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Monday, September 14, 2009

क्यों नहीं 26/11 मुंबई हमले पर पाक मंत्री की ललकार के जवाब में वन-टू-वन करते पी चिदंबरम।


हाल ही में पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक ने इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलेआम भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम को ओपन डिबेट के लिए ललकारा। मुंबई हमलों पर बोलते हुए रहमान मलिक ने साफ तौर पर ये कहा कि 26/11 के मसले पर भारत पाकिस्तान पर दोष मढ़ना बंद करे। सबसे बड़ी बात उसमें ये कही गई कि भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम के साथ वो भारत में कहीं पर भी, पाकिस्तान या फिर किसी भी मुल्क में ये डिबेट कर सकते हैं।

चिदंबरम को चैलेज देने के अलावा भी रहमान मलिक सच से पर्दा उठाते ही रहे। जैसे, भारत ने मुंबई हमलों पर 9 फरवरी को भेजी हमारी दरख्वास्त का जवाब 20 जून को जाकर दिया जो कि बहुत देर से था और जवाब मराठी में भेजा। (कोई भी राष्ट्र किसी को जवाब अपनी क्षेत्रिय भाषा में क्यों देगा, ये इल्जाम कितना सच है ये तो मलिक जी ही बेहतर जानते हैं।) भारत ने चार्जशीट दाखिल करने में 90 दिन से भी ज्यादा का वक्त लिया वहीं हमने महज 76 दिन में इस कवायद को पूरा कर लिया। भारत कभी किसी को मास्टरमाइंड बताता है तो कभी किसी और को। हमने जकीउर रहमान लखवी को गिरफ्तार किया तो भारत हाफिज सईद को मास्टरमाइंड बताने लग गया। (क्योंकि दोनों ही इस साजिश में शामिल थे।) वहीं भारत समझौता एक्सप्रेस मामले पर सबूत साझा नहीं कर रहा जो कि बहुत अहम है। आप हमारे कोर्ट का सम्मान करो और हम आपके कोर्ट का सम्मान तो करते ही हैं। इस पर कितना सच था और कितनी बातों पर सच का पर्दा पड़ा रहा, ये हम सब बेहतर जानते हैं।

ये सारी बातें तब कही गई हैं जब कि भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम अमेरिका दौरे पर थे और अमेरिका को पाक की नियत से रूबरू कर रहे थे। पाक मीडिया ने दोनों खबरों को खूब उछाला और साथ ही भारतीय मीडिया ने भी इन खबरों को दिखाया। फिर क्या वजह है कि इस बारे में पी चिदंबरम की तरफ से या फिर भारत की तरफ से कोई भी जवाब नहीं आया। क्यों?

सबसे ज्यादा बात जो खल रही है कि एक तरफ तो कोई ये कह रहा है कि कहीं भी बात करने के लिए तैयार हैं और हम उस पर प्रतिक्रिया भी नहीं दे रहे। क्यों? कब तक पाकिस्तान गलती करते हुए भी हर बात पर हेकड़ी जमाता रहेगा। गलती करके हमें ही ललकारता रहेगा और हम शांत रहकर उन बातों का जवाब बहुत गहन विचार करके ही देते रहेंगे। कब तक इन मामलों पर भी राजनीति होती रहेगी। क्यों सामने आकर कोई भी इस बारे में जवाब नहीं दे रहा है।
अभी थोड़े दिन पहले ही भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भारत को पाकिस्तानी तालिबान की तरफ से मुंबई हमलों की तर्ज पर हमले की आशंका से आगाह किया था। उस पर रहमान मलिक का जवाब था,
"There was a statement from the PM of India that they knew there might be Bombay-like attacks replicated in India by the Pakistani Taliban. Prime Minister Sir, you are the chief executive, whatever information you have, it must have come from your Intelligence agencies, why didn't you share it with us? Why were you holding this information before the Bombay attacks? Why didn't you tell us? We are two countries we could have investigated it together. I am still ready, let’s meet."

रहमान मलिक की इतनी बातों के बाद कोई भी ये सोचने पर मजबूर हो सकता है कि भारत सिर्फ इल्जाम लगाता रहता है लेकिन कार्रवाई करने से बचता है। इसका मतलब ये हुआ कि भारत गुमराह करने की पॉलिसी अपना रहा है। पर ये पूर्ण सत्य नहीं है।

भारत कैसे अपने इंटैलिजेंस सीक्रेट किसी दूसरे देश और वो भी पाकिस्तान जैसे दुश्मन राष्ट्र के साथ शेयर कर सकता है। कैसे-कैसे करके हमारी इंटैलिजेंस एजेंसी खबरों को इक्ट्ठा करती हैं उस पर यदि भारत ये बात भी शेयर करने लग गया तो शायद जो लोग इस काम में लगे हुए हैं उनकी जान सलामत नहीं रहे। लेकिन हां, भारत ये कर सकता था कि उस तथ्यों के पुलिंदों में से कुछ तथ्यों को पाकिस्तान भेज कर ये साबित जरूर कर सकता था कि हां हमारे पास एविडेंस है, सबूत हैं।

जानते हैं कि पाक उस पर कार्रवाई नहीं करता और गर करता भी तो पहले से ही वहां से आतंकी संगठनों को हटा दिया गया जाता। आतंकवादियों को हटाने या पकड़ने के लिए पाक का एक भी सिपाही मारा नहीं जाता। आर्मी इधर होती है तो बम उधर फटता है। क्या इस के पीछे की नीतियां समझ में नहीं आती?

