Saturday, May 29, 2010

'ये यंगिस्तान की हार नहीं है...'


यंगिस्तान की हार, यंगिस्तान को धूल चटा दी, यंगिस्तान इसे एक सबक समझे, और ना जाने क्या-क्या सलोगन सुनने में आ रहे हैं। कल से ही कई लोगों की जुबान पर ये बात आ रही थी और आज सुबह अधिकतर अखबार इसी पटे हुए हैं। पर मेरा सवाल ये है कि क्या सचमुच में यंगिस्तान की हार हुई है? और हां, यहां पर एक बात साफ कर दूं कि जिम्बॉब्वे की टीम फिसड्डी नहीं है जैसा कि कई जगह बताया जा रहा है।

हां, यंगिस्तान की हार तो हुई है, जो मैदान में खेल रहा है हारेगा तो वो ही। पर क्या इस हार के जिम्मेदार भी पूरी तरह से वो ही हैं? हार की पूरी वजह भी यंगिस्तान ही है?

नहीं, इस हार को यदि प्रतिशत में देखूं तो 10 फीसदी गलती यंगिस्तान टीम की है जो कि कल मैदान में उतरी थी। जी हां, सिर्फ 10 फीसदी गलती मानता हूं टीम की। वन डे में 285 का लक्ष्य किसी भी दूसरी टीम के लिए कम मुश्किल चुनौती नहीं होता। पर क्या इस टीम के पास कोई भी ऐसा गेंदबाज था जो दूसरी टीम और लक्ष्य के बीच दीवार की तरह खड़ा हो जाता। जवाब है, नहीं। तीनों तेज गेंदबाज वन डे में अपनी पारी की शुरूआत कर रहे थे। तीनों ने पूरे 10 ओवर नहीं फेंके और साथ ही तीनों ने 6 की रन रेट से रन दिए। सफल इसमें विनय कुमार ही रहे पर महंगे भी साबित हुए। पर ऐसा क्यों हुआ कि तीन नए गेंदबाजों को एक साथ ही मैदान में उतारना पड़ा? क्या हमारे पास नेहरा, जहीर, प्रवीण को छोड़ कर गेंदबाज नहीं हैं।

नहीं ऐसा नहीं है, हमारे पास गेंदबाज हैं पर उनको मौका नहीं दिया गया। इरफान पठान, श्रीशांत, आरपी सिंह, अजीत अगरकर, जोगिंदर शर्मा को टीम के साथ भेजा जा सकता था पर क्यों नहीं टीम में शामिल किया गया ये तो सेलेक्टर्स ही बेहतर बता सकते हैं। उथप्पा, मनीष पांडे, रायडू, अभिषेक तिवारी, अभिषेक नायर इन नामों पर भी चर्चा हो सकती थी। शायद हुई भी हो पर इस टीम के साथ किसी भी सीनियर खिलाड़ी को ना भेजने के पीछे क्या लॉजिक था ये तो श्रीकांत एंड कंपनी ही बता सकती है। 70 फीसदी गलती सेलेक्टर्स की है।

20 फीसदी गलती है भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ियों की। जब कई खिलाड़ी छुट्टी मांग रहे हैं तो क्या भारतीय टीम के कप्तान धोनी को नहीं चाहिए था कि वो छुट्टी पर ना जाएं। क्यों सभी खिलाड़ियों ने एक साथ आराम की मांग की? और कैसे सेलेक्टर्स ने सभी को छुट्टी या आराम दे दिया। नेहरा ने ऐसा कौन सा पहाड़ तोड़ा था कि जिस कारण उन्हें आराम की जरूरत थी। सचिन तेंदुलकर ना तो वर्ल्ड टी-20 में गए फिर उनको आराम की जरूरत क्यों आ पड़ी।

हमारे टीम के सीनियर खिलाड़ियों से तो सिर्फ ये ही लगता है कि वो सभी अपने लिए खेलते हैं टीम या फिर देश के लिए नहीं खेलते। सब के सब आईपीएल में पैसा कमाने के लिए खेल सकते हैं पर देश की बात आए तो आराम की दरकार करते हैं। और सोने पर सुहागा सेलेक्टर्स, अपने ही पसंदीदा और क्षेत्र के खिलाड़ियों को ही टीम में शामिल करने में लगे रहते हैं।

