वाह भई, चित भी मेरी पट भी मेरी। हम तो करेक्टर के हिसाब से काम करते हैं। यदि स्क्रीप्ट में ये डिमांड है कि हमें अपने पार्टनर के साथ कोई अंतरंग सीन देना है तो हम वो भी करने के लिए तैयार हैं पर ये डिमांड स्क्रीप्ट की होनी चाहिए। हमें लगना चाहिए कि ये फिल्म की डिमांड है। आप भी जानते हैं यदि बीच का सीन होगा तो वहां पर साड़ी पहनकर तो हम जाएंगे नहीं। यदि कोई एक प्रेमिका की भूमिका में है या फिर पत्नी की भूमिका में है तो फिल्म की स्क्रीप्ट के हिसाब से ही काम करना होगा। हमारी कोशिश ये होती है कि कैसे भी हम फिल्म में वो फील लेकर आएं की देख कर लगे कि हां ये रिएल है। ये बात आपको आज कल के अधिक्तर एक्टर कहते सुनते नजर आजाएंगे।
सही बात है कि रिएल का संबंध रील से होता है। इसलिए कई निर्देशक आज भी इसी फिराक में रहते हैं कि कैसे भी जिंदगी के हर कौण को दर्शाती फिल्म बनाई जाए। उस फिल्म में ये सीन अच्छे भी लगते हैं और ये भी दर्शाते हैं कि इनकी उपयोगिता थी फिल्म में, इन सीन की जगह थी फिल्म में। फिल्म को चलाने के लिए जबरन ठांसे नहीं गए हैं। इन फिल्मों में कोई भी हीरो एक साथ 20-25 गुंडों को मारता नजर नहीं आएगा।
कब तक हमारे एक्टर दोहरी जिंदगी पर मुहर लगाते रहेंगे। कब तक अपनी हवस/वासना को पूरा करने के लिए ये ढोंग करते रहेंगे। अपने चेहरे पर नकाब ओढ़े रहेंगे हमारे अदाकार। एक उदाहरण के तौर पर देखें तो, जी हां, पुरानी फिल्मों में किस सीन के लिए दो फूलों को जोड़ दिया जाता था या फिर कैमरा पैन कर दिया जाता था किसी सुंदर जगहों पर। पुरानी फिल्मों में एक हीरो 100 गुंडों की फौज को खत्म कर देता था जबकि गुंडों के पास हथियार होते थे। याने वो फिल्में काल्पनिक चरित्रों पर बनती थीं अधिकतर फिल्में जिन में मारधाड़ होती थी वो रील में रिएल का मिश्रण नहीं होती थीं। आज की फिल्मों में भी किस सीन होते हैं पर यहां फूल नहीं 'स्मूच' को पांच मिनट तक दिखाया जाता है, बहाना है रील में रिएल के तड़के का। पर वहीं दूसरी तरफ एक हीरों आज भी 20-25 गुंडों पर भारी पड़ता है और उन्हें खत्म कर देता है। क्या ये सचमुच संभव है? क्या ये रिएल है? कहीं तो रिएल हो, या तो वो किस रिएल हो सकता है या फिर एक हीरो 20-25 गुंडों पर भारी पड़ सकता है।
20वीं मंजिल से हीरो कूद जाता है, या खुदा हीरो सही सलामत, पर दूसरी मंजिल से विलेन कूदता है तो हाथ-गोड़ तुड़वा बैठता है। अच्छा समझ में आया विलेन का पाप का घड़ा भर गया होगा। किस रिएल कर रहे हो तो फाइट सीन भी रिएल करो। फिर देखते हैं कि गुलाम में हीरो आमिर खान विलेन पर कितना भारी पड़ता है।
अरे, अपनी हरकतों के नाम पर लोगों को बरगलाना बंद करो। यदि है हिम्मत तो काम करो हॉलीवुड के हीरो-हीरोइन की तरह, उदाहरण तो देते हो हर बात पर तो उनके जैसा काम भी करो। वो जो काम करते हैं तो उसके पीछे लॉजिक देने की कोशिश करते हैं। यदि वो दूसरी मंजिल से छलांग लगा रहे हैं और पीछे तार से उनको पकड़ा हुआ है तब भी वो ये दिखाएंगे कि छलांग मारने पर उनको लगी है। पर हमारे हीरो 10वीं मंजिल से छलांग लगाने के बाद भी ठीक से खड़े हो जाएंगे। उनको देखा-देखी कई बच्चे अपनी जान गंवा चुके हैं या फिर अपाहिज हो चुके हैं।
