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Monday, June 7, 2010

क्या लोगों ने ‘उसे’ ठीक पीटा?


उस समय मेरे मुंह से सिर्फ ये ही शब्द निकले....ओह माई गॉड। उसे बुरी तरह से पीट रहे थे लोग। हर आता-जाता दो-चार तो कम से कम लगा ही देता, जहां दिल चाहता वहां मारता। कोई-कोई तो मन भरकर मारता और कुछ तो तब तक मारते जब तक कि खुद के हाथ-पैर दुखने ना लग जाएं। सुना था पर आज देख रहा था भीड़ का कानून।

कब-कौन-कहां से निकल कर उस लड़के के सामने आता और अपनी पूरी भड़ास उस पर निकाल देता, पता ही नहीं चल रहा था। हल्की दाढ़ी से भरे, लाल हो चुके गाल पर रसीद कर दिए जाते और यदि चेहरा छुपाने की कोशिश गर वो करता तो उसके कान तक आ चुके लंबे बाल उसके चेहरे को पीछे खींचने के लिए काफी होते। और फिर चेहरे पर तीन-चार....। कुछ तो उसे बॉक्सिंग पैड समझ कर सिर्फ पेट पर ही गुस्सा निकालते।

कुछ को तो मैंने देखा कि वो राहगीर थे उनको पता नहीं था कि मसला क्या है पर बाइक रोकी उतरे और चार लगाए बाइक शुरू की और चल दिए। कुछ सिर्फ वहां से गुजर रहे थे, देखा, लड़के को अपने दम के मुताबिक पीटा और चल दिए। कइयों को देख कर के ऐसा लग रहा था कि जैसे कहीं की खुंदक कहीं पर निकाल रहे हों।

मुझे फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस याद आई। जब सुनील दत्त एक चोर से बोलते हैं कि यदि मैंने तुम को यहां पब्लिक के आगे छोड़ दिया तो सोचो कि तुम्हारा क्या होगा। कोई घर से लड़ कर आया है, कोई बीबी से परेशान है, किसी को बॉस की टेंशन है, ऑफिस का झमेला, किसी की तुम जैसे जेब कतरे ने जेब काटी है सोचो जब इतने सब लोगों के बीच में तुम होगे तो क्या होगा? उस चोर की हवाइयां उड़ने लग गई। यहां पर भी मुझे वही परेशान लोग नजर आ रहे थे।

वहीं, पिटने वाला लगभग 18-19 साल का युवक होगा। बाल लंबे, कद लंबा, छरेरा शरीर पर अब सब कुछ धुमिल हो चुका लग रहा था। जगह-जगह से खून निकल रहा था, मुंह तो लहु-लुहान हो रहा था। कपड़े कई जगह से फट चुके थे। उस लड़के को समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो क्या करे क्योंकि जब तक संभलता तब तक फिर वो अपने आप को संभालने में जुट जाता।

जैसा वो चोर इस दुर्दशा के बाद सोच रहा होगा कि इस से तो बेहतर होता कि पुलिस के हत्थे चढ़ता। हुआ भी ऐसा ही ये सारा वाक्या होने के लगभग 5 मिनट के अंदर ही पुलिस मौके पर पहुंच कर उस लड़के में दो-चार लगाकर अपने साथ लेकर चलते बनी। कई बार तो शक भी होता है कि कहीं ये लोग भी तो नहीं मिले रहते इनसे?

लेकिन यहां के लोग झपट्टामार चोरों से परेशान हो चुके हैं। यहां कि लड़कियों,महिलाओं का तो दिन में सड़क पर निकलना दूभर हो गया है। सड़क पर मोबाइल पर बात कर ही नहीं सकते पता नहीं कब-कौन-कहां से आकर आपका कीमती सामान झपट जाए। कई बार तो लगता है कि उस लड़के के साथ अच्छा हुआ और पीटना चाहिए था पर कई बार सोचता हूं कि इतना नहीं मारना चाहिए था। मैं भी इंसान हूं क्या करूं!

कल एक जगह खबर पढ़ी थी कि लोगों ने झपट्टामार चोर को पकड़ा और इतना मारा कि वो मर गया। वो था इन चोरों से परेशान और पुलिस की नाकामियत पर भीड़ का कानून

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, May 28, 2010

’हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग’।


हर दिन की तरह आज भी दौड़ते-भागते मेट्रो में कदम रखा तो भीड़ होने के बावजूद सीट कब्जाने में मैं कामयाब हो गया। बिना वक्त गंवाए मैं रोज की तरह किताब के काले अक्षरों में गुम हो गया। मैं पन्ने दर पन्ने पलट रहा था, और मेट्रो, स्टेशन दर स्टेशन भागी जा रही थी। अगले स्टेशन पर दो लड़कियां चढ़ीं, लगभग 17-18 की होंगी। आते के साथ ही दोनों ने आंखें दौड़ाई कि महिला आरक्षित सीट कौन सी है और उस पर बैठे एक 55-56 साल के अंकल को ऑन्ली फॉर लेडीज का बोर्ड दिखा कर उठा दिया। मैंने अंकल को सीट दी पर अगले स्टॉप पर सीट वापस मिल गई, अंकल उतर गए।

मुझे याद आया कि उन अंकल जी को महिला आरक्षित सीट लगभग इतनी ही उम्र की एक लड़की ने दी थी। कभी-कभी ये देखने को मिलता है एक साथ सिक्के के दो पहलू। मैं फिर किताब के पन्नों में खो गया। मन को हल्का करने के लिए भारी किताबों से हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन का रुख कर चुका हूं। हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मक पेशकश इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर में डूब गया। अपने में मजेदार शख्शियत इंस्पेक्टर मातादीन।

मैं जितना भी मातादीन के करेक्टर में डूबने की कोशिश करता मेरे मन को उस लोक पर जाने से पहले ही ब्रेक लग जाता। मन भटकने का कारण थी इस लोक की दो बालाएं। दोनों लड़कियां चैटर बॉक्स की तरह चालू थीं। मेरे कान के पास चैं चैं...पैं पैं....बाप रे। वो आपस में बात नहीं कर रहीं थीं, वो तो दुनिया को सुना रहीं थीं कि वो कितनी बोल्ड और मॉर्डन हैं। उनकी वार्ता की विष्य वस्तु लड़के, सेक्स और समाज।

जिन शब्दों को किसी भी फैमली चैनल पर बीप कर दिया जाता है उन शब्दों का उपयोग और उपभोग वो दिल खोल के कर रही थीं। अब बारी थी एंग्री यंग मैन लुक की पर हुआ कुछ नहीं, दोनों मुसकुराते हुए उस लुक को ओवर लुक कर गईं। मैंने किताब की तरफ ही रुख करना बेहतर समझा।

मैं किताब में डूबा हुआ था इनमें से एक लड़की ने पूछा कि हमें फ्लां-फ्लां जगह पर जाना है। अब मुसकुराने की बारी मेरी थी। दोनों को वहां जाना था जिसके लिए पिछले स्टेशन पर उतरना होता है और वहां से दूसरी मेट्रो पकड़नी पड़ती है। अब भी वैसे कुछ ज्यादा बिगड़ा नहीं था। मैंने उन दोनों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अंत में एक मुनियों वाली वाणी में मैंने संदेश दिया जिसे दोनों ने बड़े ही ध्यान से सुना।

मेरी बातें जो दो-चार सुन रहे थे समर्थन कर रहे थे और साथ ही अपनी भड़ास मधुर वाणी में निकाल रहे थे। वहां खड़े हर किसी को पता चल चुका था कि मार्डन दिखने और लगने में बहुत फर्क होता है। मार्डन होने का ये मतलब नहीं कि अक्ल के दरवाजे बंद कर दो।

दोनों वहां से जल्द गेट पर पहुंची और जाते-जाते एक जुमला भी छोड़ गईं हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग मेट्रो का दरवाजा खुल चुका था और वो दोनों इस प्रकरण को हंसी में उड़ाते हुए आगे बढ़ गईं और पीछे छोड़ गई वो ओल्ड जनरेशन। मैंने किताब बंद की और बैग के हवाले करते हुए सीट छोड़ दी, मैं अपने गंतव्य तक पहुंचने वाला था।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, May 27, 2010

धीरे-धीरे एक आदत की ओर...


