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Monday, October 6, 2008

“अमर सिंह ने बाटला वालों पर ठेला अपना दोष, कहा, मुझे तो बाटला वालों ने बरगलाया”

“वर्दी पहने हुए जो भी मरा है और ‘अगर’ वो शहीद है चाह आतंकवादी की गोली से मरा हो चाहे पुलिस वालों ने अपनी गोली से उसे अपनी जान बचाने के लिए मार दिया हो। संदेह इस लिए होता है कि पांच दिन पहले उसे उसके पद से हटा दिया गया था। हमने उसके परिवार के लिए भी 10 लाख रुपये देने की घोषणा की है और वो हम दे भी रहे हैं”।

सहारनपुर में एक बार फिर से समाजवादी पार्टी के महासचिव ने अपना मुंह खोला और फिर वो ही राग अलापा जो कि बाटला जाकर अलापा था। अमर सिंह को इस शहादत पर सियासत चमकाने में बड़ा ही रास आ रहा है। लेकिन पूरे देश को ये समझ में नहीं आ रहा कि अमर सिंह को इस शहादत में सियासत क्यों दिखती है।
अमर सिंह ने ये बात कही कि इंस्पेक्टर शर्मा को पद से हटा दिया गया था। वैसे ये बात वो कह तो गए लेकिन शायद भूल गए कि तबादले को पद से हटाना नहीं कहते। बहरहाल दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने तुरंत बयान दिया,
“औपचारिक रूप से हम ये बताते हैं कि इंस्पेक्टर शर्मा का तबादला नहीं हुआ था, ये कोरी बकवास है”।

यहां पर दिल्ली पुलिस ने भी गलत किया कि जब पहले दिन से ये बयान आ रहा था तो तब ही इस पर क्यों नहीं साफ कर दिया गया।
अब अमर सिंह जी का क्या जवाब होता। ये जानने के लिए तुरंत अमर सिंह से फोन पर बात की गई कि आखिर अब आप क्या कहते हैं। दिल्ली पुलिस खुद कह रही है कि नहीं, ऐसी, कोई भी बात नहीं है, सब बकवास है तबादला हुआ ही नहीं।
अमर सिंह ने तुरंत पलटी मारी, पल भर में अपना रंग बदला और जो कहा वो बताता है कि ये राजनेता किसी गैर के क्या, अपनों के भी नहीं होते।
“मुझे बाटला हाउस पहुंचने पर वहीं के लोकल लोगों ने ही ये जानकारी दी थी कि शहीद इंस्पेक्टर शर्मा जी का तबादला हो चुका था”....लेकिन मैंने जब भी कुछ कहा है तो ‘अगर’ शब्द का इस्तेमाल जरूर किया है।

क्या अमर सिंह को शर्म नहीं आनी चाहिए। बिना सोचे समझे कैसे ये सवाल खड़े कर सकते हैं? ये जानते हुए भी कि ये एक ऐसा विषय है जो कभी भी एक चिंगारी के कारण बवंडर मचा सकता है। सच, अब लगने लगा है कि किसी को भी हम वोट करें पर इन जैसे नेताओं की जमात को तो कतई नहीं। तुरंत ही बाटला हाउस वालों का साथ छोड़ दिया। साफ-साफ कह दिया कि बाटला हाउस वालों ने ही तो बताया था और मुझे क्या पता। एक दिन पहले जाकर मरहम लगाते हैं और दूसरे दिन कुरेद देते हैं ऐसे लोगो में से एक हैं अमर सिंह।
सहारनपुर में ही एक बात दोहराने से अमर सिंह नहीं भूले कि, ‘10 लाख का चेक हमने भेज दिया है शर्मा जी के परिवार को’। शायद याद दिलाना पड़ेगा कि वो चेक वापस हो चुका है। क्योंकि चेक के अंकों में दस लाख की जगह पर एक शून्य छूट गया था और वो एक लाख बन गया था पर शब्दों में दस लाख ही लिखा हुआ था। क्या किसी ने भी ये गौर करने, या फिर रीचैक करने की कोशिश नहीं की। जब कि मामला ऐसा हो तब भी। एक पार्टी के महासचिव से ऐसी तो उम्मीद नहीं की जा सकती। यहां बात और, कि जब आप इस शहादत पर सवाल उठा ही रहे हैं तो १० लाख का चेक देने की ये नौटंकी क्यों की जा रही है?
अंत में, अमर सिंह से ये पूछना चाहता हूं, कि क्या आतंकवादियों का कोई धर्म होता है? दूसरा, क्या ये काफी नहीं है कि आतंकवादी, सिर्फ और सिर्फ आतंकवादी ही होता है? क्यों हम मजहब की दीवार को खड़ा करते हैं जब भी ऐसा कोई वाक्या होता है? देश की सुरक्षा किसी भी मजहब से क्या बड़ी होती है? इन सवालों का जवाब शायद ही किसी नेता के पास हो।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, October 5, 2008

“अमर सिंह, तुम पागल हो गए हो”

