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Saturday, February 6, 2010

राहुल और शाहरुख जैसे और दो-तीन जवाब शिवसेना की मुंबई में कब्र बना देगा।


उत्तरभारतीयों के पीछे राज ठाकरे...खान से खुन्नस निकालती शिवसेना....शिवसेना के पीछे बीजेपी-आरएसएस...और अब इनके पीछे युवराज यानी राहुल गांधी। पर कुछ भी हो हार तो यहां बाल ठाकरे और उनके मुद्दे की हुई है।

ठाकरे के परिवार की अब वो हैसियत नहीं रह गई है जो कि पहले हुआ करती थी। ये हाल में देखने को मिल गया। कुछ साल पहले तक बाल ठाकरे की छत्रछाया पाने के लिए मुंबई पहुंचा हर बड़े से बड़ा शख्स आतुर रहता था। बाल ठाकरे को मुंबई का शेर माना जाता था पर जान पड़ता है कि धीरे-धीर शेर बूढ़ा हो चला है।

जब मुंबई में 1993 के बम धमाके हुए तब बाल ठाकरे का राजनीतिक कैरियर पूरे शवाब पर था। याद है कि मराठी मानुष की राजनीति करते-करते 1995 विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने 73 सीटों पर कब्जा किया था और उस समय कांग्रेस ही महज 9 सीटों से शिवसेना से आगे थी।

शिवसेना में अंतर कलह और उद्धव ठाकरे को ज्यादा तवज्जो देने से पार्टी के वरिष्ठ नेता ठाकरे खानदान से बगावत करके उनके सामने खड़े होने लगे। नारायण राणे, संजय निरुपम, और फिर शिवसेना को सबसे बड़ा आघात। घर का सदस्य राज ठाकरे घर छोड़ आंख से आंख मिलाने निकल पड़ा।

शिवसेना का वर्चस्व धीर-धीरे अपने अंत की तरफ जाता दिखाई दे रहा था। बाल ठाकरे की तबीयत नासाज रहने लगी थी। सारी बागडोर उद्धव ठाकरे के हाथों में आ गई और शिवसेना की नैय्या बीच में कहीं फंसकर रह गई। शिवसेना का सूरज डूबने लगा। वहीं, दूसरी तरफ राज ठाकरे नाम का सूरज आसमान पर चमकना शुरू कर चुका था। राज ने अपने चाचा के नक्सेकदम पर चलते हुए बांटों और राज करो की नीति अपनाई साथ ही कहीं पीछे दब चुके मराठी मानुष को जिंदा कर दिया।

2004 में शिवसेना के हाथ लगी थीं 62 सीटें, मुंबई में पिछड़ चुकी थी शिवसेना। अब 2009 में एमएनएस भी अपने पैर जमा चुकी थी। तो यहां पर 13 सीटों के साथ एमएनएस ने खाता खोला तो वहीं शिवसेना टूट गई और महज 45 सीटों से ही उसे संतोष करना पड़ा।

बाल ठाकरे ने सामने से वार करने के लिए रुख सामना का किया। अपने मुखपत्र से दिन-ब-दिन हस्तियों को निशाना बनाना शुरू किया। अमिताभ बच्चन से लेकर सचिन तेंदुलकर, मुकेश अंबानी, आमिर खान और अब शाहरुख खान।

अपने मुद्दे को छिनता देख बाल ठाकरे खुल कर सामने तो आ गए तब तक उनका सामना करने के लिए एक पूरी फौज ही तैयार हो चुकी थी। किंग खान कहे जाने वाले शाहरुख खान ने कह दिया कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा कि जिसकी वजह से वो शिवसेना से माफी मांगें और शाहरुख खान किसी से नहीं डरता। सचिन और आमिर ने भी अपने तेवर पहले ही साफ कर दिए थे। अब तो शाहरुख के समर्थन में अभिषेक बच्चन और सलमान खान भी उतर आए हैं। शिवसेना की दोगली नीति अब सामने आने लगी। कुछ को सहारा और कुछ को लताड़ने का क्रम लोग समझने लग गए हैं।

राहुल गांधी ने पहले संदेशा पहुंचवाया और फिर वो मुंबई आए। पर मुंबई में इस बार लगा कि शिवसेना खत्म हो चुकी है। यदि पुलिस मदद नहीं करती तो शायद काले झंडे देखने के लिए मीडिया वाले तरस जाते। राहुल का कुछ भी बाल ठाकरे नहीं उखाड़ पाए। ये सभी जानते हैं कि बाल ठाकरे सिर्फ और सिर्फ सुबह सामना में ही अपनी झुझलाहट उतारेंगे।

शिवसेना के लिए ये नाक की लड़ाई है, इस बार पीछे हटे तो पार्टी कभी आगे नहीं आ पाएगी और इसका सबसे बड़ा फायदा होगा राज ठाकरे को। अभी तक तो देखने से लगता है कि आर-पार की इस लड़ाई में शिवसेना बैकफुट पर है और जवाब देने वाले फ्रंटफुट पर। अब तो 12-13 तारीख को ही पता चलेगा कि किसमें कितना है दम।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, January 23, 2010

’मेरी मर्जी’


सर, मेरे पास भी वो ही सामान है जो कि उस स्टॉल पर है। आपने मेरा सामान देखा, मुझसे बात की और फिर दूसरे स्टॉल पर जाकर सामान खरीद लिया। जबकि मेरा सामान उसके सामान से क्वालिटी में बेहतर है, फिर भी आपने ऐसा किया। आपने जानबूझकर मेरे साथ ये बुरा व्यवहार किया है। आप नहीं चाहते कि मैं ऊपर उठूं। आपने उस दुकान से ही ये सामान क्यों लिया, आपको मेरे से ही सामान लेना होगा, नहीं लोगे तो मैं ट्रेड फेयर के मालिकों से और अपनी सरकार से आपकी शिकायत करूंगा। आपने मेरे साथ गलत किया है?’
मेरी मर्जी, मेरा पैसा मैं चाहे किसी से सामान खरीदूं, तुम कौन? मेरी मर्जी!’

ऐसा वाक्या आपके साथ भी हुआ होगा, कई बार ऐसा होता है। पर इसका ये मतलब नहीं कि दाना-पानी लेकर कोई दूसरे के ऊपर चढ़ जाए। पर कुछ ऐसा ही आजकल देखने में आ रहा है स्पोर्टसमैनशिप के नाम पर आईपीएल में।

पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आईपीएल 3 के लिए यदि नहीं लिया गया तो इसमें कहां से आगई दुश्मनी की बात। क्यों बार-बार सरहद के पार से ये बयान आ रहा है कि पाक खिलाड़ियों पर बोली ना लगाकर उनकी बेइज्जती की गई है। अब तो हर पाकिस्तानी का मानना है कि इसमें हिंदुस्तान का षडयंत्र है। भारत सरकार ही नहीं चाहती कि पाकिस्तानी खिलाड़ी भारत में आकर खेलें और पैसा कमाएं।

अब बात मैं तर्कों से करता हूं।

सबसे पहला तर्क, ऑस्ट्रेलिया खिलाड़ियों को भी नहीं लिया गया, उनकी बोली नहीं लगी तो क्या ऑस्ट्रेलियन भी ये बोलने लगें कि ये भारत सरकार की करनी धरनी है? ऑस्ट्रेलिया में भारतियों पर हमला होने के कारण टेनिस सितारों ने नाम वापस ले लिया। तो ये भी सरकार का ही फैसला होगा? जबकि हाल में जो शिवसेना ने धमकी दी उसके बाद ऑस्ट्रेलियन खिलाड़ी ऐसा मानते हैं कि भारत में खेलने में कोई हर्ज नहीं है। पर भारतीयों पर हो रहे हमले पर भारतीयों की प्रतिक्रिया को क्या ऑस्ट्रेलियन नहीं समझते होंगे। जब एक देश समझ रहा है तो दूसरा देश हमारा पड़ोसी मुल्क समझने में कोताही क्यों बरत रहा है। क्या पाकिस्तान के लोगों को ये पता नहीं होता कि भारत की राजनीति में क्या चल रहा है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि 20-20 के चैंपियनों की बेइज्जती हुई है। पर ये बेइज्जती की किसने है? मेरा जवाब है खुद पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने अपनी बेइज्जती करवाई है?
क्या पाकिस्तानी खिलाड़ी या वहां कि आवाम ये नहीं जानती कि 26/11 का घाव अभी भी हरा है। फिर कैसे कोई भी फ्रेन्चाइजी ओनर उसी ट्राइडेंट होटल में बैठकर उन्हीं पाकिस्तानियों की बोली लगाता जिसके देश से आए लोगों ने इसी होटल को कुछ समय पहले कब्रगाह बना दिया था।

आईपीएल एक प्राइवेट संस्था है वो किसको रखेगी कब वेन्यू चेंज करेगी इसमें सरकार का कोई भी हस्ताक्षेप नहीं है। यदि ये छोटी सी बात पाकिस्तानियों की मोटी बुद्धि(जो कि उनके पास नहीं है) में नहीं आती तो इसमें कोई भी कुछ नहीं कर सकता। मेरी मर्जी मैं आपको लूं या ना लूं। इतना बड़ा आईपीएल सीजन है उसमें से कोई मजबूत खिलाड़ी नहीं पहुंचे तो उस टीम पर कितना फर्क पड़ेगा ये शायद दूर से हाथ सेकने वाले नहीं समझ सकते। उनको तो पैसा मिल जाता और फिर जो भी नुकसान होता फ्रेन्चाइजी को होता। क्या कोई भी पाकिस्तानी ये आश्वासन दे सकता है कि मार्च 13 तक भारत पर आतंकी हमला नहीं होगा। शायद कोई नहीं उनके हुक्मरान तक नहीं।

बिना किसी से पूछे आईपीएल ने अपना पहले मैच का वेन्यू चेंज कर दिया। क्या इसमें भी साजिश है नहीं। ये दिमाग है, दूरदर्शिता है।

तो क्यों वो खिलाड़ी इन सब कारणों को जानते हुए भारत में अपनी बेइज्जती करवाने आए? क्यों उन्होंने और पीसीबी ने एक बार भी नहीं सोचा कि ऐसा हो सकता है पर शायद मुझे लगता है कि उनकी बेइज्जती नहीं हुई उन्हें तो बख्स दिया गया वर्ना उन्हें तो इस से भी ज्यादा जल्लात सहनी पड़ती।

अंत में मेरी राय तो ये है कि जब तक संवाद ठीक नहीं हो जाते तब तक पाकिस्तानियों को भारत में आने से पहले सोचना चाहिए क्योंकि यहां पर कुछ भी उनके साथ घट सकता है और हो सके तो अभी नहीं आए तो बेहतर।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, September 14, 2009

क्यों नहीं 26/11 मुंबई हमले पर पाक मंत्री की ललकार के जवाब में वन-टू-वन करते पी चिदंबरम।


हाल ही में पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक ने इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलेआम भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम को ओपन डिबेट के लिए ललकारा। मुंबई हमलों पर बोलते हुए रहमान मलिक ने साफ तौर पर ये कहा कि 26/11 के मसले पर भारत पाकिस्तान पर दोष मढ़ना बंद करे। सबसे बड़ी बात उसमें ये कही गई कि भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम के साथ वो भारत में कहीं पर भी, पाकिस्तान या फिर किसी भी मुल्क में ये डिबेट कर सकते हैं।

चिदंबरम को चैलेज देने के अलावा भी रहमान मलिक सच से पर्दा उठाते ही रहे। जैसे, भारत ने मुंबई हमलों पर 9 फरवरी को भेजी हमारी दरख्वास्त का जवाब 20 जून को जाकर दिया जो कि बहुत देर से था और जवाब मराठी में भेजा। (कोई भी राष्ट्र किसी को जवाब अपनी क्षेत्रिय भाषा में क्यों देगा, ये इल्जाम कितना सच है ये तो मलिक जी ही बेहतर जानते हैं।) भारत ने चार्जशीट दाखिल करने में 90 दिन से भी ज्यादा का वक्त लिया वहीं हमने महज 76 दिन में इस कवायद को पूरा कर लिया। भारत कभी किसी को मास्टरमाइंड बताता है तो कभी किसी और को। हमने जकीउर रहमान लखवी को गिरफ्तार किया तो भारत हाफिज सईद को मास्टरमाइंड बताने लग गया। (क्योंकि दोनों ही इस साजिश में शामिल थे।) वहीं भारत समझौता एक्सप्रेस मामले पर सबूत साझा नहीं कर रहा जो कि बहुत अहम है। आप हमारे कोर्ट का सम्मान करो और हम आपके कोर्ट का सम्मान तो करते ही हैं। इस पर कितना सच था और कितनी बातों पर सच का पर्दा पड़ा रहा, ये हम सब बेहतर जानते हैं।

ये सारी बातें तब कही गई हैं जब कि भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम अमेरिका दौरे पर थे और अमेरिका को पाक की नियत से रूबरू कर रहे थे। पाक मीडिया ने दोनों खबरों को खूब उछाला और साथ ही भारतीय मीडिया ने भी इन खबरों को दिखाया। फिर क्या वजह है कि इस बारे में पी चिदंबरम की तरफ से या फिर भारत की तरफ से कोई भी जवाब नहीं आया। क्यों?

सबसे ज्यादा बात जो खल रही है कि एक तरफ तो कोई ये कह रहा है कि कहीं भी बात करने के लिए तैयार हैं और हम उस पर प्रतिक्रिया भी नहीं दे रहे। क्यों? कब तक पाकिस्तान गलती करते हुए भी हर बात पर हेकड़ी जमाता रहेगा। गलती करके हमें ही ललकारता रहेगा और हम शांत रहकर उन बातों का जवाब बहुत गहन विचार करके ही देते रहेंगे। कब तक इन मामलों पर भी राजनीति होती रहेगी। क्यों सामने आकर कोई भी इस बारे में जवाब नहीं दे रहा है।
अभी थोड़े दिन पहले ही भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भारत को पाकिस्तानी तालिबान की तरफ से मुंबई हमलों की तर्ज पर हमले की आशंका से आगाह किया था। उस पर रहमान मलिक का जवाब था,
"There was a statement from the PM of India that they knew there might be Bombay-like attacks replicated in India by the Pakistani Taliban. Prime Minister Sir, you are the chief executive, whatever information you have, it must have come from your Intelligence agencies, why didn't you share it with us? Why were you holding this information before the Bombay attacks? Why didn't you tell us? We are two countries we could have investigated it together. I am still ready, let’s meet."

रहमान मलिक की इतनी बातों के बाद कोई भी ये सोचने पर मजबूर हो सकता है कि भारत सिर्फ इल्जाम लगाता रहता है लेकिन कार्रवाई करने से बचता है। इसका मतलब ये हुआ कि भारत गुमराह करने की पॉलिसी अपना रहा है। पर ये पूर्ण सत्य नहीं है।

भारत कैसे अपने इंटैलिजेंस सीक्रेट किसी दूसरे देश और वो भी पाकिस्तान जैसे दुश्मन राष्ट्र के साथ शेयर कर सकता है। कैसे-कैसे करके हमारी इंटैलिजेंस एजेंसी खबरों को इक्ट्ठा करती हैं उस पर यदि भारत ये बात भी शेयर करने लग गया तो शायद जो लोग इस काम में लगे हुए हैं उनकी जान सलामत नहीं रहे। लेकिन हां, भारत ये कर सकता था कि उस तथ्यों के पुलिंदों में से कुछ तथ्यों को पाकिस्तान भेज कर ये साबित जरूर कर सकता था कि हां हमारे पास एविडेंस है, सबूत हैं।

जानते हैं कि पाक उस पर कार्रवाई नहीं करता और गर करता भी तो पहले से ही वहां से आतंकी संगठनों को हटा दिया गया जाता। आतंकवादियों को हटाने या पकड़ने के लिए पाक का एक भी सिपाही मारा नहीं जाता। आर्मी इधर होती है तो बम उधर फटता है। क्या इस के पीछे की नीतियां समझ में नहीं आती?

