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Saturday, November 15, 2008

क्या केक ऐसे काटा जाता है, नहीं, राज ठाकरे आपने तो केक चीरा है

कुछ लोग करतूत ही ऐसी करते हैं जिसे की कोई हजम नहीं कर सकता। 14 जून 2008 याने की इस साल का ही वीडियो सामने आया है जिसमें राज ठाकरे का जन्मदिन मनाया जा रहा था। इस वीडियो में दिख रहा है कि कैसे कोई किसी से कितनी नफरत कर सकता है कि अपने निजी जश्न में भी वो उसपर वार करने से नहीं चूकता। ये है राज
ठाकरे के दिल में उत्तर भारतीयों के खिलाफ नफरत।

जन्मदिन का वीडियो या फिर नफरत का

वीडियो में दिख रहा है कि एक ऐसा केक काटा जा रहा है जिसपर लिखा था-भैया। भैया, इसका मतलब किसी को समझाने कि जरूरत नहीं है। भैया का मतलब होता है बिहार- यूपी के लोग।
सबसे ज्यादा एतराज केक को काटने में है। जिस तरह से केक को काटा गया उसे शायद हम में से कोई भी ये नहीं कह सकता कि वो केक काटा गया। साफ दिखता है कि केक काटा नहीं गया उसे चीरा गया। सीधे-सीधे राज ठाकरे ने केक को पहले बाएं से दाएं और
फिर दाएं से बाएं चीर दिया जिसपर लिखा था भैया। 40 सेकेंड के वीडियो में ये सब दिखाया गया है।
केक पर वैसे तो नाम ही लिखा जाता है उस शख्स का जिसका कि जन्मदिन होता है। उस केक पर लिखा था भैया, लेकिन क्या राज ठाकरे को भैया के नाम से जाना जाता है या उन्हें कोई राज ठाकरे के नाम से पुकारता है जिसे कि एमएनएस के लोग गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। तो ये बात तो यहीं पर खारिज हो जाती है कि राज ठाकरे को भैया के नाम का केक गिफ्ट किया गया।

राज की बहन या फिर कार्यकर्ता

फिर राज ठाकरे को कोई भैया कहकर बहन पुकारती हो और उसने ये तोहफे के तौर पर भेंट किया हो। बात तुरंत कहते के साथ ही सामने आई। एमएनएस की महिला शाखा की सचिव रीता गुप्ता राज ठाकरे की बहन के रूप में सामने आई। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि ये तो बड़ा ही पर्सनल वीडियो था इसे कैसे कोई सामने ला सकता है। साथ ही वो राज ठाकरे को भैया कहकर पुकारती हैं। तो उन्होंने गिफ्ट किया था अपनी ब्रेकरी में बना केक राज के जन्मदिन पर।
चलिए ये बात तो साफ हो गई कि केक बहन ने दिया था। पर केक काटने का तरीका सही था। रीता गुप्ता जी बार-बार इस सवाल को घुमा जाती। क्योंकि कोई जंगली भी इस तरीके से केक को नहीं काटता। मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति सिर्फ इस बात से ही है।

वीडियो पर सियासत

राज ठाकरे के तहलका मचाने वाले इस वीडियो को जारी करने वाले शख्स है किशोर समरीते। किशोर समरीते मध्यप्रदेश के लांजी क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के विधायक है। सवाल ये है समरीते के पास ये वीडियो कहां से आया.. समरीते इसका खुलासा नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि उनके एक दोस्त ने उन्हें ये वीडियो दिया है। सवाल ये भी है छह महीने पुराने इस वीडियो को अचानक प्रेस को क्यों दिया। माना जा रहा है कि समरीते अपनी सियासत चमकाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे है
राज ठाकरे के इस केक मामले पर सियासत भी गरमा गई है। जहां सभी पार्टी इस की निंदा कर रही हैं। वहीं राज ठाकरे को लालू प्रसाद यादव ने फिर से मेंटल करार दे दिया है।

सही मायने में तो राज ठाकरे ने इस केक को केक माना ही नहीं है। ये है राज ठाकरे की नफरत उत्तर भारतीयों के लिए। लेकिन राज ठाकरे का अपने जन्मदिन को मनाने का तरीका बड़ा ही अनोखा और विचित्र लगा। तो राज ठाकरे इस तरह मनाते हैं अपना जन्मदिन और फैलाते हैं नफरत की आग।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, October 31, 2008

राज ठाकरे, तुम्हारे कारण ही तो पैदा हुए हैं राहुल राज जैसे हमलावर

मुंबई में जब सभी की निगाहें अटकी पड़ी थी कि शुक्रवार के काले दिन के बाद बाजार किस करवट बैठेगा तब मुंबई की एक बेस्ट बस में 23 साल का एक युवक चढ़ा और चंद मिनटों में सारी बस पर हावी हो गया। क्या सोच कर आया था वो युवक राहुल राज, क्या चाहता था वो, किसी को तब तक पता नहीं चल पा रहा था। आवाज और भाषा से लग रहा था कि वो मराठी नहीं है, और उसके हाथ में हथियार लहरा रहा था। बेस्ट की डबल डेकर बस में वो बार-बार चिल्ला रहा था कि उसे राज ठाकरे से मिलना है। कोई उस की बात पुलिस और मीडिया से कराए। बार-बार सिर्फ एक ही बात कि उसे राज ठाकरे से मिलवाओ, फोन पर पुलिस और मीडिया से बात कराओ। बताया जाता है वो राज ठाकरे के खिलाफ नारे भी लगा रहा था।