चीन से मिलकर पाकिस्तान की भारत के ऊपर अपना रुतबा कायम करने की कोशिश असर नहीं दिखा पाएगी। माना कि भारत हथियारों और ताकत के मामले में चीन से पीछे है पर हथियारों कि गुणवत्ता में पीछे नहीं है। भारत के पास लेटेस्ट तकनीक के हथियार हैं और वही चीन के पास हथियारों की तादाद ज्यादा है पर वो बहुत पुराने हैं। भारत का एक हथियार उनके चार के बराबर है। पर ये सत्य है कि कई जगहों पर हम चीन के पासंग भी नहीं है। जहां तक पाकिस्तान की बात की जाए तो भारत उनसे हर क्षेत्र में कहीं ज्यादा आगे है।

ध्यान तो इस बात का रखना है कि भारत में मौजूद गद्दार भारत की जमीन को नुकसान नहीं पहुंचा सकें। साथ ही उन अलगाववादियों को भी ये सोचना चाहिए कि चाहे चीन दागे या फिर पाकिस्तान, गोली, बारूद और बम की आंखें नहीं होती वो दोस्त और दुश्मन में फर्क करना नहीं जानती। यदि भारत की जमीं पर बम फटेगा तो यहां मौजूद दोस्त-दुश्मन सब के शरीर छलनी होंगे। बेहतर है कि भारत को एकजुट रहने दो और खुद भी मिल कर रहो और दुश्मनों का मिलकर मुकाबला करो।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, May 21, 2009

हम तो उसकी फिराक में है जो हमारी फिराक में है।

कुल मिलाकर ३२२ का आंकड़ा हो गया है यूपीए के पास। मनमोहन सिंह ने इतनों का पर्चा तो महामहिम को सौंप दिया है। यूपीए के २७० और ४ निर्दलीय बाकी ४८ सब माया-मुलायम-लालू से। ये तिकड़ी ना चाहते हुए भी साथ है। जैसे कि पिछले लेख में मैंने कहा था कि तीनों कुछ भी कर जाएंगे पर सरकार को समर्थन जरूर देंगे। हुआ भी बिल्कुल वही। क्योंकि तीनों के तीनों बचने की फिराक में हैं। एक शायर हुए थे फिराक। उन्होंने क्या खूब कहा था---

ये ना समझ कि हम तेरी फिराक में हैं,
हम तो उसकी फिराक में हैं जो तेरी फिराक में है।


यहां पर इन लोगों पर ये चंद शब्द कुछ यूं बैठते हैं---

ये ना समझ कि हम तेरी फिराक में हैं,
हम तो उसकी फिराक में है जो हमारी फिराक में है।


ये बचाना चाहते हैं सीबीआई के हंटर से। मतलब साफ है कि तीनों के तीनों ने समर्थन एक डर कि वजह से किया है। आज नहीं तो कल इन पर चार्जशीट तो लगनी ही है। इन तीनों का चालान तो होना ही है। दुनिया को ये दिखाने के लिए रह जाएगा कि कांग्रेस को सरकार बनाने में समर्थन भी किया अब सरकार हमारे ऊपर ही ऊंगली उठा रही है। यूपी में मिली कांग्रेस की बढ़त अब इन से देखी नहीं जा रही है। ये चाहते हैं कि यूपी में आने वाले दिनों में यदि कांग्रेस की तरफ से कोई भूचाल आता है तो अपना बचाव वो यूं कर सकें। राज्य में बीएसपी की सरकार है तो पहले पत्ता मुलायम-अमर का ही कटेगा। लालू तो चुनाव के नतीजों से मरे हुए हैं जब तक संभलेंगे तब तक सीबीआई कोई ना कोई रास्ता निकाल ही लेगी।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है कि उसको राज्यसभा की स्थिति पर गोर भी तो करना ही होगा। अभी तो कांग्रेस को मंत्रिमंडल बंटवारे पर माथापच्ची करनी होगी।

मनमोहन यूपीए के नेता चुने गए, सरकार का दावा ठोंकने गए पर फिर भी बात पूरे समय राहुल की ही होती रही। जहां भी देखो तो चर्चा का केंद्र बिंदु युवराज ही क्यों बने हुए हैं? क्यों? यूपीए की पहली बैठक में जो शुमार हुए। राहुल को अब तो कोई पद संभाल लेना चाहिए या सीधे पीएम का पद ही संभालेंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, May 16, 2009

