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Saturday, May 16, 2009

सारे आंकड़े फास, बीजेपी का सूपड़ा साफ, कांग्रेस के हाथ सरकार

इंतजार की घड़ी खत्म हुई और कांग्रेस इतनी बड़ी जीत के साथ सामने आएगी शायद ही किसी ने सोचा हो। और बीजेपी को ज़ोर का झटका ज़ोर से ही पड़ा। बीजेपी का हाल ये होगा ऐसा भी किसी ने सोचा नहीं होगा। सबसे ज्यादा खराब स्थिति भी गर सोची जा रही थी तो बीजेपी को १३० सीटों से कम कोई नहीं सोच रहा था। बीजेपी के दिग्गज कह रहे थे कि इस बार तो बीजेपी यूपी में अपना परचम फिर से लहराएगी पर ऐसा हो ना सका। इस बार तो बीजेपी सबसे खराब स्थिति के नंबर को भी नहीं पकड़ पा रही। पीएम इन वेटिंग का वेट और बढ़ गया। नहीं चला आडवाणी जी का जादू और शायद अब वो कभी पीएम नहीं बन पाएंगे। आडवाणी जी का सुनहरा सपना टूट गया। आखिरकार ये साबित हो गया कि देश पर नहीं चला लौह पुरूष जादू। गुजरात को छोड़ दें तो मोदी अपनी साख के मुताबिक कहीं पर भी आंकड़े नहीं बटोर पाए। इस बार के चुनाव के नतीजों के बाद यदि ये सोचा जाए कि बीजेपी को फिर से जुगत लगानी होगी अपना नया पीएम इन वेटिंग ढूंढने में। मोदी का गढ़ है गुजरात पर मोदी देश के नेता नहीं हैं, नतीजे तो ये ही कहते हैं।

कांग्रेस के लिए सबसे खराब स्थिति में भी १४० का आंकड़ा छूने की बात कही जा रही थी। यहां तो कांग्रेस २०० के आंकड़े के पार जा पहुंची। यहां पर सिपाहासलार की भूमिका में सोनिया पर जनता ने विश्वास किया। पीएम मनमोहन सिंह के कामों पर जनता ने मोहर लगाई। लोगों ने राहुल गांधी के जज्बे को पहचाना। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अपने नेताओं पर भरोसा किया और जनता को साथ चलने के लिए राजी किया। जब ही तो यूपी में राहुल की मेहनत रंग लाई या यूं कहें देश में उनको पहचान मिली। राहुल के साथ युवा जुड़े और देश को आगे बढ़ाने की राह पर निकल चले। दिल्ली में शीला दीक्षित के काम को लोगों ने ७-० से जीता दिया। दिल्ली और पंजाब में टाइटलर और सज्जन कुमार को हटाना अच्छा रहा। इससे सिखों का वोट मनमोहन सिंह और कांग्रेस को मिला। राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, यूपी, दिल्ली, महाराष्ट्र, केरला, आंध्र प्रदेश सभी जगह कांग्रेस ने बढ़त बनाई।

कांग्रेस ने जो दो-तीन गलती पिछली बार की थी उससे उनको सबक लेना होगा। शिवराज पाटील को हटाना फायदेमंद रहा पर ये ध्यान में रखना होगा कि कहीं फैसले लेने में ज्यादा देर ना हो जाए। नटवर सिंह को विदेश मंत्री के पद से हटाना भी सही फैसला था। पर इस बार थोड़ा सोच-समझकर चलना होगा वर्ना जनता सब जानती है।

तीसरे मोर्चे को काफी नुकसान हुआ सीट और पैसे दोनों मामलों में। अब इनकी दादागीरी नहीं चलेगी। पासवान-लालू लोग खरीद-फरोख्त का धंधा नहीं कर सकेंगे, सौदेबाजी नहीं कर सकेंगे। ये अच्छा हुआ कि नीतीश कुमार के काम को लोगों ने पहचाना और वोट दिया और उनकी पार्टी को जीता दिया। पर नीतीश कुमार को अभी फैसला करना होगा कि वो किस करवट बैठेंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, April 29, 2009

