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Friday, March 13, 2009

अपनों के दर्द में फंसा कोई अपना

बोलने के लिए बोलना और उस बोलने से ना जाने कितनों के दिल को दुखाना, पर फिर भी बोलना। वैसे ही जैसे कि कुछ भी लिखने के लिए बस लिख देना या फिर किसी बात की गहराइयों तक बिना पहुंचे, बात को सामने रख देना उस बात को एक नाम दे देना। क्या और कितना उचित है? कई बार हम, ना जाने कुछ ऐसा कर देते हैं जो कि सामने से हमसे उतना सरोकार ना रखती हों, पर कहीं दूर बैठे लोगों के लिए वो ‘कुछ ऐसा’ ज़िंदगी और मौत की लड़ाई बन जाता है। अपनी आन और शान को जिंदा रखने के लिए वो ना मालूम कितनों की जान ले भी सकते हैं और वक्त पड़ने पर दे भी सकते हैं। वो बातें जो बिना दूर की सोच-समझ के साथ लिखी गई हों वो बातें अप्रत्यक्ष रूप से कभी हम से और कहीं दूर बैठे लोगों से सरोकार जरूर रखती हैं।
हाल ही में मेरे सामने कुछ ऐसी ही बातें सामने आगईं। ऐसा नहीं था कि कभी मैंने या मेरे सहयोगियों ने किसी धर्म, मजहब, या फिर किसी समूह पर निशाना साधकर कुछ लिख दिया हो। पर ऐसा कुछ लिखा गया जिसे हमारी नज़र सही के पैमान से आंक रही थी और वहीं दूसरे की नज़र उसमें गलती बयां कर रही थी। जब तक एहसास को भी एहसास होता तब तक गलती घट चुकी थी और कहीं ना कहीं वो एहसास ही हमें, हमारे कदमों को मंजिल तक की राह दिखा रहे थे।
बाटला एनकाउंटर, हमारी नज़र में सही था पर जो भी बात आपको सही लगे ऐसा नहीं कि दूसरे को भी सही लगे। तो उसी तरह, किसी जगह पर उसे गलत बताया जा रहा था। उस एनकाउंटर में शहीद के नाम को इतना उछाला गया कि उसके बाद लगने लगा कि अब किसी को शहीद होने से पहले सोचना होगा। यहां पर सिर्फ कहने के लिए लोग कह रहे हैं कि वो फर्जी एनकाउंटर था, सिर्फ कहने के लिए, बार-बार कह रहे हैं ‘बेचारों को मार दिया’। कहने के लिए कह दिया कि वो बेचारे थे। पर किसी ने ये नहीं सोचा कि उस मुठभेड़ में कोई शहीद भी हुआ। एक पल में उस की शहादत पर सवालिया निशान लग गया।
‘बर्खुरदार, आप तो वो ही ख़बर दिखाते हो, जो आप लोग दिखाना चाहते हो’।
‘नहीं, हमने वो खबर दिखाई जो सही थी’। ‘जिस दिन एनकाउंटर हुआ उस से एक रोज़ पहले तीन लड़कों को उठाया गया था, कहां गए वो लड़के ‘बेचारों को मार दिया’, बेगुनाहों को मार डाला गया’।
‘आपको सही जानकारी ही नहीं है, आजकल ऐसा नहीं है कि किसी को भी उठाओ और दिखा दो कि मार दिया और कह दो कि होगया एनकाउंटर। पुलिस का जीना दुर्भर कर देता है मीडिया और आयोग। उन तीन लोगों के घरवालों ने हल्ला क्यों नहीं किया कि हमारे बच्चों को उठाया गया? बेकार में लोगों ने बात फैला दी और लोगों ने बिना किसी सोच के बात मान ली’।

