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Monday, July 27, 2009

क्या सारे अखबार के संपादक मर्द हैं जो कि लड़कियों की तस्वीरों को प्राथमिकता देते हैं?

चार दिन की छुट्टी ली थी और बेगम ने चाहा कि क्यों ना आबो हवा बदल ली जाए। पर उन्होंने यहां सोचा और जब तक हम कुछ फैसला ले पाते उससे पहले वहां उनकी मौसी ने उसे कर भी दिया। यानी की वो अपने बच्चों के साथ हमारे यहां पर आबो हवा बदलने के लिए आ पहुंची। उनका बड़ा बेटा थोड़ा दुखी दिखा क्योंकि 12वीं में उसके सिर्फ 88 फीसदी अंक आए थे। ये बात गर्मी की छुट्टियों की है।

मैंने साले साहब को समझाया की ये तो बहुत अच्छे मार्कस हैं फिर क्यों चिंता कर रहे हो। उसके जवाब ने मुझे थोड़ा संतुष्ट किया। वो बोला, जीजाजी, ‘मैं चाहता था कि दिल्ली में मेरा एडमिश्न एक अच्छे कॉलेज में आसानी से हो जाए पर अब लगता है कि मुझे दौड़ भाग करनी होगी। दूसरी बात कि मैंने कुछ कॉम्पटीशन टेस्ट देने हैं उसमें पूरे भारत से बच्चे एग्जाम देते हैं। साथ ही बारहवीं में जिनके मार्कस अच्छे होते हैं उनको प्राथमिक्ता दी जाती है। मेरी चिंता है कि कहीं मैं पीछे ना रह जाऊं’। दिल्ली आने का दूसरा कारण ये भी था कि अखबार और टीवी के माध्यम से कॉलेजों के बारे में पता आसानी से चल जाता है। सुबह से ही पूरे dedication के साथ वो लग जाता। सबसे पहले सारे अखबार अपने पास रख लेता है और देखता कि कौन-कौन से कॉलेज अच्छे हैं वहीं साथ ही कि किन कॉलेजों में फॉर्म भरने चाहिए। सुबह से वो लंबी लाइन, दौड़-धूप, यहां जाना-वहां जाना और फिर शाम को वापसी।

एक दिन वो कई अखबार लेकर मेरे सामने आया, बोला, ये अखबार वाले हमारी फोटो क्यो नहीं छापते? मैंने पूछा कि क्या हुआ तुमने ऐसा क्या कर दिया कि तुम्हारी फोटो छापी जाए। जवाब में उसने कहा कि तो इन लड़कियों ने क्या कर दिया है जो हर पेपर में लड़के छोड़ लड़कियों के फोटो छपते हैं। हम लोग सुबह से शाम तक लाइन में नहीं लग रहते हैं, क्या हमारे लिए कॉलेज जाने का ये पहला मौका नहीं है? हेडिंग है कॉलेज जाने की तैयारी, तो दिखादी उछलती लड़कियां, कॉलेजों में लंबी लाइन तो दिखा दी 4-5 लड़कियां, आज कॉलेजों में भरे गए लाखों फॉर्म तो 2-3 लड़कियां बैठी हुई फॉर्म भरती हुई दिखा दी। स्कूल के बाद कॉलेज की तरफ बढ़े कदम, दो लड़कियां चलती हुई दिखा दी। क्या जीजाजी, हम लड़कों के लिए कॉलेज जाना जिंदगी की एक नया अध्याय नहीं है? क्यों हम लड़कों के लिए पेपरों में जगह नहीं है? क्या सारे अखबार के संपादक मर्द हैं जो कि लड़कियों की तस्वीरों को प्राथमिकता देते हैं?

मैं उसे जवाब के रूप में एक झूठी और फीकी सी स्माइल देकर रह गया। वो तो अपनी बात कह कर चला गया। वो जितने अखबार छोड़ गया था उसमें पिछले कई दिनों के अखबार थे। वो कुछ अखबार आगरा से भी लेकर आया था कुछ दिल्ली के थे और एक ही न्यूजपेपर नहीं थे, तीन-चार तरह-तरह के अखबार। मैंने गौर करना शुरू किया तो पाया कि उसकी बात काफी हद तक सही ही है। फिर मैंने पेपर में छपने वाले एड देखने शुरू किए। तो पाया कि एक एड छपा था कि कपड़ों पर 40 फीसदी की छूट और तस्वीर छपी थी एक मॉडल की ब्रा और पैंटी में। मुझे तो समझ नहीं आया कि ये किस पर छूट थी अंडर गारमेंट्स पर या फिर कपड़ों पर। देखा कि पूरे कपड़ों पर थी ये छूट फिर ऐसी तस्वीर क्यों छापी गई।

