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Wednesday, August 12, 2009

ट्रैफिक की पों...पों...और मेरा मन गीला-गीला।

ऑफिस से घर पहुंचने की जल्दी, घर के रास्ते पर गाड़ियों का शोर और जगह-जगह से उड़ती धूल। रास्ते में बस...किसी कार....या थ्री व्हीलर का बिना बात बजता हॉर्न, बार-बार बजता हॉर्न लगता कि क्या चालक बहरा है या हमें बहरा समझ रखा है या हमें बहरा करने पर तुला हुआ है। आंखें घर तक पहुंचाने वाली बस के इंतजार में, अपनी उस बस के इंतजार में दूर तक देखती मेरी नजर। पर लगता है कि फिर बस का इंतजार करना व्यर्थ हो जाएगा....इतनी भरी होगी कि चढ़ ही नहीं पाऊंगा। यदि बस टाइम पर आ जाए और मिल जाए तो तीन-चार चेंज करने से बच जाता हूं। पर अब समय बर्बाद करने से बेहतर है कि मेट्रो से चला जाए करेंगे चार बार कसरत।

मेट्रो से मुझे तो ये ही अच्छा लगता है कि सफर कब खत्म हो जाता है पता ही नहीं चलता। जब तक संभलते हैं तो पता चलता है कि आपका गंतव्य आगया। पूरा पसीना सूख गया पर अब शुरू होगी घर तक पहुंचने की जंग। धूल-हॉर्न-चिल्लाहट-धूप-उमस-पसीना-गंदगी और पता नहीं क्या-क्या सब से होगा सामना, वो भी एक साथ। धूप इतनी रहती है पर फीडर बस वालों से लड़ों नहीं तो चलेंगे नहीं। देखो, सभी तो बस के अंदर भिच कर बैठे-खड़े हुए हैं। मैं नीचे ही रहता हूं धूप झेल लूंगा पर पसीना-गर्मी नहीं। ये देखो हम धूप में खड़े हुए हैं और ड्राइवर-कंडेक्टर छांव में हंसी-ठिठोली कर रहे हैं। चलो आज मुझे नहीं जाना पड़ा और कोई गया है लड़ने के लिए। भइया दोनों को लेकर ही लौटना। चलो फतह मिली उठ कर आ तो रहे हैं।

कई बस बदल लेने के बाद अपने अंतिम गंतव्य तक पहुंचने के लिए ऑटो की तरफ बढ़ा।
‘अरे, तुम ही तो थे ना भइया कल भी’।
मैंने उसके जवाब का इंतजार भी नहीं किया और बैठ गया।
‘जी साहब, कल मैं ही था। वहीं छोड़ूं ना जहां पर कल छोड़ा था’।
'भइया मेरा घर उसी सोसायटी में ही है तो वहीं छोड़ोगे ना कहीं और क्यों जाऊंगा मैं'।
’नही, नहीं साहब, कहीं सब्जी वगैरा तो नहीं लेने जानी मैं तो ये ही पूछ रहा था। चलिए छोड़ देता हूं यदि बुरा लगा हो तो साहब, ‘सॉरी’।’
ऐसी बात तो थी नहीं कि इसे सॉरी बोलना पड़े। मुझे लगा मैंने बेकार ही इस बेचारे का मन दुखा दिया, उस सवाल का जवाब ‘हां’ में भी तो दिया जा सकता था पर आजकल मैं क्यों जल्दी इरिटेट हो जाता हूं।

मैं पसीने में पूरा तरबतर थ्री व्हीलर में लग रही हवा से काफी राहत महसूस कर रहा था। ओह हो....रेडलाइट भी अभी होनी थी अब जाकर थोड़ी हवा लगने लगी थी पसीना सूखना शुरू हुआ ही था कि ब्रेक लग गया। ऑटो वाले ने ऑटो बंद कर दिया।

सिग्नल ग्रीन होने पर ऑटो वाले ने स्टार्ट किया तो पहली बार में नहीं हुआ, दूसरी बार फिर नहीं हुआ। पीछे से पों...पों...पों....पीं...पीं....पीं...लोगों ने बुरा हाल कर दिया। कुछ कार वाले बगल से निकलते वक्त गाली देते हुए निकले। रेड लाइट पर गाड़ी रुकने की गंभीरता को समझते हुए तुरंत नीचे उतरा और उसके साथ मिलकर धक्का लगाने लगा। कोने में ऑटो को करवा कर उसमें बैठ गया। जितना पसीना सूखा था उससे दोगुना निकल गया। ऑटो भी स्टार्ट हो गया और हमने उसी ग्रीन लाइट को समय रहते पार भी कर लिया।