समाजवार्दी पार्टी के महासचिव अमर सिंह को बाटला हाउस के बहाने अपने गढ़ पर लगी चोट सालने लगी है। इसलिए अब वो खुलकर अपने गढ़ के समर्थन में उतर आए हैं। हमेशा ही सुर्खियों में बने रहने की इच्छा के कारण इस बार जो जरिया उन्होंने चुना है वो है बाटला हाउस का L-18। दिल्ली का वो एनकाउंटर जिसमें दो आतंकवादी मारे गए थे और एक अभी पुलिस के कब्जे में है। और बाद में तीन और को भी पकड़ गया। और ये तीनों को इस बात का दुख है कि इस वारदात के बाद इतनी जल्दी वो पुलिस के हत्थे चढ़ गए।
अमर सिंह अब अपने गढ़ पर साधे गए पुलिसिया निशाने का जवाब, पुलिस पर वार करके चुका रहे हैं। समाजवादी पार्टी के महासचिव हैं अमर सिंह, तो महासचिव चलेगा तो अध्यक्ष की राह पर ही। याद दिलाना चाहूंगा कि कुछ समय पहले इस पार्टी के अध्यक्ष ने सिमी पर पाबंदी का विरोध किया था। तो अब छोटे मियां क्यों नहीं चलेगें राजनीति की चाल। एनकाउंटर के १३-१४ दिन के बाद अब उन्हें जामिया की याद आगई क्योंकि इनके बड़े भईया की सुलह राज ठाकरे और शाहरुख खान दोनों से हो गई है। तो अब राजनीति चमकाने के लिए कुछ तो होना चाहिए ना। तो बढ़ चले यूपी के मुसलमानों के बाद दिल्ली के मुसलमानों के वोट बैंक की तरफ। भई, आखिर कैंद्र में भी तो आने की इच्छा है।
बाटला हाउस पहुंचकर L-18 में हुए एनकाउंटर पर सवाल खड़ा कर दिया और साथ ही मांग की न्यायिक जांच की। साथ ही लगे हाथ केंद्र सरकार को धमकी भी दे डाली कि यदि मुठभेड़ फर्जी हुई तो सरकार के पंजे से मिलाया हाथ वो खींच लेंगे। शायद अमर सिंह ये नहीं जानते कि कांग्रेस सिर्फ करार को करने के लिए इतना सुन भी रही है। जैसे ही करार पर दस्तखत हुए तो समझ लो कि दूध में मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिए जाओगे। हद तो अमर सिंह ने तब कर दी जब मोहनचंद शर्मा की शहादत पर ही सवालिया निशान लगा दिया। दूसरों के जख्मों पर मरहम लगाने के बहाने औरों को जख्म देने का ये अंदाज अपने में ही निराला लगा। जिस शख्स को पूरा देश शहीद मान रहा है उस पर उंगली उठाने की गलती करने के कारण, क्या खुद अमर सिंह को इस देश का ‘गद्दार’ नहीं माना जाना चाहिए। एक तरफ उन आतंकवादियों की वकालत दूसरी तरफ शहीद पर सवालिया निशान।
“यहां जो मास्टरमाइंड पकड़े गए, वो गोल्ड मेडलिस्ट थे, एमबीए के स्टूडेंट थे”।

साथ ही ये भी...
“जो पुलिस का आदमी यहां मारा गया है वो शहादत के लिए भेजा गया था। जब चार-पांच दिन पहले उसका तबादला हो गया था तो वो फिर यहां पर क्यों फिर रहा था। अपना तबादला रोकने के लिए वो यहां पर आया था।”

ये दो बयान हैं अमर सिंह के ,पहले वाले में साफ वो आतंकवादियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ एक शहीद की शहादत पर सवाल उठा रहे हैं। बिना जानकारी के पुलिस पर वार कर रहे हैं। शायद ये भूल गए कि दो दिन पहले ही सागर में एक मंत्री जब सियासत चमकाने पहुंचे तो पुलिस के इतने डंडे पड़े कि अभी तक आईसीयू में भर्ती हैं। अमर सिंह जी आपको कई उपाधियों से नवाजा जा चुका है। अब आप आतंकवादी भी कहलवाना पसंद करेंगे। सिमी को इंडियन मुजाहिद्दीन और आजमगढ़ को गढ़ आप जैसों ने ही बनाया है।
अधूरी जानकारी के साथ अमर सिंह को कभी बयान नहीं देना चाहिए। दरअसल, एसीपी राजवीर के क़त्ल के बाद से दिल्ली पुलिस ने ये तय किया था कि किसी भी पुलिसवाले को एक जगह पर दस साल से ज्यादा नहीं रखा जाएगा। सितंबर के दूसरे हफ्ते में तबादले के ऑर्डर भी जारी किए गए थे, लेकिन कई अधिकारियों के बारे में ये तय नहीं किया जा सका था, कि कहां जाना है और उसी में से एक थे शहीद मोहन चंद शर्मा भी।
मामला कोर्ट में है तब ऐसे बयान देना कहां तक उचित है? साथ ही आतंकवाद से लड़ रहे उन जवानों पर इन बयानों का क्या असर होगा, ये कभी सोचा है इस बड़बोले समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह ने?वोट बैंक के लिए अमर सिंह इतना गिर जाएंगे ये किसी भी भारतीय ने नहीं सोचा था, पर क्या अभी अमर सिंह का और भी नीचे गर्क में गिरना बाकी है?

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”