इस हार को यंगिस्तान की हार मत कहिए, ये हार तो है हमारे बूढ़े सेलेक्टर्स और हमारे स्वार्थी सीनियर खिलाड़ियों की। इन सबको ये समझना चाहिए कि ये हार भारत की है और ये हार रिकॉर्डस में दर्ज भी जरूर होगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, May 28, 2010

’हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग’।


हर दिन की तरह आज भी दौड़ते-भागते मेट्रो में कदम रखा तो भीड़ होने के बावजूद सीट कब्जाने में मैं कामयाब हो गया। बिना वक्त गंवाए मैं रोज की तरह किताब के काले अक्षरों में गुम हो गया। मैं पन्ने दर पन्ने पलट रहा था, और मेट्रो, स्टेशन दर स्टेशन भागी जा रही थी। अगले स्टेशन पर दो लड़कियां चढ़ीं, लगभग 17-18 की होंगी। आते के साथ ही दोनों ने आंखें दौड़ाई कि महिला आरक्षित सीट कौन सी है और उस पर बैठे एक 55-56 साल के अंकल को ऑन्ली फॉर लेडीज का बोर्ड दिखा कर उठा दिया। मैंने अंकल को सीट दी पर अगले स्टॉप पर सीट वापस मिल गई, अंकल उतर गए।

मुझे याद आया कि उन अंकल जी को महिला आरक्षित सीट लगभग इतनी ही उम्र की एक लड़की ने दी थी। कभी-कभी ये देखने को मिलता है एक साथ सिक्के के दो पहलू। मैं फिर किताब के पन्नों में खो गया। मन को हल्का करने के लिए भारी किताबों से हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन का रुख कर चुका हूं। हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मक पेशकश इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर में डूब गया। अपने में मजेदार शख्शियत इंस्पेक्टर मातादीन।

मैं जितना भी मातादीन के करेक्टर में डूबने की कोशिश करता मेरे मन को उस लोक पर जाने से पहले ही ब्रेक लग जाता। मन भटकने का कारण थी इस लोक की दो बालाएं। दोनों लड़कियां चैटर बॉक्स की तरह चालू थीं। मेरे कान के पास चैं चैं...पैं पैं....बाप रे। वो आपस में बात नहीं कर रहीं थीं, वो तो दुनिया को सुना रहीं थीं कि वो कितनी बोल्ड और मॉर्डन हैं। उनकी वार्ता की विष्य वस्तु लड़के, सेक्स और समाज।

जिन शब्दों को किसी भी फैमली चैनल पर बीप कर दिया जाता है उन शब्दों का उपयोग और उपभोग वो दिल खोल के कर रही थीं। अब बारी थी एंग्री यंग मैन लुक की पर हुआ कुछ नहीं, दोनों मुसकुराते हुए उस लुक को ओवर लुक कर गईं। मैंने किताब की तरफ ही रुख करना बेहतर समझा।

मैं किताब में डूबा हुआ था इनमें से एक लड़की ने पूछा कि हमें फ्लां-फ्लां जगह पर जाना है। अब मुसकुराने की बारी मेरी थी। दोनों को वहां जाना था जिसके लिए पिछले स्टेशन पर उतरना होता है और वहां से दूसरी मेट्रो पकड़नी पड़ती है। अब भी वैसे कुछ ज्यादा बिगड़ा नहीं था। मैंने उन दोनों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अंत में एक मुनियों वाली वाणी में मैंने संदेश दिया जिसे दोनों ने बड़े ही ध्यान से सुना।

मेरी बातें जो दो-चार सुन रहे थे समर्थन कर रहे थे और साथ ही अपनी भड़ास मधुर वाणी में निकाल रहे थे। वहां खड़े हर किसी को पता चल चुका था कि मार्डन दिखने और लगने में बहुत फर्क होता है। मार्डन होने का ये मतलब नहीं कि अक्ल के दरवाजे बंद कर दो।

दोनों वहां से जल्द गेट पर पहुंची और जाते-जाते एक जुमला भी छोड़ गईं हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग मेट्रो का दरवाजा खुल चुका था और वो दोनों इस प्रकरण को हंसी में उड़ाते हुए आगे बढ़ गईं और पीछे छोड़ गई वो ओल्ड जनरेशन। मैंने किताब बंद की और बैग के हवाले करते हुए सीट छोड़ दी, मैं अपने गंतव्य तक पहुंचने वाला था।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, May 27, 2010

धीरे-धीरे एक आदत की ओर...