ऑटो को दोबारा शुरू करने में महज एक मिनट भी नहीं लगा और रेडलाइट ३ मिनट की थी। फिर लोग क्यों हुए इतने बेचैन कि गालियां देते हुए चले गए, हॉर्न पर हॉर्न बजाने लगे। क्या हमारा अंदर संयम खत्म हो चुका है। इसी संयम खत्म होने की वजह से एक्सीडेंट और खून खराबा होता है। घरों में, बीवी के साथ, भाई के साथ, माता-पिता के साथ लड़ाई होती है। इसी संयम ना रखने की वजह से। क्यों हम इतने बेपरवाह हो गए हैं।

मैं घर पहुंच गया और घर पहुंचते-पहुंचते पसीने से मेरी शर्ट सूख चुकी है पर मन गीला-गीला हो रहा है क्योंकि और लोगों की तरह ही मैंने भी तो संयम नहीं बरता था।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, June 29, 2009

इससे सिर्फ हमें परेशानी हुई, फायदा पता नहीं किस का हुआ

शनिवार को जब मेट्रो स्टेशन पहुंचा तो घड़ी सुबह के 7.40 बजा रही थी। ऑफिस के लिए थोड़ा लेट हो चुका था, सोचा कि जल्दी से ट्रेन मिलजाए तो बेहतर। जहां तक मुझे पता था कि एक 7.41 पर और यदि ये छूट गई तो दूसरी 7.50 पर है। याने कि 10 मिनट की और देरी। रविवार का दिन होने की वजह से स्टेशन पर भीड़ नहीं थी कुल 30-35 लोग होंगे। स्टेशन के बाहर मूवमेंट देखी थी, एक दो चैनल की ओबी वैन भी पहुंची हुईं थी, तो सोचा कि शायद ओपनिंग वगैरा होगी तो वीआईपी आ रहा होगा, पुलिस-सेना के जवान भी दिखे, कुछ स्कूली बच्चे भी थे।

स्टेशन की डिस्पले प्लेट बता रही थी कि ट्रेन 6 मिनट के अंदर स्टेशन पर पहुंचेगी। पर 6 मिनट गुजरने के बाद भी समय 6 मिनट ही लगा रहा पर फिर 12 मिनट हो गया। फिर अचानक ही स्टेशन के बाहर कुछ आवाज़ आई। लगा जैसे कि दो-चार पटाखे फूटे हैं फिर धुंआ-धुंआ। मेरे को समझते देर नहीं लगी कि ये मॉक ड्रिल चल रही है। और फोर्स वगैरा इसी मॉक ड्रिल का ही हिस्सा है। थोड़ी देर में एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड की गाड़ियां, हॉर्न के साथ बड़े अफसरों की गाड़ियां भी पहुंच गई। मैं सोच रहा था कि चलो इसके जरिए लोगों को ये तो पता चलेगा कि कभी आपात स्थिति आ जाए तो क्या करना होगा। ये सब नजारा मैं प्लेटफॉर्म से देख रहा था, सभी यात्री भी देख रहे थे। तभी मेरी नज़र स्टेशन की डिस्पले पर पड़ी जिसमें अभी तक 15 मिनट लिखा आ रहा था वहां पर लिखा आ गया कि मॉक ड्रिल के कारण ट्रेनें लेट हो सकती हैं। ये जब लिखा आया तब तक 20-25 मिनट बीत चुके थे। फिर एनाउंसमेंट हुई कि आज मॉक ड्रिल के कारण ट्रेनें लेट हो सकती हैं। फिर डिस्पले हुआ कि मॉक ड्रिल के कारण अभी ट्रेनें नहीं चलेंगी असावधानी के लिए खेद है। एनाउंसर भी बार-बार ये ही एनाउंस करने लगा। फिर एनाउंसमेंट हुई कि जल्दी से प्लेटफॉर्म खाली कर दीजिए, ये भी मॉक ड्रिल का हिस्सा है।

अब यहां से शुरू होती है परेशानी। पता ये चला कि अब ये मॉक ड्रिल एक घंटे तक तो चलेगी ही। मतलब साफ था कि मैं और लेट होने जा रहा हूं। मैंने तुरंत ऑफिस फोन करके इसकी जानकारी दे दी। जब हम प्लेटफॉर्म से बाहर निकल रहे थे तो कुछ लोग मेट्रो कर्मचारी से भिड़ गए। यदि ये मॉक ड्रिल का पहले से पता था तो ये एनाउंसमेंट पहले से होनी चाहिए थी जिससे समय बेकार नहीं जाता। पर पुलिस ने किसी की एक नहीं सुनी और सबको आपातकालीन रास्ते से बाहर निकाल दिया। कुछ नौजवान लड़के-लड़कियां तो बेचार गेट पर सुरक्षाकर्मियों से अनुरोध करते नज़र आए कि आज उनकी परीक्षा है और सेंटर पर ९।३० तक पहुंचना है तो कैसे पहुंचेंगे ऊपर से टिकट का किराया भी ले लिया है। पैसे वापस करने के नाम पर कुछ नहीं दे रहे हैं। ऐसे में वो बेचारे जाएं तो जाएं कहां?

