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Saturday, May 29, 2010

'ये यंगिस्तान की हार नहीं है...'


यंगिस्तान की हार, यंगिस्तान को धूल चटा दी, यंगिस्तान इसे एक सबक समझे, और ना जाने क्या-क्या सलोगन सुनने में आ रहे हैं। कल से ही कई लोगों की जुबान पर ये बात आ रही थी और आज सुबह अधिकतर अखबार इसी पटे हुए हैं। पर मेरा सवाल ये है कि क्या सचमुच में यंगिस्तान की हार हुई है? और हां, यहां पर एक बात साफ कर दूं कि जिम्बॉब्वे की टीम फिसड्डी नहीं है जैसा कि कई जगह बताया जा रहा है।

हां, यंगिस्तान की हार तो हुई है, जो मैदान में खेल रहा है हारेगा तो वो ही। पर क्या इस हार के जिम्मेदार भी पूरी तरह से वो ही हैं? हार की पूरी वजह भी यंगिस्तान ही है?

नहीं, इस हार को यदि प्रतिशत में देखूं तो 10 फीसदी गलती यंगिस्तान टीम की है जो कि कल मैदान में उतरी थी। जी हां, सिर्फ 10 फीसदी गलती मानता हूं टीम की। वन डे में 285 का लक्ष्य किसी भी दूसरी टीम के लिए कम मुश्किल चुनौती नहीं होता। पर क्या इस टीम के पास कोई भी ऐसा गेंदबाज था जो दूसरी टीम और लक्ष्य के बीच दीवार की तरह खड़ा हो जाता। जवाब है, नहीं। तीनों तेज गेंदबाज वन डे में अपनी पारी की शुरूआत कर रहे थे। तीनों ने पूरे 10 ओवर नहीं फेंके और साथ ही तीनों ने 6 की रन रेट से रन दिए। सफल इसमें विनय कुमार ही रहे पर महंगे भी साबित हुए। पर ऐसा क्यों हुआ कि तीन नए गेंदबाजों को एक साथ ही मैदान में उतारना पड़ा? क्या हमारे पास नेहरा, जहीर, प्रवीण को छोड़ कर गेंदबाज नहीं हैं।

नहीं ऐसा नहीं है, हमारे पास गेंदबाज हैं पर उनको मौका नहीं दिया गया। इरफान पठान, श्रीशांत, आरपी सिंह, अजीत अगरकर, जोगिंदर शर्मा को टीम के साथ भेजा जा सकता था पर क्यों नहीं टीम में शामिल किया गया ये तो सेलेक्टर्स ही बेहतर बता सकते हैं। उथप्पा, मनीष पांडे, रायडू, अभिषेक तिवारी, अभिषेक नायर इन नामों पर भी चर्चा हो सकती थी। शायद हुई भी हो पर इस टीम के साथ किसी भी सीनियर खिलाड़ी को ना भेजने के पीछे क्या लॉजिक था ये तो श्रीकांत एंड कंपनी ही बता सकती है। 70 फीसदी गलती सेलेक्टर्स की है।

20 फीसदी गलती है भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ियों की। जब कई खिलाड़ी छुट्टी मांग रहे हैं तो क्या भारतीय टीम के कप्तान धोनी को नहीं चाहिए था कि वो छुट्टी पर ना जाएं। क्यों सभी खिलाड़ियों ने एक साथ आराम की मांग की? और कैसे सेलेक्टर्स ने सभी को छुट्टी या आराम दे दिया। नेहरा ने ऐसा कौन सा पहाड़ तोड़ा था कि जिस कारण उन्हें आराम की जरूरत थी। सचिन तेंदुलकर ना तो वर्ल्ड टी-20 में गए फिर उनको आराम की जरूरत क्यों आ पड़ी।

हमारे टीम के सीनियर खिलाड़ियों से तो सिर्फ ये ही लगता है कि वो सभी अपने लिए खेलते हैं टीम या फिर देश के लिए नहीं खेलते। सब के सब आईपीएल में पैसा कमाने के लिए खेल सकते हैं पर देश की बात आए तो आराम की दरकार करते हैं। और सोने पर सुहागा सेलेक्टर्स, अपने ही पसंदीदा और क्षेत्र के खिलाड़ियों को ही टीम में शामिल करने में लगे रहते हैं।

इस हार को यंगिस्तान की हार मत कहिए, ये हार तो है हमारे बूढ़े सेलेक्टर्स और हमारे स्वार्थी सीनियर खिलाड़ियों की। इन सबको ये समझना चाहिए कि ये हार भारत की है और ये हार रिकॉर्डस में दर्ज भी जरूर होगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, September 12, 2009

