चार दिन की छुट्टी ली थी और बेगम ने चाहा कि क्यों ना आबो हवा बदल ली जाए। पर उन्होंने यहां सोचा और जब तक हम कुछ फैसला ले पाते उससे पहले वहां उनकी मौसी ने उसे कर भी दिया। यानी की वो अपने बच्चों के साथ हमारे यहां पर आबो हवा बदलने के लिए आ पहुंची। उनका बड़ा बेटा थोड़ा दुखी दिखा क्योंकि 12वीं में उसके सिर्फ 88 फीसदी अंक आए थे। ये बात गर्मी की छुट्टियों की है।
मैंने साले साहब को समझाया की ये तो बहुत अच्छे मार्कस हैं फिर क्यों चिंता कर रहे हो। उसके जवाब ने मुझे थोड़ा संतुष्ट किया। वो बोला, जीजाजी, ‘मैं चाहता था कि दिल्ली में मेरा एडमिश्न एक अच्छे कॉलेज में आसानी से हो जाए पर अब लगता है कि मुझे दौड़ भाग करनी होगी। दूसरी बात कि मैंने कुछ कॉम्पटीशन टेस्ट देने हैं उसमें पूरे भारत से बच्चे एग्जाम देते हैं। साथ ही बारहवीं में जिनके मार्कस अच्छे होते हैं उनको प्राथमिक्ता दी जाती है। मेरी चिंता है कि कहीं मैं पीछे ना रह जाऊं’। दिल्ली आने का दूसरा कारण ये भी था कि अखबार और टीवी के माध्यम से कॉलेजों के बारे में पता आसानी से चल जाता है। सुबह से ही पूरे dedication के साथ वो लग जाता। सबसे पहले सारे अखबार अपने पास रख लेता है और देखता कि कौन-कौन से कॉलेज अच्छे हैं वहीं साथ ही कि किन कॉलेजों में फॉर्म भरने चाहिए। सुबह से वो लंबी लाइन, दौड़-धूप, यहां जाना-वहां जाना और फिर शाम को वापसी।
एक दिन वो कई अखबार लेकर मेरे सामने आया, बोला, ये अखबार वाले हमारी फोटो क्यो नहीं छापते? मैंने पूछा कि क्या हुआ तुमने ऐसा क्या कर दिया कि तुम्हारी फोटो छापी जाए। जवाब में उसने कहा कि तो इन लड़कियों ने क्या कर दिया है जो हर पेपर में लड़के छोड़ लड़कियों के फोटो छपते हैं। हम लोग सुबह से शाम तक लाइन में नहीं लग रहते हैं, क्या हमारे लिए कॉलेज जाने का ये पहला मौका नहीं है? हेडिंग है कॉलेज जाने की तैयारी, तो दिखादी उछलती लड़कियां, कॉलेजों में लंबी लाइन तो दिखा दी 4-5 लड़कियां, आज कॉलेजों में भरे गए लाखों फॉर्म तो 2-3 लड़कियां बैठी हुई फॉर्म भरती हुई दिखा दी। स्कूल के बाद कॉलेज की तरफ बढ़े कदम, दो लड़कियां चलती हुई दिखा दी। क्या जीजाजी, हम लड़कों के लिए कॉलेज जाना जिंदगी की एक नया अध्याय नहीं है? क्यों हम लड़कों के लिए पेपरों में जगह नहीं है? क्या सारे अखबार के संपादक मर्द हैं जो कि लड़कियों की तस्वीरों को प्राथमिकता देते हैं?