राहुल राज एक अनाड़ी हमलावर

राहुल राज ने सभी को ये बताया कि वो किसी को कोईं भी हानि नहीं पहुंचाएगा। कंडेक्टर को उसने पकड़ा कि मोबाइल से पुलिस और राज ठाकरे से बात कराओ। युवक बेचैनी में कभी इधर तो कभी उधर जा रहा था। बस के सारे यात्री डर और सहम चुके थे। फिर बाद में उसने अधिकतर यात्रियों को बस से जाने दिया। इस बीच कंडेक्टर ने पुलिस को सूचित किया। करीब 50 मीटर दूर पर ही था थाना, पुलिस तुरंत मौके पर पहुंच गई। पुलिस के सामने उसने 10 और 50 के नोट पर लिख कर संदेश दिया कि वो राज ठाकरे से मिलना चाहता है। कई जगह ये बात भी सामने आई कि उस पर लिखा था कि वो पटना से आया है राज ठाकरे को मारने लेकिन इस की असलियत क्या है किसी को पता नहीं चल पाई है, पर हां, वो राज ठाकरे से मिलना जरूर चाहता था। पुलिस अपने काम पर लग चुकी थी। पुलिस ने पूरी बस को घेर लिया और जब राहुल बस के अगले हिस्से में जाता तो पुलिस पीछे से चढ़ने की कोशिश करती और जब वो पीछे आता तो आगे से चढ़ती। राहुल राज दूसरी स्टोरी पर चला गया। इस बीच उसने पुलिस को डराने के लिए और ये दिखाने के लिए की उसके पास असली हथियार है उसने जमीन पर एक फायर किया। जब तक राहुल बस के ऊपरी हिस्से तक पहुंचता तब तक पुलिस ने हवा में दो फायर किए। जवाब में राहुल ने भी दो फायर हवा में किए। पुलिस बस के अंदर घुस चुकी थी लेकिन तभी हड़बड़ाए राहुल से एक गोली चली जो कि एक यात्री के पैर में लग गई। पुलिस ने फायर खोल दिया। राहुल को तीन गोली लगी और पुलिस का ये अभियान खत्म हुआ। बेस्ट की एक बस को अगवा करने की कोशिश को नाकाम कर दिया गया।

पुलिस की अपनी थ्यौरी

पूरे मामले में महाराष्ट्र पुलिस की पीठ ठोंकी गई और साथ ही पूरे मामले पर सियासत भी शुरू होगई। पुलिस ने अपने काम को सराहया और अपने कदम को सही भी ठहराया। पुलिस का कहना था कि यदि किसी भी कारण से उस शख्स की बंदूक से निकली गोली किसी भी यात्री को मार डालती तो पूरी दुनिया एक सुर में ये इल्जाम लगाती कि पुलिस को पहले ही उस शख्स को गोली मार देनी चाहिए थी। तो यदि पुलिस कुछ सही भी करती है तो भी उस पर इल्जाम लग जाता है। वैसे, पुलिस को आतंकवाद से लड़ने के लिए महाराष्ट्र में ये हिदायत है कि यदि कोई भी बंदुक से जवाब दे तो पुलिस भी फिर गोली का जवाब गोली से दे सकती है, और ये ही काम पुलिस ने भी किया। किसी के चेहरे पर ये नहीं लिखा है कि वो आतंकवादी नहीं है।

दो मंत्रियों की सोच में अंतर

वहीं महाराष्ट्र के गृहमंत्री का मानना है कि पुलिस ने जो भी किया वो ठीक है। जो भी नियम और कानून तोड़ेगा उसको हम ऐसे ही सबक सिखाएंगे। पर राज ठाकरे और एमएनएस के मामले में शायद वो ये सब भूल जाते हैं। राज ठाकरे ने पाबंदी के बावजूद मीडिया में अपनी सुरक्षा को कम किए जाने पर इंटरव्यू दिया है। वहीं, इस घटना के बाद सरकार ने राज ठाकरे को जेड श्रेणी की सिक्योरिटी वापस दे दी है। पर क्या महाराष्ट्र के ये बड़बोले गृहमंत्री और उप मुख्यमंत्री राज ठाकरे की जमानत रद्द करवाएंगे, या फिर कुछ भी कार्रवाई होगी। शायद नहीं। वहीं दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री का कहना है कि यदि पुलिस चाहती तो राहुल राज को पकड़ा जा सकता था। लेकिन ये मुंबई पुलिस की नाकामी है कि वो ऐसा करने में नाकाम रही और राहुल को मार गिराया। ये बातें दो मंत्रियों ने कहीं हैं और दोनों ही ऊंचे पद पर आसीन हैं। तो क्या कारण है कि दो मंत्रियों की राय एक नहीं हो पा रही है?

एनकाउंटर पर सियासत

राहुल राज के एनकाउंटर पर राजनीति भी गरमा गई, सब सियासत चमकाने लगे। एक के बाद एक दल ने राज्य सरकार पर साधा निशाना। सभी एक सुर में राज ठाकरे और उसकी पार्टी पर पाबंदी लगाने की मांग करने लगे। राज्य सरकार पर भी इसी बहाने निशाना साधा गया। अब तो शिवसेना को भी लगने लगा कि आखिर मुंबई में ये क्या हो रहा है। इस प्रकरण के बाद से शिवसेना बैकफुट पर दिखी। दो दिन तक राहुल राज के घर पर आने जाने वाले नेताओं का जमघट लगा रहा। कभी सीबीआई से जांच की मांग की जाती तो कोई जांच आयोग गठित करने की मांग करता। राहुल राज के घर के बाहर दिन भर लोगों को तांता लगा रहा, वहां नारेबाजी चलती रही। इसी बहाने अमर सिंह अमिताभ और राज ठाकरे का मसला फिर से उछालने से बाज नहीं आए। अमर सिंह ने लालू यादव और पासवान पर निशाना साधा। कुछ नेताओं ने राष्ट्रपति शासन की मांग भी कर दी महाराष्ट्र में।

एनकाउंटर या हत्या?