सुबह हर किसी को जल्दी, हर कोई अपने कदमों से तेज, दूसरे से पहले पहुंचने की होड़। एक अजनबी से भी एक अनजाना मुकाबला, आगे निकलने की जद्दोजहद। हर कोई भीड़ का हिस्सा और नहीं भी। एक-दूसरे को धक्का देते, कोहनी से पीछे ढकेलते, आगे बढ़ जल्दी से सीट लपकने की जी जान कोशिश। और फिर सीट पर बैठकर शून्य में खोने का वो एहसास। उफ!!...देखते ही बनता है, हजारों के साथ अकेले सफर करना, भीड़ में अपने ख्यालों के साथ खो जाना।

मेट्रो की सीढ़ियों से ही जैसे मुकाबला शुरू हो जाता है। सबसे पहले दौड़ कर लिफ्ट पकड़ने की चाहत। जो सवार हो गया तो उसे सीट कब्जाने की होड़ और जो नहीं चढ़ पाया उसे सीढ़ियों के रास्ते सीढ़ी दर सीढ़ी किसी को पीछे छोड़ने की होड़। प्लेटफॉर्म पर सिर से जुड़े सिर फिर भी हर कोई हर एक से जुदा-जुदा।

एक बार इधर-उधर अपने सिर को घुमाकर देखिए। पहले बहुत कम लोग पढ़ते हुए चला करते थे पर मेट्रो में इस का चलन वापिस शुरू हुआ है। ना मुझे इस से मतलब ना उस से। कान में इयर फोन, हाई मैमोरी बेस्ड मोबाइल जिसमें सुनने को अथाह सामाग्री। बड़ों की तरज पर हाथ में न्यूजपेपर या फिर अंग्रेजी का कोई नॉवेल। ये है कुछ युवाओं का चेहरा। कुछ युवा जुदा भी हैं। दोनों में कॉमन है मोबाइल, वो नॉवेल में ना करते हुए, मोबाइल में ही आरएनडी करते रहते हैं।

मैने मेट्रो में कुछ दिन तो और लोगों की तरह सिर से सिर मिलाकर आंखों में नींद या फिर पुराने ख्याली पुलाव या दिन के सपनों के साथ गुजार दिए। पर फिर लगा कि नहीं ऐसे 25-30 मिनट बेकार में बेकार करना ठीक नहीं। तो अधिकतर कोई किताब रखकर चलता हूं और जैसे ही मौका मिला, लग जाता हूं पन्ने पलटने में। मेट्रो के कारण कई किताब खत्म करने में कामयाब रहा हूं।

कई बार मेट्रो में कुछ बातें ऐसी होती है जो कि ना जाने क्यों दिल को छू जाती हैं और कुछ दिल को दुखा देती हैं। इन सब बातों की बात अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, May 22, 2010

दूर बैठे, दूर की सोच


गांव, मेरा गांव। जब भी गांव जाता हूं तो करीब 40-50 किलोमीटर पहले ही वो शहर की पक्की सड़क पीछे छूट जाती है। फिर शुरू हो जाता है सफर कच्ची सड़क का, जिसे बोलचाल की भाषा में खड़ंजा (ईट की सड़क) कहते हैं। फिर शुरू हो जाती है हरियाली और सिर्फ हरियाली। मिट्टी की सौंधी-सौंधी महक, वो खुशबू, जो बीमार को भी भला-चंगा कर दे। दूर- दूर तक आंखें सिर्फ देख पाती है तो लहलहाते खेत, हरे-भरे खेत। खेतों में बनी पगडंडी और उस पगडंडी पर कोई खेत में काम कर रहे अपनों के लिए खाना ले जाता या फिर दूर से ही आते दिखती सर पर घास का बड़ा गठ्ठर लिए जिसे कोई आम आदमी सोच भी नहीं सकता उठाने की।

गांवों भी अब पक्के मकानों से घिर चुका हैं पर शहर जैसी कोठियां नहीं है। वो पुराने अंदाज और जमाने की कोठियां। गांव में जिसके पास सबसे छोटा घर होगा उसकी कीमत भी शहर में एक आम आदमी की बड़ी पहुंच से बहुत ऊपर होगी। पर गांव में वो एक गरीब किसान, एक मजबूर मजदूर है।