लव सीन देते हुए तो सबसे बड़ा झूठ सामने आता है। कोई पति-पत्नी कितनी देर फोरप्ले करेंगे, उस पर विराम तो लगना है ही तो क्या हमारे अदाकार उन सीन्स को करने का कलेजा रखते हैं। क्या अभी तक कोई हीरो या हीरोइन ने अपने प्राइवेट पार्टस किसी भी मूवी में दिखाए हैं सेक्स के दौरान। सेक्स सीन करेंगे तो मिलेगा 'ए' सर्टिफिकेट और फिर फिल्म चलेगी नहीं तो सिर्फ 17-18 स्मूच सीन से ही काम चलाते हैं। यदि रिएल्टी का शौक चढ़ आया है तो लो अपने फैसले मत बनो प्रोड्यूसर-डायरेक्टर के हाथ की कठपुतली। वैसे हर बात के लिए स्क्रीप्ट का हवाला पर जहां फंसने वाली बात आए तो डायरेक्टर का हवाला। 'ए' सर्टिफिकेट ना दे दिया जाए उसके लिए प्रोड्यूसर और डायरेक्टर एडी चोटी का जोर लगा देते हैं। याद आता है कि अभी हाल ही में रिलीज हुई राज में कंगना रनाउत के एक शॉट में बाथरूम में नेकेड सीन दिया तो कोहराम मच गया। बाद में पता चला कि कंगना ने Body coloured thin skin tight ड्रेस पहन रखी थी। ए सर्टिफिकेट के डर के कारण फैशन के लिए भी मधुर भंडारकर को दिल्ली तक के चक्कर लगाने पड़ गए थे। सब जानते हैं कि यूए सर्टिफिकेट मिल जाएगा तब भी कोई फर्क तो पड़ना नहीं है।
वहीं दूसरी तरफ हॉलीवुड में एक डायरेक्टर अपनी पत्नी को सेक्स सीन समझाता है और वो भी दूसरे एक्टर के साथ कि कैसे इस सीन को अंजाम देना है। वो अदाकारा एक मूवी के लिए लगभग 85 करोड़ लेती हैं और वहीं एक्टर 130 करोड़ के करीब चार्ज करते हैं। हमारे यहां पर इतने में मूवी बन जाती है।
क्या हमारा समाज इतना परिपक्व हो गया है कि वो सेक्स सीन्स को हजम कर सके। मुझे लगता है कि समाज तो हजम कर जाएगा क्योंकि जब बॉलीवुड की मूवी हजम कर जाते हैं तो अपने देश के अदाकारों को हजम क्यों नहीं कर पाएंगे। पर असल बात ये है कि कितना सोचा जाता है किसी फिल्म में रिएल इनपुट के नाम पर? सिर्फ अधिक से अधिक जिस्म दिखा दो और कुछ नहीं, अभी किस करने पर ज्यादा जवाब नहीं देना होता है तो उसकी छूट मिली हुई है।
बस प्रेमी सैफ किस अभिनेत्री को किस कर रहे हैं उससे करीना को एतराज नहीं होना चाहिए और करीना किस को किस कर रही हैं इससे सैफ को कोई मतलब नहीं होना चाहिए। फिर तो गाड़ी चलने दो स्क्रीप्ट की डिमांड के नाम पर और करते रहो किस, बरगलाते रहो दुनिया को पर कुछ रिएल मत करो।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
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Friday, June 12, 2009
Saturday, April 4, 2009
‘मैं आपसे इत्तेफाक नहीं रखता समीर जी’
समीर लाल जी,
पहली बार आप से असहमत हो रहा हूं शायद। गुलाल देखी है मैंने, जितनी आसानी से आपने इसकी समीक्षा कर दी है उतनी आसानी से नहीं बनी है ये फिल्म। अनुराग कश्यप से लेकर केके मेनन, आदित्य श्रीवास्तव, राज चौधरी, पीयूष मिश्रा, अभिमन्यू सिंह, दीपक डोबरियाल सबने बहुत मेहनत करके इस फिल्म को बनाया है। २००१ से अनुराग कश्यप के दिमाग में इस फिल्म का प्लॉट चल रहा था।
हां, मैं ये मान सकता हूं कि फिल्म का विष्य गलत है, जहां हर तरफ बंटने-बांटने की बात चल रही हो तो चिंगारी पैदा करने की जरूरत ही क्या थी। चलिए मान लिया, फिल्म में एक-दो जगह नहीं कई जगह भटकाव है और कुछ हद तक हम ये भी मान लेते हैं कि इस फिल्म के गीत, कविताओं की पैरोडी की तरह लगे।