राहुल राज का एनकाउंटर हुआ है या हत्या? इस बारे में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। गर पुलिस चाहती तो उस नौसिखिए हमलावर को थोड़ी देर में ही पकड़ भी सकती थी। लेकिन शायद पुलिस ने ये कोशिश नहीं की। 15 मिनट के इस ड्रामे में क्या पुलिस को कोई भी मौका नहीं मिला कि वो राहुल के पिस्तौल वाले हाथ पर निशाना लगा सकें। क्या पुलिस उस के पैरों पर गोली नहीं चला सकती थी। क्या जरूरत पड़ी थी कि उसके शरीर पर एक साथ तीन गोलियां मारने की, क्या एक गोली से काम नहीं चल सकता था। उसके दोनों हाथ पर गोली मारी जा सकती थी। या पुलिस बिहारी या उत्तर भारतियों से इतना ज्यादा कुपित होगई है कि इस एपिसोड को खत्म करने के लिए उसने एक नौजवान की गोली मारकर हत्या कर दी। क्यों नहीं ये ही रणनीति ये आतंकवादी या किसी डॉन के साथ करते।

चिता जली पर सवाल बाकी

इस से दुखद पहलु क्या हो सकता है कि एक जवान बेटे का शव बाप के कंधे पर शमशान जा रहा हो। जिस दिन पूरे देश में दीए जलाकर रोशनी की जा रही थी उस दिन राहुल की चिता जली और उस बाप के ऊपर क्या बीती होगी जब दीवाली के रोज उसने अपने जवान बेटे की चिता को मुखाग्नि दी होगी। चिता तो जल गई है पर सवाल अभी बाकी हैं। मुंह बाए खड़े हैं कुछ सवाल जिनके जवाब कुछ तो राहुल की चिता के साथ जल गए और कुछ उस चिता की चिंगारियों से उठ खड़े हुए हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, September 23, 2008

कसम खा रखी है राज ठाकरे के गुंडों ने, 'हम नहीं सुधरेंगे'

चाहे कुछ हो जाए पर हम नहीं सुधरेंगे। शायद इसी राह पर चल रहे हैं राज ठाकरे के गुंडे। एमएनएस यानी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने एक बार फिर जमकर गुंडागर्दी मचाई। एक डॉक्टर के नर्सिंग होम में घुसकर उन्होंने जमकर तोड़फोड़ की और डॉक्टर दंपत्ति को जमकर पीटा। इस बार जो एमएनएस के गुंडों के हत्थे चढ़े वो हैं मलाड के जीवन नर्सिंग होम के डॉक्टर रमेश रेलन और उनकी पत्नी सरीना रेलन। दोनों को जमकर पीटा गया और साथ ही उनके चेहरे पर कालिख बी पोती गई। वो डॉक्टर हाथ जोड़ जोड़ कर माफी की भीख मांगता रहा और वो उसे लिटा लिटा कर उस पर लात घूंसे बरसाते रहे। डॉक्टर रमेश रेलन तो चलो पुरुष हैं पर उनकी पत्नी को भी बुरी तरह पीटा गया। ऐसा लग रहा था कि आतंकवादी लोगों के हत्थे चढ़ चुके हैं और ये आज उनसे हर बात का बदला लेकर रहेंगे।

दरअसल मामला देखा जाए तो ये था कि एक महिला जिसका नाम ट्रीसा है उसने डॉक्टर पर आरोप लगाया कि डॉक्टर ने 9 महीने पहले उसका ऑपरेशन किया था। ऑपरेशन तो सफल हुआ पर उस महिला के पेट में टॉवल छूट गया। जब महिला को पेट में कुछ तकलीफ हुई तो उसने इसकी शिकायत डॉक्टर रमेश से की लेकिन डॉक्टर ने उन्हें पेट की दवाई दे दी। लेकिन महिला की हालत में सुधार नहीं हुआ। फिर महिला ने दूसरे नर्सिंग होम में चैकअप कराया जहां पर इस बात का पता चला कि उसके पेट में टॉवल छूट गया है। उस महिला ने डॉक्टर से शिकायत की पर डॉक्टर ने टालमटोली शुरू कर दी। फिर क्या था महिला पुलिस के पास जाने के बजाय सीधे पहुंच गई आज के उभरते हुए गुंडों के पास यानी कि एमएनएस। एमएनएस के कार्यकर्ताओं ने अपने ही ढ़ंग से उस महिला को इंसाफ दिलवाया। नर्सिंग होम के घुसकर डॉक्टर की जमकर धुनाई की और फिर वो ही पुरानी हरकत कालिख पोती।राज ठाकरे जानते हैं कि उनको किसी की राह पकड़नी है और मुंबई पर कब्जा कैसे करना है। साथ ही उसको किस का उत्तराधिकारी बनना है।

मलाड के डॉक्टर दंपत्ति ने जो काम किया वो सचमुच ऐसा था कि उनको हवालात में होना चाहिए था। मैं कोई उस डॉक्टर के पक्ष में नहीं हूं पर मैं इस बात का भी समर्थन नहीं करता कि कोई भी आदमी खुद जाकर इंसाफ करने लग जाए। वहशी और दरिंदों की भीड़ ने अब तक कई बार कई लोगों की जान ली है एमएनएस मुझे उस वहशी भीड़ से ज्यादा कुछ भी नहीं लगती। मेरा सवाल ये है कि क्या उस महिला को पुलिस के पास पहले नहीं जाना चाहिए था? क्या बिगाड़ा था डॉक्टर रमेश की पत्नी ने जो उस के साथ भी हाथापाई की गई साथ ही उसको इतना जलील किया गया? क्या इंसाफ पाने का ये ढ़ंग सही है? माना कि डॉक्टर रमेश को पुलिस के हवाले कर दो, अंदर बंद करवा दो पर क्या ये रवैया ठीक है? घसीट-घसीट कर किसी को मारना कहां तक उचित है? एक महिला के साथ ऐसा व्यवहार करना एमएनएस की कार्यकर्ताओं को वो भी महिला कार्यकर्ताओं को शोभा देता है? एक महिला दूसरी महिला को पुरुष की मदद से पीट रही है साथ ही कभी पुरुष भी महिला पर हाथ साफ करदेता है क्या ये सही है? क्यों बनी हुई है एक महिला ही दूसरी महिला की दुश्मन, आखिर क्यों?