चीन से मिलकर पाकिस्तान की भारत के ऊपर अपना रुतबा कायम करने की कोशिश असर नहीं दिखा पाएगी। माना कि भारत हथियारों और ताकत के मामले में चीन से पीछे है पर हथियारों कि गुणवत्ता में पीछे नहीं है। भारत के पास लेटेस्ट तकनीक के हथियार हैं और वही चीन के पास हथियारों की तादाद ज्यादा है पर वो बहुत पुराने हैं। भारत का एक हथियार उनके चार के बराबर है। पर ये सत्य है कि कई जगहों पर हम चीन के पासंग भी नहीं है। जहां तक पाकिस्तान की बात की जाए तो भारत उनसे हर क्षेत्र में कहीं ज्यादा आगे है।

ध्यान तो इस बात का रखना है कि भारत में मौजूद गद्दार भारत की जमीन को नुकसान नहीं पहुंचा सकें। साथ ही उन अलगाववादियों को भी ये सोचना चाहिए कि चाहे चीन दागे या फिर पाकिस्तान, गोली, बारूद और बम की आंखें नहीं होती वो दोस्त और दुश्मन में फर्क करना नहीं जानती। यदि भारत की जमीं पर बम फटेगा तो यहां मौजूद दोस्त-दुश्मन सब के शरीर छलनी होंगे। बेहतर है कि भारत को एकजुट रहने दो और खुद भी मिल कर रहो और दुश्मनों का मिलकर मुकाबला करो।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, July 19, 2009

अंग्रेजों की नीति अपना रहा है अमेरिका, भारत-पाक को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है।

किसी भी देश का कोई प्रतिनिधि यदि किसी देश का दौरा करता है तो सबसे पहले माना ये जाता है कि दोनों देशों के बीच संबंध मधुर होंगे और साथ ही कुछ नई राह खुलेंगी। कुछ समझौतों भी हो सकते हैं साथ ही कुछ नए प्रोजेक्ट पर भी चर्चा होगी। और यदि वो देश आतंकवाद का शिकार रहा है तो फिर आतंक से निपटने की बात भी होगी।

जब अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत के दौरे पर मुंबई पहुंची तो लगा कि भारत-अमेरीका के रिश्तों में ये एक अच्छी शुरूआत होगी। अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति के पद से चूक चुकीं हिलेरी ने भारत में आकर रिश्तों को आगे तो बढ़ाया पर इस रिश्ते पर सवाल भी खड़ा कर दिया।

हिलेरी क्लिंटन ने मुंबई में 26/11 आतंकवादी हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी साथ ही उसकी तुलना अमेरिका में हुए 9/11 हमलों से कर दी। ताज होटल के कर्मचारियों के जज्बे की तारीफ और बहादुरी की तारीफ की “....मैं आपके जज्बे को सैल्यूट करती हूं...मैं सलाम करती हूं मुंबई के साहस को ...”। हिलेरी वहां मौजूद थी जहां आंतकवादियों ने क़हर बरपाया था। ताज होटल की लॉबी में वो उस जगह पर मौजूद थीं, जहां 26/11 की याद में 'ट्री ऑफ लाइफ' बनाया गया था।

एक तरफ तो हिलेरी ने देशवासियों को ये याद दिला दिया कि अमेरिका भारत के साथ है आतंकवाद की लड़ाई में। पर दूसरी तरफ ट्री ऑफ लाइफ के पास खड़ीं हिलेरी ने पाकिस्तान की तारीफ में कसीदे भी पढ़ दिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी आतंकवाद को खत्म करने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ वो यहीं पर नहीं रुकी उन्होंने ये भी कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठा रहा है। यहां इस बात का हवाला देने का क्या मतलब। क्या वो यहां पर पाक की पैरोकार बन कर आईं हैं। शायद नहीं क्योंकि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कह दिया था कि वो सिर्फ भारत-अमेरिका के रिश्तों पर ही बात करेंगी। तो फिर पाकिस्तान की तारीफ करने का क्या मतलब? या वो भारत में अमेरिका का स्टेंड साफ कर रहीं थी कि अमेरिका क्या सोचता है?

हाल ही में जरदारी ने कहा था कि अमेरिका पर 9/11 हमलों के बाद पाकिस्तान के लिए ही पाक टुकड़ों पर पलने वाले आतंकवादी खतरे का सबब बन चुके हैं। हिलेरी जी को शायद ये नहीं पता कि पाकिस्तान भारत सियालकोट सीमा पर अपने बंकर खड़े कर रहा है। यदि अफ्गानिस्तान का मामला या यूं कहें कि गृह युद्ध की नौबत नहीं होती स्वात, बलुचिस्तान, लाहौर में तो पाकिस्तान अपनी सीमा से सेना कम नहीं करता

इस सब बातों को देखकर लगता है कि अमेरिका फिर दोतरफा चाल चल रहा है। एक तरफ तो भारत के साथ मिलकर आतंकवाद खत्म करने की बात कर रहा है वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान को भी क्लीन चिट देने में लगा हुआ है। इस कूटनीति को भारत को समझना चाहिए और हो सके तो कुछ मुद्दों पर अमेरिका का हस्ताक्षेप बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, May 13, 2009

ये लो आगए फिर रंग में सचिन

ये देखिए चल गए ना फिर से सचिन तेंदुलकर। कल ही तो मैंने लिखा था जब हर जगह ये ही बात होने लगी थी कि पता नहीं सचिन को क्या होगया है। मैंने साफ लिखा था कि भई कई बार ऐसा होता है कि हां कोई दो-चार मैच परफोर्म नहीं कर पाता पर इसका ये मतलब नहीं है कि दाना-पानी लेकर ही पीछे लग जाओ।

किंग्स इलेवन ने दूसरी भिड़ंत में भी 119 रन ही बनाए और जीत के लिए 120 की चुनौती मुंबई इंडियंस के सामने रखी। और मैच में टॉस हारने के बावजूद सचिन ने कप्तानी का सही रुख दिखाते हुए तीसरे ओवर से ही गेंदबाजों को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। फिर भज्जी को गेंद पकड़ाई और भज्जी ने कमाल ही कर दिया। सबसे खतरनाक खिलाड़ी संगकारा को आउट कर दिया। साथी ही ड्यूमनी को भी सचिन ने मौका दिया। ड्यूमनी ने भी युवराज को आउट कराके मुंबई की कमर ही तोड़ दी। सचिन ने फील्डिंग में भी कमाल दिखाया और सोहल जो कि खतरनाक बन रहा था उसे रन आउट किया।

जब बल्लेबाजी की बात आई तो सचिन ने गजब का आत्मविश्वास दिखाते हुए ब्रावो से ओपन करवाया और साथ ही जयसूर्या के आउट होने के बाद पिछले मैच में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले राहणे को मैदान में उतारा। फिर रहाणे के आउट होने के बाद खुद मैदान में आए। चाहते तो ड्यूमनी को भेजा जा सकता था पर नहीं। अपनी परर्फोरमेंस को सुधारने का जज्बा लेकर सचिन मैदान में उतरे और 40 से 122 तक टीम को पहुंचाया। साथ ही ब्रावो का उत्साहवर्धन भी करते रहते। जहां ब्रावो ने श्रीशांत को छक्के मारे वहीं घातक बनते हुए पीयूष चावला को सचिन ने भी शानदार छक्का जड़ा।

माना कि अभी आईपीएल का सफर बहुत बाकी है और सचिन को हमेशा से ही बार-बार अपने आप को साबित करते रहना पड़ेगा खासकर टीम के लिए। वैसे पूरी दुनिया में कोई भी सचिन से साबित करने की बात तो कहने नहीं जा रहा। पर ट्वेंटी-20 में जैसी कप्तानी और परफोर्मेंस एक खिलाड़ी से चाहिए वहां पर अभी सचिन पूरा नहीं दे पा रहे हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, May 11, 2009

क्या हो गया है सचिन को? शुरुआत में तो लगा था कि वाह! मास्टर ब्लास्टर इस बार तो ब्लास्ट करने के लिए तैयार हैं। पर क्या होगया सचिन को एकदम से ब्रेक लग गए। आईपीएल सीजन 2 में सचिन ने 9 मैच खेले हैं और 226 रन बनाए हैं जिसमें से एक बार नॉट आउट भी रहे। पहले तीन मैचों में तो सचिन का जलवा देखने लायक था। पहले तीन मैचों में ही सचिन ने दो हॉफ सेंचुरी जमाई। पहले ही मैच में 49 गेंदों पर नाबाद 59 रन बनाए जिसमें 7 चौके शामिल थे। चेन्नई को बड़ी ही आसानी से मात दे दी थी। हैदराबाद के खिलाफ दूसरे मैच में टीम 12 रन से भले ही हार गई पर सचिन ने 3 छक्के और 2 चौकों की मदद से महज 27 गेंदों पर 36 रन बनाए। कोलकाता के खिलाफ तो कमाल ही कर गए मास्टर। ऐसा ब्लास्ट किया कि मजा ही आगया। महज 45 गेंद में 4 छक्के और 6 चौकों की मदद से 45 गेंद पर 68 रन की पारी खेली जो कि अभी तक सचिन की इस सीजन में सर्वश्रेष्ठ है।
फिर तो लगता है जैसे कि सचिन को नजर ही लग गई। किंग्स के खिलाफ 01, कोलकाता के खिलाफ 34, बैंगलोर के खिलाफ 11, हैदराबाद के खिलाफ 02, दिल्ली के खिलाफ महज 15, फिर बैंगलोर के खिलाफ 00। मतलब-
पहले तीन मैचों में- 59+36+68=163
बाकी के 6 मैचों में- 01+34+11+02+15+00=63
तो एकदम से अचानक सचिन को क्या होगया। कहां चली गई फॉर्म। माना की बैगलोर को हराकर टीम ने फिर से अपने आप को सेमीफाइनल की दौड़ में रखा है पर लगता है कि सचिन पर कप्तानी हावी होने लग गई है। जब भी थोड़ी सी टेन्स हालात होते हैं सचिन को नाखुन चबाते जरूर देखा जा सकता है चाहे वो मैदान में हों या फिर बाहर।

आजकल ये मुद्दा गर्माया हुआ है कि क्या हो गया है सचिन को? सब इस बारे में ही बात करते नजर आजाएंगे। पर सचिन को कुछ भी नहीं हुआ है। जहां तक सवाल रहा जयसूर्या का तो वो अभी ८ मैचों में सिर्फ १७१ रन बना पाए हैं। तो सचिन को कुछ नहीं हुआ है बस देखना ये है कि सचिन कब फॉर्म में वापस आ पाते हैं और उसका इंतजार सब को रहेगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, April 18, 2009

कांग्रेसियों, अफजल गुरू और कसाब को सरबजीत के साथ मत तोलो। केस मत लटकाओ, उन्हें लटकाओ।

वो हंस रहा है, वो मुस्कुरा रहा है, वो ठहाके लगा रहा है। आज वो भीख नहीं मांग रहा, आज वो जवाब दे रहा है। ये सब वो कर रहा है दुनिया को ये दिखाने के लिए कि उसे किसी का डर नहीं है, कैद में भी वो जी रहा है मौज में। ये सब वो वहां कर रहा है जहां पर सिर्फ उसे जिंदा रखने का खर्च लाखों में आ रहा है। वो ठहाके लगा रहा है कानून व्यवस्था पर, कानून प्रणाली पर, कानून के नियमों पर। वो इस बात पर हंस रहा है कि यहां पर एक देशद्रोही, एक आतंकवादी के ऊपर ट्रायल चलाने के लिए भी 36 पेंच हैं। वो जानता है कि वो बेवकूफ बना सकता है, तो बना रहा है। और ऐसा सब वो कर रहा है कानून के मंदिर में, वहीं पर बैठ वो उड़ा रहा है कानून की धज्जियां, हंस रहा है उसी कानून पर, ठहाके लगा रहा है।

और ऐसा भी नहीं है कि वो कोई अच्छा आदमी है। वो तो है एक ही रात में करोड़ों के मन में दहशत पैदा करने वाला अजमल आमिर कसाब

जी हां, मुंबई में बंद है कसाब नाम का वो शख्स जिसने अपने पाकिस्तान साथियों के साथ मिलकर 26/11 को मुंबई दहलाई थी। ऐसी साजिश जिसने पूरे मुल्क से लेकर दुनिया को एक नए तरीके के हमले से दो-चार कराया था। 26/11 की रात को जब उसे पकड़ा गया था तो उसे इस बात का इल्म भी नहीं था कि भारत में एक आतंकवादी को जिंदा पकड़ने के बावजूद उसे इतने आराम से रखा जाएगा। तभी तो वो सिर्फ अपने आप को मार देने की बात कर रहा था। अब तो वो अपने इकबालिया बयान से भी पलट गया। अब क्या? उसका वकील ये कहने से पीछे नहीं हट रहा है कि कसाब तो बच्चा है। शायद उस वकील को ये नहीं पता कि बच्चे कैसे होते हैं।

मेरा सवाल ये है कि ४० पेज का इकबालिया बयान जो कि मैजिस्ट्रेट के सामने दिया गया था कसाब उस से कैसे मुकर सकता है। बयान देते समय उस पर किसी भी पुलिस का दवाब नहीं था।
मेरा सवाल ये है कि क्यों उस आतंकवादी को इतनी सहुलियत देने पर आमादा है हमारी सरकार। क्या जानती नहीं है कि वो पाकिस्तानी आतंकवादी है जिसने मुंबई को एक ऐसा घाव दिया है जो कि कभी भरा नहीं जा सकता।
मेरा सवाल ये है कि कैसे कसाब इकबालिया बयान से पलट रहा है। एक तरफ तो उसने अपने मां-बाप का पता-ठिकाना सही बताया अब बयान को दबाव में बता रहा है। मां को जो ख़त लिखा था क्या वो भी भारतीय पुलिस ने दबाव में लिखवाया था।
मेरा सवाल है कि उस जैसे क़ातिल, दरिंदे को हम कैसे छोड़ सकते हैं, क्यों नहीं फांसी पर चढ़ा देते। क्यों मामले को टाल रहे हैं और कसाब को भी अफजल गुरू की तरह मौका देने की भूल कैसे कर सकते हैं।

अफजल गुरु को कांग्रेस फांसी पर नहीं लटकाएगी क्योंकि उस से हताहत होगा हमारे देश का अल्पसंख्यक समुदाय जो कि बहुत बड़ा वोट बैंक है। पर क्या कसाब को भी वोट बैंक की राजनीति में तोला जा रहा है? सरबजीत की दुहाई मत दो, वो तो अकेला है। कांग्रेसियों, अफजल गुरू और कसाब को सरबजीत के साथ मत तोलो। केस मत लटकाओ, उन्हें लटकाओ। वर्ना गर चुनाव जीते तब भी हार जाओगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, January 14, 2009

एनबीए के नियम बड़े या फिर न्यूज चैनलों की टीआरपी?