पर तीन बातों पर शायद लोग गौर नहीं कर पाए-
सभी कलाकारों की अदाकारी,
चाहे राजपूताना नहीं बता पाई हो फिल्म लेकिन राजनीति जरूर बताती है,
फिल्म के गानों के बोल-सुभानअल्लाह।
सभी कलाकारों की अदाकारी
फिल्म के अधिकतर कलाकार रंग मंच से जुड़े हुए हैं। सबने बड़े परदे को थिएटर मानकर अपनी अदाकारी बिखेरी है। लगता है कि फिल्म एक आम आदमी, एक स्टूडेंट से जुड़ी हुई है। वो आम आदमी जिसे नंगा किया जाता है, ‘माइंड वाश’ किया जाता है और जब उसको गुस्सा आता है तो सर भी फोड़ देता है। कमर्शियल मूवी की तरह नहीं कि एक हीरो सौ आदमियों पर भारी पड़ता है और खाली हाथ-पैर से ही एक लोकेशन पर गुंडों को मार डालता है। कलाकारों ने कितने सरल अंदाज में अभिनय किया है ये इस फिल्म की यूएसपी है। किसी कॉलेज के चुनाव को लो बजट मूवी में इसी तरफ से ही दिखाया जा सकता था। चुनाव के समय रणसा का डडबाल के कमरे का दरवाजा खटखटाना और हंसना वहीं दूसरी तरफ दलीप का पीछे से आकर अपना पर्चा लगाना कलाकारी दिखाता है। कोई भी भव्य सेट नहीं है हर जगह आर्ट मूवी जैसी ही दिखती है ये फिल्म।
क्या ये लाइनें हुक्मरानों पर फिट नहीं बैठती-
इस मुल्क ने जिस शख्स को जो काम था सौंपा, उस शख्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी।
एक अमीर बाप से उन्हीं के पैसों पर ऐश करते बेटे की मुंहजोरी-
मुझे अमर चित्रकथा में नहीं जीना।
चाहे राजपूताना नहीं बता पाई हो फिल्म लेकिन राजनीति जरूर बताती है
‘...याद है अफगानिस्तान में नजीबउल्लाह को कैसे चौराहे पर लटकाया था...’।ये डायलॉग केके मेनन के थे जब कि रणसा और दलीप डडबाल का सर खोलकर आते हैं।‘नहीं बना...डडबाल ने नजीबउल्लाह वाली बात का बदला लिया था’। रणसा के क़त्ल से कैसे जोड़ते हैं इस बात को बहन और भाई। बिल्कुल घाघ राजनीति दिखाई गई है। पता ही नहीं चलता कि कब क्या हो रहा है और क्यों? एक उच्च कोटी की राजनीति को दर्शाती है ये फिल्म।
फिल्म के गानों के बोल-सुभानअल्लाह।
मैं आपकी इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं कि-‘गीतों के नाम पर कविताओं की पैरोडी और उन पर झमाझम नाचती, बल खाती बाला.पियूष मिश्रा के गीत पर-जैसे दूर देश के टावर में घुस गयो रे ऐरोप्लेन’।
इस फिल्म में आठ गाने हैं और सभी पीयूष मिश्र ने लिखे है और कुछ गाए भी हैं। किसी दूसरे गाने के बारे में बात क्यों नहीं।
आरंभ है प्रचंड...वीर रस की कविता है। मेरा कुछ सामान...भी एक कविता ही थी जिसे गाने का रूप पंचम दा ने दिया था। और पीयूष मिश्र के गानों में नुक्कड़ संगीत वाली बात भी रहती है क्योंकि वो ज्यादा लोगों को मौका देने की फिराक में रहते हैं। साथ ही कई गानों में तो जैसे ऐसी सज़ा देती हवा तन्हाई भी तन्हा नहीं...इसमें पूरे वेस्टर्न म्यूजिक का इस्तेमाल किया गया है मतलब वादयंत्रों से है। ओ री दुनिया...गाने के शब्द इस दुनिया पर तमाचा मारते हुए लगते हैं साथ ही इस गाने में मुख्य रूप से तबला और हारमोनियम पर गाना बनाया है, आज के म्यूजिक डायरेक्टर बनाए तो जरा। रात के मुसाफिर...