Friday, July 4, 2008

शहंशाह से बब्बन, अब अय्यार

शहंशाह तेरे कितने रूप? इस सवाल का जवाब दे पाना ही मुमकिन नहीं। हर किरदार में छुपा है एक नाम और नाम में छुपी है शख्शियत। आजकल फिर दिखने लगा है एक चेहरा। लोहे का मास्क पहने हुए, जो एक आंख को कवर करता है लेकिन उसमें एक आंख आधी छिपी, आधी दिखाई देती है। चेहरे पर सफेद दाढ़ी, लिबास में सफेद चोंगा और हाथ में नंगी तलवार, सफेद घोड़े पर ‘अय्यारी’ करते हुए। जल्द ही पर्दे पर आप उन्हें देख पाएंगे, आने वाली नई फिल्म में, जिसमें वो अय्यार बने हैं। फिल्म में सिर्फ अमिताभ ही अय्यार नहीं हैं, इनके अलावा तीन अय्यार और भी हैं। १८९२ में लिखे उपन्यास चंद्रकांता पर आधारित हैं। जिसका नमूना आप चंद्रकांता टीवी सीरियल में पहले ही देख चुके हैं। इस बार फिर अमिताभ पर नया प्रयोग किया है विधु विनोद चोपड़ा ने। जिंदगी के इस पड़ाव पर भी एक्टिंग में प्रयोग से नहीं घबराते बिग बी। अधिक्तर फिल्मों में बिग बी ने अपने आप को, किरदार के रूप में ढालने के लिए, उसमें समाने के लिए अपने अक्स को भी भुला दिया और फिर जो सामने आया वो रहा गया सिर्फ एक बदला हुआ नया अक्स। हाल में देखें, तो ‘रामू की आग’ में अमिताभ के चेहरे, चाल, आवाज़ पर प्रयोग किया गया, फिल्म नहीं चली लेकिन ‘बब्बन’ का नाम चल गया। विधु विनोद चोपड़ा की ‘एकलव्य द रॉयल गार्ड’ में अचूक निशानेबाज, हवेली का रखवाला ‘एकलव्य’। इसमें राजस्थानी भेष में, सर पर पगड़ी, कमर में गमछा, राजस्थानी लिबास और पैर में जूतियां।
‘चीनी कम’ में पहली बार चोटी में नजर आए । ‘मेरी उम्र तुम्हारे बाप से भी पांच साल ज्यादा है’ ये उस भूमिका की बेचारगी भरे अल्फाज, जिसमें उन्होंने अपने से आधी उम्र की लड़की से प्यार करने किया। वैसे रामू की ‘निशब्द’ में भी किरदार की कहानी लगभग मिलती-जुलती थी लेकिन उस में गेटअप बदला नहीं था। पगड़ी बांधे ‘मेजर साहब’ तो आप को याद ही होंगे। सबको लगा कि पगड़ी में अमिताभ उतना जचे नहीं। मेरा मानना भी कुछ ये ही है। बेटे की फिल्म को प्रमोट करने के लिए ‘झूम बराबर झूम’ में एक टाइटल गाने के लिए मेहमान के तौर पर भी आए। इसमें बिग बी का गेटअप एकदम अलग और निराला था। कोई भी अभिनेता अपनी छवि से अलग नहीं जाना चाहता। लेकिन अमिताभ के साथ ये बात नहीं है। सर पर फरों वाली टोपी, ढीली ढाली कमीज, जींस चुस्त, हाथ में गिटार, लंबे बूट में किसी भी रॉक स्टार से कम नहीं लग रहे थे। और ‘अक्स’ के उस बेहरूपिया से आप को मिलाने की जरूरत तो नहीं। लेकिन इस फिल्म में मनोज वाजपेयी ने अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा दिया था।
बिग बी की सबसे पहली वाली छवि ‘एंग्री यंग मैन’ की थी, दशकों तक उनको इसमें ही याद रखा गया। क्या बिग बी की उस छवि पर ये सारी छवियां अपना
असर छोड़ पाने में कामयाब हो पाएंगी?
अब हाल ही में उनकी एक फिल्म आने वाली है...’तलिस्मान’ जिसमें उन्होंने एक अय्यार की भूमिका निभाई है। अय्यार का मतलब समझ में आ ही गया होगा आपको, गर नहीं, तो याद दिलाता हूं। ’यक्कू मामा’.... कुछ याद आया, सीरियल चंद्रकांता....इस सीरियल का ये किरदार छोटे पर्दे पर काफी लोकप्रिय हुआ था। इस बार अमिताभ 'अय्यारी' करते नज़र आएंगे। इस किरदार में चेहरे पर सफेद दाढ़ी, लिबास में सफेद चोंगा और हाथ में नंगी तलवार साथ में सफेद घोड़े का साथ। गेटअप तो देखने से ही अलग और आकर्षित करने वाला लगता है। बिग बी के बारे में कुछ भी लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा है। लेकिन देखना तो ये है कि इस किरदार में ये सूरज उगेगा या अस्त होगा।

आपका अपना,
नीतीश राज

Wednesday, July 2, 2008

खत्म हुई छुटिटयां...