सारे आंकड़े फास, बीजेपी का सूपड़ा साफ, कांग्रेस के हाथ सरकार

इंतजार की घड़ी खत्म हुई और कांग्रेस इतनी बड़ी जीत के साथ सामने आएगी शायद ही किसी ने सोचा हो। और बीजेपी को ज़ोर का झटका ज़ोर से ही पड़ा। बीजेपी का हाल ये होगा ऐसा भी किसी ने सोचा नहीं होगा। सबसे ज्यादा खराब स्थिति भी गर सोची जा रही थी तो बीजेपी को १३० सीटों से कम कोई नहीं सोच रहा था। बीजेपी के दिग्गज कह रहे थे कि इस बार तो बीजेपी यूपी में अपना परचम फिर से लहराएगी पर ऐसा हो ना सका। इस बार तो बीजेपी सबसे खराब स्थिति के नंबर को भी नहीं पकड़ पा रही। पीएम इन वेटिंग का वेट और बढ़ गया। नहीं चला आडवाणी जी का जादू और शायद अब वो कभी पीएम नहीं बन पाएंगे। आडवाणी जी का सुनहरा सपना टूट गया। आखिरकार ये साबित हो गया कि देश पर नहीं चला लौह पुरूष जादू। गुजरात को छोड़ दें तो मोदी अपनी साख के मुताबिक कहीं पर भी आंकड़े नहीं बटोर पाए। इस बार के चुनाव के नतीजों के बाद यदि ये सोचा जाए कि बीजेपी को फिर से जुगत लगानी होगी अपना नया पीएम इन वेटिंग ढूंढने में। मोदी का गढ़ है गुजरात पर मोदी देश के नेता नहीं हैं, नतीजे तो ये ही कहते हैं।

कांग्रेस के लिए सबसे खराब स्थिति में भी १४० का आंकड़ा छूने की बात कही जा रही थी। यहां तो कांग्रेस २०० के आंकड़े के पार जा पहुंची। यहां पर सिपाहासलार की भूमिका में सोनिया पर जनता ने विश्वास किया। पीएम मनमोहन सिंह के कामों पर जनता ने मोहर लगाई। लोगों ने राहुल गांधी के जज्बे को पहचाना। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अपने नेताओं पर भरोसा किया और जनता को साथ चलने के लिए राजी किया। जब ही तो यूपी में राहुल की मेहनत रंग लाई या यूं कहें देश में उनको पहचान मिली। राहुल के साथ युवा जुड़े और देश को आगे बढ़ाने की राह पर निकल चले। दिल्ली में शीला दीक्षित के काम को लोगों ने ७-० से जीता दिया। दिल्ली और पंजाब में टाइटलर और सज्जन कुमार को हटाना अच्छा रहा। इससे सिखों का वोट मनमोहन सिंह और कांग्रेस को मिला। राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, यूपी, दिल्ली, महाराष्ट्र, केरला, आंध्र प्रदेश सभी जगह कांग्रेस ने बढ़त बनाई।

कांग्रेस ने जो दो-तीन गलती पिछली बार की थी उससे उनको सबक लेना होगा। शिवराज पाटील को हटाना फायदेमंद रहा पर ये ध्यान में रखना होगा कि कहीं फैसले लेने में ज्यादा देर ना हो जाए। नटवर सिंह को विदेश मंत्री के पद से हटाना भी सही फैसला था। पर इस बार थोड़ा सोच-समझकर चलना होगा वर्ना जनता सब जानती है।

तीसरे मोर्चे को काफी नुकसान हुआ सीट और पैसे दोनों मामलों में। अब इनकी दादागीरी नहीं चलेगी। पासवान-लालू लोग खरीद-फरोख्त का धंधा नहीं कर सकेंगे, सौदेबाजी नहीं कर सकेंगे। ये अच्छा हुआ कि नीतीश कुमार के काम को लोगों ने पहचाना और वोट दिया और उनकी पार्टी को जीता दिया। पर नीतीश कुमार को अभी फैसला करना होगा कि वो किस करवट बैठेंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, April 22, 2009

अब बोल दिया सो बोल दिया, अब क्यों डर रहे हो आडवाणी जी। बिलो द बेल्ट तो आपने हिट किया ही था।