गाना नहीं लगता है अपने में ही एक आदमी को चुनौती देता सा लगता है कहीं दूर बैकग्राउंड में गिटार बज रहा है वो भी धीरे-धीरे। जब शहर हमारा सो गयो थो...ये ट्रडिशनल सांग की तर्ज पर बना हुआ लगता है। रणसा की मौत के समय पर ये गाना लगाया गया था और जब भी गाना सुनोतो दृष्य याद आ ही जाता है।यारा...मौला...ये गाना एक फास्ट नंबर है और इसके बोल एक कॉलेज के लड़के की विपदा को पूरा बताते हैं...फिर वो आए, भीड़ बनकर, हाथ में थे उनके खंजर, बोले फेंको ये किताबें, और संभालो ये सलाखें...इस गाने के अंत में...अब हमारे लगा ज़ायका खून का अब बताओ करें तो करें क्या...पढ़ने लिखने वाला छात्र खंजर हाथ में उठा ले तो उसको ये सवाल करने का हक मिल जाता है कि जिन्होंने भी बरगलाया उसको बेहतर है उनसे ये सवाल पूछ ले, ना मिले जवाब तो खुद से पूछ ले। अभी तक इसमें मैंने उस फूहड़ गाने का जिक्र नहीं किया है जो कि बीड़ी जलाईले की तर्ज पर बनाया गया था।
मेरे लिहाज से तो इस फिल्म में ये खूबियां थी जो मैंने देखी।
मैं जानता हूं कि समीर जी के खिलाफ जाने का मतलब है अपने लिए मुसीबत मोल ले लेना लेकिन ये मेरी राय है इस फिल्म के बारे में।
खोने की जिद्द में ये क्यों भूलते हो कि पाना भी होता है....।
आपका अपना
नीतीश राज
पहली बार आप से असहमत हो रहा हूं शायद। गुलाल देखी है मैंने, जितनी आसानी से आपने इसकी समीक्षा कर दी है उतनी आसानी से नहीं बनी है ये फिल्म। अनुराग कश्यप से लेकर केके मेनन, आदित्य श्रीवास्तव, राज चौधरी, पीयूष मिश्रा, अभिमन्यू सिंह, दीपक डोबरियाल सबने बहुत मेहनत करके इस फिल्म को बनाया है। २००१ से अनुराग कश्यप के दिमाग में इस फिल्म का प्लॉट चल रहा था।
हां, मैं ये मान सकता हूं कि फिल्म का विष्य गलत है, जहां हर तरफ बंटने-बांटने की बात चल रही हो तो चिंगारी पैदा करने की जरूरत ही क्या थी। चलिए मान लिया, फिल्म में एक-दो जगह नहीं कई जगह भटकाव है और कुछ हद तक हम ये भी मान लेते हैं कि इस फिल्म के गीत, कविताओं की पैरोडी की तरह लगे।
पर तीन बातों पर शायद लोग गौर नहीं कर पाए-
सभी कलाकारों की अदाकारी,
चाहे राजपूताना नहीं बता पाई हो फिल्म लेकिन राजनीति जरूर बताती है,
फिल्म के गानों के बोल-सुभानअल्लाह।
सभी कलाकारों की अदाकारी
फिल्म के अधिकतर कलाकार रंग मंच से जुड़े हुए हैं। सबने बड़े परदे को थिएटर मानकर अपनी अदाकारी बिखेरी है। लगता है कि फिल्म एक आम आदमी, एक स्टूडेंट से जुड़ी हुई है। वो आम आदमी जिसे नंगा किया जाता है, ‘माइंड वाश’ किया जाता है और जब उसको गुस्सा आता है तो सर भी फोड़ देता है। कमर्शियल मूवी की तरह नहीं कि एक हीरो सौ आदमियों पर भारी पड़ता है और खाली हाथ-पैर से ही एक लोकेशन पर गुंडों को मार डालता है। कलाकारों ने कितने सरल अंदाज में अभिनय किया है ये इस फिल्म की यूएसपी है। किसी कॉलेज के चुनाव को लो बजट मूवी में इसी तरफ से ही दिखाया जा सकता था। चुनाव के समय रणसा का डडबाल के कमरे का दरवाजा खटखटाना और हंसना वहीं दूसरी तरफ दलीप का पीछे से आकर अपना पर्चा लगाना कलाकारी दिखाता है। कोई भी भव्य सेट नहीं है हर जगह आर्ट मूवी जैसी ही दिखती है ये फिल्म।
क्या ये लाइनें हुक्मरानों पर फिट नहीं बैठती-
