कहीं और ले गई। समय का चक्र दोनों की जिंदगी के साथ चलता रहा और फिर समय की हवा ने उन दो जिंदगियों को जवानी की दहलीज पर एक बार फिर एक ही शहर में लाकर खड़ा कर दिया। पर वो तो हवा का झौंका था एक को शहर के इस कोने और दूसरे को शहर के दूसरे कोने पर फेंक दिया। फिर समय ही दोनों को वापिस एक छत के नीचे लेकर आया और तब से लेकर आजतक दस साल पीछे मुड़ कर दोनों ने नहीं देखा। पहले से ही वो मेरे बहुत करीब था, दोस्त था पर कब भाई बन गया पता ही नहीं चला।
कल उसका फोन आया कि उसका जाना तय हो गया है। फोन पर ही पता चल रहा था कि वो बहुत खुश है। मैंने मुबारकबाद दी और पूछा कि मियां, आखिर जा कहां रहे हो? उसने बोला जिसकी तैयारी मैं इतने समय से कर रहा था। मैंने सोचा कि जो ये विदेश जाने की तैयारी कर रहा था लगता है कि इसको बाहर नौकरी मिल गई है। उसने बताया कि नतीजा आ गया है और अगले महीने की 10 तारीख को वो 'मेलबर्न' जा रहा है। वहां की यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो गया है और करीब एक साल का कोर्स है।
चिंता तो अब शुरू होती थी। मैंने पूछा कि क्यों जा रहा है वहां अभी तो सिचुएशन वैसे भी बड़ी टेंस है? आए दिन देख और सुन रहे हैं कि नस्लवाद के जहर के कारण कोई ना कोई भारतीय वहां पर पिट रहा है। कभी किसी का सामान छीन लिया जाता है तो कभी किसी की गाड़ी फूंक दी जा रही है। घर में भी घुसकर वो लोग मारपीट कर रहे हैं। जिसका भी मन चल रहा है किसी को भी पीटने लग रहा है। कोई पीट रहा है तो दूसरे जो जानते भी नहीं हैं वो भी पटीने लग जाते हैं। साथ ही पुलिस और सरकार का रवैया भी संतोषजनक नहीं है।
कई तर्क उसने मुझे दिए और उन तर्कों के बीच कई जवाब। उसने कहा कि क्या यहां पर अपने देश में ऐसा नहीं हो रहा है? तो मेरा जवाब था कि यहां नस्लभेद के कारण ऐसा नहीं हो रहा है। वो बोला, हर जगह पर लूटपाट की वारदातें होती हैं लेकिन यदि कोई तुम से तुम्हारा सामान छीनने लगे तो क्या तुम यूं ही दे दोगे। नहीं। पर वहां पर भारतीय यहां से कैसे-कैसे करके तो जा रहे हैं उस पर कोई सामान छीनने लगे तो मारपीट तो होनी ही है। वहां के गुंडे कुछ भारी पड़ रहे हैं अब सरकार भी कह रही है कि वो सुरक्षा देगी भारतीयों को। ऑस्ट्रेलिया के स्टूडेंट को लगता है कि भारतीय कहीं कम पैसों में वो काम कर लेते हैं जो कि वो इतने कम पैसों में नहीं करते। जैसे कि दिल्ली में बिहारी कम पैसों पर काम करके उत्तरप्रदेश, हिमाचली और दिल्ली के लोगों के दुश्मन बने हुए हैं। भारतीय वहां पर कम पैसों पर काम करते हैं और वहां की नागरिकता लेकर वहीं ठहर जाते हैं, जैसे कि मुंबई में राज ठाकरे ने उठाया था बाहर के लोगों का मुद्दा।
दूसरी बात, जहां पर 4 स्टूडेंट को रहने के लिए जगह दी गई हो वहां पर 10-12 स्टूडेंट रहते हैं, क्यों? जब छड़े रहेंगे तो रात में शोर भी होगा ही, बाहर अंडरवियर में चले आते हैं, कहीं पर खड़े होकर पेशाब करने लग जाते हैं, लड़कियों को देखकर फब्तियां कसते हैं, तो कभी ना कभी वहां के लोगों का गुबार निकलेगा ही ना। उसने मुझ पर ही सवाल दाग दिया कि यदि तुम्हारे घर के पीछे या फिर पार्क में कोई सरेआम 'पेशाब' करने लगे तो क्या करोगे?
