"MY DREAMS"
मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
बहुत वक्त से सोच रहा था कि लिखने का क्रम फिर से शुरू करूं। तो लगभग दस साल के बाद फिर से ब्लॉग की दुनिया में कदम रख रहा हूं। वैसे तो बहुत से माध्यम हो चले हैं तब से अब तक अपनी बात को रखने के लिए पर ब्लॉग का अपना ही एक अनुभव है। जब लिखा करता था तो बहुत से लोगों का साथ मिला था। कुछ दूर तक चले और कुछ कभी कभार मिल जाते। कुछ साथी याद करके चुटकी लेते "क्यों, दवात में स्याही नहीं बची, यार लिखा करो।"
तो चलिए, फिर इस सफर पर निकल पड़ते हैं। बस आप सब का साथ और मेरे प्रभु का आशीर्वाद बना रहे।
.....कहते हैं कि वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता, और उसके लिए वक्त बदल भी गया। मेरे लिए तो वक्त अभी था पर उसका वक्त भी तो मेरा हो चुका था जो मुझसे मेरी ही चुगली कर रहा था और बता रहा था मुझे कि अब मेरे पास भी वक्त नहीं रह गया है। मेरे वक्त ने तो कसम खा रखी थी कि मेरा साथ नहीं देगा। उसका वक्त, उसका साथ छोड़ते हुए भी उसके साथ था।
आज भी मेरी किस्मत के तार उस खिड़की के साथ जुड़े हैं जिस खिड़की से मैं नीलम को देखा करता था। कई बार यूं ही हाथ अचानक बिना किसी आवाज़ के ही उठ जाता है और चुपचाप कहता है कि ’आ रहा हूं’। उस हाथ की आवाज़ अब किसी को समझ में नहीं आती है। वो चारपाई जिस पर हम साथ वक्त गुजारा करते थे वो अब भी चर-चर करती है और अचानक उसकी चर-चर आज भी हंसा जाती है। छज्जे पर पड़ी वो सीढ़ी गंदी हो चुकी है पर आज भी उस धूल की परतों के नीचे हम दोनों के पैर की छाप देखी जा सकती है। एक पांव में पड़ी उसकी पायल आज भी कभी-कभी दिमाग में छम-छम कर जाती है। हर एक छम के साथ ही पूरे शरीर में एक लहर सी दौड़ जाती है।
चाय की चुस्की लेते हुए उस खिड़की से बाहर देखते हुए मैं अक्सर सोचता हूं कि वक्त कब और कैसे करवट बदलता है पता ही नहीं चलता। ग्रेजुएशन करने के बाद इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन और फिर बीएड के बाद 4 गांवों के एक स्कूल में मास्टर बन गया। दूर तलक कई गांवों में ऐसा स्कूल नहीं है आमदनी अच्छी-खासी हो जाती है। गांव से थोड़ा बाहर जाना पड़ता है थोड़ी दूर है पर फिर भी इस कमरे में वापस आते ही सारी थकान गायब हो जाती है।
दो साल का वो वक्त कितना आसान था जिंदगी जीना का मन करता था। पर वक्त बदला और मेरी दुनिया भी। उस एक वक्त ने मेरी दुनिया बदल दी और तब से आजतक मेरी दुनिया बदली हुई है। अब कोई भी इस पुरानी खिड़की की तरफ कंकड नहीं उछालता। ना ही नीलम और ना ही शंभू। ना शंभू कभी नीलम से मिला था और ना ही नीलम कभी शंभू से मिली थी पर भगवान ने दोनों की जोड़ी लिखी थी। शंभू की मां की तबीयत बिगड़ी जल्दबाजी में लड़के की शादी की बात चली और जब तक कोई समझता दूल्हे संग 5 बाराती लड़की वालों के घर पर थे उनमें से दूल्हे संग मैं था।
.....जेठ के महीने की चिलचिलाती धूप में भी वो हौसला दिखाते हुए मुझसे मिलने पहुंच ही जाती थी मेरे तपते हुए कमरे में। उसके पत्थर फेंकने पर मैं धीरे से बिना आवाज़ किए सीढ़ी नीचे उतार देता और फिर हम दोनों घंटों बैठकर बातें करते रहते थे। कभी इतिहास (history)की तारीखों में उलझते तो कभी सांख्यिकी(statistics) का कोई सवाल ऐसा पेंच फंसाता घंटों उसी में उलझ कर रह जाते।
