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Saturday, November 15, 2008

क्या केक ऐसे काटा जाता है, नहीं, राज ठाकरे आपने तो केक चीरा है

कुछ लोग करतूत ही ऐसी करते हैं जिसे की कोई हजम नहीं कर सकता। 14 जून 2008 याने की इस साल का ही वीडियो सामने आया है जिसमें राज ठाकरे का जन्मदिन मनाया जा रहा था। इस वीडियो में दिख रहा है कि कैसे कोई किसी से कितनी नफरत कर सकता है कि अपने निजी जश्न में भी वो उसपर वार करने से नहीं चूकता। ये है राज
ठाकरे के दिल में उत्तर भारतीयों के खिलाफ नफरत।

जन्मदिन का वीडियो या फिर नफरत का

वीडियो में दिख रहा है कि एक ऐसा केक काटा जा रहा है जिसपर लिखा था-भैया। भैया, इसका मतलब किसी को समझाने कि जरूरत नहीं है। भैया का मतलब होता है बिहार- यूपी के लोग।
सबसे ज्यादा एतराज केक को काटने में है। जिस तरह से केक को काटा गया उसे शायद हम में से कोई भी ये नहीं कह सकता कि वो केक काटा गया। साफ दिखता है कि केक काटा नहीं गया उसे चीरा गया। सीधे-सीधे राज ठाकरे ने केक को पहले बाएं से दाएं और
फिर दाएं से बाएं चीर दिया जिसपर लिखा था भैया। 40 सेकेंड के वीडियो में ये सब दिखाया गया है।
केक पर वैसे तो नाम ही लिखा जाता है उस शख्स का जिसका कि जन्मदिन होता है। उस केक पर लिखा था भैया, लेकिन क्या राज ठाकरे को भैया के नाम से जाना जाता है या उन्हें कोई राज ठाकरे के नाम से पुकारता है जिसे कि एमएनएस के लोग गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। तो ये बात तो यहीं पर खारिज हो जाती है कि राज ठाकरे को भैया के नाम का केक गिफ्ट किया गया।

राज की बहन या फिर कार्यकर्ता

फिर राज ठाकरे को कोई भैया कहकर बहन पुकारती हो और उसने ये तोहफे के तौर पर भेंट किया हो। बात तुरंत कहते के साथ ही सामने आई। एमएनएस की महिला शाखा की सचिव रीता गुप्ता राज ठाकरे की बहन के रूप में सामने आई। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि ये तो बड़ा ही पर्सनल वीडियो था इसे कैसे कोई सामने ला सकता है। साथ ही वो राज ठाकरे को भैया कहकर पुकारती हैं। तो उन्होंने गिफ्ट किया था अपनी ब्रेकरी में बना केक राज के जन्मदिन पर।
चलिए ये बात तो साफ हो गई कि केक बहन ने दिया था। पर केक काटने का तरीका सही था। रीता गुप्ता जी बार-बार इस सवाल को घुमा जाती। क्योंकि कोई जंगली भी इस तरीके से केक को नहीं काटता। मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति सिर्फ इस बात से ही है।

वीडियो पर सियासत

राज ठाकरे के तहलका मचाने वाले इस वीडियो को जारी करने वाले शख्स है किशोर समरीते। किशोर समरीते मध्यप्रदेश के लांजी क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के विधायक है। सवाल ये है समरीते के पास ये वीडियो कहां से आया.. समरीते इसका खुलासा नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि उनके एक दोस्त ने उन्हें ये वीडियो दिया है। सवाल ये भी है छह महीने पुराने इस वीडियो को अचानक प्रेस को क्यों दिया। माना जा रहा है कि समरीते अपनी सियासत चमकाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे है
राज ठाकरे के इस केक मामले पर सियासत भी गरमा गई है। जहां सभी पार्टी इस की निंदा कर रही हैं। वहीं राज ठाकरे को लालू प्रसाद यादव ने फिर से मेंटल करार दे दिया है।

सही मायने में तो राज ठाकरे ने इस केक को केक माना ही नहीं है। ये है राज ठाकरे की नफरत उत्तर भारतीयों के लिए। लेकिन राज ठाकरे का अपने जन्मदिन को मनाने का तरीका बड़ा ही अनोखा और विचित्र लगा। तो राज ठाकरे इस तरह मनाते हैं अपना जन्मदिन और फैलाते हैं नफरत की आग।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, November 14, 2008