सुबह हर किसी को जल्दी, हर कोई अपने कदमों से तेज, दूसरे से पहले पहुंचने की होड़। एक अजनबी से भी एक अनजाना मुकाबला, आगे निकलने की जद्दोजहद। हर कोई भीड़ का हिस्सा और नहीं भी। एक-दूसरे को धक्का देते, कोहनी से पीछे ढकेलते, आगे बढ़ जल्दी से सीट लपकने की जी जान कोशिश। और फिर सीट पर बैठकर शून्य में खोने का वो एहसास। उफ!!...देखते ही बनता है, हजारों के साथ अकेले सफर करना, भीड़ में अपने ख्यालों के साथ खो जाना।

मेट्रो की सीढ़ियों से ही जैसे मुकाबला शुरू हो जाता है। सबसे पहले दौड़ कर लिफ्ट पकड़ने की चाहत। जो सवार हो गया तो उसे सीट कब्जाने की होड़ और जो नहीं चढ़ पाया उसे सीढ़ियों के रास्ते सीढ़ी दर सीढ़ी किसी को पीछे छोड़ने की होड़। प्लेटफॉर्म पर सिर से जुड़े सिर फिर भी हर कोई हर एक से जुदा-जुदा।

एक बार इधर-उधर अपने सिर को घुमाकर देखिए। पहले बहुत कम लोग पढ़ते हुए चला करते थे पर मेट्रो में इस का चलन वापिस शुरू हुआ है। ना मुझे इस से मतलब ना उस से। कान में इयर फोन, हाई मैमोरी बेस्ड मोबाइल जिसमें सुनने को अथाह सामाग्री। बड़ों की तरज पर हाथ में न्यूजपेपर या फिर अंग्रेजी का कोई नॉवेल। ये है कुछ युवाओं का चेहरा। कुछ युवा जुदा भी हैं। दोनों में कॉमन है मोबाइल, वो नॉवेल में ना करते हुए, मोबाइल में ही आरएनडी करते रहते हैं।

मैने मेट्रो में कुछ दिन तो और लोगों की तरह सिर से सिर मिलाकर आंखों में नींद या फिर पुराने ख्याली पुलाव या दिन के सपनों के साथ गुजार दिए। पर फिर लगा कि नहीं ऐसे 25-30 मिनट बेकार में बेकार करना ठीक नहीं। तो अधिकतर कोई किताब रखकर चलता हूं और जैसे ही मौका मिला, लग जाता हूं पन्ने पलटने में। मेट्रो के कारण कई किताब खत्म करने में कामयाब रहा हूं।

कई बार मेट्रो में कुछ बातें ऐसी होती है जो कि ना जाने क्यों दिल को छू जाती हैं और कुछ दिल को दुखा देती हैं। इन सब बातों की बात अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, March 10, 2010

वो पुरानी चौखट की याद


उस दिन धूप अच्छी थी ठंड के दिन जो शुरू हो चुके थे। ठंड की धूप बूढ़े हो चुके जिस्म पर पड़ती तो काली-सफेद चमड़ी सिक कर लाल-काली हो जाती। याद है, उस दिन उम्र के सफर में पक चुके दो जिस्म धूप में चमड़ी काली करने के बाद जैसे ही घर की ड्योढ़ी चढ़े थे उसमें से एक जिस्म ने दूसरे का लगभग साथ छोड़ दिया था। लगा था कि जैसे धूप की गर्मी ने उस पक्के जिस्म में गर्मी भर रखी थी जैसे-जैसे धूप कम हो रही थी पास में रखी लौ बुझने का इशारा कर रही थी। पहले तारे के साथ ही घर का सबसे चहेता तारा टूट गया और पीछे छोड़ गया आंखों में पानी।

ट्रेन में बैठी तारा को धुंधला दिखने लगा था। यादों ने दिल पर अपना कब्जा कर के मन को भर दिया था जो आंखों के रास्ते छलक भी रहा था। आज पूरे एक साल के बाद तारा अपने ननिहाल जा रही है। पता नहीं उस एक जिस्म से मिलने जो कि अभी छत पर बैठा धूप में अपने जिस्म को काला कर रहा था या फिर उस जिस्म के लिए जिसकी यादों ने आंचल को गीला किया था।

स्टेशन की भागदौड़ ने आंखों को सामने देखने का हौसला दिया और एक हाथ में सामान और दूसरे हाथ से अपने पांच साल के बच्चे का हाथ थाम उसने घर का रुख किया। ये शहर बहुत अपना और बहुत पराया दोनों लगता है। ये शहर और घर को जाते रास्ते भुलाए नहीं भूलते पर कभी बिल्कुल अनजाने से लगते हैं। कितनी बार आई हूं यहां पर कभी उन दोनों जिस्मों की गर्मी के साथ तो कभी एक के साथ। पर आज चाह कर के भी दोनों जिस्मों के स्पर्श का एहसास नहीं कर सकती।  

रिक्शे से उतरकर गली में दाखिल होते ही नजरें उस चौखट पर पड़ी जहां वो जा चुका शख्स मेरे आने का इंतजार किया करता था। आज वो चौखट खाली थी, मेरे इंतजार में कोई नहीं खड़ा था। आंखों ने फिर से साथ छोड़ दिया। ऐसा क्यों होता है कि जब हम घर के पास पहुंचने लगते हैं तो पैर भी लड़खड़ाने लगते हैं इस चाहत में कि यहां तो इस दर्द को सहारा मिल ही जाएगा।

तारा ने चौखट से खड़े होकर पहले अंदर का जायजा लिया। आंगन पर धूप खिली हुई थी। तभी छत पर आहट हुई। सिर्फ सर दिख रहा था ऐसा लगा जैसे कि कुर्सी थोड़ी खिसकाई गई हो। तारा ने घर के अंदर कदम रखा। आंगन को पार करते हुए मां-बेटे दोनों ने सामान और फल की पन्नी को कमरे में रखा। बिना घर वालों से दुआ-सलाम किए दोनों छत पर जा पहुंचे।

ठीक से सुनाई नहीं देता, देखने में भी परेशानी पर शरीर अभी भी चुस्त। दोनों मां-बेटे दीवार से लगकर उस शून्य में ताकती आंखों में झांकने की कोशिश करते रहे। बूढ़े जिस्म में हरकत हुई और उसने उठकर आसमान में देखते हुए अपनी कुर्सी को छाया से थोड़ा दूर करके धूप में डाली और जा बैठा शून्य के साथ।

बच्चे के हाथ पर एक बूंद आकर गिरी लड़के ने नजर ऊपर नहीं उठाई वो नीचे देखता रहा, समझ चुका था कि मां की आंखों ने फिर से एक बार साथ छोड़ दिया है। बेटे ने हाथ पर गिरी बूंद को यूं ही बहने दिया और दूसरे हाथ से अपने गालों पर उभर आई लकीरों को पोछ दिया।

दोपहर बाद की धूप धीरे-धीरे खिसक रही थी परछाई लंबी होती जा रही थी। तारा ने आगे बढ़कर उन बूढ़े कंधों को छुआ जो थोड़ा और झुक चुके थे। उन हाथों के एहसास ने सामाजिक तुजुर्बेकार से तारा के वहां होने की चुगली कर दी थी।

आगई तू? सुबह से धूप के साथ चल रहा हूं, वो जहां जाती है उठके साथ हो लेता हूं। तूने देर कर दी, तुझे तो दोपहर तक आजाना चाहिए था अब तो शाम हो चली है।
धूप खत्म होने से पहले पहुंच ही गई मैं। आओ, नीचे चलें।

बूढ़ी सीढ़ियों को जवानी की सीढ़ियों का सहारा मिल गया। कंधे नीचे आते हुए थोड़ा ऊंचे हो गए थे।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, January 30, 2010

स्टोव की गर्मी


फटररररर...फटरररररर....खटररररर...खटरररररर...। ग्लास से बार-बार टकराती चम्मच की खटररररर....खटररररर....। खटररर...खटरररर...होने के बाद तेल में छप्प से एक चिरमिराहट के साथ वो ग्लास को स्टोव पर रखे फ्राइकपेन में उड़ेल देता।
अच्छे से सेकना...पर जलाना नहीं और हां, यार...दो अंडों का ऑम्लेट और कर देना विद आउट ब्रैड।

फुल बाजू की कमीज पर आधे बाजू का पैबंद लगा स्वेटर। कोहरे से भरी रात में जहां 10 हाथ दूर दिखाई नहीं दे रहा वहां रात के 1 बजे ये शख्स आधे बाजू के कुछ ऊन के टुकड़ों से ठंड से लोहा ले रहा है। ना सर पर टोपी, ना पैरों में जूते, ना ही कोई ऊपर से कपड़ा। हां... पैरों में जगह जगह से फटी जुराब जरूर पहन रखी थी। गौर से देखा तो जान पड़ा कि एक नहीं दो जोड़ी फटी पुरानी सी जुराब एक के ऊपर एक थी।

वहीं, हमने सर पर टोपी, गले में मफलर, हाथ में दस्ताने, पैर में जूते और अंदर मोटी जुराब अड़ाई हुई थी। हमने अपने शरीर को मोटी-मोटी कपड़ों की परतों से ढका हुआ था। फिर भी जान नहीं पड़ रहा था कि ठंड कहां से लग रही है।

लोग आते उसे ऑर्डर देते और वहीं कहीं पर खड़े होकर अपने-अपने पेय पीने लग जाते।  एक बार वो ऑर्डर देने वाले को देखता और फिर अपने काम में जुट जाता। पता नहीं कहां से उसे पता होता कि फलां ऑर्डर वाला कहां खड़ा हुआ है। नहीं जानता मैं कि वो किस तरह से याद रखता था कि पहले ये है और दूसरा ये...। पहले वाले की चाय में चीनी कम रखनी है और इलायची नहीं डालनी, दूसरी वाले के ऑमलेट में हरी मिर्च नहीं डालनी है। ख्वाहिशें होती रहती और मजबूरी नीचे झुके उन ख्वाहिशों को पूरा करती रहती।