मैं उसे जवाब के रूप में एक झूठी और फीकी सी स्माइल देकर रह गया। वो तो अपनी बात कह कर चला गया। वो जितने अखबार छोड़ गया था उसमें पिछले कई दिनों के अखबार थे। वो कुछ अखबार आगरा से भी लेकर आया था कुछ दिल्ली के थे और एक ही न्यूजपेपर नहीं थे, तीन-चार तरह-तरह के अखबार। मैंने गौर करना शुरू किया तो पाया कि उसकी बात काफी हद तक सही ही है। फिर मैंने पेपर में छपने वाले एड देखने शुरू किए। तो पाया कि एक एड छपा था कि कपड़ों पर 40 फीसदी की छूट और तस्वीर छपी थी एक मॉडल की ब्रा और पैंटी में। मुझे तो समझ नहीं आया कि ये किस पर छूट थी अंडर गारमेंट्स पर या फिर कपड़ों पर। देखा कि पूरे कपड़ों पर थी ये छूट फिर ऐसी तस्वीर क्यों छापी गई।
ऐसे विज्ञापन तो आम हैं, एक लड़की रेजर के साथ खड़ी हुई है, भई रेजर की लड़की को क्या जरूरत पर फिर भी एड में छपी हुई है। मर्दों की सेंडो बनियान को हाथों में लेकर खड़ी हैं एक महिला आखिर क्यों? सेंडो बनियान की उन्हें क्या जरूरत। सेंडो और ब्रीफ के लिए भी लड़कियों की जरूरत महसूस होती है। आखिर क्यो?
टीवी पर तो हमेशा इस बात की शिकायत करते हैं कि अंगप्रदर्शन हो रहा है पर अखबारों में भी जीना मुहाल कर दिया है। कहते हैं कि टाइम्स ऑफ इंडिया के डेल्ही टाइम्स (पंजाब केसरी के बाद डेल्ही टाइम्स ही बना था दूसरा पंजाब केसरी) के पहले सबसे ज्यादा बिक्री पंजाब केसरी की हुआ करती थी वो भी सिर्फ एक दिन। क्योंकि उसकी गुरुवार की बिक्री पूरे हफ्ते के अखबार से ज्यादा हुआ करती थी। क्यों? कारण था कि गुरुवार को सेलिब्रेटीज की बोल्ड रंगीन तस्वीरें हुआ करती थी, जो अब भी होती हैं।
कई बार सोचता हूं कि क्या लड़कियां सिर्फ टीआरपी जोन की वस्तु मात्र रह गई हैं? और दूसरी बात साले साहब की, क्या सारे अखबार के संपादक मर्द हैं जो लड़कियों की तस्वीरों को प्राथमिकता देते हैं? वैसे ये तो बात सही है मर्द प्रधान समाज में शायद ऐसा ही होता है! सोचने पर तो मजबूर हैं.....। अब तो सुधरो अखबार वालों, यारों जब देखो हर आईटम पर लड़की की तस्वीर ना लगा दिया करो।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
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Monday, July 27, 2009
Thursday, November 20, 2008
‘लिफ्ट याने मदद, पर ऐसी घटना से लगता है ना करो मदद’
ऑफिस की भागदौड़ के बाद जब हम ऑफिस से निकले तो रात के ११ बजने को थे। वैसे भी शाम को कुछ काम और काम से बड़ा उसको सही ढंग से ऑनएयर करने का प्रेशर कुछ ज्यादा ही रहता है। मैं और मेरे सहयोगी एक साथ हम नीचे उतरे सोचा कि चलो कहीं चलकर कुछ खा लें, फिर दोनों घर की तरफ रुखस्त हों। वैसे भी हम दोनों के रास्ते जुदा हैं एक पूर्व रहता है और दूसरा पश्चिम।
सहयोगी ने ऑफर किया कि चलो पहाड़गंज में एक अच्छा होटल है चलो वहीं चलकर कुछ खा पी लेते हैं, और फिर वो मुझे वापिस ऑफिस छोड़ कर घर चले जाएंगे। भूख के कारण मुझे भी ये फैसला उचित लगा। दोनों की हालत लगभगा एक जैसी थी, दोनों ने जल्दी-जल्दी ड्रिंक और खाना खत्म किया और फिर दोनों घर की तरफ निकल लिए।