"देशद्रोही पर पाबंदी कहां तक सही है"

महाराष्ट्र सरकार ने 'देशद्रोही' फिल्म की स्क्रीनिंग पर बैन लगा दिया है। देशद्रोही पूरे देश में रिलीज हो रही है पर सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं होगी। महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र सिनेमा रेगुलेशन ऐक्ट के तहत 60 दिनों के लिए फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि इस फिल्म के कारण महाराष्ट्र में तनाव फैल सकता है। मुख्य वजह जो मानी जा रही है वो हैं इस फिल्म के डॉयलग, जो कि मराठी और गैर मराठी हिंसा के मुद्दों पर रोशनी डालते हैं। फिल्म की कहानी में नफरत भी है, क्षेत्रवाद भी, राजनीति भी, एक आम इंसान का दर्द भी है, और इन सब मुद्दों के बीच मुंबई झुलस रही है। फिल्म के कई डॉयलग को सुनकर लगेगा कि वाकई ये ही काफी हैं तनाव फैलाने के लिए। लेकिन ये डॉयलग महाराष्ट्र की सच्चाई को भी बताते हैं। साथ ही साथ कुछ डॉयलग ऐसे भी हैं जो कि बताते हैं कि जो मुद्दा कुछ समय से महाराष्ट्र की जमीन पर जंग छेड़े हुए हैं वो वाकई में तो कुछ भी नहीं है सिर्फ राजनीति है। कुछ संवादों से ये भी लगता है कि दिल से दिल को मिलाने की कोशिश भी की गई है।
मुंबई जिस क्षेत्रवाद की आग में जल रही है फिल्म का एक-एक डॉयलाग उसमें नफरत का घी छिड़कता नजर आता है। यूपी से मुंबई गया एक शख्स अपने अंदाज में यूं ही बस कंडक्टर को भईया कहकर संबोधित करता है। "मुझे भईया मत कहो...तुम यूपी बिहार वालों ने मुंबई को कबूतरखाना बना दिया है" उस मराठी कंडक्टर को वो भईया गाली की तरह लगती है और उसे बस से धक्के मार कर निकाल देता है। क्या ये महाराष्ट्र का सच है?
कई संवाद तो ऐसे हैं जिनपर पहले तो सेंसर बोर्ड की तरफ से कांट छांट हो चुकी है और साथ ही एमएनएस को भी उन पर आपत्ति थी। जैसे कि--
"तुम यूपी बिहार वालों ने अनाथ आश्रम बना दिया है मुंबई को" या फिर "बस ड्राइवर कहता है, बीएसटी की जगह भईया ट्रांसपोर्ट कर देना चाहिए"।
जब से फिल्म के प्रोमो दिखने लगे तब से ही फिल्म सुर्खियां बटोरने लगी। आए दिन हर चैनल पर प्रोमो दिखने लगा। फिल्म को बनाने की लागत आई है 5 करोड़ लेकिन प्रचार में खर्च हुए हैं लगभग 7 करोड़। इस फिल्म की रिलीज पर पहले मुंबई पुलिस ने रोक लगाई। विवाद फिर भी नहीं थमा। और आखिरकार राज्य सरकार ने इस फिल्म पर रोक लगा ही दी।
वैसे इस फिल्म के निर्माता-एक्टर कमाल राशिद खान ने हर पल फिल्म के प्रोमो दिखाकर खूब भुनाने की कोशिश की है। पुलिस फिल्म देखे या सेंसर बोर्ड की आपत्ति या फिर किसी भी तरह का विरोध हर बात को पब्लिसिटी की तरह इस्तेमाल किया गया। ये फिल्म पहले से तय तारीख के मुताबिक 14 नवंबर को रिलीज होने वाली थी। निर्माता ने इसका फैसला भी कई दिन पहले ले लिया था। लेकिन देशद्रोही के प्रोमो में इसकी तारीख 7 नवंबर ही रहने दी गई। आखिर इसका भी लाभ मिलना ही था।

