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Friday, June 5, 2009

बैड टी, अखबार और चुस्कियां लेती खबरें

कुछ बातों और चीजों की आदत सी पड़ जाती है। मस्लन रात के काम और दो-चार पैग के हैंगोवर को मिटाने के लिए सुबह उठते के साथ ही गर्मा गर्म चाय और साथ में दिमाग को पटरी पर लाने के लिए अखबार। सुबह यदि ये दोनों चीज ना मिलें तो लगता है कि दिन की शुरूआत अभी हुई नहीं और जो हुई है वो अधूरी-अधूरी सी है। सुबह से ही ये दोनों मेरे दिन भर की जरूरत बन जाती हैं।

काले हरफों पर दिन भर आंख यूं गड़ी रहती है, ना जाने,
क्यों ये लगता है, इन अक्षरों में मेरी महबूबा रहती है।

पर ये महबूबा बने हरफ जब सच्चाई बताते हैं तो महबूबा जैसा ही दर्द देते हैं। लगता है कि इसके रंग से ही अखबार को भी काला कर दूं। पिछले दिनों कई ख़बरें ऐसी आई जिसने ये सोचने पर मजबूर किया कि क्या कोई कानून इन लोगों के खिलाफ नहीं बनना चाहिए जो ये ग़लत काम कर रहे हैं।

ख़बर-बिहार में एक हॉल्ट को हटाने पर दो ट्रेनें फूंकी गई, एक स्टेशन को जला दिया गया। श्रमजीवी एक्सप्रेस की दो बोगियां जलाई गईं। रेलवे ट्रैक उखाड़ दिए गए।

गांवों के लोगों ने इस काम को यूं अंजाम दिया जैसे कि कूड़े या कचड़े को जलाया गया हो। इस काम को अंजाम देने के बाद वो अपने आप को किसी हीरो से कम नहीं समझ रहे होंगे पर मेरे लिए वो विलेन से भी बदत्तर हैं। उन लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था कि उनकी इस करतूत से कितना नुकसान हुआ होगा राष्ट्रीय संपत्ति को। वो हॉल्ट इस लिए बंद किया गया था क्योंकि उस जगह से कोई भी आमदनी रेलवे को नहीं हो रही थी। तो लंबी दूरियों की ट्रेन को क्यों रोक कर ईंधन, समय को बर्बाद किया जाए। वैसे भी अधिकतर ट्रेन राजगीर से पटना के बीच ११ जगहों पर रुकती है जबकि दोनों स्टेशनों के बीच महज दूरी है ९९ किलोमीटर। याने कि हर ९ किलोमीटर के बाद ट्रेन रुकेगी। सुपरफास्ट ट्रेनें हर ९ किलोमीटर के बाद रूकती हैं बिहार में।

भई, क्यों जला दी आपने ट्रेन? तो एक शख्स दूसरे का मुंह तकता है कि भई क्यों जला दी। अरे, तू भाग रहा था तो मैं भी तेरे पीछे-पीछे भाग लिया। मुझे क्या पता तू किस लिए भागा। कोई अलग जवाब देता कि लोगों ने जला दी हमें क्या मालूम। कौन लोग? नहीं पता। फिर पीछे से कुछ दस-बारह लोग सामने आएंगे और बातों को घुमाने लगेंगे। वो कौन? किसी राजनीतिक पार्टी के मुंह बोले भाई लोग।

ख़बर-ऑस्ट्रिया के शहर वियना में गुरुद्वारे में फायरिंग, संत रामानंद और गुरू निरंजन दास पर हुआ हमला। संत गुजर गए और गुरूजी घायल। हमलावर गिरफ्तार।

