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Friday, September 12, 2008

मुंबई का किंग कौन?

"अगर के एल प्रसाद को अपनी वर्दी, कुर्सी और बैच जो कि उसके कंधे पर लगे हैं, उनका इतना ही गुरूर है तो वो उसे उतारकर सड़क पर आकर बयान दें तब उन्हें पता चलेगा कि मुंबई किसकी है।" ये कहना है राज ठाकरे का और वो भी किसी दो कौड़ी के आदमी के बारे में नहीं, मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर के बारे में। आपको ये बता दूं कि ये के एल प्रसाद वो ही हैं जिन्होंने एक रोज पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कहा था कि 'मुंबई किसी के बाप की नहीं'। राज ठाकरे ने पलटवार करते हुए अपनी पीसी में मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर को खुले शब्दों में चुनौती दे डाली कि वर्दी है तो इतना बोल रहे हो यदि वर्दी उतारकर सामने आओ तो दिखाते हैं हम अपनी गुंडागर्दी जिससे कि पूरा मुंबई आजकल थरथर कांप रहा है। और ये भी कोई बड़ी बात नही कि आने वाले दिनों में के एल प्रसाद की वर्दी को नुचवाकर ये मुंबई का नया उभरता हुआ गुंडा राज ठाकरे फिकवा दे या फिर सबसे सरल उपाय तबादला करवा दे। इस कहते हैं दादागीरी। सीधे-सीधे चैलेंज है पुलिस को, कि मैं तो चुप नहीं रहूंगा चाहे जो हो सके तो वो कर लो। क्या पुलिस की इतनी हिम्मत है कि वो राज ठाकरे पर इस धमकी के ऊपर कोई भी कदम उठा सके? हम सब को जवाब पता है...शायद नहीं। राज ठाकरे की एक दहाड़ के सामने दुम हिलाती है पुलिस। लेकिन ये ख़ौफ़ कब तक, आखिर कब तक रहेगा ये ख़ौफ़? सरासर गुंडाराज चल रहा है मुंबई में।
बेशक राज ठाकरे सरकार नहीं हैं पर वो आदेश देता है तो महाराष्ट्र की सरकार की जुबान पर ताला लग जाता है। वो जज भी नहीं है पर फिर भी दंड सुनाने का अधिकार सिर्फ उसने अपने पास सुरक्षित रखा है। जिसे चाहे वो अपने आगे झुका सकता है, जिसे चाहे वो कुछ भी कह सकता है गाली तक दे सकता है और कानून उस शख्स के खिलाफ कोई कदम भी नहीं उठा सकता है। वो चाहे तो जिस किसी की फिल्म की रिलीज पर महाराष्ट्र में पाबंदी लगा सकता है, और वो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता। इस शख्स की सनक के सब गुलाम बन चुके हैं।
