कांग्रेस को एक तरह से पूर्ण बहुमत मिला नहीं कि सभी छोटी पार्टियां लगी हुई हैं कि हमें भी गठबंधन में ले लो। सरकार में रहने का सुख भोगना चाहते हैं अब सभी। जनता ने कांग्रेस को बहुमत के करीब पहुंचा कर ये तो साबित कर दिया है कि अब क्षेत्रिय पार्टियों को काम करना ही पड़ेगा।
इस पूरे चुनाव के दौरान और चुनाव से पहले मायावती के निशाने पर गर कोई था तो पार्टी के रूप में कांग्रेस और शख्स के रूप में राहुल गांधी। कांग्रेस के लिए मायावती का हर रैली में ये कहना था कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश सरकार को पैसा मुहैया नहीं करा रही है, कांग्रेस झूठी पार्टी है और पता नहीं क्या-क्या। चुनाव के दौरान ही मायावती ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा था कि गरीबों के घर में सो जाने से कोई गरीबों के दर्द को नहीं समझ सकता और राहुल के गांवों के हर दौरे पर मायावती के निशाने पर ही राहुल गांधी होते थे। आज एक रैली में माया पलट गईं और कहने लगीं कि बिना शर्त के वो समर्थन देने को तैयार हैं क्योंकि मनमोहन सिहं ने उन्हें छोटी बहन कहा था। छोटी बहन तो संजय दत्त ने भी कहा था तो क्या उस पार्टी के साथ चलना चाहेंगी आप? नहीं। जवाब सभी जानते हैं।
आखिरकार मायावती को एकदम से हुआ क्या जो कांग्रेस की इतनी बुराई करती थी वो एकदम से कैसे सरकार के साथ चलने लगी है। जो वो कांग्रेस के पीछे हाथ धोकर पड़ गई कि सरकार में हमें भी ले लो प्लीज।
इस सब के पीछे एक बहुत बड़ी चाल है मायावती की। मायावती अब उत्तर प्रदेश से एसपी को खत्म करना चाहती हैं। इसलिए वो सरकार का हिस्सा बनना चाहती हैं क्योंकि यदि देखें तो राज्य में तो खुद माया काबिज हैं पर यदि केंद्र में भी हिस्सेदारी हो जाएगी तो अमर-मुलायम से वो पिछले सारे हिसाब बराबर कर सकेंगी।
लखनऊ में मायावती ने किया क्या है? एक अपनी महत्वाकांक्षी योजना में करोड़ों रु लगाए जा रही हैं। दूसरी तरफ मुलायम सरकार में बना लोहिया पार्क आज पानी को तरस रहा है। उस पार्क में कोई पानी भी देने वाला भी नहीं है। अरे अपनी लड़ाई में एक दूसरे का सर फोड़ो जो करना है करो पर जनता का तो भला रहने दो। पूरे शहर को नीला ही नीला कर दिया पोस्टरों से अखिलेश दास गुप्ता के पोस्तरों से। हर जगह नीली लाइट क्या है ये। विकास के नाम पर क्या किया?????
वहीं यदि देखें तो बार-बार दुत्कार दिए जाने के बाद भी अमर सिंह राष्ट्रपति को समर्थन पत्र देने अकेले ही पहुंच गए। अरे तुम समर्थन नहीं चाहोगे तो भी हमें तो आता ही है समर्थन देना। भई, यदि सरकार को बाहर से समर्थन देंगे तो भी तो सरकार के साथ तो रहेंगे ही कोई इतनी आसानी से हाथ तो नहीं डाल पाएगा। गर कोई डालने की हिम्मत करेगा तो जिस चीज में हम माहिर हैं हम वो करेंगे। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मम्मी... मम्मी चिल्लाने लगेंगे अपने बचाव में। मम्मी कुछ तो ध्यान देंगी ही। यदि सरकार में शामिल नहीं होंगे तो मायावती जरूर से जेल में डलवाकर चक्की पिसवाएंगी। तो ये तो एसपी की मजबूरी है कि उसे हर हाल में, कैसे भी सरकार में शामिल होना होगा। पहलवानी के जोश में पूर्व पहलवान मुलायम सिंह ने लगता है कि कुछ काम ऐसे कर रखे हैं जो कि भविष्य में उनकी सेहत के लिए सही नहीं है।
वहीं कुछ ऐसे भी दल हैं जो कि लड़े तो एनडीए के साथ और अब सरकार में शामिल होने के लिए यूपीए गठबंधन में रास्ते खोज रहे हैं। हर बार पलटू राजनीति में माहिर अजित सिंह ये ही कर रहे हैं। जिगरा तो नीतीश कुमार के जैसा होना चाहिए था जो एनडीए के साथ चुनाव तो नहीं लड़े पर जब से उनके साथ आए तो उनके साथ ही हैं। बशर्ते कि नीतीश कुमार ने बिहार में बहुत काम किया पर इस मसले पर जनता का उल्लू खींचा।