अब बोल दिया सो बोल दिया, अब डरना क्यों? ये तो नहीं लग रहा कि कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं बोल दिया। कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे कि चुनाव के समय में इतने नीचे नहीं गिरना चाहिए था। बार-बार पीएम को कमजोर नहीं कहना चाहिए था। अब भई बार-बार किसी को फटकारते रहेंगे तो कभी ना कभी तो दूसरा फट ही पड़ेगा। जब दूसरा फट ही पड़ा है तो अब आप क्यों घबरा रहे हैं। क्यों? हर दिन कभी किसी चैनल पर तो कभी किसी अखबार में पीएम के बारे में आपको सफाई देते सुना जा सकता है।
मैंने तो सिर्फ मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री कहा था। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि मनमोहन सिंह ने पीएम के पद के स्तर को कम किया है। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि वो सारे निर्णय सोनिया गांधी से पूछ कर लेते हैं। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री यदि कोई हुआ है तो वो सिर्फ मनमोहन सिंह हैं। अब आडवाणी जी किसी को आप बार-बार ये सब कहते रहेंगे तो कौन चुप रहेगा। अब जब आपकी पोल पट्टी खुलने लगी तो नाराज़ बैठे हुए हैं और लगे हैं सभी से पूछने कि भई, क्या मैंने बिलो द बेल्ट हिट किया था?
जब आडवाणी जी चुप नहीं हुए और अपनी सभी रैलियों में उनका टेपरिकॉर्डर बजने लगा तो फिर कांग्रेस ने आडवाणी पर चौतरफा हमला करना शुरू कर दिया। अब ढाल के रूप में कोई सामने तो आया नहीं, तो लगे हैं रोने। आपकी एक के बाद एक गलतियां गिनाई जाने लगी तो लगा कि कहां पंगा ले लिया, मेरा गिरेबान तो ज्यादा मैला है। इस देश के हिंदुओं को तो छोड़िए, मुसलमानों के लिए भी जिन्ना किसी विलेन से कम नहीं था। आप पाकिस्तान जाते हैं तो लग जाते हैं उनकी तारीफ के गुणगान करने। तो जब भी इस मुद्दे पर आपको घेरा जाएगा तो संघ आपके साथ नहीं खड़ा होगा। बाबरी मस्जिद विध्वंश में आपकी भूमिका सब जानते हैं पर यहां पर दो धड़े हैं। हिंदु आपके साथ हो सकते हैं पर मुसलमानों के लिए तो आप विलेन ही हैं। तो जब-जब ये वाक्या सामने आएगा आपके वोट बैंक पर असर तो पड़ना ही है। कांधार मामले पर आपने अपना पल्ला झाड़ लिया पर उसमें भी आप फंस गए। उस समय आप गृहमंत्री थे और आपको इस बारे में जानकारी ही नहीं दी गई ये कोई पचा ही नहीं पा रहा है और यदि सच में नहीं दी गई तो आपकी पार्टी ही आप पर विश्वास नहीं करती। तो हर तरफ से आप फंस गए।
बेहतर तो ये है कि आप जब भी दूसरे पर हमला करें तो ये साथ में ध्यान रखें कि आप कितने पानी में हैं। अफजल गुरु के मामले में आप भी कठघरे में आते हैं जिसका जिक्र मैंने अपनी पिछली पोस्ट में किया है। १९९९ से लेकर २००४ तक आपने किसी भी राष्ट्रपति के पास पड़े माफीनामे पर कार्रवाई नहीं की उसके पीछे की वजह ये थी कि पहली बार ही यदि कुछ फैसले ले लेते तो हमेशा किसी वोट बैंक से आपको हाथ धोना पड़ता।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, October 4, 2008

‘प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री अब तो जागो या आदत पड़ चुकी है फरियाद पर ही जागोगे’

क्या आपको पता है पीएम मनमोहन सिंह साहब और रक्षा मंत्री ए के एंटनी, की परिवार का कोई सदस्य यदि बंधक हो तो परिवार वालों पर क्या बीतती है। 19 दिन के बाद भी परिवार वालों की सुध लेने वाला सरकार की तरफ से कोई नहीं है। सिर्फ और सिर्फ आश्वासनों का दौर चल रहा है। हम अभी कार्रवाई कर रहे हैं, जल्द ही नतीजा आपके सामने होगा। अरे, क्या कार्रवाई कर रहे हैं, कब तक होगी कार्रवाई क्या आप बता सकते हैं। एक्शन लेने तक से तो आप डरते हैं। दूसरे देश अपनी नौसेना भेज रहे हैं। हमारे देश की नौसेना कह रही है कि वो बंधकों को रिहा करवाना चाहती है तो फिर कोई भी निर्णय लेने में हमारे देश की सरकार क्यों घबरा रही है। क्यो पीछे हट रहे हैं हम। अमेरिकी नौसेना वहां पर मौजूद है साथ ही रूस की तरफ से भी मदद दी जा रही है। रूस की नौसेना की टुकड़ी जिसमें कि तकरीबन 200 क्रू मैंबर हैं पहुंचने वाले हैं। यूक्रेन का भी एक जहाज इसी इलाके में बंधक खड़ा हुआ है जिसपर की अमेरिका आंखें गड़ाए बैठा है साथ ही इसमें रूस के लोग भी बंधक बने हुए हैं। जब दो देश की सेना वहां पहुंची हुई है तो फिर आप को क्या चिंता सता रही है। या तो मदद दो या फिर उनसे मदद लो लेकिन यदि अमेरिका या रूस जैसा बनना है तो फिर फैसला तो कुछ कड़ा ही लेना होगा क्योंकि कब तक कोई यूं ही हमारी मदद करता रहेगा। माना कि बंधकों में से आपका कोई भी नहीं है पर क्या जिन्होंने बंधक बनाया है वो आपके जान पहचान के हैं जो कि इतने दिन बाद भी इतनी ढिलाई बरती जा रही है।
15 सितंबर को सोमालिया कोस्ट पर एक व्यापारिक ऑयल टैंकर ‘स्टोल्ट वेलोर(Stolt valor)’ को बंधक बनाया गया था। जहाज पर 22 लोग हैं जिसमें से 18 भारतीय हैं। बाकी बचे 4 विदेशी हैं। हमारी सरकार कोई भी ठोस कदम या यूं कहें कि बल प्रयोग करने के पक्ष में नहीं है। रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया है। हमारी सरकार घटना घट जाने के बाद अपने काम में लग चुकी है यानी कि अब नीति बनाई जा रही इन समुद्री लुटेरों से लड़ने के लिए। वाह ! चलो सांप तो निकल गया अब लाठी मारने का काम दिखावे के लिए तो कर लें।
क्या सोमालिया कोस्ट और यमन क्षेत्र के इन समुद्री लुटेरों के बारे में हम नहीं जानते। इनकी क्या रणनीति होती है क्या हमें नहीं पता। ये जहाज भी उड़ाना या डुबाना जानते हैं। इनका क़हर बरपा हुआ है। जनवरी 2008 से लेकर अब तक 55 जहाजों को अगवा कर चुके हैं जिसमें से 11 जहाज अब भी इनके कब्जे में हैं। इन समुद्री लुटेरों ने इस जहाज को छोड़ने के एवज में 6 करोड़ की मांग की है। कई बार तो इन लुटेरों से बातचीत महीने-महीने चल जाती है, नहीं तो कम से कम 30 दिन का समय तो लगता ही है। तब तक क्या होगा इन 22 लोगों का जो कि अभी तक तो सुरक्षित हैं पर क्या आगे भी रह पाएंगे।
Stolt valor भारतीय जहाज नहीं है, इसका रजिस्ट्रेशन हांगकांग में किया गया और मालिक जापानी है। क्रू पूरा भारतीय है तो सोचना तो भारतीय सरकार को ही होगा।सबसे बड़ी अड़चन जो भारत सरकार के सामने आ रही है शायद वो है कि सोमालिया के क्षेत्र में वो ही देश कार्रवाई कर सकता है जिस देश का झंडा उस बंधक जहाज पर लगा हो और उस पर भारत का झंडा नहीं है। ये प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हाल ही में पारित हुआ था। लेकिन हम हाथ पर हाथ धरे उन २२ लोगों को भगवान भरोसे तो नहीं ही छोड़ सकते।
तब से अब तक 19 दिन बीत चुके हैं। परिवार वाले मारे-मारे फिर रहे हैं। मंत्रियों के दर- दर की ठोकरें खा रहे हैं। कैप्टन पी के गोयल की पत्नी सीमा गोयल और साथ में बंधक परिवार के सदस्य भी हर समय कभी इस न्यूज चैनल तो कभी दूसरे, कि सरकार कैसे तो इनकी आवाज़ सुनें, और देश के लोगों तक उनकी आवाज़ पहुंचे, और तभी सरकार कोई कारगर कदम उठाए। साथ ही सीमा गोयल और बंधकों के परिवार वाले १० जनपथ जाकर राहुल गांधी से भी गुहार लगा चुके हैं और साथ ही साउथ ब्लाक भी फरियाद करके आगए हैं। पर क्या हमारी सरकार को परिवार वालों के फरियाद और गुहार करने के बाद ही फैसले के बारे में सोचना होगा। क्यों सरकार सोती रहती है कि जब कोई फरियादी उन तक आएगा तब जाकर सरकार कोई कदम उठाएगी? ऐसा क्यों?