लोग यदि अभी नहीं संभले तो एक दिन ये एमएनएस के कार्यकर्ता किसी और बात पर खुद उन्हीं के घर में घुसकर उनको मारेंगे जिन्होंने कभी उनसे मदद ली होगी, और वो भी किसी और की शिकायत पर, क्योंकि गुंडों की राजनीति में कोई भी भाई हमेशा भाई नहीं होता।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, September 12, 2008

मुंबई का किंग कौन?

"अगर के एल प्रसाद को अपनी वर्दी, कुर्सी और बैच जो कि उसके कंधे पर लगे हैं, उनका इतना ही गुरूर है तो वो उसे उतारकर सड़क पर आकर बयान दें तब उन्हें पता चलेगा कि मुंबई किसकी है।" ये कहना है राज ठाकरे का और वो भी किसी दो कौड़ी के आदमी के बारे में नहीं, मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर के बारे में। आपको ये बता दूं कि ये के एल प्रसाद वो ही हैं जिन्होंने एक रोज पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कहा था कि 'मुंबई किसी के बाप की नहीं'। राज ठाकरे ने पलटवार करते हुए अपनी पीसी में मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर को खुले शब्दों में चुनौती दे डाली कि वर्दी है तो इतना बोल रहे हो यदि वर्दी उतारकर सामने आओ तो दिखाते हैं हम अपनी गुंडागर्दी जिससे कि पूरा मुंबई आजकल थरथर कांप रहा है। और ये भी कोई बड़ी बात नही कि आने वाले दिनों में के एल प्रसाद की वर्दी को नुचवाकर ये मुंबई का नया उभरता हुआ गुंडा राज ठाकरे फिकवा दे या फिर सबसे सरल उपाय तबादला करवा दे। इस कहते हैं दादागीरी। सीधे-सीधे चैलेंज है पुलिस को, कि मैं तो चुप नहीं रहूंगा चाहे जो हो सके तो वो कर लो। क्या पुलिस की इतनी हिम्मत है कि वो राज ठाकरे पर इस धमकी के ऊपर कोई भी कदम उठा सके? हम सब को जवाब पता है...शायद नहीं। राज ठाकरे की एक दहाड़ के सामने दुम हिलाती है पुलिस। लेकिन ये ख़ौफ़ कब तक, आखिर कब तक रहेगा ये ख़ौफ़? सरासर गुंडाराज चल रहा है मुंबई में।
बेशक राज ठाकरे सरकार नहीं हैं पर वो आदेश देता है तो महाराष्ट्र की सरकार की जुबान पर ताला लग जाता है। वो जज भी नहीं है पर फिर भी दंड सुनाने का अधिकार सिर्फ उसने अपने पास सुरक्षित रखा है। जिसे चाहे वो अपने आगे झुका सकता है, जिसे चाहे वो कुछ भी कह सकता है गाली तक दे सकता है और कानून उस शख्स के खिलाफ कोई कदम भी नहीं उठा सकता है। वो चाहे तो जिस किसी की फिल्म की रिलीज पर महाराष्ट्र में पाबंदी लगा सकता है, और वो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता। इस शख्स की सनक के सब गुलाम बन चुके हैं।
ये दादागीरी नहीं है तो और क्या है। अभी मेरी पिछली पोस्ट पर डॉ अनुराग ने कमेंट किया था कि अगले महीने उनका मुंबई जाना हो रहा है। वहां पर चल रही भाषावाद की हवा से वो काफी नाखुश भी हैं और पशोपेश में भी। आपको सच बताऊं तो ऑफिस से मेरे एक सहयोगी को मुंबई जाना था लेकिन वो मुंबई नहीं गए। क्यों? जबकि हमारा भरा पूरा ब्यूरो है वहां पर, लेकिन वहां कि हवा ही ऐसी चल रही है कि हर कोई डरने लगा है। गुंडों से शायद हमलोग अकेले तो लड़ सकते हैं लेकिन परिवार के साथ नहीं। सच माने तो राज ठाकरे का कद ये हो चुका है कि कोई भी इस बड़बोले से पंगा नहीं लेना चाहता और लगता तो ये भी है कि सब के सब इसके रहमोकरम पर ही हैं।
इस दादागीरी और गुंडागर्दी के आग सदी के महानायक तक को झुकना पड़ा। पहले ब्लॉग, फिर हर चैनल पर घूम-घूम कर माफी मांगनी पड़ी। चाहे द लास्ट लियर के लिए दिए जा रहे इंटरव्यू की बात हो या चाहे कोई और, लेकिन हर जगह वो माफी मांगते हुए दिखे। बिग बी यानी अमिताभ बच्चन इस मुद्दे पर कुछ जुमलों को ही हर इंटरव्यू में बोलते नजर आए। माफी मांगने से थोड़े ही कोई छोटा हो जाता है, भई बीत गई सो बात गई, अब आगे क्या, माफी हमने मांग ली है, इसकी जांच हो रही है यदि लगे कि हमने गलत किया है तो हमें जो सजा देना चाहेंगे हमें मंजूर है। हर जगह बचते-बचते अमिताभ ने सभी सवालों के जवाब दिए। कैमरे पर माफी मांगे जाने को लेकर तो बिल्कुल कन्नी काट गए। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि राज तो मेरे दोस्त के हैं और मैं उन्हें अपनी फिल्म देखने का न्यौता देता हूं। अब सवाल ये उठता है कि क्या सदी का महानायक डर गया? हर जगह जा जा कर उन्हें माफी क्यों मागनी पड़ रही है? क्या बिग बी पर द लास्ट लियर के प्रोड्यूसर की तरफ से कोई दबाव है? या फिर फिल्म सही सलामत मुंबई या यूं कहें कि महाराष्ट्र में रिलीज हो जाए ये चाहते हैं अमिताभ। पर जो भी कारण हो जब सदी के महानायक को डरना पड़ सकता है इस नेता रूपी गुंडे से तो फिर आम आदमी की तो औकात ही क्या है। यदि राज ने न्यौता स्वीकार कर लिया तो राज की राजनीति समझ में जरूर आजाएगी ये तो साफ है।
ये मराठियों की एकजुटता की जीत है या फिर राज ठाकरे के गुंडों का ख़ौफ़ लेकिन भाषावाद का ये घटिया प्रकरण आखिरकार खत्म तो हो गया। अब तो ये लड़ाई राज ठाकरे बनाम मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर के बीच हो चली है। पर इसमें जया और अमिताभ बच्चन को पूरे मामले में शर्मिंदगी बहुत उठानी पड़ी है। साथ ही जाते जाते राज ठाकरे ने जया बच्चन को नसीहत भी दे डाली है कि हो सके तो आगे से लिखे हुए डायलॉग ही पढ़ें तो बेहतर। पर इस प्रकरण ने ये तो बता ही दिया कि, 'मुंबई का किंग कौन?.........राज ठाकरे'।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-गूगल)