अनर्गल आरोपों से लड़के को गुस्सा आ गया था।
‘……नहीं, अब आप पहले मेरी पूरी बात सुनिए, मुझे पूरा कर लेने दीजिए। उन लड़कों के पास से इतने सबूत मिले हैं कि वो उसी वक्त नहीं रखे जा सकते थे जब कि एनकाउंटर हुआ। वो लड़के आज से इस धंधे में नहीं थे वो बहुत पहले से ही इस सब को अंजाम देने में लगे थे। आप के अनुसार तो ये भी होगा कि उस पुलिसवाले को भी पुलिसवालों ने ही मारा। अब आप खुद बताइए कि क्या जरूरत पड़ी थी पुलिसवालों को अपने साथी को मारने की? जवाब नहीं होंगे आप के पास, क्योंकि ये सब मनगढ़ंत है और जो सही था वो सामने आ चुका है, वो गुनहगार थे’।
इस मसले पर और सवाल-जवाब नहीं हो सकते थे, अपने को और फंसाना नहीं चाहते थे वो बुर्जुग, सो बात तो पलटनी ही थी। आखिरकार सच्चाई तो नौजवान पत्रकार के साथ ही थी। पर अब फंसने की बारी नौजवान पत्रकार की थी जो कि खाना खाते हुए सवाल-जवाब में फंसा हुआ था।
‘हूं, चलो छोड़ो इस बात को, लेकिन तुम लोगों ने तो नर्सरी तक कह दिया था! आतंक की नर्सरी, आजमगढ़’।
मुझे एक ब्रेक लगा और मेरा खाना खाना रुक गया। मैंने चेहरा उठाया तो उसी शांत चेहरे के साथ वो बुजुर्ग, उस नौजवान को देख रहे थे, जैसे तौल रहे हों कि अब क्या जवाब दोगे। लेकिन वो नौजवान उसी शांत चेहरे के साथ खाना खाता रहा। अंदर ही अंदर वो नौजवान पत्रकार समझ चुका था कि जो तीर अब छोड़ा गया है वो बेहद पेचीदा है। मुझे याद आ रहा था कि ऑफिस में इस शब्द के ऊपर बहुत बहस हुई थी। पहले लिखने के लिए मना भी किया गया था पर कुछ लोगों ने इस शब्द पर आपत्ती नहीं जाहिर की थी और बाद में ‘वो’ लिखा गया। लिखा दिल्ली में गया था और वहां से बहुत दूर उस शब्द ने अपना क़हर बरपा दिया था। बाद में उस शब्द को हटा दिया गया था।
‘जी हां, लिखा था क्योंकि सारे तार वहीं से जा कर जुड़ रहे थे। ये सिर्फ हम नहीं सब कर रहे थे, पुलिस तक कह रही थी’।
‘पर नाम तो तुम लोगों ने ही रखा था ना, आतंक की नर्सरी, आजमगढ़, तो तुम लोग कुछ भी नाम रख दोगे, ये नहीं सोचोगे कि इसका असर क्या होगा’।

नौजवान ने चुप्पी साध ली।
‘....और तुम क्या पुलिस की बात कर रहे हो उसने तो उठा लिया ना आजमगढ़ से उस लड़के को। क्या वो गुनहगार था? आज भी लखनऊ में उस शब्द की आग की लपटें दिख जाती हैं। आज ही दो ट्रेन भर के आजमगढ़ से लोग आए हैं। कुछ जवाब बनता है सही था उस को गिरफ्तार करना’।
‘नहीं, वो तो गलत था लेकिन हर बार सही हो ऐसा नहीं है, गलती हो ही जाती है’।
‘फिर भी तुम दोगे तो पुलिस और अपने भाइयों का ही साथ, बिरादरी का साथ, पत्रकार बिरादरी का साथ’।