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, September 4, 2008

एक चिट्ठी से सरकारी गलियारे में हलचल

अगर भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका करार से हट सकता है। इस बात की जानकारी बुश प्रशासन की 9 महीने पुरानी चिट्ठी से हुई है। बुश प्रशासन ने ये चिट्ठी यूएस कांग्रेस को लिखी थी। ये चिट्ठी छपी है अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट में। चिट्ठी में लिखा है कि अगर भारत ने दोबारा परमाणु परिक्षण किया तो अमेरिका करार तोड़ देगा। यदि ऐसा अमेरिका करता है तो फिर भारत के हाथ करार पर इतना आगे बढ़ने के बाद भी खाली ही रहेंगे। ना तो भारत को परमाणु ईंधन मिलेगा और ना ही भारत को परमाणु इंधन को उपयोग करने के लिए तकनीकी मदद।
देश में हलचल तो स्वाभाविक थी। पीएम आवास पर तुरंत कांग्रेस की एक बैठक हुई। और भारत सरकार की तरफ से ये साफ किया गया कि भारत और अमेरिका के बीच हुए परमाणु करार में कोई भी फेरबदल नहीं होगा। परमाणु परीक्षण पर भारत ने खुद ही अपनी तरफ से पाबंदी लगा रखी है। भारत पर इस मामले में कोई भी दबाव नहीं है। भारत अमेरिका के अंदरुनी मामलों में हस्ताक्षेप नहीं करता। पर सवाल उठता है कि यदि इन सब बातों की जानकारी मनमोहन सिंह को थी तो फिर आननफानन में बैठक क्यों बुलाई गई।
क्या इस चिट्ठी में जो भी लिखा है उसकी जानकारी भारत सरकार को थी। मनमोहन सिंह बार-बार ये