इस मुल्क ने जिस शख्स को जो काम था सौंपा, उस शख्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी।
एक अमीर बाप से उन्हीं के पैसों पर ऐश करते बेटे की मुंहजोरी-
मुझे अमर चित्रकथा में नहीं जीना।
चाहे राजपूताना नहीं बता पाई हो फिल्म लेकिन राजनीति जरूर बताती है
‘...याद है अफगानिस्तान में नजीबउल्लाह को कैसे चौराहे पर लटकाया था...’।ये डायलॉग केके मेनन के थे जब कि रणसा और दलीप डडबाल का सर खोलकर आते हैं।‘नहीं बना...डडबाल ने नजीबउल्लाह वाली बात का बदला लिया था’। रणसा के क़त्ल से कैसे जोड़ते हैं इस बात को बहन और भाई। बिल्कुल घाघ राजनीति दिखाई गई है। पता ही नहीं चलता कि कब क्या हो रहा है और क्यों? एक उच्च कोटी की राजनीति को दर्शाती है ये फिल्म।
फिल्म के गानों के बोल-सुभानअल्लाह।
मैं आपकी इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं कि-‘गीतों के नाम पर कविताओं की पैरोडी और उन पर झमाझम नाचती, बल खाती बाला.पियूष मिश्रा के गीत पर-जैसे दूर देश के टावर में घुस गयो रे ऐरोप्लेन’।
इस फिल्म में आठ गाने हैं और सभी पीयूष मिश्र ने लिखे है और कुछ गाए भी हैं। किसी दूसरे गाने के बारे में बात क्यों नहीं।
आरंभ है प्रचंड...वीर रस की कविता है। मेरा कुछ सामान...भी एक कविता ही थी जिसे गाने का रूप पंचम दा ने दिया था। और पीयूष मिश्र के गानों में नुक्कड़ संगीत वाली बात भी रहती है क्योंकि वो ज्यादा लोगों को मौका देने की फिराक में रहते हैं। साथ ही कई गानों में तो जैसे ऐसी सज़ा देती हवा तन्हाई भी तन्हा नहीं...इसमें पूरे वेस्टर्न म्यूजिक का इस्तेमाल किया गया है मतलब वादयंत्रों से है। ओ री दुनिया...गाने के शब्द इस दुनिया पर तमाचा मारते हुए लगते हैं साथ ही इस गाने में मुख्य रूप से तबला और हारमोनियम पर गाना बनाया है, आज के म्यूजिक डायरेक्टर बनाए तो जरा। रात के मुसाफिर...गाना नहीं लगता है अपने में ही एक आदमी को चुनौती देता सा लगता है कहीं दूर बैकग्राउंड में गिटार बज रहा है वो भी धीरे-धीरे। जब शहर हमारा सो गयो थो...ये ट्रडिशनल सांग की तर्ज पर बना हुआ लगता है। रणसा की मौत के समय पर ये गाना लगाया गया था और जब भी गाना सुनोतो दृष्य याद आ ही जाता है।यारा...मौला...ये गाना एक फास्ट नंबर है और इसके बोल एक कॉलेज के लड़के की विपदा को पूरा बताते हैं...फिर वो आए, भीड़ बनकर, हाथ में थे उनके खंजर, बोले फेंको ये किताबें, और संभालो ये सलाखें...इस गाने के अंत में...अब हमारे लगा ज़ायका खून का अब बताओ करें तो करें क्या...पढ़ने लिखने वाला छात्र खंजर हाथ में उठा ले तो उसको ये सवाल करने का हक मिल जाता है कि जिन्होंने भी बरगलाया उसको बेहतर है उनसे ये सवाल पूछ ले, ना मिले जवाब तो खुद से पूछ ले। अभी तक इसमें मैंने उस फूहड़ गाने का जिक्र नहीं किया है जो कि बीड़ी जलाईले की तर्ज पर बनाया गया था।
मेरे लिहाज से तो इस फिल्म में ये खूबियां थी जो मैंने देखी।
मैं जानता हूं कि समीर जी के खिलाफ जाने का मतलब है अपने लिए मुसीबत मोल ले लेना लेकिन ये मेरी राय है इस फिल्म के बारे में।
खोने की जिद्द में ये क्यों भूलते हो कि पाना भी होता है....।
आपका अपना
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Friday, November 14, 2008