Thursday, September 11, 2008

राज ठाकरे, मुंबई तुम्हारे बाप की नहीं

राज ठाकरे, मुंबई तुम्हारे बाप की नहीं। असल मायने में कुछ-कुछ ये ही कहना था मुंबई के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर के एल प्रसाद का। और ये सच भी तो है मुंबई बाद में है पहले भारत है और भारत के एक अभिन्न अंग है मुंबई। पूरा देश मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट, और ट्रेन में हुए सीरियल ब्लास्ट के समय में मुंबई के साथ था। तब तो किसी ने नहीं कहा कि ये सिर्फ मराठियों का दुख है इससे हम ही निपटेंगे, हमें देश की हमदर्दी नहीं चाहिए। तब तो ये नेता अपनी सुरक्षा के बारे में सोचते रहे। कोई भी ये कहने आगे नहीं आया कि लाशों को तुम नहीं उठाओगे क्योंकि तुम बिहारी हो या फिर तुम यूपी को हो। तो फिर ये भाषावाद अब क्यों? वैसे तो इन गुंडों पर यदि कोई लगाम लगा सकता है तो वो है पुलिस। पर पुलिस को पूरी ईमानदारी के साथ काम करना होगा। साथ ही ये बिकाऊ मंत्री भी पुलिस को अपनी ढंग से काम करने की आजादी दें। वैसे तो पुलिस ने ये बयान दे दिया पर देखना ये है कि क्या सचमुच राज ठाकरे के गिरेबान पर हाथ वो डाल पाएगी?
राज ठाकरे के पास गुंडे हैं वो चाहे तो क्या नहीं कर सकते। चाहे तो फिल्म चलने दें या फिर आप का कारोबार। चाहें तो सब तबाह कर दें। मारठी में ही हों दुकान के बोर्ड, हर साइन मराठी में ही हों। अरे, पगला गए हो क्या राज ठाकरे। यदि तुम जैसे लोग सीएम बन जाएं तो संजय गांधी की याद ताजा करा दें। क्या आप को पता है कि मुंबई में कितन लोग बाहर से आते हैं? शायद नहीं, जब ही तो आप ये सवाल उठा रहे हैं। यदि मराठी में बोर्ड लगाएंगे तो रोजी-रोटी कहां से चलेगी। हर किसी को तो मराठी आती नहीं। फिर कैसे बिकेंगे सामान।
क्या तुम राज ठाकरे, हां, राज ठाकरे, क्या तुम बिकवाओगे सामान या फिर खरीदोगे? खुद तो तुम एसी रूम में बैठकर ये सब फरमान लोगों पर थोपते रहते हो। यदि लोग नहीं मानें तो तुम अपने गुंडे भेजकर लोगों को डराते हो उन के साथ मार-पीट करते हो। ये कहां तक जायज है। वैसे अपनी पिछली पोस्ट में मैंने इस बात का जिक्र किया कि ‘राज ठाकरे अपनी चोंच बंद रखो’ तो किसी ने कमेंट किया कि अरे ये तो बोलेंगे ही आप दूसरों को नसीहत दो कि वो इनकी बातों में ना आएं। सही कमेंट था। ये तो वो बुल डॉग हैं जो कि ना चाहते हुए भी भोखेंगे ही। तब बेहतर तो ये है कि महाराष्ट्र की जनता इन जैसों को ना सुनें और मिलकर इन जालिमों का विरोध करे जो कि देश को भाषा में बांटना चाहते हैं।
जया बच्चन के बाद अमिताभ ने भी माफी मांग ली लेकिन कैमरे पर माफी मांगने पर अड़े हुए हैं राज समर्थक। वैसे अमिताभ ने एक बात सही कही कि,
“जो हो गया सो हो गया अब आगे की सोचना चाहिए और आगे क्या होगा। हमने माफी मांग ली है। अब बाकी बचा काम प्रशासन का है कि वो क्या ऐक्शन लेती है। यदि हमने गलत किया है तो हम हर सज़ा के लिए तैयार हैं”।…..
क्या सचमुच ये लगता है कि अमिताभ बच्चन से बड़ा हो गया है राज ठाकरे का कद। राज ठाकरे का नाम यदि गूगल में सर्च करें तो इस भाषावाद के साथ तो आप जोड़ कर देख सकते हैं वरना और किसी के साथ नहीं। लेकिन अमिताभ बच्चन तो अपने में एक लीजेंड हैं। दुनिया उनका लोहा मान चुकी है। जब वो शख्स भी बिन बात के बढ़ी बात पर माफी मांग चुका है तो क्या अलगाव फैलाना अच्छा है? क्या राज ठाकरे जैसा बद दिमाग शख्स सुधरेगा। देश के लिए एक अच्छा काम नहीं किया होगा राज ठाकरे ने।