ये सब बातें करने के बाद मैं खुद सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या जो ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है वो सही है? जहां तक मैने सोचा या यूं कहूं कि जिस नतीजे पर मैं पहुंचा वो ये था कि चाहे जो भी गलतियां भारतीय वहां पर कर रहे हों पर उस कारण से मारपीट करना वाजिब नहीं है वो गैरकानूनी है। यदि हम अपनी काब्लियत की बदौलत कोई नौकरी पाते हैं और कम पैसों पर काम करने का पैमाना तो सबका अलग-अलग होता है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रति व्यक्ति आय अलग-अलग हैं। हम कम पैसों में भी काम कर सकते हैं आप नहीं कर सकते तो ये आपकी प्रोब्लम है हमारी नहीं। हम उसी डिग्री के लिए ज्यादा खर्च करते हैं जिसे आप काफी कम पैसों पर पा लेते हैं।
वैसे ऑस्ट्रेलिया में सीनियर्स से बात हुई है वो कह रहे हैं कि थोड़ी बहुत दिक्कतें तो आती ही रहतीं थीं पर अब कि बार वो कुछ ज्यादा ही सामने आगईं हैं। कोई डरने की बात नहीं है बाकी ऑस्ट्रेलिया में सब ठीक है। हमारी तो यही दुआ है कि जल्द ही ये नस्लवाद का काला चक्र खत्म हो।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
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Thursday, June 11, 2009
नस्लवाद तो कहीं है पर क्या कोई तुम्हारे घर के सामने पे... करेगा तो तुम चुप बैठोगे?
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Wednesday, November 19, 2008
नंबर 1 टीम मैन है एम एस धोनी
सौरव गांगुली ने कहा था कि धोनी के पास वो एक्स्ट्र लक है जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत एक कप्तान को होती है। एम एस धोनी के हाथों में कप्तानी की बागडोर देकर कुंबले को भी अच्छा लगा होगा और सौरव को भी ये देखकर अच्छा लगा होगा कि जो स्पार्क टीम इंडिया को उन्होंने दिया था वो वैसा ही है।
महेंद्र सिंह धोनी को शायद ही कोई खिलाड़ी इस पूरे नाम से कभी बुलाता हो वर्ना वो सबके लिए धोनी या फिर माही है। टीम क्या पूरे भारत और क्रिकेट जगत के लिए धोनी को इन दो नामों से ही जाना जाता है। धोनी इस समय बल्लेबाजी में वन डे रैंकिंग में 784 अंकों के साथ नंबर 1 पर हैं। मेरी नजर में वो नंबर 1 बल्लेबाज ही नहीं हैं बल्कि नंबर 1 कप्तान भी हैं और यहां तक पहुंचने के लिए धोनी का जोश में होश ना खोना ही सबसे अहम है।
शायद कोई सोच भी नहीं सकता कि धोनी के पास विकेट के पीछे से दुश्मन पर दांव चलाने का हुनर है। नागपुर टेस्ट का दूसरा दिन, पहली पारी में भारत के पास 441 रन का बड़ा स्कोर था और दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक ऑस्ट्रेलिया ने 189-2 बना लिए थे। मैच के तीसरे दिन आस्ट्रेलिया अपनी पारी दो विकेट पर 189 रन से आगे बढाने उतरा। धोनी ने पहले ही सोच रखा था कि पहले सत्र तक उन्हें क्या करना है और पूरे उस सत्र में महज 42 निकले वो भी पूरे 24 ओवर में। धोनी ने नई रणनीति बनाई मैदान की 8 खिलाड़ी आफ साइड में औऱ सिर्फ 2 फील्डर आन साइड में रखे थे और गेंदबाजों को बोल दिया कि गेंद सिर्फ आफ स्टंप के बाहर रखो। हसी औऱ कैटिच लगातार ऑफ स्टंप के बाहर की गेंदों को खेलते-खेलते उकता गये। तमाम क्रिकेट पंडित धोनी को कोस रहे थे लेकिन धोनी जानते थे कि वो क्या कर रहे हैं, उन्हें सिर्फ अपना मकसद दिख रहा था। नतीजा ये रहा कि जो टीम 2 विकेट पर 189 रन बटोर चुकी थी वो अगले 166 रनों में बाकी आठ विकेट गंवा बैठी।