जब हम चलने लगे तो मैंने उससे पूछा, क्यों ठंड नहीं लग रही क्या? उसने नजर उठाके देखा और फिर लग गया खटरररर....फटररररर...में। तब तक काफी लोग जा चुके थे, कुछ ऑर्डर वो पूरा करने में लगा हुआ था। पैसे वापिस करने के बाद उसने कहा, भाईसाहब, पैर अकड़ जाते हैं जबकि मैं दो जुराबें पहनता हूं। मेरे पास ना तो जूते हैं और ना ही गर्मी देने को अंगीठी। पूरे टाइम तो स्टोब चलता ही रहता है और मैं चलता रहता हूं। स्टोव के पास आने की चाहत ही मुझे जल्दी-जल्दी काम करवाती है। मैं जब ठेला छोड़ता हूं तो ठंड महसूस करता हूं पर सामान देकर लौटने पर गरमाहट दूर से ही लगने लगती है।

साहब, स्टोब की गर्मी जिस्म में गर्मी तो भर देती है पर पैर ठंड में मारे खड़े रहने में दिक्कत पैदा करते हैं।
मैंने कुछ पैसे उसकी तरफ बढ़ाए और अपने लिए गर्म जुराबें ले लेना।
नहीं साहब, ये पैसे तो मैं ले ही नहीं सकता, हां, गर कोई फटा पुराना मोजा आपके पास पड़ा हो तो आते-जाते वक्त.....।
वो बोल पूरे नहीं कर पाया, नीचे देखने लगा।
...फटे भी होंगे तो चलेंगे दोनों जुराबों के ऊपर ही पहन लूंगा।

पैसे उसने नहीं लिए....क्या आदमी है....पता नहीं कहां से आती है इतनी सहनशक्ति। क्या सिर्फ स्टोव की गर्मी में रात बिता देता होगा वो....यहां तो चारदिवारी के अंदर भी रूम हीटर चला लेते हैं लोग।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, September 10, 2009

एंबुलेंस, ट्रैफिक और जिंदगी की कश्मकश


घर की सोसायटी से निकलते ही कुछ दूरी पर बाएं होते ही ट्रैफिक से सामना हो ही जाता है। रेंगती हुई चलती गाड़ियां ऐसे जैसे कोई अजगर शिकार निगलने के बाद धीर-धीरे रेंग कर किसी सुरक्षित स्थान पर लहराकर जा रहा हो। एनएच की राह पकड़ते-पकड़ते ही कई गाड़ी वाले अपना धैर्य खो देते हैं और आगे निकलने की होड़ में वो ऐसा काम करने लग जाते हैं जिसे हम सुबह-सुबह बोहनी खराब करना कहते हैं। पर अब तो आदत सी पड़ गई है फिर भी एनएच तक पहुंचने में ही काफी वक्त निकल जाता है।
एनएच पर गाड़ियों का काफिला एक दूसरे के पीछे और उनमें से कुछ ऐसे जो इस काफिले में सब से पीछे और हसरत सबसे आगे चलने की। रास्ते में सिर्फ और सिर्फ पों....पों....पों....पों.....की आवाज़। पता नहीं क्यों सारी दुनिया हॉर्न बजाने लग जाती है जब कि जानती है कि आगे वाला भी सड़क पर अपना घर बनाने नहीं आया। वो भी मौका पाते ही आगे बढ़ेगा और यदि वो आगे नहीं बढ़ रहा तो क्या हॉर्न बजाकर आप गाड़ी के ऊपर से निकल जाएंगे। पता नहीं क्यों लोग दिमाग से ज्यादा हॉर्न का इस्तेमाल करते हैं।
पीछे से एंबुलेंस के सायरन की आती आवाज़ ने मेरे ध्यान को भंग किया। टों....टों.....टों.... टों.....की आवाज़ दूर से ही अपने लिए रास्ता मांगते हुए लगी। अपनी बाइक की सीट से मैंने सायरन को देखने की कोशिश की। वो चारों तरफ गाड़ियों से घिरा सिर्फ और सिर्फ चीख रहा था जो वो कर सकता था। याद आता है बचपन में गुरूजी कहते थे कि बेटा एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस की गाड़ियों के लिए हमेशा रास्ता छोड़ देना चाहिए। शायद सायरन भी बार-बार बजते हुए ये ही कह रहा था कि मुझे रास्ता दो
कुछ इसी उधेड़बुन में मैं लगा हुआ था और धीर-धीरे आगे बढ़ रहा था पर एंबुलेंस को आगे बढ़ने की जगह नहीं मिल रही थी। सायरन अपनी ही आवाज़ में चिंघाड़ रहा था,....टों....टों..... टों....टों.....। आवाज़ तेज होती जा रही थी और रास्ता उतना ही सकरा।
रेड लाइट पर ट्रैफिक वालों और कुछ लोगों की मदद ने उस एंबुलेंस को निकालने की पहल की। ट्रैफिक तुरंत साफ करते हुए एंबुलेंस को निकाला गया। एंबुलेंस के निकलते ही काफी कारें एक साथ झपटीं, सब के दिमाग में ये ही चल रहा होगा कि एंबुलेंस के पीछे रहेंगे तो बिना रुकावट गंतव्य तक पहुंच जाएंगे।
मैंने अपनी बाइक की स्पीड थोड़ी तेज की और एंबुलेंस के पीछे पहुंच गया। जब रेड लाइट पर मेरे पास से गुजरी थी एंबुलेंस तो आंखों ने देखा कि उसमें एक महिला बैठी हुई थीं और ग्लूकोस स्टैंड था। जब एंबुलेंस ने मुझे क्रॉस किया तो एक हाथ ऊपर उठा और फिर नीचे गिर गया। बस। क्या चल रहा है इस एंबुलेंस में ये जानने का दिल कर गया। एंबुलेंस का ड्राइवर मरीज की हालत की गंभीरता को समझते हुए शायद 60 के ऊपर नहीं जा रहा था या फिर सड़क में हो चुके गढ्ढे उसे जाने नहीं दे रहे थे। पर सायरन अब भी उसी तेजी के साथ रास्ते के ऊपर भागता जा रहा था।
एंबुलेंस में एक लड़के पर ग्लूकोज लगा हुआ था और बार-बार लड़का अपना दूसरा हाथ ऊपर-नीचे कर रहा था। हाथ चाहे ऊपर हो या फिर नीचे बगल में बैठी महिला लगातार शून्य में देख रहीं थी। एंबुलेंस ने लेफ्ट साइड का इंडिकेटर दिया और एंबुलेंस बाएं जाने लगी, धीरे-धीरे मुझसे दूर, मेरा और उसका रास्ता जुदा हो गया था। जब तक वो मेरी आंखों से ओझल नहीं होगई मेरी आंखें उसी का पीछा करती रहीं। मुझे दाहिने मुड़ना था मैं आगे बढ़ा और फिर उसी ट्रैफिक में ये सोचते हुए गुम हो गया, क्यों हम खुद से किसी के लिए रास्ता नहीं छोड़ते, क्यों?
आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, September 5, 2009

बेगम और बेटे ने मिलकर मेरे इस ‘खास’ दिन को बेहद ‘खास’ बना दिया।

रात के बारह बजने वाले थे घर में हम सब बैठे हुए थे। मैं कंप्यूटर पर आर्टिकल लिखने में मशगूल था। बेगम बेटे के साथ पढ़ने में लगीं हुई थी। मैं बार-बार बेटे से कह रहा था कि सो जाओ कल सुबह स्कूल जाना है। पर दूसरे दिनों की तरह आज पता नहीं क्यों बेटा सोने की बात पर खुश नहीं हो रहा था।


पापा सो जाऊंगा पहले ये पेंटिंग पूरी तो कर लूं

अरे कल पूरी कर लेना फिर सुबह स्कूल जाने के लिए उठने में ना नुकुर करते हो।

ठीक है, ये पेंटिंग पूरी कर लूं फिर सो जाऊंगा।

वहीं बेगम की किताब भी आज बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। वहीं मैं अपने काम में फिर से लग गया।


ठीक बारह बजे बेटे ने अपने हाथों से बना ग्रीटिंग कार्ड मुझे दिया और मुझे विश रके याद दिलाया की आज मेरा जन्मदिन है। मेरी आंखें आश्चर्य में खुल गई कि आंखों में नींद छुपाए बेटा इस इंतजार में था कि कब बारह बजें और वो मुझे अपने हाथों से गिफ्ट दे सके। मैंने उसे गले लगा लिया उस ग्रीटिंग कार्ड पर क्या बना हुआ था और क्या लिखा हुआ था वो आप चित्रों में देख सकते हैं।



ये कलाकारी मेरे बेटे की है। इस बार नवरात्र के पहले दिन वो पांच साल का पूरा हो जाएगा। वहीं दूसरी तरफ मेरी बेगम मुग्ध-मुग्ध मुस्कुरा रहीं थीं। उन्होंने भी मुझे विश किया और फिर मैंने कंप्यूटर बंद किया और बेटा मेरे गल लगकर सो गया।


सुबह उठा तो पाया की बीच-बीच में मोबाइल बज रहा है और कुछ संदेश रात के भी थे तो अपने मित्रों की बधाई का जवाब देने लग गया। फिर फोन कॉल्स का सिलसिला शुरू हो गया। माताजी-पिताजी-भैयाजी सब से बात करने के बाद मैं सुबह के कामों को निपटा कर पूजा-पाठ किया।

मुझे सुबह क्या रात से ही लग रहा था कि आज मेरा स्पेशल दिन है। बेगम और बेटा दोनों मेरे को ये एहसास कराने में लगे हुए थे कि आज मेरा जन्मदिन है। स्कूल से आते के साथ ही बेटा जितना बार मुझे मिलता तो सिर्फ एक बात कहता पापा हैप्पी बर्थ डे