ये दादागीरी नहीं है तो और क्या है। अभी मेरी पिछली पोस्ट पर डॉ अनुराग ने कमेंट किया था कि अगले महीने उनका मुंबई जाना हो रहा है। वहां पर चल रही भाषावाद की हवा से वो काफी नाखुश भी हैं और पशोपेश में भी। आपको सच बताऊं तो ऑफिस से मेरे एक सहयोगी को मुंबई जाना था लेकिन वो मुंबई नहीं गए। क्यों? जबकि हमारा भरा पूरा ब्यूरो है वहां पर, लेकिन वहां कि हवा ही ऐसी चल रही है कि हर कोई डरने लगा है। गुंडों से शायद हमलोग अकेले तो लड़ सकते हैं लेकिन परिवार के साथ नहीं। सच माने तो राज ठाकरे का कद ये हो चुका है कि कोई भी इस बड़बोले से पंगा नहीं लेना चाहता और लगता तो ये भी है कि सब के सब इसके रहमोकरम पर ही हैं।
इस दादागीरी और गुंडागर्दी के आग सदी के महानायक तक को झुकना पड़ा। पहले ब्लॉग, फिर हर चैनल पर घूम-घूम कर माफी मांगनी पड़ी। चाहे द लास्ट लियर के लिए दिए जा रहे इंटरव्यू की बात हो या चाहे कोई और, लेकिन हर जगह वो माफी मांगते हुए दिखे। बिग बी यानी अमिताभ बच्चन इस मुद्दे पर कुछ जुमलों को ही हर इंटरव्यू में बोलते नजर आए। माफी मांगने से थोड़े ही कोई छोटा हो जाता है, भई बीत गई सो बात गई, अब आगे क्या, माफी हमने मांग ली है, इसकी जांच हो रही है यदि लगे कि हमने गलत किया है तो हमें जो सजा देना चाहेंगे हमें मंजूर है। हर जगह बचते-बचते अमिताभ ने सभी सवालों के जवाब दिए। कैमरे पर माफी मांगे जाने को लेकर तो बिल्कुल कन्नी काट गए। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि राज तो मेरे दोस्त के हैं और मैं उन्हें अपनी फिल्म देखने का न्यौता देता हूं। अब सवाल ये उठता है कि क्या सदी का महानायक डर गया? हर जगह जा जा कर उन्हें माफी क्यों मागनी पड़ रही है? क्या बिग बी पर द लास्ट लियर के प्रोड्यूसर की तरफ से कोई दबाव है? या फिर फिल्म सही सलामत मुंबई या यूं कहें कि महाराष्ट्र में रिलीज हो जाए ये चाहते हैं अमिताभ। पर जो भी कारण हो जब सदी के महानायक को डरना पड़ सकता है इस नेता रूपी गुंडे से तो फिर आम आदमी की तो औकात ही क्या है। यदि राज ने न्यौता स्वीकार कर लिया तो राज की राजनीति समझ में जरूर आजाएगी ये तो साफ है।
ये मराठियों की एकजुटता की जीत है या फिर राज ठाकरे के गुंडों का ख़ौफ़ लेकिन भाषावाद का ये घटिया प्रकरण आखिरकार खत्म तो हो गया। अब तो ये लड़ाई राज ठाकरे बनाम मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर के बीच हो चली है। पर इसमें जया और अमिताभ बच्चन को पूरे मामले में शर्मिंदगी बहुत उठानी पड़ी है। साथ ही जाते जाते राज ठाकरे ने जया बच्चन को नसीहत भी दे डाली है कि हो सके तो आगे से लिखे हुए डायलॉग ही पढ़ें तो बेहतर। पर इस प्रकरण ने ये तो बता ही दिया कि, 'मुंबई का किंग कौन?.........राज ठाकरे'।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-गूगल)