फिल्म पर सियासत

कमाल जानते हैं कि फ़िल्म यूपी-बिहार वालों को जम गई तो चल जाएगी। पर महाराष्ट्र सरकार की पाबंदी के बाद कमाल ख़ान महाराष्ट्र सरकार के फ़ैसले पर हैरान हैं। वो अब कोर्ट तक जाने का भी मन बना चुके हैं। फिल्म में क्षेत्र-भाषा का मुद्दा है तो कुछ राजनेता भी फ़िल्म के समर्थन में कूद पड़े हैं। आरजेडी के नेता रामकृपाल यादव फ़िल्म पर लगे बैन को लेकर महाराष्ट्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। कमाल कहते हैं कि देशद्रोही में वही दिखाने की कोशिश की गई है जो मुंबई की सच्चाई है। ये तो महज़ संयोग है कि फ़िल्म ऐसे वक़्त में रिलीज़ हो रही है जब महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक मराठी-गैरमराठी का मुद्दा तूल पकड़ चुका है।

बहती गंगा में दूसरी फिल्म भी रिलीज को तैयार

हिंदी फीचर फिल्म देशद्रोही ने महाराष्ट्र समेत पूरे देश में तहलका मचा दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में फिल्म पर पाबंदी भी लगा दी है। इसी मुद्दे पर बनी और काफी समय से लटकी रवि किशन की भोजपुरी फिल्म भूमिपुत्र भी दो हफ्तों में थियेटर्स में लग जाएगी। रवि किशन की फिल्म भूमिपुत्र के ये सीन जल्दी ही आपको टीवी पर नजर आएंगे। इस फिल्म में बेरोजगार नौजवान रविकिशन रोजी रोटी की तलाश में मुंबई आता है। यहां उसे मराठियों के गुस्से का सामना करना पड़ता है लेकिन धीरे धीरे वो मराठियों का अच्छा दोस्त बन जाता है। वैसे तो ये फिल्म सात महीने पहले ही बनकर तैयार हो चुकी थी पर निर्माता एएम खान का कहना है कि पहले माननीय राज ठाकरे का टेंशन था पर अब सब ठीक है, तो जल्द से जल्द रिलीज कर देंगे। पहले इस फिल्म का नाम भोला बजरंगी रखा गया था लेकिन जैसे ही राज ठाकरे ने भूमिपुत्र का मसला गर्म किया तो फिल्म का नाम बदलकर भूमिपुत्र कर दिया गया।

देशद्रोही ने लेकिन कई सवालों को जन्म दिया है

सबसे बड़ा और अहम सवाल ये उठता है कि जब एक क्षेत्र में आग लगी हो तो क्या ऐसी फिल्म बना कर लोगों की भावनाओं से खेलना चाहिए। राजनेता तो राजनीति करते हैं पर क्या फिल्मकारों के ये नहीं सोचना चाहिए कि वो नेता नहीं हैं। वो तो इन से अलग सोच सकते हैं। आज इस समय वो ही बात याद आ रही है कि छटाक भर की पोस्ट और किलो भर के टैग(याद तो होगा ही सबको वो विवाद)। फिल्म की लगात ५ करोड़ और प्रचार का खर्चा ७ करोड़। इतनी ही रकम लगानी थी तो अच्छे अदाकार भी ले लेते, थोड़ा लेखक को भी दे देते। ये क्या लगता है कि सारे पैसे ही डॉयलग राइटर को दे दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाकर क्या साबित करना चाहा है। राज्य में कानून व्यवस्था बनी रहे तो सिर्फ एक पक्ष से ही हर बार अपेक्षा क्यों रखी जाती है। यदि हालात बिगड़ सकने की बात सरकार मानती है तो ये क्यों नहीं मानती कि हां, विवाद बढ़ चुका है और अब ये आग किसी भी घर के चिराग को नहीं बुझाएगी।
बहरहाल आज ये फिल्म पर्दे पर तो आ जाएगी पर क्या गर्म मुद्दों पर बनी ये फिल्म सूखे पड़े मार्केट में कोई बहार ला सकेगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, October 31, 2008

ये क्षेत्रवाद की आग है, जो राजनीतिक गलियारे से लेकर आम लोगों तक डर और नफरत का रूप ले चुकी है