मुझे याद आता है हीथ्रो हवाई अड्डे पर हमला और ७ जुलाई जब कि लंदन के अंडरग्राउंड ट्रेनों को टारगेट बनाया गया था। लंदन में ७ जुलाई, २००५, पहले खबर ये आई कि ट्रेन का एक्सीडेंट हो गया है पर बाद में ये पता चला कि ये हादसा नहीं, आतंकवादी हमला है। क्या याद है कि शुरुआत से ही किस तरह की तस्वीरें या रिपोर्ट हमें मिल रहीं थी। सभी जगहों को सील कर दिया गया था। मीडिया को अंदर जाने की इजाजत नहीं थी। दूर से तस्वीरें ली जा रहीं थी। उन जगहों को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया था। ये सारी फुटेज आज भी यू ट्यूब पर आराम से देखी जा सकती हैं कि हमें उस समय मीडिया ने क्या दिखाया था और साथ ही बाद में भी मीडिया ने क्या दिखाया था ये भी हमें याद करना चाहिए। जब तक पुलिस ने उन जगहों को पूरी तरह से साफ नहीं कर दिया तब तक वो तस्वीरें किसी चैनल पर नहीं दिखाई गईं। ऐसे समय पर मीडिया का क्या रोल हो ये बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।
जब हीथ्रों हादसे के समय पर भी वापस हम अपने देश की खबरों पर ३-४ घंटे बाद लौट आए थे। क्यों लौट आए थे, क्योंकि बाहर की कुछ चुनिंदा तस्वीरें हम को मिल रहीं थीं, उनमें एक्शन नहीं था, कोई क्यों देखना चाहेगा उन तस्वीरों को, चाहे उस में हमारे देश के कुछ चुनिंदा लोग क्यों ना फंसे हुए हों। हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता जब सरकार को कुछ फर्क नहीं पड़ता तो देश के कुछ चुनिंदा टीआरपी पसंद चैनलों को क्यों फर्क पड़ेगा। पर बात यहां आकर खत्म नहीं होती यहां से तो वो शुरू होती है कि फिर देश के लिए मीडिया का रोल क्या हो?
जब आपातकाल के समय रिपोर्टिंग करनी हो और जब संवेदनशनील मामले हों तो मीडिया की भूमिका क्या ये ही होनी चाहिए कि अनाप-शनाप, बिना किसी प्रमाण के कुछ भी छाप दे या फिर बात बिना पुष्टी किए लोगों तक पहुंचा दे। साथ ही कितना देश के हित में कहना है या कि कितना भड़काऊ कंटेंट लोगों तक पहुंचाना है इस बात को ध्याना में रखते हुए कि कहीं देश में स्थिति और ना बिगड़ जाए। कुछ तो सरकार को ऐसा करना ही होगा कि देश की बेहतरी के लिए लगाम लगाई जा सके।
अब ये तो और ही साफ हो गया है कि मुंबई हमलों के पीछे मास्टरमाइंड जकीउर्ररहमान लख्वी ने अपने भेजे आतंकियों को फोन पर टीवी देखकर ही दिशा निर्देश दिये थे। ऐसी स्थिति में मीडिया के लिए देश ऊपर होना चाहिए ना कि टीआरपी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए एनबीए याने की न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन में शामिल सभी चैनलों के संपादकों ने मिलकर कुछ अहम दिशा निर्देश बनाए। सरकार नियम बनाए और उसको मीडिया के ऊपर थोंपे इससे बेहतर ये हुआ कि संपादकों ने मिलकर कुछ अपने नियम बना लिए।
आतंकवादी हमले, सांप्रदायिक हिंसा या इसी प्रकार के अन्य संघर्ष और अपराध की खबरों के कवरेज के समय सदा इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि इसमें से कितना और क्या दिखाना जनहित में है। साथ ही मीडिया को अपनी इस जिम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिये कि खबर बिल्कुल सही औऱ सिर्फ तथ्यों पर आधारित हो। ये भी ध्यान में रखना होगा कि ऐसी लाइव रिपोर्टिंग नहीं करें जिससे आतंकवादियों, उनके संगठन या विचारधारा का किसी प्रकार प्रचार होता हो या फिर उनके लिये किसी तरह की हमदर्दी पैदा होती हो। साथ में इस बात का भी ध्यान में रखें कि बंधकों को बचाने के लिए चल रही किसी कार्रवाई का अगर लाईव कवरेज हो रहा हो, तो बंधकों की पहचान, उनकी संख्या और उनकी स्थिति के बारे में कोई जानकारी ना दी जाए। साथ ही बचाव अभियान कितना बाकी है या बचाव में लगे सुरक्षा बलों की संख्या कितनी है और उनकी रणनीति क्या है, इसका भी लाईव प्रसारण नहीं होना चाहिये। ये हिदायत एक चैनल के आतंकवादियों से बातचीत के बाद दी गई। किसी हादसे के दौरान पीड़ितों , वहां तैनात सुरक्षा बलों , तकनीकी लोगों या फिर आतंकवादियों से लाइव बातचीत नहीं की जानी चाहिए। साथ ही वैसी पुरानी फुटेज बेवजह बार बार ना दिखायें जिससे दर्शकों की भावनायें भड़कें। पुरानी फुटेज अगर दिखाएं तो उस पर स्पष्ट लिखा हो 'फाइल'। संभव हो तो वक्त और तारीख लिखें। ये भी हिदायत कि मारे गये लोगों का पूरा सम्मान होना चाहिये औऱ शवों को नहीं दिखाना चाहिये। साथ ही विचलित करनेवाली तस्वीरें और ग्राफिक्स दिखाते समय इस बात का खास ख्याल रखें कि उनसे पीड़ित परिवार की तकलीफ ना बढे।
पर देखने की बात तो ये होगी कि क्या मीडिया इन सब नियमों को मानेगा और नहीं मानने पर उस चैनल पर किस तरह की कार्रवाई होगी। अब सरकार भी इन हमलों के बाद से मीडिया के लिए एक पैमाना तैयार कर रही है कि मीडिया आपात समय में किस तरह से कवरेज करेगा। पर सरकारी फरमान के खिलाफ आवाजें अभी से ही उठने लगी हैं। जहां तक मेरा मानना है तो सरकार को सिर्फ आपात स्थितयों को ध्यान में रखते हुए ही नियम बनाने चाहिए वर्ना हर समय के लिए यदि नियम बन गए तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सरकारी फरमान काफी भारी पड़ेगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, January 13, 2009

हमारे न्यूज चैनल कितने परिपक्व?

जो भी न्यूज़ देखता है उनसे पूछा जाए कि न्यूज़ चैनल के लिए क्या जरूरी है खबर या टीआरपी, तो अधिकतर कहेंगे ‘खबर’, पर न्यूज चैनल टीआरपी पसंद करते हैं और अब न्यूज़ कहां। लेकिन कुछ दिनों से ये देखा जा रहा है कि न्यूज़ चैनलों पर न्यूज़ वापस लौटी है। वर्ना पहले न्यूज़ के सिवा हमारे देश के न्यूज़ चैनलों पर सब कुछ होता था। नाग-नागिन, भूत, ज्योतिष, भ्रम फैलाने वाली ख़बरें और इन पर होने वाले लंबी-लंबी चर्चा, एक ही तस्वीर बार-बार दिखाई जाती थी। पर नहीं बदली तो खेल की खबरें पहले भी सिर्फ क्रिकेट होता था और अब भी सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट ही होता है, किसी और खेल को जगह नहीं मिल पाती। क्यों? क्योंकि भारत में क्रिकेट के सिवा कुछ नहीं ‘बिकता’। कुछ अंग्रेजी चैनल खेल की खबरों में सभी खेलों को जगह देते दिख जाएंगे पर हिंदी न्यूज चैनलों पर तो सिर्फ ढाक के तीन पात याने क्रिकेट। दूसरे खेलों के हाल का अंदाजा हम इससे लगा सकते हैं कि पुलेला गोपीचंद को खेल मंत्री एम एस गिल ने नहीं पहचाना था, जबकि गुपीचंद की शागिर्द सायना नेहवाल के कंधे पर हाथ रख कर मंत्री जी खड़े थे। शायद मंत्री जी भी हिंदी न्यूज चैनल ही देखते होंगे।
वहीं गर दूसरे शब्दों में कहें, कि क्या हमारी न्यूज इंडस्ट्री इतनी परिपक्व हो गई है जितने की पश्चिमी देशों की न्यूज़ इंडस्ट्री? हमारे लिए न्यूज़ क्या है? यदि हम ये सवाल अपने आप से पूछें तो हमारे जहन में सबसे पहले ख्याल क्या आएगा? हमारी खबरों का दायरा सिर्फ और सिर्फ हमारे इर्द गिर्द ही घूमता है, आस पास की क्षेत्रीय हलचल पर हम ज्यादा ध्यान देते हैं। देश में क्या चल रहा है राजनीति के स्तर पर थोड़ा बहुत लोग पढ़ भी लेते हैं या जान लेने के इच्छुक होते हैं वर्ना दूसरे प्रदेश, या देश या फिर सात समंदर की खबरों को जानने के इच्छुक हम बहुत ही कम होते हैं।
मुंबई हमलों के दौरान बीबीसी पर पूरे दिन-रात सिर्फ और सिर्फ मुंबई की ख़बरें ही छाई रहीं। क्या ब्रिटेन में २६ से २९ तक कुछ भी ऐसा नहीं घट रहा था कि वो बीबीसी चैनल पर एयर टाइम ले पाता। हमारे देश में तो बहुत से रिएलिटी शो हैं जिन पर हर दिन दो-तीन घंटे आराम से निकल जाते हैं। बीबीसी पर पूरे समय मुंबई हमलों का क़हर ही चलता रहा। सेटेलाइट फोन के जरिए तस्वीरें दिखाई जा रहीं थी। साथ ही विदेशी मीडिया इस बात का भी ध्यान रख रहा था कि कहीं भी विचलित करने वाली तस्वीरें ना दिखाई जाएं, क्षत विक्षप्त शरीर नहीं दिखे या फिर सेना की मूवमेंट भी नहीं दिखाई जा रही थी। बीबीसी पर ब्लॉगर छाए रहे, जो अपने ब्लॉग पर कोई जानकारी दे रहे थे, उनसे वो फोन पर बात भी कर रहे थे।
अब जब कि बहुत हद तक साफ हो गया है कि मुंबई हमलों में पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है। साथ ही कसाब को भी पाकिस्तानी मान लिया गया है। लेकिन मुंबई हमला भारतीय मीडिया के लिए एक नया अनुभव साबित हुआ। क्या रोल हो मीडिया का इस बारे में बात अगली बार। इस तरह की कमांडों कार्रवाई पहली बार हमारी मीडिया ने देखी। यदि गौर करें तो श्रीनगर या फिर बोर्डर एरिया को छोड़कर कहां पर हमें याद आता है कि कमांडो कार्रवाई की गई जिसे इतने बड़े पैमाने पर कवर किया गया। अमृतसर के स्वर्णमंदिर में कमांडो कार्रवाई हुई थी पर तब कितना सजग था मीडिया। कुछ चुनिंदा अखबार हुआ करते थे लोगों के पास टीवी भी नहीं था। तो किसी शहर में वो भी मैट्रो सिटी में इस तरह आतंकवादियों का क़हर बरपाना और साथ ही सबसे आगे निकलने की होड़ ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से इतनी बड़ी गलती करवाई जिसका सीधे-सीधे फायद पाकिस्तान में बैठे इन आतंकवादियों के आकाओं को मिला और बिना बाहर देखे वो कमांडो की हर कार्रवाई के बार में आसानी से जान जाते और हमारी सेना को इसका काफी खामियाजा भुगतना पड़ता। लगता तो ये है कि सबसे पहले और आगे निकलने की होड़ ने हमारी इलैक्ट्रोनिक मीडिया और एजेंसियों को कभी परिपक्व ही नहीं होने दिया।
यहां पर ये गौर करने वाली बात है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात बन गए हैं। साथ ही दोनों देशों में साइबर वॉर छिड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ मीडिया के बीच भी एक तरह की कोल्ड वॉर छिड़ गई है। ये समय होता है कि दोनों देश अपने आप में संयम बरतें पर ऐसा दिख नहीं रहा है। मीडिया की बात है तो कुछ कायदे, कानून, नियम, सरकार को बनाने ही होंगे जो कि ऐसी आपतकाल स्थितियों में मीडिया पर लागू हो। सरकार ही मीडिया को कुछ फुटेज और घंटे दर घंटे ब्रीफिंग करे और हालात से वाकिफ कराए। जब चाहे सरकार आपात स्थितियों में दुनिया के सामने जैसे चाहे हालात दिखाना चाहे वो दिखाए। याने कि जिस तरह की कवरेज से दूसरे समूह याने कि हमलावरों को फायदा नहीं पहुंचे। वैसे सरकार जल्द ही इस मामले में कुछ नियम कानून की व्यवस्था करने में जुट गई है। पर देखना तो ये होगा कि ये नियम आते कितने वक्त में हैं और न्यूज चैनल कितना इन नियमों पर अमल करते हैं। कुछ नियम एनबीए याने न्यूज ब्रॉडकास्ट एसो. ने भी बनाए हैं याने की वो संस्था जो कि मीडिया में रहकर मीडिया पर सख़्त नज़र रखती है। उनपर एक नज़र अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, January 9, 2009