अब सरप्राइज देने की बारी बेगम की थी। जैसा कि उन्हें पता है कि बच्पन में शायद मैं चार-पांच साल का था तो किसी ने कुछ कह दिया था तो फिर पापाजी कभी केक लेकर नहीं आए। तो इस बार बेगम की तरफ से ये थी भेंट।

फिर एक शर्ट जैसी कि कभी कॉलेज टाइम में मैं पहना करता था। अंदर राउंड नैक टी-शर्ट और फिर नीचे के दो-तीन बटन लगी कॉटन की शर्ट। दोपहर को मेरा मनपसंदीदा खाना उसी तर्ज पर जिस तरह मुझे पसंद है (अब भी मुंह में पानी आ रहा है, पेट भरा हुआ है पर.....।) फिर शाम को एक चैक शर्ट दी जिस तरह की शर्ट मैं काफी दिन से सोच रहा था लेने की। इतने सरप्राइज बहुत बढ़िया, सुभानअल्लाह।

मैं इतने सरप्राइज पाकर अपने आपको किसी वीवीआईपी से कम नहीं समझ रहा था। बेगम ने अपना काम कर दिया था। मैं चने के झाड़ में चढ़ चुका था। मैंने बोला अब शाम का डिनर तुम दोनों को मैं कराऊंगा। डिनर से ज्यादा तो जो डिनर के पहले और बाद में मंगाया जाता है उसके कारण जेब ज्यादा ढीली होती है। ऐसे मौकों पर यूं जाना जरा अच्छा लगता है.....

अंत में चलते-चलते प्रीती जी (मेरा सागर) को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मुझे इस खास मौके पर इतनी अच्छी कविता भेंट की। मैंने तो सोचा ही नहीं था कि कोई भी ब्लॉग में मेरे जन्मदिन को यूं मना सकता है। साथ ही बी एस पाबला जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मेरे इस खास दिन को मेरे लिए इतना अहम बना दिया और मैंने इस बार काफी ब्लॉगर दोस्तों से बधाई पाई। आप सब का एक बार फिर से धन्यवाद कहना चाहूंगा।


आपका अपना

नीतीश राज

Friday, September 4, 2009

इन बहकते कदमों का दोषी कौन?

बेगम ने फोन पर बताया कि, ‘सोसायटी में कुछ हलचल हो रही है और शायद पुलिस भी पहुंची हुई है’। मैं सैलून में सेविंग करवा रहा था। अमूमन मैं सेविंग घर पर ही करता हूं। एक तरफ जल्दी-जल्दी सेविंग हो रही थी और दूसरी तरफ मेरे दिमाग में कई बातें चल रही थीं। सैलून से फारिक़ होकर मैं घर की तरफ दौड़ लिया। इस बीच मैंने ये काम कर दिया था कि सोसायटी में एक और शख्स को फोन पर इस बारे में जानकारी दे दी थी और कह दिया था कि थोड़ा ध्यान रखे।

सोसायटी के गेट पर पहुंचते के साथ ही लग गया कि मामला गड़बड़ है। गेट के बाहर तक आवाज़ें आ रही थीं। गेट में दाखिल होते ही गार्ड ने मुझे रोक लिया फिर पहचान करके अंदर आने दिया। मैंने इस बीच ही आधी जानकारी गार्ड से ही ले ली। गाड़ी पार्किंग में लगा रहा था तब भी कई बार आवाज़ें बहुत तेज हो जाती और फिर किसी के बीच-बचाव करने पर तेज होती आवाज़ों पर लगाम लग जाती।

जहां से आवाज़ रही थी जब उस समूह के पास पहुंचा तो अधिकतर चेहरे नए थे दो-चार लोग कुर्ते-पजामें में दिख रहे थे, बाकी सब 35-40 के बीच की उम्र के थे। उनमें से कुछ तो पुलिसवाले के साथ गेट रजिस्टर की एंट्री को चैक कर रहे थे और कुछ गार्डों से सच निकलवाने की कोशिश में जुटे हुए थे। सच इसलिए क्योंकि कई बार वो लोग ये बात कह रहे थे कि इन गार्डों को पता है सारा सच। अभी तक मेरी समझ में ये तो आ गया था कि कौन परिवार का है और कौन-कौन साथ के या फिर मित्रगण हैं उस पीड़ित परिवार के। पर ये अभी तक नहीं समझ पाया था कि मामला क्या है।

थोड़ी देर बाद सारी स्थिति साफ हो गई। हमारी सोसायटी में रहने वाले एक बिजनेसमैन का बेटा तरुण बीती रात करीब दो-तीन बजे अपने घर से भाग गया। रात एक बजे तक परिवार के साथ बैठे होने की पुष्टि पूरा परिवार कर रहा था। परिवार के मुताबिक रात में पूरे परिवार ने मिलकर एक साथ खाना खाया और फिर टीवी देखा। बिजनेसमैन होने के कारण खाना देर से ही होता था। रात को तीन बजे से पहले ही तरुण घर छोड़कर भाग गया था और जाते-जाते बाहर से घर के दरवाजे की कुंडी भी लगा गया था। इस बात की पुष्टि गेट में मौजूद गार्ड की रजिस्टर एंट्री से हुई थी कि कोई भी रात 3 बजे के बाद नहीं गया था।

वहां पर मौजूद लोगों ने ये बताया कि उसकी उम्र 14 साल की है तब तो उसके दोस्तों को और कुछ गार्डस को साथ लेकर पुलिस वहां से चली गई। शाम होते-होते सोसायटी में इसी बात की चर्चा होने लगी। तब मुझे पता चला कि ये 14 साल का लड़का वो ही है जो कि बार-बार मना करने पर भी सोसायटी में सबसे तेज पल्सर बाइक चलाता था। सोसायटी के एक सज्जन ने मुझे बताया कि उस लड़के को काफी बुरी आदतें थीं। दोस्तों ने जो पुलिस को बताया वो ये कि तरुण तो कल से कह रहा था कि वो अपने किसी दोस्त के पास पुणे या गोवा जा रहा है। कोई उसे ट्रेस ना कर सके वो अपना मोबाइल फोन भी घर पर ही छोड़ कर गया था। पुलिस तफ्तीश में लगी हुई है।

यहां पर इस 14 साल के लड़के की बात को बताने का मतलब सिर्फ ये है कि कहीं हम अपने बच्चे को छोटी सी उम्र में सारी सहुलियतें देकर उन्हें बिगाड़ तो नहीं रहे। जैसे बाइक को चलाने की उचित उम्र तो 18 साल है पर उस लड़के को देखकर लगता था कि वो इस उम्र को भी पार कर चुका है। मैंने तरुण की तस्वीर देखी तो देख कर लगा कि वो कोई 18-20 साल का लड़का है। बच्चों के मांगने पर उन्हें हमेशा पैसे पकड़ा देने कहां तक उचित है? कहीं हम खुद ही तो उनको गलत राह पर नहीं धकेल रहे? इन बहकते कदमों का दोषी कौन? माना की इस दौड़ती भागती जिंदगी में घरवालों की सारी इच्छाओं और सहुलियतों और उनकी मांगों को मानने के लिए हमेशा काम में लगे रहना क्या हम अभिभावक अपनी जिम्मेदारियों से मुंह तो नहीं मोड़ रहे? कई बार तो ये भी समझ में नहीं आता कि इसके लिए क्या करें कि जो हर मोड़ पर हम सही और सब की इच्छाओं पर खरा उतर सकें?

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, August 30, 2009

सावधान! आप कार खरीदने तो नहीं जा रहे गर जा रहे हैं तो इसे पढ़ते जाइए।

कुछ दिन पहले की बात है लगभग महीने भर पहले की, मेरे एक जाननेवाले के साथ कुछ ऐसा हुआ जिसे मैंने क्या कभी मेरे जाननेवालों में से किसी ने नहीं सुना या देखा था। तभी से मैंने सोच लिया था कि इस बारे में जरूर से लिखूंगा और सबको आगाह करूंगा।

मेरे जाननेवाले एक बिल्डर की कंपनी में काम करते हैं। हर दिन सौ से ज्यादा लोगों से मिलना होता है। काफी दिन से सेंट्रो को चला रहे थे। एक दिन कहीं पर जाना था साथ में उनके बॉस भी थे, बॉस की गाड़ी में कुछ खराबी आगई थी। उस ड्राइव के बाद बॉस ने कहा कि बेहतर है कि दूसरी गाड़ी ले लो। बातों-बातों में बात निकली और तय होगया कि नई गाड़ी ली जाए। उनको पसंद थी होंडा सिटी।

कैसे ना कैसे करके 10 दिन के अंदर ही होंडा सिटी घर की पार्किंग में खड़ी थी। घर वाले काफी खुश थे। दोस्तों को पार्टी भी दी गई वो सब अलग। कहीं पर भी जाना होता तो होंडा सिटी से ही जाते। बेचारी सेंट्रो अपनी बारी आने की राह तकने लगी।

बहरहाल, गाड़ी खरीदने के एक महीने के बाद ही एक हादसा हो गया। एक महीने के बाद गाड़ी सर्विसिंग के लिए जाती है वैसे ही उनकी भी गई। सर्विसिग के दो-तीन दिन के बाद ही एक दिन जब वो ऑफिस जाने के लिए घर से उतरे तो देखा कि गाड़ी पार्किंग में मौजूद नहीं है। काटो तो खून नहीं जैसी स्थिति हो गई। उनके हाथ में गाड़ी की चाबी थी फिर गाड़ी गई तो गई कहां और कैसे?