दूसरी पारी में भी धोनी ने तेज औऱ फिरकी गेंदबाजों को बड़ी सूझबूझ से लगाया। दूसरी पारी में कंगारू 50वें ओवर में मैच छोड़ चुके थे। इस दौरान सिर्फ भज्जी ही एक ऐसे गेंदबाज थे जिन्होंने 19 ओवर तक फेंके वर्ना सब ने बराबर के लगभग ही ओवर डाले थे। मैथ्य़ू हेडन भज्जी की गेंदो को बार-बार बाउंड्री के बाहर भेज रहे थे। लेकिन धोनी ने भज्जी को हटा कर अपने मंसूबों पर पानी नहीं फेरा। और फिर भज्जी की एक गेंद ने हेडन को गच्चा दे दिया औऱ फिर तो कंगारु मैच को पकड़ सकने में भी कामयाब नहीं रह पाए। टीम इंडिया ने 2-0 से कंगारुओं को सीरीज में मात देकर जो इतिहास रचा है उसे जब-जब याद किया जायेगा माही का जिक्र जरुर आयेगा।
वैसे गर देखें तो धोनी टीम मैन है। कुंबले को कंधे पर उठाने का हौसला बहुत ही कम दिखा सकते थे। जब सीरीज की ट्रॉफी दी जा रही थी तो धोनी ने कुंबले को साथ लेजाकर, कुंबले को ये सम्मान दिया कि जिसे खुद कुंबले के साथ-साथ सब याद रखना चाहेंगे। धोनी ने ये ही काम श्रीलंका में भी किया था। वहीं दूसरी तरफ सौरव गांगुली अपना अंतिम मैच खेल रहे थे और धोनी ने दादा से अंतिम मैच के अंतिम क्षणों में कप्तानी देकर एक ऐसा काम किया जो शायद कोई और नहीं कर पाता और दूसरों के लिए एक मिसाल भी रख दी। और जब-जब इन दोनों सितारों के संन्यास की बात आएगी तब धोनी का नाम हमेशा आएगा।
अब इंग्लैंड के साथ भी माही का जुझारुपन दिख रहा है। साथ ही टीम मैन वाली बात भी हमेशा सामने आती है। बाइक मिली युवराज को धोनी ने पूरे मैदान में खुद युवराज का सारथी बनकर घुमाई। इसी जज्बे के साथ धोनी और धोनी की टीम जिसने २०-२० वर्ल्ड कप जीता था अभी तक इंग्लैंड से इस सीरीज में २-० से आगे हैं। धोनी को मछ्ली की आंख दिख रही है हम भी चाहेंगे कि धोनी अपने लक्ष्य से ना भटके।
आपका अपना
नीतीश राज
महेंद्र सिंह धोनी को शायद ही कोई खिलाड़ी इस पूरे नाम से कभी बुलाता हो वर्ना वो सबके लिए धोनी या फिर माही है। टीम क्या पूरे भारत और क्रिकेट जगत के लिए धोनी को इन दो नामों से ही जाना जाता है। धोनी इस समय बल्लेबाजी में वन डे रैंकिंग में 784 अंकों के साथ नंबर 1 पर हैं। मेरी नजर में वो नंबर 1 बल्लेबाज ही नहीं हैं बल्कि नंबर 1 कप्तान भी हैं और यहां तक पहुंचने के लिए धोनी का जोश में होश ना खोना ही सबसे अहम है।
शायद कोई सोच भी नहीं सकता कि धोनी के पास विकेट के पीछे से दुश्मन पर दांव चलाने का हुनर है। नागपुर टेस्ट का दूसरा दिन, पहली पारी में भारत के पास 441 रन का बड़ा स्कोर था और दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक ऑस्ट्रेलिया ने 189-2 बना लिए थे। मैच के तीसरे दिन आस्ट्रेलिया अपनी पारी दो विकेट पर 189 रन से आगे बढाने उतरा। धोनी ने पहले ही सोच रखा था कि पहले सत्र तक उन्हें क्या करना है और पूरे उस सत्र में महज 42 निकले वो भी पूरे 24 ओवर में। धोनी ने नई रणनीति बनाई मैदान की 8 खिलाड़ी आफ साइड में औऱ सिर्फ 2 फील्डर आन साइड में रखे थे और गेंदबाजों को बोल दिया कि गेंद सिर्फ आफ स्टंप के बाहर रखो। हसी औऱ कैटिच लगातार ऑफ स्टंप के बाहर की गेंदों को खेलते-खेलते उकता गये। तमाम क्रिकेट पंडित धोनी को कोस रहे थे लेकिन धोनी जानते थे कि वो क्या कर रहे हैं, उन्हें सिर्फ अपना मकसद दिख रहा था। नतीजा ये रहा कि जो टीम 2 विकेट पर 189 रन बटोर चुकी थी वो अगले 166 रनों में बाकी आठ विकेट गंवा बैठी।