ऐसे विज्ञापन तो आम हैं, एक लड़की रेजर के साथ खड़ी हुई है, भई रेजर की लड़की को क्या जरूरत पर फिर भी एड में छपी हुई है। मर्दों की सेंडो बनियान को हाथों में लेकर खड़ी हैं एक महिला आखिर क्यों? सेंडो बनियान की उन्हें क्या जरूरत। सेंडो और ब्रीफ के लिए भी लड़कियों की जरूरत महसूस होती है। आखिर क्यो?

टीवी पर तो हमेशा इस बात की शिकायत करते हैं कि अंगप्रदर्शन हो रहा है पर अखबारों में भी जीना मुहाल कर दिया है। कहते हैं कि टाइम्स ऑफ इंडिया के डेल्ही टाइम्स (पंजाब केसरी के बाद डेल्ही टाइम्स ही बना था दूसरा पंजाब केसरी) के पहले सबसे ज्यादा बिक्री पंजाब केसरी की हुआ करती थी वो भी सिर्फ एक दिन। क्योंकि उसकी गुरुवार की बिक्री पूरे हफ्ते के अखबार से ज्यादा हुआ करती थी। क्यों? कारण था कि गुरुवार को सेलिब्रेटीज की बोल्ड रंगीन तस्वीरें हुआ करती थी, जो अब भी होती हैं।

कई बार सोचता हूं कि क्या लड़कियां सिर्फ टीआरपी जोन की वस्तु मात्र रह गई हैं? और दूसरी बात साले साहब की, क्या सारे अखबार के संपादक मर्द हैं जो लड़कियों की तस्वीरों को प्राथमिकता देते हैं? वैसे ये तो बात सही है मर्द प्रधान समाज में शायद ऐसा ही होता है! सोचने पर तो मजबूर हैं.....। अब तो सुधरो अखबार वालों, यारों जब देखो हर आईटम पर लड़की की तस्वीर ना लगा दिया करो।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, January 14, 2009

एनबीए के नियम बड़े या फिर न्यूज चैनलों की टीआरपी?

