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Saturday, May 29, 2010

'ये यंगिस्तान की हार नहीं है...'


यंगिस्तान की हार, यंगिस्तान को धूल चटा दी, यंगिस्तान इसे एक सबक समझे, और ना जाने क्या-क्या सलोगन सुनने में आ रहे हैं। कल से ही कई लोगों की जुबान पर ये बात आ रही थी और आज सुबह अधिकतर अखबार इसी पटे हुए हैं। पर मेरा सवाल ये है कि क्या सचमुच में यंगिस्तान की हार हुई है? और हां, यहां पर एक बात साफ कर दूं कि जिम्बॉब्वे की टीम फिसड्डी नहीं है जैसा कि कई जगह बताया जा रहा है।

हां, यंगिस्तान की हार तो हुई है, जो मैदान में खेल रहा है हारेगा तो वो ही। पर क्या इस हार के जिम्मेदार भी पूरी तरह से वो ही हैं? हार की पूरी वजह भी यंगिस्तान ही है?

नहीं, इस हार को यदि प्रतिशत में देखूं तो 10 फीसदी गलती यंगिस्तान टीम की है जो कि कल मैदान में उतरी थी। जी हां, सिर्फ 10 फीसदी गलती मानता हूं टीम की। वन डे में 285 का लक्ष्य किसी भी दूसरी टीम के लिए कम मुश्किल चुनौती नहीं होता। पर क्या इस टीम के पास कोई भी ऐसा गेंदबाज था जो दूसरी टीम और लक्ष्य के बीच दीवार की तरह खड़ा हो जाता। जवाब है, नहीं। तीनों तेज गेंदबाज वन डे में अपनी पारी की शुरूआत कर रहे थे। तीनों ने पूरे 10 ओवर नहीं फेंके और साथ ही तीनों ने 6 की रन रेट से रन दिए। सफल इसमें विनय कुमार ही रहे पर महंगे भी साबित हुए। पर ऐसा क्यों हुआ कि तीन नए गेंदबाजों को एक साथ ही मैदान में उतारना पड़ा? क्या हमारे पास नेहरा, जहीर, प्रवीण को छोड़ कर गेंदबाज नहीं हैं।

नहीं ऐसा नहीं है, हमारे पास गेंदबाज हैं पर उनको मौका नहीं दिया गया। इरफान पठान, श्रीशांत, आरपी सिंह, अजीत अगरकर, जोगिंदर शर्मा को टीम के साथ भेजा जा सकता था पर क्यों नहीं टीम में शामिल किया गया ये तो सेलेक्टर्स ही बेहतर बता सकते हैं। उथप्पा, मनीष पांडे, रायडू, अभिषेक तिवारी, अभिषेक नायर इन नामों पर भी चर्चा हो सकती थी। शायद हुई भी हो पर इस टीम के साथ किसी भी सीनियर खिलाड़ी को ना भेजने के पीछे क्या लॉजिक था ये तो श्रीकांत एंड कंपनी ही बता सकती है। 70 फीसदी गलती सेलेक्टर्स की है।

20 फीसदी गलती है भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ियों की। जब कई खिलाड़ी छुट्टी मांग रहे हैं तो क्या भारतीय टीम के कप्तान धोनी को नहीं चाहिए था कि वो छुट्टी पर ना जाएं। क्यों सभी खिलाड़ियों ने एक साथ आराम की मांग की? और कैसे सेलेक्टर्स ने सभी को छुट्टी या आराम दे दिया। नेहरा ने ऐसा कौन सा पहाड़ तोड़ा था कि जिस कारण उन्हें आराम की जरूरत थी। सचिन तेंदुलकर ना तो वर्ल्ड टी-20 में गए फिर उनको आराम की जरूरत क्यों आ पड़ी।

हमारे टीम के सीनियर खिलाड़ियों से तो सिर्फ ये ही लगता है कि वो सभी अपने लिए खेलते हैं टीम या फिर देश के लिए नहीं खेलते। सब के सब आईपीएल में पैसा कमाने के लिए खेल सकते हैं पर देश की बात आए तो आराम की दरकार करते हैं। और सोने पर सुहागा सेलेक्टर्स, अपने ही पसंदीदा और क्षेत्र के खिलाड़ियों को ही टीम में शामिल करने में लगे रहते हैं।

इस हार को यंगिस्तान की हार मत कहिए, ये हार तो है हमारे बूढ़े सेलेक्टर्स और हमारे स्वार्थी सीनियर खिलाड़ियों की। इन सबको ये समझना चाहिए कि ये हार भारत की है और ये हार रिकॉर्डस में दर्ज भी जरूर होगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, March 2, 2009

सचिन,अपने चाहने वालों के अरमानों को पूरा कर पाओगे?