सारी दुनिया कह रही थी कि तीन देवियां सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी। पर एक देवी के सामने सभी देवियां फीकी पड़ गईं। ये राजनीति है कुछ भी करा सकती है। वैसे कांग्रेस को नकारों की फौज खड़ी करने से बचना चाहिए। साथ ही इन सभी को सबक भी सिखाना चाहिए चाहे वो लालू-मुलायम-पासवान ही क्यों ना हों।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
Showing posts with label मुलायम. Show all posts
Showing posts with label मुलायम. Show all posts
Tuesday, May 19, 2009
Wednesday, February 25, 2009
सियासत-राजनीति का मिश्रण है नवाबों का शहर 'लखनऊ'
नवाबों के शहर में नवाबी तो लगता है रह नहीं गई है, जो रह गया लगता है वो है राजनीति। एक शहर था पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ जहां पर एक भी पोस्टर नहीं था और यहां, उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में कौन सा कोना बाकि रह गया जहां पर पोस्टर ना चस्पा हों, वो भी सत्तारूढ़ पार्टी का। एक महानुभाव हैं जो कि कांग्रेस से बीएसपी में चले गए हैं यानी कि दलबदलू हैं। उन्होंने पूरे शहर को अपने पोस्टरों से भऱ दिया है, लंबा-चौड़ा नीला पोस्टर। कई जगह तो ये पोस्टर महज़ ३०-४० फुट की दूरी पर भी लगे हुए दिखे। मेरा दिल तो ये कर रहा था कि इस एतिहासिक शहर की खूबसूरती पर प्रहार करने वाले इस नेता को कोई वोट करने वाला ही ना मिले।
बहरहाल, सहयोगी की शादी में लखनऊ जाना हुआ। हम चार एक साथ दिल्ली से कानपुर, ट्रेन से और फिर कानपुर से वाया रोड लखनऊ पहुंचे। वैसे तो तीन-चार साल पहले कानपुर जाना हुआ था। तब तो नहीं पर इस बार शहर कुछ छोटा और कुछ भिचा-भिचा याने की कंजस्टेड सा लगा। साथ ही पता नहीं यहां के लोगों को क्या बीमारी है कि हॉर्न बजाते रहते हैं वो भी बेमतलब, जानते हैं कि आगे वाला साइड अभी नहीं दे सकता फिर भी। वहां पर देखने से लगा कि दिल्ली, ट्रेफिक के मामले में बेहतर है। वैसे तो लखनऊ में भी ट्रेफिक दिखा पर ज्यादा घिचपिच नहीं दिखी, फिर भी कानपुर से हाल बेकार, शायद ही १० फीसदी लोगों को ये पता होगा कि गाड़ी कैसे चलाते हैं।
पूरे १० घंटे लगातार सफर के बाद लखनऊ के चारबाग के अंबर होटल पर जाकर हमारा कारवां रुका। बाहर से देखने पर लग रहा था कि होटल बड़ा ही शानदार होगा पर अंदर मामला कुछ और ही था। हमें दो कमरे मिले थे जिसमें से एक तो ठीक था और दूसरा पहले कमरे की पूरी कसर निकाल रहा था। इस होटल की सबसे अच्छी चीज ये लगी कि चाय दिल को छू लेने वाली मिल रही थी और एक बार नहीं हर बार वैसा ही स्वाद। यारों ने कहा कि होटल का कूक अच्छा है। थके हारे को क्या चाहिए एक गरमा गर्म शानदार चाय, थकान उतर गई।
तीन-चार घंटे आराम और कमरे में मस्ती करने के बाद हम सज-धज के निकले बारात के लिए। बारात घर से जब बारात चली तो लगा कि शायद ये ५०-६० मीटर जाने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा और हुआ भी कुछ यूं ही। नवाबों के शहर में दूल्हा भी नवाबों की तरह ही सजा था हाथ में तलवार, सर पे हाथ से बंधी रसूख वाली पगड़ी। नाच-गाने के बाद दूल्हे को दरवाजे के पास ही रोक कर पूजा कराई गई। और फिर मंच, लोगों के साथ फोटो खिंचवाना, दुल्हन का आना, साथ में सहेली, फिर वर माला, खाना-पीना, शादी खत्म, थैंक्यू