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Friday, June 19, 2009

अगर मुंबई जैसा हमला होता तो यूपी पुलिस महीने भर तक कामयाब नहीं होती।

1950-60,1970-80 के दशक में कई फिल्में आई थीं जिसमें हीरो राह भटक कर अपनी जिंदगी की राह ऐसी जगह पर ले जाता था जो उसे आम जिंदगी से दूर ले जाती है। एक ऐसी जगह जहां की राह तो आसान है पर वहां से वापसी मुश्किल। जब वो छुपते-छुपाते, भागते हुए अपने घर या फिर कहीं पैसे लेने या फिर किसी अपने के पास जाता है तो उसके आने की खबर पुलिस को मुखबिर पहले से ही दे चुका रहता है। फिर शुरू होता है चूहे-बिल्ली का खेल, चोर आगे और पुलिस पीछे। फिर हीरो एक घर से दूसरे घर छलांग लगाकर भागता है, सीटी बजाकर अपने घोड़े को बुलाता है और पुलिस की आंखों में धूल झोंक जंगल में कहीं दूर निकल अपने अड्डे तक पहुंच जाता है।

चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, कौसांबी, इलाहाबाद, फतेहपुर के जवान तैनात और एसटीएफ, पीएसी और एसओजी के लगभग ५०० से ज्यादा जवान उस गांव को घेर लेते हैं।

ठीक उसी फिल्मी अंदाज में तीन दिन पहले(१६ जून, २००९) भी हुआ। एक डाकू अपने कुछ साथियों के साथ एक गांव में अपने संबंधियों से मिलने के वास्ते आता है। मुखबिर पहले से ही इस बात की खबर पुलिस तक पहुंचा देता है क्योंकि उस डाकू के सर पर पचास हजार का इनाम। पुलिस रात से ही घात लगा कर बैठ जाती है। सुबह ९-१० बजे जब वो अपने रिश्तेदार के पास पहुंचता है तो पुलिस फिल्मी अंदाज में उस को ललकारती है और फिर गोलियों की आवाज़ से पूरा गांव गूंज उठता है।

उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के इतिहास में अब तक का सबसे लंबा एनकाउंटर।

दोनों ओर से मोर्चाबंदी के बीच गांव में पहले से ही उस इनामी डाकू के हमदर्द मौजूद उसे पुलिस से बचाते हैं। पर इस बीच-बचाव में मौके का फायदा उठाते हुए वो सटीक निशानेबाज डाकू फिर से पुलिस को वो आघात देता है जिस के कारण वो मई २००८ से पुलिस की हिट लिस्ट के पहले नंबर पर शुमार हो गया था जब उसने एसओजी के एक जवान को मौत के घाट उतार दिया था। पुलिस के आला अफसर मुठभेड़ को अंजाम देने में लग जाते हैं। पर वो चतुर डकैत उनको घेर लेता है तो अपने आला अफसरों को बचाने में दो कांस्टेबल शहीद हो जाते हैं। पुलिस उसे जिंदा पकड़ने की कोशिश कर सकती थी पर अब पुलिस उसे कभी भी बर्दाश नहीं कर सकती थी। पुलिस के लगभग १०० जवान उस गांव में मौजूद उस एनकाउंटर को अंजाम देने में जुट जाते हैं और साथ ही नजाकत को समझते हुए आधा दर्जन जिलों की पुलिस चित्रकूट, बांदा, हमीरपु, कौसांबी, इलाहाबाद, फतेहपुर के जवान तैनात हो जाते हैं और एसटीएफ, पीएसी और एसओजी के लगभग ५०० से ज्यादा जवान उस गांव को घेर लेते हैं। पीएसी के कंपनी कमांडर बेनी माधव सिंह और दो सिपाहियों शमीम और गनर इकबाल शहीद हो गए। इतना ही नहीं पीएसी के आईजी एके गुप्ता और बांदा के डीआईजी सुशील कुमार सिंह जख्मी हो गए।

वो १३-१४ फीट ऊंची छत थी जो कि वो ऐसे ही कूद गया वो भी गोलीबारी के बीच।

एक दिन यानी २४ घंटे कब-कब में गुजर जाते हैं पर पुलिस इधर-उधर भागती रहती है पर उसे कोई भी कामयाबी नहीं मिलती। पुलिस के और दस्ते आस-पास के जंगल को घेरने के लिए आ जाते हैं। दूसरे दिन पुलिस का एक कांस्टेबल शहीद और आईजी, डीआईजी समेत एक दर्जन से ज्यादा पुलिसवाले घायल। जबकि पहले दिन के बाद पुलिस ने कहा था कि अगली सुबह वो डाकू नहीं देख पाएगा।

अगर कहीं मुंबई जैसा हमला हो जाता तो शायद यूपी पुलिस तो कुछ भी नहीं कर पाती।

दूसरा दिन, ४८ घंटे तक इस एनकाउंटर को चलते हुए हो जाता है। जबकि पुलिस आधुनिक हथियार के साथ वहां पर तैनात और बाद में पता चलता है कि वो डाकू गिरोह के साथ नहीं एकेला है। उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के इतिहास में अब तक का सबसे लंबा एनकाउंटर।


चित्रकूट के राजापुर थाने के जमौली गांव के एक मकान में छुपकर डाकू घनश्याम केवट पूरे दो दिन से पुलिस से लोहा ले रहा था। पुलिस ने जहां-जहां पर वो मौजूद हो सकता था उस जगह को हथगोलों से बर्बाद कर दिया था। कई घर तबाह कर दिए गए। पुलिस बिल्कुल उसके नजदीक तक पहुंच गई और इस बार अपने एक और जवान को खो बैठी।


५०वां घंटा-फिल्मी स्टाइल से दूसरी मंजिल की छत से एक शख्स कैमरे में कैद होता है जो खुद डाकू घनश्याम केवट था। दूसरी मंजिल की छत पर मौजूद वो शख्स जुड़ी हुई दूसरी छत पर उतरता है और फिर वहां से नीचे कूद जाता है। उस छत से वो ऐसे कूदता है जैसे की सिर्फ कोई छोटी सी हर्डल हो पर वो १३-१४ फीट ऊंची छत थी जो कि वो ऐसे ही कूद गया वो भी गोलीबारी के बीच। फिर देखते ही देखते वो वहां से फरार हो गया। बिल्कुल फिल्मी अंदाज में वो वहां से लगभग १००० पुलिसवालों की आंखों में धूल झौंक कर भाग निकलता है।