तुरंत उन्होंने घर जाकर सबको बताया कि गाड़ी नहीं है पार्किंग में। कार साफ करने वाले से पूछा गया। उसने बताया कि गाड़ी आज उसने साफ की थी लगभग सुबह 7.45 के करीब। फिर जिस गार्ड की पार्किंग में ड्यूटी थी उस गार्ड से पूछा गया उसने भी बताया कि गाड़ी को खुद उसने सफाई होने के बाद चैक किया था। तुरंत दोस्तों को कॉल करके बुलाया गया कुछ ऑफिस जा रहे थे या कुछ रास्ते में थे सब वापिस सोसायटी आगए। सभी को बताया गया तो सब हैरान क्योंकि होंडा सिटी का दावा है कि उसकी डुप्लीकेट चाबी कोई बना नहीं सकता और बिना चाबी के वो खुल ही नहीं सकती। तो फिर गाड़ी कहां गई?

शाम तक ये साफ हो गया कि गाड़ी चोरी हो गई है। हम लोगों के प्रेशर के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली। पुलिस की शुरूआती तफ्तीश में एक ऐसी बात सामने आई कि जिसके कारण पैरों तले जमीन खिसक गई। पुलिस ने दूसरी चाबी की डिमांड की, तुरंत पेश की गई। और यहीं था सबसे बड़ा पेंच। दूसरी चाबी यानी की डुप्लीकेट चाबी जो कि आपको गाड़ी खरीदते वक्त दी जाती है वो इस होंडा सिटी की नहीं थी उस चाबी में फर्क था

पुलिस को शक हुआ डीलर के ऊपर और तुरंत उन लोगों को पकड़ा गया जिन्होंने डिलीवरी की थी गाड़ी की। डीलर के दो लोगों को पुलिस ने डिटेन किया। पर कुछ पता नहीं चला और फिर कई दिन तफ्तीश में निकलते चले गए। हम लोग यहां भागदौड़ कर रहे थे।

एक दिन दिल्ली पुलिस के रिनगर थाने से कॉल आया कि मेरे जानने वाले को कि गाड़ी मिल गई है। सभी पुलिस स्टेशन पहुंचे तो एक शख्स को पकड़ रखा था और गाड़ी को असम से रिकवर किया गया। गाड़ी के फर्जी कागजात यहां दिल्ली में ही बन रहे थे, तभी पुलिस ने इस शख्स को धर दबोचा।

उस गाड़ी चोर ने खुलासा किया कि 6 साल के अंदर अब तक 71 गाड़ियां चुरा चुका है। गाड़ियों को नॉर्थ इस्ट, उत्तराखंड जैसी जगहों पर ले जाकर बेच दिया जाता हैं। इस काम में पूरा गिरोह सक्रिय है और अधिकतर उन गाड़ियों को निशाना बनाया जाता हैं जो कि नई होती है क्योंकि उनमें एक भी पैसा नहीं लगता, सिर्फ कागजात बनवाने का खर्च आता है।

पर होंडा सिटी की चाबी कहां से मिली?

तब जो पता चला उसने हमारे होश ही उड़ा दिए। डीलर के यहां निचले तबके पर इनके गिरोह के लोग काम करते हैं। जब गाड़ी की डिलीवरी करनी होती है तब गाड़ी लाने के लिए उन लोगों से ही कहा जाता है। यही वो वक्त होता है जब वो खेल जाते हैं सबसे बड़ा खेल। तब वो एक्सीडेंटल गाड़ियों की चाबी के साथ उस नई नवेली गाड़ी की चाबी को बदल देते हैं और खुशी से लबरेज ग्राहक दोनों चाबियों को चैक करके नहीं देखते। अधिकतर लोग उस चाबी से ही ओपरेट करते हैं जिसमें कि रिमोट इन बिल्ट होता है और दूसरी चाबी को यूं ही बिना चैक किए जेब के हवाले कर देते हैं। जब उनकी गाड़ी सर्विसिंग के लिए आती है तो वहां पर भी गिरोह के लोग होते हैं। अधिकतर गाड़ी घर पर ही डिलीवर की जाती है तो एड्रेस(घर का) का पता चल जाता है। गर डिलीवरी घर पर नहीं होनी है तब गिरोह का दूसरा साथी सर्विस सेंटर के बाहर मौजूद होता है। जैसे ही गाड़ी मालिक गाड़ी लेकर जाता है तो बाहर खड़ा शख्स गाड़ी का पीछा करके घर तक पहुंच जाता है। फिर दो-तीन दिन तक लगातार गाड़ी के मालिक पर नजर रखकर किसी दिन भी हाथ साफ कर दिया जाता है। शान से बिना आवाज़ किए काम हो जाता है और ड्राइवर की सीट पर बैठकर चोर गाड़ी उड़ा ले जाता है।

तो ये है आज के हाईटेक चोरों की हकीकत। तो संभल जाइए कहीं आप अपने हाथ से ही चोरों को अपनी गाड़ी की चाबी तो नहीं दे कर आ रहे। कहीं आप गाड़ी खरीदने जा रहे हों तो आप तो वो गलती नहीं कर रहे। जब भी कोई भी चाबी लें तो सभी चाबियों को चैक जरूर करें और संतुष्ट होने के बाद ही वहां से हटें। तब थोड़ा वक्त गर आप लगा देंगे तो बाद में बहुत सा वक्त और आपकी गाड़ी बच जाएगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, August 12, 2009

ट्रैफिक की पों...पों...और मेरा मन गीला-गीला।

ऑफिस से घर पहुंचने की जल्दी, घर के रास्ते पर गाड़ियों का शोर और जगह-जगह से उड़ती धूल। रास्ते में बस...किसी कार....या थ्री व्हीलर का बिना बात बजता हॉर्न, बार-बार बजता हॉर्न लगता कि क्या चालक बहरा है या हमें बहरा समझ रखा है या हमें बहरा करने पर तुला हुआ है। आंखें घर तक पहुंचाने वाली बस के इंतजार में, अपनी उस बस के इंतजार में दूर तक देखती मेरी नजर। पर लगता है कि फिर बस का इंतजार करना व्यर्थ हो जाएगा....इतनी भरी होगी कि चढ़ ही नहीं पाऊंगा। यदि बस टाइम पर आ जाए और मिल जाए तो तीन-चार चेंज करने से बच जाता हूं। पर अब समय बर्बाद करने से बेहतर है कि मेट्रो से चला जाए करेंगे चार बार कसरत।

मेट्रो से मुझे तो ये ही अच्छा लगता है कि सफर कब खत्म हो जाता है पता ही नहीं चलता। जब तक संभलते हैं तो पता चलता है कि आपका गंतव्य आगया। पूरा पसीना सूख गया पर अब शुरू होगी घर तक पहुंचने की जंग। धूल-हॉर्न-चिल्लाहट-धूप-उमस-पसीना-गंदगी और पता नहीं क्या-क्या सब से होगा सामना, वो भी एक साथ। धूप इतनी रहती है पर फीडर बस वालों से लड़ों नहीं तो चलेंगे नहीं। देखो, सभी तो बस के अंदर भिच कर बैठे-खड़े हुए हैं। मैं नीचे ही रहता हूं धूप झेल लूंगा पर पसीना-गर्मी नहीं। ये देखो हम धूप में खड़े हुए हैं और ड्राइवर-कंडेक्टर छांव में हंसी-ठिठोली कर रहे हैं। चलो आज मुझे नहीं जाना पड़ा और कोई गया है लड़ने के लिए। भइया दोनों को लेकर ही लौटना। चलो फतह मिली उठ कर आ तो रहे हैं।

कई बस बदल लेने के बाद अपने अंतिम गंतव्य तक पहुंचने के लिए ऑटो की तरफ बढ़ा।
‘अरे, तुम ही तो थे ना भइया कल भी’।
मैंने उसके जवाब का इंतजार भी नहीं किया और बैठ गया।
‘जी साहब, कल मैं ही था। वहीं छोड़ूं ना जहां पर कल छोड़ा था’।
'भइया मेरा घर उसी सोसायटी में ही है तो वहीं छोड़ोगे ना कहीं और क्यों जाऊंगा मैं'।
’नही, नहीं साहब, कहीं सब्जी वगैरा तो नहीं लेने जानी मैं तो ये ही पूछ रहा था। चलिए छोड़ देता हूं यदि बुरा लगा हो तो साहब, ‘सॉरी’।’
ऐसी बात तो थी नहीं कि इसे सॉरी बोलना पड़े। मुझे लगा मैंने बेकार ही इस बेचारे का मन दुखा दिया, उस सवाल का जवाब ‘हां’ में भी तो दिया जा सकता था पर आजकल मैं क्यों जल्दी इरिटेट हो जाता हूं।

मैं पसीने में पूरा तरबतर थ्री व्हीलर में लग रही हवा से काफी राहत महसूस कर रहा था। ओह हो....रेडलाइट भी अभी होनी थी अब जाकर थोड़ी हवा लगने लगी थी पसीना सूखना शुरू हुआ ही था कि ब्रेक लग गया। ऑटो वाले ने ऑटो बंद कर दिया।