राजनीति, अब लॉन्ग टेनिस का ग्राउंड बन चुकी है।

हम सब लॉन्ग टेनिस के बारे में जानते हैं और कुछ तो इस खेल पर हाथ आजमा भी रहे होंगे। जो इस खेल के बारे में ना जानते हों उन्हें ये बता दूं कि आजकल हमारी राजनीति में कुछ इसी तरह का खेल चल रहा है। इस खेल के बारे में थोड़ा ध्यान से वर्ना समझ नहीं पाएंगे और जब समझ नहीं पाएंगे तो हार आपकी निश्चित है। पहला खिलाड़ी चारों तरफ से घिरे स्टेडियम में ठसा-ठस भीड़ के सामने हाथ में रैकेट लेकर मैदान में खड़ा होता है और दूसरे छोर पर दूसरा खिलाड़ी सामना करने के लिए तैयार। पहला खिलाड़ी गेंद को दूसरे खिलाड़ी के पाले में जान लगाकर फेंक देता है। ऐसा करने पर कई बार पहले वाले खिलाड़ी की आवाज़ हलक से बाहर भी आ जाती है। स्टेडियम में बैठे उस खिलाड़ी के दीवाने जोश में भर जाते हैं। वहीं दूसरा खिलाड़ी भी अपनी पूरी ताकत के साथ गेंद को फिर से पहले वाले के पाले में फेंक देता है। पहला खिलाड़ी और दम लगाता है, दूसरा खिलाड़ी उससे भी ज्यादा दम लगाता है, उनके दीवाने जोश से उछलने लगते हैं। गेंद एक दूसरे के पाले में फेंकने लगते हैं। अब दूसरे खिलाड़ी के दीवाने ज्यादा दम लगाने और दिखाने के चक्कर में हलक की आवाज़ स्टेडियम के बाहर तक चली जाती है। इधर की आवाज़-उधर की आवाज़, इधर का जोश-उधर का जोश। इस जोश से भरी आवाज़ के जोश में कई बार दीवानों के साथ-साथ खिलाड़ी भी होश खो बैठते हैं। कई बार इसी कारण से बाहर वालों को दिक्कत होने लग जाती है और गेम को गेम की तरह खेलने का आग्रह लेकर आसपास-पड़ोस के लोग उन्हें समझाकर चले जाते हैं।

आजकल हमारी राजनीति उस खेल की तरह चल रही है जिसे खासतौर पर भारत में तो एक लड़की के कारण ज्यादा पहचाना जाने लगा। और उसी बाला से बला के गुण सीख कर हमारे नेता उसे मंच पर आजमा रहे हैं।

आजकल हर दिन ये सुनने को मिलता कि किसी नेता ने दूसरे नेता के लिए कुछ कह दिया, थोड़ा सा दम लगाकर। अब गेंद उस दूसरे नेता के पाले में चली गई। उसने थोड़ा ज्यादा दम लगाकर गेंद पर गाली लपेटकर पहले वाले नेता के पाले में फेंक दी। और फिर सिलसिला शुरु होगा। वार पर पलटवार हो गया और फिर उस पलटवार पर भी पलटवार हो गया।

पहले आडवाणी जी ने शुरुआत की तो फिर मनमोहन जी ने भी जवाब दिया। बात कुछ ज्यादा होचली तो आस पास के लोग भी जुड़ गए। सोनिया गांधी फिर राहुल-प्रियंका सब हाथ धोकर पीछे पड़ गए आडवाणी के। आडवाणी जी सकपका गए, बोलने लगे कि क्या मैंने कुछ गलत कहा या बिलो द बेल्ट हिट किया। आडवाणी जी को बचाने के लिए इस बार अटल जी नहीं हैं तो राजनाथ जी जब तक पाला संभालते तब तक मोदी जी कूद पड़े। अब मोदी ने कुछ बोला तो जवाब प्रियंका ने दे दिया। इतने कद्दावर नेता को गेंद सीधे सर पर लगी कि इतनी पिद्दी सी प्रियंका कैसे जवाब दे सकती है। तो फिर गेंद को प्रियंका के पाले में फेंक दिया। इधर राहुल ने जवाब देना शुरु ही किया कि सबने कहा बच्चे की बात हम नहीं सुनते, ये खेल बच्चे नहीं खेलते। प्रियंका जो छोटी थी उसे सबने गंभीरता से लिया। गंभीर प्रियंका ने गंभीरता से जवाब दिया।