आज की सुबह कुछ अलग ही लग रही थी। हमारी सोसाइटी का नजारा बदला-बदला सा था। सड़क पर स्कूल बसें दौड़ रही थी जो इस बात का सबूत थी कि बच्चों की छुट्टियां खत्म हुई, साथ ही, माता-पिता की भी। फिर शुरू हो गया नौनिहालों को वक्त पर तैयार करने का सिलसिला। कुछ तो इसे ड्यूटि की तरह ही लेते हैं। तरह –तरह की स्कूल यूनिफॉर्म में बच्चे आज दिख रहे थे। वैसे कई जगह स्कूल कल ही खुल गए लेकिन मेरे बेटे का स्कूल आज खुला। बीती छुट्टियों की तरह कल तक हम लेट ही सो कर उठे। बेटे को आगाह कर दिया था, बस, अब और लेट तक नहीं। देर तक सोने का कार्यक्रम खत्म। अब जल्दी सोना और जल्दी उठना। आस-पास में सुबह से ही बच्चों की आवाज़ें आ रही थी। कोई उठते हुए रोता, तो कोई उठने के बाद। किसी को नहाने में दिक्कत, तो किसी को खाने में परेशानी। जब बच्चे नीचे पहुंच रहे थे तो एक अलग तरह की रौनक उनमें थी, ‘चलो स्कूल चलें’ वाली बात। आज अधिक्तर माता-पिता को देखकर उड़न परी पीटी उषा या फिर मिल्खा सिंह की याद आ रही थी। कभी लगता की अभिभावक आगे हैं, तो कभी लगता कि बच्चों ने बाजी मार ली। छोटे से हाथ में बड़ी सी बोतल(पानी की) अपने से ज्यादा वजनी बैग और मटकते मटकते चले आते हैं स्कूल बस के इंतजार में। जब तक बस नहीं आती तब तक स्पोट पर मौजा ही मौजा। वैसे, मैं आप को बता दूं कि जहां मैं रहता हूं उस सोसाइटी में तकरीबन आस-पास या यूं कहें दूर के भी कुछ स्कूलों की बसें आती हैं। मेरा घर सोसाइटी गेट के बिल्कुल सामने है और दूसरा फ्लोर भी, तो नजारा बिल्कुल साफ दिखता है। सुबह बाल्कनी में खड़े होकर चाय की चुस्कियों के साथ ये सब, एक अलग अनुभूति देता है। कभी हमें भी हमारे माता-पिता ऐसे ही दौड़-दौड़ कर छोड़ने जाते होंगे। लेकिन लगता है कि वो हम से ज्यादा ऑर्गनाइज रहते थे। मैं किसी भी बच्चे के ग्रैंडपेरेंट को भागते हुए नहीं देखता, अब भी। वो अब भी ऑर्गनाइज है। शायद आज देर रात तक काम करना या फिर शिफ्ट में काम करना हमारी मजबूरी बन गयी है। जब बड़े बुजुर्ग सो कर उठने वाले होते हैं तब कई बार हम सोने की तैयारी करते हैं। हमने अपनी सहुलियतों के लिए लोन ही इतने ले रखे हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए हमें ये सब करना भी पड़ता है। शायद हमने अपने पैर ज्यादा पसार दिए हैं। बेटे के आने पर पता चलेगा कि आज उसका दिन स्कूल में कैसा बीता।