कहां जा रहे हैं आप लोग? जी, घर जा रहे हैं। घर? कहां रहते हैं आप लोग, यहां क्या काम के सिलसिले में आना हुआ था या काम करते हैं। जी, हम सभी यूपी के हैं और गोरखपुर जा रहे है। यहां काम करने के लिए आए थे, पर अब घर जा रहे हैं।
ये सुनने के बाद तुरंत सीन बदल जाता है। तकरीबन १०-१२ लड़के धुनाई करने लगते हैं चारों की। चारों कभी हाथ जोड़ते हैं कभी माफी मांगते हैं मुंबई में आने की, लेकिन वो लोग नहीं मानते। वो चारों इस बात का भी वास्ता देते हैं कि अब जो हम जा रहे हैं तो वापिस नहीं आएंगे। अपने और भाईयों से भी कह देंगे कि मुंबई से वापिस चले आओ, सभी को बोलेंगे कि मुंबई नहीं जाना है।
पर कोई इस बात से पिंघलने वाला नहीं था। मारा-पीटा गया सभी को मुर्गा बनाया गया काफी देर तक ये नाटक चलता रहा। इस बीच धर्मदेव को काफी चोट लग चुकी थी। वो तीनों उन से गुहार लगाने लगे कि हमें छोड़ दो नहीं तो इस की मौत हो जाएगी। लेकिन उन दरिंदों ने एक नहीं सुनी और उनको छोड़ने की जगह और यातना देने लगे।
धर्मदेव तो मर गया लेकिन उसके उन तीनों साथियों को पुलिस अपने साथ थाने ले गई। तीनों को बैठाकर रखा गया। एक दम से पूरे देश में जैसे कि इस खबर ने हड़कंप मचाना शुरू कर दिया। मायावती ने केंद्र से हस्ताक्षेप की मांग की औऱ मुआवजे का एलान भी कर दिया। वहीं मुलायम सिंह और अमर सिंह ने अपने-अपने पासे फेंक दिए। केंद्र ने अफरातफरी में महाराष्ट्र सरकार से इस हादसे की रिपोर्ट मांगी। तुरंत जवाब भेजा गया “ये कोई भी प्रांतीय या क्षेत्रवाद का मुद्दा नहीं है, सीट को लेकर दो गुटों में कहासुनी के बाद मारापीटी हुई और जिसमें एक की जान चली गई”।
क्या ये जवाब सच लगता है? दीवाली की रात को मुंबई में कौन सी ऐसी लोकल थी जिसमें कि इतने ज्यादा यात्री थे कि सीट को लेकर मार पिटाई हो गई? इतनी देर तक ये ड्रामा चलता रहा, तो कहां थी रेलवे पुलिस? इस सवालों को उठाते पर तभी हमें भी इस खबर को ‘टोन डाउन’ करने के लिए कहा गया। इसके पीछे सोच ये थी कि कहीं इन खबरों से कुछ चुनिंदा लोगों को तो फायदा होता है लेकिन नुकसान पूरे देश का होता है। तुरंत उत्तर भारतीय शब्द को हटा दिया गया। कहीं पर भी इस बात का जिक्र नहीं किया गया कि धर्मदेव कहां का रहने वाला है।
पर तभी खबर आई कि धर्मदेव के भाई को शव नहीं सौंपा गया और फिर उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया पुलिस के द्वारा। पहले की मार ही नहीं भूले थे उसके साथी और दोस्तों को इस अत्याचार ने और डरा दिया। दोस्तों और साथियों ने कह दिया कि इस से तो बेहतर है थोड़ा कम कमाएंगे लेकिन रहेंगे अपने मुल्क में। धर्मदेव के पिता ने २० लाख के मुआवजे की रकम लेने से मना कर दिया और कहा कि मैं ‘२० लाख देता हूं मुझे राज ठाकरे दे दो’। इस बात से पता चलता है कि उत्तर भारतीयों के मन में भी राज ठाकरे ने घृणा की राजनीति आखिरकार भर ही दी है। ये नफरत की आग सब झुलसा देगी। ये एक बाप की आह थी जो राज ठाकरे को कहीं का भी नहीं छोड़ेगी।
उसके एक साथी शिव ने तो रोते-रोते कह दिया कि वो सब इस हादसे के बाद वापस अपने ‘मुल्क’ चले जाएंगे। इस मुल्क शब्द ने मुझे थोड़ा झकझोर दिया। क्या मुंबई गैर मुल्क हो गया है?
धर्मदेव की मौत हो गई।
धर्मदेव तो चला गया पीछे छोड़ गया वो दहशत जो कि हर उत्तर भारतीय के मन में पैदा होगई है। हर उस गैर परांतीय के मन में एक अनजाना डर बैठा गई है उसकी मौत, जो कि शायद दूर होने के लिए काफी वक्त की दरकार करे।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, October 21, 2008