वो सफर, जो मुझे हमेशा याद रहेगा। मेरी पहली हवाई यात्रा-2।

आगे...
...इतने बड़े ग्राउंड में अपने प्लेन को ढूंढने की असमंजस में मैं इधर-उधर ताकने लगा। कई बस आजा रही थी इतनी देर में ये तो जान गया था कि ये जगह एयरपोर्ट है ना कि कोई बस अड्डा। लेकिन क्या करूं याद आ रही थी बस अड्डे की जहां पर कोई ना कोई जरूर आवाज़ लगाता रहता है, मैं ये ही सोच रहा था कि कोई आवाज़ लगाए कि मुंबई-मुंबई, कोलकाता-कोलकाता,बैंगलोर-बैंगलोर...और मैं पैदल ही वहां का रुख कर लूं। लेकिन ये जगह है इतनी बड़ी कि पैदल ढूंढना भी बहुत मुश्किल है। दिमाग में सिर्फ और सिर्फ ये ही सब घूम रहा था और लगातार दौड़ रहा था पर पैर थे कि जम से गए थे। सुबह के 5.45 बज रहे थे। ठंड भी बहुत थी लेकिन अब तो पसीना आने लगा था। साथ ही वहां पर अभी तक सिर्फ मैं ही अकेला खड़ा हुआ था तो और घबराहट हो रही थी कि कहीं देर तो नहीं होगई। लेकिन तभी वहां पर टाई पहने एक लड़का आया। उसके हाथ में वॉकी टॉकी भी था और उसने मुझे बताया कि अभी बस आएगी और आपको आपके प्लेन तक ले जाएगी।
अब आई सांस में सांस। लेकिन अब दूसरी चिंता सताने लगी और वो चिंता हमेशा ही गलत समय पर आती है वो है लघुशंका की। अब समझ में नहीं आ रहा था कि कहां फारिग होऊं। ग्राउंड स्टाफ कहां जाता है इसका तो पता नहीं था पर यदि जाऊं और बस फिर छूट जाए तो क्या होगा। इसी द्वंद में फंसा हुआ था कि बस आगई और कुछ सह यात्री भी आगए। बस थोड़ी देर रुक कर तकरीबन 15 यात्री को लेकर बस प्लेन की तरफ चल दी। लघुशंका का निवारण तो अब प्लेन में जाकर ही होगा। ये प्लेन होगा हमारा, बस नहीं रुकी, तो ये होगा, ये भी नहीं। करते-करते तकरीबन आधा किलोमीटर घूमने के बाद हम अपने प्लेन तक पहुंचे। या तो मेरे प्रेशर का मामला था या पता नहीं क्या, पर तुरंत मैं बस से उतर कर सीढ़ियों के पास तक जा पहुंचा और मेरे टिकट को आधा फाड़कर चैकर ने आधा मुझे पकड़ा दिया। ऊपर पहुंचा तो दो ऑटियों ने मेरे इस्तकबाल किया और अंदर की तरफ इशारा किया। पहले बिजनेस क्लास पड़ा और तुरंत ही तकरीबन 186 सीटों का इकॉनमी क्लास। अब कहां बैठूं? कुछ दिन पहले ही एक अंग्रेजी मूवी देखी थी कि एयरहोस्टेस खुद बताती हैं कि कहां बैठना है। पर यहां तो ऐसा नहीं था। मैंने तुरंत बोर्डिंग पास पर नजर डाली तो उसमें सीट नंबर लिखा हुआ था 12A। याने समझते देर नहीं लगी कि मुझे कहां बैठना है।
अरे, ये क्या मुझे तो खिड़की के बगल वाली सीट मिली है। कहीं ए नंबर की सीट कोई और तो नहीं होती, पर ऐसा नहीं था और पूरे इत्मीनान के साथ बैठ गया। बैठते ही लघुशंका की शंका का निवारण करने की इच्छा जाग्रित हुई और मैं चल दिया बाथरुम की ओर। मैं जिस से बड़ी देर से त्रस्त था उस से निजात पा लिया। थोड़ी ही देर में मेरी सीट के आगे लगी स्क्रीन पर जो कि मेरे आगे वाले की सीट की बैक थी उस पर संदेश आने लगे। अधिकतर फिल्मों में देखा है कि पहली बार सफर करने वाले को बेल्ट लगाने में बड़ी दिक्कत होती है पर मुझे नहीं हुई। सीढ़ियां हटा ली गईं थी। एयरहोस्टेस जो कि उदघोषिता भी थी उसने सूचना दी कि थोड़ी देर में फ्लाइट उड़ने के लिए तैयार है और उदघोषणा बंद होगई।
धीरे-धीरे विमान बड़ी आवाज़ करते हुए सरकने लगा और रनवे तक पहुंच गया। विमान थोड़ा रुका और मैंने धरती को जी भरकर पास से देखा क्योंकि मेरे बगल में तो कोई था नहीं लेकिन जो भी सहयात्री आजू-बाजू थे वो अपने दोनों हाथ जोड़कर बैठे हुए थे। उनमें से कुछ पढ़ भी रहे थे और कुछ सिर्फ सामने शून्य में देख रहे थे। मैं अपने बगल में बांयी और की विंग को देखने लगा। विमान रनवे पर चल दिया फिर तेज आवाज़ के जरिए दौड़ने लगा। बस एक छोटे से हल्के झटके के साथ मैं आसमान की तरफ बढ़ गया। धरती पीछे और नीचे छूटती जा रही थी और मैं लगातार नीचे देखता जा रहा था। पर ये क्या, प्लेन की लेफ्ट विंग नीचे की तरफ क्यों झुक रही है। मेरा तो कलेजा मुंह को ही आ रहा था और मैं नीचे देखने से डरने लगा। साथ ही मैं दूसरी तरफ झुकने लगा। ऐसा लगा कि कहीं नीचे ही ना गिर जाएं। वो एहसास बड़ा ही खतरनाक था। लग रहा था कि खड़ा हो जाऊं क्योंकि प्लेन एक तरफ काफी झुक गया था और ठीक मेरे नीचे दिल्ली या फिर उसके आसपास के इलाके रहे होंगे। यदि कोई बाईचांस मुझे देख रहा होता तो वो पहचान जाता कि ये मेरी पहली हवाई यात्रा है। मेरी हवाईयां उड़ी हुई थी।
थोड़ा ऊपर जाकर विमान ठीक से चलने लगा। एहसास हो रहा था कि जैसे चढ़ाई में कुछ दिक्कत हुई है और अब वो समतल सड़क पर ठीक से चलने लगा है। पर लगता था कि बीच-बीच में सड़क में बहुत गड़्ढ़े हैं और प्लेन में काफी आवाज़ हो रही थी। लेकिन ऊपस से धरती को देखना का सुख मुझे बहुत ही प्रफुल्लित कर रहा था। साथ ही लग रहा था कि गूगलअर्थ में जो चित्र उभरते हैं वो सचमुच में ही काफी सही और जीवंत लगते हैं।

'बादलों के ऊपर जहां और भी हैं। ऐसा लग रहा था।'

नीचे धरती, उसके ऊपर बादल, उसके ऊपर हमारा विमान और हमारे विमान के ऊपर सिर्फ और सिर्फ साफ आसमान। सूरज ऊगने की फिराक में धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए। बड़ी ही मनमोहक तस्वीर उभरकर सामने आ रही थी। थोड़ी देर बाद नाश्ता आया और पता चला कि हवाई ब्रेकफास्ट कैसा होता है। उस समय हम समुद्र तल से 10700 मीटर की ऊंचाई पर थे और बाहर हवा का तापमान था -46 डिग्री, जी हां, शून्य से 46 डिग्री नीचे। मैं अपने इयरपीस पर गाने सुनता हुआ जा रहा था। चलचित्र और गानों की व्यवस्था भी अंदर थी उसी स्क्रीन पर जहां पर पहले संदेश आ रहे थे। सिर्फ पौने दो घंटे में मैं मुंबई पहुंच गया। पूरी उड़ान के वक्त मैं एक अलग एहसास होता रहा जो कि बिल्कुल अलग था।
जाने में तो वक्त का पता ही नहीं चला। शाम को एक शो करना था शो करके अगले दिन दोपहर की फ्लाइट पकड़कर दिल्ली वापिस हो लिया। लेकिन इस बार की फ्लाइट में कोई दिक्कत नहीं हुई। ऊपर ऐसा लग रहा था कि जैसे सड़क सुधार दी गई हैं जो भी ऊबड़-खाबड़ रास्ते थे वो पाट दिए गए हैं। लेकिन जैसे ही दिल्ली के करीब पहुंचे और उतरने के लिए उदघोषणा हुई सब ने तैयारी कर ली पर ये क्या, प्लेन तो हवा में ही उड़ा जा रहा है। क्या हुआ कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं। कैप्टन ने बताया कि अभी नीचे ट्रैफिक है तो इंतजार कीजिए। अब लगा प्लेन राउंड-राउंड घूमने और यहां मेरी हालत खराब होने लगी। उस समय ऊंचाई ज्यादा नहीं थी और लेफ्ट साइड पूरी तरफ झुक जाती तो लगता कि अब गिरे और तब। जब कोई हवाई यात्रा के सफर पर जाता था और उसके साथ ऐसी कोई घटना होती थी तो हम बहुत चहकते हुए कहते थे कि पैसे तो दो घंटे के लिए दिए थे और ढ़ाई घंटे की मौज ली है, मजा बहुत आया होगा। अब पता चलता है कि क्या हालत होती है जब हवा में अटके रहते हैं तो। 15 मिनट के बाद हमारी फ्लाइट नीचे उतर गई पर अंतरराष्ट्रीय रनवे पर। और वहां से घरेलू रनवे तक हम विमान में दौड़ते हुए आए जिसकी गति लगभग 30 कि.मी. थी।
पर जो कुछ भी था फ्लाइट में आनंद आ गया बस एक बात थी कि बाईं तरफ प्लेन जब झुकता है तो कलेजा मुंह को आता है।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, January 7, 2009

वो सफर, जो मुझे हमेशा याद रहेगा। मेरी पहली हवाई यात्रा।

मेरी पहली हवाई यात्रा कुछ ऐसी रही जिसकी कल्पना भी मैं नहीं कर सकता था और वो हो भी गई यूं ही अचानक। अभी हाल फिलहाल में ही मुंबई हमले के बाद जब कि ये खबर आ रही थी कि अब आतंकवादियों के निशाने पर है एयर रूट याने कि हवा के जरिए आक्रमण। ऑफिस में काम कर रहा था कि तभी हुजूरेवाला ने आदेश के स्वर में पूछा कि कल कौन सी शिफ्ट है। यही, जो आज कर रहा हूं। तो कल तुम्हारी ये शिफ्ट नहीं है। फिर कल सुबह तुमको मुंबई जाना है अपना रिक्रुजेशन भर दो सुबह की ही फ्लाइट है। बहुत दिनों के बाद ये कुछ ऐसा फरमान था जो कि अच्छा लगा। वाह! ऐसे फरमान तो रोज आएं तो सुभानअल्लाह।
जब तक कि एयरपोर्ट के दरवाजे पर नहीं पहुंच गया तब तक मुंह कलेजे को आ रहा था। लग रहा था पता नहीं ऑफिस में कब, कौन से दोस्त रूपी दुश्मन मज़ा बेकार कर दे। क्योंकि कुछ ने तो बहुत प्रयास किए थे, पर भला हो फरमान वाले का कि उस फरमान पर कोई डोरे ना डाल सका। लेकिन कई बार तो ये लगता रहा कि पूरे दिन ये खबर चली है कि अब वायु आक्रमण ही करेंगे आतंकवादी इस लिए लगता है कि ऑफिस के वो लोग जो कि बाज कि तरह ऐसे असाइनमेंट पर नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं उन्होंने इस बार मेरे पर नजरें गड़ा दी, और मुझे बनाया है बलि का बकरा। लगातार जगते हुए मुझे करीब २२ घंटे हो चुके थे साथ ही इस सोच के बावजूद मेरी आंखों में नींद का नामो निशान नहीं था। लगातार जगते हुए मुझे करीब २२ घंटे हो चुके थे पर इस खुशी के आगे आंखों में नींद का नामो निशान नहीं था।
दिल्ली एयरपोर्ट पर जैसे ही गाड़ी ने छोड़ा तो लगा कि अब तो पहली बार हवाई यात्रा हो ही जाएगी। लेकिन परेशानी ये थी कि इस से पहले मैं कभी भी एयरपोर्ट नहीं आया था। दो-चार बार दोस्तों को छोड़ने आया था तो बस ये पता था कि यहां पर छोड़ते हैं और इस जगह के आगे आप नहीं जा सकते। मैंने एक हाथ में टिकट रख लिया और गेट पर पहुंचा और लाइन में लग गया। एक सिक्योरिटी गार्ड ने मेरे हाथ में ई-टिकट देखकर उसने कहा कि आप चाहें तो वहां(दूसरे गेट) से भी एंट्री कर सकते हैं। मैं उस राह हो लिया। मेरा आईडी कार्ड और टिकट चैक करने के बाद मैंने पहली बार किसी भी एयरपोर्ट पर पहली बार कदम रखा।
अंदर तो मैं आ गया था पर सबसे बड़ी बात ये लग रही थी कि अब आगे क्या। क्या करना हैं, मुझे कहां जाना होगा? कुछ भी तो पता नहीं था, पर सुना था कि कोई बोर्डिंग पास लेना होता है सिर्फ इस टिकट से काम नहीं चलता। पर ये मिलेगा कहां? तो देखा कि सामान की चैकिंग भी हो रही थी। तो क्या पहले सामान की चैकिंग करवाऊं या कि बोर्डिंग पास लूं। दिमाग का फैसला था कि टिकट ले लिया जाए। वहीं पास में एंट्री काउंटर था जहां पर मैंने पूछा कि क्या ये एयर इंडिया का काउंटर है तो उन्होंने कहा कि पहले आप को यहां से टिकट पर स्टैंप लगवानी होगी फिर आप को वहां जाना होगा और उसका काउंटर वो है किसी में भी लाइन में लग जाइए। वहां से निकलकर बोर्डिंग पास की राह पर चल दिया। इस के बाद मैंने सामान की को रखवाना ही उचित समझा। सामान जहां पर कि बैंड लग रहे थे जैसे पहुंचा तो उसने कहा कि नहीं आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं क्योंकि इसे हम हैंडबैग की तरह ही समझते हैं। ओ.के.। अब बोर्डिंग पास काउंटर की तरफ मैं बढ़ गया, तो किस लाइन में लगूं इकॉनमी या फिर बिजनेस क्लास में? इस ई-टिकट पर तो कुछ भी नहीं लिखा। या कुछ इनीसिएल बनें हों तो मुझे पता नहीं। लाइन में दो शख्स ही थे तुरंत मेरा नंबर आ गया। लेकिन हैंड बैग पर उस शख्स को मैंने एक कार्ड सा लगाते हुए देखा जो कि एयर इंडिया का ही था। मैंने भी उसे अपने बैग के साथ लटका लिया। तुरंत बोर्डिंग पास मिल गया। अब तो मेरा जाना पक्का हो ही गया। काउंटर पर ही बता दिया गया था कि वहां से एंट्री होगी। एक लाइन थी मैं भी लग गया। तुरंत चार-पांच आदमी लाइन से चैक होते-होते वहां पर बढ़े जा रहे थे जहां पर कि हैंड बैग चैक किये जा रहे थे। ये गार्ड सिर्फ आईडी प्रुफ और बोर्डिंग पास चैक कर रहे थे। मेरे आईकार्ड और बोर्डिंग पास चैक होगया और जैसे ही मैंने आगे बढ़ने की कोशिश की तभी मुझे एक गार्ड ने रोक दिया।
मुझे लगा कि जरूर से ही कोई बात होगी। पता चला कि नहीं आगे वालों की चैकिंग नहीं हुई है तो मुझे और मेरे पीछे की जनता को रोक दिया गया। मैं देख रहा था कि एक ट्रे में सब मोबाइल और पर्स तक निकाल के रख रहे हैं साथ ही जैकेट भी। मैंने भी पूरी तैयारी कर ली। जैसे ही आगे जाने का आदेश हुआ तुरंत सब चीजें ऐसे रखी जैसे कि रोज आना जाना लगा रहता है, साथ में बैग भी रख दिया। मशीन के अंदर से चैक होता बैग आगे गया। साथ ही मेरे को भी एक ऑफिसर ने चैक किया बारिकी से फिर मैं आगे बढ़ गया। अब सब चैक पूरे हो चुके थे और जो मैंने बैग में कार्ड लटकाया था उस पर सिक्योरिटी चैक की मुहर भी लग चुकी थी। फिर वही समस्या कि जाना कहां है याने कि अब क्या?
देखा कुछ लोगों को एक महिला बड़े ही प्यार से बात करते हुए साथ ही खड़े पुरुष महोदय चैकिंग करते हुए बैग पर लटके उस कार्ड और बोर्डिंग पास की उन्हें आगे भेज रहे थे। लेकिन आगे कहां? अरे वहां पर खड़े हैं विमान तो! ओह हो! मतलब कि चलो जल्दी से लघुशंका भी जाना है हरदम गलत समय पर ही लगती है। मैं हीरो की तरह उस दरवाजे की तरफ बढ़ा। महिला को कार्ड दिखाया तो महिला ने देखा और मुझे दिशा निर्देश देते हुए बताया कि आपको मुंबई के लिए प्लीज उस गेट से जाना होगा। मैं इतने देर में समझ चुका था कि मामला कुछ गड़बड़ है और साथ ही ऊपर लगे प्लाजमा में इस फ्लाइट का नंबर भी नहीं था। ओह हो मुंबई के लिए वो काउंटर है ओ. के.। थैंक्स। कहते हुए मैं आगे बढ़ गया। उस काउंटर पर जैसे ही पहुंचा मेरा सभी सुरक्षा तंत्रों को चैक करने के बाद उस मोटे से आदमी ने मुझे अंदर जाने कि इजाजत दे दी। मैं ये ही सोच रहा था कि बैंगलोर जाने वालों की अगवानी के लिए महिला और मुंबई जाने वालों के लिए ये भैंसा, सांड। इसी सोच में वहां खड़ी बस निकल गई। लगा कि अब तो फ्लाइट जरूर से छूट जाएगी। अब इतनी विशाल जगह पर अपने प्लेन को कहां ढूंढूंगा।
जारी है...
हमें तो आदत रही है ट्रेन और बस की। जहां पर आप खुद के जिम्मेदार स्वंय हैं। यदि गाड़ी छूटी तो टिकट बेकार। पर प्लेन के सफर में ऐसा नहीं होता। ये बात हमको बाद में पता चली कि बोर्डिंग पास लेने के बाद तो ये एयरलाइंस की जिम्मेदारी बन जाती है कि वो हमें पुकार लगा-लगा के बुलाए और हमें बैठाए। पर हम जैसे अनाड़ी की हालत उस पैसेंजर बस के छूटने के बाद क्या हुई और हवाई सफर आखिर कटा कैसा। अपने तमाम अनुभव अगली पोस्ट में।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, December 21, 2008

मांग करने वालों की तादाद बढ़ी तो अब सबकी जुबान चुप क्यों?