Thursday, September 11, 2008

राज ठाकरे, मुंबई तुम्हारे बाप की नहीं

राज ठाकरे, मुंबई तुम्हारे बाप की नहीं। असल मायने में कुछ-कुछ ये ही कहना था मुंबई के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर के एल प्रसाद का। और ये सच भी तो है मुंबई बाद में है पहले भारत है और भारत के एक अभिन्न अंग है मुंबई। पूरा देश मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट, और ट्रेन में हुए सीरियल ब्लास्ट के समय में मुंबई के साथ था। तब तो किसी ने नहीं कहा कि ये सिर्फ मराठियों का दुख है इससे हम ही निपटेंगे, हमें देश की हमदर्दी नहीं चाहिए। तब तो ये नेता अपनी सुरक्षा के बारे में सोचते रहे। कोई भी ये कहने आगे नहीं आया कि लाशों को तुम नहीं उठाओगे क्योंकि तुम बिहारी हो या फिर तुम यूपी को हो। तो फिर ये भाषावाद अब क्यों? वैसे तो इन गुंडों पर यदि कोई लगाम लगा सकता है तो वो है पुलिस। पर पुलिस को पूरी ईमानदारी के साथ काम करना होगा। साथ ही ये बिकाऊ मंत्री भी पुलिस को अपनी ढंग से काम करने की आजादी दें। वैसे तो पुलिस ने ये बयान दे दिया पर देखना ये है कि क्या सचमुच राज ठाकरे के गिरेबान पर हाथ वो डाल पाएगी?
राज ठाकरे के पास गुंडे हैं वो चाहे तो क्या नहीं कर सकते। चाहे तो फिल्म चलने दें या फिर आप का कारोबार। चाहें तो सब तबाह कर दें। मारठी में ही हों दुकान के बोर्ड, हर साइन मराठी में ही हों। अरे, पगला गए हो क्या राज ठाकरे। यदि तुम जैसे लोग सीएम बन जाएं तो संजय गांधी की याद ताजा करा दें। क्या आप को पता है कि मुंबई में कितन लोग बाहर से आते हैं? शायद नहीं, जब ही तो आप ये सवाल उठा रहे हैं। यदि मराठी में बोर्ड लगाएंगे तो रोजी-रोटी कहां से चलेगी। हर किसी को तो मराठी आती नहीं। फिर कैसे बिकेंगे सामान।
क्या तुम राज ठाकरे, हां, राज ठाकरे, क्या तुम बिकवाओगे सामान या फिर खरीदोगे? खुद तो तुम एसी रूम में बैठकर ये सब फरमान लोगों पर थोपते रहते हो। यदि लोग नहीं मानें तो तुम अपने गुंडे भेजकर लोगों को डराते हो उन के साथ मार-पीट करते हो। ये कहां तक जायज है। वैसे अपनी पिछली पोस्ट में मैंने इस बात का जिक्र किया कि ‘राज ठाकरे अपनी चोंच बंद रखो’ तो किसी ने कमेंट किया कि अरे ये तो बोलेंगे ही आप दूसरों को नसीहत दो कि वो इनकी बातों में ना आएं। सही कमेंट था। ये तो वो बुल डॉग हैं जो कि ना चाहते हुए भी भोखेंगे ही। तब बेहतर तो ये है कि महाराष्ट्र की जनता इन जैसों को ना सुनें और मिलकर इन जालिमों का विरोध करे जो कि देश को भाषा में बांटना चाहते हैं।
जया बच्चन के बाद अमिताभ ने भी माफी मांग ली लेकिन कैमरे पर माफी मांगने पर अड़े हुए हैं राज समर्थक। वैसे अमिताभ ने एक बात सही कही कि,
“जो हो गया सो हो गया अब आगे की सोचना चाहिए और आगे क्या होगा। हमने माफी मांग ली है। अब बाकी बचा काम प्रशासन का है कि वो क्या ऐक्शन लेती है। यदि हमने गलत किया है तो हम हर सज़ा के लिए तैयार हैं”।…..
क्या सचमुच ये लगता है कि अमिताभ बच्चन से बड़ा हो गया है राज ठाकरे का कद। राज ठाकरे का नाम यदि गूगल में सर्च करें तो इस भाषावाद के साथ तो आप जोड़ कर देख सकते हैं वरना और किसी के साथ नहीं। लेकिन अमिताभ बच्चन तो अपने में एक लीजेंड हैं। दुनिया उनका लोहा मान चुकी है। जब वो शख्स भी बिन बात के बढ़ी बात पर माफी मांग चुका है तो क्या अलगाव फैलाना अच्छा है? क्या राज ठाकरे जैसा बद दिमाग शख्स सुधरेगा। देश के लिए एक अच्छा काम नहीं किया होगा राज ठाकरे ने।

क्या उस जैसे चरित्र का बिग बी जैसे इंसान के साथ ऐसा व्यवहार करना सही है। मैं कोईं बिग बी का समर्थक नहीं हूं पर भाषावाद और राज ठाकरे जैसे दो कोड़ी के गली के टुच्चे से नेता के खिलाफ तो जरूर हूं।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो- साभार गूगल)