"देशद्रोही पर पाबंदी कहां तक सही है"
महाराष्ट्र सरकार ने 'देशद्रोही' फिल्म की स्क्रीनिंग पर बैन लगा दिया है। देशद्रोही पूरे देश में रिलीज हो रही है पर सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं होगी। महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र सिनेमा रेगुलेशन ऐक्ट के तहत 60 दिनों के लिए फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि इस फिल्म के कारण महाराष्ट्र में तनाव फैल सकता है। मुख्य वजह जो मानी जा रही है वो हैं इस फिल्म के डॉयलग, जो कि मराठी और गैर मराठी हिंसा के मुद्दों पर रोशनी डालते हैं। फिल्म की कहानी में नफरत भी है, क्षेत्रवाद भी, राजनीति भी, एक आम इंसान का दर्द भी है, और इन सब मुद्दों के बीच मुंबई झुलस रही है। फिल्म के कई डॉयलग को सुनकर लगेगा कि वाकई ये ही काफी हैं तनाव फैलाने के लिए। लेकिन ये डॉयलग महाराष्ट्र की सच्चाई को भी बताते हैं। साथ ही साथ कुछ डॉयलग ऐसे भी हैं जो कि बताते हैं कि जो मुद्दा कुछ समय से महाराष्ट्र की जमीन पर जंग छेड़े हुए हैं वो वाकई में तो कुछ भी नहीं है सिर्फ राजनीति है। कुछ संवादों से ये भी लगता है कि दिल से दिल को मिलाने की कोशिश भी की गई है।
मुंबई जिस क्षेत्रवाद की आग में जल रही है फिल्म का एक-एक डॉयलाग उसमें नफरत का घी छिड़कता नजर आता है। यूपी से मुंबई गया एक शख्स अपने अंदाज में यूं ही बस कंडक्टर को भईया कहकर संबोधित करता है। "मुझे भईया मत कहो...तुम यूपी बिहार वालों ने मुंबई को कबूतरखाना बना दिया है" उस मराठी कंडक्टर को वो भईया गाली की तरह लगती है और उसे बस से धक्के मार कर निकाल देता है। क्या ये महाराष्ट्र का सच है?
कई संवाद तो ऐसे हैं जिनपर पहले तो सेंसर बोर्ड की तरफ से कांट छांट हो चुकी है और साथ ही एमएनएस को भी उन पर आपत्ति थी। जैसे कि--
"तुम यूपी बिहार वालों ने अनाथ आश्रम बना दिया है मुंबई को" या फिर "बस ड्राइवर कहता है, बीएसटी की जगह भईया ट्रांसपोर्ट कर देना चाहिए"।
जब से फिल्म के प्रोमो दिखने लगे तब से ही फिल्म सुर्खियां बटोरने लगी। आए दिन हर चैनल पर प्रोमो दिखने लगा। फिल्म को बनाने की लागत आई है 5 करोड़ लेकिन प्रचार में खर्च हुए हैं लगभग 7 करोड़। इस फिल्म की रिलीज पर पहले मुंबई पुलिस ने रोक लगाई। विवाद फिर भी नहीं थमा। और आखिरकार राज्य सरकार ने इस फिल्म पर रोक लगा ही दी।
वैसे इस फिल्म के निर्माता-एक्टर कमाल राशिद खान ने हर पल फिल्म के प्रोमो दिखाकर खूब भुनाने की कोशिश की है। पुलिस फिल्म देखे या सेंसर बोर्ड की आपत्ति या फिर किसी भी तरह का विरोध हर बात को पब्लिसिटी की तरह इस्तेमाल किया गया। ये फिल्म पहले से तय तारीख के मुताबिक 14 नवंबर को रिलीज होने वाली थी। निर्माता ने इसका फैसला भी कई दिन पहले ले लिया था। लेकिन देशद्रोही के प्रोमो में इसकी तारीख 7 नवंबर ही रहने दी गई। आखिर इसका भी लाभ मिलना ही था।
फिल्म पर सियासत