सिग्नल ग्रीन होने पर ऑटो वाले ने स्टार्ट किया तो पहली बार में नहीं हुआ, दूसरी बार फिर नहीं हुआ। पीछे से पों...पों...पों....पीं...पीं....पीं...लोगों ने बुरा हाल कर दिया। कुछ कार वाले बगल से निकलते वक्त गाली देते हुए निकले। रेड लाइट पर गाड़ी रुकने की गंभीरता को समझते हुए तुरंत नीचे उतरा और उसके साथ मिलकर धक्का लगाने लगा। कोने में ऑटो को करवा कर उसमें बैठ गया। जितना पसीना सूखा था उससे दोगुना निकल गया। ऑटो भी स्टार्ट हो गया और हमने उसी ग्रीन लाइट को समय रहते पार भी कर लिया।

ऑटो को दोबारा शुरू करने में महज एक मिनट भी नहीं लगा और रेडलाइट ३ मिनट की थी। फिर लोग क्यों हुए इतने बेचैन कि गालियां देते हुए चले गए, हॉर्न पर हॉर्न बजाने लगे। क्या हमारा अंदर संयम खत्म हो चुका है। इसी संयम खत्म होने की वजह से एक्सीडेंट और खून खराबा होता है। घरों में, बीवी के साथ, भाई के साथ, माता-पिता के साथ लड़ाई होती है। इसी संयम ना रखने की वजह से। क्यों हम इतने बेपरवाह हो गए हैं।

मैं घर पहुंच गया और घर पहुंचते-पहुंचते पसीने से मेरी शर्ट सूख चुकी है पर मन गीला-गीला हो रहा है क्योंकि और लोगों की तरह ही मैंने भी तो संयम नहीं बरता था।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, August 5, 2009

आज के दिन का ना खत्म होने वाला इंतजार....--2

...........मेरी चचेरी बहन, पूरे खानदान के नौ भाइयों की इकलौती बहन। इस बार सभी नौ भाइयों की कलाई सूनी.....इस बार नहीं, शायद हर बार।

कितने मजबूर होते हैं हम, कई बार कुछ भी नहीं कर पाते। सिर्फ कठपुतलियों की तरह इधर से उधर होते रहते हैं। हमारे अपने दुख के उस समंदर में पहुंच जाते हैं जहां से उन्हें वापस लेकर आपाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लगता है। क्योंकि अन्तर्मन के पटल पर जब एक बार जख्म बन जाए तो हर हाल में साल दर साल बाद भी निशान बाकी रह जाते हैं।
घर की हालत देखते ही बज्रपात हुआ हम सभी पर। हम में सबसे छोटी, अपने तीन बच्चों के साथ सिर्फ २४ साल की उम्र में वो.....।

याद आता है....मेरे को परिवार वाले बार-बार बोलते रहे कि नौ भाइयों की एक बहन है और हम चाहते हैं कि शादी में सभी लोग मौजूद रहें। मुझे याद नहीं आ रहा कि मैं क्यों नहीं शरीक हो पाया था शादी में। मेरी बहन ने मुझसे बहुत दिनों तक बात नहीं की थी, बहुत दिन या यूं कहें कि कई महीने। फिर धीरे-धीरे समय निकला और फिर मेरा उससे मिलना हुआ और फिर जिंदगी आगे यूं ही बढ़ गई।

दो महीने पहले सुबह-सुबह एक दिन भइया का फोन आया, मैं ऑफिस में था। जैसे कि मैं पहले भी बता चुका हूं कि ऑफिस में मैं ऐसी जगह बैठता हूं वहां पर कोई फोन अटैंड तो कर सकता हैं पर बात नहीं कर सकता। भइया ने मेसिज दिया और मैं अवाक सा फोन पकड़े खड़ा रहा। मैंने तुरंत अपने रिलीवर को फोन लगाया हर समय की तरह उसने फोन नहीं उठाया। मुझे लगा कि वो फोन उठाएगा भी नहीं और ना ही कॉलबैक करेगा पर थैंक्स गॉड उसने कॉलबैक किया। मैंने उसे ख़बर बताई और उसे जल्द से जल्द ऑफिस आने को कहा। वो जैसे बैठा था वैसे ही एक घंटे बाद ऑफिस पहुंच गया, मैं इतना टेंस था कि बिना उसे धन्यवाद कहे वहां से घर के लिए रवाना हो लिया।
वो मुझसे लिपट कर मुझसे पूछती रही कि, भइया तुम्हें तो मेरे घर का पता नहीं मिलता था ना....पर आज कैसे मिल गया....। मैं टूटता जा रहा था मुझे सभी ने खड़ा किया और मैं अपनी बहन से दूर होगया।

मैं तुरंत घर पहुंचा और हम निकल पड़े अपनी बहन की ससुराल। मैं कभी गया तो था नहीं तो काफी दिक्कत हुई पर हम उनके घर पहुंच गए। घर की हालत देखते ही बज्रपात हुआ हम सभी पर। हम में सबसे छोटी, अपने तीन बच्चों के साथ सिर्फ २४ साल की उम्र में वो.....हमारे सामने बिना चूड़ियों, बिना बिंदिया, बिना साजो समान, बिना सुहाग के जमीन पर मोक्ष सी पड़ी हुई थी। मुझे मेरे परिवार में मन का बहुत सख्त माना जाता है पर जैसे ही वो मेरे सामने आई मैं वैसे ही टूट गया और काफी देर से रुका बांध बह निकला।

वो मुझसे लिपट कर, मुझसे पूछती रही कि, भइया तुम्हें तो मेरे घर का पता नहीं मिलता था ना....पर आज कैसे मिल गया....। मैं टूटता जा रहा था मुझे सभी ने खड़ा किया और मैं अपनी बहन से दूर होगया।
सब कहते थे कि कितने दूर हो जाओ, इस एक दिन जरूर बहन से मिलने आओगे पर आज.....शायद तो............।

आपका अपना
नीतीश राज

(कुछ भी जीवन में गलती हुई हो, तो माफ जरूर कर देना। तुम हमेशा ही दिल के करीब रहोगी।)

आज के दिन का ना खत्म होने वाला इंतजार....

जब मैं छोटा था शायद ७-८ साल का, तब से करीब २० साल की उम्र तक मुझे अच्छी तरह से याद है मैं इस त्यौहार पर किसी का इंतजार करता था। घर के दरवाजे पर झूलते हुए, पीछे से मम्मी की डांट, जब तक दरवाजा टूट नहीं जाएगा तब तक यूं ही राह तकता रहोगा। कभी सीढ़ियों पर बैठ कर, कभी खिड़की में दोनों टांगे बाहर लटका कर, कभी धूप में खड़े होकर इंतजार की इंतहा तक सिर्फ और सिर्फ इंतजार। इंतजार एक अदद बहन का।
घर के उस कोने यानी बाथरूम में जाकर खूब देर तक रोता रहता। इस बात से अनभिज्ञ कि हर किसी के भाग्य में बहनें नहीं होती।

आप को लगेगा कि क्या कह रहा हूं मैं पर हां, एक अदद बहन का इंतजार। कुछ लोग तो दूर की रिश्ते की बहन के खत के कारण डाकिये की राह तकते हैं कि देर से ही सही पर समय रहते शायद राखी पहुंच जाए। हम दो भाई, हमारी कोई बहन नहीं आज के दिन हम नासमझ हमेशा इसी इंतजार में कि कोई तो हमारी बहन भगवान ने बनाई ही होगी जो आज के दिन हमारी सूनी कलाइयों में वो धागा बांधेगी और फिर जिसे हम रक्षा का वचन देंगे। पर इंतजार-इंतजार ही रहा। मेरे बड़े भाई शायद जल्द ही इस बात को समझ गए पर मैं इंतजार में ही लगा रहा।

कई बार मेरा, जानने वाले खूब मजाक उड़ाते, कहते कि अपने पापा-मम्मी से कहो तो शायद बहन मिल जाए। तब सब हंसते और मम्मी उनको झेंपते हुए डांटने लग जाती। हमारी समझ में नहीं आता पर मेरी बहन मुझे नहीं मिलती।

मैं आखिर कब तक राह तकता। मैंने खुद बहन बनाना शुरू कर दिया। स्कूल में, पड़ोस में, पापा के जानने वालो की बेटियों को बनाता बहन। पर जब उनके भाई आगए तो उन्होंने मुझे दूध में मक्खी की तरह निकाल दिया। मेरी कलाई फिर सूनी रह जाती। आज के दिन मैं सड़कों पर, रेलवे स्टेशन पर कुछ लड़कियां राखी बांधती और पैसे लेती, मैं इस बात से अनभिज्ञ उनसे राखी बंधवाता और खुश होता कि एक बहन ने राखी बांधी है। पर सच्चाई ने पर्दा उठाया और मैं मायूस घर वापस आ बैठता।
पूरे खानदान के नौ भाइयों की इकलौती बहन। इस बार सभी नौ भाइयों की कलाई सूनी रहेंगी....इस बार नहीं, शायद हर बार।