क्या उस जैसे चरित्र का बिग बी जैसे इंसान के साथ ऐसा व्यवहार करना सही है। मैं कोईं बिग बी का समर्थक नहीं हूं पर भाषावाद और राज ठाकरे जैसे दो कोड़ी के गली के टुच्चे से नेता के खिलाफ तो जरूर हूं।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो- साभार गूगल)

Wednesday, September 10, 2008

राज ठाकरे अपनी चोंच बंद रखो

एक बार दशहरे के समय हमारे मोहल्ले के कुछ लड़के टोली बनाकर चंदा लेने आए। हर साल आते थे इस साल भी आए। चंदा दे दिया गया, लडकों के हैड ने कहा कि इतने से तो क्या होगा, यदि देना है तो एक पत्ता तो ढीला करना ही होगा, नहीं तो वापस ले लीजिए। घर के बड़ों ने बात को सुल्टाने के लिए 10 रुपये और जोड़कर 61 रुपये कर दिए। हम भीख नहीं मांग रहे अंकल, देना है तो 101 दो नहीं तो...। ये तो दादागीरी है, जाइए नहीं देते। जब मैं आया तो घर के बाहर हल्ला मचा हुआ था। पापा उन्हें ज्ञान दिए जा रहे थे और वो भी ढीठ की तरह एक ही बात पर अड़े हुए थे। मैं जानता था उन सब को और उनकी करतूतों को। चंदे के नाम पर वसूली करके, प्रोग्राम तो करवाते पर बाद में बचे उन पैसों से खूब मजे किया करते थे। सोचिए पूरे स्टेट में 100 से ज्यादा घर थे तो सोचिए मनमानी से कितनी रकम जुड़ती होगी। मैंने भी समझाया तब तो वो सब चले गए, पर उस समय से हर घंटे हमारे घर में कई आवारा लड़के आते और मुझे बुरा-भला कह कर या धमका कर चल जाते। मैंने फैसला किया की जितनी बार आएंगे तो उस हैड के घर मैं भी उतनी ही बार जाऊंगा और धमका कर के आऊंगा। ये मैं जानता था कि वो खुद मेरा कुछ नहीं बिगाड़ेगा। धीरे-धीरे चार-पांच रोज बाद तक ये सिलसिला चलता रहा और फिर ना वो आए ना ही मैं गया। बाद में मेरे घरवालों को इस बात का पता चला। सब ने मुझे कुछ दिनों के लिए घर से चले जाने के लिए भी कहा। पर मैं उनसे कहता कि मैंने ये सब शुरू नहीं किया है, कैसे कोई बिन बात के मेरे पापा और बड़ों का अपमान कर सकता है, वो भी बिना बात के। उस शख्स ने दीवाली के कुछ दिन बाद मेरे को अकेले कुछ लड़कों के साथ पकड़ा। उसका इरादा क्या था उसका पता मुझे लग ही रहा था। पर मैं जानता था कि ये मेरा कुछ भी नहीं करेंगे क्योंकि बात ही इतनी फैल चुकी थी। उसने समझाने के उद्देश्य से मुझे ज्ञान दिया, मैंने भी ज्ञान लिया, फिर दिया और फिर दोनों तरफ से ज्ञान का आदान-प्रदान होने लगा। वो स्टेट के कुछ गुंडों में से एक था, मेरे ज्ञान और साहस पता नहीं किस कारण वो झुका और फिर हमारे घर आकर उसने पापा-मम्मी से माफी मांगी। आज भी यदि कभी मेरे पापा-मम्मी उस को दिख जाते हैं कहीं भी तो बिना पैर पढ़े वो नमस्कार नहीं करता। मैं भी उसे आज तक भैय्या कह कर ही संबोधित करता हूं।

चलिए एक सीन तो ये था अब दूसरे सीन पर चलते हैं।

'मैं यूपी की हूं और हिंदी ही बोलूंगी और यूपी के लोगों को हिंदी ही बोलनी चाहिए, महाराष्ट्र के भाईयों से माफी मांगती हूं'। जया बच्चन ने ये बात द्रोण की म्यूजिक लॉन्च पार्टी में कही थी। बात बढ़ी और फिर हरे हो गए आगे-पीछे के जख्म। राज ठाकरे लगे फिर से अपना भोपूं बजाने। जया ने लिखित माफी मांग ली।
"अगर मैंने मुंबई और महाराष्ट्र के मराठी भाषी लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाया है तो इसका मुझे दुख है। एक हिंदी फिल्म के म्यूज़िक लॉच पर मैंने हिंदी बोलने को लेकर जो कुछ कहा वो बिना किसी छल कपट से कहा था। मैं उस शहर को बदनाम क्यों करूंगी जिसने हमें सबकुछ दिया। क्या हमलोग भी इस शहर के नहीं हैं। मैं इस शहर का मरते दम तक निरादर नहीं करूंगी।"
पर एमएनएस को मंजूर नहीं, लिखित में नहीं, 'कैमरे के सामने ही माफी मांगनी होगी'। महाराष्ट्र का अपमान कैमरे के सामने किया तो कैमरे के सामने ही माफी मांगो। ये कहना है खुद राज ठाकरे का। ये भी एक अजीब और अपने किस्म की दादागीरी है।
वैसे तो, राज ठाकरे को अपनी ये चोंच 8 अक्टूबर तक बंद रखने का फरमान है। पर वो बोल रहे हैं और अपने नापाक इरादों से मराठियों को बरगलाने में लगे हुए हैं। ये तो महाराष्ट्र के गुंडे हैं जो कि देश के गुंडे बनते जा रहे हैं। कभी किसी ने ये सोचा कि देश के और किसी भी प्रांत में राज ठाकरे क्यों नहीं आते-जाते हैं क्योंकि राज को डर रहता है कि कहीं जिंदगी के लाले ना पड़ जाएं। क्या राज ठाकरे को अक्ल नहीं आई है कि देश के अब भाषावाद में बांटने में तुले हुए है। क्या जब तक राज ठाकरे को कोई पीटेगा नहीं तब तक उसको चैन नहीं मिलेगा? या फिर देश के दूसरे हिस्सों में मराठियों को पीटा नहीं जाएगा तब तक राज ठाकरे नाम का बदनुमा जानवर अपनी चोंच बंद नहीं करेगा। ये तो देश के दूसरे हिस्सों के लोगों की अपने देश के साथ ईमानदारी है कि जो अब तक ये सब कुछ सुनने में नहीं आया। वरना कसर तो इन ठाकरे परिवार ने नहीं छोड़ी है। भाषा का मुद्दा बनाकर राज ठाकरे क्या साबित कर देना चाहते हैं कि राजनीति सिर्फ इससे ही चलती रहेगी। अपने गुंडे भेज कर लोगों के ऑफिसों में, दुकानों पर, घर पर उत्पात मचाना। कब तक सहेंगे लोग जिस दिन बिदक गए तो मंच पर चढ़कर मारेंगे और तब इस चोंच से बाप- बाप के अलावा कुछ नहीं निकलेगा। राज को सलाह है, अपनी चोंच बंद रखो राज ठाकरे।