“है हिम्मत, तो पकड़ लो मुझे, फिर देखना, कैसे पूरा महाराष्ट्र जलता है”

संसद में भी उत्तर भारतियों की पिटाई की गूंज सुनाई दी। पूरे दिन जमकर हंगामा हुआ। पिटाई के बाद ही सभी उत्तर भारतीय नेताओं ने राज ठाकरे के गुंडाराज को आड़े हाथों लिया। कई नेताओं ने मांग की थी कि राज ठाकरे पर लगाम लगे। जैसे लालू ने तो उन्हें मानसिक रोगी करार दे दिया। साथ ही कांग्रेस की सरकार को भी आड़े हाथों लिया। सीएम विलासराव देशमुख तो यहां तक कह गए कि प्रशासन की ही जिम्मेदारी होती है लोगों की सुरक्षा करना और प्रशासन इसमें पूरी तरह नाकाम रहा है, खासकर की एमएनएस की गुंडागर्दी को रोकने में।
लेकिन कांग्रेस की भी इसमें चाल है। इतनी लाचार तो कोई भी सरकार हो नहीं सकती। कांग्रेस जानती है कि शिवसेना की ४० साल पुरानी जातीय राजनीति के नए खेवनहार या कि उत्तराधिकारी के रूप में सामने आ रहे हैं राज ठाकरे। शिवसेना का वोट बैंक राज की झोली में जाएगा। लेकिन महाराष्ट्र में जहां भी उत्तर भारतीय है वो अपने बचाव के लिए कांग्रेस को वोट देंगे। और ऐसे कांग्रेस का फायदा होगा। लेकिन ये तभी संभव है कि जब राज ठाकरे की दादागीरी यूं ही चलती रहे और साथ ही शिवसेना भी उनसे यूं ही भिड़ी रहे। ये कांग्रेस की दीर्घकालीन परियोजना का हिस्सा है।
अब जमशेदपुर कोर्ट ने भड़काऊ भाषण और आपत्तिजनक टिप्पणियों, तोड़फोड़ के लिए राज ठाकरे के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी कर दिया। मुंबई पुलिस को ये मिल भी गया है। मुंबई पुलिस ने दोपहर से ही एमएनएस कार्यकर्ता जो कि दंगा फैला सकते हैं उनकी धरपकड़ तेज कर दी और अबतक ११०० से ज्यादा लोगों को सलाखों के पीछे भेज चुके हैं।
राज ठाकरे की गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है। राज ठाकरे इस समय रत्नागिरी में हैं। मुंबई पुलिस रत्नागिरी पहुंच चुकी है। वहीं राज ठाकरे के वकीलों ने पहल कर दी है इस वारंट के खिलाफ। उन्होंने कोर्ट में अर्जी दाखिल कर दी है जिस पर की शनिवार को फैसला होगा। लेकिन राज ठाकरे के ऊपर गिरफ्तारी के बादल मंडरा रहे हैं।
वहीं राज ठाकरे ने महाराष्ट्र सरकार को चुनौती दी है कि ‘है हिम्मत तो पकड़ लो मुझे और फिर देखो कैसे पूरा महाराष्ट्र आग की लपटों में जलता है’।

तो ये हैं राज ठाकरे जो कि कभी पुलिस को कहते हैं कि वर्दी उतार के सड़क पर आओ तो बताते हैं कि ये मुंबई किसकी है। कभी सरकार को उन्हें गिरफ्तार करने की चुनौती देते हैं और फिर पकड़ने पर अंजाम भुगतने की धमकी भी दे देते हैं। ये हैं आज के नेता राज ठाकरे। फिर भी कई महाराष्ट्र के लोग हैं जो कि इस पागल और मानसिक रोगी के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं। बेहतर होगा कि उन लोगों को राज ठाकरे की ही क्षेणी में ही रखा जाए। उनको भी हम मानसिक रोगी कह सकते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, October 19, 2008

