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Friday, November 14, 2008

"देशद्रोही पर पाबंदी कहां तक सही है"

महाराष्ट्र सरकार ने 'देशद्रोही' फिल्म की स्क्रीनिंग पर बैन लगा दिया है। देशद्रोही पूरे देश में रिलीज हो रही है पर सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं होगी। महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र सिनेमा रेगुलेशन ऐक्ट के तहत 60 दिनों के लिए फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि इस फिल्म के कारण महाराष्ट्र में तनाव फैल सकता है। मुख्य वजह जो मानी जा रही है वो हैं इस फिल्म के डॉयलग, जो कि मराठी और गैर मराठी हिंसा के मुद्दों पर रोशनी डालते हैं। फिल्म की कहानी में नफरत भी है, क्षेत्रवाद भी, राजनीति भी, एक आम इंसान का दर्द भी है, और इन सब मुद्दों के बीच मुंबई झुलस रही है। फिल्म के कई डॉयलग को सुनकर लगेगा कि वाकई ये ही काफी हैं तनाव फैलाने के लिए। लेकिन ये डॉयलग महाराष्ट्र की सच्चाई को भी बताते हैं। साथ ही साथ कुछ डॉयलग ऐसे भी हैं जो कि बताते हैं कि जो मुद्दा कुछ समय से महाराष्ट्र की जमीन पर जंग छेड़े हुए हैं वो वाकई में तो कुछ भी नहीं है सिर्फ राजनीति है। कुछ संवादों से ये भी लगता है कि दिल से दिल को मिलाने की कोशिश भी की गई है।
मुंबई जिस क्षेत्रवाद की आग में जल रही है फिल्म का एक-एक डॉयलाग उसमें नफरत का घी छिड़कता नजर आता है। यूपी से मुंबई गया एक शख्स अपने अंदाज में यूं ही बस कंडक्टर को भईया कहकर संबोधित करता है। "मुझे भईया मत कहो...तुम यूपी बिहार वालों ने मुंबई को कबूतरखाना बना दिया है" उस मराठी कंडक्टर को वो भईया गाली की तरह लगती है और उसे बस से धक्के मार कर निकाल देता है। क्या ये महाराष्ट्र का सच है?
कई संवाद तो ऐसे हैं जिनपर पहले तो सेंसर बोर्ड की तरफ से कांट छांट हो चुकी है और साथ ही एमएनएस को भी उन पर आपत्ति थी। जैसे कि--
"तुम यूपी बिहार वालों ने अनाथ आश्रम बना दिया है मुंबई को" या फिर "बस ड्राइवर कहता है, बीएसटी की जगह भईया ट्रांसपोर्ट कर देना चाहिए"।
जब से फिल्म के प्रोमो दिखने लगे तब से ही फिल्म सुर्खियां बटोरने लगी। आए दिन हर चैनल पर प्रोमो दिखने लगा। फिल्म को बनाने की लागत आई है 5 करोड़ लेकिन प्रचार में खर्च हुए हैं लगभग 7 करोड़। इस फिल्म की रिलीज पर पहले मुंबई पुलिस ने रोक लगाई। विवाद फिर भी नहीं थमा। और आखिरकार राज्य सरकार ने इस फिल्म पर रोक लगा ही दी।
वैसे इस फिल्म के निर्माता-एक्टर कमाल राशिद खान ने हर पल फिल्म के प्रोमो दिखाकर खूब भुनाने की कोशिश की है। पुलिस फिल्म देखे या सेंसर बोर्ड की आपत्ति या फिर किसी भी तरह का विरोध हर बात को पब्लिसिटी की तरह इस्तेमाल किया गया। ये फिल्म पहले से तय तारीख के मुताबिक 14 नवंबर को रिलीज होने वाली थी। निर्माता ने इसका फैसला भी कई दिन पहले ले लिया था। लेकिन देशद्रोही के प्रोमो में इसकी तारीख 7 नवंबर ही रहने दी गई। आखिर इसका भी लाभ मिलना ही था।