ये देखकर मम्मी मेरी कलाई में राखी बांधती। मैं खाना नहीं खाया करता था, मम्मी मुझे प्यार से मेरी मनपसंद खीर बनाकर कृष्ण जी को भोग लगाकर, उन्हें राखी बांधकर, फिर मुझे राखी बांधती और खिलाया करती। कुछ वक्त नखरा करता पर बच्चा अपनी मनपसंद चीज के सामने कितनी देर टिकता, फिर खा लेता।

आज के दिन मेरे दोस्त मुझे खेलने के लिए बुलाते तो दूर से उनके हाथों में ढेर सारी राखियां देखकर ही मैं खेलने नहीं जाता। और घर के उस कोने यानी बाथरूम में जाकर खूब देर तक रोता रहता। इस बात से अनभिज्ञ कि हर किसी के भाग्य में बहनें नहीं होती।

इंतजार खत्म हुआ पापा जी का तबादला हमारे पुश्तैनी घर के पास हुआ। तब से पोस्ट के साथ-साथ मेरी चचेरी बहन मुझे राखी बांधती। कभी बुआ या उनकी बच्चियां यानी मेरी बहनें मुझे राखी बांधती। मेरी चचेरी बहन, पूरे खानदान के नौ भाइयों की इकलौती बहन। इस बार सभी नौ भाइयों की कलाई सूनी रहेंगी....इस बार नहीं, शायद हर बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, August 3, 2009

अभी राखी के स्वयंवर का पार्ट २ बाकी है

दर्शक तैयार रहें ड्रामा क्वीन के नाटकों के लिए और साथ ही इलेश परुजनवाला को भी ये नहीं समझना चाहिए कि राखी सावंत उनकी हो गईं क्योंकि फिल्म तो अभी बाकी है मेरे दोस्त...

चौदह हजार लोगों की याचिकाओं में से सिर्फ सोलह लोगों को चुना गया था और उन सोलह लोगों में से भी एक-एक करके सिर्फ तीन लोग बाकी रह गए। करीब दो वीक के फेमिली ड्रामे के बाद राखी के पास अवसर था कि वो किस लड़के को अपना दूल्हा चुनती हैं। राखी के स्वयंवर ने पूरे देश को ठीक रात ९ बजे छोटे पर्द के सामने बैठने पर मजबूर कर दिया। राखी सावंत के स्वयंवर की टीआरपी ने एनडीटीवी इमेजिन को इस समय पर सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर दिया था। अब भी जब कि स्टार प्लस पर सच का सामना और सोनी पर इस जंग से मुझे बचाओ शुरू होने के बाद भी उसकी टीआरपी में ज्यादा फर्क नहीं आया था। सभी न्यूज चैनलों पर भी राखी ही राखी छाई रहीं। दर्शकों से पूछा गया कि कौन होगा राखी का दूल्हा?

हर चैनल पर इसके जवाब में ७०-७५ फीसदी से अधिक लोगों की राय एक थी इलेश परुजनवाला। साथ ही राखी के मुंह बोले भाई रवि किशन का भी ये ही मानना था कि इलेश से बेहतर दूल्हा राखी के लिए तो कोई और नहीं हो सकता। राखी को दुनिया से इतना प्यार इसलिए मिला क्योंकि एक मध्यमवर्गी फैमली से राखी का ताल्लुक। हर लड़की ये चाहती कि वो राखी की तरह बोल्ड बने। राखी ने जब चाहा वो किया, जैसे चाहा वैसे किया, मीडिया को जैसे चाहा वैसे नचाया। याद होगा पिछला वेलेंटाइन डे, पूर्व प्रेमी अभिषेक को राखी ने जड़ा थप्पड़ और उस थप्पड़ की गूंज ने जहां लड़कों में रोष पैदा किया था वहीं लड़कियों ने उसकी बोल्डनेस को सराहया था। पूरे दिन मीडिया में सुर्खियों में बनी रहीं थी राखी। ये राखी सावंत का स्टाइल था। प्रेमी छोड़ा तो डंके की चोट पर अब सगाई की तो वो भी ड़ंके की चोट पर। इसी कारण राखी इतनी लोकप्रिय हुई और लोगों ने उन्हें आईटम गर्ल के साथ-साथ ड्रामा क्वीन कहकर बुलाना शुरू कर दिया।

याद होगा पिछला वेलेंटाइन डे, पूर्व प्रेमी अभिषेक को राखी ने जड़ा थप्पड़ और उस थप्पड़ की गूंज ने जहां लड़कों में रोष पैदा किया था वहीं लड़कियों ने उसकी बोल्डनेस को सराहया था। पूरे दिन मीडिया में सुर्खियों में बनी रहीं थी राखी। ये राखी सावंत का स्टाइल था।

वहीं दूसरी तरफ राखी तीनों दूल्हों के परिवार से मिल कर, बहुत देख-परखने भी चुकी थीं। जैसा सब जानते थे कि मानस कत्याल और क्षितिज जैन दोनों ने राखी से समय मांगा था और दोनों ही उम्र में राखी से छोटे थे। राखी असमंजस में थी कि क्या फैसला ले। वहीं इलेश परुजनवाला एक एनआरआई टोरंटो बेसड बिजनेसमैन था जो हर लिहाज से राखी के लिए उपर्युक्त था पर राखी की टूटी-फूटी अंग्रेजी यहां पर उसकी दुश्मन बन रही थी।

स्वयंवर में राखी बार-बार दूल्हों से, उनके परिवार वोलों से, टीवी देख रहे लोगों से ये कहती रहीं कि ये स्वयंवर असली है। ये कोई रिएलिटी शो नहीं है कि अंत में शादी ना हो। ऋषिकेश के मनमोहन तिवारी की मां के पूछने पर राखी का जवाब ये ही था कि ये असली स्वयंवर है यहां से शादी करके ही मेरी विदाई होगी। पर अब क्या ये दर्शकों को बेवकूफ बनाना नहीं हुआ।

राखी और एनडीटीवी इमेजिन ने शादी से पहले एक गेम खेल दिया। अब तक जो ये कहते आ रहे थे कि राखी जिस लड़के को पसंद करेंगी उसी से शादी भी करेंगी। राखी ने अंत में अपने स्वयंवर में एक टविस्ट के साथ इलेश परुजनवाला को वरमाला डाल दी। पर ये वरमाला स्वयंवर की रस्मों को पूरा करने के लिए भर थी। वहीं इलेश को इस बात के लिए मनाया गया कि पहले शादी नहीं सगाई हो जिससे आप दोनों को एक दूसरे को समझने का मौका मिलेगा।

राखी ने इलेश को चुन तो लिया पर वो विश्वास राखी के अंदर नहीं जग पाया जिसके कारण वो इलेश को अपना जीवनसाथी मान सकें। शो में कुछ रस्मों को पूरा करने के लिए ही सगाई की रस्म की गई और हवाला दिया गया कि भारत में पहले सगाई और फिर शादी होती है। वहीं राखी ने कई बार इलेश को बोलने का पूरा मौका भी नहीं दिया गया और खुद राखी ने इलेश के नाम पर कई बातों को मीडिया और लोगों से कह दिया।

पर ये पहला स्वयंवर होगा जहां पर दुल्हन ने दूल्हा तो चुना पर उससे शादी नहीं की। शायद राखी अभी अपनी टीआरपी समझती हैं साथ ही क्या वो अभी भी अपने पुराने आशिक अभिषेक के लिए मौके खुले रखना चाहती हैं। दर्शक तैयार रहें ड्रामा क्वीन के नाटकों के लिए, राखी के स्वयंवर पार्ट २ के लिए एनडीटीव एमेजिन पर। साथ ही इलेश परुजनवाला को भी ये नहीं समझना चाहिए कि राखी सावंत उनकी हो गईं क्योंकि फिल्म तो अभी बाकी है मेरे दोस्त....।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, July 24, 2009

आखिर आ ही गई अक्ल

१८ जुलाई २००९ को मैंने यूपी में हाल ही में उठे उस बवंडर के बारे में एक पोस्ट ‘ये रेप की राजनीति है यूपी वालों, मायवती की दोगली नीति।’ लिखी थी जिसमें जिक्र किया गया था कि राजनीति का, जो उठी है रेप से। मैंने उस लेख के जरिए कई सवाल खड़े किए थे ‘.....इज्जत की कीमत तो आप २५ हजार दे रही हैं पर उस कीमत को चुकाने के लिए ५ लाख खर्च कर रही हैं। हेलिकॉप्टर से डीआईजी जगह-जगह जाते हैं और खर्च करते हैं करीब ५ लाख सिर्फ फ्यूल में। क्या ये बेहतर नहीं होता कि उस जिले के वरिष्ठ अधिकारी उस पीड़ित परिवार को मुआवजा दे देते……’।

अब सरकार ने ये फैसला किया है कि अब जिस जिले में रेप जैसा कुकर्म होगा तो उस जिले के वरिष्ठ अधिकारी को ही जलील होने के लिए और साथ ही पैसे पहुंचाने के लिए पीड़ित के परिवार वालों के पास जाना होगा। ये फैसला आने वाले दिनों के लिए काफी अच्छा है। क्यों हर बार एक प्रदेश के डीआईजी रैंक के अफसर को अपने ही डिपार्टमेंट के कुछ नाकारा लोगों की नाकामी की कीमत के एवज में अपनी गर्दन झुकानी पड़े। अब जो होगा नाकाम वो ही जाएगा शर्मिंदा होने के लिए। जो भी हुआ अच्छा हुआ अब फिजूलखर्ची तो रुकेगी ही और शायद खुदा ना करे कि कोई रेप का पीड़ित हो पर यदि कोई होता है तो ज्यादा से ज्यादा मुआवजा मिल सके।