कहते रहे है कि इस करार से हमारी स्वतंत्रता पर कोई भी असर नहीं पड़ेगा। इसका मतलब कि भारत के परमाणु कार्यक्रमों पर इस करार का कोई भी असर नहीं पड़ना। जबकि अमेरिकी राजदूत डेविड मलफर्ड का कहना है कि इस चिट्ठी के कंटेंट के बारे में भारत सरकार को पूरी जानकारी है।
यदि ऐसा है तो चिट्ठी में लिखी बातों का असर भारत और अमेरिका के संबंधों पर नहीं पड़ेगा और इस से भारत को घबराने की जरूरत भी नहीं है। बुश प्रशासन या यूं कहें कि अमेरिका को भी इतना आसान नहीं होगा इस करार से पल्ला झाड़ना। खुद अमेरिका इस करार को लेकर इतना आगे आ गया है कि इतनी आसानी से तो वो पीछे हट नहीं सकता।
पर भारत के लिए मुश्किल ये है कि ये चिट्ठी उस वक्त आई है जब कि भारत 45 देशों के न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप याने एनएसजी को परमाणु करार पर राजी कराने में जुटा है। देश में बहुमत मिल जाने से और सरकार बचा लेने से ये साबित नहीं होता कि करार होगया। अभी तो मंजिल बहुत दूर है।

आपका अपना
नीतीश राज

फोटो साभार-गूगल

Wednesday, July 23, 2008

खेल तो हो ही गया...ये ही राजनीति है

पूरे देश की नज़र संसद पर टिकी हुई थी। सब जानना चाहते थे कि क्या सरकार ये मैच जीत जाएगी? पूरे दिन संसद कभी भी ठंडी नहीं हुई, जब भी संसद की गतिविधियां देखने के लिए लोकसभा टीवी का रुख किया तो पाया की संसद में घमासान जारी था। सांसद अपने पुराने काम को सही रूप से अंजाम दे रहे थे जो कि वो काफी समय से करते आरहे थे। एक दूसरे पर आरोप लगाने का सिलसिला। वैसे भी ये कोई नई बात तो नहीं है। संसद पूरे दिन उबलती रही, गर्म रही। क्या ये कभी सोचा गया कि सरकार इस करार पर अपना करार भी दांव पर लगाने को क्यों राजी होगई। ऐसा इस करार में क्या है कि लेफ्ट से चला आ रहा 4-सवा 4 साल का करार एक ही झटके में तोड़ दिया गया। ये जो देश पर चुनावी संकट आया इस के लिए जिम्मेदार क्या ये दो नेता हैं-मनमोहन और प्रकाश करात। सिर्फ इसलिए कि एक की जिद दूसरी पूरी नहीं कर रहा तो गठबंधन तोड़ दिया गया। क्या करार पर आगे बढ़ना और गठबंधन को तोड़ने के पीछे मनमोहन सिंह ही जिम्मेदार हैं। मेरा इशारा किस ओर है ये आप समझ ही रहे होंगे। वहीं दूसरी तरफ चुनाव सर पर खड़े हैं तो केंद्र नहीं चाहता कि आने वाले चुनाव में विपक्ष महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरे। और सरकार के पास अपने को बचाने के लिए कोईं भी हथियार रूपी घटना नहीं हो। इस समय कोई भी सरकार आ जाए तो महंगाई पर लगाम नहीं लगा सकती। देश के दो सबसे काबिल फाइनेंस को समझने वाले शक्स केंद्र के पाले में ही हैं। लेकिन फिर भी केंद्र महंगाई के ऊपर चुनाव कतई नहीं लड़ना चाहती थी। क्योंकि सोनिया और मनमोहन के साथ में कांग्रेसी जानते हैं कि प्याज पर भी सरकार गिर सकती है तो यहां तो हर चीज के दाम सरकार को नीचे उतारने के लिए तैयार बैठे हैं। यदि इस करार के मामले में सरकार गिर भी जाती तो सरकार को फायदा होता और अब बच गई है तो सरकार इस करार को पूरा करके इस मुद्दे को भुनाना चाहेगी आगामी चुनावों में।
लेकिन.....संसद के काले दिन में एक समय ऐसा भी आया जबकि पूरा देश अवाक रह गया। एक ऐसा वाक्या जिसने की लोकतंत्र के मुंह पर कालिख पोत दी। संसद के इतिहास में 22 जुलाई को काला दिन लिखा जा चुका था। बीजेपी के तीन सांसद सदन में नोटों की गड्डियों को लहराते रहे। उन्होंने ये आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष के लोगों ने ये पैसा(1 करोड़) सरकार के पक्ष में वोट करने के लिए दिया हैं। साथ ही, कि ये तो पहली खेंप भर है बाकि के पैसे तो अभी मिलने बाकी हैं। जिसने भी इस प्रकरण को देखा-सुना वो शर्मसार था। ये नहीं पता कि आरोप सच हैं लेकिन सदन की गरिमा पर तो कालिख पुत ही चुकी थी।
इस घटना ने क्रिकेट में मैच फिक्सिंग और साथ ही हॉकी में गिल-प्रभाकरण के प्रकरण की याद ताजा कर दी। तब भी देश अवाक रह गया था। लेकिन इस एपिसोड से देश की गरिमा को ठेस पहुंची है। विदेशी पार्लियामेंट में जूतमपैजार होता है तो पता चलता है कि दूसरे देशों में उस वाक्ये पर किस तरह से थू-थू हो रही होगी।
फिर भी अंत में जब वोटिंग हुई तो खुलकर ये ही सामने आया कि सरकार के पास 253 का आंकड़ा है। सरकार को बधाई देने का सिलसिला शुरू होगया। विपक्ष की संख्या 232 थी। लालकृष्ण आडवाणी का चेहरा उतर चुका था और पीएम के साथ सोनिया खुश नजर आ रहीं थीं। जैसे कि मैंने कल अपने आर्टिकल में लिखा था कि ‘खेल हो चुका है’ बात तो सही निकली कि ‘खेल हो चुका था’ और सरकार बचने की कगार पर थी। लेकिन तब भी 48 सांसदों की पर्चियां आनी बाकी थीं। और कुछ भी हो सकता था यदि 232 में 48 सांसद जुड़ जाते, तो 280 आंकड़ा सरकार को पीछे छोड़ देता और जो लोग खुशियां मना रहे थे वो गम के समंदर में खो जाते लेकिन ऐसा हुआ नहीं और अंतिम में फैसला-275 पक्ष और 256 विपक्ष का स्कोर रहा। और सातवें पीएम बन गए मनमोहन सिंह जिन्होंने विश्वास मत पा लिया। वैसे तो कांग्रेस कभी भी विश्वास मत में फेल नहीं हुई है। लेकिन बीजेपी के 7 सांसदों ने क्रॉस वोटिंग की और कुल मिलाकर 15 सांसद ऐसे रहे जिन्होंने क्रॉस वोटिंग की। बीजेपी के लिए भी ये सोचने की बात है कि दो के बारे में तो वो भी जानती थी कि हां, ये बागी हैं लेकिन उन 5 पर नजर क्यों नहीं पड़ी जो कि बागी बन गए। मेरी मानें तो इसी को कहते हैं खेल। इसी को कहते हैं राजनीति।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, July 22, 2008