Wednesday, September 10, 2008

राज ठाकरे अपनी चोंच बंद रखो

एक बार दशहरे के समय हमारे मोहल्ले के कुछ लड़के टोली बनाकर चंदा लेने आए। हर साल आते थे इस साल भी आए। चंदा दे दिया गया, लडकों के हैड ने कहा कि इतने से तो क्या होगा, यदि देना है तो एक पत्ता तो ढीला करना ही होगा, नहीं तो वापस ले लीजिए। घर के बड़ों ने बात को सुल्टाने के लिए 10 रुपये और जोड़कर 61 रुपये कर दिए। हम भीख नहीं मांग रहे अंकल, देना है तो 101 दो नहीं तो...। ये तो दादागीरी है, जाइए नहीं देते। जब मैं आया तो घर के बाहर हल्ला मचा हुआ था। पापा उन्हें ज्ञान दिए जा रहे थे और वो भी ढीठ की तरह एक ही बात पर अड़े हुए थे। मैं जानता था उन सब को और उनकी करतूतों को। चंदे के नाम पर वसूली करके, प्रोग्राम तो करवाते पर बाद में बचे उन पैसों से खूब मजे किया करते थे। सोचिए पूरे स्टेट में 100 से ज्यादा घर थे तो सोचिए मनमानी से कितनी रकम जुड़ती होगी। मैंने भी समझाया तब तो वो सब चले गए, पर उस समय से हर घंटे हमारे घर में कई आवारा लड़के आते और मुझे बुरा-भला कह कर या धमका कर चल जाते। मैंने फैसला किया की जितनी बार आएंगे तो उस हैड के घर मैं भी उतनी ही बार जाऊंगा और धमका कर के आऊंगा। ये मैं जानता था कि वो खुद मेरा कुछ नहीं बिगाड़ेगा। धीरे-धीरे चार-पांच रोज बाद तक ये सिलसिला चलता रहा और फिर ना वो आए ना ही मैं गया। बाद में मेरे घरवालों को इस बात का पता चला। सब ने मुझे कुछ दिनों के लिए घर से चले जाने के लिए भी कहा। पर मैं उनसे कहता कि मैंने ये सब शुरू नहीं किया है, कैसे कोई बिन बात के मेरे पापा और बड़ों का अपमान कर सकता है, वो भी बिना बात के। उस शख्स ने दीवाली के कुछ दिन बाद मेरे को अकेले कुछ लड़कों के साथ पकड़ा। उसका इरादा क्या था उसका पता मुझे लग ही रहा था। पर मैं जानता था कि ये मेरा कुछ भी नहीं करेंगे क्योंकि बात ही इतनी फैल चुकी थी। उसने समझाने के उद्देश्य से मुझे ज्ञान दिया, मैंने भी ज्ञान लिया, फिर दिया और फिर दोनों तरफ से ज्ञान का आदान-प्रदान होने लगा। वो स्टेट के कुछ गुंडों में से एक था, मेरे ज्ञान और साहस पता नहीं किस कारण वो झुका और फिर हमारे घर आकर उसने पापा-मम्मी से माफी मांगी। आज भी यदि कभी मेरे पापा-मम्मी उस को दिख जाते हैं कहीं भी तो बिना पैर पढ़े वो नमस्कार नहीं करता। मैं भी उसे आज तक भैय्या कह कर ही संबोधित करता हूं।

