
30 जून को पहली बार एक चिंगारी ने आग पकड़ी थी, और तभी से जल रहा है जम्मू। जम्मू में लगी हुई है आग। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन वापस देने की मांग पर लगातार फूंकी जा रही है गाड़ियां, जलाए जा रहे हैं घर। घरों में दुबके-सहमें हुए हैं लोग। आए दिन किसी के मरने की ख़बर आती है। कभी किसी पुलिसवाले की जान गई तो कभी किसी के घर से उठती रहीं चीखें। लेकिन ये आग अभी भी नहीं बुझी है। कर्फ्यू तोड़कर भी लोग हंगामा करने से बाज नहीं आ रहे। उपद्रव भीड़ और पुलिस के बीच हर दिन झड़प हो रही है। 100-150 से भी ज्यादा बार इन झड़पों में भीड़ के निशाने पर रहीं गाड़ियां, दुकानों और सरकारी संपत्ति। इन्हें ये भी नहीं मालूम कि इन नुकसानों की भरपाई आने वाली जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए सरदर्द बन जाएगी।
तीन दिन पहले पुलिस चौकी फूंकी दी गई। 7 पुलिसवाले घायल हो गए और लगातार ख़बर मिलती रही कि कुछ पुलिसवाले बंधक बनाए जा चुके हैं। पुलिस और लोगों की इस झड़प में 5 पुलिसवालों की मौत
भी हो चुकी है और अब तक 10 लोग भी इस हिंसा का शिकार हो चुके हैं।जम्मू और घाटी के बीच चल रही इस जंग में अब 37 दिन बाद सियासत चमकाने नेता वहां का रुख कर रहे हैं। सर्वदलीय बैठक में यह फैसला लिया गया कि एन एन वोहरा को राज्यपाल के पद से नहीं हटाया जाएगा। अब एक कमेटी का गठन भी कर दिया गया है जो जम्मू-कश्मीर के उन हिस्सों में जाएगी जहां पर आग का क़हर बरपा है। ये कमेटी लोगों से भी बात करेगी। लेकिन जो हाल इस समय इस राज्य का लग रहा है उससे तो कतई नहीं लगता कि ये कमेटी वहां पर जाकर कुछ ठोस कर भी पाएगी। समस्याओं पर जब सियासी समाधान की कोशिश होती है, तो वो किसी बंद कमरे में लंबी मेज के चारों और बैठे बड़े-बड़े नेताओं के सामने होती है। लेकिन, वो भूल जाते हैं कि बंद कमरे के बाहर सियासत फिर भी रुकती नहीं।
बीजेपी की सुषमा स्वराज ने फिर मुंह खोल दिया और कांग्रेस की पूर्व सरकार पर इसका ठीकरा फोड़ दिया है। इस में तो कोई दो राय नहीं कि अमरनाथ की आग कांग्रेस की लगाई हुई है। पर अभी वक्त है उस आग पर पानी डाल कर इसे शांत करने का। ये नहीं कि इस आग में घी डालकर दूर खड़े होकर मजा लेने का। यदि मजा लिया तो ऐसा ना हो कि इस देश के स्वर्ग पर जो नजर लग गई है उस पर पड़ी इस कालिख की कालक इतनी चढ़ जाए और हमारे हाथ उस कालिख से इतने काले हो जाएं कि फिर कभी चाह कर भी साफ ना हो सकें।
आपका अपना
नीतीश राज