कल खुशी पर भारी पड़ा गम।


कहीं खुशी, कहीं गम, ये ही हाल रहा दो दिन के बारे में कहूं तो। दिल्ली में बारिश ही बारिश। हरियाणा से यमुना में पानी भी छोड़ा गया जिसके कारण दिल्ली में बाढ़ जैसे हालात हो गए हैं। पता नहीं कितने सालो बाद ऐसी बारिश हुई है। शायद 98 में दिल्ली में ऐसा ही एक बार हुआ था जब कि यमुना पुश्ता पर पानी भर गया था और दिल्ली में बाढ़ आई थी।
एक गाना हुआ करता था रिमझिम गिरे सावन....पर अब तो सावन बीत जाए और फिर रिमझिम शुरू हो जाए। ये हाल हो गया है मौसम का।

वैसे, मैं यहां पर बात क्या करने वाला था और क्या करने लग गया। कल के दिन खुशी मिली पर जब गम सामने आया तो वो खुशी पर भारी पड़ गया।

ऑफिस में इस बात का इंतजार हो रहा था कि क्या भारत आज का मैच जीत जाएगा। चार विकेट गिर चुके थे। मैं और मेरे साथ ही कुछ इस पर चर्चा भी कर रहे थे कि जब स्कोर छोटा होता है तो टीम इंडिया जरूर उतना ही मर मर कर जीतती है। ये नहीं कि शेर की तरह खेले और जल्दी जीत कर मैच को रफा-दफा करे। चार विकेट गिर चुके थे, द्रविड़ ने 65 मिनट क्रीज पर रहकर 45 गेंदों में महज 14 रन बनाए। द्रविड़ एक महान खिलाड़ी हैं पर क्यों द्रविड़ वन डे को भी टेस्ट की तरह खेलते हैं।

इस बीच एक खबर ने सब में रोमांच भर दिया। पहले था कि सीरीज जीतने पर ही टीम इंडिया नंबर वन बन पाएगी। पर अब ये खबर आई कि न्यूजीलैंड को हराने के साथ ही हम नंबर वन बन जाएंगे पर नंबर वन बने रहने के लिए कॉम्पेक कप जीतना जरूरी होगा। और थोड़ी देर बाद ही धोनी और रैना ने जीत दिला दी। धोनी और रैना दोनों की तारीफ करना चाहूंगा कि दोनों ने सूझबूझ कर बैटिंग की और अंत तक टिके रहे। आशीष नेहरा को मैन ऑफ द मैच से नवाजा गया। सचिन को सम्मान के रूप में बाइक दी गई जिसपर इस बार सचिन खुद ही बैठे धोनी को बैठने का मौका नहीं दिया।

अब बात गम की भी कर लें।

अभी ऑफिस से घर की तरफ निकले ही थे कि पता चला कि डीडी ने सेमीफाइनल और फाइनल के राइट्स खरीद लिए हैं। अब तो लगा कि वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारत का झंडा ऊंचा होगा और विजेंदर अपने बाउट जीतकर फाइनल की जंग में पहुंच जाएगा।

पूरे ऑफिस में बताया गया कि रात के 1.30 बजे है बाउट। मैं घर पहुंच कर खाना पीना करके टीवी खोलकर कभी कुछ कभी कुछ देखते हुए जगने की कोशिश में लग गया। बार-बार न्यूज पर वापिस आता कि जब तक क्रिकेट का ही लुत्फ ले लिया जाए। दिल में एक इच्छा थी कि विजेंदर जीत जाए क्योंकि हाल ही में करोड़ों का मुनाफा हुआ है विजेंदर को।

इतिहास तो विजेंदर ने भी रच ही दिया है। पहली बार कोई भारतीय बॉक्सर इस ऊंचाई तक पहुंच पाया है। यदि विजेंदर जीत जाए तो अच्छा होगा क्योंकि बहुत हो लिया क्रिकेट। पर ये ही सोचते-सोचते कब नींद आगई पता ही नहीं चला। सुबह जब उठा तो तुरंत टीवी चलाया देखा तो हर न्यूज चैनल पर सिर्फ क्रिकेट ही क्रिकेट चल रहा था। लग गया कि विजेंदर का क्या हुआ। यानी हार गया विजेंदर।

जी हां, उजबेकिस्तान बॉक्सर अब्बोस अतोव जिसकी रैंक इस चैंपियनशिप में चौथी थी उसने पहली रैंक विजेदर को 7-3 से मात दे दी। जबकि पहले राउंड में 0-1 से आगे चल रहा थे विजेंदर। पर दूसरे राउंड में ज्यादा डिफेंसिव मोड विजेंदर को हार के कगार पर ले गया। और उजबेक बॉक्सर ने दूसरे राउंड में 5 अंक बटोर लिए और फिर अंतिम राउंड में तो सिर्फ खानापूर्ति ही रह गई। अतोव ने 2007 में लाइट वेट में वर्ल्ड चैंपियनशिप में फाइनल जीता था और वो भी तब जब कि वो बाउट के दौरान प्रतिद्वंदी के पंच के कारण नीचे गिर गए थे। दूसरे राउंड के बाद स्कोर 5-1 था और अंत में 7-3 से विजेंदर हार गया और मुझे लगता है कि बॉक्सिंग का फ्यूचर भी हार गया।