धीरे-धीरे शाम तक देश में ये ख़बर फैलने लगती है। पंजाब में कुछ जगहों पर सेना तैनात और कुछ जगहों पर एहतियातन कर्फ्यू लगने लगता है। पर रात गहराती है वहीं दंगाई सड़कों पर। सबसे पहले जालंधर फिर फिरोजपुर, धीरे-धीरे पंजाब के और शहर और फिर हरियाणा जलने लगता है। हर जगह ट्रकों, बसों, में आग लगा दी जाती है। जलांधर कैंट स्टेशन पर हिमगिरी एक्सप्रेस आग के हवाले। घर लूट लिए गए, हाईवे की सभी दुकानें लूट ली गईं। २४-२५-२६ मई तीन दिन में पंजाब में चारों तरफ हाहाकार मच जाता है। क्या है ये सब? क्या लोगों के अंदर से कानून का ख़ौफ़ निकल गया है।

पहली बात दोनों घटनाओं में लोगों ने राष्ट्रीय संपत्ति को हानि पहुंचाई। क्यों? क्योंकि ऐसा कोई कानून नहीं जिसके तहत कोई कार्रवाई इन लोगों पर हो सके। भीड़ है भीड़ पर कोई कानून नहीं लागू होता। दूसरे देश में रंजिश की वहज से कत्ल हो जाता है तो भी यहां पर जिस शख्स की दुकान लूटी गई जिसके घर जलाए गए, उन्होंने क्या बिगाड़ा था। उसकी दुकान या घर लूट लेने से क्या बदला पूरा हो गया? ऐसा नहीं है।

क्या मिल जाता है इन लोगों को ऐसा करके। टैक्स मैं भरता हूं मेरी जरूरतें पूरी हो नहीं पाती फिर भी टैक्स भरता हूं। उन ट्रेनों, बसों में मेरा भी हिस्सा था जिन्हें फूंक दिया गया, मेरे पैसों को फूंक दिया गया? क्या है किसी के पास जवाब।

पंजाब के उन इलाकों में जहां दंगाइयों ने दुकान लूटी, घर लूटे काफी समय तक कोई भी लूटपाट की घटना वहां नहीं होगी। क्योंकि वो दंगाई नहीं लुटेरे थे जिन्होंने बहती गंगा में हाथ धोए हैं।

जब भी ऐसी खबरें पढ़ता हूं तो चाय मुंह का स्वाद सुबह-सुबह ही कसेला कर जाती है।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, May 18, 2009

जनता है ये सब जानती है....

चुनवा हो गए और जनता ने चुन लिए हैं अपने नेता। साथ ही बता दिया है कि जनता के लिए कौन से मुद्दे हैं जिनपर वो वोट देती है। इस बार के चुनावों में जनता ने अपने आपको वोट दिया। जिसको चाहा उसको ही संसद की राह दिखाई। जनता विकास देखना चाहती है, अव वो ठगा जाना नहीं चाहती, अब वो नहीं डरती। जिनसे डरती थी उनको इस बार वोट नहीं दिया।
जनता ने कर दिखाया वो काम जो कि कानून की मोटी-मोटी किताबें और धाराएं नहीं कर सकी क्योंकि कानून ने बांध रखी है आंख पर पट्टी। जनता ने पूरा पत्ता साफ कर दिया उन बाहुबलियों का जो कल तक अपने आप को नेता कहते थे, जिनके ऊपर चलते थे कई मकद्दमें, पर हुए नहीं थे फैसले जनता ने एक उंगली से ही कर दिया फैसला, और कर दिया उन सभी का सूपड़ा साफ।

उत्तर प्रदेश हो या फिर बिहार या फिर महाराष्ट्र सभी जगह से ये भाई लोग हारे। हर कोई हारा चाहे कितना बड़ा हो या फिर कितना ही भारी। पर फिर भी 150 दागी उम्मीदवार पास होने में कामयाब हो ही गए, जिसमें बीजेपी से 42, कांग्रेस से 41, समाजवादी पार्टी से 8 दागी संसद में पहुंच गए हैं।