बिना तथ्यों के बात करना गलत होता है, यदि तथ्य हैं तो बेहतर हो कि उजागर भी हों। अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं वो पुराने तथ्यों से कुछ अलग हैं। जो पुराने तथ्य सामने आए थे वो ये थे कि करकरे, सालस्कर, काम्टे और साथ में बैठे तीनों सिपाही जब शहीद हुए तो उनके पास टाइम ही नहीं था कि वो आतंकवादियों की गोली का जवाब दे पाते। साथ ही तीनों अधिकारियों को पीछे की तरफ से गोली मारी गई थी। सबकुछ इतना अचानक हो गया कि किसी को भी पता नहीं चल सका था कि क्या हुआ। 27 की रात 1 बजे के करीब जब ये ख़बर आई थी कि हमारे तीन आला अधिकारियों को गोली लग गई है जिसमें से करकरे को ताज के पास और सालस्कर, काम्टे को कामा के पास गोली लगी है। पर थोड़ी देर बाद ये दुखद समाचार आया कि करकरे नहीं रहे, पर ये क्या सालस्कर भी नहीं रहे, और तीसरा फ्लैश था कि काम्टे भी शहीद। मुंबई के साथ-साथ पूरा देश आतंकित हो गया। हेमंत करकरे का नाम हर दिन सुनने को आ रहा था कारण था साध्वी का। तो फिर एकदम से खबर आना कि आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला कर दिया है और इन आतंकियों ने हमारे तीन आला अधिकारियों को मार दिया है तो ख़ौफ़ की बात तो थी ही। क्या आतंकवादी इतने ताकतवर होकर आए हैं कि पूरे मुंबई को कब्जे में कर लेंगे। फिर एक घंटे बाद ही ये साफ हो गया कि तीनों अधिकारी कामा के पास शहीद हुए। लेकिन जिस क्वालिस में करकरे थे उस क्वालिस में सिर्फ एक सिपाही घायल अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहा था। अभी तक जो भी सच सामने आया है वो है खुद जाधव की जुबानी। जो भी हमने जाना है वो हमें जाधव ने बताया है। उस में ही ये सच सामने आया कि उस क्वालिस में किसी ने भी बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहन रखी थी। दूसरी बात जो सामने आई थी वो ये कि इतना मौका किसी के पास भी नहीं था कि कोई संभल कर आतंकवादियों का जवाब दे पाता।
पर अब, जो बात सामने आ रही है वो है कसाब की जुबानी। अजमल आमिर कसाब वो आतंकवादी, जो मुंबई में कहर बरपाने वाले देहश्तगर्द गुट का सदस्य था। कसाब को गिरगांव चौपाटी से जिंदा धर दबोचा गया था और इसका साथी इस्माइल मारा गया था। इन्हीं दोनों आतंकवादियों ने अधिकारियों को मारा और फिर इन्हीं की गाड़ी लेकर गिरगांव चौपाटी भाग निकले। अब कसाब का इकबाले जुर्म सामने आया है। कसाब का बयान जो सामने आया है वो बिल्कुल अलग है। आतंकवादी कसाब के मुताबिक जब वो कामा में क़हर बरपाने के बाद जैसे ही कामा से बाहर निकले तो पुलिस से उनका सामना हुआ। एके 47 का मुंह उन्होंने पुलिस पर खोल दिया। तभी वहां पर दूर से पुलिस की गाड़ियां भी आती दिखाई दी। पहली गाड़ी कामा के पीछे वाले गेट से आगे वाले गेट की तरफ बढ़ गई। थोड़े फासले से आती दूसरी गाड़ी पीछे वाले गेट के पास धीरे हो गई। धीरे होते के साथ क्वालिस में आगे की सीट पर बैठे पुलिसवाले ने उन्हें पहचान लिया था जिसके हाथ में एक 47 थी। गाड़ी रुकते के साथ ही पुलिस ने फायर खोल दिया। गोली कसाब के हाथ को चीरते हुए निकल गई। तभी इस्माइल ने गोलियां चलानी शुरू कर दी और सभी के सभी पुलिसवालों को मार दिया। तीन शव को गाड़ी से बाहर फेंक कर वो गाड़ी से मुंबई में ख़ौफ़ का क़हर, बरपाते हुए चले गए और गिरगांव चौपाटी पर पकड़े गए।
लेकिन यहीं पर बात जो सामने आती है वो है कि दो अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। ये बात भी सामने आ रही है कि ये दोनों छिपे हुए थे और जिस जगह पर छिपे थे वो गाड़ी के बांयी ओर थी और जो गोलियां अधिकारियों को लगी हैं वो दाहिने तरफ लगी हैं। जब आतंकवादी बांयी तरफ थे तो दायीं तरफ से और पीछे से गोली कैसे चली। मान लिया चलगई पता नहीं कैसे चल गई, कहां से चल गई। लेकिन हेमंत करकरे की बुलेट प्रूफ जैकेट कहां है? जब करकरे की मौत की खबर आई तो नरीमन हाउस में इस ख़बर का तालियों से स्वागत किया गया।
दूसरी बात कि हेमंत करकरे के सीने में तीन गोली लगी जब गोली पीछे से चलाई गईं तो गोली सीने में कैसे लगी? सीएसटी पर जब वो मोर्चा लेने के लिए निकले थे तो उन्होंने बुलेटप्रूफ जैकेट और साथ ही हेल्मेट भी लगा रखा था तो फिर उन्होंने ये उतार क्यों दिया? क्या हेमंत करकरे जैसे सीनियर ऑफिसर इस आतंकवादी घटना को कम आंक रहे थे। या कि फिर ओवर कॉनफिडेंस ने इन आतंकवादियों को इतना मौका दे दिया कि हमने देश का सच्चा सिपाही खो दिया। वो सिपाही जो कि देश को आने वाले दिनों में एक ऐसे सच से रूबरू कराने वाला था जो कि अभी तक भारत के इतिहास में नहीं हुआ था। जिसके कारण वो पूरे देश का दुश्मन बन गया था।
सालस्कर को भी गोली दाहिने तरफ ही लगी है। तो क्या इन दोनों थ्यौरियों में कुछ लोच है या फिर असलियत अभी आना बाकी है। मैं कसाब की थ्यौरी को तबज्जो नहीं देता लेकिन जाधव की भी बात कहीं ना कहीं अधुरी लगती है। जांच की मांग जो की जा रही है वो इन्हीं तथ्यों के कारण की जा रही है। पूरा देश ये मानता है कि तीनों ऑफिसर हमारे नगीना थे, अभी मुंबई को इनकी जरूरत थी शायद देश को भी, पर कुछ हैं जो कि मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। वो इस शहीद को खोने के हमारे ग़म को भी हमारा नहीं होने देना चाहते। अंतुले के बाद कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी है, साथ ही हर दिन कोई ना कोई इस जांच को कराने की वकालत कर रहा है तो फिर कुछ चुनिंदा लोग जांच क्यों नहीं होने देना चाहते। क्या कुछ पर्दे के पीछे है जो कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते की सामने आए?

आपका अपना
नीतीश राज

सबूत पे सबूत मांगते हो, कार्रवाई करोगे या फिर...।

सबूत, सबूत, सबूत, सबूत मांगता है पाकिस्तान। कितने सबूत चाहिए पाकिस्तान को और किस बात के सबूत चाहिए। अब क्या आकाशवाणी होगी कि पाकिस्तान ही है जिम्मेदार। वो ही है मुंबई के २०० लोगों का हत्यारा और करोड़ों लोगों के दिल को दुखाने और दहशत भरने का जिम्मेदार। क़ातिल ने खुद मान लिया कि हां मैंने ही क़त्ल किया है। करोड़ों लोगों के सामने उसने नरसंहार किया। ऐसा नहीं कि तुम(पाक) नहीं देख रहे थे उस हत्याकांड को। पाक को भी पता चल रहा था कि हां ये उनके ही आदमी है लेकिन कबूल कर तो वो सकता ही नहीं।
मुंबई हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को सबूत दिए साथ ही २० मोस्ट वांटेड लोगों की लिस्ट भी थमा दी। पाक ने तुरंत इस बात से मना कर दिया कि उनके देश में मोस्ट वांटेड नहीं हैं। साथ ही यदि होंगे भी तो हम भारत को नहीं सौपेंगे, जो भी करना होगा हम पाकिस्तान की अदालत में ही करेंगे। मतलब उनका भी साफ था कि पाकिस्तान फिर से अंग्रेजों के शासनकाल में लौट जाएगा जहां पर हर कानून उनका अपना होता था, जज से लेकर पैरोकार तक। भारत ने वो ही सबूत यूएन के पास भी भेजे थे। यूएन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए तुरंत पाक को आगाह किया और पाक के एक आतंकवादी संगठन पर कार्रवाई होगई। फिर पाक किस बात के सबूत मांग रहा है। जब एक तरफ तो हमारे दिए हुए सबूत पर कार्रवाई कर रहा है तो फिर किस बात के सबूत।
दूसरी तरफ जब कसाब ने ये खुद कबूल किया है कि वो पाकिस्तानी है और साथ ही पाक के फरीदकोट का रहने वाला है तो फिर भी पाकिस्तान को भरोसा नहीं हो रहा है। चलो भई कसाब को हमने और हमारी पुलिस ने खूब पीटा और फिर उससे जबर्दस्ती ये लिखवाया और बुलवाया जा रहा है तो चलो कसाब की बात भी छोड़ देते हैं।
पाकिस्तान के फरीदकोट का रहने वाला एक शख्स जो कि अपना नाम आमिर बताता है उसने बोला है कि टीवी पर दिखलाए जाने वाला आतंकवादी जिसने की मुंबई में नरसंहार किया वो उसका ही बेटा है। उस पिता ने तो यहां तक कहा कि वो कई दिन तक ये सोचते रहे कि कैसे कबूल करें कि अजमल आमिर कसाब उनकी ही औलाद है।
फरीदकोट के इस शख्स को रातों रात कहां गायब कर दिया जाता है कि पता ही नहीं चलता। दूसरी तरफ बीबीसी के संवाददाता जब वहां जाकर तहकीकात करता है तो उसे कसाब के घर सादी ड्रेस में पुलिस का पहरा दिखता है। पुलिस का पहरा क्यों? कोई जवाब देने के लिए। फिर उस रिपोर्टर को वहां से चले जाने के लिए कहा जाता है।
पाकिस्तान का नेशनल टीवी डॉन, एक स्टिंग ऑपरेशन करता है वो भी कसाब के गांव का। कैमरे पर तो नहीं पर हिडन कैमरे पर सभी लोगों ने कसाब की असलियत खोल दी।
अब पाकिस्तान की दो ऐसी शख्सियत ये बोल रही हैं कि अजमल आमिर कसाब पाकिस्तानी है। नवाज शरीफ ने एक पाक टीवी को दिए इंटरव्यू में ये साफ साफ कह दिया कि कसाब पाकिस्तानी है और जरदारी इस सच को सामने आने देना नहीं चाहते। साथ ही पाकिस्तान में इस सच को कबूल करने वाले तो बहुत मिल जाएंगे लेकिन सामने लाने वाला नहीं। नवाज शरीफ ने ये भी कहा कि खुद नवाज ने इस बात का पता लगाया है कि फरीदकोट का ही रहने वाला है कसाब और उसका परिवार भी वहीं रहता है और साथ ही उसके परिवार पर हर समय पेहरा है। सीधे उन्होंने ये बात कही है कि यदि कसाब पाकिस्तानी नहीं है तो फरीदकोट में इतनी सुरक्षा क्यों है।
अब पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की अध्यक्ष असमा जहांगीर ने ये माना है कि पाकिस्तान का ही है कसाब। साथ ही उन्होंने ये भी माना कि बेहतर हो कि पाकिस्तान सीधे-सीधे इस बात को मान ले और फिर क्या अब भी सबूत की जरूरत है पाकिस्तान को, ये असमा जहांगीर ने कहा।
पाकिस्तान और पाक मीडिया इस बात को कहीं और से जोड़ कर देख रहे हैं। पाक के मैरियट होटल को उड़ाने के अंदाजे से आरडीएक्स से भरा ट्रक होटल से टक्करा दिया जाता है वहां पर इस बात को भारत की तरफ से कार्रवाई माना जा रहा है। पाक मीडिया और विश्लेषक भी जरदारी राग अलापने में लगे हुए हैं। भारत को इस बार कड़ा कदम उठाना होगा।
कहीं से भी छोटी से भूल भारत-पाक को युद्ध की ओर लेजा सकती है। दोनों देशों को बचाना तो इस युद्ध से ही है क्योंकि अलगाववादी ये ही तो चाहते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, December 18, 2008

करकरे की शहादत पर सवाल नहीं पर मौत की जांच तो होनी ही चाहिए, क्या गलत कहा है अंतुले ने।

कई बार लगता है कि आग शांत होने की राह तकती रहती है लेकिन कुछ उस आग में घी डालकर उसे जलाए रखना चाहते हैं। चाहे किसी वजह से भी। कुछ घाव ऐसे होते हैं जो कि समय के साथ भर जाते हैं लेकिन अपने निशान छोड़ जाते हैं, पर कुछ घाव ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार-बार छेड़ा जाता है, कचोटा जाता है, लेकिन बार-बार क्यों छेड़ा जाता है उन घावों को? क्योंकि वो घाव नासूर की शक्ल इखित्यार कर ले।
कुछ लोगों को शायद शहीदों की शहादत पर सवालिया निशान लगाने की आदत से हो गई है। पहले इंस्पेक्टर शर्मा की शहादत पर उठाए गए थे सवाल, तब भी बहुत बखेड़ा हुआ था। कुछ लोगों ने तो उस दिल्ली के बाटला एनकाउंटर तक को फर्जी करार दे दिया था। कुछ ने तो यहां तक कह दिया था कि खुद पुलिस की गोली का शिकार हुए थे इंस्पेक्टर शर्मा। फिर अब आवाज़ उठने लगी है कि शहीद करकरे क्या वाकई में शहीद हुए हैं? क्या इस बार मुंबई पर हुए हमले को भी कुछ लोग फर्जी करार देंगे, जहां पर 200 लोग मारे गए।
शायद कुछ लोग शहीद हेमंत करकरे के नाम के साथ जुड़े इस शहीद तमगे को पचा नहीं पा रहे हैं। तभी तो कोई ना कोई इस शहीद की शहादत पर सवालिया निशान जरूर लगा देता है।
अब की बार बारी है केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले की। बिना तोल के बोलकर फंस गए अंतुले। अंतुले ने हेमंत करकरे पर कहा कि ‘उन्हें आतंकवादियों ने मारा या फिर किसी और ने’। जब मामला उठा तो अंतुले ने लोकसभा में जरा तोल कर जवाब दिया 'मैंने कहा था कि बजाए इसके कि करकरे, काम्टे, सालस्कर समेत एटीएस दल ताज होटल या ओबेराय भेजा जाता, उन्हें कामा अस्पताल भेजा गया। इन जवां मर्दों को एक ही गाड़ी में सवार होकर कामा अस्पताल जाने का निर्देश किसने दिया इस मामले की जांच कराने के बारे में मैंने कहा था।'
मैं नहीं जानता कि कितने लोग गलत समय पर दिए अंतुले के इस बयान से इत्तेफाक रखते होंगे।
अंतुले के इस बयान से पर मैं तो पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूं।