ये सब हो रहा था एडीजी बृजलाल की आंखों के सामने क्योंकि इस ऑपरेशन की कमान अब मौके पर पहुंचकर उन्होंने खुद संभाल ली थी। नन्हू उर्फ घनश्याम केवट जंगल की तरफ भाग गया लेकिन पुलिस का घेराबंद इतना सख्त था कि फिर से जंगल में उसे घेर लिया गया। पहली गोली उसे जांघ पर लगी और दूसरी सीने पर और और इस तरह यूपी-एमपी पुलिस के ज्वाइंट ऑपरेशन ने दो दर्जन मामलों में नामजद डाकू नन्हू उर्फ घनश्याम केवट को खत्म कर दिया।
ऑपरेशन तो खत्म हो गया। पर इस एनकाउंटर ने उठा दिए हैं कई सवाल---
१) पुलिस के पास पूरा असला और वहीं डाकू के पास सिर्फ एक हाईरेंज राइफल फिर भी तीन दिन लग गए।
२) करीब १००० पुलिसवाले और वो एक डाकू तो क्या एनकाउंटर इतनी देर तक ही चलना चाहिए था।
३) पुलिस के जवानों को ट्रेनिंग की सख्त कमी दिखी। हमारी पुलिस को पता ही नहीं है कि कैसे ऐसी घटना से पार पाएं। वर्ना एक डाकू इतनी देर तक किसी भी पुलिस के सामने नहीं रुक सकता था।
४) क्या इस एनकाउंटर के समय सिर्फ घनश्याम डाकू ही वहां पर अकेला था कहीं ऐसा तो नहीं कि वो पूरे अपने गिरोह के साथ हो और सिर्फ अपनी जान गंवा कर अपने साथियों की जान बचा ली हो।


सबसे बड़ा सवाल उठा है पुलिस की कार्यप्रणाली पर। अगर कहीं मुंबई जैसा हमला हो जाता तो शायद यूपी पुलिस तो कुछ भी नहीं कर पाती। वो कसाब और उसके साथी एक महीने तक यूपी एसटीएफ से नहीं खदेड़े जाते और वो इनको चकमा देकर भाग जाते। और अंत में एडीजी बृजलाल ने माना कि देरी उनसे हुई और उनके पास रॉकेट लॉन्चर नहीं था।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, April 8, 2009

पढ़ना तो पूरा पढ़ना, वर्ना मत पढ़ना।

‘समीर लाल जी आपकी फरमाइश’

जब भी कभी टूर से वापस लौटता तो अकसर दोस्त-यार मुझसे पूछते हैं कि क्यों कैसा रहा? हमेशा की तरह जवाब होता, बस दुआ है। पर इस बार हाल पूछने पर, ना मालूम मेरे मुंह में इन शब्दों का अकाल क्यों पड़ गया? हर बार इस जवाब को मैं टालता जा रहा था, पर जब मेरे अपनों ने मेरे दिल में छुपी आवाज़ को बाहर निकालने के लिए आवाज़ लगाई तो सोचा कि जुबानी नहीं, अल्फाज के जरिए सब को बता दूं कि आखिर मेरे अंदर कि वो आवाज़ किस तरह जख्मी पड़ी है, जो मुझे लगातार, हर वक्त, मुझे खुद से जुदा किए जा रही है।

आजमगढ़, बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद आतंक की इस जमीन को तलाशने के लिए मैं आजमगढ़ पहुंचा। नाम ले-लेकर कहा जा रहा था कि ये सारे आतंकी आजमगढ़ की ही मिट्टी ने उगले हैं। जब आजमगढ़ पहुंचा तो कुछ चाहने वालों ने कहा, ‘शम्स भाई यहां तक तो ठीक है पर हो सके तो सरायमीर या सनजरपुर नहीं जाना, दो दिन पहले ही कुछ पत्रकारों को पीट चुके हैं और कुछ को तो कई घंटे तक बंधक बना कर रखा, लोगों के अंदर बेइंत्हा गुस्सा है’। जाहिर है मंजिल के इतने करीब पहुंचकर मकसद से भटक मैं सकता नहीं था। आजमगढ़ के अपने साथी राजीव कुमार को साथ लेकर मैं मंजिल की तरफ निकल पड़ा।

आजमगढ़ से करीब तीस किलोमीटर दूर सरायमीर हमारा पहला पड़ाव था। गाड़ी से उतरते ही एक भाई ने दुआ-सलाम के बाद सड़क किनारे दवा की दुकान के बाहर कुर्सी दे दी। अभी हम वहां के ताजा हालात पर बात कर ही रहे थे कि तभी एक लड़का चाय और पानी ले आया। राजीव और हमारे ड्राइवर को ग्लास देने के बाद वो मेरी तरफ बढ़ा। मेरा हाथ मेरी जांघ से उठकर ग्लास की तरफ बढ़ता इस से पहले ही तिफलू भाई बोल पड़े-‘अरे शम्स भाई को मत देना इनका रोजा होगा। क्यों शम्स भाई रोजे से तो हैं ना आप?’ इतना सुनते ही मैं मन मसोस कर और हाथ मल कर मैं रह गया।

तिफलू भाई का इलाके में अच्छा रौब था और वहां के हालात को देखते हुए अब आगे के सफर में उनको अपने साथ रखना एक दानिशमंदाना फैसला था। सबसे पहले हमने रुख किया गुजरात बम धमाकों के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले अबू बशर के गांव बीना पाड़ा का। गांव के प्रधान को पहले ही तिफलू भाई से खबर लग चुकी थी। जब हम पहुंचे तो सीधे अबू बशर के घर के दरवाजे के बाहर ही चारपाई बिछा दी गई थी।
अब हम जिस घर के सामने थे वो था एक आतंकवादी का घर, गुजरात धमाकों के मास्टरमाइंड अबू बशर का घर।