सबसे बड़ी बात मुझे देखने में ये लगी कि मॉक ड्रिल बस मॉक ही होती है। इसमें कई खामियां नज़र आईं। जब आर्मी ने ये बात साफ कर दी कि स्टेशन के बाहर तीन ग्रेनेड से हमला किया गया है, तो फिर लोगों को स्टेशन से बाहर क्यों भेजा जा रहा है? जहां पर सबसे ज्यादा खतरा है साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि बाहर ही हो सकता है कोई और आतंकवादी।

दूसरी कि जब लोगों को बाहर निकाला जा रहा था तो मैं एक साइड हो गया और काउंटर के पास खड़ा हो गया। कई बार फिर मैंने आपातकाल रस्ते से जाने की कोशिश की पर मुझे रोक दिया गया। तकरीबन १५ मिनट के बाद जब किसी का मेरी तरफ कोई ध्यान नहीं गया तो एक अधिकारी को बुलाकर मैंने कहा कि आपका ये अभ्यास बेकार है। उन्होंने तुरंत पूछा कि क्यों, और साथ ही वो मेरे से पूछताछ भी करने लग गए। मैने बताया कि १५ मिनट से मैं यहां पर आपकी आंखों के सामने खड़ा हूं पर किसी ने भी ये जरूरत नहीं समझी कि वो मुझसे पूछे कि मैं कौन हूं, क्यों खड़ा हू?

बाहर पहुंचा तो वो ही बच्चे अपने टिकट वापसी के पैसे का अनुराध कर रहे थे। उन बच्चों का कहना भी सही है जहां पर ये मेट्रो स्टेशन बना हुआ है वो बस स्टैंड से लगभग दो किलोमीटर दूर है। एक बार तो पैदल चल कर आया जा सकता है पर दूसरी बार वापस जाने के लिए तभी पैदल चलना बहुत मु्श्किल है ऊपर से ये गर्मी।

जब स्टेशन के बाहर निकला तो देखा कि काफी मीडिया वालों की तादाद बढ़ चुकी थी। एक अफसर अपने लोगो पर गुस्सा हो रहा था क्योंकि कई गाड़ियों के ड्राइवर गाड़ी खाली छोड़कर यहां-वहां चले गए। अधिकारी ने कहा कि यदि ऐसे गाड़ी कोई छोड़ कर जाता है तो आतंकवादी गाड़ी को लेकर भाग सकता है। यहां पर भी ढीलापन।

जहां पर आग लगी है उसको बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड की गाड़ी भी पहुंची। पर ये क्या, पाइप किस रास्ते से अंदर लाया जा रहा है शायद गलत रास्ता पकड़ लिया। पानी शुरू तुरंत नहीं किया गया क्योंकि पाइप छोटी पड़ गई।

इतनी दिक्कत के बाद सवा-डेढ़ घंटे के बाद ये ऑपरेशन खत्म हुआ। यदि लोगों को पता होता तो कोई मेट्रो की तरफ कूच नहीं करता। मेरी राय तो ये है कि लोगों को पहले बताया जाना चाहिए था कि ऐसा कुछ होगा। जिससे कि जो जानना या देखना चाहता वो भी आ सकता था। ट्रेन के कारण गंतव्य तक पहुंचने में लेट नहीं होते। काफी वोलेन्टियर मिल जाते हैं इन कामों के लिए। दूसरा ये कि यदि करना ही था तो वीक डे में करते तो पता चलता कि ३०-३५ की जगह जब १५०-२०० लोगों को हेंडल करना पड़े तो क्या होता है। तीसरा, यदि ड्रिल की बात मेट्रो कर्मचारियों को पहले से पता थी तो एक निर्धारित समय के बाद से किसी भी यात्रियों को टिकट बांटने ही नहीं चाहिए थे। चौथा, इतने लूज प्वाइंट के बाद तो पुलिस अधिकारियों को अपनी सेना के बारे में जरूर सोचना चाहिए जो कि बहुत आलसी ढंग से इस ड्रिल में लगी हुई थी।

जब मैं अपनी गाड़ी लेने जा रहा था तो मुझसे कई लोगों ने पूछा कि ऐसे समय में हमें क्या करना चाहिए। मैंने उन्हें जवाब तो ये दिया कि पुलिस और आर्मी जैसे संचालित करें उस समय तो वैसा ही करना चाहिए। पर मेरा दिमाग कुछ और जवाब देना चाह रहा था। जब भी कभी ऐसा हो तो सबसे पहले ....भागो....किसी ने भी हमें ये नहीं बताया कि हम क्या करें। हमें रोक के रखा, हमारा समय खराब किया और हमें ही नहीं पता कि ऐसे समय में क्या करें।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”