काफी दिन से सोच रहा था कि गांव का चक्कर लगा आऊं। पर जाना हो ही नहीं पा रहा। वहां की तो बस यादें ही रह गई हैं, जाना तो जैसे छूट ही गया है। ये हालात तो तब हैं जब गांव मेरे बसेरे से महज 125 किलोमीटर भी नहीं है। गांव में चाचाजी और दूसरे नातेदार रहते हैं और हमारी खेती संभालते हैं। पर वक्त का अंतराल इतना हो गया है कि मेरा कोई रिश्तेदार मुझे शहर की सड़कों पर रोक कर पूछें, कि पहचाना? तो मैं बहुत ही असहज हो जाऊंगा और कहने को मजबूर हो जाऊंगा, माफ कीजिएगा नहीं पहचाना। कई बार लगता है जब फासले इतने ज्यादा हो गए हैं तो क्यों ना खेत-खलिहान बेच दूं। पर क्या अपनी जड़ों से इतना आसान होता है कट जाना?

उस फैसले से हम अपनी जड़ों को खो देंगे। पुरखों की एक मात्र निशानी ही है जो कि हमें अपनों के काफी करीब रखती हैं ये जमीन। शहर कि भागती दौड़ती जिंदगी की जैसे आदत सी पड़ गई है। वहां जाने की सोचता हूं तो कई बार मेरी सोच भी ये सोच नहीं पाती कि समय कैसे निकालूंगा। कितना घूमूंगा खेतों में, कितना देखूंगा आखों को सुकून देने वाले वो मनोरम दृष्य।

अभी तो फासले ही हुए हैं पर फिर वो खाई पैदा हो जाएगी जो कभी भी उस फासलों को भर नहीं सकेगी। आज गांव चला जाता हूं तो लगता है कि मैं भी यहां का हिस्सा हूं। जैसे समीर लाल जी को लगता है कि इतने सालों के बाद भी भारत की मिट्टी के हिस्सा हैं।


आपका अपना
नीतीश राज 

Friday, May 21, 2010

अब इस फतवे से जगी आस


भारत में 90 फीसदी मुस्लिम छात्र दसवीं तक पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। शहरों में सिर्फ 1 फीसदी महिलाएं और 3.4 फीसदी मर्द स्नातक हैं। गांवों में मात्र 0.7 फीसदी पुरुष स्नातक हैं और महिलाएं ना के बराबर हैं।

आए दिन कोई ना कोई फतवा। कभी इस बात पर फतवा कभी उस बात पर फतवा। खुद का दिमाग खराब है और साथ ही वो हमारा भी दिमाग खराब कर रहे हैं। अरे आज से कुछ दशक पहले फतवे का खौफ था। जब भी किसी के खिलाफ फतवा जारी हो जाए तो समझो उस शख्स की शामत आगई। पर अब तो ये आलू-प्याज की तरफ दिए जा रहे हैं कभी-कभी तो लगता है कि प्याज का दाम ज्यादा है इन फतवों से।



फतवे ही फतवे

बालों में डाई नहीं लगा सकते सिर्फ मेहंदी लगाएं, वंदेमातरम् नहीं गाएंगे, महिलाओं के मॉडलिंग के खिलाफ फतवा, बॉडी स्कैनर के खिलाफ फतवा, पैसों को बैंक में ना रखें, ब्याज पर पैसे को रखना, औरतें मर्दों के साथ काम नहीं करें, फेसबुक के खिलाफ पतवा...और पता नहीं क्या-क्या। यदि इन लोगों का बस चले तो ये झौंक दें देश को 100 साल पहले के समाज में। अरे, कुछ तो सोचो कि यार क्या फतवा दे रहे हो। फतवा कोई कानून तो है नहीं, ये तो सिर्फ एक राय है पर वो राय तो सोच समझ के दी ही जा सकती हैं।

फेसबुक पर फतवा क्योंकि मिस्र में कुछ जोड़ों का तलाक फेसबुक की वजह से हुआ। गलतियां कोई करे और उठाकर जो मन में आए सुना दो फतवा।

औरतें मर्दों के साथ काम नहीं कर सकती। इस पर बाद में मशविरा का नाम देकर कन्नी काट ली गई पर ऐसी राय भी क्यों दी गई कि सभ्यतापूर्ण कपड़े पहनकर महिलाएं काम पर जाएं। किसी की निजी जिंदगी पर कमेंट करना या फिर बेफालतू की राय देने की ही क्या जरूरत है।