चलिए एक सीन तो ये था अब दूसरे सीन पर चलते हैं।

'मैं यूपी की हूं और हिंदी ही बोलूंगी और यूपी के लोगों को हिंदी ही बोलनी चाहिए, महाराष्ट्र के भाईयों से माफी मांगती हूं'। जया बच्चन ने ये बात द्रोण की म्यूजिक लॉन्च पार्टी में कही थी। बात बढ़ी और फिर हरे हो गए आगे-पीछे के जख्म। राज ठाकरे लगे फिर से अपना भोपूं बजाने। जया ने लिखित माफी मांग ली।
"अगर मैंने मुंबई और महाराष्ट्र के मराठी भाषी लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाया है तो इसका मुझे दुख है। एक हिंदी फिल्म के म्यूज़िक लॉच पर मैंने हिंदी बोलने को लेकर जो कुछ कहा वो बिना किसी छल कपट से कहा था। मैं उस शहर को बदनाम क्यों करूंगी जिसने हमें सबकुछ दिया। क्या हमलोग भी इस शहर के नहीं हैं। मैं इस शहर का मरते दम तक निरादर नहीं करूंगी।"
पर एमएनएस को मंजूर नहीं, लिखित में नहीं, 'कैमरे के सामने ही माफी मांगनी होगी'। महाराष्ट्र का अपमान कैमरे के सामने किया तो कैमरे के सामने ही माफी मांगो। ये कहना है खुद राज ठाकरे का। ये भी एक अजीब और अपने किस्म की दादागीरी है।
वैसे तो, राज ठाकरे को अपनी ये चोंच 8 अक्टूबर तक बंद रखने का फरमान है। पर वो बोल रहे हैं और अपने नापाक इरादों से मराठियों को बरगलाने में लगे हुए हैं। ये तो महाराष्ट्र के गुंडे हैं जो कि देश के गुंडे बनते जा रहे हैं। कभी किसी ने ये सोचा कि देश के और किसी भी प्रांत में राज ठाकरे क्यों नहीं आते-जाते हैं क्योंकि राज को डर रहता है कि कहीं जिंदगी के लाले ना पड़ जाएं। क्या राज ठाकरे को अक्ल नहीं आई है कि देश के अब भाषावाद में बांटने में तुले हुए है। क्या जब तक राज ठाकरे को कोई पीटेगा नहीं तब तक उसको चैन नहीं मिलेगा? या फिर देश के दूसरे हिस्सों में मराठियों को पीटा नहीं जाएगा तब तक राज ठाकरे नाम का बदनुमा जानवर अपनी चोंच बंद नहीं करेगा। ये तो देश के दूसरे हिस्सों के लोगों की अपने देश के साथ ईमानदारी है कि जो अब तक ये सब कुछ सुनने में नहीं आया। वरना कसर तो इन ठाकरे परिवार ने नहीं छोड़ी है। भाषा का मुद्दा बनाकर राज ठाकरे क्या साबित कर देना चाहते हैं कि राजनीति सिर्फ इससे ही चलती रहेगी। अपने गुंडे भेज कर लोगों के ऑफिसों में, दुकानों पर, घर पर उत्पात मचाना। कब तक सहेंगे लोग जिस दिन बिदक गए तो मंच पर चढ़कर मारेंगे और तब इस चोंच से बाप- बाप के अलावा कुछ नहीं निकलेगा। राज को सलाह है, अपनी चोंच बंद रखो राज ठाकरे।