सचिन तेंदुलकर के दीवाने न्यूजीलैंड में भी हैं। 2002-03 के बाद से न्यूजीलैंड में उनके दीवाने अब उनको खेलते हुए देख पाएंगे इसलिए उत्सुक्ता और बढ़ गई है। पिछला दौरा ना ही सचिन और ना ही भारत टीम के लिए अच्छा रहा था। 2002-03 में 7 वन डे भारत-न्यूजीलैंड के बीच खेले गए और भारत ने वो सीरीज 5-2 से गंवाई थी। 2003 वर्ल्ड कप से ठीक पहले की ये सीरीज थी। पर इस बार सचिन के ऊपर जो जिम्मेदारी है वो बहुत बड़ी है। पिछली सीरीज की नाकामयाबी का दाग धोना है जिसमें सचिन ने 3 वन डे में सिर्फ 0, 1, 1 रन बनाए थे। अभी तक यदि देखें तो सचिन ने न्यूजीलैंड में 15 वन डे खेले हैं और 27 की औसत से 408 रन का ही योगदान देने में कामयाब हो सके हैं। न्यूजीलैंड में सचिन ने वन डे में शतक नहीं जमाया है, तो इस बार सचिन को ये कीर्तिमान अपने नाम करना ही होगा। साथ ही टेस्ट में भारत 1967 के बाद से अब तक न्यूजीलैंड में टेस्ट सीरीज नहीं जीत पाया है। तो भारतीय टीम के सबसे सीनियर और बुजुर्ग खिलाड़ी से ये उम्मीद की जा रही है कि इसके बाद तो मौका मिलने नहीं जा रहा है, हो सके तो इस टूर में न्यूजीलैंड में अपने सारे सपने पूरे कर डालें और टीम के भी।

सचिन को लोग क्रिकेट का खुदा मानते हैं। सचिन से सब को बहुत उम्मीदें होती हैं और चाहे कोई कुछ भी कहे लेकिन सचिन को खेलते देखना अपने में एक अलग रोमांच भर देता है। यहां तक की गेंदबाज जो कि सचिन को गेंद डालता है वो भी रोमांचित हुए नहीं रह पाता। हर एक गेंदबाज का सपना होता है अपने करियर में सचिन को एक बार आउट करना। पर सवाल ये उठता है कि क्या क्रिकेट में सचिन का कद इतना बड़ा हो चुका है कि सचिन अपने चाहने वालों के अरमान को पूरा कर सकें? न्यूजीलैंड में न्यूजीलैंड की टीम के खिलाफ वन डे में शतक का अरमान? एक अच्छी ईनिंग का अरमान?
न्यूजीलैंड में सचिन के आंकड़े सचिन के बढ़ते कद को ठेंगा दिखाते हुए उनकी वहां पर नाकामयाबी की चुगली करते हैं। न्यूजीलैंड में सचिन 15 मैचों में 3 बार शून्य पर आउट हुए हैं, 3 बार तो 10 का आंकड़ा भी नहीं छू सके। सिर्फ 3 हाफ सेंचुरी और यदि देखें तो 1994 से लेकर अब तक सचिन के बल्ले को तलाश है एक हाफ सेंचुरी की। न्यूजीलैंड में अभी सचिन के बल्ले की प्यास शतक को लेकर नहीं बुझी है। तो क्या ये आंकड़े महान बल्लेबाज से सवाल नहीं करते कि क्या सचिन अपने चाहने वालों के अरमान को पूरा कर पाएंगे? श्रीलंका में तीन बार अंपायर की गलती तो सारी दुनिया मान रही थी पर क्या सचिन के रिफ्लेक्सिस ज्यादा धीरे नहीं हो गए जिसके कारण ना चाहते हुए भी सचिन के बल्ले की बजाय हर बार बॉल पेड पर लग जा रही थी।

माना जा रहा है कि भारत कि इस समय की टीम पहले की सभी टीमों से बेहतर है तो साबित करना होगा इस टीम को कि ये टीम सर्वश्रेष्ठ है। 1967 के बाद यदि ये करिश्मा कोई टीम कर सकती है तो वो ये ही टीम होगी। लेकिन पहले वन डे में 2003का बदला उतारना है फिर टेस्ट की बात करेंगे।
नेपियर में अब तक सचिन तीन बार खेलने उतरे हैं और दो बार दूसरे नंबर पर बल्लेबाजी की है। फरवरी 1995 में दूसरे मैच में 15 गेंदों पर 13 रन और तीसरे मैच जनवरी 1999 में 23 रन 19 गेंदों पर बनाए थे, जिसमें 4 चौके शामिल थे। दुआ है कि इस बार सचिन नेपियर में कामयाबी की ऊंचाइयों को छू लें।

बेस्ट ऑफ लक टीम इंडिया और बेस्ट ऑफ लक मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, November 19, 2008