बस ये ही एक आस

ये मत करो, ये मत करो, ये मत करो पर अब पहली बार कोई पॉजिटिव फतवा सामने आया है। महिलाओं को जरूरी है शिक्षा। औरतों की तालीम पर जोर दिया गया है। सभी जानते हैं कि इस्लाम में कहा गया है कि बांदी तक को शिक्षित करो। इस तरह के फतवे जारी करो तो बेहतर है।

भारत में 90 फीसदी मुस्लिम छात्र दसवीं तक पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। शहरों में सिर्फ 1 फीसदी महिलाएं और 3.4 फीसदी मर्द स्नातक हैं। गांवों में मात्र 0.7 फीसदी पुरुष स्नातक हैं और महिलाएं ना के बराबर हैं। अभी हाल ही में जारी प्लानिंग कमीशन की रिपोर्ट में ये बात सामने आई है। ये आंकड़ें अपने में सारी बात कहते हैं।

हर जगह भद पिटने के बाद फतवादारों ने अब तालीम पर जोर दिया है। जिस काम को सबसे पहले अंजाम तक पहुंचाना चाहिए था वो अब पहुंचाया जा रहा है। तालीम पर फतवा उस समय में जारी किया गया है जब कि लोगों का फतवों से विश्वास उठ रहा है।

इस बार ये एक आस जगी है कि यदि ये फतवा कामयाब हुआ तो जरूर ही भारत देश के रूप में तरक्की करेगा और साथ ही अशिक्षित लोग दूसरों के बहलावे में आकर देश का नुकसान नहीं करेंगे। चलो अच्छा है कि देर से ही पर जागे तो।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, May 20, 2010

“वो पुरानी खिड़की”-2


अब आगे...

.....कहते हैं कि वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता, और उसके लिए वक्त बदल भी गया। मेरे लिए तो वक्त अभी था पर उसका वक्त भी तो मेरा हो चुका था जो मुझसे मेरी ही चुगली कर रहा था और बता रहा था मुझे कि अब मेरे पास भी वक्त नहीं रह गया है। मेरे वक्त ने तो कसम खा रखी थी कि मेरा साथ नहीं देगा। उसका वक्त, उसका साथ छोड़ते हुए भी उसके साथ था।

आज भी मेरी किस्मत के तार उस खिड़की के साथ जुड़े हैं जिस खिड़की से मैं नीलम को देखा करता था। कई बार यूं ही हाथ अचानक बिना किसी आवाज़ के ही उठ जाता है और चुपचाप कहता है कि आ रहा हूं। उस हाथ की आवाज़ अब किसी को समझ में नहीं आती है। वो चारपाई जिस पर हम साथ वक्त गुजारा करते थे वो अब भी चर-चर करती है और अचानक उसकी चर-चर आज भी हंसा जाती है। छज्जे पर पड़ी वो सीढ़ी गंदी हो चुकी है पर आज भी उस धूल की परतों के नीचे हम दोनों के पैर की छाप देखी जा सकती है। एक पांव में पड़ी उसकी पायल आज भी कभी-कभी दिमाग में छम-छम कर जाती है। हर एक छम के साथ ही पूरे शरीर में एक लहर सी दौड़ जाती है।

चाय की चुस्की लेते हुए उस खिड़की से बाहर देखते हुए मैं अक्सर सोचता हूं कि वक्त कब और कैसे करवट बदलता है पता ही नहीं चलता। ग्रेजुएशन करने के बाद इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन और फिर बीएड के बाद 4 गांवों के एक स्कूल में मास्टर बन गया। दूर तलक कई गांवों में ऐसा स्कूल नहीं है आमदनी अच्छी-खासी हो जाती है। गांव से थोड़ा बाहर जाना पड़ता है थोड़ी दूर है पर फिर भी इस कमरे में वापस आते ही सारी थकान गायब हो जाती है।

दो साल का वो वक्त कितना आसान था जिंदगी जीना का मन करता था। पर वक्त बदला और मेरी दुनिया भी। उस एक वक्त ने मेरी दुनिया बदल दी और तब से आजतक मेरी दुनिया बदली हुई है। अब कोई भी इस पुरानी खिड़की की तरफ कंकड नहीं उछालता। ना ही नीलम और ना ही शंभू। ना शंभू कभी नीलम से मिला था और ना ही नीलम कभी शंभू से मिली थी पर भगवान ने दोनों की जोड़ी लिखी थी। शंभू की मां की तबीयत बिगड़ी जल्दबाजी में लड़के की शादी की बात चली और जब तक कोई समझता दूल्हे संग 5 बाराती लड़की वालों के घर पर थे उनमें से दूल्हे संग मैं था।

आपका अपना 
नीतीश राज

Wednesday, May 19, 2010

“वो पुरानी खिड़की”-1


अब आगे....