मैंने टीवी बंद कर दिया था। सोच रहा था कि आज भी दो मैच हैं। जहां एक जगह टीम इंडिया श्रीलंका से भिड़ेगी, वहीं दूसरी तरफ जीतेगा भी भारत और हारेगा भी भारत। अमेरिकी ओपन टेनिस चैंपियनशिप में भूपति और पेस होंगे आमने-सामने। देखते हैं कि खुशी मिलती है या फिर आज का पार्ट-2।
आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, May 13, 2009

ये लो आगए फिर रंग में सचिन

ये देखिए चल गए ना फिर से सचिन तेंदुलकर। कल ही तो मैंने लिखा था जब हर जगह ये ही बात होने लगी थी कि पता नहीं सचिन को क्या होगया है। मैंने साफ लिखा था कि भई कई बार ऐसा होता है कि हां कोई दो-चार मैच परफोर्म नहीं कर पाता पर इसका ये मतलब नहीं है कि दाना-पानी लेकर ही पीछे लग जाओ।

किंग्स इलेवन ने दूसरी भिड़ंत में भी 119 रन ही बनाए और जीत के लिए 120 की चुनौती मुंबई इंडियंस के सामने रखी। और मैच में टॉस हारने के बावजूद सचिन ने कप्तानी का सही रुख दिखाते हुए तीसरे ओवर से ही गेंदबाजों को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। फिर भज्जी को गेंद पकड़ाई और भज्जी ने कमाल ही कर दिया। सबसे खतरनाक खिलाड़ी संगकारा को आउट कर दिया। साथी ही ड्यूमनी को भी सचिन ने मौका दिया। ड्यूमनी ने भी युवराज को आउट कराके मुंबई की कमर ही तोड़ दी। सचिन ने फील्डिंग में भी कमाल दिखाया और सोहल जो कि खतरनाक बन रहा था उसे रन आउट किया।

जब बल्लेबाजी की बात आई तो सचिन ने गजब का आत्मविश्वास दिखाते हुए ब्रावो से ओपन करवाया और साथ ही जयसूर्या के आउट होने के बाद पिछले मैच में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले राहणे को मैदान में उतारा। फिर रहाणे के आउट होने के बाद खुद मैदान में आए। चाहते तो ड्यूमनी को भेजा जा सकता था पर नहीं। अपनी परर्फोरमेंस को सुधारने का जज्बा लेकर सचिन मैदान में उतरे और 40 से 122 तक टीम को पहुंचाया। साथ ही ब्रावो का उत्साहवर्धन भी करते रहते। जहां ब्रावो ने श्रीशांत को छक्के मारे वहीं घातक बनते हुए पीयूष चावला को सचिन ने भी शानदार छक्का जड़ा।

माना कि अभी आईपीएल का सफर बहुत बाकी है और सचिन को हमेशा से ही बार-बार अपने आप को साबित करते रहना पड़ेगा खासकर टीम के लिए। वैसे पूरी दुनिया में कोई भी सचिन से साबित करने की बात तो कहने नहीं जा रहा। पर ट्वेंटी-20 में जैसी कप्तानी और परफोर्मेंस एक खिलाड़ी से चाहिए वहां पर अभी सचिन पूरा नहीं दे पा रहे हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, May 11, 2009

क्या हो गया है सचिन को? शुरुआत में तो लगा था कि वाह! मास्टर ब्लास्टर इस बार तो ब्लास्ट करने के लिए तैयार हैं। पर क्या होगया सचिन को एकदम से ब्रेक लग गए। आईपीएल सीजन 2 में सचिन ने 9 मैच खेले हैं और 226 रन बनाए हैं जिसमें से एक बार नॉट आउट भी रहे। पहले तीन मैचों में तो सचिन का जलवा देखने लायक था। पहले तीन मैचों में ही सचिन ने दो हॉफ सेंचुरी जमाई। पहले ही मैच में 49 गेंदों पर नाबाद 59 रन बनाए जिसमें 7 चौके शामिल थे। चेन्नई को बड़ी ही आसानी से मात दे दी थी। हैदराबाद के खिलाफ दूसरे मैच में टीम 12 रन से भले ही हार गई पर सचिन ने 3 छक्के और 2 चौकों की मदद से महज 27 गेंदों पर 36 रन बनाए। कोलकाता के खिलाफ तो कमाल ही कर गए मास्टर। ऐसा ब्लास्ट किया कि मजा ही आगया। महज 45 गेंद में 4 छक्के और 6 चौकों की मदद से 45 गेंद पर 68 रन की पारी खेली जो कि अभी तक सचिन की इस सीजन में सर्वश्रेष्ठ है।
फिर तो लगता है जैसे कि सचिन को नजर ही लग गई। किंग्स के खिलाफ 01, कोलकाता के खिलाफ 34, बैंगलोर के खिलाफ 11, हैदराबाद के खिलाफ 02, दिल्ली के खिलाफ महज 15, फिर बैंगलोर के खिलाफ 00। मतलब-
पहले तीन मैचों में- 59+36+68=163
बाकी के 6 मैचों में- 01+34+11+02+15+00=63
तो एकदम से अचानक सचिन को क्या होगया। कहां चली गई फॉर्म। माना की बैगलोर को हराकर टीम ने फिर से अपने आप को सेमीफाइनल की दौड़ में रखा है पर लगता है कि सचिन पर कप्तानी हावी होने लग गई है। जब भी थोड़ी सी टेन्स हालात होते हैं सचिन को नाखुन चबाते जरूर देखा जा सकता है चाहे वो मैदान में हों या फिर बाहर।