नहीं बची तो क्या होगा?


आज मनमोहन सरकार की परीक्षा की घड़ी है। सरकार बचेगी या चली जाएगी? ये सवाल हर एक के दिल में उमड़ रहे हैं। लेकिन फैसले की घड़ी आगई है। आज शाम से बहस शुरू हो जाएगी और फिर वोटिंग और फिर परिणाम भी आ जाएंगे। हमें पता चल चुका होगा कि किसके चेहरे पर हंसी है और किसके चेहरे पर ग़म। लेफ्ट-राइट या यूपीए। सोमनाथ और दागी सांसदों का वोट काफी अहम होगा। यदि सोमनाथ दादा स्पीकर रहते हुए सरकार के विपक्ष में वोट डाल कर सरकार को गिरा देते हैं तो फिर वो इस दुनिया के पहले ऐसे स्पीकर हो जाएंगे जिस के वोट से सरकार गिरेगी। लेकिन सोमनाथ दादा पहले ही मन बना चुके हैं कि वो सरकार के साथ जाएंगे। संसद में कुछ ऐसे सांसद भी होंगे कि जिनके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही होंगी क्योंकि वो जब संसद में दाखिल हुए होंगे तो इस विश्वास के साथ कि हमने इतनों को तो खरीद ही लिया है, तो जीत हमारी तय है। लेकिन तब तक खेल हो चुका होगा। ये हाल किसी भी पक्ष का हो सकता है। क्योंकि कई सांसद मान चुके हैं कि खरीद-फरोख्त का सिलसिला चला है। ये हम भी जानते हैं कि यह पहला अवसर नहीं है कि जब सांसदों पर ये इल्जाम लगे हैं। राष्ट्रपति चाहतीं तो शायद इस खरीद-फरोख्त के धंधे को कम समय के लिए कर सकतीं थीं, यूपीए को बहुमत साबित करने के लिए कम वक्त देकर। बहरहाल, ये तो हम सभी जानते हैं कि यदि मनमोहन एंड ग्रुप जादुई आंकड़े को पा जाते हैं तो सरकार बच जाएगी। लेकिन यदि जादुई आंकड़ा या यूं कहें कि बहुमत साबित नहीं कर पाते हैं तो क्या होगा। फिर राष्ट्रपति क्या फैसला करंगे। 1) राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने के लिए कह सकते है। यदि पीएम मना करते हैं तो सरकार को बर्खास्त (हटाना) कर सकते हैं। लेकिन आज तक ऐसा हुआ नहीं है कि किसी भी पीएम ने विश्वास मत नहीं मिलने के बाद इस्तीफा नहीं दिया हो। 2) थर्ड फ्रेंट सरकार बनाने के लिए आग आ सकती है और बाहर से बीजेपी समर्थन दे सकती है। लेकिन मुलायम का धड़े के बाहर होने के कारण मायावती अंदर तो आगईं है लेकिन बीजेपी किसी भी कीमत में माया का समर्थन नहीं कर सकती। भई, दूध का जला छाज को भी फूंक-फूंक कर पीता है। 3) बीजेपी सरकार बनाने के लिए आगे आ सकती है और यूएनपीए बाहर से समर्थन दे। लेकिन देखने की बात ये होगी कि क्या लेफ्ट बीजेपी को सरकार गिराने के साथ-साथ सरकार बनाने के लिए भी समर्थन दे सकती है। वैसे बीजेपी पहले ही कह चुकी है कि वो चुनाव चाहते हैं। 4) कोई भी सरकार बनाने का दावा नहीं करे और मनमोहन सिंह अगले चुनाव तक केयर टेकर प्रधानमंत्री बन रहेंगे। पीएम की सारी ताकत उनके पास रहेंगी। लेकिन पीएम किसी भी महत्वपूर्ण पॉलिसी से जुड़े निर्णय नहीं ले सकते।
अभी तो कोई भी ये नहीं जानता कि क्या होगा लेकिन संसद अभी गर्म है। संसद में पार्टियां एक दूसरे पर इल्जाम लगा रही हैं सांसदों के खरीद-फरोख्त का। कौन कितने में बिका, कौन कितने में खरीदा गया आज संसद में ये ही सब सवाल रहेंगे और कल अखबारों में।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, July 10, 2008