कुछ पल के बाद ही हमें एक बुजुर्ग से मिलवाया गया। शम्स, ये हैं बाकर साहब, अबू बशर के वालिद। उन्हें एक तरफ से फालिज ने मार रखा था। इधर-उधर की बातों के दौरान जितना अबू बशर को उसके वालिद के जरिए टटोल सकता था मैं टटोलने लगा। पर मगर बातचीत के दौरान ही एक ऐसा हादसा हुआ जिसे कि मैं अब भी जेहन से निकाल नहीं पा रहा हूं। बाकर साहब की पीठ उनकी घर की तरफ थी जबकि मेरा मुंह ठीक उनके घर के सदर दरवाजे की तरफ था। बातचीत के दौरान अचानक १४-१५ साल का एक लड़का अबू बशर के घर का दरवाजा खोलता है और फिर बाहर निकलते के साथ ही उस दरवाजे को वापस बंद कर देता है। सिर्फ पांच सेकेंड के लिए घर के अंदर का जो मंजर मैंने देखा तो उसे करीब से देखने के लिए मैं अंदर जाने को आतुर हो गया। पर सवाल ये था कि जाऊं कैसे? इस सवाल के हल के लिए मैंने तुरंत तिफलू भाई को अलग से बुलाकर अपनी ख्वाहिश बता दी।

फिर अगले ही मिनट मैं गुजरात धमाकों के मास्टरमाइंड और सिमी के सबसे खूंखार आतंकवादी अबू बशर के घर के अंदर था। दरवाजे से घुसते ही सामने एक ओसारा था, जिसके नीचे लकड़ी की एक चौकी पड़ी थी। चौकी के दो पांव को ईटों से सहारा दिया गया था। चौकी के सिरहाने(सर की तरफ) बेहद पुराना बिस्तर पड़ा था। जबकि चौकी की बाईं तरफ बगैर गैस के खाली गैस स्टोव करीब आठ ईटों पर रखा हुआ था। स्टोव और ईटों के बीच कुछ साबुत और कुछ अधजली लकड़ियां पड़ी थी। वहीं बराबर में कालिख हो चुके पांच बर्तनों के बराबर में मिट्टी का एक घड़ा रखा था।

उस घर में सिर्फ एक कमरा था। हम उस कमरे को भी देखना चाहते थे पर झिझक थी कि कहीं अंदर कोई महिला ना हो। तिफलू भाई ने हमारी वो परेशानी भी हल कर दो और हमें अंदर लेगए। उस कमरे में सिर्फ अबू बशर की मां ही थी। कमर या फिर कूल्हे पर उन्हें कुछ ऐसी परेशानी है जिसकी वजह से वो चल-फिर नहीं सकतीं। जितनी उनकी उम्र उस से भी उम्रदराज चारपाई पर वो एक मटमैली चादर पर लेटी हुईं थी।

कमरे को चारों तरफ से जब ध्यान से देखा तो लोहे के दो पुराने बक्से और एक ब्रीफकेस के अलावा अंदर कुछ नहीं था। पिता को फालिज और मां का ये दर्द। अबू बशर के दोनों छोटे भाई ही घर का सारा काम-काज करते हैं और साथ ही उन चार बर्तनों में खाना भी वो ही बनाते हैं। तिफलू भाई ने घर से बाहर निकलते वक्त घर के सदर दरवाजे पर नीले रंग का एक सरकारी निशान भी हमें दिखाया। ये निशान गांव के उन घरों के बाहर लगाया गया है जो गरीबी रेखा के नीचे हैं।
दुआ-सलाम के बाद हम वहां से अपने अगले पड़ाव की तरफ बढ़ गए। अगले पड़ावों पर कुछ लोग ऐस मिले जो की सिर्फ मीडिया पर ही दोष मड़ते नज़र आए। वहां पर काफी लोग इस बात से नाराज थे कि हम आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी कैसे कह रहे हैं? मैंने विश्वास दिलाया और तत्काल प्रभाव से उस शब्द को कहीं दूर फिकवा दिया। अबू बशर के घर को तो हम बहुत पीछे छोड़ आए थे पर ना मालूम क्यों अब भी अबू बशर का घर मेरा पीछा ही नहीं छोड़ पा रहा?

शम्स ताहिर खान
(एंकर और क्राइम हेड, आजतक)

(समीर लाल जी की इच्छा थी कि वो ‘आतंकवादी का घर’ पढ़ना चाहते थे। साथ ही मैं अपने सहयोगी शिवेंद्र श्रीवास्तव और सुप्रतिम बनर्जी का शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने शम्स ताहिर खान के ये जज्बात छापने की इज्जात दी।)

****इस स्क्रिप्ट में थोड़ा फेरबदल किया गया है।

Friday, March 13, 2009

अपनों के दर्द में फंसा कोई अपना

बोलने के लिए बोलना और उस बोलने से ना जाने कितनों के दिल को दुखाना, पर फिर भी बोलना। वैसे ही जैसे कि कुछ भी लिखने के लिए बस लिख देना या फिर किसी बात की गहराइयों तक बिना पहुंचे, बात को सामने रख देना उस बात को एक नाम दे देना। क्या और कितना उचित है? कई बार हम, ना जाने कुछ ऐसा कर देते हैं जो कि सामने से हमसे उतना सरोकार ना रखती हों, पर कहीं दूर बैठे लोगों के लिए वो ‘कुछ ऐसा’ ज़िंदगी और मौत की लड़ाई बन जाता है। अपनी आन और शान को जिंदा रखने के लिए वो ना मालूम कितनों की जान ले भी सकते हैं और वक्त पड़ने पर दे भी सकते हैं। वो बातें जो बिना दूर की सोच-समझ के साथ लिखी गई हों वो बातें अप्रत्यक्ष रूप से कभी हम से और कहीं दूर बैठे लोगों से सरोकार जरूर रखती हैं।
हाल ही में मेरे सामने कुछ ऐसी ही बातें सामने आगईं। ऐसा नहीं था कि कभी मैंने या मेरे सहयोगियों ने किसी धर्म, मजहब, या फिर किसी समूह पर निशाना साधकर कुछ लिख दिया हो। पर ऐसा कुछ लिखा गया जिसे हमारी नज़र सही के पैमान से आंक रही थी और वहीं दूसरे की नज़र उसमें गलती बयां कर रही थी। जब तक एहसास को भी एहसास होता तब तक गलती घट चुकी थी और कहीं ना कहीं वो एहसास ही हमें, हमारे कदमों को मंजिल तक की राह दिखा रहे थे।
बाटला एनकाउंटर, हमारी नज़र में सही था पर जो भी बात आपको सही लगे ऐसा नहीं कि दूसरे को भी सही लगे। तो उसी तरह, किसी जगह पर उसे गलत बताया जा रहा था। उस एनकाउंटर में शहीद के नाम को इतना उछाला गया कि उसके बाद लगने लगा कि अब किसी को शहीद होने से पहले सोचना होगा। यहां पर सिर्फ कहने के लिए लोग कह रहे हैं कि वो फर्जी एनकाउंटर था, सिर्फ कहने के लिए, बार-बार कह रहे हैं ‘बेचारों को मार दिया’। कहने के लिए कह दिया कि वो बेचारे थे। पर किसी ने ये नहीं सोचा कि उस मुठभेड़ में कोई शहीद भी हुआ। एक पल में उस की शहादत पर सवालिया निशान लग गया।
‘बर्खुरदार, आप तो वो ही ख़बर दिखाते हो, जो आप लोग दिखाना चाहते हो’।
‘नहीं, हमने वो खबर दिखाई जो सही थी’। ‘जिस दिन एनकाउंटर हुआ उस से एक रोज़ पहले तीन लड़कों को उठाया गया था, कहां गए वो लड़के ‘बेचारों को मार दिया’, बेगुनाहों को मार डाला गया’।
‘आपको सही जानकारी ही नहीं है, आजकल ऐसा नहीं है कि किसी को भी उठाओ और दिखा दो कि मार दिया और कह दो कि होगया एनकाउंटर। पुलिस का जीना दुर्भर कर देता है मीडिया और आयोग। उन तीन लोगों के घरवालों ने हल्ला क्यों नहीं किया कि हमारे बच्चों को उठाया गया? बेकार में लोगों ने बात फैला दी और लोगों ने बिना किसी सोच के बात मान ली’।