ऐसा नहीं है कि मैं जया बच्चन के समर्थन में हूं। किसी भी मंच पर चढ़कर लोगों की भावना से खेलना गलत है और जबकि उस मुद्दे पर जिसमें आप पहले ही हाथ जलाए बैठे हैं। माना ये कि हंसी मजाक में कह दिया गया और फिर उसे लेना भी उसी अंदाज में चाहिए था। मंच पर इस बात से पहले क्या बात चल रही थी ये भी बहुत ही कम को पता है। प्रियंका चोपड़ा जब अंग्रेजी के चंद शब्दों के बाद हिंदी में बोलने लगी तो ये लाइन जया बच्चन ने हंस कर कही थी। लेकिन इस बात को प्रेजेंट इस अंदाज में किया गया जैसे कि जया बच्चन ने देश की संप्रभुता के साथ खिलवाड़ कर दिया हो। उनको इस बात का इल्म हो गया कि इस बात पर उनके द्वारा चुटकी नहीं ली जानी चाहिए थी। तो उन्होंने माफी मांग ली। अब ये क्या कि नहीं कैमरे पर ही माफी मांगो। ये तो एक तरह से दूसरो को जलील करना ही हुआ। बाल ठाकरे के नक्शेकदम पर चलते हुए राज चाहते हैं कि इस मुद्दे से वो घटिया लोकप्रियता बटोर लें और उनकी राजनीति चलती रहे लेकिन लोगों को ये 'राज-नीति' समझनी ही होगी, खासतौर पर भाषा की इस राजनीति को । वैसे ही देश जगह जगह से जल रहा है एक आग और नहीं चाहिए हमें।
राजनीति क्या-क्या ना कराए। अभी तक जो शख्स बिग बी के बगल में बैठकर ये कहता था कि बिग 'बी' तुम ही अकेले नहीं हो मैं भी तो बिग 'बी' हूं। बाल ठाकरे भी चुप नहीं बैठे वो भी इस भाषावाद की लड़ाई में कूद पड़े। मराठी और हिंदी की लड़ाई में अमिताभ का साथ किसी ने दिया था तो वो बाल ठाकरे ही थे पर कल के सगे आज पराए हो गए। बार ठाकरे सामना में लिखते हैं--
"अमिताभ पूरे देश के महानायक हैं और ऐसा महानायक सदी में एक बार पैदा होता है। कोई भी प्रांत और भाषा की दीवार उनकी कला को रोक नहीं सकती लेकिन अब जया बच्चन ही कह रही हैं कि हम यूपी वाले हैं। इसका मतलब क्या है। अमिताभ बच्चन और उनका परिवार जब मुंबई आया था तब उन्हें कोई नहीं पहचानता था लेकिन मुंबई ने उन्हें पहचान दी, बड़ा किया। पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को महाराष्ट्र की राजधानी ने आसरा दिया लेकिन इन लोगों ने मुंबई और महाराष्ट्र को क्या दिया। ये सवाल जया बच्चन के बयान की वजह से खड़ा होता है।"
बाल साहेब तो शाहरुख पर भी बिफर पड़े। पर बाल ठाकरे को ये कौन समझाए कि यदि बालासाहेब खुद दिल्ली में आकर रहने लगें तो भी वो सबको ये ही बताएंगे कि वो मुबई के ही है। चाहे दिल्ली उन्हें कितना ही कुछ दे दे पर वो रहेंगे तो मुंबई के ही ना। जब वो खुद को मुंबई का बताने से नहीं हिचकते तो फिर क्यों दिल्ली का कोई भी ये मानने से पीछ रहेगा कि वो दिल्ली का नहीं है। मैं बालासाहेब ठाकरे का काफी सम्मान करता हूं पर लगता है कि उम्र का असर अब उनके लेखन पर दिखने लगा है और वो दूर की बातें नहीं सोच पा रहे हैं। वैसे तो अब उनको लिखना ही बंद कर देना चाहिए।
वैसे जया बच्चन के साथ हमेशा से साथ खड़े रहने वाले अमिताभ मुंबई लौट आए हैं और जैसे कि अभिषेक बच्चन ने कहा कि फैसला अमिताभ ही करेंगे की इस पर क्या करना चाहिए। तो देखना ये होगा कि राज की भाषा की इस आग में अमिताभ पानी डालते हैं या पेट्रोल।


आपका अपना
नीतीश राज

(कल बजरंग दल के कार्यकर्ता एक इलाके में गए और वहां के लोगों को निकालकर पीटा। फिर उन्हें एक जगह इकट्ठा कर उनसे वंदे मातरम, भारत माता की जय के नारे लगवाए। ये सब बांग्लादेशी थे। ये आग फैल रही है ना फैले तो बेहतर।क्योंकि भेड़चाल चलने वाले कम नहीं हैं देश में।)
(फोटो साभार-गूगल)

