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Wednesday, April 8, 2009

पढ़ना तो पूरा पढ़ना, वर्ना मत पढ़ना।

‘समीर लाल जी आपकी फरमाइश’

जब भी कभी टूर से वापस लौटता तो अकसर दोस्त-यार मुझसे पूछते हैं कि क्यों कैसा रहा? हमेशा की तरह जवाब होता, बस दुआ है। पर इस बार हाल पूछने पर, ना मालूम मेरे मुंह में इन शब्दों का अकाल क्यों पड़ गया? हर बार इस जवाब को मैं टालता जा रहा था, पर जब मेरे अपनों ने मेरे दिल में छुपी आवाज़ को बाहर निकालने के लिए आवाज़ लगाई तो सोचा कि जुबानी नहीं, अल्फाज के जरिए सब को बता दूं कि आखिर मेरे अंदर कि वो आवाज़ किस तरह जख्मी पड़ी है, जो मुझे लगातार, हर वक्त, मुझे खुद से जुदा किए जा रही है।

आजमगढ़, बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद आतंक की इस जमीन को तलाशने के लिए मैं आजमगढ़ पहुंचा। नाम ले-लेकर कहा जा रहा था कि ये सारे आतंकी आजमगढ़ की ही मिट्टी ने उगले हैं। जब आजमगढ़ पहुंचा तो कुछ चाहने वालों ने कहा, ‘शम्स भाई यहां तक तो ठीक है पर हो सके तो सरायमीर या सनजरपुर नहीं जाना, दो दिन पहले ही कुछ पत्रकारों को पीट चुके हैं और कुछ को तो कई घंटे तक बंधक बना कर रखा, लोगों के अंदर बेइंत्हा गुस्सा है’। जाहिर है मंजिल के इतने करीब पहुंचकर मकसद से भटक मैं सकता नहीं था। आजमगढ़ के अपने साथी राजीव कुमार को साथ लेकर मैं मंजिल की तरफ निकल पड़ा।

आजमगढ़ से करीब तीस किलोमीटर दूर सरायमीर हमारा पहला पड़ाव था। गाड़ी से उतरते ही एक भाई ने दुआ-सलाम के बाद सड़क किनारे दवा की दुकान के बाहर कुर्सी दे दी। अभी हम वहां के ताजा हालात पर बात कर ही रहे थे कि तभी एक लड़का चाय और पानी ले आया। राजीव और हमारे ड्राइवर को ग्लास देने के बाद वो मेरी तरफ बढ़ा। मेरा हाथ मेरी जांघ से उठकर ग्लास की तरफ बढ़ता इस से पहले ही तिफलू भाई बोल पड़े-‘अरे शम्स भाई को मत देना इनका रोजा होगा। क्यों शम्स भाई रोजे से तो हैं ना आप?’ इतना सुनते ही मैं मन मसोस कर और हाथ मल कर मैं रह गया।

तिफलू भाई का इलाके में अच्छा रौब था और वहां के हालात को देखते हुए अब आगे के सफर में उनको अपने साथ रखना एक दानिशमंदाना फैसला था। सबसे पहले हमने रुख किया गुजरात बम धमाकों के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले अबू बशर के गांव बीना पाड़ा का। गांव के प्रधान को पहले ही तिफलू भाई से खबर लग चुकी थी। जब हम पहुंचे तो सीधे अबू बशर के घर के दरवाजे के बाहर ही चारपाई बिछा दी गई थी।
अब हम जिस घर के सामने थे वो था एक आतंकवादी का घर, गुजरात धमाकों के मास्टरमाइंड अबू बशर का घर।

कुछ पल के बाद ही हमें एक बुजुर्ग से मिलवाया गया। शम्स, ये हैं बाकर साहब, अबू बशर के वालिद। उन्हें एक तरफ से फालिज ने मार रखा था। इधर-उधर की बातों के दौरान जितना अबू बशर को उसके वालिद के जरिए टटोल सकता था मैं टटोलने लगा। पर मगर बातचीत के दौरान ही एक ऐसा हादसा हुआ जिसे कि मैं अब भी जेहन से निकाल नहीं पा रहा हूं। बाकर साहब की पीठ उनकी घर की तरफ थी जबकि मेरा मुंह ठीक उनके घर के सदर दरवाजे की तरफ था। बातचीत के दौरान अचानक १४-१५ साल का एक लड़का अबू बशर के घर का दरवाजा खोलता है और फिर बाहर निकलते के साथ ही उस दरवाजे को वापस बंद कर देता है। सिर्फ पांच सेकेंड के लिए घर के अंदर का जो मंजर मैंने देखा तो उसे करीब से देखने के लिए मैं अंदर जाने को आतुर हो गया। पर सवाल ये था कि जाऊं कैसे? इस सवाल के हल के लिए मैंने तुरंत तिफलू भाई को अलग से बुलाकर अपनी ख्वाहिश बता दी।