कमाल जानते हैं कि फ़िल्म यूपी-बिहार वालों को जम गई तो चल जाएगी। पर महाराष्ट्र सरकार की पाबंदी के बाद कमाल ख़ान महाराष्ट्र सरकार के फ़ैसले पर हैरान हैं। वो अब कोर्ट तक जाने का भी मन बना चुके हैं। फिल्म में क्षेत्र-भाषा का मुद्दा है तो कुछ राजनेता भी फ़िल्म के समर्थन में कूद पड़े हैं। आरजेडी के नेता रामकृपाल यादव फ़िल्म पर लगे बैन को लेकर महाराष्ट्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। कमाल कहते हैं कि देशद्रोही में वही दिखाने की कोशिश की गई है जो मुंबई की सच्चाई है। ये तो महज़ संयोग है कि फ़िल्म ऐसे वक़्त में रिलीज़ हो रही है जब महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक मराठी-गैरमराठी का मुद्दा तूल पकड़ चुका है।
बहती गंगा में दूसरी फिल्म भी रिलीज को तैयार
हिंदी फीचर फिल्म देशद्रोही ने महाराष्ट्र समेत पूरे देश में तहलका मचा दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में फिल्म पर पाबंदी भी लगा दी है। इसी मुद्दे पर बनी और काफी समय से लटकी रवि किशन की भोजपुरी फिल्म भूमिपुत्र भी दो हफ्तों में थियेटर्स में लग जाएगी। रवि किशन की फिल्म भूमिपुत्र के ये सीन जल्दी ही आपको टीवी पर नजर आएंगे। इस फिल्म में बेरोजगार नौजवान रविकिशन रोजी रोटी की तलाश में मुंबई आता है। यहां उसे मराठियों के गुस्से का सामना करना पड़ता है लेकिन धीरे धीरे वो मराठियों का अच्छा दोस्त बन जाता है। वैसे तो ये फिल्म सात महीने पहले ही बनकर तैयार हो चुकी थी पर निर्माता एएम खान का कहना है कि पहले माननीय राज ठाकरे का टेंशन था पर अब सब ठीक है, तो जल्द से जल्द रिलीज कर देंगे। पहले इस फिल्म का नाम भोला बजरंगी रखा गया था लेकिन जैसे ही राज ठाकरे ने भूमिपुत्र का मसला गर्म किया तो फिल्म का नाम बदलकर भूमिपुत्र कर दिया गया।
देशद्रोही ने लेकिन कई सवालों को जन्म दिया है
सबसे बड़ा और अहम सवाल ये उठता है कि जब एक क्षेत्र में आग लगी हो तो क्या ऐसी फिल्म बना कर लोगों की भावनाओं से खेलना चाहिए। राजनेता तो राजनीति करते हैं पर क्या फिल्मकारों के ये नहीं सोचना चाहिए कि वो नेता नहीं हैं। वो तो इन से अलग सोच सकते हैं। आज इस समय वो ही बात याद आ रही है कि छटाक भर की पोस्ट और किलो भर के टैग(याद तो होगा ही सबको वो विवाद)। फिल्म की लगात ५ करोड़ और प्रचार का खर्चा ७ करोड़। इतनी ही रकम लगानी थी तो अच्छे अदाकार भी ले लेते, थोड़ा लेखक को भी दे देते। ये क्या लगता है कि सारे पैसे ही डॉयलग राइटर को दे दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाकर क्या साबित करना चाहा है। राज्य में कानून व्यवस्था बनी रहे तो सिर्फ एक पक्ष से ही हर बार अपेक्षा क्यों रखी जाती है। यदि हालात बिगड़ सकने की बात सरकार मानती है तो ये क्यों नहीं मानती कि हां, विवाद बढ़ चुका है और अब ये आग किसी भी घर के चिराग को नहीं बुझाएगी।
बहरहाल आज ये फिल्म पर्दे पर तो आ जाएगी पर क्या गर्म मुद्दों पर बनी ये फिल्म सूखे पड़े मार्केट में कोई बहार ला सकेगी।
आपका अपना
नीतीश राज
मुंबई जिस क्षेत्रवाद की आग में जल रही है फिल्म का एक-एक डॉयलाग उसमें नफरत का घी छिड़कता नजर आता है। यूपी से मुंबई गया एक शख्स अपने अंदाज में यूं ही बस कंडक्टर को भईया कहकर संबोधित करता है। "मुझे भईया मत कहो...तुम यूपी बिहार वालों ने मुंबई को कबूतरखाना बना दिया है" उस मराठी कंडक्टर को वो भईया गाली की तरह लगती है और उसे बस से धक्के मार कर निकाल देता है। क्या ये महाराष्ट्र का सच है?