जांच जरूर होनी चाहिए। ये कोई माखौल नहीं था कि तीन आला अफसर हम लोगों ने यूं ही गवां दिए। मैं पूछता हूं आज हम बार-बार कह रहे हैं कि हेमंत करकरे, सालस्कर और काम्टे शहीद हुए, पर क्या उन तीनों में से किसी को भी इतना मौका मिला था कि वो अपनी आत्मरक्षा में गोली चला पाएं। क्या सच मायने में वो शहीद हुए हैं। शहीद का दर्जा तो हम उनको देते हैं जो कि दुश्मन से लड़ते हुए, टक्कर लेते हुए दुश्मन की गोली से मारा जाए ना कि सरकार, प्रशासन और डिपार्टमेंट की बेवकूफी से।
जम्मू-कश्मीर में हर दो-चार दिन में एक जवान शहीद हो जाता है। शायद ही किसी को ये पता चलता हो कि कोई शहीद हो गया। ना कोई इनाम ना कोई पोस्टर ना कोई तमगा। फिर भी हर रोज उसी मुस्तैदी के साथ सभी जवान डटे रहते हैं।

२६ नवंबर की वो काली रात को जब आतंकवादियों ने सीएसटी पर क़हर बरपाया था और कुछ पुलिसकर्मी उनसे लोहा ले रहे थे और उन बेचारों की खुटल, जंग खाई बंदूक ठस हो गई थी तो उन सिपाहियों को वहां से भागना पड़ा था। कुछ लोगों ने इन सिपाहियों को भगोड़ा कहा था लेकिन मैं इन को हीरो कहता हूं। जब आतंकवादी इन पर गोलियां बरसा रहे थे तो आसपास की दीवारों से धुआं उठ रहा था तब भी काफी देर तक ये डटे रहे। सलाम करता हूं उस सिपाहियों को। तब कहीं ये खबर हेमंत करकरे, सालस्कर और अशाक काम्टे के पास पहुंची थी। पहले भी मुंबई की लाइफ लाइन माने जाने वाली लोकल ट्रेन पर हमले हो चुके हैं तो सभी के सभी इस बात को ध्यान में रखते हुए सीएसटी की तरफ भागे।
अंतिम बार वीडियो में हम सबने हेमंत करकरे को सीएसटी पर ही देखा था। तब ध्यान होगा सबको कि उस समय उन्होंने आसमानी शर्ट पर हेल्मेट लगा रखा था। साथ ही एक सिपाही ने उनके हाथ में बंदूक दी थी। तब सबसे पहले मेरे दिमाग में ख्याल आया था कि कहीं शर्मा की तरह ये भी बुलेटप्रूफ जैकेट ना पहन के जाएं। पर थोड़ी देर बाद कुछ सिपाहियों के साथ करकरे को फ्रंट पर जाते देखा था। सीएसटी के अंदर कुछ सिपाहियों के साथ जाते देखा था। याने कि एक बात तो सही है कि वो मुकाबला करने के लिए ही उस जगह पर गए थे। पर जाते समय उनके शरीर पर जो था वो था दंगा निरोधक दस्ता का बुलेट प्रूफ या कहें कि लाठी प्रूफ जैकेट जिसे की बाद में खुद पुलिस के आला अफसरों ने माना है।
तभी पता चलता है कि आतंकवादी सीएसटी छोड़ चुके हैं और कामा अस्पताल की तरफ गए हैं और सदानंद दाते कामा पर घायल हो गए हैं और मैट्रो के पास से भी गोलियों की आवाज़ें सुनी गई हैं। हेमंत करकरे अपने ड्राइवर के साथ कामा की तरफ कूच करने के लिए निकलने लगे। पर तभी सालस्कर और काम्टे भी वहां पहुंच गए। फिर तीनों के तीनों एक साथ कामा की तरफ चल दिए। पर इस बार गाड़ी की कमान खुद सालस्कर ने संभाल रखी थी। आगे की सीट पर सालस्कर के साथ काम्टे बैठे थे और क्वालिस की बीच की सीट पर हेमंत करकरे बैठे हुए थे और पीछे की सीट पर ड्राइवर के साथ चार सिपाही जिसमें जाधव भी थे। पर निकलते वक्त सभी ने बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं पहने हुए थी शायद सब ने सीएसटी पर ही छोड़ दी, क्यों। बीच-बीच में पुलिस की ये क्वालिस रुकते हुए सिपाहियों और लोगों से पूछते हुए आगे बढ़ रही थी कामा अस्पताल के पास सदानंद को की मदद के लिए ये तीनों वहां आए थे। गाड़ी रुकती है तभी पेड़ के पीछे से दो आतंकवादी कसाब और इस्माइल निकले और क्वालिस पर अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे। कुछ पल में ही मुंबई ने अपने तीनों अफसर खो दिए। साथ ही तीन सिपाही भी एक सिपाही जाधव घायल अवस्था में क्वालिस में ही पड़े मिले। जब तक कि पुलिस ने वहां आकर सभी को अस्पताल नहीं पहुंचाया, अस्पताल में जाधव का इलाज चलने लगा लेकिन उनके साहब शहीद हो चुके थे। पर सवाल यहीं खड़े होते हैं कि इन आतंकियों का मकसद क्या था। क्या वो बिना किसी मकसद के भारत में आतंक फैलाने के लिए आए थे। क्या वो विदेशियों पर हमला करने आए थे। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में हमारी नाक नीचे करने के लिए आए थे। क्या करने आए थे वो यहां पर। क्या और कोई भी कारण हमें समझ में नहीं आता। ताज होटल, ओबेराय होटल समझ में आता है कि वहां पर विदेशी थे और साथ ही वो मुंबई की पहचान है, सीएसटी, नरीमन भी समझ में आते हैं। पर क्या कारण था कि कामा, मैट्रो और पुलिस मुख्यालय की पास की जगह को क्यों निशाना बनाया गया। जहां पर विदेशी ढूंढे से भी नहीं मिलेंगे। कोई बताए फिर उस पर ही निशाना क्यों?
२५ नवंबर को पुणे के एक पुलिस थाने में एक फोन कॉल आता है जो कि मराठी में बोलता है कि हेमंत करकरे को दो-तीन दिन में बम ब्लास्ट में जान से मार देंगे। अगले दिन वो मार भी दिए जाते हैं। क्या इस की जांच नहीं होनी चाहिए कहीं कोई हमारे देश में ही गद्दार तो नहीं। लेकिन एक बात तो सारी दुनिया मानेगी कि वो आतंकवादियों से मुकाबला करने के लिए ही गए थे पर ये उनकी किस्मत ही थी कि मुंबई के तीन आला पुलिस अधिकारी बिना किसी को आघात पहुंचाए उन आतंकवादियों के घात लग गए। पर उन तीनों से शहीद का तमगा आने वाले कल में भी कोई नहीं छीन पाएगा वो फ्रंट पर ही शहीद हुए हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, December 3, 2008

इजरायली अपने लोगों का शव बिना पोस्टमार्टम के ले गए, लेकिन हमले का तो हमें पोस्टमार्टम करना होगा।

मुंबई धमाकों को क्या कोई याद रखना चाहेगा? शायद नहीं, ये वो डरावनी हकीकत है जिसे दोबारा कोई नहीं देखना चाहेगा। लेकिन यदि हम चाहते हैं कि ये दोबारा हमारे देश के साथ नहीं हो तो इस घाव को हमें हमेशा याद रखना होगा। जहां तक मेरा मानना है कि ये पहली बार है कि हम हारे हैं और आतंकवादी जीते हैं। वो जो करने आए थे वो उससे ज्यादा कर गए। अब तक वो छुप कर हमला करते थे। श्रीनगर, घाटी के तर्ज पर इस बार फिदाइन हमला किया गया। हर बार वो छुपकर वार करते थे इस बार अपना दस्ता भेजकर, बिना चेहरा छुपाए, चेहरे पर कोइ नकाब नहीं, चेहरा दिखाकर हमला किया। २००२ अक्षरधाम सबको याद ही होगा, ऐसे वाक्ये बहुत ही कम हैं। हम इस हमले को गर भूल गए तो याद रखिए कि फिर आतंकवाद पलट कर आएगा और वार होगा हमारे नासूर बन चुके घाव पर।

कैसे घुसे आतंकवादी ?

सब जानते हैं कि कहीं तो चूक हुई है पर ये चूक हुई किस-किस मोड़ पर है। तो लगता है कि शुरू से लेकर आखिर तक हर मोड़ पर सिर्फ हमारी ही गलती है। थ्यौरी तो कई सामने आ रही हैं पर जिस पर विश्वास करना पड़ेगा वो है जो कि पुलिस ने अपने आप को बचाने कि लिए दी है। पकिस्तान के कराची में पहले १० आतंकवादी इकट्ठा हुए, फिर समुद्री रास्ते के जरिए भारतीय सीमा पर एक जहाज को अगवा कर के मुंबई पहुंचे और फिर टैक्सियों में भरकर दो-दो के गुट में ५ जगह अपने-अपने मुकाम की तरफ चल दिए।
पर पेंच तो यही आता है कि पहले तो कराची से मुंबई आने के लिए पानी के रास्ते ४ दिन का समय लगता है। क्या इन चार दिन के अंदर खुफिया सूत्रों को एक बार भी ये पता नहीं चला कि समंदर के रास्ते पर कुछ हलचल है। एक जहाज को कब्जे में किया जाता है जिस का नाम कुबेर बताया गया। पुलिस ने जहाज पर मौजूद अमर सिंह टंडेल का रिकॉर्ड पहले से अच्छा नहीं माना है। ये जानकारी भी है कि गैरकानूनी काम के चलते अमर सिंह टंडेल को १ साल की कैद पाक में काटनी पड़ी थी। क्या ऐसे लोगों पर हमेशा नजर नहीं रखनी चाहिए थी। हो सकता है कि अमर सिंह टंडेल भी उनसे मिला हुआ हो और भारत तक लाने का जिम्मा उसका ही हो पर जैसे ही वो भारत की सीमा में पहुंचे उन्होंने टंडेल को मार दिया। समुद्री रास्ते से आगाह करती यूपी पुलिस की वो रिपोर्ट कहां है? कोई पूछे इंटेलिजेंस, रॉ, राज्य सरकार, सीबीआई से। ये तो सच है कि वो सब आए समुद्र के रास्ते से ही थे। जिसे हमारे गृहराज्यमंत्री जायसवाल और महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्यमंत्री समुद्री रास्ते से हुई चूक को अपनी गलती मान चुके हैं। लेकिन जब पता था कि समुद्री रास्ते पर सुरक्षा कमजोर है तो फिर क्या वहां पर ध्यान नहीं देना चाहिए था। अब ध्यान देत क्या होत जब आतंकी कर गए २०० ढेर।

कितने थे आतंकवादी ?

गुमराह करने की कोशिश है कि वो सिर्फ १० आतंकवादी ही थे। ये मैं नहीं मानता कि वो १० थे। माना कि वो समुद्र के रास्ते से आए थे और मान लें कि आए भी १० ही हों पर आतंकवादी १० नहीं थे। कुछ पहले से ही मुंबई में उनका रास्ता देख रहे थे। वहीं दूसरी तरफ, जिस जहाज को उन्होंने अगवा किया था, कुबेर को, उसमें से १५ जैकेट मिले हैं। पुलिस ने ये पहले कहा था कि शायद कुछ लोग बच कर निकल गए हों। पर अब पुलिस ने ये कह दिया है कि सिर्फ १० जैकेट ही मिले हैं क्योंकि वो भी लोगों को दहशत में नहीं रखना चाहती। जब कि पब्लिक ये जानती है कि मुंबई की धरती पर आतंकी हैं। लेकिन सवाल ये ही उठता है कि जब जैकेट १५ मिले तो लोग घट कर १० क्यों रह गए? आनन फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की जाती है और इस बात का खंडन किया जाता है कि कुबेर में सिर्फ १५ जैकेट मिले हैं। हम भी जानते हैं कि यदि ये बात फैल गई कि मुंबई या देश में ५ आतंकी घूम रहे हैं तो अफरातफरी मच जाएगी। विलासराव क्या मनमोहन की गद्दी भी ख़तरे में पड़ जाएगी।
मैं ये कतई नहीं मानता कि मुंबई में ६० घंटे तक आतंक का राज चलाने वाले सिर्फ और सिर्फ १० आतंकवादी थे। मैं अपने कमांडो फोर्स को इतना कमजोर या हमारी पुलिस की तरह निकम्मा नहीं मानता। कमांडो कह रहे थे कि इन आतंकवादियों को पूरे होटल का लेयआउट पता था। किस फ्लोर पर कितने कमरे हैं, हर कमरे के पास क्या है, वो यहां से गोली चलाते जब तक हम घूम कर देखते तो दूसरे पल तीसरे फ्लोर से फायरिंग होने लगती, हम अपनी निगाह वहां गड़ाते तो वो छठे फ्लोर से फायरिंग करने लगते, फिर ५वें से, फिर पहले तक से फायरिंग करने लगते और फिर ग्रेनेड हमला। उन आतंकियों को होटल के चप्पे-चप्पे के बारे में पता था और ये मैं शर्त के साथ कह सकता हूं कि ताज को सिर्फ और सिर्फ ४ आतंकवादियों ने अपने कब्जे में नहीं किया। वो भी दो आतंकी बाद में आए उस से पहले तक वो दो आतंकी मुंबई में कोहराम मचा रहे थे। २७ की रात जब ओबरॉय पर कार्रवाई की जा रही थी तब ये खबर आने लगी कि ताज में सिर्फ एक आतंकी बाकी रह गया है और वो भी घायल हालत में है। सबने सोचा था कि आज ताज को छुड़ा लिया जाएगा लेकिन अगले दिन दोपहर आते-आते तो इतनी गोलीबारी होने लगी कि लग गया कि वहां पर और भी आतंकी हैं। तो और आतंकी जब कि सेना ने पूरे ताज को घेर रखा था तब वो दो कहां से आए? जैसे कि पुलिस ने कहा कि दो आतंकी बाद में आकर पहले वाले आतंकियों से मिले।
इस बीच एक माता-पिता को फोन आता है। फोन के दूसरी तरफ होता है मौत के मुंह में झूल रहा खुद उनका बेटा। जो कि ताज होटल में इंटरनसिप कर रहा था और उसने अपनी आखरी इच्छा पूरी कर ली, मरने से पहले अपने घर फोन कर अपने घर वालों से बात कर ली। लेकिन जो जानकारी दी वो भयंकर थी, माता-पिता दोनों एक पल के लिए तो सन्न रह गए। अंतिम सांसे लेते हुए बेटा बोल रहा था कि
आतंकवादियों का हमला ताज पर हो चुका है और उसे गोली लग गई है, लेकिन गोली आतंकवादियों ने नहीं मारी, मारी तो उस शख्स ने है जो कि ताज में, हमारे साथ पिछले ५-६ महीने से इंटरनसिप (काम) कर रहा था।
तो क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि फिर वो पांचवां कहां गया? चार आतंकियों की लाश तो मिल गई तो क्या ये शख्स भाग गया या मर गया? वैसे पुलिस ने ये बात शुरू में कही थी कि नरीमन हाउस में रहने वाले दो लड़के ताज में काम करते थे फिर इस बात को किस बात के कारण से दबा दिया गया। जानता हूं क्योंकि ताज है भी बहुत बड़ा और बहुत बड़े लोग हैं।
ये बात पुलिस ने बिल्कुल सही कही है कि वो सीधे कराची से आए थे और फिर क़हर बरपाने मुंबई में फैल गए। तो, नरीमन हाउस पर ठीक उसी समय पर पांच-छह लड़कों को देखे जाने की बात थी तो वो कौन थे? क्या है किसी के पास इस का जवाब? नहीं, तो अगली पोस्ट।

जारी है...