फिर अगले ही मिनट मैं गुजरात धमाकों के मास्टरमाइंड और सिमी के सबसे खूंखार आतंकवादी अबू बशर के घर के अंदर था। दरवाजे से घुसते ही सामने एक ओसारा था, जिसके नीचे लकड़ी की एक चौकी पड़ी थी। चौकी के दो पांव को ईटों से सहारा दिया गया था। चौकी के सिरहाने(सर की तरफ) बेहद पुराना बिस्तर पड़ा था। जबकि चौकी की बाईं तरफ बगैर गैस के खाली गैस स्टोव करीब आठ ईटों पर रखा हुआ था। स्टोव और ईटों के बीच कुछ साबुत और कुछ अधजली लकड़ियां पड़ी थी। वहीं बराबर में कालिख हो चुके पांच बर्तनों के बराबर में मिट्टी का एक घड़ा रखा था।

उस घर में सिर्फ एक कमरा था। हम उस कमरे को भी देखना चाहते थे पर झिझक थी कि कहीं अंदर कोई महिला ना हो। तिफलू भाई ने हमारी वो परेशानी भी हल कर दो और हमें अंदर लेगए। उस कमरे में सिर्फ अबू बशर की मां ही थी। कमर या फिर कूल्हे पर उन्हें कुछ ऐसी परेशानी है जिसकी वजह से वो चल-फिर नहीं सकतीं। जितनी उनकी उम्र उस से भी उम्रदराज चारपाई पर वो एक मटमैली चादर पर लेटी हुईं थी।

कमरे को चारों तरफ से जब ध्यान से देखा तो लोहे के दो पुराने बक्से और एक ब्रीफकेस के अलावा अंदर कुछ नहीं था। पिता को फालिज और मां का ये दर्द। अबू बशर के दोनों छोटे भाई ही घर का सारा काम-काज करते हैं और साथ ही उन चार बर्तनों में खाना भी वो ही बनाते हैं। तिफलू भाई ने घर से बाहर निकलते वक्त घर के सदर दरवाजे पर नीले रंग का एक सरकारी निशान भी हमें दिखाया। ये निशान गांव के उन घरों के बाहर लगाया गया है जो गरीबी रेखा के नीचे हैं।
दुआ-सलाम के बाद हम वहां से अपने अगले पड़ाव की तरफ बढ़ गए। अगले पड़ावों पर कुछ लोग ऐस मिले जो की सिर्फ मीडिया पर ही दोष मड़ते नज़र आए। वहां पर काफी लोग इस बात से नाराज थे कि हम आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी कैसे कह रहे हैं? मैंने विश्वास दिलाया और तत्काल प्रभाव से उस शब्द को कहीं दूर फिकवा दिया। अबू बशर के घर को तो हम बहुत पीछे छोड़ आए थे पर ना मालूम क्यों अब भी अबू बशर का घर मेरा पीछा ही नहीं छोड़ पा रहा?

शम्स ताहिर खान
(एंकर और क्राइम हेड, आजतक)

(समीर लाल जी की इच्छा थी कि वो ‘आतंकवादी का घर’ पढ़ना चाहते थे। साथ ही मैं अपने सहयोगी शिवेंद्र श्रीवास्तव और सुप्रतिम बनर्जी का शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने शम्स ताहिर खान के ये जज्बात छापने की इज्जात दी।)