आजकल ये मुद्दा गर्माया हुआ है कि क्या हो गया है सचिन को? सब इस बारे में ही बात करते नजर आजाएंगे। पर सचिन को कुछ भी नहीं हुआ है। जहां तक सवाल रहा जयसूर्या का तो वो अभी ८ मैचों में सिर्फ १७१ रन बना पाए हैं। तो सचिन को कुछ नहीं हुआ है बस देखना ये है कि सचिन कब फॉर्म में वापस आ पाते हैं और उसका इंतजार सब को रहेगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, March 9, 2009

सचिन ने पूरा किया अपने चाहने वालों का अरमान

जब ये सीरीजी शुरू हुई तो सबसे पहले मैंने इस बात पर ही जोर दिया था कि क्या सचिन पूरा कर सकोगे अपने चाहने वालों के अरमान? थोड़ी-थोड़ी उम्मीद थी और थोड़ी-थोड़ी नहीं भी। पर सचिन एक महान बल्लेबाज की तरह पूरे मैच में खेले और उस अधूरे काम को पूरा कर दिया जिसे वो बहुत पहले से करना चाहते थे। न्यूजीलैंड में शतक मारने के सपने को सचिन ने सच कर दिखाया। वैसे भारत ने अपनी पारी में मारे 18 छक्के जो कि किसी भी पारी में मारे गए छक्कों के बराबर है।
न्यूजीलैंड ने टॉस जीतकर की फील्डिंग।
क्राइस्टचर्च में भारत ने अभी तक ५ वन डे खेले थे और एक भी नहीं जीता था। 6ठे वन डे में भारत क्राइस्टचर्च में जीत की दरकार के साथ फील्ड पर उतरा। डेनियल विटोरी की पत्नी प्रेग्नेंट हैं तो विटोरी अपनी पत्नी के पास रहे पर मैच में बीच-बीच में दिखते रहे। इस लिए आज मैच की कप्तानी पहली बार मैक्कुलम ने की और टॉस जीतकर विटोरी के ना होने पर पहले फील्डिंग चुनी। पर मैक्कुलम को क्या पता था कि उनकी कप्तानी में रिकॉर्ड बनने वाला है न्यूजीलैंड में न्यूजीलैंड के खिलाफ सबसे ज्यादा रन। शुरुआत में लगा कि मैक्कुलम का ये फैसला टीम के लिए सही साबित हुआ जब कि सहवाग महज 3 रन बनाकर एक सीधी गेंद को छोटी बाउंडरी से बाहर पहुंचाने के चक्कर में मिस कर गए और क्लीन बोल्ड हो गए। भारत ने अपना पहला विकेट 15 के स्कोर पर खो दिया। फिर गंभीर ने सचिन का साथ दिया और सचिन अपनी लय में खेल रहे थे। तभी गंभीर 15 के निजी स्कोर पर बटलर का शिकार बने। भारत के स्कोरबोर्ड पर 13 ओवर में 65 रन हो चुके थे पर 2 विकेट भी खो दिए थे।
सचिन-युवराज की जोड़ी ने क्राइस्टचर्च में मचाया कोहराम।
युवराज आते के साथ ही सचिन के साथ टीम का स्कोर आगे बढ़ाने में लगे। तीसरे विकेट के लिए दोनों के बीच 132 रन की पार्टनरशिप हुई। इसमें युवराज ने 60 गेंदों में 87 रने बनाए। जिसमें 10 जानदार चौके और 6 शानदार छक्के शामिल थे। इस से आप हिसाब लगा सकते हैं कि युवराज ने चौके-छक्के से ही 76 रन बनाए सिर्फ 11 रन दौड़कर लिए। इस बीच सचिन युवराज का साथ देते रहे और स्ट्राइक ज्यादा से ज्यादा युवी को देते रहे और दर्शक सचिन के कलात्मक खेल का लुत्फ लेते रहे। भारत का स्कोर तब 203 था जब 145 की स्ट्राइक रेट से बैटिंग कर रहे युवराज 30 ओवर में एलियट की दूसरी गेंद का शिकार बने, सिर्फ 13 रन से शतक से चूके पर सबको बता दिया कि फॉर्म में आ चुका हूं।
सचिन रिटायर्ड हर्ट।
युवराज के बाद कप्तान धोनी 5वें नंबर पर बैटिंग करने उतरे। युवराज के जाने के बाद ऐसा लग रहा था जैसे सचिन ने युवराज की जगह ले ली है और भारत के स्कोर को तेजी से बढ़ाने लगे। सचिन ने मैदान के हर कोने में स्ट्रोक खेले। पर कप्तान और सचिन के बीच की साझेदारी 135 रन की ही हो सकी। लेकिन इस बीच सचिन काफी देर से एक दिक्कत से गुजर रहे थे। सचिन के पेट की मसल खिंच चुकी थी जिसे की वो काफी देर से दबा कर खेल रहे थे। पर अब बात बढ़ चुकी थी। सचिन दोहरे शतक से सिर्फ 37 रन दूर थे तब वो मैदान से बाहर आगए।
सचिन की इस पारी के लिए न्यूजीलैंड के कप्तान मैक्कुलम ने कहा कि, 'मैंने ऐसी पारी काफी कम देखी हैं। हर शॉट उनके बल्ले के मिडल से गया।' इस शानदार पारी के लिए सचिन को मैन ऑफ द मैच मिला।