अनर्गल आरोपों से लड़के को गुस्सा आ गया था।
‘……नहीं, अब आप पहले मेरी पूरी बात सुनिए, मुझे पूरा कर लेने दीजिए। उन लड़कों के पास से इतने सबूत मिले हैं कि वो उसी वक्त नहीं रखे जा सकते थे जब कि एनकाउंटर हुआ। वो लड़के आज से इस धंधे में नहीं थे वो बहुत पहले से ही इस सब को अंजाम देने में लगे थे। आप के अनुसार तो ये भी होगा कि उस पुलिसवाले को भी पुलिसवालों ने ही मारा। अब आप खुद बताइए कि क्या जरूरत पड़ी थी पुलिसवालों को अपने साथी को मारने की? जवाब नहीं होंगे आप के पास, क्योंकि ये सब मनगढ़ंत है और जो सही था वो सामने आ चुका है, वो गुनहगार थे’।
इस मसले पर और सवाल-जवाब नहीं हो सकते थे, अपने को और फंसाना नहीं चाहते थे वो बुर्जुग, सो बात तो पलटनी ही थी। आखिरकार सच्चाई तो नौजवान पत्रकार के साथ ही थी। पर अब फंसने की बारी नौजवान पत्रकार की थी जो कि खाना खाते हुए सवाल-जवाब में फंसा हुआ था।
‘हूं, चलो छोड़ो इस बात को, लेकिन तुम लोगों ने तो नर्सरी तक कह दिया था! आतंक की नर्सरी, आजमगढ़’।
मुझे एक ब्रेक लगा और मेरा खाना खाना रुक गया। मैंने चेहरा उठाया तो उसी शांत चेहरे के साथ वो बुजुर्ग, उस नौजवान को देख रहे थे, जैसे तौल रहे हों कि अब क्या जवाब दोगे। लेकिन वो नौजवान उसी शांत चेहरे के साथ खाना खाता रहा। अंदर ही अंदर वो नौजवान पत्रकार समझ चुका था कि जो तीर अब छोड़ा गया है वो बेहद पेचीदा है। मुझे याद आ रहा था कि ऑफिस में इस शब्द के ऊपर बहुत बहस हुई थी। पहले लिखने के लिए मना भी किया गया था पर कुछ लोगों ने इस शब्द पर आपत्ती नहीं जाहिर की थी और बाद में ‘वो’ लिखा गया। लिखा दिल्ली में गया था और वहां से बहुत दूर उस शब्द ने अपना क़हर बरपा दिया था। बाद में उस शब्द को हटा दिया गया था।
‘जी हां, लिखा था क्योंकि सारे तार वहीं से जा कर जुड़ रहे थे। ये सिर्फ हम नहीं सब कर रहे थे, पुलिस तक कह रही थी’।
‘पर नाम तो तुम लोगों ने ही रखा था ना, आतंक की नर्सरी, आजमगढ़, तो तुम लोग कुछ भी नाम रख दोगे, ये नहीं सोचोगे कि इसका असर क्या होगा’।

नौजवान ने चुप्पी साध ली।
‘....और तुम क्या पुलिस की बात कर रहे हो उसने तो उठा लिया ना आजमगढ़ से उस लड़के को। क्या वो गुनहगार था? आज भी लखनऊ में उस शब्द की आग की लपटें दिख जाती हैं। आज ही दो ट्रेन भर के आजमगढ़ से लोग आए हैं। कुछ जवाब बनता है सही था उस को गिरफ्तार करना’।
‘नहीं, वो तो गलत था लेकिन हर बार सही हो ऐसा नहीं है, गलती हो ही जाती है’।
‘फिर भी तुम दोगे तो पुलिस और अपने भाइयों का ही साथ, बिरादरी का साथ, पत्रकार बिरादरी का साथ’।

नौजवान बीच खाने से उठ गया। जानता था कि वो इसका जवाब दे नहीं सकता था और उस समय दर्द को छोड़कर कुछ दिखा भी नहीं पाया था, जिसे कुछ ने समझा था और कुछ उसी तरह अनजान बने रहे जिस तरह आज वो बनने की कोशिश कर रहा था। मैंने भी खाना खत्म किया और उठ गया। ना शब्द, ना सवाल, ना जवाब, कुछ भी तो नहीं था हमारे पास। हाथ धोकर सीधे गाड़ी में जाकर बैठ गए और गाड़ी दिल्ली की तरफ दौड़ा दी।
ये संवाद थे एक बाप और बेटे के बीच। ये पहली बार नहीं हैं जब कि खाना आधा छूटा हो ये पहले भी कई बार हो चुका हैं। दिक्कत तो उस पत्रकार के लिए होती है जो कि इस घटना से अपनी ही कौम, अपने ही लोगों का गुनहगार बनकर खड़ा हो जाता है। और उसी काम के लिए तमगा भी पाता है। कभी-कभी एक शब्द से ही दूर-दूर तक उस दर्द का एहसास लंबे समय तक होता है।
इस चुप्पी के बीच मुझे याद आ रहा था ‘एक आतंकवादी का घर’, जिसे मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ‘शम्स ताहिर खान’ ने लिखा था। जिसे मेरे एक ब्लॉगर भाई ने अपने ब्लॉग पर छापा भी था। यदि इजाज़्त मिली तो मैं उसे पेश करूंगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, October 6, 2008