****इस स्क्रिप्ट में थोड़ा फेरबदल किया गया है।

Friday, March 13, 2009

अपनों के दर्द में फंसा कोई अपना

बोलने के लिए बोलना और उस बोलने से ना जाने कितनों के दिल को दुखाना, पर फिर भी बोलना। वैसे ही जैसे कि कुछ भी लिखने के लिए बस लिख देना या फिर किसी बात की गहराइयों तक बिना पहुंचे, बात को सामने रख देना उस बात को एक नाम दे देना। क्या और कितना उचित है? कई बार हम, ना जाने कुछ ऐसा कर देते हैं जो कि सामने से हमसे उतना सरोकार ना रखती हों, पर कहीं दूर बैठे लोगों के लिए वो ‘कुछ ऐसा’ ज़िंदगी और मौत की लड़ाई बन जाता है। अपनी आन और शान को जिंदा रखने के लिए वो ना मालूम कितनों की जान ले भी सकते हैं और वक्त पड़ने पर दे भी सकते हैं। वो बातें जो बिना दूर की सोच-समझ के साथ लिखी गई हों वो बातें अप्रत्यक्ष रूप से कभी हम से और कहीं दूर बैठे लोगों से सरोकार जरूर रखती हैं।
हाल ही में मेरे सामने कुछ ऐसी ही बातें सामने आगईं। ऐसा नहीं था कि कभी मैंने या मेरे सहयोगियों ने किसी धर्म, मजहब, या फिर किसी समूह पर निशाना साधकर कुछ लिख दिया हो। पर ऐसा कुछ लिखा गया जिसे हमारी नज़र सही के पैमान से आंक रही थी और वहीं दूसरे की नज़र उसमें गलती बयां कर रही थी। जब तक एहसास को भी एहसास होता तब तक गलती घट चुकी थी और कहीं ना कहीं वो एहसास ही हमें, हमारे कदमों को मंजिल तक की राह दिखा रहे थे।
बाटला एनकाउंटर, हमारी नज़र में सही था पर जो भी बात आपको सही लगे ऐसा नहीं कि दूसरे को भी सही लगे। तो उसी तरह, किसी जगह पर उसे गलत बताया जा रहा था। उस एनकाउंटर में शहीद के नाम को इतना उछाला गया कि उसके बाद लगने लगा कि अब किसी को शहीद होने से पहले सोचना होगा। यहां पर सिर्फ कहने के लिए लोग कह रहे हैं कि वो फर्जी एनकाउंटर था, सिर्फ कहने के लिए, बार-बार कह रहे हैं ‘बेचारों को मार दिया’। कहने के लिए कह दिया कि वो बेचारे थे। पर किसी ने ये नहीं सोचा कि उस मुठभेड़ में कोई शहीद भी हुआ। एक पल में उस की शहादत पर सवालिया निशान लग गया।
‘बर्खुरदार, आप तो वो ही ख़बर दिखाते हो, जो आप लोग दिखाना चाहते हो’।
‘नहीं, हमने वो खबर दिखाई जो सही थी’। ‘जिस दिन एनकाउंटर हुआ उस से एक रोज़ पहले तीन लड़कों को उठाया गया था, कहां गए वो लड़के ‘बेचारों को मार दिया’, बेगुनाहों को मार डाला गया’।
‘आपको सही जानकारी ही नहीं है, आजकल ऐसा नहीं है कि किसी को भी उठाओ और दिखा दो कि मार दिया और कह दो कि होगया एनकाउंटर। पुलिस का जीना दुर्भर कर देता है मीडिया और आयोग। उन तीन लोगों के घरवालों ने हल्ला क्यों नहीं किया कि हमारे बच्चों को उठाया गया? बेकार में लोगों ने बात फैला दी और लोगों ने बिना किसी सोच के बात मान ली’।