आपका अपना
नीतीश कुमार

Tuesday, December 2, 2008

ताज..,नरीमन..,ओबरॉय..और मेरे विचार

कई दिन से सोच रहा था कि मुंबई आतंकवादी हमले पर मेरा लिखना बनता है। कई मेल भी आए अपने ब्लॉगर भाइयों के, कि इस मुद्दे पर अब तक तुम्हारे ब्लॉग की तरफ से कुछ आया ही नहीं। तो सबको बता दूं कि कुछ और प्रोजेक्ट पर लगा हुआ था और फिर जब से ये हमला हुआ है तो तब से अधिकतर वक्त ऑफिस में ही निकल जाता।
२६ को प्रगति मैदान गए थे, शाम तक घूमते-घूमते हालत ऐसी हो गई कि उस दिन फिर कुछ लिख नहीं सका। शाम को सोचा था कि प्रगति मैदान पर लचर सुरक्षा व्यवस्था पर जरूर लिखूंगा लेकिन थकान ही इतनी ज्यादा थी कि कुछ लिख नहीं पाया। साथ ही यदि आपका बॉस कान का कच्चा हो तो और भी दिक्कत होजाती है और रात में उनसे एक बात को लेकर बहस हो गई(मेरे बॉस ये जानते हैं कि मैं लिखता हूं और जब वो इसे पढ़ेंगे तब तो)। मैंने सोचा था कि २७ को इस पर कुछ लिखूंगा लेकिन मुझे क्या पता था कि २६ की रात ऐसी आपदा देश पर आएगी कि देश के साथ-साथ पूरा विश्व उस घटना से हतप्रभ सा रह जाएगा।
२६ की रात को जब तक मैंने देखा तब तक अपुष्ट खबरें आ रही थीं कि शायद ये आतंकवादी हो सकते हैं। पर लगा कि मुंबई में सुरक्षा व्यवस्था तो इतनी कमजोर नहीं रह गई है जब से कि एटीएस का निर्माण हुआ है लेकिन आतंकवादी मुंबई में हैं ये बात कुछ हजम नहीं हो रही थी। सब चैनलों पर ये चल रहा था कि दो गुट में फायरिंग हुई है। लगा कि अंडरवर्ल्ड के दो गुटों में जमकर फायरिंग हो रही है पर ये आतंकवादी नहीं हो सकते दिल नहीं मान रहा था। थोड़ी देर में पता चला कि नहीं ये तो कुछ और ही है। ये महज कुछ क्षण के लिए फायरिंग नहीं हो रही है मुंबई पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है।
सुबह मुझे देर तक सोने की आदत है, घर में सब उठ चुके थे, मैंने उठ कर सबसे पहले अपना चैनल देखा तो आंख फटी की फटी रह गई। ४ साल के बेटे ने पूछा, पापा क्या हुआ? पत्नी भी मेरे बगल में आकर बैठ गईं। हम दोनों को ऐसे बैठे देख, बेटू भी टीवी देखने लगे। फिर सवाल शुरू हुए बेटे के। लेकिन उन सवालों के जवाब मेरे पास क्या किसी के पास भी नहीं हो सकते। पापा ये स्मार्ट अंकल कौन हैं और इनके हैंड में क्या है? क्यों ये ढिसुम ढिसुम कर रहे हैं? अंकल लोग क्यों भाग रहे हैं? फिर खबरें देखते-देखते ही खाना वगैरा चलता रहा और दूसरी तरफ हमारे बेटू बार-बार ये बोलते रहे कि पापा अपना वाला चैनल चला लूं(कार्टून नेटवर्क)। लेकिन मैं मना करता रहा। बेटे ने भी ज्यादा जिद नहीं की। थोड़े समय के बाद मैं ऑफिस के लिए चला गया वहां पता चला कि २६ की रात से ही लाइव बुलेटिन चल रहे हैं। फिर तो काम करने में जुट गए। २८ की सुबह ६ बजे तक मैं ऑफिस में लाइव बुलेटिन करता रहा। रात बारह बजे लग रहा था कि ओबरॉय को छोड़कर दोनों जगहें आतंकियों के कब्जे से छुड़ा ली जाएंगी। पूरी रात नरीमन, ओबरॉय और ताज में फायरिंग होती रही, ग्रेनेड फेंकने का सिलसिला जारी रहा। ऑफिस से घर सोने के लिए फिर उठते ही वापस ऑफिस की राह। और यूं ही सुबह ६ बजे तक लाइव चलता रहता। तीन दिन कुछ यूं ही सिलसिला चलता रहा। पता नहीं चल पा रहा था कि कितने और शहीद होंगे। दुख हुआ कि करकरे, सालास्कर, शहीद होगए, पर क्या वो सच में शहीद हुए। बार-बार खबरें आती रही कि यहां से इतने हताहत हुए और वहां से संख्या बढ़ गई है। थोड़ी देरी की शांति के बाद फिर फायरिंग या ग्रेनेड हमला। इस बीच एक फैसला जरूर अच्छा हुआ कि मीडिया पर लाइव तस्वीरें दिखाने की मनाई हो गई। इस के पीछे कई लोगों ने कई बात बनाई। पर ये फैसला काफी अच्छा था। मैंने अपने सीनियर के सामने ये बात रखी थी कि कमांडो कहां पर हैं ये हमें नहीं दिखाना चाहिए। पर शायद उन्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने कुछ भी जवाब नहीं दिया, साथ ही कहा कि फिर हम दिखाएंगे क्या? और साथ ही कि दोनों होटलों के केबल कनेक्शन काट दिए गए हैं, तो उन्हें पता कैसे चलेगा। मेरा जवाब था कि फोन और सेटेलाइट फोन के जरिए। कहीं पर भी उनके आका देख रहे होंगे जो उनको इस बात की जानकारी दे रहे होंगे। लेकिन थोड़ी देर के बाद ही इस बात को मान लिया गया था। बहुत खुशी हुई जब कमांडो कार्रवाई के दौरान तीनों जगह को आजाद करा लिया गया। पर शायद बहुत देर में हमने अपना पिंड इन आतंकियों से छुड़ाया। गलती किसकी? इस बारे में सिर्फ तथ्यों के साथ अगली पोस्ट में लौटूंगा।
लेकिन ये ५-६ दिन ऐसे थे कि ना चाहते हुए भी लगा कि हमने इस बार बहुत खोया है। कई सवाल मन में उठ रहे हैं। उन सब सवालों के जवाब और उन पर उठते सवालों के साथ अगली पोस्ट में सब लिखूंगा। अभी के लिए इतना ही।


आपका अपना
नीतीश राज

Friday, November 14, 2008

"देशद्रोही पर पाबंदी कहां तक सही है"

महाराष्ट्र सरकार ने 'देशद्रोही' फिल्म की स्क्रीनिंग पर बैन लगा दिया है। देशद्रोही पूरे देश में रिलीज हो रही है पर सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं होगी। महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र सिनेमा रेगुलेशन ऐक्ट के तहत 60 दिनों के लिए फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि इस फिल्म के कारण महाराष्ट्र में तनाव फैल सकता है। मुख्य वजह जो मानी जा रही है वो हैं इस फिल्म के डॉयलग, जो कि मराठी और गैर मराठी हिंसा के मुद्दों पर रोशनी डालते हैं। फिल्म की कहानी में नफरत भी है, क्षेत्रवाद भी, राजनीति भी, एक आम इंसान का दर्द भी है, और इन सब मुद्दों के बीच मुंबई झुलस रही है। फिल्म के कई डॉयलग को सुनकर लगेगा कि वाकई ये ही काफी हैं तनाव फैलाने के लिए। लेकिन ये डॉयलग महाराष्ट्र की सच्चाई को भी बताते हैं। साथ ही साथ कुछ डॉयलग ऐसे भी हैं जो कि बताते हैं कि जो मुद्दा कुछ समय से महाराष्ट्र की जमीन पर जंग छेड़े हुए हैं वो वाकई में तो कुछ भी नहीं है सिर्फ राजनीति है। कुछ संवादों से ये भी लगता है कि दिल से दिल को मिलाने की कोशिश भी की गई है।
मुंबई जिस क्षेत्रवाद की आग में जल रही है फिल्म का एक-एक डॉयलाग उसमें नफरत का घी छिड़कता नजर आता है। यूपी से मुंबई गया एक शख्स अपने अंदाज में यूं ही बस कंडक्टर को भईया कहकर संबोधित करता है। "मुझे भईया मत कहो...तुम यूपी बिहार वालों ने मुंबई को कबूतरखाना बना दिया है" उस मराठी कंडक्टर को वो भईया गाली की तरह लगती है और उसे बस से धक्के मार कर निकाल देता है। क्या ये महाराष्ट्र का सच है?
कई संवाद तो ऐसे हैं जिनपर पहले तो सेंसर बोर्ड की तरफ से कांट छांट हो चुकी है और साथ ही एमएनएस को भी उन पर आपत्ति थी। जैसे कि--
"तुम यूपी बिहार वालों ने अनाथ आश्रम बना दिया है मुंबई को" या फिर "बस ड्राइवर कहता है, बीएसटी की जगह भईया ट्रांसपोर्ट कर देना चाहिए"।
जब से फिल्म के प्रोमो दिखने लगे तब से ही फिल्म सुर्खियां बटोरने लगी। आए दिन हर चैनल पर प्रोमो दिखने लगा। फिल्म को बनाने की लागत आई है 5 करोड़ लेकिन प्रचार में खर्च हुए हैं लगभग 7 करोड़। इस फिल्म की रिलीज पर पहले मुंबई पुलिस ने रोक लगाई। विवाद फिर भी नहीं थमा। और आखिरकार राज्य सरकार ने इस फिल्म पर रोक लगा ही दी।
वैसे इस फिल्म के निर्माता-एक्टर कमाल राशिद खान ने हर पल फिल्म के प्रोमो दिखाकर खूब भुनाने की कोशिश की है। पुलिस फिल्म देखे या सेंसर बोर्ड की आपत्ति या फिर किसी भी तरह का विरोध हर बात को पब्लिसिटी की तरह इस्तेमाल किया गया। ये फिल्म पहले से तय तारीख के मुताबिक 14 नवंबर को रिलीज होने वाली थी। निर्माता ने इसका फैसला भी कई दिन पहले ले लिया था। लेकिन देशद्रोही के प्रोमो में इसकी तारीख 7 नवंबर ही रहने दी गई। आखिर इसका भी लाभ मिलना ही था।

फिल्म पर सियासत

कमाल जानते हैं कि फ़िल्म यूपी-बिहार वालों को जम गई तो चल जाएगी। पर महाराष्ट्र सरकार की पाबंदी के बाद कमाल ख़ान महाराष्ट्र सरकार के फ़ैसले पर हैरान हैं। वो अब कोर्ट तक जाने का भी मन बना चुके हैं। फिल्म में क्षेत्र-भाषा का मुद्दा है तो कुछ राजनेता भी फ़िल्म के समर्थन में कूद पड़े हैं। आरजेडी के नेता रामकृपाल यादव फ़िल्म पर लगे बैन को लेकर महाराष्ट्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। कमाल कहते हैं कि देशद्रोही में वही दिखाने की कोशिश की गई है जो मुंबई की सच्चाई है। ये तो महज़ संयोग है कि फ़िल्म ऐसे वक़्त में रिलीज़ हो रही है जब महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक मराठी-गैरमराठी का मुद्दा तूल पकड़ चुका है।

बहती गंगा में दूसरी फिल्म भी रिलीज को तैयार

हिंदी फीचर फिल्म देशद्रोही ने महाराष्ट्र समेत पूरे देश में तहलका मचा दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में फिल्म पर पाबंदी भी लगा दी है। इसी मुद्दे पर बनी और काफी समय से लटकी रवि किशन की भोजपुरी फिल्म भूमिपुत्र भी दो हफ्तों में थियेटर्स में लग जाएगी। रवि किशन की फिल्म भूमिपुत्र के ये सीन जल्दी ही आपको टीवी पर नजर आएंगे। इस फिल्म में बेरोजगार नौजवान रविकिशन रोजी रोटी की तलाश में मुंबई आता है। यहां उसे मराठियों के गुस्से का सामना करना पड़ता है लेकिन धीरे धीरे वो मराठियों का अच्छा दोस्त बन जाता है। वैसे तो ये फिल्म सात महीने पहले ही बनकर तैयार हो चुकी थी पर निर्माता एएम खान का कहना है कि पहले माननीय राज ठाकरे का टेंशन था पर अब सब ठीक है, तो जल्द से जल्द रिलीज कर देंगे। पहले इस फिल्म का नाम भोला बजरंगी रखा गया था लेकिन जैसे ही राज ठाकरे ने भूमिपुत्र का मसला गर्म किया तो फिल्म का नाम बदलकर भूमिपुत्र कर दिया गया।

देशद्रोही ने लेकिन कई सवालों को जन्म दिया है

सबसे बड़ा और अहम सवाल ये उठता है कि जब एक क्षेत्र में आग लगी हो तो क्या ऐसी फिल्म बना कर लोगों की भावनाओं से खेलना चाहिए। राजनेता तो राजनीति करते हैं पर क्या फिल्मकारों के ये नहीं सोचना चाहिए कि वो नेता नहीं हैं। वो तो इन से अलग सोच सकते हैं। आज इस समय वो ही बात याद आ रही है कि छटाक भर की पोस्ट और किलो भर के टैग(याद तो होगा ही सबको वो विवाद)। फिल्म की लगात ५ करोड़ और प्रचार का खर्चा ७ करोड़। इतनी ही रकम लगानी थी तो अच्छे अदाकार भी ले लेते, थोड़ा लेखक को भी दे देते। ये क्या लगता है कि सारे पैसे ही डॉयलग राइटर को दे दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाकर क्या साबित करना चाहा है। राज्य में कानून व्यवस्था बनी रहे तो सिर्फ एक पक्ष से ही हर बार अपेक्षा क्यों रखी जाती है। यदि हालात बिगड़ सकने की बात सरकार मानती है तो ये क्यों नहीं मानती कि हां, विवाद बढ़ चुका है और अब ये आग किसी भी घर के चिराग को नहीं बुझाएगी।
बहरहाल आज ये फिल्म पर्दे पर तो आ जाएगी पर क्या गर्म मुद्दों पर बनी ये फिल्म सूखे पड़े मार्केट में कोई बहार ला सकेगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, October 23, 2008