नौजवान बीच खाने से उठ गया। जानता था कि वो इसका जवाब दे नहीं सकता था और उस समय दर्द को छोड़कर कुछ दिखा भी नहीं पाया था, जिसे कुछ ने समझा था और कुछ उसी तरह अनजान बने रहे जिस तरह आज वो बनने की कोशिश कर रहा था। मैंने भी खाना खत्म किया और उठ गया। ना शब्द, ना सवाल, ना जवाब, कुछ भी तो नहीं था हमारे पास। हाथ धोकर सीधे गाड़ी में जाकर बैठ गए और गाड़ी दिल्ली की तरफ दौड़ा दी।
ये संवाद थे एक बाप और बेटे के बीच। ये पहली बार नहीं हैं जब कि खाना आधा छूटा हो ये पहले भी कई बार हो चुका हैं। दिक्कत तो उस पत्रकार के लिए होती है जो कि इस घटना से अपनी ही कौम, अपने ही लोगों का गुनहगार बनकर खड़ा हो जाता है। और उसी काम के लिए तमगा भी पाता है। कभी-कभी एक शब्द से ही दूर-दूर तक उस दर्द का एहसास लंबे समय तक होता है।
इस चुप्पी के बीच मुझे याद आ रहा था ‘एक आतंकवादी का घर’, जिसे मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ‘शम्स ताहिर खान’ ने लिखा था। जिसे मेरे एक ब्लॉगर भाई ने अपने ब्लॉग पर छापा भी था। यदि इजाज़्त मिली तो मैं उसे पेश करूंगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, February 25, 2009

नवाबों के शहर में ठाकुर की शादी की शान

शादी में लखनऊ जाना हुआ था, वो भी सहयोगी की शादी। साथ में उठना-बैठना, खाना-पीना, तो बनता ही है कि उसकी शादी में जाएं। वैसे दिल्ली से ५०० किलोमीटर दूर सिर्फ शादी में शरीक होने जाना अपने में ही बहुत बड़ी बात है। ऑफिस की तरफ से ही १४-१५ साथी शादी में पहुंचे। इतनी दूर शादी में जाना ये बताता है कि जरूर से सहयोगी में कुछ तो बात होगी कि इतने लोग शादी का हिस्सा बने।
ठाकुर विशाल प्रताप सिंह नाम ही बहुत भारी है दूल्हे मियां का। फिर उसी अंदाज में शादी। जैसा नाम वैसा ही अंदाज दिख रहा था शादी का। अधिकतर घर के सदस्यों ने सूट ना पहनकर शेरवानी, कुर्ता पहना हुआ था और सर पर सभी ने पग या यूं कहें कि हाथ से बांधी गई पगड़ी डाली हुई थी। उस पगड़ी के कारण रौब अलग लग रहा था। दूल्हे मियां का भी हाल वो ही था कि पिंक कलर की पग जिसमें की गोल्डन रंग का सामने फर लगा हुआ था जैसे कि जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर पहना करते थे। पिंक शेरवानी गले में मोतियों की माला। मोतियों की ३-४ माला के ऊपर दो-तीन फूलों की माला। वैसे तो अधिकतर जगह ऐसा होता है कि जब भी दूल्हा पूजा पाठ करके उठता है तो उसके गले में जनेऊ भी होता है और सभी मालाओं के ऊपर धर्म में बंधा सूत का वो धागा जो कि शादी के समय पर आपकी रक्षा करता है बुरी ताकतों से। पर मुझे तो लगता है कि जो शादी करता रहता है उसकी रक्षा तो खुद भगवान भी नहीं कर सकते। कुछ दिन बाद तो बेगम के हाथ में बेलन रहेगा, और शरीर दूल्हे का होगा चाहे वो कहीं पर भी लगे। तो रक्षा बुरी ताकतों से नहीं बेगमों से बचाने के लिए जनेऊ की ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। खासकर शुरूआत में तो सब सही चले फिर तो खुदा को भी पता है कि कुछ नहीं हो सकता चलेगी तो गृहमंत्री की ही।
दूल्हे के हाथ में एक भारी भरकम तलवार थी जो कि बाद में पता चला कि पुश्तैनी थी। पता नहीं कितने लोग उस तलवार को लेकर मंडप में जा चुके थे। मुझे तो हाथ में तलवार लिए विशाल काफी जच रहा था। पैरों में चर-चर करने वाली जूती जिसका सिरा आगे से उठा हुआ और मुड़ा रहता है।