नंबर 1 टीम मैन है एम एस धोनी

सौरव गांगुली ने कहा था कि धोनी के पास वो एक्स्ट्र लक है जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत एक कप्तान को होती है। एम एस धोनी के हाथों में कप्तानी की बागडोर देकर कुंबले को भी अच्छा लगा होगा और सौरव को भी ये देखकर अच्छा लगा होगा कि जो स्पार्क टीम इंडिया को उन्होंने दिया था वो वैसा ही है।
महेंद्र सिंह धोनी को शायद ही कोई खिलाड़ी इस पूरे नाम से कभी बुलाता हो वर्ना वो सबके लिए धोनी या फिर माही है। टीम क्या पूरे भारत और क्रिकेट जगत के लिए धोनी को इन दो नामों से ही जाना जाता है। धोनी इस समय बल्लेबाजी में वन डे रैंकिंग में 784 अंकों के साथ नंबर 1 पर हैं। मेरी नजर में वो नंबर 1 बल्लेबाज ही नहीं हैं बल्कि नंबर 1 कप्तान भी हैं और यहां तक पहुंचने के लिए धोनी का जोश में होश ना खोना ही सबसे अहम है।
शायद कोई सोच भी नहीं सकता कि धोनी के पास विकेट के पीछे से दुश्मन पर दांव चलाने का हुनर है। नागपुर टेस्ट का दूसरा दिन, पहली पारी में भारत के पास 441 रन का बड़ा स्कोर था और दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक ऑस्ट्रेलिया ने 189-2 बना लिए थे। मैच के तीसरे दिन आस्ट्रेलिया अपनी पारी दो विकेट पर 189 रन से आगे बढाने उतरा। धोनी ने पहले ही सोच रखा था कि पहले सत्र तक उन्हें क्या करना है और पूरे उस सत्र में महज 42 निकले वो भी पूरे 24 ओवर में। धोनी ने नई रणनीति बनाई मैदान की 8 खिलाड़ी आफ साइड में औऱ सिर्फ 2 फील्डर आन साइड में रखे थे और गेंदबाजों को बोल दिया कि गेंद सिर्फ आफ स्टंप के बाहर रखो। हसी औऱ कैटिच लगातार ऑफ स्टंप के बाहर की गेंदों को खेलते-खेलते उकता गये। तमाम क्रिकेट पंडित धोनी को कोस रहे थे लेकिन धोनी जानते थे कि वो क्या कर रहे हैं, उन्हें सिर्फ अपना मकसद दिख रहा था। नतीजा ये रहा कि जो टीम 2 विकेट पर 189 रन बटोर चुकी थी वो अगले 166 रनों में बाकी आठ विकेट गंवा बैठी।
दूसरी पारी में भी धोनी ने तेज औऱ फिरकी गेंदबाजों को बड़ी सूझबूझ से लगाया। दूसरी पारी में कंगारू 50वें ओवर में मैच छोड़ चुके थे। इस दौरान सिर्फ भज्जी ही एक ऐसे गेंदबाज थे जिन्होंने 19 ओवर तक फेंके वर्ना सब ने बराबर के लगभग ही ओवर डाले थे। मैथ्य़ू हेडन भज्जी की गेंदो को बार-बार बाउंड्री के बाहर भेज रहे थे। लेकिन धोनी ने भज्जी को हटा कर अपने मंसूबों पर पानी नहीं फेरा। और फिर भज्जी की एक गेंद ने हेडन को गच्चा दे दिया औऱ फिर तो कंगारु मैच को पकड़ सकने में भी कामयाब नहीं रह पाए। टीम इंडिया ने 2-0 से कंगारुओं को सीरीज में मात देकर जो इतिहास रचा है उसे जब-जब याद किया जायेगा माही का जिक्र जरुर आयेगा।
वैसे गर देखें तो धोनी टीम मैन है। कुंबले को कंधे पर उठाने का हौसला बहुत ही कम दिखा सकते थे। जब सीरीज की ट्रॉफी दी जा रही थी तो धोनी ने कुंबले को साथ लेजाकर, कुंबले को ये सम्मान दिया कि जिसे खुद कुंबले के साथ-साथ सब याद रखना चाहेंगे। धोनी ने ये ही काम श्रीलंका में भी किया था। वहीं दूसरी तरफ सौरव गांगुली अपना अंतिम मैच खेल रहे थे और धोनी ने दादा से अंतिम मैच के अंतिम क्षणों में कप्तानी देकर एक ऐसा काम किया जो शायद कोई और नहीं कर पाता और दूसरों के लिए एक मिसाल भी रख दी। और जब-जब इन दोनों सितारों के संन्यास की बात आएगी तब धोनी का नाम हमेशा आएगा।
अब इंग्लैंड के साथ भी माही का जुझारुपन दिख रहा है। साथ ही टीम मैन वाली बात भी हमेशा सामने आती है। बाइक मिली युवराज को धोनी ने पूरे मैदान में खुद युवराज का सारथी बनकर घुमाई। इसी जज्बे के साथ धोनी और धोनी की टीम जिसने २०-२० वर्ल्ड कप जीता था अभी तक इंग्लैंड से इस सीरीज में २-० से आगे हैं। धोनी को मछ्ली की आंख दिख रही है हम भी चाहेंगे कि धोनी अपने लक्ष्य से ना भटके।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”