बाय बाय। अगले दिन दोपहर तक होटल को बाय बाय। दोस्त के घर जाकर पेट पूजा। अब घूमने के लिए तैयार टोली। पर ये क्या जहां पर जा रहे हैं वहीं पर रास्ता बंद है। दोस्त से पूछा कि माजरा क्या है? आजमगढ़ से दो ट्रेन में भरकर लोग आए हैं, वो ही बाटला एनकाउंटर और आजमगढ़ से एक शख्स की गिरफ्तारी का विरोध। तो अब क्या, चलो दूसरे रास्ते से ट्राई करते हैं। पर सारा जमघट तो उसी जगह पर लगा हुआ है जहां पर हमें जाना है- बड़ा इमाम बाड़ा और भूल भुलैया। पर अफसोस दूसरा रास्ता भी बंद, भीड़ ही भीड़, जाम ही जाम, गाड़ी ही गाड़ी। सबने एक सुर में कहा यहां से निकालों कहीं और चलो। हजरतगंज का रुख किया गया। लखनऊ का सीपी, चंडीगढ़ का सेक्टर १७। दिल्ली में सबसे ज्यादा जहां पर घूमते हैं, अफसोस कि नवाबों के शहर में भी वहीं पर जाकर बैठना, घूमना पड़ा, यानी मॉल में। एक रेस्त्रां में जाकर ४०० रु. की कॉफी पी गए। वहां पर २-३ घंटे बैठे ऑफिस की बातों पर सर मारते रहे एक दूसरे से। जिस जगह से भाग कर गए थे उसी जगह की बातों पर बातें करते रहे।
मायावती जहां पर १० हजार करोड़ रु. खर्च कर रहीं हैं उस जगह पर भी गए लेकिन वहां पर काम चल रहा था, अंदर तो जा नहीं सके बाहर से ही देखना पड़ा कि ये पत्थर का पहाड़ आखिर है क्या? इतना पैसा यूपी के विकास, भविष्य पर लगता तो शायद लोगों का भला हो जाता। आगे कभी मुलायम की सरकार आएगी तो जैसे मुलायम के बनवाए राम मनोहर लोहिया पार्क में आज कोई पानी देने वाला नहीं है वैसे ही इसकी दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए जाएंगे। राजनीतिक विद्वेष के कारण और खासकर कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई के चलते नुकसान जनता झेलती हैं।
आखिर, लखनऊ से चलने का वक्त हो गया। चलते-चलते भोजन और किसी परिचित से मिलने के लिए हम प्रेस क्लब पहुंचे। कहां चंडीगढ़ का प्रेस क्लब और कहां यूपी का? पर खाने के मामले में वाह भई वाह! लाजवाब। कुछ देख सके या नहीं पर आदमी का दिल जीतना है तो उसका रास्ता पेट से होकर जाता है और वाकई खाने ने हमारा दिल जीत लिया और इसी कारण लखनऊ ने भी। चौक में ठंडाई हो या फिर १० रंग के गोलगप्पे या फिर मियां जी की बिरयानी जिसकी महक चौराहे के पार बनी पुलिस चौकी तक पहुंच जाती है और टुंडे के कवाब। सच खाने में तो लखनऊ का जवाब नहीं।
ट्रेन में यही सोचता रहा कि यदि ये जाम-भीड़ नहीं होता तो शायद ये दिन हमारी जिंदगी के लिए काफी खुशनुमा होता।
#### शादी की शान और आजमगढ़ की खट्टास अगली बार।
आपका अपना
नीतीश राज
बहरहाल, सहयोगी की शादी में लखनऊ जाना हुआ। हम चार एक साथ दिल्ली से कानपुर, ट्रेन से और फिर कानपुर से वाया रोड लखनऊ पहुंचे। वैसे तो तीन-चार साल पहले कानपुर जाना हुआ था। तब तो नहीं पर इस बार शहर कुछ छोटा और कुछ भिचा-भिचा याने की कंजस्टेड सा लगा। साथ ही पता नहीं यहां के लोगों को क्या बीमारी है कि हॉर्न बजाते रहते हैं वो भी बेमतलब, जानते हैं कि आगे वाला साइड अभी नहीं दे सकता फिर भी। वहां पर देखने से लगा कि दिल्ली, ट्रेफिक के मामले में बेहतर है। वैसे तो लखनऊ में भी ट्रेफिक दिखा पर ज्यादा घिचपिच नहीं दिखी, फिर भी कानपुर से हाल बेकार, शायद ही १० फीसदी लोगों को ये पता होगा कि गाड़ी कैसे चलाते हैं।