“अमर सिंह ने बाटला वालों पर ठेला अपना दोष, कहा, मुझे तो बाटला वालों ने बरगलाया”

“वर्दी पहने हुए जो भी मरा है और ‘अगर’ वो शहीद है चाह आतंकवादी की गोली से मरा हो चाहे पुलिस वालों ने अपनी गोली से उसे अपनी जान बचाने के लिए मार दिया हो। संदेह इस लिए होता है कि पांच दिन पहले उसे उसके पद से हटा दिया गया था। हमने उसके परिवार के लिए भी 10 लाख रुपये देने की घोषणा की है और वो हम दे भी रहे हैं”।

सहारनपुर में एक बार फिर से समाजवादी पार्टी के महासचिव ने अपना मुंह खोला और फिर वो ही राग अलापा जो कि बाटला जाकर अलापा था। अमर सिंह को इस शहादत पर सियासत चमकाने में बड़ा ही रास आ रहा है। लेकिन पूरे देश को ये समझ में नहीं आ रहा कि अमर सिंह को इस शहादत में सियासत क्यों दिखती है।
अमर सिंह ने ये बात कही कि इंस्पेक्टर शर्मा को पद से हटा दिया गया था। वैसे ये बात वो कह तो गए लेकिन शायद भूल गए कि तबादले को पद से हटाना नहीं कहते। बहरहाल दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने तुरंत बयान दिया,
“औपचारिक रूप से हम ये बताते हैं कि इंस्पेक्टर शर्मा का तबादला नहीं हुआ था, ये कोरी बकवास है”।

यहां पर दिल्ली पुलिस ने भी गलत किया कि जब पहले दिन से ये बयान आ रहा था तो तब ही इस पर क्यों नहीं साफ कर दिया गया।
अब अमर सिंह जी का क्या जवाब होता। ये जानने के लिए तुरंत अमर सिंह से फोन पर बात की गई कि आखिर अब आप क्या कहते हैं। दिल्ली पुलिस खुद कह रही है कि नहीं, ऐसी, कोई भी बात नहीं है, सब बकवास है तबादला हुआ ही नहीं।
अमर सिंह ने तुरंत पलटी मारी, पल भर में अपना रंग बदला और जो कहा वो बताता है कि ये राजनेता किसी गैर के क्या, अपनों के भी नहीं होते।
“मुझे बाटला हाउस पहुंचने पर वहीं के लोकल लोगों ने ही ये जानकारी दी थी कि शहीद इंस्पेक्टर शर्मा जी का तबादला हो चुका था”....लेकिन मैंने जब भी कुछ कहा है तो ‘अगर’ शब्द का इस्तेमाल जरूर किया है।

क्या अमर सिंह को शर्म नहीं आनी चाहिए। बिना सोचे समझे कैसे ये सवाल खड़े कर सकते हैं? ये जानते हुए भी कि ये एक ऐसा विषय है जो कभी भी एक चिंगारी के कारण बवंडर मचा सकता है। सच, अब लगने लगा है कि किसी को भी हम वोट करें पर इन जैसे नेताओं की जमात को तो कतई नहीं। तुरंत ही बाटला हाउस वालों का साथ छोड़ दिया। साफ-साफ कह दिया कि बाटला हाउस वालों ने ही तो बताया था और मुझे क्या पता। एक दिन पहले जाकर मरहम लगाते हैं और दूसरे दिन कुरेद देते हैं ऐसे लोगो में से एक हैं अमर सिंह।
सहारनपुर में ही एक बात दोहराने से अमर सिंह नहीं भूले कि, ‘10 लाख का चेक हमने भेज दिया है शर्मा जी के परिवार को’। शायद याद दिलाना पड़ेगा कि वो चेक वापस हो चुका है। क्योंकि चेक के अंकों में दस लाख की जगह पर एक शून्य छूट गया था और वो एक लाख बन गया था पर शब्दों में दस लाख ही लिखा हुआ था। क्या किसी ने भी ये गौर करने, या फिर रीचैक करने की कोशिश नहीं की। जब कि मामला ऐसा हो तब भी। एक पार्टी के महासचिव से ऐसी तो उम्मीद नहीं की जा सकती। यहां बात और, कि जब आप इस शहादत पर सवाल उठा ही रहे हैं तो १० लाख का चेक देने की ये नौटंकी क्यों की जा रही है?
अंत में, अमर सिंह से ये पूछना चाहता हूं, कि क्या आतंकवादियों का कोई धर्म होता है? दूसरा, क्या ये काफी नहीं है कि आतंकवादी, सिर्फ और सिर्फ आतंकवादी ही होता है? क्यों हम मजहब की दीवार को खड़ा करते हैं जब भी ऐसा कोई वाक्या होता है? देश की सुरक्षा किसी भी मजहब से क्या बड़ी होती है? इन सवालों का जवाब शायद ही किसी नेता के पास हो।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, October 5, 2008

“अमर सिंह, तुम पागल हो गए हो”