पहले पिटाई, फिर प्रदर्शन, और अब धरपकड़

अभी तो फिल्म बाकी है मेरे दोस्त। यदि देखा जाए तो महाराष्ट्र में नौकरी को लेकर उत्तरभारतियों की पिटाई तो सिर्फ टेलर भर थी। ये पिटाई मराठी बनाम गैरमराठी की है। ये लड़ाई सिर्फ अब एमएनएस की नहीं रह गई है। इस लड़ाई में वोटों की राजनीति है। हर पार्टी अब इस मुद्दे पर वोट का खेल खेलना चाहती है। तभी इस बार एमएनएस के साथ-साथ शिवसेना भी मारपीट की राजनीति में कूद पड़ी, जो कि वो पिछले ४० साल से कर रही है। वो ऐसे कूदी कि पूरे महाराष्ट्र में गुंडागर्दी देखने को मिली। कल्याण, ठाणे, सोलापुर, नेरूला, भांडूप, भायंदर, डोंबीवली सभी इलाकों में इनका क़हर बरपा।
अब महाराष्ट्र में सभी दल ये कहने लगे हैं कि ये किसी पार्टी विशेष की लड़ाई नहीं है ये तो स्थानीय लोगों की लड़ाई है। एक दम से सभी दल के नेताओं को हो क्या गया, कि स्थानीय लोगों की याद दूसरी पार्टी के कारण आने लगी। सीधे-सीधे ये नेतागण कहना चाहते हैं कि ये एमएनएस की लड़ाई नहीं है ये लड़ाई तो हम सब की है, हमने ही तो शुरू की है। मतलब कि वोट हममें भी बटें। सिर्फ कुछ मुट्ठी भर लोग, कुछ चुनिंदा लोग अब पूरे महाराष्ट्र के लोगों की किस्मत का फैसला करेंगे। ये जो गंदी राजनीति चल रही है ये महाराष्ट्र के सभी लोगों की सोच है? मैं तो ऐसा नहीं मानता,ये पूरे महाराष्ट्र की राय नहीं हो सकती।
इस बार इनके निशाने पर थे रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा देने आए उत्तर भारतीय छात्र। देर रात से लेकर सुबह तक जहां पर भी उत्तर भारतीयों को देखा गया वहां पर उनकी शामत आगई। मुंबई में शिवसेना के लोगों ने कोहराम मचाया तो महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में एमएनएस के गुंडों ने। सोलापुर में एमएनएस के गुंडों की भी धुनाई की ये एक नई बात जरूर देखने को मिली और उसी समय 20 कार्यकर्ता गिरफ्तार भी किए गए। शिवसेना के 10 कार्यकर्ता भी पकड़े गए। और अब राज ठाकरे को पकड़ने के लिए 1100 एमएनएस कार्यकर्ता पकड़े गए हैं।
सारे हंगामे की जड़ ये है कि सभी नेता ऐसा सोचते हैं या यूं कहें की मांग करते है कि रेलवे की नौकरी में स्थानीय लोगों को ज्यादा भागीदारी मिले। खासकर चतुर्थ श्रेणी की नौकरी पूरी तरह स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित हों। सिर्फ इसी के चलते यहां पर राजनीति इतनी गरमाई हुई है। तो क्या हमें हमारे देश में ही इस तरह एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने पर यूं बुरी तरीके से जलील होना पड़ेगा।
जैसे कि मैंने पहले लिखा है कि फिल्म तो अभी बाकी है मेरे दोस्त। राज की गिरफ्तारी को लेकर जो ड्रामा शुरू होगा वो तो फिल्म का इंटरवेल होगा और फिर शुरू होगी वो फिल्म जिसकी शूटिंग छठ पूजा के बाद तक चलेगी। लालू प्रासाद यादव ने इस बार छठ पूजा मुंबई में मनाने का एलान किया है। साथ ही राज्य सरकार ने सुरक्षा का पूरा वादा भी किया है। तो फिल्म का क्लाइमैक्स तो अभी बाकी है, सो, फिल्म तो अभी बाकी है... मेरे दोस्त....।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”