कई संवाद तो ऐसे हैं जिनपर पहले तो सेंसर बोर्ड की तरफ से कांट छांट हो चुकी है और साथ ही एमएनएस को भी उन पर आपत्ति थी। जैसे कि--
"तुम यूपी बिहार वालों ने अनाथ आश्रम बना दिया है मुंबई को" या फिर "बस ड्राइवर कहता है, बीएसटी की जगह भईया ट्रांसपोर्ट कर देना चाहिए"।
जब से फिल्म के प्रोमो दिखने लगे तब से ही फिल्म सुर्खियां बटोरने लगी। आए दिन हर चैनल पर प्रोमो दिखने लगा। फिल्म को बनाने की लागत आई है 5 करोड़ लेकिन प्रचार में खर्च हुए हैं लगभग 7 करोड़। इस फिल्म की रिलीज पर पहले मुंबई पुलिस ने रोक लगाई। विवाद फिर भी नहीं थमा। और आखिरकार राज्य सरकार ने इस फिल्म पर रोक लगा ही दी।
वैसे इस फिल्म के निर्माता-एक्टर कमाल राशिद खान ने हर पल फिल्म के प्रोमो दिखाकर खूब भुनाने की कोशिश की है। पुलिस फिल्म देखे या सेंसर बोर्ड की आपत्ति या फिर किसी भी तरह का विरोध हर बात को पब्लिसिटी की तरह इस्तेमाल किया गया। ये फिल्म पहले से तय तारीख के मुताबिक 14 नवंबर को रिलीज होने वाली थी। निर्माता ने इसका फैसला भी कई दिन पहले ले लिया था। लेकिन देशद्रोही के प्रोमो में इसकी तारीख 7 नवंबर ही रहने दी गई। आखिर इसका भी लाभ मिलना ही था।
फिल्म पर सियासत
कमाल जानते हैं कि फ़िल्म यूपी-बिहार वालों को जम गई तो चल जाएगी। पर महाराष्ट्र सरकार की पाबंदी के बाद कमाल ख़ान महाराष्ट्र सरकार के फ़ैसले पर हैरान हैं। वो अब कोर्ट तक जाने का भी मन बना चुके हैं। फिल्म में क्षेत्र-भाषा का मुद्दा है तो कुछ राजनेता भी फ़िल्म के समर्थन में कूद पड़े हैं। आरजेडी के नेता रामकृपाल यादव फ़िल्म पर लगे बैन को लेकर महाराष्ट्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। कमाल कहते हैं कि देशद्रोही में वही दिखाने की कोशिश की गई है जो मुंबई की सच्चाई है। ये तो महज़ संयोग है कि फ़िल्म ऐसे वक़्त में रिलीज़ हो रही है जब महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक मराठी-गैरमराठी का मुद्दा तूल पकड़ चुका है।
बहती गंगा में दूसरी फिल्म भी रिलीज को तैयार
हिंदी फीचर फिल्म देशद्रोही ने महाराष्ट्र समेत पूरे देश में तहलका मचा दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में फिल्म पर पाबंदी भी लगा दी है। इसी मुद्दे पर बनी और काफी समय से लटकी रवि किशन की भोजपुरी फिल्म भूमिपुत्र भी दो हफ्तों में थियेटर्स में लग जाएगी। रवि किशन की फिल्म भूमिपुत्र के ये सीन जल्दी ही आपको टीवी पर नजर आएंगे। इस फिल्म में बेरोजगार नौजवान रविकिशन रोजी रोटी की तलाश में मुंबई आता है। यहां उसे मराठियों के गुस्से का सामना करना पड़ता है लेकिन धीरे धीरे वो मराठियों का अच्छा दोस्त बन जाता है। वैसे तो ये फिल्म सात महीने पहले ही बनकर तैयार हो चुकी थी पर निर्माता एएम खान का कहना है कि पहले माननीय राज ठाकरे का टेंशन था पर अब सब ठीक है, तो जल्द से जल्द रिलीज कर देंगे। पहले इस फिल्म का नाम भोला बजरंगी रखा गया था लेकिन जैसे ही राज ठाकरे ने भूमिपुत्र का मसला गर्म किया तो फिल्म का नाम बदलकर भूमिपुत्र कर दिया गया।
देशद्रोही ने लेकिन कई सवालों को जन्म दिया है
सबसे बड़ा और अहम सवाल ये उठता है कि जब एक क्षेत्र में आग लगी हो तो क्या ऐसी फिल्म बना कर लोगों की भावनाओं से खेलना चाहिए। राजनेता तो राजनीति करते हैं पर क्या फिल्मकारों के ये नहीं सोचना चाहिए कि वो नेता नहीं हैं। वो तो इन से अलग सोच सकते हैं। आज इस समय वो ही बात याद आ रही है कि छटाक भर की पोस्ट और किलो भर के टैग(याद तो होगा ही सबको वो विवाद)। फिल्म की लगात ५ करोड़ और प्रचार का खर्चा ७ करोड़। इतनी ही रकम लगानी थी तो अच्छे अदाकार भी ले लेते, थोड़ा लेखक को भी दे देते। ये क्या लगता है कि सारे पैसे ही डॉयलग राइटर को दे दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाकर क्या साबित करना चाहा है। राज्य में कानून व्यवस्था बनी रहे तो सिर्फ एक पक्ष से ही हर बार अपेक्षा क्यों रखी जाती है। यदि हालात बिगड़ सकने की बात सरकार मानती है तो ये क्यों नहीं मानती कि हां, विवाद बढ़ चुका है और अब ये आग किसी भी घर के चिराग को नहीं बुझाएगी।
बहरहाल आज ये फिल्म पर्दे पर तो आ जाएगी पर क्या गर्म मुद्दों पर बनी ये फिल्म सूखे पड़े मार्केट में कोई बहार ला सकेगी।
आपका अपना
नीतीश राज
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