ऐसा नहीं है कि मैं जया बच्चन के समर्थन में हूं। किसी भी मंच पर चढ़कर लोगों की भावना से खेलना गलत है और जबकि उस मुद्दे पर जिसमें आप पहले ही हाथ जलाए बैठे हैं। माना ये कि हंसी मजाक में कह दिया गया और फिर उसे लेना भी उसी अंदाज में चाहिए था। मंच पर इस बात से पहले क्या बात चल रही थी ये भी बहुत ही कम को पता है। प्रियंका चोपड़ा जब अंग्रेजी के चंद शब्दों के बाद हिंदी में बोलने लगी तो ये लाइन जया बच्चन ने हंस कर कही थी। लेकिन इस बात को प्रेजेंट इस अंदाज में किया गया जैसे कि जया बच्चन ने देश की संप्रभुता के साथ खिलवाड़ कर दिया हो। उनको इस बात का इल्म हो गया कि इस बात पर उनके द्वारा चुटकी नहीं ली जानी चाहिए थी। तो उन्होंने माफी मांग ली। अब ये क्या कि नहीं कैमरे पर ही माफी मांगो। ये तो एक तरह से दूसरो को जलील करना ही हुआ। बाल ठाकरे के नक्शेकदम पर चलते हुए राज चाहते हैं कि इस मुद्दे से वो घटिया लोकप्रियता बटोर लें और उनकी राजनीति चलती रहे लेकिन लोगों को ये 'राज-नीति' समझनी ही होगी, खासतौर पर भाषा की इस राजनीति को । वैसे ही देश जगह जगह से जल रहा है एक आग और नहीं चाहिए हमें।
राजनीति क्या-क्या ना कराए। अभी तक जो शख्स बिग बी के बगल में बैठकर ये कहता था कि बिग 'बी' तुम ही अकेले नहीं हो मैं भी तो बिग 'बी' हूं। बाल ठाकरे भी चुप नहीं बैठे वो भी इस भाषावाद की लड़ाई में कूद पड़े। मराठी और हिंदी की लड़ाई में अमिताभ का साथ किसी ने दिया था तो वो बाल ठाकरे ही थे पर कल के सगे आज पराए हो गए। बार ठाकरे सामना में लिखते हैं--
"अमिताभ पूरे देश के महानायक हैं और ऐसा महानायक सदी में एक बार पैदा होता है। कोई भी प्रांत और भाषा की दीवार उनकी कला को रोक नहीं सकती लेकिन अब जया बच्चन ही कह रही हैं कि हम यूपी वाले हैं। इसका मतलब क्या है। अमिताभ बच्चन और उनका परिवार जब मुंबई आया था तब उन्हें कोई नहीं पहचानता था लेकिन मुंबई ने उन्हें पहचान दी, बड़ा किया। पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को महाराष्ट्र की राजधानी ने आसरा दिया लेकिन इन लोगों ने मुंबई और महाराष्ट्र को क्या दिया। ये सवाल जया बच्चन के बयान की वजह से खड़ा होता है।"
बाल साहेब तो शाहरुख पर भी बिफर पड़े। पर बाल ठाकरे को ये कौन समझाए कि यदि बालासाहेब खुद दिल्ली में आकर रहने लगें तो भी वो सबको ये ही बताएंगे कि वो मुबई के ही है। चाहे दिल्ली उन्हें कितना ही कुछ दे दे पर वो रहेंगे तो मुंबई के ही ना। जब वो खुद को मुंबई का बताने से नहीं हिचकते तो फिर क्यों दिल्ली का कोई भी ये मानने से पीछ रहेगा कि वो दिल्ली का नहीं है। मैं बालासाहेब ठाकरे का काफी सम्मान करता हूं पर लगता है कि उम्र का असर अब उनके लेखन पर दिखने लगा है और वो दूर की बातें नहीं सोच पा रहे हैं। वैसे तो अब उनको लिखना ही बंद कर देना चाहिए।
वैसे जया बच्चन के साथ हमेशा से साथ खड़े रहने वाले अमिताभ मुंबई लौट आए हैं और जैसे कि अभिषेक बच्चन ने कहा कि फैसला अमिताभ ही करेंगे की इस पर क्या करना चाहिए। तो देखना ये होगा कि राज की भाषा की इस आग में अमिताभ पानी डालते हैं या पेट्रोल।


आपका अपना
नीतीश राज

(कल बजरंग दल के कार्यकर्ता एक इलाके में गए और वहां के लोगों को निकालकर पीटा। फिर उन्हें एक जगह इकट्ठा कर उनसे वंदे मातरम, भारत माता की जय के नारे लगवाए। ये सब बांग्लादेशी थे। ये आग फैल रही है ना फैले तो बेहतर।क्योंकि भेड़चाल चलने वाले कम नहीं हैं देश में।)
(फोटो साभार-गूगल)