.....जेठ के महीने की चिलचिलाती धूप में भी वो हौसला दिखाते हुए मुझसे मिलने पहुंच ही जाती थी मेरे तपते हुए कमरे में। उसके पत्थर फेंकने पर मैं धीरे से बिना आवाज़ किए सीढ़ी नीचे उतार देता और फिर हम दोनों घंटों बैठकर बातें करते रहते थे। कभी इतिहास (history) की तारीखों में उलझते तो कभी सांख्यिकी(statistics) का कोई सवाल ऐसा पेंच फंसाता घंटों उसी में उलझ कर रह जाते।

एक रात जब मैं शंभू के साथ खाने के बाद का कोटा(सिगरेट का) खत्म करके कमरे में लौटा तो थोड़ी ही देर बाद एक पत्थर कमरे की खिड़की तक नहीं पहुंच पाया। समझ ने दिमाग को तुरंत सतर्क किया, पर इस सतर्कता में मन घबरा गया कहीं ये वो तो नहीं है। तुरंत चर-चर करती अपनी चारपाई से उठते हुए खिड़की से हाथ बाहर निकाल दिया। धीरे-धीरे आंखों को खिड़की के बाहर तक लेगया। मैं हतप्रभ था। इस समय नीलम यहां पर? जल्दी से छज्जे पर पहुंचा, नीचे वो अपनी बहन के साथ साइकिल पर खड़ी थी। उसने सिर्फ एक कागज को पत्थर पर लपेट कर छज्जे की तरफ उछाल दिया और चली गई।

उसे सांख्यिकी के उस सवाल का हल मिल गया था जिस पर आज पूरी दोपहरी हम दोनों ने माथापच्ची की थी। उस पर्चे में मेरी वो छोटी सी गलती बता दी जिसके बाद हल तुरंत निकल गया। वो जानती थी कि मैं पूरी रात इसी सवाल में लगा रहूंगा जब तक कि हल नहीं मिल जाएगा। मैं पूरी रात आंखों में ना काटूं इसलिए सिर्फ वो हल बताने इतनी रात मेरे पास आई। दीवानी थी वो, पढ़ाई की और साथ ही मेरी भी।

पर धीरे-धीरे ये मुलाकातें, ये बातें पढ़ाई तक ही नहीं रह गई थीं। कभी घर की बातें होतीं तो कभी बिल्कुल निजी। निजी कुछ इतनी कि वो बातें हम दोनों में ही हो सकती थी किसी तीसरे से नहीं। वो चोरी छिपे घर आती और हम दूसरी दुनिया में गोते लगाने लगते। अब बातों का सिलसिला दूरियों से कम होता-होता हमारी नजदीकियों में समाने लगा। वो पल, उस समय के वो पल भुलाए नहीं भूलते।.....।

                                                जारी है.....

आपका अपना
नीतीश राज

ये फैसला तो जरूरी था।


पिछले वर्ल्ड टी 20 में मैंने एक पूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता से पूछा था कि कौन सी टीम सब से प्रबल दावेदार है कप की। उनके जवाब से मैं संतुष्ट नहीं हुआ। मैंने कहा कि पाकिस्तान को आप कम मत आंकिए ये कभी भी उल्टफेर करने का माद्दा रखती है। उनका जवाब क्या था वो आप को बाद में बताता हूं पहले बात इस बारे में।

ये तो जरूरी था।

7 दिन के अंदर नोटिस का जवाब देना होगा भारतीय टीम के 6 खिलाड़ियों को जिन्होंने वर्ल्ड टी-20 में भारत की शर्मनाक विदाई के बाद पब में पंगा किया था। युवराज सिंह, जहीर खान, आशीष नेहरा, रोहित शर्मा, पीयूष चावला और रवींद्र जडेजा को बोर्ड ने नोटिस जारी किया। वैसे तो हारने के बाद भारतीय जमीन पर कदम रखते ही आशीष नेहरा का पीछा पब ने नहीं छोड़ा था। पर पब के किसी भी तरह के पंगे से उन्होंने गुस्से की हंसी के साथ साफ-साफ इनकार किया था। साथ ही टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी युवराज सिंह ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर में कहा था कि उनका कोई पंगा नहीं हुआ।
वेस्टइंडीज टूर पर भारतीय टीम मैनेजर रंजीव बिस्वाल ने खिलाड़ियों के इनकार के बाद जो रिपोर्ट सौंपी उसमें ये साफ था कि पब में पंगा हुआ था पर हाथापाई नहीं हुई थी