समाजवार्दी पार्टी के महासचिव अमर सिंह को बाटला हाउस के बहाने अपने गढ़ पर लगी चोट सालने लगी है। इसलिए अब वो खुलकर अपने गढ़ के समर्थन में उतर आए हैं। हमेशा ही सुर्खियों में बने रहने की इच्छा के कारण इस बार जो जरिया उन्होंने चुना है वो है बाटला हाउस का L-18। दिल्ली का वो एनकाउंटर जिसमें दो आतंकवादी मारे गए थे और एक अभी पुलिस के कब्जे में है। और बाद में तीन और को भी पकड़ गया। और ये तीनों को इस बात का दुख है कि इस वारदात के बाद इतनी जल्दी वो पुलिस के हत्थे चढ़ गए।
अमर सिंह अब अपने गढ़ पर साधे गए पुलिसिया निशाने का जवाब, पुलिस पर वार करके चुका रहे हैं। समाजवादी पार्टी के महासचिव हैं अमर सिंह, तो महासचिव चलेगा तो अध्यक्ष की राह पर ही। याद दिलाना चाहूंगा कि कुछ समय पहले इस पार्टी के अध्यक्ष ने सिमी पर पाबंदी का विरोध किया था। तो अब छोटे मियां क्यों नहीं चलेगें राजनीति की चाल। एनकाउंटर के १३-१४ दिन के बाद अब उन्हें जामिया की याद आगई क्योंकि इनके बड़े भईया की सुलह राज ठाकरे और शाहरुख खान दोनों से हो गई है। तो अब राजनीति चमकाने के लिए कुछ तो होना चाहिए ना। तो बढ़ चले यूपी के मुसलमानों के बाद दिल्ली के मुसलमानों के वोट बैंक की तरफ। भई, आखिर कैंद्र में भी तो आने की इच्छा है।
बाटला हाउस पहुंचकर L-18 में हुए एनकाउंटर पर सवाल खड़ा कर दिया और साथ ही मांग की न्यायिक जांच की। साथ ही लगे हाथ केंद्र सरकार को धमकी भी दे डाली कि यदि मुठभेड़ फर्जी हुई तो सरकार के पंजे से मिलाया हाथ वो खींच लेंगे। शायद अमर सिंह ये नहीं जानते कि कांग्रेस सिर्फ करार को करने के लिए इतना सुन भी रही है। जैसे ही करार पर दस्तखत हुए तो समझ लो कि दूध में मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिए जाओगे। हद तो अमर सिंह ने तब कर दी जब मोहनचंद शर्मा की शहादत पर ही सवालिया निशान लगा दिया। दूसरों के जख्मों पर मरहम लगाने के बहाने औरों को जख्म देने का ये अंदाज अपने में ही निराला लगा। जिस शख्स को पूरा देश शहीद मान रहा है उस पर उंगली उठाने की गलती करने के कारण, क्या खुद अमर सिंह को इस देश का ‘गद्दार’ नहीं माना जाना चाहिए। एक तरफ उन आतंकवादियों की वकालत दूसरी तरफ शहीद पर सवालिया निशान।
“यहां जो मास्टरमाइंड पकड़े गए, वो गोल्ड मेडलिस्ट थे, एमबीए के स्टूडेंट थे”।

साथ ही ये भी...
“जो पुलिस का आदमी यहां मारा गया है वो शहादत के लिए भेजा गया था। जब चार-पांच दिन पहले उसका तबादला हो गया था तो वो फिर यहां पर क्यों फिर रहा था। अपना तबादला रोकने के लिए वो यहां पर आया था।”

ये दो बयान हैं अमर सिंह के ,पहले वाले में साफ वो आतंकवादियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ एक शहीद की शहादत पर सवाल उठा रहे हैं। बिना जानकारी के पुलिस पर वार कर रहे हैं। शायद ये भूल गए कि दो दिन पहले ही सागर में एक मंत्री जब सियासत चमकाने पहुंचे तो पुलिस के इतने डंडे पड़े कि अभी तक आईसीयू में भर्ती हैं। अमर सिंह जी आपको कई उपाधियों से नवाजा जा चुका है। अब आप आतंकवादी भी कहलवाना पसंद करेंगे। सिमी को इंडियन मुजाहिद्दीन और आजमगढ़ को गढ़ आप जैसों ने ही बनाया है।
अधूरी जानकारी के साथ अमर सिंह को कभी बयान नहीं देना चाहिए। दरअसल, एसीपी राजवीर के क़त्ल के बाद से दिल्ली पुलिस ने ये तय किया था कि किसी भी पुलिसवाले को एक जगह पर दस साल से ज्यादा नहीं रखा जाएगा। सितंबर के दूसरे हफ्ते में तबादले के ऑर्डर भी जारी किए गए थे, लेकिन कई अधिकारियों के बारे में ये तय नहीं किया जा सका था, कि कहां जाना है और उसी में से एक थे शहीद मोहन चंद शर्मा भी।
मामला कोर्ट में है तब ऐसे बयान देना कहां तक उचित है? साथ ही आतंकवाद से लड़ रहे उन जवानों पर इन बयानों का क्या असर होगा, ये कभी सोचा है इस बड़बोले समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह ने?वोट बैंक के लिए अमर सिंह इतना गिर जाएंगे ये किसी भी भारतीय ने नहीं सोचा था, पर क्या अभी अमर सिंह का और भी नीचे गर्क में गिरना बाकी है?

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, September 29, 2008

“बाटला के L-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है”