एक रात जब मैं शंभू के साथ खाने के बाद का कोटा(सिगरेट का) खत्म करके कमरे में लौटा तो थोड़ी ही देर बाद एक पत्थर कमरे की खिड़की तक नहीं पहुंच पाया। समझ ने दिमाग को तुरंत सतर्क किया, पर इस सतर्कता में मन घबरा गया कहीं ये वो तो नहीं है। तुरंत चर-चर करती अपनी चारपाई से उठते हुए खिड़की से हाथ बाहर निकाल दिया। धीरे-धीरे आंखों को खिड़की के बाहर तक लेगया। मैं हतप्रभ था। इस समय नीलम यहां पर?जल्दी से छज्जे पर पहुंचा, नीचे वो अपनी बहन के साथ साइकिल पर खड़ी थी। उसने सिर्फ एक कागज को पत्थर पर लपेट कर छज्जे की तरफ उछाल दिया और चली गई।
उसे सांख्यिकी के उस सवाल का हल मिल गया था जिस पर आज पूरी दोपहरी हम दोनों ने माथापच्ची की थी। उस पर्चे में मेरी वो छोटी सी गलती बता दी जिसके बाद हल तुरंत निकल गया। वो जानती थी कि मैं पूरी रात इसी सवाल में लगा रहूंगा जब तक कि हल नहीं मिल जाएगा। मैं पूरी रात आंखों में ना काटूं इसलिए सिर्फ वो हल बताने इतनी रात मेरे पास आई। दीवानी थी वो, पढ़ाई की और साथ ही मेरी भी।
पर धीरे-धीरे ये मुलाकातें, ये बातें पढ़ाई तक ही नहीं रह गई थीं। कभी घर की बातें होतीं तो कभी बिल्कुल निजी। निजी कुछ इतनी कि वो बातें हम दोनों में ही हो सकती थी किसी तीसरे से नहीं। वो चोरी छिपे घर आती और हम दूसरी दुनिया में गोते लगाने लगते। अब बातों का सिलसिला दूरियों से कम होता-होता हमारी नजदीकियों में समाने लगा। वो पल, उस समय के वो पल भुलाए नहीं भूलते।.....।
‘वो’खिड़की, मेरी खिड़की, जो कुछ पुराने जमाने की थी, वहां से सड़क दूर तक दिखती। कोई भी दूर से आता आसानी से खिड़की की सलाखों के बीच से पहचाना जाता। पूरी सड़क दिखा करती थी, हमारा घर या यूं कहें कि ‘उस’ दुमंजले वाली खिड़की सड़क के साथ-साथ थोड़ी सी कर्व में मुड़ रही थी। घर को बनाते समय दादा जी ने गांठ मार ली थी कि घर की एक खिड़की सड़क के साथ–साथ ही घूम जाए जिससे हम जब चाहें सतर्क हो सकें।
उस दुमंजले वाले कमरे की खाली और पुरानी हो चुकी खिड़की के पास मैं, लेटा रहता था। मेरा कूलर और एसी तो ये ही खिड़की थी। चर-चर करती चारपाई और साथ रखे लकड़ी के बड़े स्टूल (हम उसे टेबल की संज्ञा नहीं दे सकते) पर पड़ी किताबें ये ही पहचान थी मेरी और मेरे कमरे की।
खिड़की के रास्ते कोई पत्थर गर अंदर आकर गिरता तो समझो कि शंभू आ गया है। सिगरेट पीने का ये ही सिग्नल हुआ करता था। दिन में, तीन बार पत्थर इस खिड़की से अंदर आया करता था। सुबह जब शंभू काम पर जाता, फिर जब वो काम से वापस लौटता और तीसरा खाना खाने के बाद सैर करने के लिए। सिर्फ ये ही तीन वक्त थे जब सिगरेट पीने के लिए मैं बाहर निकलता और पूरे दिन का कोटा यानी चार-पांच सिगरेट खींच लेता।
शंभू काम करता था अपने बाबू जी की फेक्ट्री में। बारहवीं के बाद ही वो काम करने लग गया था और तभी से खिड़की से अंदर पत्थर आने लग गए थे। इधर मुझे इंतजार रहा करता था सुबह से शाम और फिर रात का और रात के बाद फिर सुबह का फिर....। ये क्रम यूं ही चलता रहा मैं अब भी पढ़ाई ही कर रहा था, सेकेंड ईयर में। मेरे पास पैसे नहीं हुआ करते थे। वहीं दूसरी तरफ मेरे साथ के कई लड़के कमाने लग गए थे क्योंकि वो पढ़ाई छोड़ चुके थे।
जब कंकड़ खिड़की के रास्ते अंदर ना आए तो समझो कि नीचे नीलम है। मैं दूसरा कंकड़ फेंकने से पहले ही हाथ बाहर निकाल देता। वो समझ जाती कि मैं कमरे में हूं, ये इशारा होता था हमारा। यदि हाथ बाहर नहीं निकलता तो वो चुपचाप उल्टे पैर लौट जाती। पर जब मैं होता तो कमरे के छज्जे पर पड़ी सीढ़ी काम आती। जिसे नीलम से दोस्ती होने के बाद बड़ी मशक्कत से मैंने बनाया था। इस सीढ़ी के बारे में सिर्फ हम दोनों ही जानते थे।