उत्तर प्रदेश में जनता ने काफी उलटपलट कर दिया। गाजियाबाद के डीपी यादव का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी रसूख है पर इस बार वो भी काम नहीं आया और जनता ने उन्हें भी टिकट देने से इनकार कर दिया। वैसे भी राजनीति में डीपी यादव के अब चंद ही दिन बाकी रह गए थे तो जनता ने इस बार बता दिया कि वो दिन भी पूरे हो गए। अतीक अहमद को अपना दल ने प्रतापगढ़ से टिकट दिया था पर ना तो अतीक का ना ही अपना दल का और ना ही इन दोनों का प्रताप कुछ काम आया।
मुख्तार अंसारी को बीएसपी ने वाराणसी से दिया था टिकट। बीजेपी के विधायक कृष्णानंद राय के कत्ल के आरोप में गाजीपुर जेल में बंद हैं मुख्तार अंसारी। इस बार जनता ने मुख्तार को संसद के अंदर का नहीं जेल के अंदर का टिकट काट कर दे दिया। मुख्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी को टिकट तो मिल गया पर गाजीपुर से जीत नहीं।
उन्नाव की लोकसभा सीट इसलिए इस बार काफी चर्चा में रही क्योंकि यहा की प्रत्याशी कांग्रेस की अनु टंडन के प्रचार के लिए सलमान खान गए थे। अनु टंडन का मुकाबला था वहां के डॉन अरुणशंकर शुक्ला उर्फ अन्ना का। लेकिन जनता ने डॉन को नहीं सीधी सादी अनु टंडन को संसद का टिकट दे दिया।

बिहार में इस बार सब को पता था कि नीतीश कुमार की मेहनत रंग लाएगी। नीतीश कुमार ने बिहार में लोगों के अंदर से भय गायब किया है। तो जनता ने भी इस का जवाब देते हुए राज्य से साले साहब साधु यादव, तसलीमुद्दीन, मुन्ना शुक्ला, रामा सिंह, प्रभुनाथ सिंह जैसे आपराधिक तत्वों को हरा कर नीतीश का साथ दिया है। पूर्णिया से बाहुबलि पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन सुपौल से और मां पूर्णिया से बुरी तरह हारी। सीवान से शहाबुद्दीन की बेगम हिना, आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद और डॉन सूरजभान की पत्नी वीणा नवादा से अपने पति के कर्मों के कारण इन्हें हार का मुंह देखना पड़ा।

जनता ने लेकिन इस बार ये दिखा दिया कि यदि वो चाहे तो क्या नहीं कर सकती है। पर अभी जनता को और जागरुक होना होगा। नामचीन बाहुबलियों को और उनके मंसूबों को तो जनता ने हरा ही दिया है पर फिर भी यदि देश को सुरक्षित रखना है तो इन दागियों को संसद का टिकट पाने से सिर्फ जनता ही रोक सकती है।

वहीं दूसरी तरफ जनता ने इस बार जितने भी सौदेबाज थे उतनों को हराकर साबित किया है कि वो स्थाई सरकार बनाना चाहती है। जितनी भी छोटी पार्टियां चंद सीटें जीतने के बाद सौदे करती है उन्हें जनता ने सिरे से नकार दिया। जनता ने कहा 'NO TO THEM'. चाहे वो लालू हों या फिर पासवान या फिर मुलायम-अमर की जोड़ी या फिर माया या लेफ्ट की कोई नई चाल। ऐसा हुआ कि कुछ गढ़ से ही कुछ का तो पत्ता साफ हो गया।

जनता है ये सब जानती है...पब्लिक है....।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, September 1, 2008

ये दर्द का सैलाब है...