कितनी शर्म की बात है कि सीनियर खिलाड़ियों ने ऐसा बर्ताव किया। हार गए और ऐसा बर्ताव। सीनियर खिलाड़ी बखूबी जानते हैं कि क्रिकेट को खुदा की तरह समझने वाले देश भारत के प्रशंसक कैसे हैं। इन्होंने गलती की और गलती के बाद झूठ बोला। एक बार नहीं बार-बार। वहीं दूसरी तरफ, हम यदि ये कहें कि हार का गम था और फैन्स को ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए था तो ये भी गलत है। ऐसा तो होना ही था पर हां उसको अंत कुछ इस तरह होगा ऐसा शायद ही किसी ने सोचा हो। ये अनुशासनात्मक कार्रवाई इन खिलाड़ियों के ऊपर होनी थी और ये जरूरी भी थी।

धोनी का बयान, एक तीर दो निशाने

वहीं धोनी ने कहा कि टीम के चयन में चयनकर्ता उनकी सुनते नहीं है। तो ये बात पहले भी कही जा सकती थी। जब तक टीम जीत रही थी तब तक आपको भी कोई दिक्कत नहीं हुई पर जैसे ही टीम हारी आप भी खिलाड़ियों के साथ छोड़कर दूर खड़े होगए। जबकि ये बात आप खुद जानते हैं कि इस बार के टी-20 में आपके कई फैसलों पर सवालिया निशान लगाया जा रहा है। लेकिन धोनी कहीं ना कहीं टीम / बोर्ड की राजनीति को भी सामने लाना चाहते हैं।

बोर्ड भी कठघरे में

असल मायने में बोर्ड पर भी सवाल उठना चाहिए। ना वो कोच की सुनती ना ही वो कप्तान की सुनती, क्यों? याद है मुझे पिछले वर्ल्ड टी-20 में हार के बाद भी बोर्ड के एक सदस्य का ये ही कहना था जो कि इस बार भी दोहराया उन्होंने कि यदि खिलाड़ियों को थकान महसूस हो रही थी तो वो बताते तो हम उन्हें आराम देते। रटा-रटाया बयान फिर से जैसे पढ़ दिया गया हो। यानी की वो बोर्ड अधिकारी पुरानी गलतियों से सबक नहीं लेते हैं, इससे तो ये ही जाहिर होता है।
दूसरी बात, इस बात से मैं तो कतई इत्तेफाक नहीं रखता कि सहवाग की जगह मुरली विजय को भेजने का फैसला ठीक कहा जाएगा। आईपीएल की फॉर्म रॉबिन उथप्पा को भेजने की हिमायती दिखती है पर फिर ये फैसला क्यों लिया गया, शायद सेलेक्टर ही जानते हों। मुरली विजय जिस टीम से आईपीएल में खेलते हैं उस टीम के मेंबर बोर्ड में भी मेंबर हैं।

आईपीएल असर तो डालता ही है....

आईपीएल ने फायदा दिया या घाटा पहुंचाया इस पर बहुत समय से बहस हो रही है पर जहां पर जिस देश में आईपीएल ने जन्म लिया और उस देश का कप्तान ये कहे कि थैंक्स, अगली बार पहले वर्ल्ड कप है बाद में आईपीएल। इस बयान से आप एक कप्तान की व्यथा जान ही सकते हैं कि आईपीएल में कितना पेंच होता है। शायद ये ही कारण है कि इस बार आईपीएल के किसी भी खिलाड़ी ने वहां पर परचम नहीं लहराया।