‘बाटला के एल-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है’। ये मैं नहीं कह रहा हूं ये वो तीन आतंकवादी कह रहे हैं जो कि एनकाउंटर के बाद से दक्षिण दिल्ली से पकड़े गए हैं। शकील, जिया और साकिब ये तीनों रो रहे हैं अपने गुनाहों के लिए अल्लाह से रहम की जगह मौत मांग रहे हैं। ये पुलिस से भी मौत मांग रहे हैं। कस्टडी में जब भी इनको कोई पुलिसवाला दिख जाता है तभी ये रोना शुरू कर के गिड़गि़ड़ाते हुए उनसे अपने गुनाहों का वास्ता देते हुए सज़ा की भीख मांगते हैं। क्या आपने कभी आतंकवादियों को भीख मांगते हुए देखा है? शायद नहीं ही देखा होगा ये तो वो जालिम होते हैं जो कि औरों से भीख मंगवाते हैं। लेकिन आज ये खुद भीख मांग रहे हैं अपनी मौत की। दिन में रोते हैं, रात में रोते हैं, जमीन-दीवार पर सर मार-मार कर रोते हैं। लेकिन सच जो कि अर्द्धसत्य नहीं कि ये भीख उन्हें कोई भी नहीं दे सकता।
अभी कई बार पढ़ा कि लोग सवाल उठा रहे हैं कि एल-18 में जो एनकाउंटर हुआ वो फर्जी था। मैंने सबकी दलीलें सुनी हैं, साथ में ‘बड़े-बड़े’ लोगों की दलीलें भी सुनी हैं। दलीलें हैं हमने वहां पर आसपास के परिवार वालों से बातें की। जितने मुंह उतनी बातें। अब ये समझ में नहीं आता कि जब हर जगह से अलग-अलग कहानी सुनने को मिल रही हैं तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि उन सारी कहानियों में से कोई एक भी सही है। फिर पुलिस के बयान को भी एक दलील मान कर सच माना जा सकता है।
हर कोई जानना चाहता है सच। ये सच या तो सैफ बता सकता है जो कि वहां से पकड़ा गया या फिर एक शख्स और है जो असलियत बता सकता है। कुछ का मानना है कि भई, सैफ को तो वहां लाया गया था उसे कैसे पता होगा। तो जवाब है, क्यों आंखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या सैफ ने। चलो, मान लें कि सैफ को कुछ भी नहीं पता।
उस दूसरे शख्स को पूछते हैं कि भई, क्या हुआ था। वो हैं कांस्टेबल बलवंत। उस मुठभेड़ में गोली इस शख्स को भी लगी। एम्स ट्रामा सेंटर में इलाज चल रहा है। एक हाथ जो कि चोटिल हुआ वो बच पाया तो बहुत ही होगा। ये बात जो मैं बताने जा रहा हूं वो बलवंत ने किसी मीडियाकर्मी या फिर पुलिस-डॉक्टर को नहीं बताई है। ये बात उसने अपने साथ काम करने वाले एक साथी को बताई है वो भी सबके सामने नहीं बिल्कुल निजी तौर पर।
बलवंत ने अपने साथी के पूछने पर ये बताया कि पूरा घटनाक्रम कैसे-क्या हुआ बताया ही नहीं जा सकता लेकिन मोटा-मोटा क्या हुआ बता देता हूं। उन्होंने बोलना शुरू किया,
‘हम साहब(स्व.इंस्पेक्टर शर्मा) के साथ उपर गए। सेल्समैन बनें हमारे सहयोगी ने हमें कमरा-कमरे का नक्शा यानी समान कहां-कहां रखा है, हथियार दिखे कि नहीं और जो भी उसने देखा था, कम शब्दों में, सब बता दिया था। साहब आगे थे हम सब लोग पीछे, अपनी-अपनी जगह चुनते हुए, खड़े होते रहे, मैं साहब के साथ ही था। साहब ने जाते ही दरवाजे में ठोकर मारी और खोलने के लिए आवाज़ लगाई। लेकिन जब खोलने में देर होने लगी तो साहब ने दरवाजे में दो तीन ठोकरें और जड़ दीं साथ ही ‘जल्दी खोलो’ की आवाज़ भी लगाई। फिर क्या हुआ असल में समझ में नहीं आया, नहीं पता चला कि क्या हुआ। चीख चिल्लाहट के बीच गोलियां चलने लगी और उसके आगे कि तो तुम रोज ही पढ़ते रहते होगे’
।
तो ये थी बलवंत की अपने साथी से बातचीत। अब और तो शायद ही प्रमाण कोई दे सकता हो। फिर और भी बातें हुईं, वो कुछ महकमे की, कुछ घर परिवार की, कुछ स्व. शर्मा जी के परिवार की।
पुलिस ने एल-18 से जो चीजें बरामद की हैं उनमें से कई चीजें ऐसी हैं जो कि इन आतंकवादियों को ओवरस्मार्ट साबित करती हैं। 900 से ज्यादा फोटों उनके लैपटॉप से बरामद हुई हैं। इन तस्वीरों में ब्लास्ट की तस्वीरें हैं। कुछ वीडियों भी मिले हैं जो कि ब्लास्ट के तुरंत बाद के हैं। उन तस्वीरों में कुछ तो वो हैं जैसे कि मणिनगर में साइकिल की जिसमें कि शकील और जिया ने बम लगाया था। उन सभी कारों की तस्वीरें हो जो कि अहमदाबाद में उपयोग की गईं। बम और टाइमर कार के अंदर प्लांट करते हुए की तस्वीरें हैं। कार के अंदर बम रखा हुआ है, फोटो पर समय बता रहा है शाम के 5.45 और फिर दूसरी तस्वीर भी वहीं कि ब्लास्ट के 5 मिनट बाद की 6.25। साथ ही ऐसा करते हुए इनको लगता था कि पुलिस हो या स्थानीय लोग इन्हें मीडिया का समझेंगे कोई भी हाथ नहीं लगाएगा। इसके अलावा और क्या सबूत दें। और लीजिए सबूत। ये सब फोटो और वीडियो सीडी और मेल के साथ एटैच करके भेजी जाती थीं। देखिए हमने कितने अच्छे ढ़ंग से काम को अंजाम दिया है। कई-कई सिम और ब्लास्ट के बाद और पहले भी एक ही सिम पर कॉल किया गया।
जैसे ही पुलिस को टिप मिली थी इन लड़कों के बारे में जो कि एल-18 में रहते हैं तो उस दिन से ही इनका फोन सर्विलांस पर लग चुका था। पुलिस ने इनकी बातें सुनीं। इनके कारगुजारियों के किस्से भी सुने। लेकिन कभी भी बातचीत में इन्होंने हथियार के बार में जिक्र नहीं किया। ये ही कारण था कि स्व. इस्पेक्टर शर्मा बिना किसी लाइफ गार्ड के दरवाजा खटखटाने चले गए।
सब ये सोच जरूर रहे होंगे कि शकील, जिया और साकिब रो क्यों रहे थे। पुलिस की मार से या क्या कारण था। स्पेशल सेल ने उनको अहमदाबाद ब्लास्ट और बैंगलोर ब्लास्ट के साथ-साथ दिल्ली के दर्द की तस्वीरें भी दिखाईं हैं। इन तस्वीरों को देख कर वो अपने को माफ नहीं कर पा रहे हैं। अब वो बताते हैं कि उन्हें तो मुंबई के दंगों, बाबरी मस्जिद, गोधरा के दंगों की तस्वीरें दिखाई हैं। बोला गया उनको तकरीरें दी गईं हैं और कई न्यूज चैनलों की वो स्टोरी दिखाई गईं हैं जो कि ब्लास्ट के बाद किसी मुस्लिम परिवार पर कवर की गईं थी। वो बताते हैं कि हमें तो कभी रॉ सामान नहीं मिलता था। हम से कहा जाता कि ये सामान वहां रखकर आ जाना है। सिर्फ रखने का झंझट रहता था और वो भी पहले से ही तयशुदा रहता था कि कैसे-क्या करना हैं।
आधा सच जानकर ना जाने ये नौजवान क्यों बहक जाते हैं। पूर्ण सच की तलाश कठिन तो होती है पर नामुमकिन नहीं। लेकिन सच सच ही होता है उसमें से ना घटाया जा सकता है और ना ही उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद कुछ सच और सामने आएंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, September 20, 2008