दूसरी पारी में भी धोनी ने तेज औऱ फिरकी गेंदबाजों को बड़ी सूझबूझ से लगाया। दूसरी पारी में कंगारू 50वें ओवर में मैच छोड़ चुके थे। इस दौरान सिर्फ भज्जी ही एक ऐसे गेंदबाज थे जिन्होंने 19 ओवर तक फेंके वर्ना सब ने बराबर के लगभग ही ओवर डाले थे। मैथ्य़ू हेडन भज्जी की गेंदो को बार-बार बाउंड्री के बाहर भेज रहे थे। लेकिन धोनी ने भज्जी को हटा कर अपने मंसूबों पर पानी नहीं फेरा। और फिर भज्जी की एक गेंद ने हेडन को गच्चा दे दिया औऱ फिर तो कंगारु मैच को पकड़ सकने में भी कामयाब नहीं रह पाए। टीम इंडिया ने 2-0 से कंगारुओं को सीरीज में मात देकर जो इतिहास रचा है उसे जब-जब याद किया जायेगा माही का जिक्र जरुर आयेगा।
वैसे गर देखें तो धोनी टीम मैन है। कुंबले को कंधे पर उठाने का हौसला बहुत ही कम दिखा सकते थे। जब सीरीज की ट्रॉफी दी जा रही थी तो धोनी ने कुंबले को साथ लेजाकर, कुंबले को ये सम्मान दिया कि जिसे खुद कुंबले के साथ-साथ सब याद रखना चाहेंगे। धोनी ने ये ही काम श्रीलंका में भी किया था। वहीं दूसरी तरफ सौरव गांगुली अपना अंतिम मैच खेल रहे थे और धोनी ने दादा से अंतिम मैच के अंतिम क्षणों में कप्तानी देकर एक ऐसा काम किया जो शायद कोई और नहीं कर पाता और दूसरों के लिए एक मिसाल भी रख दी। और जब-जब इन दोनों सितारों के संन्यास की बात आएगी तब धोनी का नाम हमेशा आएगा।
अब इंग्लैंड के साथ भी माही का जुझारुपन दिख रहा है। साथ ही टीम मैन वाली बात भी हमेशा सामने आती है। बाइक मिली युवराज को धोनी ने पूरे मैदान में खुद युवराज का सारथी बनकर घुमाई। इसी जज्बे के साथ धोनी और धोनी की टीम जिसने २०-२० वर्ल्ड कप जीता था अभी तक इंग्लैंड से इस सीरीज में २-० से आगे हैं। धोनी को मछ्ली की आंख दिख रही है हम भी चाहेंगे कि धोनी अपने लक्ष्य से ना भटके।
आपका अपना
नीतीश राज
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भारत अर्श पर, ऑस्ट्रेलिया फर्श पर, अब इंग्लैंड होगा फर्श पर
भारत की रैंकिंग ऑस्ट्रेलिया को हराने के बाद से बढ़ गई और भारत दूसरे पायदान पर आकर टेस्ट रैंकिंग में खड़ा हो गया। जहां भारत ने 40 मैच खेलते हुए 4659 अंक हासिल किए और रैंकिंग अंक 116 मिले हैं वहीं दूसरी तरफ द.अफ्रीका के भी रैंकिंग अंक 116 ही हैं पर उसके 34 मैचों के साथ 3953 अंक हैं। भारत दूसरे पायदान पर खड़ा हो पाया क्योंकि उसने पहले नंबर पर खड़े घमंडी कंगारुओं को 2-0 से सीरीज में मात दी। वैसे ऑस्ट्रेलिया के 121 अंक हैं और अभी तो खास तौर पर वो पहले पायदान पर आराम से खड़ा हुआ है पर भारत दूसरे पायदान पर कैसे आया ये वाकई एक सफर है खासतौर पर पिछली सीरीज में तो।
ये चमत्कार हुआ है टीम वर्क से, इस बार हम श्रीलंका में हुई सीरीज की तरह दब कर नहीं खेले। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फर्क इतना था कि टीम इंडिया के शेर दहाड़ते हुए दिखे और कंगारू पूरी तरह लाचार।