उस दिन धूप अच्छी थी ठंड के दिन जो शुरू हो चुके थे। ठंड की धूप बूढ़े हो चुके जिस्म पर पड़ती तो काली-सफेद चमड़ी सिक कर लाल-काली हो जाती। याद है, उस दिन उम्र के सफर में पक चुके दो जिस्म धूप में चमड़ी काली करने के बाद जैसे ही घर की ड्योढ़ी चढ़े थे उसमें से एक जिस्म ने दूसरे का लगभग साथ छोड़ दिया था। लगा था कि जैसे धूप की गर्मी ने उस पक्के जिस्म में गर्मी भर रखी थी जैसे-जैसे धूप कम हो रही थी पास में रखी लौ बुझने का इशारा कर रही थी। पहले तारे के साथ ही घर का सबसे चहेता तारा टूट गया और पीछे छोड़ गया आंखों में पानी।
ट्रेन में बैठी तारा को धुंधला दिखने लगा था। यादों ने दिल पर अपना कब्जा कर के मन को भर दिया था जो आंखों के रास्ते छलक भी रहा था। आज पूरे एक साल के बाद तारा अपने ननिहाल जा रही है। पता नहीं उस एक जिस्म से मिलने जो कि अभी छत पर बैठा धूप में अपने जिस्म को काला कर रहा था या फिर उस जिस्म के लिए जिसकी यादों ने आंचल को गीला किया था।
स्टेशन की भागदौड़ ने आंखों को सामने देखने का हौसला दिया और एक हाथ में सामान और दूसरे हाथ से अपने पांच साल के बच्चे का हाथ थाम उसने घर का रुख किया। ये शहर बहुत अपना और बहुत पराया दोनों लगता है। ये शहर और घर को जाते रास्ते भुलाए नहीं भूलते पर कभी बिल्कुल अनजाने से लगते हैं। कितनी बार आई हूं यहां पर कभी उन दोनों जिस्मों की गर्मी के साथ तो कभी एक के साथ। पर आज चाह कर के भी दोनों जिस्मों के स्पर्श का एहसास नहीं कर सकती।
रिक्शे से उतरकर गली में दाखिल होते ही नजरें उस चौखट पर पड़ी जहां वो जा चुका शख्स मेरे आने का इंतजार किया करता था। आज वो चौखट खाली थी, मेरे इंतजार में कोई नहीं खड़ा था। आंखों ने फिर से साथ छोड़ दिया। ऐसा क्यों होता है कि जब हम घर के पास पहुंचने लगते हैं तो पैर भी लड़खड़ाने लगते हैं इस चाहत में कि यहां तो इस दर्द को सहारा मिल ही जाएगा।
तारा ने चौखट से खड़े होकर पहले अंदर का जायजा लिया। आंगन पर धूप खिली हुई थी। तभी छत पर आहट हुई। सिर्फ सर दिख रहा था ऐसा लगा जैसे कि कुर्सी थोड़ी खिसकाई गई हो। तारा ने घर के अंदर कदम रखा। आंगन को पार करते हुए मां-बेटे दोनों ने सामान और फल की पन्नी को कमरे में रखा। बिना घर वालों से दुआ-सलाम किए दोनों छत पर जा पहुंचे।
ठीक से सुनाई नहीं देता, देखने में भी परेशानी पर शरीर अभी भी चुस्त। दोनों मां-बेटे दीवार से लगकर उस शून्य में ताकती आंखों में झांकने की कोशिश करते रहे। बूढ़े जिस्म में हरकत हुई और उसने उठकर आसमान में देखते हुए अपनी कुर्सी को छाया से थोड़ा दूर करके धूप में डाली और जा बैठा शून्य के साथ।
बच्चे के हाथ पर एक बूंद आकर गिरी लड़के ने नजर ऊपर नहीं उठाई वो नीचे देखता रहा, समझ चुका था कि मां की आंखों ने फिर से एक बार साथ छोड़ दिया है। बेटे ने हाथ पर गिरी बूंद को यूं ही बहने दिया और दूसरे हाथ से अपने गालों पर उभर आई लकीरों को पोछ दिया।
दोपहर बाद की धूप धीरे-धीरे खिसक रही थी परछाई लंबी होती जा रही थी। तारा ने आगे बढ़कर उन बूढ़े कंधों को छुआ जो थोड़ा और झुक चुके थे। उन हाथों के एहसास ने सामाजिक तुजुर्बेकार से तारा के वहां होने की चुगली कर दी थी।
’आगई तू?सुबह से धूप के साथ चल रहा हूं, वो जहां जाती है उठके साथ हो लेता हूं। तूने देर कर दी, तुझे तो दोपहर तक आजाना चाहिए था अब तो शाम हो चली है।’
’धूप खत्म होने से पहले पहुंच ही गई मैं। आओ, नीचे चलें।‘
बूढ़ी सीढ़ियों को जवानी की सीढ़ियों का सहारा मिल गया। कंधे नीचे आते हुए थोड़ा ऊंचे हो गए थे।