रैना बने रनमशीन।
18 गेंदें, 38 रन, 5 छक्के। ये था रैना का आंकड़। इस पूरी सीरीज में रैना ने कमाल की बैटिंग की है। पहले वन डे में भी रैना ने 5 चौके और 4 छक्के लगाए थे। जब भारत का स्कोर 382 पहुंचा तो धोनी 5 चौके और 2 छक्कों की मदद से 68 रन पर मिल्स की गेंद का शिकार बने। लेकिन तब तक भारत की तरफ से क्राइस्टचर्च के पांच नायक काम कर चुके थे। भारत ने न्यूजीलैंड के सामने रखा 393 का लक्ष्य। ये न्यूजीलैंड में किसी भी टीम का सर्वाधिक स्कोर था।

भारत को मिली कड़ी टक्कर।
राइडर और इस मैच के लिए कप्तान बने मैक्कुलम ने बताया कि वो भी दम रखते हैं। राइडर ने शुरू से समझदारी से बैटिंग की और साथ ही मैक्कुलम को जब भी कहीं रन लेने का मौका मिला वहां पर उन्होंने रन चुराया। शुरूआत में भारत की फिल्डिंग अप टू डेट नहीं थी और कई बार मिस फिल्डिंग हुई और इस का फायदा न्यूजीलैंड के ओपनरों ने खूब उठाया। पूरा ओवर ठीक पड़ता लेकिन दो गेंद गलत हुई नहीं कि जितने की दरकार थी उनको वो रन निकालते। दोनों ओपनर गेंदबाजों के पास उन दोनों बल्लेबाजों का तोड़ नहीं मिल रहा था। गेंदबाजों को बदला गया लेकिन फिर भी कोई भी फायदा नहीं हुआ और न्यूजीलैंड ने 50 फिर 100 और फिर 150 रन बिना विकेट खोए बना लिए। फिर एक छोटी सी चूक और रैना की फुर्ती ने मैक्कुलम को रन आउट कर दिया और यहां से गेम पलट गया। मैक्कुलम ने 71 रन बनाए जिसमें 6 चौके और 3 छक्के शामिल थे। पहला विकेट 166, दूसरा 179, तीसरा 182, चौथा 188, पांचवां 203, छठा विकेट 217, सांतवा 218 यानी कि इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिर्फ 52 रन के अंदर 7 खिलाड़ी न्यूजीलैंड ने खो दिए। बाकि तो कुछ नहीं कर पाए लेकिन राइडर को भज्जी ने आउट किया जब कि राइडर 105 पर खेल रहे थे जिसमें 12 चौके और 4 छक्के लगाए थे।
आंठवें विकेट के लिए 83 रन की साझेदारी ने भारत के लिए एक बार तो मुश्किल खड़ी कर दी थी। लग ये रहा था कि कभी भी ये मैच भारत के हाथ से निकल सकता है। यहां पर विटोरी की कमी न्यूजीलैंड को और भारत को ईशांत शर्मा की कमी खली। सबसे ज्यादा खेल के लिहाज से गलत ये हुआ कि जब भारतीय टीम को विकेट नहीं मिल रहे थे तब मुनाफ पटेल ने दो लगातार बीमर डाल दी जिसके कारण अंपायर ने उन्हें बॉल करने से मना कर दिया। पर फिर एक विकेट यूसुफ और दूसरा विकेट प्रवीण कुमार ने लेकर न्यूजीलैंड की टीम की पारी समाप्त कर दी।
कुछ दिलचस्प जानकारी
इस मैच की दोनों पारियों में 726 रन बने जो कि दूसरा एक मैच में सबसे ज्यादा स्कोर रहा। सचिन को 58वीं बार मैन ऑफ द मैच का खिताब मिला जो कि सबसे ज्यादा है। दोनों पारियों में लगे 31 छक्के जो कि अपने में एक रिकॉर्ड है। भारत ने लगाए एक पारी में 18 छक्के जो कि रिकॉर्ड की बराबरी है।
पर कुछ भी हो सचिन ने अपने चाहने वालों का अरमान पूरा तो कर ही दिया।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, March 4, 2009