पूरे १० घंटे लगातार सफर के बाद लखनऊ के चारबाग के अंबर होटल पर जाकर हमारा कारवां रुका। बाहर से देखने पर लग रहा था कि होटल बड़ा ही शानदार होगा पर अंदर मामला कुछ और ही था। हमें दो कमरे मिले थे जिसमें से एक तो ठीक था और दूसरा पहले कमरे की पूरी कसर निकाल रहा था। इस होटल की सबसे अच्छी चीज ये लगी कि चाय दिल को छू लेने वाली मिल रही थी और एक बार नहीं हर बार वैसा ही स्वाद। यारों ने कहा कि होटल का कूक अच्छा है। थके हारे को क्या चाहिए एक गरमा गर्म शानदार चाय, थकान उतर गई।
तीन-चार घंटे आराम और कमरे में मस्ती करने के बाद हम सज-धज के निकले बारात के लिए। बारात घर से जब बारात चली तो लगा कि शायद ये ५०-६० मीटर जाने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा और हुआ भी कुछ यूं ही। नवाबों के शहर में दूल्हा भी नवाबों की तरह ही सजा था हाथ में तलवार, सर पे हाथ से बंधी रसूख वाली पगड़ी। नाच-गाने के बाद दूल्हे को दरवाजे के पास ही रोक कर पूजा कराई गई। और फिर मंच, लोगों के साथ फोटो खिंचवाना, दुल्हन का आना, साथ में सहेली, फिर वर माला, खाना-पीना, शादी खत्म, थैंक्यू बाय बाय। अगले दिन दोपहर तक होटल को बाय बाय। दोस्त के घर जाकर पेट पूजा। अब घूमने के लिए तैयार टोली। पर ये क्या जहां पर जा रहे हैं वहीं पर रास्ता बंद है। दोस्त से पूछा कि माजरा क्या है? आजमगढ़ से दो ट्रेन में भरकर लोग आए हैं, वो ही बाटला एनकाउंटर और आजमगढ़ से एक शख्स की गिरफ्तारी का विरोध। तो अब क्या, चलो दूसरे रास्ते से ट्राई करते हैं। पर सारा जमघट तो उसी जगह पर लगा हुआ है जहां पर हमें जाना है- बड़ा इमाम बाड़ा और भूल भुलैया। पर अफसोस दूसरा रास्ता भी बंद, भीड़ ही भीड़, जाम ही जाम, गाड़ी ही गाड़ी। सबने एक सुर में कहा यहां से निकालों कहीं और चलो। हजरतगंज का रुख किया गया। लखनऊ का सीपी, चंडीगढ़ का सेक्टर १७। दिल्ली में सबसे ज्यादा जहां पर घूमते हैं, अफसोस कि नवाबों के शहर में भी वहीं पर जाकर बैठना, घूमना पड़ा, यानी मॉल में। एक रेस्त्रां में जाकर ४०० रु. की कॉफी पी गए। वहां पर २-३ घंटे बैठे ऑफिस की बातों पर सर मारते रहे एक दूसरे से। जिस जगह से भाग कर गए थे उसी जगह की बातों पर बातें करते रहे।
मायावती जहां पर १० हजार करोड़ रु. खर्च कर रहीं हैं उस जगह पर भी गए लेकिन वहां पर काम चल रहा था, अंदर तो जा नहीं सके बाहर से ही देखना पड़ा कि ये पत्थर का पहाड़ आखिर है क्या? इतना पैसा यूपी के विकास, भविष्य पर लगता तो शायद लोगों का भला हो जाता। आगे कभी मुलायम की सरकार आएगी तो जैसे मुलायम के बनवाए राम मनोहर लोहिया पार्क में आज कोई पानी देने वाला नहीं है वैसे ही इसकी दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए जाएंगे। राजनीतिक विद्वेष के कारण और खासकर कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई के चलते नुकसान जनता झेलती हैं।
आखिर, लखनऊ से चलने का वक्त हो गया। चलते-चलते भोजन और किसी परिचित से मिलने के लिए हम प्रेस क्लब पहुंचे। कहां चंडीगढ़ का प्रेस क्लब और कहां यूपी का? पर खाने के मामले में वाह भई वाह! लाजवाब। कुछ देख सके या नहीं पर आदमी का दिल जीतना है तो उसका रास्ता पेट से होकर जाता है और वाकई खाने ने हमारा दिल जीत लिया और इसी कारण लखनऊ ने भी। चौक में ठंडाई हो या फिर १० रंग के गोलगप्पे या फिर मियां जी की बिरयानी जिसकी महक चौराहे के पार बनी पुलिस चौकी तक पहुंच जाती है और टुंडे के कवाब। सच खाने में तो लखनऊ का जवाब नहीं।
ट्रेन में यही सोचता रहा कि यदि ये जाम-भीड़ नहीं होता तो शायद ये दिन हमारी जिंदगी के लिए काफी खुशनुमा होता।
#### शादी की शान और आजमगढ़ की खट्टास अगली बार।
आपका अपना
नीतीश राज
Subscribe to:
Posts (Atom)
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”