फिल्म पर सियासत

कमाल जानते हैं कि फ़िल्म यूपी-बिहार वालों को जम गई तो चल जाएगी। पर महाराष्ट्र सरकार की पाबंदी के बाद कमाल ख़ान महाराष्ट्र सरकार के फ़ैसले पर हैरान हैं। वो अब कोर्ट तक जाने का भी मन बना चुके हैं। फिल्म में क्षेत्र-भाषा का मुद्दा है तो कुछ राजनेता भी फ़िल्म के समर्थन में कूद पड़े हैं। आरजेडी के नेता रामकृपाल यादव फ़िल्म पर लगे बैन को लेकर महाराष्ट्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। कमाल कहते हैं कि देशद्रोही में वही दिखाने की कोशिश की गई है जो मुंबई की सच्चाई है। ये तो महज़ संयोग है कि फ़िल्म ऐसे वक़्त में रिलीज़ हो रही है जब महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक मराठी-गैरमराठी का मुद्दा तूल पकड़ चुका है।

बहती गंगा में दूसरी फिल्म भी रिलीज को तैयार

हिंदी फीचर फिल्म देशद्रोही ने महाराष्ट्र समेत पूरे देश में तहलका मचा दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में फिल्म पर पाबंदी भी लगा दी है। इसी मुद्दे पर बनी और काफी समय से लटकी रवि किशन की भोजपुरी फिल्म भूमिपुत्र भी दो हफ्तों में थियेटर्स में लग जाएगी। रवि किशन की फिल्म भूमिपुत्र के ये सीन जल्दी ही आपको टीवी पर नजर आएंगे। इस फिल्म में बेरोजगार नौजवान रविकिशन रोजी रोटी की तलाश में मुंबई आता है। यहां उसे मराठियों के गुस्से का सामना करना पड़ता है लेकिन धीरे धीरे वो मराठियों का अच्छा दोस्त बन जाता है। वैसे तो ये फिल्म सात महीने पहले ही बनकर तैयार हो चुकी थी पर निर्माता एएम खान का कहना है कि पहले माननीय राज ठाकरे का टेंशन था पर अब सब ठीक है, तो जल्द से जल्द रिलीज कर देंगे। पहले इस फिल्म का नाम भोला बजरंगी रखा गया था लेकिन जैसे ही राज ठाकरे ने भूमिपुत्र का मसला गर्म किया तो फिल्म का नाम बदलकर भूमिपुत्र कर दिया गया।

देशद्रोही ने लेकिन कई सवालों को जन्म दिया है

सबसे बड़ा और अहम सवाल ये उठता है कि जब एक क्षेत्र में आग लगी हो तो क्या ऐसी फिल्म बना कर लोगों की भावनाओं से खेलना चाहिए। राजनेता तो राजनीति करते हैं पर क्या फिल्मकारों के ये नहीं सोचना चाहिए कि वो नेता नहीं हैं। वो तो इन से अलग सोच सकते हैं। आज इस समय वो ही बात याद आ रही है कि छटाक भर की पोस्ट और किलो भर के टैग(याद तो होगा ही सबको वो विवाद)। फिल्म की लगात ५ करोड़ और प्रचार का खर्चा ७ करोड़। इतनी ही रकम लगानी थी तो अच्छे अदाकार भी ले लेते, थोड़ा लेखक को भी दे देते। ये क्या लगता है कि सारे पैसे ही डॉयलग राइटर को दे दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाकर क्या साबित करना चाहा है। राज्य में कानून व्यवस्था बनी रहे तो सिर्फ एक पक्ष से ही हर बार अपेक्षा क्यों रखी जाती है। यदि हालात बिगड़ सकने की बात सरकार मानती है तो ये क्यों नहीं मानती कि हां, विवाद बढ़ चुका है और अब ये आग किसी भी घर के चिराग को नहीं बुझाएगी।
बहरहाल आज ये फिल्म पर्दे पर तो आ जाएगी पर क्या गर्म मुद्दों पर बनी ये फिल्म सूखे पड़े मार्केट में कोई बहार ला सकेगी।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”