लॉन्ग टेनिस का मैच तो शुरु हुआ था और खत्म होगया चाहे वहां पर पांच सेट चले हों। ज्यादा हल्क से आवाज़ निकलने लगे तो आस-पड़ोस वाले समझाकर चले भी गए। पर राजनीति के खेल में गेंद के रूप में गाली, आरोप एक दूसरे पर लगते रहे और बढ़ते भी रहे। जो इन्हें शांत कराने आते वो इनके साथ ही जुड़ते चले गए और लगता नहीं कि इस चुनाव के ख़त्म होने तक ये दौर रुकेगा। सच, ये खेल बच्चों का नहीं है पर बड़ों को ये बात समझते हुए इस खेल को भी बड़ों की तरह ही खेलना चाहिए, ‘छोटों’ की तरह नहीं।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, April 22, 2009

अब बोल दिया सो बोल दिया, अब क्यों डर रहे हो आडवाणी जी। बिलो द बेल्ट तो आपने हिट किया ही था।

अब बोल दिया सो बोल दिया, अब डरना क्यों? ये तो नहीं लग रहा कि कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं बोल दिया। कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे कि चुनाव के समय में इतने नीचे नहीं गिरना चाहिए था। बार-बार पीएम को कमजोर नहीं कहना चाहिए था। अब भई बार-बार किसी को फटकारते रहेंगे तो कभी ना कभी तो दूसरा फट ही पड़ेगा। जब दूसरा फट ही पड़ा है तो अब आप क्यों घबरा रहे हैं। क्यों? हर दिन कभी किसी चैनल पर तो कभी किसी अखबार में पीएम के बारे में आपको सफाई देते सुना जा सकता है।
मैंने तो सिर्फ मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री कहा था। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि मनमोहन सिंह ने पीएम के पद के स्तर को कम किया है। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि वो सारे निर्णय सोनिया गांधी से पूछ कर लेते हैं। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री यदि कोई हुआ है तो वो सिर्फ मनमोहन सिंह हैं। अब आडवाणी जी किसी को आप बार-बार ये सब कहते रहेंगे तो कौन चुप रहेगा। अब जब आपकी पोल पट्टी खुलने लगी तो नाराज़ बैठे हुए हैं और लगे हैं सभी से पूछने कि भई, क्या मैंने बिलो द बेल्ट हिट किया था?
जब आडवाणी जी चुप नहीं हुए और अपनी सभी रैलियों में उनका टेपरिकॉर्डर बजने लगा तो फिर कांग्रेस ने आडवाणी पर चौतरफा हमला करना शुरू कर दिया। अब ढाल के रूप में कोई सामने तो आया नहीं, तो लगे हैं रोने। आपकी एक के बाद एक गलतियां गिनाई जाने लगी तो लगा कि कहां पंगा ले लिया, मेरा गिरेबान तो ज्यादा मैला है। इस देश के हिंदुओं को तो छोड़िए, मुसलमानों के लिए भी जिन्ना किसी विलेन से कम नहीं था। आप पाकिस्तान जाते हैं तो लग जाते हैं उनकी तारीफ के गुणगान करने। तो जब भी इस मुद्दे पर आपको घेरा जाएगा तो संघ आपके साथ नहीं खड़ा होगा। बाबरी मस्जिद विध्वंश में आपकी भूमिका सब जानते हैं पर यहां पर दो धड़े हैं। हिंदु आपके साथ हो सकते हैं पर मुसलमानों के लिए तो आप विलेन ही हैं। तो जब-जब ये वाक्या सामने आएगा आपके वोट बैंक पर असर तो पड़ना ही है। कांधार मामले पर आपने अपना पल्ला झाड़ लिया पर उसमें भी आप फंस गए। उस समय आप गृहमंत्री थे और आपको इस बारे में जानकारी ही नहीं दी गई ये कोई पचा ही नहीं पा रहा है और यदि सच में नहीं दी गई तो आपकी पार्टी ही आप पर विश्वास नहीं करती। तो हर तरफ से आप फंस गए।
बेहतर तो ये है कि आप जब भी दूसरे पर हमला करें तो ये साथ में ध्यान रखें कि आप कितने पानी में हैं। अफजल गुरु के मामले में आप भी कठघरे में आते हैं जिसका जिक्र मैंने अपनी पिछली पोस्ट में किया है। १९९९ से लेकर २००४ तक आपने किसी भी राष्ट्रपति के पास पड़े माफीनामे पर कार्रवाई नहीं की उसके पीछे की वजह ये थी कि पहली बार ही यदि कुछ फैसले ले लेते तो हमेशा किसी वोट बैंक से आपको हाथ धोना पड़ता।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”