एक मां के हाथ में दुधमुंहा बच्चा, खुद वो गर्दन तक पानी में डूबी, बच्चे को अपने सर से ऊपर किए हुए पानी में चलती जा रही। जहां तक नजर जाती सिर्फ पानी ही पानी। साथ में घर के या इसी त्रासिदी से जूझते लोग। सब चलते जा रहे। इस आस के साथ कि शायद कोई नाव मदद को आए और बचा ले। तभी उस मां का पैर गड्ढे में जाता है और पल भर के लिए पानी उस के सर के ऊपर तक आजाता है। पर वो मां है, उसने अपने बच्चे को पानी में नहीं डूबने दिया। अभी भी उसका बच्चा पानी के ऊपर था। हमारे कैमरामैन ने पूरा फोकस उस बच्चे और निरीह मां के ऊपर कर दिया। रूह तक कांप रही थी इन तस्वीरों को देख कर, सीधे बाढ़ प्रभावित इलाके महिपालगंज से। एक झटके में मां अपने सर को पानी से बाहर निकालती है। हम उसके हौसले की दाद दे रहे थे कि तभी उस महिला का पैर फिसला, अपने को संभालने के लिए उसका हाथ पानी के अंदर गया और बच्चा बिलबिलाते हुए पानी के अंदर। पल भर के लिए ही, बच्चा पानी में रहता है और फिर उस ममता की जीती जागती पवित्र रूह ने अपने बच्चे को तुरंत ऊपर की ओर कर दिया। बच्चा रो रहा है और यहां ऑफिस में हम सब की आंखें नम हैं। मैंने अपने सहयोगी से कहा कि visuals को slow motion में कर दो, अब तस्वीरें स्लो करके दर्शकों को दिखाई जा रही हैं। मेरे सीनियर का गला भर आया वो अपना मुंह अपने हाथ से ढक कर पूरे PCR(Production Control Room) में माहौल को गमगीन कर गए।
हमें ये एहसास बार बार मार डाल रहा था कि क्या इतनी देर पानी में रहने के बाद ये जिंदा बच पाएंगे। और जब रात होगी और काल बनी कोशी अपने प्रचंड रूप में पुकारेगी तब क्या ये बच पाएंगे। अभी तो दिन है कुछ किया भी जा सकता है पर रात में क्या होगा। दूर-दूर तक सिर्फ काला-मटमैला पानी, कोई ओर क्षोर नहीं, खाने को दाना भी नहीं जगह जगह से लाशें बहती हुई आ रही हैं, ऊपर से चोर-डाकुओं का डर। इस समय जिसके पास नाव है वो राजा है। और ये राजा कोई और नहीं चोर-डाकू हैं। औरतों के साथ बलात्कार भी हो रहा है। ये सारी बातें और उन तस्वीरों ने आंखों से आंसूओं की धारा बहा दी। मैंने अपने एंकर से कहा कि इन तस्वीरों को फिर से बता दो। लेकिन एंकर कुछ नहीं बोली। वो भी तो अपने रूंधे हुए गले से कुछ भी कह नहीं पा रही थी। बाद में उसने मुझसे कहा कि तुम लोग तो वहां खड़े रो लिए पर हम तो रो भी नहीं सकते थे, लोग हमारी आवाज सुन लेते।


अब दूसरी घटना और भी बेहद मार्मिक। एक मां अपनी बगल में दो बच्चों को दबाए बाढ़ के उफनते पानी को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी। साथ में कुछ और लोग भी थे। धीरे-धीरे सब चलते जा रहे थे किसी को पता नहीं था कि आखिर इस बाढ़ का अंत कहां है, पर बचने के लिए चलना तो जरूरी था। पानी का एक तेज बहाव उनकी तरफ आया। सबने संभलने की कोशिश की। मां ने भी अपने आप को बचाने के लिए एक पेड़ की टहनी को पकड़ लिया और उस बहाव से जूझने लगी। पर जिस हाथ से टहनी पकड़ी थी उसकी बगल में दबा बच्चा तो उस बहाव की भेंट चढ़ गया। वो बच्चा तो बह गया किसी को पता तक नहीं चला कि एक जिंदगी ने चलते चलते यूं ही दम तोड़ दिया। उस मां को ऐसा सदमा लगा कि तभी से उनकी आवाज़ चली गई। ये बात है १९६२ की, जब कि बिहार में बाढ़ ने कई माओं की कोक उजाड़ी थी, और ये जो मां थी आज हमारे इस शो को एकंर कर रही लड़की की नानी थीं। ऑफिस में जो सुन रहा था सब की आंखें नम हो चलीं थीं।

आपका अपना
नीतीश राज


दुआ-ओ...ऊपर वाले कर रहम

‘मैंने घर में अपनी पत्नी को जब ये वाक्या बताया तो पूरा सुनने के बाद वो मेरे पास से उठ कर चली गई। हम दोनों की आंखें नम थी। दोनों एक दूसरे को इस बेचारगी के हाल में देख नहीं सकते थे’।
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”