जो भी हो सब बहुत ठीक था
पर पता नहीं क्यों फैसला ये हुआ कि दूल्हा घोड़ी पर नहीं चढ़ेगा, गाड़ी से जाएगा। ना तो मुझे समझ आया और ना ही अच्छा भी लगा। बारात लड़की के घर तक या जहां भी मंडप लगा हो आ रही हो और दुनिया दूल्हे को नहीं देख पाए तो लोगों की उत्सुक्ता बढ़ने के बजाए खत्म हो जाती है। आज भी दिल्ली या फिर सभी जगह घोड़ी पर ही दूल्हा चढ़ता है या फिर खुली कार में बंद में तो नहीं। बारात पहुंची और सजावट देखकर हम वाह कहने से पीछे नहीं हटे। बहुत बढ़िया तरह से पूरी जगह को सजा रखा था। मंच, पूजा स्थल, वर माला की जगह, नवविवाहित जोड़े के लिए अलग से स्थान, अच्छा लगा देखकर। कई जगह बल्ब की एक लड़ी से मंच को सजाया गया था जो काफी बेहतर बन चुका था। लेकिन यहां कार से दूल्हा उतरा और वहां उसे पकड़कर बैठा लिया गया वहीं गेट के पास पहले पूजा पाठ। पूजा होती भी बड़ी लंबी है और फिर जाकर लड़का मंच तक पहुंचा। इतनी देर में हम सब ने लॉन में सेब के फ्लेवर का हुक्का पिया।
वरमाला के लिए एक अलग स्थान बनाया गया था जहां पर दूल्हा-दुल्हन को एक चक्र पर खड़े होना है और वो चक्र स्टेज पर बना हुआ था और लगातार घूमता रहेगा। उसकी रफ्तार तेज नहीं होगी पर फिर भी निरंतर तो रहेगा ही।

पहले दूल्हे ने शुरूआत की और फिर दुल्हन लेकिन इस समय मैं स्टेज पर पहुंच कर दूल्हे को उठाने लगा साथ ही सभी साथियों को भी आना था पर कोई ऊपर नहीं आया और सिर्फ मैं अकेला रह गया। साथ ही कैमरामैन एक लाइव फ्रेम कैच नहीं कर रहा था, हर बार रीटेक पर रीटेक ले रहा था और जहां हम लोग काम करते हैं वहां तो रीटेक का मौका अधिकतर होता ही नहीं है। इस कारण उस कैमरामैन को मेरे सहयोगी ने पार्लियामेंट का कैमरामैन के नाम से नवाजा, जहां हलचल कम और फ्रेम ज्यादा मिलते हैं।
इस शान की शादी में खाना भी अलग तरह का था। ब्रज, दिल्ली, पुरानी दिल्ली, लखनवी, मुगलई सब तरह के खाने का लुत्फ ले सकते हैं। बिल्कुल सादा खाना जो कि उबला हुआ था वो भी था। साथ ही खाना खाने के बाद पान। आह! ऐसे पान


कभी नहीं खाया। यहां पर ये बताना जरूरी है कि ऐसा नहीं ऐसे पान कभी नहीं खाया। भई पान तो बहुत खाए पर खिलाने का अंदाज बिल्कुल निराला था। कभी भी इस अंदाज से मैंने पान नहीं खाया ना ही किसी को खिलाते और खाते देखा। मटकते-मटकते पान की गिलौरी बनाना और फिर हाथ को नचाते हुए खुद अपने हाथ से खाने वाले के मुंह में पान का बीड़ा डालना। अधिकतर लोगों ने इस निराले अंदाज का लुत्फ लिया।
सबसे खुशी की बात ये है कि विशाल ने जिसे चाहा उसी से शादी की और वो भी डंके की चोट पर। और उसकी शादी में हम ऑफिस से पहुंचने वाले भी बहुत खुशनसीब थे, क्यों? क्योंकि सब ने शादी उन्हीं से शादी की है जिन्हें उन्होंने चाहा है या फिर शादी करने जा रहे हैं जिन्हें चाह रहे हैं। तो हमारी बिरादरी में शामिल होने का स्वागत है मेरे दोस्त।