आपका अपना,
नीतीश राज

Tuesday, July 1, 2008

आरुषि केस-अब भी कई पेंच

आरुषि हत्याकांड का सच सामने आ भी पाएगा, ये सवाल सब के जहन में घूम रहा है। इस केस ने पहले नोएडा पुलिस की भद पीटी और अब हर दिन सीबीआई की साख दांव पर लगी रहती है। सीबीआई नोएडा पुलिस की तरह काम नहीं कर रही, वो काम दिमाग खोलकर कर रही है। यूपी पुलिस ने तो आंखें, दिमाग, अनुभव सब को बंद कर काल कोठरी में डाल दिया था। सीबीआई एक भी पक्ष को दरकिनार नहीं कर रही और आगे बढ़ती जा रही है। लेकिन सीबीआई के पास भी वो ही पुराने सवाल मुंह खोले खड़े हुए हैं। क्या था क़त्ल का मकसद? हेमराज को किसने मारा? किस से की गई हत्या? कहां है हथियार? कहां है मोबाइल? किसने किया आरुषि का मोबाइल बंद? किसने तोड़ा या गायब किया मोबाइल? कैमरे से फोटों क्यों और किसने की डिलिट? जवाब, अभी अधर में। कहीं इनका हाल भी ऐसा ही ना हो, जैसे कि नोएडा पुलिस का। एक दिन पहले तक एक आला अफसर मीडिया के सामने आकर कहता है कि यदि सुराग आपके पास हों तो हमें भी बताए। और अगले दो दिन में दूसरा अधिकारी साल की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने का दावा करता है। केस बताते हुए वो आरुषि की जगह पर श्रुति का नाम बार-बार बोल रहे थे। लेकिन सीबीआई से किसी को भी इस तरह की गुगली की उम्मीद नहीं है।लेकिन सीबीआई कृष्णा पर ‘ब्लाइंड फेथ’ क्यों कर रही है। क्या कृष्णा इंट्रोगेशन में सच ही बता रहा है? सीबीआई कृष्णा को आरोपी मान चुकी है और पूछताछ कर रही है। जैसे कृष्णा हांक रहा है वैसे सीबीआई चलती जा रही है। अभी तक सीबीआई हत्या में शामिल हथियार और मकसद को तक नहीं जान पाई है। 15 मई की रात को एल 32 में क्या हुआ, क़त्ल कैसे हुआ, किसने किया, कुछ भी तो साफ नहीं कर पा रही है सीबीआई?डेढ़ महीने से वो राज, राज ही बना हुआ है। एक महीने से सीबीआई इस केस की जांच पड़ताल कर रही है और 2 जून से कृष्णा भी उनके कब्जे में है लेकिन नतीजा, अभी तक सिर्फ कई थ्योरी ही हैं। वहीं दूसरी तरफ, डॉ राजेश तलवार को भी अपने कब्जे में सीबीआई ने रखा हुआ है। पूछताछ के मामले में डासना जेल का रुख अब वो नहीं कर रही है। लेकिन सीबीआई का मानना है की अभी भी शक की सुईं सबसे ज्यादा डॉ तलवार पर ही अटकी हुई है। कृष्णा जो भी जवाब दे रहा है वो भी डॉ तलवार को कठघरे में खड़े करने के लिए प्रर्याप्त हैं। और बात भी सच है, उस रात डॉ तलवार ने क्या किया और साथ ही सुबह क्या-क्या हुआ ये बातें वो ठीक-ठीक नहीं बता पाए। फिर, अपनी इकलौती बेटी के क़त्ल का शक जिसपर था उसकी लाश मिलने पर प्रतिक्रिया भी हैरान कर देने वाली थी। सीबीआई ने डॉ तलवार की अपने दोस्त से कहीं बात को सबूत बना कर राजेश तलवार की न्यायिक हिरासत बढ़वाई है। वहीं नूपुर तलवार कह रहीं है कि वो सहयोग पूरा कर रहीं है। हां, अभी तक सही बात जो इसमें लग रही है वो ये कि जो दुर्रानी दंपत्ति के चरित्र पर कीचड़ उछल रहा था वो शर्मनाक बात अब नहीं हो रही है, इससे सभी को काफी सुकुन है। अब सीबीआई एक नई थ्योरी पर काम कर रही है। ये थ्योरी नौकरों पर आधारित है। हेमराज, कृष्णा, राजकुमार और विकास मंडल इन चारों ने मिलकर किया है क़त्ल? लेकिन इस पर भी आने वाले दिनों में कई सवाल उठ खड़े होंगे। जैसे कि, यदि कृष्णा की बात मानें, तो क्या उस क़ातिल रात, राजकुमार ने आरुषि से जबरदस्ती की थी? और यदि की थी तो माता-पिता तक चीखने-चिल्लाने की कोई भी आवाज़ क्यों नहीं पहुंच गई। रात में दो आदमी की आहट ही काफी है किसी की नींद में दखल डालने के लिए। तो क्या तलवार परिवार को उस रात खाने में नशा दिया गया था? लेकिन आरुषि की रिपोर्ट में साफ हो चुका है कि उसके शरीर में किसी भी प्रकार का नशा नहीं था। तो क्या सिर्फ तलवार दंपत्ति को ही नशा दिया गया था? तो क्या वजह है कि दूसरे कमरे में इतना बड़ा हादसा हो रहा हो और पता भी नहीं चले। अभी हाल ही में, एक महिला का पति, रात के समय पंखे से लटककर फांसी लगाने जा रहा था लेकिन आहट से ही पत्नी की आंख खुल गई और उसने अपने पति को बचा लिया। तो ये नींद कैसी थी?सीबीआई के पास हर तरह की, नई से नई तकनीक है। इतने वक्त में भी यदि वो किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची हैं तो इसके पीछे शुरुआती दौर में सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी मानी जा सकती है। सीबीआई डॉ तलवार, नूपुर तलवार, कृष्णा, राजकुमार सभी के कई टेस्ट भी करवा चुकी है। पॉलीग्राफी टेस्ट, नारको टेस्ट, साइको टेस्ट के बाद भी अभी तक दाल ठीक से गल नहीं पाई है, काफी कच्ची है। सीबीआई की इस केस रुपी दाल के गलने का, इंतजार है ।

आपका अपना,
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”