राज्य सरकार ने राज ठाकरे को पिटने से बचाने के लिए खेला ये खेल

राज ठाकरे को पुलिस ने पकड़ा, किसके कहने पर सरकार के कहने पर। सरकार ने पहल करके ये बताना चाहा कि बहुत हो चुका अब इस बड़बोले शख्स को जेल की हवा खिलानी ही होगी। कानून ने एक तरफ तो न्याय का चाबुक चलाया और दूसरी तरफ चाबुक शरीर पर लगने से पहले ही पकड़ भी लिया। वहीं दूसरी तरफ कानून की वो देवी जो कि आंखों पर पट्टी बांधे रखती है वो फिर किसी तरह से जागी और फिर चाबुक चमड़ी उधेड़ने के लिए उठा लेकिन शरीर पर पड़ने से पहले ही चाबुक पकड़ लिया। हिम्मत के आगे कानून जीता, हिम्मत हारी।
ये कोई पहेली नहीं है ये है कल्याण कोर्ट की कहानी। राज ठाकरे के खिलाफ सरकार ने जो प्लान बनाया था वो काफी अच्छा था। पर सरकार भी ये जानती थी कि यदि इस शख्स को लोगों तक पहुंचने दिया तो ये राज्य सरकार के लिए ठीक नहीं होगा। तो खेल खेला गया। एक ऐसा खेल जिससे दिखाने के लिए काम भी हो जाए और राज ठाकरे भी पिटने से भी बच जाए।
सरकार को राज ठाकरे ने रत्नागिरी में चैलेंज किया था कि अगर हिम्मत है तो पकड़ के दिखाओ और फिर देखना कि महाराष्ट्र कैसे जलता है। राज्य सरकार काफी दिनों से ये धमकियां सुन रही थी। और इस बार तो दबाव भी केंद्र से बन गया था(सीएम देशमुख ने कहा कि राज्य सरकार पर कोई दबाव नहीं था, वहीं शिवराज पाटील ने कहा है कि गृहमंत्रालय ने चिट्ठी लिखी थी और फोन पर खुद उन्होंने बात की थी। सच्चा कौन?)।
तभी राज्य सरकार को पता चला, राज ठाकरे के खिलाफ जारी हो चुका है एक गैर जमानती वारंट। राज्य सरकार तुरंत हरकत में आगई। यदि जमशेदपुर पुलिस राज ठाकरे को अपने साथ ले गई तो फिर राज्य में राजनीति कौन करेगा। कौन मारेगा-पीटेगा उत्तर भारतीयों को, जिनकी तादाद मुंबई-ठाणे में ज्यादा हैं। पता नहीं कहीं जमशेदपुर ले जाते हुए कोई भी सुरक्षा में चूक होगई और राज ठाकरे को बिहारियों के साथ झारखंडियों ने मिलकर पीट दिया या फिर कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर अलगाव को नहीं रोका जा सकेगा। राज्य सरकार ने घोड़े दौड़ाए और ३००-३५० किलोमीटर दूर बैठे राज ठाकरे को रात के २.३० बजे के करीब गिरफ्तार कर लिया गया।
खबर फैली हर जगह उत्पात होना ही था और हुआ भी। लेकिन इस बार सिर्फ महाराष्ट्र में ही उत्पात नहीं हुआ। इस चिंगारी की आग पटना तक गई। वहां पर स्टेशन पर तोड़फोड़ की गई। बहरहाल ये बात बाद में।
कोर्ट में राज की पेशी होती है। सुरक्षा कारणों से देरी होती है और फिर बांद्रा कोर्ट से राज को जमानत मिल जाती है। पर राज्य सरकार ने पूरा इंतजाम कर रखा था। अब बारी थी कल्याण कोर्ट की। कल्याण कोर्ट में एक दूसरे मामले में राज को पेश किया जाना था पर देरी की वजह से एक पूरी रात मानपाड़ा थाने की हवालात में काटनी पड़ती है राज ठाकरे को। हर पुलिसकर्मी जेल में बैठे उस ढ़ोंगी के वक्तव्य सुनता रहता है और जी हुजूरी करता रहता है। रात कट जाती है फिर सुबह पेश किया जाता है पर अदालत में खड़ी उस देवी के आंखें में पट्टी है साथ ही वो पट्टी कान के ऊपर से निकलती है इसलिए ना वो किसी का दर्द सुन सकती है और ना देख सकती है। अदालत ने अपना काम किया इतना तेज चाबुक मारा, कि दीवाली भी जेल में काटने का इंतजाम कर दिया, ५ नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया। फिर शरीर पर लगने से पहले ही पकड़ भी लिया, कोर्ट ने सिर्फ १५००० के निजी मुचलके पर जमानत भी दे दी। साथ ही देखा कि रेलवे पुलिस खड़ी है राज ठाकरे को पकड़ कर लेजाने के लिए और इतनी देर हो चुकी है कि वकील चाहे कुछ भी करें तब भी रात तो हवालात में काटनी ही होगी। और राज ठाकरे कमजोर भी दिख रहे हैं। तुरंत २४ तक हर मामले में अदालत ने राज ठाकरे को अंतरिम राहत दे दी। यानि की अब जब भी कार्रवाई होगी वो होगी २५ को याने कि जमशेदपुर कोर्ट से जारी वारंट का इलाज मिल गया। और शनिवार को कोर्ट में इस याचिका के खिलाफ पहले ही अर्जी डाली जा चुकी है। तो राज ठाकरे राज्य सरकार की राजनीति की वजह से राजशाही ठाठबाट पाते रहेंगे।
राजनीति इसे ही कहते हैं मेरे दोस्त। राज्य सरकार ने अपना उल्लू भी सीधा कर दिया और साथ ही राज की मुश्किल भी हल कर दी। वर्ना यदि राज ठाकरे को महाराष्ट्र छोड़कर जाना पड़ता तो क्या होता राज ठाकरे का इसका अनुमान सब लगा सकते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, September 23, 2008

कसम खा रखी है राज ठाकरे के गुंडों ने, 'हम नहीं सुधरेंगे'

चाहे कुछ हो जाए पर हम नहीं सुधरेंगे। शायद इसी राह पर चल रहे हैं राज ठाकरे के गुंडे। एमएनएस यानी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने एक बार फिर जमकर गुंडागर्दी मचाई। एक डॉक्टर के नर्सिंग होम में घुसकर उन्होंने जमकर तोड़फोड़ की और डॉक्टर दंपत्ति को जमकर पीटा। इस बार जो एमएनएस के गुंडों के हत्थे चढ़े वो हैं मलाड के जीवन नर्सिंग होम के डॉक्टर रमेश रेलन और उनकी पत्नी सरीना रेलन। दोनों को जमकर पीटा गया और साथ ही उनके चेहरे पर कालिख बी पोती गई। वो डॉक्टर हाथ जोड़ जोड़ कर माफी की भीख मांगता रहा और वो उसे लिटा लिटा कर उस पर लात घूंसे बरसाते रहे। डॉक्टर रमेश रेलन तो चलो पुरुष हैं पर उनकी पत्नी को भी बुरी तरह पीटा गया। ऐसा लग रहा था कि आतंकवादी लोगों के हत्थे चढ़ चुके हैं और ये आज उनसे हर बात का बदला लेकर रहेंगे।

दरअसल मामला देखा जाए तो ये था कि एक महिला जिसका नाम ट्रीसा है उसने डॉक्टर पर आरोप लगाया कि डॉक्टर ने 9 महीने पहले उसका ऑपरेशन किया था। ऑपरेशन तो सफल हुआ पर उस महिला के पेट में टॉवल छूट गया। जब महिला को पेट में कुछ तकलीफ हुई तो उसने इसकी शिकायत डॉक्टर रमेश से की लेकिन डॉक्टर ने उन्हें पेट की दवाई दे दी। लेकिन महिला की हालत में सुधार नहीं हुआ। फिर महिला ने दूसरे नर्सिंग होम में चैकअप कराया जहां पर इस बात का पता चला कि उसके पेट में टॉवल छूट गया है। उस महिला ने डॉक्टर से शिकायत की पर डॉक्टर ने टालमटोली शुरू कर दी। फिर क्या था महिला पुलिस के पास जाने के बजाय सीधे पहुंच गई आज के उभरते हुए गुंडों के पास यानी कि एमएनएस। एमएनएस के कार्यकर्ताओं ने अपने ही ढ़ंग से उस महिला को इंसाफ दिलवाया। नर्सिंग होम के घुसकर डॉक्टर की जमकर धुनाई की और फिर वो ही पुरानी हरकत कालिख पोती।राज ठाकरे जानते हैं कि उनको किसी की राह पकड़नी है और मुंबई पर कब्जा कैसे करना है। साथ ही उसको किस का उत्तराधिकारी बनना है।

मलाड के डॉक्टर दंपत्ति ने जो काम किया वो सचमुच ऐसा था कि उनको हवालात में होना चाहिए था। मैं कोई उस डॉक्टर के पक्ष में नहीं हूं पर मैं इस बात का भी समर्थन नहीं करता कि कोई भी आदमी खुद जाकर इंसाफ करने लग जाए। वहशी और दरिंदों की भीड़ ने अब तक कई बार कई लोगों की जान ली है एमएनएस मुझे उस वहशी भीड़ से ज्यादा कुछ भी नहीं लगती। मेरा सवाल ये है कि क्या उस महिला को पुलिस के पास पहले नहीं जाना चाहिए था? क्या बिगाड़ा था डॉक्टर रमेश की पत्नी ने जो उस के साथ भी हाथापाई की गई साथ ही उसको इतना जलील किया गया? क्या इंसाफ पाने का ये ढ़ंग सही है? माना कि डॉक्टर रमेश को पुलिस के हवाले कर दो, अंदर बंद करवा दो पर क्या ये रवैया ठीक है? घसीट-घसीट कर किसी को मारना कहां तक उचित है? एक महिला के साथ ऐसा व्यवहार करना एमएनएस की कार्यकर्ताओं को वो भी महिला कार्यकर्ताओं को शोभा देता है? एक महिला दूसरी महिला को पुरुष की मदद से पीट रही है साथ ही कभी पुरुष भी महिला पर हाथ साफ करदेता है क्या ये सही है? क्यों बनी हुई है एक महिला ही दूसरी महिला की दुश्मन, आखिर क्यों?

लोग यदि अभी नहीं संभले तो एक दिन ये एमएनएस के कार्यकर्ता किसी और बात पर खुद उन्हीं के घर में घुसकर उनको मारेंगे जिन्होंने कभी उनसे मदद ली होगी, और वो भी किसी और की शिकायत पर, क्योंकि गुंडों की राजनीति में कोई भी भाई हमेशा भाई नहीं होता।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, September 12, 2008

मुंबई का किंग कौन?

"अगर के एल प्रसाद को अपनी वर्दी, कुर्सी और बैच जो कि उसके कंधे पर लगे हैं, उनका इतना ही गुरूर है तो वो उसे उतारकर सड़क पर आकर बयान दें तब उन्हें पता चलेगा कि मुंबई किसकी है।" ये कहना है राज ठाकरे का और वो भी किसी दो कौड़ी के आदमी के बारे में नहीं, मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर के बारे में। आपको ये बता दूं कि ये के एल प्रसाद वो ही हैं जिन्होंने एक रोज पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कहा था कि 'मुंबई किसी के बाप की नहीं'। राज ठाकरे ने पलटवार करते हुए अपनी पीसी में मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर को खुले शब्दों में चुनौती दे डाली कि वर्दी है तो इतना बोल रहे हो यदि वर्दी उतारकर सामने आओ तो दिखाते हैं हम अपनी गुंडागर्दी जिससे कि पूरा मुंबई आजकल थरथर कांप रहा है। और ये भी कोई बड़ी बात नही कि आने वाले दिनों में के एल प्रसाद की वर्दी को नुचवाकर ये मुंबई का नया उभरता हुआ गुंडा राज ठाकरे फिकवा दे या फिर सबसे सरल उपाय तबादला करवा दे। इस कहते हैं दादागीरी। सीधे-सीधे चैलेंज है पुलिस को, कि मैं तो चुप नहीं रहूंगा चाहे जो हो सके तो वो कर लो। क्या पुलिस की इतनी हिम्मत है कि वो राज ठाकरे पर इस धमकी के ऊपर कोई भी कदम उठा सके? हम सब को जवाब पता है...शायद नहीं। राज ठाकरे की एक दहाड़ के सामने दुम हिलाती है पुलिस। लेकिन ये ख़ौफ़ कब तक, आखिर कब तक रहेगा ये ख़ौफ़? सरासर गुंडाराज चल रहा है मुंबई में।
बेशक राज ठाकरे सरकार नहीं हैं पर वो आदेश देता है तो महाराष्ट्र की सरकार की जुबान पर ताला लग जाता है। वो जज भी नहीं है पर फिर भी दंड सुनाने का अधिकार सिर्फ उसने अपने पास सुरक्षित रखा है। जिसे चाहे वो अपने आगे झुका सकता है, जिसे चाहे वो कुछ भी कह सकता है गाली तक दे सकता है और कानून उस शख्स के खिलाफ कोई कदम भी नहीं उठा सकता है। वो चाहे तो जिस किसी की फिल्म की रिलीज पर महाराष्ट्र में पाबंदी लगा सकता है, और वो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता। इस शख्स की सनक के सब गुलाम बन चुके हैं।
ये दादागीरी नहीं है तो और क्या है। अभी मेरी पिछली पोस्ट पर डॉ अनुराग ने कमेंट किया था कि अगले महीने उनका मुंबई जाना हो रहा है। वहां पर चल रही भाषावाद की हवा से वो काफी नाखुश भी हैं और पशोपेश में भी। आपको सच बताऊं तो ऑफिस से मेरे एक सहयोगी को मुंबई जाना था लेकिन वो मुंबई नहीं गए। क्यों? जबकि हमारा भरा पूरा ब्यूरो है वहां पर, लेकिन वहां कि हवा ही ऐसी चल रही है कि हर कोई डरने लगा है। गुंडों से शायद हमलोग अकेले तो लड़ सकते हैं लेकिन परिवार के साथ नहीं। सच माने तो राज ठाकरे का कद ये हो चुका है कि कोई भी इस बड़बोले से पंगा नहीं लेना चाहता और लगता तो ये भी है कि सब के सब इसके रहमोकरम पर ही हैं।
इस दादागीरी और गुंडागर्दी के आग सदी के महानायक तक को झुकना पड़ा। पहले ब्लॉग, फिर हर चैनल पर घूम-घूम कर माफी मांगनी पड़ी। चाहे द लास्ट लियर के लिए दिए जा रहे इंटरव्यू की बात हो या चाहे कोई और, लेकिन हर जगह वो माफी मांगते हुए दिखे। बिग बी यानी अमिताभ बच्चन इस मुद्दे पर कुछ जुमलों को ही हर इंटरव्यू में बोलते नजर आए। माफी मांगने से थोड़े ही कोई छोटा हो जाता है, भई बीत गई सो बात गई, अब आगे क्या, माफी हमने मांग ली है, इसकी जांच हो रही है यदि लगे कि हमने गलत किया है तो हमें जो सजा देना चाहेंगे हमें मंजूर है। हर जगह बचते-बचते अमिताभ ने सभी सवालों के जवाब दिए। कैमरे पर माफी मांगे जाने को लेकर तो बिल्कुल कन्नी काट गए। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि राज तो मेरे दोस्त के हैं और मैं उन्हें अपनी फिल्म देखने का न्यौता देता हूं। अब सवाल ये उठता है कि क्या सदी का महानायक डर गया? हर जगह जा जा कर उन्हें माफी क्यों मागनी पड़ रही है? क्या बिग बी पर द लास्ट लियर के प्रोड्यूसर की तरफ से कोई दबाव है? या फिर फिल्म सही सलामत मुंबई या यूं कहें कि महाराष्ट्र में रिलीज हो जाए ये चाहते हैं अमिताभ। पर जो भी कारण हो जब सदी के महानायक को डरना पड़ सकता है इस नेता रूपी गुंडे से तो फिर आम आदमी की तो औकात ही क्या है। यदि राज ने न्यौता स्वीकार कर लिया तो राज की राजनीति समझ में जरूर आजाएगी ये तो साफ है।
ये मराठियों की एकजुटता की जीत है या फिर राज ठाकरे के गुंडों का ख़ौफ़ लेकिन भाषावाद का ये घटिया प्रकरण आखिरकार खत्म तो हो गया। अब तो ये लड़ाई राज ठाकरे बनाम मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर के बीच हो चली है। पर इसमें जया और अमिताभ बच्चन को पूरे मामले में शर्मिंदगी बहुत उठानी पड़ी है। साथ ही जाते जाते राज ठाकरे ने जया बच्चन को नसीहत भी दे डाली है कि हो सके तो आगे से लिखे हुए डायलॉग ही पढ़ें तो बेहतर। पर इस प्रकरण ने ये तो बता ही दिया कि, 'मुंबई का किंग कौन?.........राज ठाकरे'

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-गूगल)
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”