न्यूजीलैंड में भारत जीता, पाकिस्तान में क्रिकेट हारा।

ट्वेंटी-20 सीरीज हारने के बाद धोनी और धोनी की टीम के लिए पहला वन डे बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने था। धोनी के लिए फिर टॉस अच्छा रहा, और टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला। ओपनर के रूप में जैसा कि सोचा जा रहा था वो ही हुआ सहवाग के साथ गंभीर नहीं सचिन ही थे। सचिन से लोगों को काफी उम्मीदें, सचिन ने जमने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ सहवाग अपने रंग में आ चुके थे। जहां सहवाग अर्ध शतक के नजदीक थे वहीं सचिन अभी डबल फिगर को छू ही पाए थे।

सचिन ने भी अपने हाथ दिखाए और दो शानदार चौके लगाए। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं, फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सचिन से सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल की रफ्तार और हवा से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
जिसकी उम्मीद थी बिल्कुल उससे हटके हुआ। जहां लोग सोच रहे थे कि लेफ्ट-राइट का कॉम्बिनेशन देने के लिए कोई लेफ्टी आएगा याने कि सबसे सफल जोड़ी फिर होगी क्रीज पर, पर ऐसा हुआ नहीं। लोगों और मीडिया की खरी-खरी सुनने के बाद अपना पसंदीदा नंबर 7 छोड़ कप्तान धोनी 3 नंबर पर बैटिंग करने पहुंचे। अपने इस निर्णय को साबित करने के लिए धोनी ने धीमे और सधी शुरुआत करी। वहां वीरू का बल्ला बोल रहा था। अब तक वीरू 56 गेंदों पर 11 चौके और 1 छक्के की मदद से 77 रन बना चुके थे। विटोरी की गेंद पर एक लाजवाब शॉट सहवाग ने खेली और सर्कल के अंदर खड़े टेलर ने उससे भी शानदार कैच लपक वीरू की शानदार पारी पर ब्रेक लगा दी। चौथे नंबर पर टीम के युवराज आए और
कप्तान के साथ दूसरे रन के फेर में पड़कर पवैलियन की राह पर निकल लिए। अब टी-20 के स्टार सुरेश रैना की बारी थी। 20-20 के क्रम को आगे बढ़ाते हुए रैना ने मैदान के हर कोने में बॉल पहुंचाई और शानदार 4 छक्के और 5 चौंकों की मदद से महज 39 गेंदों पर 66 रन बनाकर छक्के मारने के प्रयास में एलिट की गेंद पर ब्रायन को कैच थमा बैठे। वहीं दूसरे छोर पर कप्तान ने पारी संभाल रखी थी। अब धोनी का साथ देने क्रीज पर आए यूसुफ पठान आए और 10 गेंदों पर 1 छक्के और 2 चौकों की मदद से 20 रन बनाए। धोनी की इस समझदारी भरी पारी में सिर्फ ६ चौकों की मदद से 89 गेंदों पर 84 रन बनाए। न्यूजीलैंड के सामने 7.20 की औसत के साथ लक्ष्य 38 ओवरों में 274 रहा।
वैसे, इस बीच न्यूजीलैंड में झमाझम बारिश होने लगी और पाकिस्तान में श्रीलंका टीम की बस पर दनादन फायरिंग। पाकिस्तान में दूसरे टेस्ट के साथ-साथ दौरा भी खटाई में पड़ गया। खेल और क्रिकेट के इतिहास का काला दिन। वहीं दूसरी तरफ न्यूजीलैंड में बारिश के कारण पहला वन डे के ओवर कम कर दिए गए, मैच 38-38 ओवरों का हो गया।
इरफान की जगह टीम में आए प्रवीण कुमार ने बिना खाता खोले न्यूजीलैंड को दूसरे ओवर में ही पहला झटका मैक्कुलम के रूप में दिया। न्यूजीलैंड की तरफ से टी-20 का सितारा अस्त हो गया था। दूसरा विकेट भी प्रवीण कुमार की झोली में गया। गुप्टिल और टेलर जब खेल रहे थे तो लग रहा था कि औसर रन रेट तो बढ़ता जा रहा है पर फिर भी यदि ये दोनों टिके रहे तो मैच को कभी भी पलटने की काब्लियत रखते हैं। १६वें ओवर में यूसुफ पठान ने घातक होते टेलर को सचिन के हाथों कैच करवाकर न्यूजीलैंड की मुसीबत और बढ़ा दी। एलिट को सहवाग के सपाट थ्रू ने रन आउट कर दिया और बारिश शुरू हो गई।
डकवर्थ लुईस नियम को लागू किया गया और फिर जो टार्गेट न्यूजीलैंड के सामने था वो लगभग नामुमकिन सा ही था। 43 गेंद पर 111 रन। जब चौथा विकेट गिरा था तो न्यूजीलैंड को 102 गेंद पर 163 रन चाहिए थे और उनके हाथ में 6 खिलाड़ी थे।
जब मैच शुरू हुआ तो स्कोर को आगे बढ़ाने के कारण ओरम युवराज का शिकार बने। अब लगने लगा कि यदि गुप्टिल का विकेट भारत कैसे भी झटक ले तो फिर पूरी तरह मैच भारत के पक्ष में हो जाएगा। और हुआ भी कुछ यूं ही, पर अब बारी थी भज्जी की। चार गेंद पर भज्जी ने 3 विकेट झटक लिए। सबसे पहले गुप्टिल, फिर ब्रूम और फिर मिल्स को आउट कर न्यूजीलैंड की हार में चारों तरफ कील ठोंक दी। कहां एक समय 132 पर 5 विकेट थे वहीं 9 विकेट भी होगए। अब बस खानापूर्ति ही शेष रह गई थी। और भारत ने पहला वन डे 53 रन से डकवर्थ लुईस नियम से जीत लिया। मैन ऑफ द मैच चुने गए टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी।