अगले दिन जब ऑफिस पहुंचे तो फिर काम में हम दोनों जुट चुके थे। बीच में एक ख़बर आई कि लिफ्ट के बहाने दो लड़कियों ने एक आदमी को हजारों का नहीं लाखों का चूना लगा दिया। पैसे, घड़ी, सोने की चेन, सोने की दो अंगूठी, कार सब लेकर गायब होगई। अब वो आदमी पुलिस के धक्के खा रहा था। मेरा सहयोगी कुछ देर तक अपने दोनों हाथ सर के पीछे करके बैठ गया। मैंने पूछा क्या हुआ। वो खबर की तरफ ज्यादा मुखातिब था, मेरी बात शायद उसने ठीक से सुनी नहीं। मैंने दोबारा पूछा। उसने बताया कि ब्रेक पर बताऊंगा।
ब्रेक में उसने बताया कि कल जब वो मुझे छोड़ कर घर जा रहा था तो दो लड़कियों ने उससे भी लिफ्ट मांगी थी। उसने सोचा कि चलो सलवार सूट में सीधी-साधी लड़कियां हैं। उन दोनों लड़कियों को भी वहीं तक जाना था जहां पर मेरे सहयोगी को जाना था। दोनों को लिफ्ट दे दी, यूं ही तीनों में आपस में बात होने लगी। फिर एक लड़की ने पूछा कि क्या उसने खाना खा लिया है। मेरे सहयोगी ने हां में सर हिलाते हुए जवाब के साथ सवाल पूछ लिया कि और आप लोगों ने? दोनों ने ना में सर हिला दिया। फिर लड़कियों ने एक रेस्त्रां में जा कर कुछ खाने की बात कही। सहयोगी को उस रेस्त्रां की पूरी हिस्ट्री पता थी उस को समझने में देर नहीं लगी कि वो शायद किसी जाल में फंसता जा रहा है। क्योंकि उस जगह पर कॉर्ल गर्ल और शराब दोनों देर रात तक आसानी से मुहैया होते हैं।
अब मेरे सहयोगी ने अपना पीछा उन दोनों से छुड़ाने की कोशिश शुरू कर दी और फिर पता चली वो असलियत जिस के लिए मेरे सहयोगी ने अपने आप को तैयार कर लिया था। यदि आप खाना नहीं खा सकते तो दो-दो ड्रिंक ही कर लीजिए। हमें आपकी मनपसंद जगह पर भी जाने से एतराज नहीं हैं। हमसे सस्ते रेट आपको नहीं मिलेंगे। यदि आपके पास जगह नहीं है तो हमारे पास है लेकिन उसका एक्सट्रा लगेगा, पर आपके लिए हम उसमें भी डिस्काउंट करवा देंगे। यदि पैसे कम है तो आप अपने दोस्तों को भी बुला सकते हैं हम उन्हें भी सर्विस दे देंगे पर दाम फिक्स हैं। यदि कहीं नहीं जाना तो हम अपनी सर्विस आपको आपकी कार में भी दे सकते हैं। लंबी और बड़ी गाड़ी में हमको भी दिक्कत नहीं होगी।
मेरे सहयोगी ने दोनों को बड़े ही प्यार से बहला फुसलाकर वहां से चलता किया पर उसको एक काम जरूर करना पड़ा कि जहां से उनको बैठाया था वहां पर वापस छोड़ना पड़ा। क्योंकि पुलिस की धमकी से मेरा दोस्त खुद फंस सकता था और लड़कियों की एक आवाज से सहयोगी अस्पताल और हवालात दोनों जगह बड़े ही आराम से घूम कर आसकता था। सच मेरे सहयोगी ने बहुत ही अक्लमंदी का परिचय देते हुए दोनों से पीछा छुड़ाया।
बाद में उसने बताया कि, वो इन सब बातों के दौरान सिर्फ उन दोनों लड़कियों की शक्ल देख रहा था। और सोच रहा था कि क्यों उस समय भगवान ने ये अक्ल दे दी कि भली समझकर लिफ्ट दे दी। सभी राहगीरों पर से उठते अपने विश्वास को अपने अंदर कहीं टूटता हुआ महसूस कर रहा था। और शायद कहीं किसी जगह छोटे से कोने में ये सच भी हमारे अंदर पनप रहा है।
आपका अपना
नीतीश राज
सहयोगी ने ऑफर किया कि चलो पहाड़गंज में एक अच्छा होटल है चलो वहीं चलकर कुछ खा पी लेते हैं, और फिर वो मुझे वापिस ऑफिस छोड़ कर घर चले जाएंगे। भूख के कारण मुझे भी ये फैसला उचित लगा। दोनों की हालत लगभगा एक जैसी थी, दोनों ने जल्दी-जल्दी ड्रिंक और खाना खत्म किया और फिर दोनों घर की तरफ निकल लिए।