जहां भारत के गेंदबाज और सलामी बल्लेबाज के साथ-साथ स्पिन का जादू भी चला तो वहीं दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया की पूरी टीम फिसड्डी दिखी। जहां ईशांत शर्मा चार मैचों में 27.06 की औसत और 55.2 की स्ट्राइक रेट के साथ 15 विकेट चटकाकर सबसे कामयाब गेंदबाज रहे, वहीं दूसरी ओर ब्रेट ली 4 मैच में आठ विकेट ही झटक सके। वो भी 61.62 के औसत और 111 के स्ट्राइक रेट से। ली की धार इस बार फीकी रही जबकि जॉनसन ऑस्ट्रेलियाई खेमें से सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले बने रहे जिन्होंने 4 मैच में 13 विकेट लिए। अमित मिश्रा और हरभजन सिंह के जादू ने भी सीरीज़ का पलड़ा भारत की तरफ झुकाने में अहम किरदार निभाया। हरभजन ने 3 मैच में 15 विकेट लेकर ईशांत के साथ रहकर नंबर वन की कुर्सी पर छाए रहे। तो दूसरी तरफ अमित ने 3 मैच में 14 विकेट झटककर कुंबले की कमी को पूरा किया।
यदि हम अब नजर डालें भारतीय बल्लेबाजी पर तो, गौतम गंभीर तीन मैचों में 77.16 के औसत से 463 रन बनाकर अव्वल रहे और दूसरे नंबर पर रहे सचिन 4 मैच में 396 रन बनाए वहीं हसी ने 4 मैच में 394 रन बनाए और मैथ्यू हेडन की हालत पूरी सीरीज में खराब रही।
भारत के गेम प्लान के सामने कंगारुओं का गेमप्लान ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। पूरी सीरीज के दौरान ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में पंटर और ली के बीच की खींचातानी से पन्ने भरे रहे। पंटर की कप्तानी पर दिग्गजों ने सवाल खड़े किए। ये एक ऐसा मौका था जब कि पंटर की सेना पर तीर छोड़े जा रहे थे और वो कुछ कर भी नहीं पा रही थी। ये वर्ल्ड क्रिकेट में भारत की नई उड़ान है ये नंबर वन की कुर्सी की ओर बढ़ा एक मजबूत कदम है ये बदला है, बदला उस टीम से जिसने पिछली बार बेइमानी से भारत को सीरीज़ में हाराया था।
अब इंग्लैंड की बारी है। इंग्लैंड के कप्तान पीटरसन और फ्लिंटॉफ ने सीरीज शुरू होने से पहले कहा था कि पूरी सीरीज में वो भारत के ऊपर हावी रहेंगे। साथ ही सीरीज शुरु होने से पहले अभ्यास मैच में इंग्लैंड ने दो मैच खेले थे और एक जीता था और एक हारा था। दूसरे मैच में इंग्लैंड की पूरी टीम 100 के आंकड़े को भी छू नहीं पाई थी और 98 पर ऑल आउट होगई थी और मैच 124 रन से गवां दिया था। तब पीटरसन ने कहा था कि हम तो यूं ही खेल रहे थे। शायद अब दो मैच के बाद भी लगता तो ये ही है कि वो यूं ही खेल रहे हैं। जहां इंग्लैंड में अखबारों के पन्ने पूरी तरह से भारतीय टीम की तारीफ से अटे पड़े हैं वहीं दूसरी तरफ पीटरसन और उनकी टीम पर बार-बार निशाना साधा जा रहा है।
अब देखना तो ये होगा कि युवराज-गंभीर की आंधी को पीटरसन की सेना कैसे रोक पाएगी। राजकोट, इंदौर और अब कानपुर के ग्रीनपार्क स्टेडियम में ये देखना होगा कि क्या भारत फिर से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा पाएगा जबकि अब तो ईशांत भी पूरी तरह फिट हो चुके हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