Thursday, July 31, 2008

आखिर तुम से पल्ला झाड़ ही लिया

बाबू, यहां पर अलग-अलग तरह के रंग मिलते हैं। इनके रंग भी बिल्कुल अलग हैं, सबसे निराले रंग हैं, अपने में सबसे अनोखे। गिरगिट की तरह रंग बदलना तो कोई इन से सीखे। गिरगिट भी सामने आ जाए तो इनकी रंग बदलने की फितरत से गश खाकर गिर जाए, कहे, मैं चाह कर भी इन जैसा नहीं बन सकता, नहीं बदल सकता इतनी तेजी से रंग। लेकिन कुछ भी हो इनके रंग बदलने की अदा देखकर ही मजा आ जाता है। आज जो सगा है वो कल सौतेला और परसों कोई और, फिर एक दिन दुश्मन या फिर किसी दिन प्रेस ब्रीफिंग में कह देंगे कि, 'याद नहीं, हम नहीं जानते'। याद दिलाने की कोशिश भी करेंगे तो आपके सवालों का जवाब, सवाल बन कर ही सामने आएगा आपके।
बीजेपी ने अपनी नियमित प्रेस ब्रीफिंग में सुषमा स्वराज से, अपना पल्ला झाड़ लिया। कह दिया ये सुषमा जी कि निजी राय है। ये राय बीजेपी की नहीं है। जो भी सुषमा जी ने कहा है वो राय राजग याने एनडीए की भी नहीं है। बीजेपी पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर जब ये कह रहे थे तो पत्रकारों ने सवाल दागा कि आज आप किस अधिकार से बोल रहे हैं क्योंकि यहीं पर बैठकर सुषमा जी ने जो बयान एक दिन पहले दिया था। उस पर आप आकर सफाई भी दे रहे हैं और पूरी तरह से पल्ला भी झाड़ रहे हैं। तब जावड़ेकर जी को बोलना पड़ा कि वो यहां पर पार्टी के प्रवक्ता की हैस्यित से ही आए हैं। इन नेताओं के भी क्या कहने, कभी भी किसी को भी गच्चा दे जाते हैं।
सवाल ये कि क्या पार्टी से बड़ी हो गई हैं सुषमा स्वराज, जो कि बिना पार्टी या फिर घटग दलों से मशवरा करके अपनी राय दे रहीं हैं? नियमित प्रेस ब्रीफिंग क्यों की जाती है? क्योंकि इस समय जब कि देश आतंकवाद से जूझ रहा है और बीजेपी के ही दो शासित प्रदेशों में ये विपदा आई हैं तो सभी जानना चाहते हैं कि आप की पार्टी और राज्य सरकार क्या सोच रखती है और क्या फैसले लिए जा रहे हैं। माना कि वरिष्ठ नेता हैं सुषमा जी बीजेपी की। उनको जो भी बोलना था तो सोच समझकर बोलना चाहिए था। सुषमा जी पर भी दबाव बनाया गया तो सामने आकर उन्होंने कह दिया कि “ये पूरी तरह से मेरी निजी राय है साथ ही मैंने ये नहीं कहा था, केंद्र सरकार ने ये सब करवाया है, मैंने तो ये कहा था कि यूपीए में कुछ लोग ऐसा कर सकते हैं। जो कि वोट-नोट प्रकरण से ध्यान हटवाना चाहते हों”। कितनी अच्छी हैं आप सुषमा जी तुरंत पलट गई। जब ही आपको अपना रोल नेता मानकर आप ही की पार्टी के ८ नेता वोट देते हुए पलट गए। जब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का यही हाल है और इस बयानबाजी में पड़े हुए हैं तो फिर तो पार्टी का अल्लाह ही मालिक है। (मेरे पिछले आर्टिकल 'सुषमा स्वाराज चुप रहो' में पूरा बयान है सुषमा स्वाराज का) ।
कई बार लगता है कि कुछ वरिष्ठ या यूं कहूं कि कुछ बूढ़े नेता सटिया गए हैं तो गलत नही होगा। माना ये जाता है कि उम्र के साथ अकल और तजुर्बा भी बढ़ता है। लेकिन इन नेताओं के साथ तो उल्टा ही है। बुढ़ापे में जोश जोर मार रहा है।
श्री प्रकाश जायसवाल जी को क्या सूझा कि वो पागलों की तरह गोधरा प्रकरण को उछालने लगे। राज्य सरकार पर तोहमत लगानी है तो सुरक्षा के मामलों पर लगाइये। गुजरात में दो जगह सूरत और अहमदाबाद में ४८-५० बम मिल चुके हैं। और आतंकवादियों का साहस तो देखिए जब मोदी सुरक्षा का जायजा लेने सूरत की गलियों में घूम रहे थे तब वो बम को प्लांट कर रहे थे। ऐसे हौसले हो गए हैं दहशतगर्दों के। राज्य सरकार को लताड़ पिलानी है तो इस मुद्दे पर पिलाइये। लेकिन ये क्या आप लगे सांप्रदायिकता को हवा देने। यदि सांप्रदायिक दंगे भड़क जाते हैं तो कांग्रेस इस दंगों पर अपनी राजनीति की रोटियां सेकने लग जाएगी। अगर दंगे फैले तो दिग्विजय सिंह और जायसवाल भी उतने ही जिम्मेदार होंगे जितने की खुद मोदी हैं।
अधिकतर नेता अब राज ठाकरे की तरज पर काम करने लगे हैं या यूं कहें की बनते जा रहे हैं। राज ठाकरे की तरह सिर्फ ऐसी बातें बोलना जिससे अपने पर कैमरे की लाइट पड़े। और वो अगली सुबह हर पेपर और न्यूज़ चैनलों की हेडलाइन बनें। इन कैमरे वालों को भी कुछ मसाला चाहिए होता है तभी वो लोग कुछ सेल्समैनी कर पाएंगे, कुछ बेच पाएंगे (कभी ये सेल्समैन भी निशाने पर आएंगे)। यदि अब नहीं सुधरे तो एक दिन ये ही होगा कि दोनों पछताएंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”