…ये तो सौदे का खेल है

बहुमत साबित करना है मनमोहन सरकार को। सब जानते हैं कि ये महज आंकड़ों का खेल है। कोई कहता है कि सरकार साबित कर देगी और कोई कहता है कि साबित तो दूर की बात औंधे मुंह गिर जाएगी सरकार। कुछ दिग्गज मानते हैं कि चुनाव बस चंद कदम दूर हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। कांग्रेस, भाजपा और वाम दल पर निशाना साधे हुए है तो वहीं वाम दल के निशाने पर पीएम, प्रणब और समाजवादी पार्टी के हीरो अमर सिंह हैं। वैसे देखा जाए तो अमर सिंह जैसे दिखते हैं शख्सियत भी उनकी वैसी ही है। गोलमोल से हैं किस करवट बैठ जाएं खुद उनके आका मुलायम सिंह को भी नहीं पता। आज कह रहे हैं कि सोनिया-मनमोहन के साथ चलो। यदि कांग्रेस ने एक भी केस खुलवा दिया तो लगेंगे रोने कि सोनिया तो विदेशी महिला है।
लेफ्ट इसलिए रो रहा है कि जी-8 का सम्मेलन अभी क्यों हुआ। हाथ तो खींच लिया लेकिन उस का फायदा लेफ्ट को मिलता दिखाई नहीं दे रहा। पीएम देश में होते तब समर्थन वापस लिया होता तो मसौदे की कॉपी वितरित नहीं हो पाती। आईएईए में जाने से सरकार को लेफ्ट कुछ समय के लिए तो और रोक ही पाती।
जैसे ही लेफ्ट ने हाथ खींचा, कांग्रेस को दर्दनिवारक गोली मिल गई और समाजवादी पार्टी ने समर्थन की चिट्ठी राष्ट्रपति को सौंप दी। लेकिन पेंच तो यहीं हो गया। 272 के जादुई आंकड़े को छूने के लिए यूपीए के पास हैं 224, तो 39 समाजवादी पार्टी के पास हैं। इनको मिलाकर होते हैं 263 तो बाकी बचते हैं 9, सिर्फ 9। लेकिन समाजवादी पार्टी के 8 सांसद अभी वोट दे पाएंगे या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता। इनमें से कुछ बागी हैं तो कुछ जेल में। तो कुल मिलाकर 17 वोट की और जरूरत होगी यूपीए को। लेकिन 272 के जादुई आंकड़े को पाने के लिए ये 17 वोट आएंगे कहां से?
तो अब शुरू होता है खरीद-फरोख्त का सिलसिला। बाते मनवाने और नंबर गिनती को बढ़ाने का काम, वादे देने और वादे मनवाने का सिलसिला। अब सबसे ज्यादा जिस पर निगाह होगी वो हैं अन्य दल। अन्य दल की संख्या है 35। याने की इनके तो वारे-न्यारे होगए। जो भी आंकड़ा आएगा वो इनमें से ही आएगा। इनमें से कुछ ने कहा है कि वो फ्लोर पर जाकर ही पक्ष-विपक्ष की बात पर गौर करेंगे। लेकिन कुछ पार्टी तो सीधे ही मोलभाव पर उतर आई हैं। एक पार्टी ने तो साफ कह दिया कि यदि हमारी मांग पूरी होगी तब ही हम पक्ष में वोट करेंगे नहीं तो हम लेफ्ट के साथ हैं। इसका मतलब ये हो गया कि जिसके पीछे लेफ्ट ने सरकार से हाथ खींचा याने कि परमाणु करार उससे इन पार्टियों को कुछ भी मतलब नहीं। वो तो सिर्फ ये जानते हैं कि इस समय बहती गंगा में हाथ धोना ही बेहतर।
वैसे, इस नंबर गेम में जोड़-तोड़ करके सरकार को अपने नंबर साबित कर पाने में शायद ज्यादा मुश्किल नहीं होगी। लेकिन इस करार से एक ये बात तो साबित हो गई कि राजनीतिक पार्टियां चाहें जो कुछ भी कहें या करें लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो सही और अपनी राह पर चलना ही पसंद करते हैं। पूर्व राष्ट्रपति कलाम जी ने साफ कर दिया कि ये करार देशहित में हैं और कुछ ऐसा ही कहना है कुछ और वैज्ञानिकों का भी। करार के पक्ष में एक कदम सरकार तो आगे बढ़ गई है लेकिन दूसरा कदम है बहुमत साबित करना। क्या मनमोहन सरकार कर पाएगी बहुमत साबित?
आपका अपना,
नीतीश राज

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”