ये चमत्कार हुआ है टीम वर्क से, इस बार हम श्रीलंका में हुई सीरीज की तरह दब कर नहीं खेले। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फर्क इतना था कि टीम इंडिया के शेर दहाड़ते हुए दिखे और कंगारू पूरी तरह लाचार।
जहां भारत के गेंदबाज और सलामी बल्लेबाज के साथ-साथ स्पिन का जादू भी चला तो वहीं दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया की पूरी टीम फिसड्डी दिखी। जहां ईशांत शर्मा चार मैचों में 27.06 की औसत और 55.2 की स्ट्राइक रेट के साथ 15 विकेट चटकाकर सबसे कामयाब गेंदबाज रहे, वहीं दूसरी ओर ब्रेट ली 4 मैच में आठ विकेट ही झटक सके। वो भी 61.62 के औसत और 111 के स्ट्राइक रेट से। ली की धार इस बार फीकी रही जबकि जॉनसन ऑस्ट्रेलियाई खेमें से सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले बने रहे जिन्होंने 4 मैच में 13 विकेट लिए। अमित मिश्रा और हरभजन सिंह के जादू ने भी सीरीज़ का पलड़ा भारत की तरफ झुकाने में अहम किरदार निभाया। हरभजन ने 3 मैच में 15 विकेट लेकर ईशांत के साथ रहकर नंबर वन की कुर्सी पर छाए रहे। तो दूसरी तरफ अमित ने 3 मैच में 14 विकेट झटककर कुंबले की कमी को पूरा किया।
यदि हम अब नजर डालें भारतीय बल्लेबाजी पर तो, गौतम गंभीर तीन मैचों में 77.16 के औसत से 463 रन बनाकर अव्वल रहे और दूसरे नंबर पर रहे सचिन 4 मैच में 396 रन बनाए वहीं हसी ने 4 मैच में 394 रन बनाए और मैथ्यू हेडन की हालत पूरी सीरीज में खराब रही।
भारत के गेम प्लान के सामने कंगारुओं का गेमप्लान ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। पूरी सीरीज के दौरान ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में पंटर और ली के बीच की खींचातानी से पन्ने भरे रहे। पंटर की कप्तानी पर दिग्गजों ने सवाल खड़े किए। ये एक ऐसा मौका था जब कि पंटर की सेना पर तीर छोड़े जा रहे थे और वो कुछ कर भी नहीं पा रही थी। ये वर्ल्ड क्रिकेट में भारत की नई उड़ान है ये नंबर वन की कुर्सी की ओर बढ़ा एक मजबूत कदम है ये बदला है, बदला उस टीम से जिसने पिछली बार बेइमानी से भारत को सीरीज़ में हाराया था।
अब इंग्लैंड की बारी है। इंग्लैंड के कप्तान पीटरसन और फ्लिंटॉफ ने सीरीज शुरू होने से पहले कहा था कि पूरी सीरीज में वो भारत के ऊपर हावी रहेंगे। साथ ही सीरीज शुरु होने से पहले अभ्यास मैच में इंग्लैंड ने दो मैच खेले थे और एक जीता था और एक हारा था। दूसरे मैच में इंग्लैंड की पूरी टीम 100 के आंकड़े को भी छू नहीं पाई थी और 98 पर ऑल आउट होगई थी और मैच 124 रन से गवां दिया था। तब पीटरसन ने कहा था कि हम तो यूं ही खेल रहे थे। शायद अब दो मैच के बाद भी लगता तो ये ही है कि वो यूं ही खेल रहे हैं। जहां इंग्लैंड में अखबारों के पन्ने पूरी तरह से भारतीय टीम की तारीफ से अटे पड़े हैं वहीं दूसरी तरफ पीटरसन और उनकी टीम पर बार-बार निशाना साधा जा रहा है।
अब देखना तो ये होगा कि युवराज-गंभीर की आंधी को पीटरसन की सेना कैसे रोक पाएगी। राजकोट, इंदौर और अब कानपुर के ग्रीनपार्क स्टेडियम में ये देखना होगा कि क्या भारत फिर से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा पाएगा जबकि अब तो ईशांत भी पूरी तरह फिट हो चुके हैं।
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“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”