कौन कहता है कि ब्लॉग नहीं पढ़े जाते, क्या मालूम हमारी पोस्ट को पढ़कर ही किसी ने ये बात आगे रखी हो। विभाग के अधिकारियों को ज्ञान मिलने के बाद ये फैसला ले लिया गया हो। हो तो कुछ भी सकता है।

आपका अपना
नीतीश राज

ये दो बयान हैं एक मिट्टी के

अब इस बात को ही आगे बढ़ाता हूं, पिछली पोस्ट (मरवा दी आतंकवादियों से अपनी बेटी, चुप क्यों बैठे हो, क्या वो हत्यारे तुम्हारे भाई हैं?) में कई ब्लॉगर भाइयों ने समझा कि मैं पुरानी बातों पर से पर्दा उजागर कर रहा हूं। पर नहीं मैंने बात छेड़ी थी बिल्कुल नई। क्योंकि कुछ दिन पहले ही शोपियां से महज कुछ किलोमीटर दूर एक लड़की को मार दिया गया और परिवार का कहना है कि लड़की को बेमतलब, बिना वजह मारा गया। और मारने वाले हमारे देश के दुश्मन आतंकवादी हैं। पर किसी भी संगठन ने इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई।

वहीं यदि देखें तो शोपियां केस पर ही दो तरह के बयान पढ़ने को मिले हैं। उसी मसले पर मैंने कुछ पढ़ा है वो आपको भी पढ़ाता हूं.....अब उन से ही मैं ये सवाल पूछना चाहता हूं कि अब क्यों चुप हैं ये अलगाववादी। क्या अब उनकी मां-बहन के साथ अन्याय नहीं हुआ।
"......शोपियां के लोगों को सलाम कि भारतीय व्यवस्था से न्याय की आशा उन्होंने नहीं छोड़ी है। शोपियां में आंदोलन चला रही मजलिस-ए-मुशावरत ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मियां अब्दुल कयूम और विधि विशेषज्ञ सैयद तसद्दुक हुसैन सीबीआई जांच चाहते हैं। उनकी मायूसी के नतीजे अच्छे नहीं होंगे। मुशावरत ने चेतावनी भी दे दी है कि इंसाफ के लिए वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक जाएगी। दुनिया के मुस्लिम मुद्दों पर विचार के लिए अमेरिकी प्रशासन की विशेष दूत फारहा पंडित से संपर्क करने की आवाजें उठने लगी हैं।"
वहीं दूसरी तरफ ये भी पढ़ा था....
".....हमारे लिए उससे अधिक चिंताजनक आसिया और नीलोफर केस का अंतरराष्ट्रीयकरण होना चाहिए। किसी भी फौजी तैयारी से हजार गुना ज्यादा असरदार कश्मीरी अवाम का यह यकीन होगा कि भारत का निजाम नाइंसाफी नहीं होने देगी। शोपियां का हादसा एक केस स्टडी है कि हम राष्ट्र राज्य की जड़ों को किस तरह मजबूत करना चाहते हैं। न्याय और अन्याय का अहसास तय करेगा कि रूस के चेचेन्या और चीन के उइगुर सूबे से कश्मीर क्यों और किस तरह भिन्न और भारत का अभिन्न अंग है।"

हैं ना दो अलग-अलग बयान, क्या कहेंगे? ये दोनों बयान कश्मीर से ही निकले हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ एक जैसे ही लोग वहां पर रहते हैं पर हां अभी वहां को काफी सुधार की गुंजाइश बाकी है।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, July 23, 2009

मरवा दी आतंकवादियों से अपनी बेटी, चुप क्यों बैठे हो, क्या वो हत्यारे तुम्हारे भाई हैं?

क्यों मेरे ब्लॉगर भाइयों, देश की सेना पर सवाल उठाने से तो तुम्हारे हांथ नहीं कांपते पर आतंकवादियों के खिलाफ....।


सभी को याद होगी शोपियां की वो घटना जिसने भारत में एक बहस को जन्म दिया था। कई बार ये भारत कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है फिर भी भारत की अवाम और निजाम दोनों पर ये इल्जाम लगता रहा है कि वो उनके साथ अपनों जैसा व्यवहार नहीं करते। राज्य में घुसपैठियों-आतंकवादियों के कारण हमेशा ही सेना अपनी जान दांव पर लगाकर रक्षा करती रहती है। पर जब शोपियां केस हुआ तो इस इल्जाम ने राज्य में सेना के होने पर ही सवालिया निशान लगा दिया। 29 मई को शोपिया में दो युवतियों के साथ रेप फिर हत्या का मामला सामने आया था। पूरा जम्मू-कश्मीर लामबंद हो गया था। अलगाववादियों ने आह्वान किया कि शोपिया चलो। अलगाववादियों के भड़काने पर तब पूरा कश्मीर सड़कों पर उतर आया। सरकार ने भी एक नहीं दो-दो बार जांच और पोस्टमार्टम करवाए। पहला पोस्टमार्टम करने वालीं डॉक्टर से वहां के लोगों और भाइयों ने कुरान पर हाथ रखवाकर पूछा कि क्या रेप हुआ तो वो फूट पड़ीं और बता दिया कि लगता तो है कि १५-१८ लोगों ने रेप किया था। तो देश भर से आवाज़ उठी कि जिन्होंने भी रेप किया है उन्हें सज़ा जरूर मिलनी चाहिए।

फिर एक लड़की शिकार हुई है वहीं श्रीनगर के शोपियां में। पर इस बार ये बर्बरता पुलिस ने नहीं आतंकवादियों ने मचाई है।


अब अलगाववादियों की बारी थी और ४७ दिन तक कश्मीर की सड़कों पर कोहराम मचा रहा। मजलिस-ए-मुशव्वरात ने हड़ताल का आह्वान किया सभी दुकानें और बिजनेस प्रतिष्ठान पर वो ऐसे हावी हो गए जैसे कि वो खुद सरकार हों और जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा।


आप सोच रहे होंगे कि मैं गड़े मुर्दे क्यों उखाड़ रहा हूं? क्योंकि फिर एक लड़की शिकार हुई है वहीं श्रीनगर के शोपियां में। पर इस बार ये बर्बरता पुलिस ने नहीं आतंकवादियों ने मचाई है लेकिन हर बार आवाज़ उठाने वाले अलगाववादी इस पर पूरी तरह से खामोश हैं। करीब तीन-चार दिन पहले तीन आतंकवादी रात में एक लड़की के घर में रुके, फिर खाना खाया और जाते-जाते उस लड़की को खाने का नजराना उसकी मौत के रूप में दे गए वो भी बिना वजह। उन्होंने लड़की को गोलियों से भून दिया। और ये सब हुआ महज शोपियां से दस किलोमीटर की दूरी पर। उस दसवीं की छात्रा के जनाजे में कोई नेता, अलगाववादियों की तरफ से कश्मीरियों का रहनुमा, यहां तक कि गांव के लोग भी शरीक नहीं हुए। ना ही किसी पार्टी ने हड़ताल का आह्वान किया ना ही किसी ने कोई पुकार लगाई ना ही कोई सड़कों पर उतरा। क्योंकि वो तीनों आतंकवादी थे।

उस दसवीं की छात्रा के जनाजे में कोई नेता, अलगाववादियों की तरफ से कश्मीरियों का रहनुमा, यहां तक कि गांव के लोग भी शरीक नहीं हुए।


मैं इधर पुलिस वालों को क्लीन चिट देने नहीं बैठा हूं। मैं यहां पर देश के धोखेबाजों से पूछने बैठा हूं कि एक लड़की की मौत पर बवाल तो वहीं दूसरी की मौत पर सौतेली नीति क्यों? यदि एक मौत की कीमत अलगाव है तो दूसरी मौत की कीमत भी अलगाव होनी चाहिए। क्यों अब वहां के कट्टरपंथी आगे नहीं आ रहे हैं उन लोगों को सजा दिलाने के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठा रहे हैं। क्या वो आतंकी उनके भाई है?


ये वो ही शोपियां है ना जहां पर उन दो मासूमों की मौत के बाद बाद सियासत की आग भी खूब लगी थी। अलगाववादियों ने सेना पर निशाना साधा था, राज्य से बाहर निकालने की बात कही थी। लोगो का जीना मुहाल हो गया था। पर अब क्या हुआ कश्मीर के चाहने वाले, मौकापरस्त कौम कहां है? क्यों आगे आकर इसी सरकार से दर्ख्वास्त करती कि इन आतंकवादियों को निकालो यहां से। पर पहले खुद इन्हें पनाह देना बंद करना होगा। अफसोस, इस घटना पर अब कोई आवाज उठानेवाला भी नहीं है।


क्यों मेरे ब्लॉगर भाइयों, देश की सेना पर सवाल उठाने से तो तुम्हारे हांथ नहीं कांपते पर आतंकवादियों के खिलाफ लिखने पर तुम्हें क्या हो जाता है। जनतंत्र है...जनतंत्र.....जवाब दो


आपका अपना
नीतीश राज

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”