आपका अपना
नीतीश राज

####आजमगढ़ पर लिखे एक शब्द से आहत हैं लखनऊ के लोग,उसकी चर्चा अगली बार।

सियासत-राजनीति का मिश्रण है नवाबों का शहर 'लखनऊ'

नवाबों के शहर में नवाबी तो लगता है रह नहीं गई है, जो रह गया लगता है वो है राजनीति। एक शहर था पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ जहां पर एक भी पोस्टर नहीं था और यहां, उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में कौन सा कोना बाकि रह गया जहां पर पोस्टर ना चस्पा हों, वो भी सत्तारूढ़ पार्टी का। एक महानुभाव हैं जो कि कांग्रेस से बीएसपी में चले गए हैं यानी कि दलबदलू हैं। उन्होंने पूरे शहर को अपने पोस्टरों से भऱ दिया है, लंबा-चौड़ा नीला पोस्टर। कई जगह तो ये पोस्टर महज़ ३०-४० फुट की दूरी पर भी लगे हुए दिखे। मेरा दिल तो ये कर रहा था कि इस एतिहासिक शहर की खूबसूरती पर प्रहार करने वाले इस नेता को कोई वोट करने वाला ही ना मिले।
बहरहाल, सहयोगी की शादी में लखनऊ जाना हुआ। हम चार एक साथ दिल्ली से कानपुर, ट्रेन से और फिर कानपुर से वाया रोड लखनऊ पहुंचे। वैसे तो तीन-चार साल पहले कानपुर जाना हुआ था। तब तो नहीं पर इस बार शहर कुछ छोटा और कुछ भिचा-भिचा याने की कंजस्टेड सा लगा। साथ ही पता नहीं यहां के लोगों को क्या बीमारी है कि हॉर्न बजाते रहते हैं वो भी बेमतलब, जानते हैं कि आगे वाला साइड अभी नहीं दे सकता फिर भी। वहां पर देखने से लगा कि दिल्ली, ट्रेफिक के मामले में बेहतर है। वैसे तो लखनऊ में भी ट्रेफिक दिखा पर ज्यादा घिचपिच नहीं दिखी, फिर भी कानपुर से हाल बेकार, शायद ही १० फीसदी लोगों को ये पता होगा कि गाड़ी कैसे चलाते हैं।
पूरे १० घंटे लगातार सफर के बाद लखनऊ के चारबाग के अंबर होटल पर जाकर हमारा कारवां रुका। बाहर से देखने पर लग रहा था कि होटल बड़ा ही शानदार होगा पर अंदर मामला कुछ और ही था। हमें दो कमरे मिले थे जिसमें से एक तो ठीक था और दूसरा पहले कमरे की पूरी कसर निकाल रहा था। इस होटल की सबसे अच्छी चीज ये लगी कि चाय दिल को छू लेने वाली मिल रही थी और एक बार नहीं हर बार वैसा ही स्वाद। यारों ने कहा कि होटल का कूक अच्छा है। थके हारे को क्या चाहिए एक गरमा गर्म शानदार चाय, थकान उतर गई।
तीन-चार घंटे आराम और कमरे में मस्ती करने के बाद हम सज-धज के निकले बारात के लिए। बारात घर से जब बारात चली तो लगा कि शायद ये ५०-६० मीटर जाने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा और हुआ भी कुछ यूं ही। नवाबों के शहर में दूल्हा भी नवाबों की तरह ही सजा था हाथ में तलवार, सर पे हाथ से बंधी रसूख वाली पगड़ी। नाच-गाने के बाद दूल्हे को दरवाजे के पास ही रोक कर पूजा कराई गई। और फिर मंच, लोगों