जब टीम इंडिया बैटिंग कर रही थी तब ये खबर फैल चुकी थी कि श्रीलंका की टीम पर हमला हो गया है। और दोनों टीमों ने हाथ पर काली पट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज कराया। धोनी ने कहा कि अच्छा हुआ कि भारतीय टीम ने पाकिस्तान का दौरा नहीं किया और शायद ही अब कोई भी खिलाड़ी पाकिस्तान में जाकर खेलना पसंद करेगा।
पर सच तो ये है कि पाक में पनपे आतंक के सच से खुद पाकिस्तानियों को लड़ना होगा और क्रिकेट को जिंदा रखने के लिए तालिबानी ताकतों के सामने घुटने नहीं टेकने होंगे। फिल्म के बाद अब इन दहशतगर्दों के निशाने पर है क्रिकेट पर आतंक से तो लड़ना होगा ही।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)

Thursday, November 6, 2008

मेरी नजर से, कुंबले की कुछ चुनिंदा यादें

मेरी नजर से कुंबले की कुछ चुनिंदा यादें हैं जो कि मैं हमेशा ही याद रखना चाहूंगा। वैसे तो हाल ही में मैंने अपने एक आर्टिकल में मोहाली टेस्ट के बाद ही ये कह दिया था कि अब कुंबले को हम भूलने लगे हैं और बेहतर हो कि कुंबले संन्यास ले लें। सारी दुनिया ये जानती है कि वो ढीले फील्डर के रूप में जाने जाते रहे हैं चाहे उन्होंने ६० कैच ही क्यों ना पकड़े हों। अनिल बल्लेबाजी भी कुछ खास नहीं माने जाते रहे, भले ही उन्होंने एक शतक वो भी नाबाद और पांच अर्द्धशतक लगाए हों जबकि वो अंतिम पायदान पर ही आते थे। शुरुआत में गेंदबाजी में विभिन्नता(वैरिएशन) के कारण जाने जाते रहे जबकि वो बॉल उतना घुमा नहीं पाते थे। हां, लेकिन उनकी रफ्तार किसी भी मध्यम तेज गेदबाज की तरह होती थी। कोई भी नहीं कहता था कि ये इंजीनियर कम गेंदबाज इतना सफल हो पाएगा।

चश्मा पहनें वो शांत, गंभीर, लंबा, इंजीनियर लड़का

चश्मा पहने एक लंबा लड़का, जिसकी टांगें उसको एक अलग शख्स के रूप में दिखाती थी। कोई भी ये नहीं कहता कि ये लड़का क्रिकेट की दुनिया में चल भी पाएगा। पर अपने जुझारूपन के कारण उसने अपने करियर की शुरूआत की और फिर जो शुरुआत की तब से कभी पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। इंग्लैंड के खिलाफ ९ अगस्त १९९० में मैनचेस्टर में कुंबले ने अपनी पारी की शुरूआत की। इक्तेफाक देखिए १९९० में पहले ही मैच में कुंबले ने तीन विकेट लिए थे और अपनी आखिरी पारी कोटला में भी उन्होंने तीन विकेट ही लिए। वो मैच भी ड्रॉ हुआ था और ये मैच भी ड्रॉ हुआ। उस समय की टीम में नरेंद्र हिरवानी जैसे दिग्गज हुआ करते थे, जिन्होंने एक मैच में १६ विकेट लेने का करिश्मा दिखाया था, पर गायब कब हुए पता ही नहीं चला। लेकिन धीरे-धीरे इस खिलाड़ी ने टीम में जगह पक्की कर ली, कभी फिलिपर गेंद डालकर तो कभी मीडियम पेसर की रफ्तार से गेंद डालकर।