Friday, July 4, 2008

शहंशाह से बब्बन, अब अय्यार

शहंशाह तेरे कितने रूप? इस सवाल का जवाब दे पाना ही मुमकिन नहीं। हर किरदार में छुपा है एक नाम और नाम में छुपी है शख्शियत। आजकल फिर दिखने लगा है एक चेहरा। लोहे का मास्क पहने हुए, जो एक आंख को कवर करता है लेकिन उसमें एक आंख आधी छिपी, आधी दिखाई देती है। चेहरे पर सफेद दाढ़ी, लिबास में सफेद चोंगा और हाथ में नंगी तलवार, सफेद घोड़े पर ‘अय्यारी’ करते हुए। जल्द ही पर्दे पर आप उन्हें देख पाएंगे, आने वाली नई फिल्म में, जिसमें वो अय्यार बने हैं। फिल्म में सिर्फ अमिताभ ही अय्यार नहीं हैं, इनके अलावा तीन अय्यार और भी हैं। १८९२ में लिखे उपन्यास चंद्रकांता पर आधारित हैं। जिसका नमूना आप चंद्रकांता टीवी सीरियल में पहले ही देख चुके हैं। इस बार फिर अमिताभ पर नया प्रयोग किया है विधु विनोद चोपड़ा ने। जिंदगी के इस पड़ाव पर भी एक्टिंग में प्रयोग से नहीं घबराते बिग बी। अधिक्तर फिल्मों में बिग बी ने अपने आप को, किरदार के रूप में ढालने के लिए, उसमें समाने के लिए अपने अक्स को भी भुला दिया और फिर जो सामने आया वो रहा गया सिर्फ एक बदला हुआ नया अक्स। हाल में देखें, तो ‘रामू की आग’ में अमिताभ के चेहरे, चाल, आवाज़ पर प्रयोग किया गया, फिल्म नहीं चली लेकिन ‘बब्बन’ का नाम चल गया। विधु विनोद चोपड़ा की ‘एकलव्य द रॉयल गार्ड’ में अचूक निशानेबाज, हवेली का रखवाला ‘एकलव्य’। इसमें राजस्थानी भेष में, सर पर पगड़ी, कमर में गमछा, राजस्थानी लिबास और पैर में जूतियां।
‘चीनी कम’ में पहली बार चोटी में नजर आए । ‘मेरी उम्र तुम्हारे बाप से भी पांच साल ज्यादा है’ ये उस भूमिका की बेचारगी भरे अल्फाज, जिसमें उन्होंने अपने से आधी उम्र की लड़की से प्यार करने किया। वैसे रामू की ‘निशब्द’ में भी किरदार की कहानी लगभग मिलती-जुलती थी लेकिन उस में गेटअप बदला नहीं था। पगड़ी बांधे ‘मेजर साहब’ तो आप को याद ही होंगे। सबको लगा कि पगड़ी में अमिताभ उतना जचे नहीं। मेरा मानना भी कुछ ये ही है। बेटे की फिल्म को प्रमोट करने के लिए ‘झूम बराबर झूम’ में एक टाइटल गाने के लिए मेहमान के तौर पर भी आए। इसमें बिग बी का गेटअप एकदम अलग और निराला था। कोई भी अभिनेता अपनी छवि से अलग नहीं जाना चाहता। लेकिन अमिताभ के साथ ये बात नहीं है। सर पर फरों वाली टोपी, ढीली ढाली कमीज, जींस चुस्त, हाथ में गिटार, लंबे बूट में किसी भी रॉक स्टार से कम नहीं लग रहे थे। और ‘अक्स’ के उस बेहरूपिया से आप को मिलाने की जरूरत तो नहीं। लेकिन इस फिल्म में मनोज वाजपेयी ने अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा दिया था।
बिग बी की सबसे पहली वाली छवि ‘एंग्री यंग मैन’ की थी, दशकों तक उनको इसमें ही याद रखा गया। क्या बिग बी की उस छवि पर ये सारी छवियां अपना
असर छोड़ पाने में कामयाब हो पाएंगी?
अब हाल ही में उनकी एक फिल्म आने वाली है...’तलिस्मान’ जिसमें उन्होंने एक अय्यार की भूमिका निभाई है। अय्यार का मतलब समझ में आ ही गया होगा आपको, गर नहीं, तो याद दिलाता हूं। ’यक्कू मामा’.... कुछ याद आया, सीरियल चंद्रकांता....इस सीरियल का ये किरदार छोटे पर्दे पर काफी लोकप्रिय हुआ था। इस बार अमिताभ 'अय्यारी' करते नज़र आएंगे। इस किरदार में चेहरे पर सफेद दाढ़ी, लिबास में सफेद चोंगा और हाथ में नंगी तलवार साथ में सफेद घोड़े का साथ। गेटअप तो देखने से ही अलग और आकर्षित करने वाला लगता है। बिग बी के बारे में कुछ भी लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा है। लेकिन देखना तो ये है कि इस किरदार में ये सूरज उगेगा या अस्त होगा।

आपका अपना,
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”