मुझे याद आता है हीथ्रो हवाई अड्डे पर हमला और ७ जुलाई जब कि लंदन के अंडरग्राउंड ट्रेनों को टारगेट बनाया गया था। लंदन में ७ जुलाई, २००५, पहले खबर ये आई कि ट्रेन का एक्सीडेंट हो गया है पर बाद में ये पता चला कि ये हादसा नहीं, आतंकवादी हमला है। क्या याद है कि शुरुआत से ही किस तरह की तस्वीरें या रिपोर्ट हमें मिल रहीं थी। सभी जगहों को सील कर दिया गया था। मीडिया को अंदर जाने की इजाजत नहीं थी। दूर से तस्वीरें ली जा रहीं थी। उन जगहों को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया था। ये सारी फुटेज आज भी यू ट्यूब पर आराम से देखी जा सकती हैं कि हमें उस समय मीडिया ने क्या दिखाया था और साथ ही बाद में भी मीडिया ने क्या दिखाया था ये भी हमें याद करना चाहिए। जब तक पुलिस ने उन जगहों को पूरी तरह से साफ नहीं कर दिया तब तक वो तस्वीरें किसी चैनल पर नहीं दिखाई गईं। ऐसे समय पर मीडिया का क्या रोल हो ये बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।
जब हीथ्रों हादसे के समय पर भी वापस हम अपने देश की खबरों पर ३-४ घंटे बाद लौट आए थे। क्यों लौट आए थे, क्योंकि बाहर की कुछ चुनिंदा तस्वीरें हम को मिल रहीं थीं, उनमें एक्शन नहीं था, कोई क्यों देखना चाहेगा उन तस्वीरों को, चाहे उस में हमारे देश के कुछ चुनिंदा लोग क्यों ना फंसे हुए हों। हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता जब सरकार को कुछ फर्क नहीं पड़ता तो देश के कुछ चुनिंदा टीआरपी पसंद चैनलों को क्यों फर्क पड़ेगा। पर बात यहां आकर खत्म नहीं होती यहां से तो वो शुरू होती है कि फिर देश के लिए मीडिया का रोल क्या हो?
जब आपातकाल के समय रिपोर्टिंग करनी हो और जब संवेदनशनील मामले हों तो मीडिया की भूमिका क्या ये ही होनी चाहिए कि अनाप-शनाप, बिना किसी प्रमाण के कुछ भी छाप दे या फिर बात बिना पुष्टी किए लोगों तक पहुंचा दे। साथ ही कितना देश के हित में कहना है या कि कितना भड़काऊ कंटेंट लोगों तक पहुंचाना है इस बात को ध्याना में रखते हुए कि कहीं देश में स्थिति और ना बिगड़ जाए। कुछ तो सरकार को ऐसा करना ही होगा कि देश की बेहतरी के लिए लगाम लगाई जा सके।
अब ये तो और ही साफ हो गया है कि मुंबई हमलों के पीछे मास्टरमाइंड जकीउर्ररहमान लख्वी ने अपने भेजे आतंकियों को फोन पर टीवी देखकर ही दिशा निर्देश दिये थे। ऐसी स्थिति में मीडिया के लिए देश ऊपर होना चाहिए ना कि टीआरपी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए एनबीए याने की न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन में शामिल सभी चैनलों के संपादकों ने मिलकर कुछ अहम दिशा निर्देश बनाए। सरकार नियम बनाए और उसको मीडिया के ऊपर थोंपे इससे बेहतर ये हुआ कि संपादकों ने मिलकर कुछ अपने नियम बना लिए।
आतंकवादी हमले, सांप्रदायिक हिंसा या इसी प्रकार के अन्य संघर्ष और अपराध की खबरों के कवरेज के समय सदा इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि इसमें से कितना और क्या दिखाना जनहित में है। साथ ही मीडिया को अपनी इस जिम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिये कि खबर बिल्कुल सही औऱ सिर्फ तथ्यों पर आधारित हो। ये भी ध्यान में रखना होगा कि ऐसी लाइव रिपोर्टिंग नहीं करें जिससे आतंकवादियों, उनके संगठन या विचारधारा का किसी प्रकार प्रचार होता हो या फिर उनके लिये किसी तरह की हमदर्दी पैदा होती हो। साथ में इस बात का भी ध्यान में रखें कि बंधकों को बचाने के लिए चल रही किसी कार्रवाई का अगर लाईव कवरेज हो रहा हो, तो बंधकों की पहचान, उनकी संख्या और उनकी स्थिति के बारे में कोई जानकारी ना दी जाए। साथ ही बचाव अभियान कितना बाकी है या बचाव में लगे सुरक्षा बलों की संख्या कितनी है और उनकी रणनीति क्या है, इसका भी लाईव प्रसारण नहीं होना चाहिये। ये हिदायत एक चैनल के आतंकवादियों से बातचीत के बाद दी गई। किसी हादसे के दौरान पीड़ितों , वहां तैनात सुरक्षा बलों , तकनीकी लोगों या फिर आतंकवादियों से लाइव बातचीत नहीं की जानी चाहिए। साथ ही वैसी पुरानी फुटेज बेवजह बार बार ना दिखायें जिससे दर्शकों की भावनायें भड़कें। पुरानी फुटेज अगर दिखाएं तो उस पर स्पष्ट लिखा हो 'फाइल'। संभव हो तो वक्त और तारीख लिखें। ये भी हिदायत कि मारे गये लोगों का पूरा सम्मान होना चाहिये औऱ शवों को नहीं दिखाना चाहिये। साथ ही विचलित करनेवाली तस्वीरें और ग्राफिक्स दिखाते समय इस बात का खास ख्याल रखें कि उनसे पीड़ित परिवार की तकलीफ ना बढे।
पर देखने की बात तो ये होगी कि क्या मीडिया इन सब नियमों को मानेगा और नहीं मानने पर उस चैनल पर किस तरह की कार्रवाई होगी। अब सरकार भी इन हमलों के बाद से मीडिया के लिए एक पैमाना तैयार कर रही है कि मीडिया आपात समय में किस तरह से कवरेज करेगा। पर सरकारी फरमान के खिलाफ आवाजें अभी से ही उठने लगी हैं। जहां तक मेरा मानना है तो सरकार को सिर्फ आपात स्थितयों को ध्यान में रखते हुए ही नियम बनाने चाहिए वर्ना हर समय के लिए यदि नियम बन गए तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सरकारी फरमान काफी भारी पड़ेगा।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”