अनर्गल आरोपों से लड़के को गुस्सा आ गया था।
‘……नहीं, अब आप पहले मेरी पूरी बात सुनिए, मुझे पूरा कर लेने दीजिए। उन लड़कों के पास से इतने सबूत मिले हैं कि वो उसी वक्त नहीं रखे जा सकते थे जब कि एनकाउंटर हुआ। वो लड़के आज से इस धंधे में नहीं थे वो बहुत पहले से ही इस सब को अंजाम देने में लगे थे। आप के अनुसार तो ये भी होगा कि उस पुलिसवाले को भी पुलिसवालों ने ही मारा। अब आप खुद बताइए कि क्या जरूरत पड़ी थी पुलिसवालों को अपने साथी को मारने की? जवाब नहीं होंगे आप के पास, क्योंकि ये सब मनगढ़ंत है और जो सही था वो सामने आ चुका है, वो गुनहगार थे’।
इस मसले पर और सवाल-जवाब नहीं हो सकते थे, अपने को और फंसाना नहीं चाहते थे वो बुर्जुग, सो बात तो पलटनी ही थी। आखिरकार सच्चाई तो नौजवान पत्रकार के साथ ही थी। पर अब फंसने की बारी नौजवान पत्रकार की थी जो कि खाना खाते हुए सवाल-जवाब में फंसा हुआ था।
‘हूं, चलो छोड़ो इस बात को, लेकिन तुम लोगों ने तो नर्सरी तक कह दिया था! आतंक की नर्सरी, आजमगढ़’।
मुझे एक ब्रेक लगा और मेरा खाना खाना रुक गया। मैंने चेहरा उठाया तो उसी शांत चेहरे के साथ वो बुजुर्ग, उस नौजवान को देख रहे थे, जैसे तौल रहे हों कि अब क्या जवाब दोगे। लेकिन वो नौजवान उसी शांत चेहरे के साथ खाना खाता रहा। अंदर ही अंदर वो नौजवान पत्रकार समझ चुका था कि जो तीर अब छोड़ा गया है वो बेहद पेचीदा है। मुझे याद आ रहा था कि ऑफिस में इस शब्द के ऊपर बहुत बहस हुई थी। पहले लिखने के लिए मना भी किया गया था पर कुछ लोगों ने इस शब्द पर आपत्ती नहीं जाहिर की थी और बाद में ‘वो’ लिखा गया। लिखा दिल्ली में गया था और वहां से बहुत दूर उस शब्द ने अपना क़हर बरपा दिया था। बाद में उस शब्द को हटा दिया गया था।
‘जी हां, लिखा था क्योंकि सारे तार वहीं से जा कर जुड़ रहे थे। ये सिर्फ हम नहीं सब कर रहे थे, पुलिस तक कह रही थी’।
‘पर नाम तो तुम लोगों ने ही रखा था ना, आतंक की नर्सरी, आजमगढ़, तो तुम लोग कुछ भी नाम रख दोगे, ये नहीं सोचोगे कि इसका असर क्या होगा’।

नौजवान ने चुप्पी साध ली।
‘....और तुम क्या पुलिस की बात कर रहे हो उसने तो उठा लिया ना आजमगढ़ से उस लड़के को। क्या वो गुनहगार था? आज भी लखनऊ में उस शब्द की आग की लपटें दिख जाती हैं। आज ही दो ट्रेन भर के आजमगढ़ से लोग आए हैं। कुछ जवाब बनता है सही था उस को गिरफ्तार करना’।
‘नहीं, वो तो गलत था लेकिन हर बार सही हो ऐसा नहीं है, गलती हो ही जाती है’।
‘फिर भी तुम दोगे तो पुलिस और अपने भाइयों का ही साथ, बिरादरी का साथ, पत्रकार बिरादरी का साथ’।

नौजवान बीच खाने से उठ गया। जानता था कि वो इसका जवाब दे नहीं सकता था और उस समय दर्द को छोड़कर कुछ दिखा भी नहीं पाया था, जिसे कुछ ने समझा था और कुछ उसी तरह अनजान बने रहे जिस तरह आज वो बनने की कोशिश कर रहा था। मैंने भी खाना खत्म किया और उठ गया। ना शब्द, ना सवाल, ना जवाब, कुछ भी तो नहीं था हमारे पास। हाथ धोकर सीधे गाड़ी में जाकर बैठ गए और गाड़ी दिल्ली की तरफ दौड़ा दी।
ये संवाद थे एक बाप और बेटे के बीच। ये पहली बार नहीं हैं जब कि खाना आधा छूटा हो ये पहले भी कई बार हो चुका हैं। दिक्कत तो उस पत्रकार के लिए होती है जो कि इस घटना से अपनी ही कौम, अपने ही लोगों का गुनहगार बनकर खड़ा हो जाता है। और उसी काम के लिए तमगा भी पाता है। कभी-कभी एक शब्द से ही दूर-दूर तक उस दर्द का एहसास लंबे समय तक होता है।
इस चुप्पी के बीच मुझे याद आ रहा था ‘एक आतंकवादी का घर’, जिसे मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ‘शम्स ताहिर खान’ ने लिखा था। जिसे मेरे एक ब्लॉगर भाई ने अपने ब्लॉग पर छापा भी था। यदि इजाज़्त मिली तो मैं उसे पेश करूंगा।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”