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Saturday, September 12, 2009

क्यों है हमारा कानून इतना लचीला? क्यों अपील करने पर दोषी को बाइज्जत बरी कर दिया जाता है?

आश्चर्य होता है मुझे कि हमारा कानून इतना लचीला क्यों है। क्यों एक तरफ हमारा कानून एक आरोपी को दोषी ठहराकर फांसी और दूसरे ही पल उसी आरोपी को बाइज्जत बरी कर देता है। या तो पहले वाली अदालत ने गलत फैसला दिया या फिर दूसरी अदालत याने की ऊपरी अदालत ने गलत फैसला दिया। कानून के कुछ जानकार खुद इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि एक अदालत और दूसरी अदालत एक ही केस पर दो निर्णय कैसे सुना सकती है। वहीं दूसरी तरफ कुछ जानकार ये भी मानते हैं कि जिस तरह से केस विशेष अदालत में पेश किया गया शायद उसी तरह से हाईकोर्ट में केस पेश नहीं किया गया। साथ ही, विशेष अदालत में आरोपी के पक्ष में शायद तथ्य उतने नहीं हो जितने कि हाईकोर्ट में बाद में पेश किए गए हों।


आज नोएडा के बहुचर्चित निठारी मामले में गाजियाबाद की विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया। पंधेर के मामले में विशेष अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंधेर को रिम्पा हल्दर मर्डर केस में बाइज्जत बरी कर दिया। रिम्पा हल्दर मर्डर केस में सारे आरोपों से पंधेर को बरी कर दिया गया और इस मामले में उसे निर्दोष साबित कर दिया। वहीं सुरेंद्र कोली की फांसी की सज़ा को बरकरार रखा गया है। जुलाई 2009 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ मोहिंदर सिंह पंधेर और सुरेंद्र कोली ने याचिका दायर की थी।


जनवरी 2007 में निठारी का ये हैवानियत से भरा वाक्या हुआ था और आईपीसी की कई धाराएं दोनों आरोपियों पर लगी थी। सीबीआई को सौंपी गई थी इस केस की फाइल। दो साल तक गाजियाबाद की विशेष अदालत में चली थी सुनवाई। सुनावई के दौरान लोगों का आक्रोश इतना ज्यादा बढ़ गया था कि लोगों ने दोनों की जमकर धुनाई की थी। फरवरी 2009 को रिम्पा हल्दर केस में मोहिंदर सिंह पंधेर और सुरेंद्र कोली को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई। पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महीने तक लगातार सुनवाई करके विशेष अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुए पंधेर को बरी कर दिया पर कोली के आरोप बरकरार रखे।


क्या गाजियाबाद की विशेष अदालत ने भावनाओं में बहकर दोनों आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी। या क्या कारण है कि आज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंधेर को बाइज्जत बरी कर दिया। मैं कोर्ट के फैसले की अवेहलना नहीं कर रहा। पर मुझे दुख इस बात का है कि एक कोर्ट किसी एक शख्स को मुजरिम ठहरा देती है और फिर वो शख्स मुजरिम कहलाता है। पर जब वो दो उसी केस में अपील करता है तो बाइज्जत बरी कर दिया जाता है तो क्या कोई भी कानून उसके वो दो साल जो कि उसने जेल में काटे वो वापस दिला सकता है। दलील है कि पंधेर उस वक्त ऑस्ट्रेलिया में था और शायद वो बेकसूर था तो फिर उसे सज़ा ही क्यों हुई? यदि सजा हुई है तो क्या कारण है कि अब वो रिहा हो गया।

वैसे 17 मामलों में 1 में फैसला उनके पक्ष में आया है अभी तो 16 केस बाकी हैं।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”