जाते-जाते----अच्छा हुआ कि इंग्लैंड जीता कप

पिछले वर्ल्ड टी 20 में मैंने एक भूतपूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता से पूछा था कि कौन सी टीम सब से प्रबल दावेदार है इस बार वर्ल्ड टी 20 की। उनके जवाब से मैं संतुष्ट नहीं था। मैंने कहा कि पाकिस्तान को आप कम मत आंकिए ये कभी भी उल्टफेर करने का माद्दा रखती है। उनका जवाब था कि नए खिलाड़ी हैं क्या जीतेंगे। जवाब में मैंने कहा कि पिछली बार भी तो भारत जीत गया था सभी बच्चे थे। पाकिस्तान की ये टीम नहीं जीत सकती, उन्होंने जवाब दिया।
जब पाकिस्तान ने कप जीता, मेरा उनसे आमना-सामना कई बार हुआ अब वो कभी बातचीत में ऐसी कोई लाइन नहीं लेते कि ये तो नहीं हो सकता।
अच्छा हुआ फिर इस बार वो टीम जीती जिसे दावेदार की सूची में नहीं रखा जा रहा था। जितने लोग थे उतने चैंपियन थे, कोई कह रहा था वेस्टइंडीज, द. अफ्रीका, पाकिस्तान शायद भारत भी...। पर अच्छा हुआ कि इंग्लैड जीत गया। पहली बार इतिहास में इंग्लैंड ने कोई ऐसा खिताब जीता है। इंग्लैंड में शुरू हुआ क्रिकेट आज तक एक बार भी 50-50 का चैंपियन नहीं बन पाया है। ब्रिटेन की लेबर पार्टी की सचमुच में हार हुई और ब्रिटेन में बदलाव आ ही गया।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, May 18, 2010

“वो पुरानी खिड़की”


वो खिड़की, मेरी खिड़की, जो कुछ पुराने जमाने की थी, वहां से सड़क दूर तक दिखती। कोई भी दूर से आता आसानी से खिड़की की सलाखों के बीच से पहचाना जाता। पूरी सड़क दिखा करती थी, हमारा घर या यूं कहें कि उस दुमंजले वाली खिड़की सड़क के साथ-साथ थोड़ी सी कर्व में मुड़ रही थी। घर को बनाते समय दादा जी ने गांठ मार ली थी कि घर की एक खिड़की सड़क के साथसाथ ही घूम जाए जिससे हम जब चाहें सतर्क हो सकें।

उस दुमंजले वाले कमरे की खाली और पुरानी हो चुकी खिड़की के पास मैं, लेटा रहता था। मेरा कूलर और एसी तो ये ही खिड़की थी। चर-चर करती चारपाई और साथ रखे लकड़ी के बड़े स्टूल (हम उसे टेबल की संज्ञा नहीं दे सकते) पर पड़ी किताबें ये ही पहचान थी मेरी और मेरे कमरे की।

खिड़की के रास्ते कोई पत्थर गर अंदर आकर गिरता तो समझो कि शंभू आ गया है। सिगरेट पीने का ये ही सिग्नल हुआ करता था। दिन में, तीन बार पत्थर इस खिड़की से अंदर आया करता था। सुबह जब शंभू काम पर जाता, फिर जब वो काम से वापस लौटता और तीसरा खाना खाने के बाद सैर करने के लिए। सिर्फ ये ही तीन वक्त थे जब सिगरेट पीने के लिए मैं बाहर निकलता और पूरे दिन का कोटा यानी चार-पांच सिगरेट खींच लेता।

शंभू काम करता था अपने बाबू जी की फेक्ट्री में। बारहवीं के बाद ही वो काम करने लग गया था और तभी से खिड़की से अंदर पत्थर आने लग गए थे। इधर मुझे इंतजार रहा करता था सुबह से शाम और फिर रात का और रात के बाद फिर सुबह का फिर....। ये क्रम यूं ही चलता रहा मैं अब भी पढ़ाई ही कर रहा था, सेकेंड ईयर में। मेरे पास पैसे नहीं हुआ करते थे। वहीं दूसरी तरफ मेरे साथ के कई लड़के कमाने लग गए थे क्योंकि वो पढ़ाई छोड़ चुके थे।

जब कंकड़ खिड़की के रास्ते अंदर ना आए तो समझो कि नीचे नीलम है। मैं दूसरा कंकड़ फेंकने से पहले ही हाथ बाहर निकाल देता। वो समझ जाती कि मैं कमरे में हूं, ये इशारा होता था हमारा। यदि हाथ बाहर नहीं निकलता तो वो चुपचाप उल्टे पैर लौट जाती। पर जब मैं होता तो कमरे के छज्जे पर पड़ी सीढ़ी काम आती। जिसे नीलम से दोस्ती होने के बाद बड़ी मशक्कत से मैंने बनाया था। इस सीढ़ी के बारे में सिर्फ हम दोनों ही जानते थे।
 
                                                         जारी है.....

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”