अगले दिन जब ऑफिस पहुंचे तो फिर काम में हम दोनों जुट चुके थे। बीच में एक ख़बर आई कि लिफ्ट के बहाने दो लड़कियों ने एक आदमी को हजारों का नहीं लाखों का चूना लगा दिया। पैसे, घड़ी, सोने की चेन, सोने की दो अंगूठी, कार सब लेकर गायब होगई। अब वो आदमी पुलिस के धक्के खा रहा था। मेरा सहयोगी कुछ देर तक अपने दोनों हाथ सर के पीछे करके बैठ गया। मैंने पूछा क्या हुआ। वो खबर की तरफ ज्यादा मुखातिब था, मेरी बात शायद उसने ठीक से सुनी नहीं। मैंने दोबारा पूछा। उसने बताया कि ब्रेक पर बताऊंगा।
ब्रेक में उसने बताया कि कल जब वो मुझे छोड़ कर घर जा रहा था तो दो लड़कियों ने उससे भी लिफ्ट मांगी थी। उसने सोचा कि चलो सलवार सूट में सीधी-साधी लड़कियां हैं। उन दोनों लड़कियों को भी वहीं तक जाना था जहां पर मेरे सहयोगी को जाना था। दोनों को लिफ्ट दे दी, यूं ही तीनों में आपस में बात होने लगी। फिर एक लड़की ने पूछा कि क्या उसने खाना खा लिया है। मेरे सहयोगी ने हां में सर हिलाते हुए जवाब के साथ सवाल पूछ लिया कि और आप लोगों ने? दोनों ने ना में सर हिला दिया। फिर लड़कियों ने एक रेस्त्रां में जा कर कुछ खाने की बात कही। सहयोगी को उस रेस्त्रां की पूरी हिस्ट्री पता थी उस को समझने में देर नहीं लगी कि वो शायद किसी जाल में फंसता जा रहा है। क्योंकि उस जगह पर कॉर्ल गर्ल और शराब दोनों देर रात तक आसानी से मुहैया होते हैं।
अब मेरे सहयोगी ने अपना पीछा उन दोनों से छुड़ाने की कोशिश शुरू कर दी और फिर पता चली वो असलियत जिस के लिए मेरे सहयोगी ने अपने आप को तैयार कर लिया था। यदि आप खाना नहीं खा सकते तो दो-दो ड्रिंक ही कर लीजिए। हमें आपकी मनपसंद जगह पर भी जाने से एतराज नहीं हैं। हमसे सस्ते रेट आपको नहीं मिलेंगे। यदि आपके पास जगह नहीं है तो हमारे पास है लेकिन उसका एक्सट्रा लगेगा, पर आपके लिए हम उसमें भी डिस्काउंट करवा देंगे। यदि पैसे कम है तो आप अपने दोस्तों को भी बुला सकते हैं हम उन्हें भी सर्विस दे देंगे पर दाम फिक्स हैं। यदि कहीं नहीं जाना तो हम अपनी सर्विस आपको आपकी कार में भी दे सकते हैं। लंबी और बड़ी गाड़ी में हमको भी दिक्कत नहीं होगी।
मेरे सहयोगी ने दोनों को बड़े ही प्यार से बहला फुसलाकर वहां से चलता किया पर उसको एक काम जरूर करना पड़ा कि जहां से उनको बैठाया था वहां पर वापस छोड़ना पड़ा। क्योंकि पुलिस की धमकी से मेरा दोस्त खुद फंस सकता था और लड़कियों की एक आवाज से सहयोगी अस्पताल और हवालात दोनों जगह बड़े ही आराम से घूम कर आसकता था। सच मेरे सहयोगी ने बहुत ही अक्लमंदी का परिचय देते हुए दोनों से पीछा छुड़ाया।
बाद में उसने बताया कि, वो इन सब बातों के दौरान सिर्फ उन दोनों लड़कियों की शक्ल देख रहा था। और सोच रहा था कि क्यों उस समय भगवान ने ये अक्ल दे दी कि भली समझकर लिफ्ट दे दी। सभी राहगीरों पर से उठते अपने विश्वास को अपने अंदर कहीं टूटता हुआ महसूस कर रहा था। और शायद कहीं किसी जगह छोटे से कोने में ये सच भी हमारे अंदर पनप रहा है।
आपका अपना
नीतीश राज
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मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”