के साथ फोटो खिंचवाना, दुल्हन का आना, साथ में सहेली, फिर वर माला, खाना-पीना, शादी खत्म, थैंक्यू बाय बाय। अगले दिन दोपहर तक होटल को बाय बाय। दोस्त के घर जाकर पेट पूजा। अब घूमने के लिए तैयार टोली। पर ये क्या जहां पर जा रहे हैं वहीं पर रास्ता बंद है। दोस्त से पूछा कि माजरा क्या है? आजमगढ़ से दो ट्रेन में भरकर लोग आए हैं, वो ही बाटला एनकाउंटर और आजमगढ़ से एक शख्स की गिरफ्तारी का विरोध। तो अब क्या, चलो दूसरे रास्ते से ट्राई करते हैं। पर सारा जमघट तो उसी जगह पर लगा हुआ है जहां पर हमें जाना है- बड़ा इमाम बाड़ा और भूल भुलैया। पर अफसोस दूसरा रास्ता भी बंद, भीड़ ही भीड़, जाम ही जाम, गाड़ी ही गाड़ी। सबने एक सुर में कहा यहां से निकालों कहीं और चलो। हजरतगंज का रुख किया गया। लखनऊ का सीपी, चंडीगढ़ का सेक्टर १७। दिल्ली में सबसे ज्यादा जहां पर घूमते हैं, अफसोस कि नवाबों के शहर में भी वहीं पर जाकर बैठना, घूमना पड़ा, यानी मॉल में। एक रेस्त्रां में जाकर ४०० रु. की कॉफी पी गए। वहां पर २-३ घंटे बैठे ऑफिस की बातों पर सर मारते रहे एक दूसरे से। जिस जगह से भाग कर गए थे उसी जगह की बातों पर बातें करते रहे।
मायावती जहां पर १० हजार करोड़ रु. खर्च कर रहीं हैं उस जगह पर भी गए लेकिन वहां पर काम चल रहा था, अंदर तो जा नहीं सके बाहर से ही देखना पड़ा कि ये पत्थर का पहाड़ आखिर है क्या? इतना पैसा यूपी के विकास, भविष्य पर लगता तो शायद लोगों का भला हो जाता। आगे कभी मुलायम की सरकार आएगी तो जैसे मुलायम के बनवाए राम मनोहर लोहिया पार्क में आज कोई पानी देने वाला नहीं है वैसे ही इसकी दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए जाएंगे। राजनीतिक विद्वेष के कारण और खासकर कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई के चलते नुकसान जनता झेलती हैं।
आखिर, लखनऊ से चलने का वक्त हो गया। चलते-चलते भोजन और किसी परिचित से मिलने के लिए हम प्रेस क्लब पहुंचे। कहां चंडीगढ़ का प्रेस क्लब और कहां यूपी का? पर खाने के मामले में वाह भई वाह! लाजवाब। कुछ देख सके या नहीं पर आदमी का दिल जीतना है तो उसका रास्ता पेट से होकर जाता है और वाकई खाने ने हमारा दिल जीत लिया और इसी कारण लखनऊ ने भी। चौक में ठंडाई हो या फिर १० रंग के गोलगप्पे या फिर मियां जी की बिरयानी जिसकी महक चौराहे के पार बनी पुलिस चौकी तक पहुंच जाती है और टुंडे के कवाब। सच खाने में तो लखनऊ का जवाब नहीं।
ट्रेन में यही सोचता रहा कि यदि ये जाम-भीड़ नहीं होता तो शायद ये दिन हमारी जिंदगी के लिए काफी खुशनुमा होता।

#### शादी की शान और आजमगढ़ की खट्टास अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”