दिल्ली में 'ये लाइव एनकाउंटर'

पुलिस को पता चला था कि बाटला हाऊस के इलाके में जो कि जामिया नगर इलाके में है उस की बिल्डिंग नंबर-एल १८ के चौथे फ्लोर पर कुछ आतंकवादी छुपे हुए हैं। बस इसके बाद का जो वाक्या है कोई नहीं जानता। एक बॉडी को जल्दी से ले जाया जा रहा है, कपड़े से लिपटी थी वो बॉडी। एक पुलिसवाला जो कि खून से लथपथ है उसे कुछ पुलिसकर्मी जल्दी से अस्पताल ले जाते हैं। फिर एक शख्स को पकड़कर उसपर चादर डालकर पुलिस ले जा रही हैं। बिल्कुल घालमेल सा पता चलता है, कहीं से, कुछ भी पुख्ता नहीं। ना ही किसी चैनल के पास ना ही कोई अधिकारी बोलने के लिए तैयार। बाद में पता चला कि आतंकवादियों के पास से ८ राउंड गोलियां चलाई गई, और दिल्ली पुलिस ने २२ राउंड फायर किए। कहा तो ये भी गया कि पुलिस वहां पर इन्वेस्टिगेट करने गई थी लेकिन आतंकवादियों ने पहले फायर खोलकर पुलिस को चुनौती दी।
धीरे-धीरे जानकारी मिलना शुरू हुई और फिर शाम ४ बजे डडवाल जीकी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ही खत्म हुई। फिर भी कई सवाल अनसुलझे।
पुलिस दिल्ली ब्लास्ट के बाद से ही इस कोशिश में लगी हुई थी कि उन्हें कोई टिप मिले और वो उस पर काम कर सके क्योंकि सबूत तो पूरे जुटा लिए गए थे। जैसे ही इन आतंकवादियों के ठहरने का पता चला तो स्पेशल सेल हरकत में आगया। वो नहीं चाहते थे कि इस मौके को कैसे भी छोड़ें। जिनको भी इस बारे में पता था वो सब चल दिए और पुलिस बल का बंदोबस्त पीछे से किया जा रहा था। सब को पता था कि वो बाटला में सघन तलाशी अभियान चलाएंगे। लेकिन इस तलाशी अभियान ने एनकाउंटर का रूप ले लिया। जिसमें कि दो आतंकवादी मारे गए और एक को पकड़ लिया गया। एक मारे गए आतंकी का नाम आतिफ उर्फ बशीर बताया गया, दूसरे का नाम साजिद और जो पकड़ा गया है उसका नाम सैफ है उसके पैर में लगी है गोली। और सबसे शर्मनाक ये की दो भाग गए।
तीनों के तीनों आजमगढ़ के हैं। इस जगह से एक एके ४७, दो रेगुल्यर पिस्टल, कंप्यूटर भी मिले, साथ ही काफी कागजात और नक्शे भी। दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा जो ऑपरेशन को लीड कर रहे थे उन्हें तीन गोली लगीं, तुरंत उपचार के लिए उन्हें होली फैमिली अस्पताल भेज दिया गया। दो गोली निकाल दी गई लेकिन तीसरी गोली जो कि उनके पेट में लगी थी उसने उनकी जान ले ली। ७ वीरता पुरस्कार और १५० इनाम से सम्मानित थे शहीद इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा, उन्होंने ७५ एनकाउंटर किए जिसमें ३५ आतंकवादियों को मार गिराया और ८५ आतंकियों को कानून के शिकंजे तक पहुंचाया। एसीपी राजबीर सिंह के साथ भी इंस्पेक्टर शर्मा ने कई एनकाउंटर में हाथ बटाया था। हेड कांन्सटेबल बलवंत को भी गोली लगी थी और एम्स में उनका उपचार चला, खतरे से वो बाहर हैं।
पुलिस ने जो जानकारी दी वो बहुत ही काबिले गौर करने वाली है। अबु बशर जिसको की गुजरात से दिल्ली लाया गया उसकी निशानदेही पर ये धरपकड़ नहीं हुई। जयपुर, बैंगलोर, अहमदाबाद, और अब दिल्ली में जितने भी ब्लास्ट हुए सभी चार जगहों का जायज़ा इस आतिफ और तौकीर ने लिया था। तौकीर ने ही भेजे हैं सारी जगह पर मेल और सभी मेल खुद तौकीर ने ही लिखे हैं। इन आतंकवादियों को पकड़ने के लिए दिल्ली धमाकों के बाद से ही २२ टीमें अलग अलग काम कर रहीं थीं। तकरीबन ५० हजार मोबाइल की कॉल डिटेल निकाले गए। दिल्ली पुलिस गुजरात पुलिस के संपर्क में भी थी। वहीं पर ये आतंकवादी दिल्ली की जगहों का जायजा जुटा कर गुजरात निकल गए। १२ लोगों की टीम गुजरात गई और २४ को अहमदाबाद पहुंचे। २६ को धमाकों के बाद फिर २७ को दिल्ली वापिस आ गए। वैसे इस बिल्डिंग एल-१८ में ये आतंकी लगभग २ महीने से रह रहे थे। दिल्ली में ही बैठकर ये सारी जगहों का प्लान किया गया।
अब दिल्ली पुलिस को किसी भी अंजाम तक ले जा सकता है तो वो है पकड़ा गया तीसरा आतंकवादी सैफ। वो ही बता सकेगा कि बचकर भागने वालों में कहीं तौकीर ही तो नहीं था?

लाइव एनकाउंटर पर मीडिया का रोल अगली बार।
जारी है...

आपका अपना
नीतीश राज
(शहीद इंस्पेक्टर शर्मा को श्रद्धाजलि)
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”