१९९९ में फिरोजशाह कोटला में कीर्तिमान

स्कोरबोर्ड पर १०१ रन बन चुके थे और एक भी विकेट पाकिस्तान का गिरा नहीं था। प्रसाद और श्रीनाथ दोनों गेंदबाजों को कामयाबी नहीं मिली थी। पहले सत्र में तो सभी गेंदबाजों को अनवर-आफरीदी की जोड़ी ने खूब ठोंका। लेकिन दूसरे सत्र की शुरूआत में ही कुंबले ने आफरीदी को मोंगिया के हाथों कैच आउट करवा दिया। फिर अगली ही गेंद पर इजाज अहमद को चलता कर दिया। ऑन द हैट्रिक थे कुंबले पर हैट्रिक ले नहीं पाए। दो ओवर के बाद ही इंजमाम ने एक लेजी सॉट खेली और गेंद खुद स्टंप को चूम गई। इस ओवर की पांचवीं गेंद पर यूसुफ योहाना को भी कुंबले ने अपना शिकार बना दिया। आफरीदी और युहाना दोनों ही इस बात से संतुष्ट नजर नहीं आए थे। जबकि आफरीदी तो साफ कॉट बिहाइंड थे और युहाना तो स्टंप के सामने ही पगबाधा हुए थे। फिर मोइन खान का स्लिप पर गांगुली ने शानदार कैच लपका। साथ ही सईद अनवर का कैच लक्ष्मण ने लपका। फिर भारत के सामने थे सिर्फ सलीम मलिक और कप्तान वसीम अकरम। कुंबले कहते हैं कि, ‘यदि इनको आउट कर दें तो फिर समझो कि मैच हमारे कब्जे में, लेकिन ये काम इतना आसान नहीं दिख रहा था’। एक साल पुराने भी नहीं हुए हरभजन सिंह की गेंद पर वसीम ने जमकर चौकों की बरसात शुरू कर दी। पर तुरंत ही सलीम मलिक को कुंबले ने क्लीन बोल्ड कर दिया। मुस्ताक अहमद और सकलेन मुश्ताक को दो लगातार गेंदों पर आउट कर दिया। फिर कुंबले ऑन द हैट्रिक थे लेकिन ओवर खत्म हो चुका था। और ये किसी को भी पता नहीं था कि अगले ओवर में ये जोड़ी टिकी रहेगी। तभी श्रीनाथ को गेंदबाजी सौंपी गई और वहां कुंबले मैदान में भगवान से ये दुआ करने लग गए कि ये आखिरी विकेट भी कुंबले को ही मिले। श्रीनाथ ने सारी गेंदें बाहर फेंकी इस कारण दो गेंद वाइड भी हो गई। कोई विकेट लेना नहीं चाहता था। फिर कुंबले के हाथ में गेंद आई और वसीम अकरम को सिली पाइंट पर लक्ष्मण को कैच आउट करवा दिया और लिख दिया इतिहास जो कभी टूट नहीं सकता। इस रिकॉर्ड की बराबरी हो सकती है पर कोई तोड़ नहीं सकता।

२००२ में टूटे जबड़े से भी जीवट प्रदर्शन

मैंने अपने एक आर्टिकल में इस बात का पहले ही जिक्र किया हुआ है। टूटे जबड़े से भी कुंबले ने जुझारुपन दिखाते हुए लारा को आउट कर अपना काम कर दिया था। इतनी चोट लगने के बावजूद भी कुंबले ने १४ ओवर फेंके थे। भारत वेस्टइंडीज से वो मैच ड्रॉ करने में कामयाब रहा था।

ग्रेग चैपल का ख़ौफ़

ग्रेग चैपल का भारतीय क्रिकेट पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि काफी समय तक सब कुछ सिर्फ और सिर्फ चैपल तक ही सिमट कर रह गया। जितने भी सीनियर खिलाड़ी थे उन सब पर चैपल ने निशाना साधा। सबसे पहले गांगुली, फिर द्रविड़ को अपने साथ मिलाकर गांगुली और द्रविड़ को भिड़ाना। शायद ये अध्याय भारतीय क्रिकेट इतिहास के लिए काला अध्याय था। फिर इस समय के महान खिलाड़ी सचिन पर भी साधा निशाना। कुंबले और लक्ष्मण दोनों ऐसे खिलाड़ी थे जो कि कभी भी बाहर का रास्ता देख सकते थे। कई बार कुंबले ने द्रविड़ के साथ इस बारे में बात भी की। द्रविड़ हमेशा ही समझाते कि अभी तो कुछ नहीं होने जा रहा है। फिर एक बार सचिन के साथ बात करते हुए कुंबले ने संन्यास की बात भी कही थी। सचिन का जवाब था कि बस परफोर्म करते रहो और यदि फिर भी कुछ होता है तो पहले निशाने पर मैं हूं उसके बाद किसी और का नंबर आएगा। उस समय सचिन की फॉर्म पर सवालिया निशान तो लग ही रहे थे। चैपल ने यहां तक कह दिया था कि सचिन सिर्फ अपने लिए खेलते हैं। कुंबले उस दौर को अपने क्रिकेट जीवन का सबसे कठिन समय मानते थे। इस दौरान ही एक-दो बार कुंबले ने पूरी टीम को अपने घर पर दावत भी दी। एयरपोर्ट से कुंबले के घर सचिन सीधे चले आते थे बिना झिझक के। इस समय में चाहे कुंबले पहले से भी कम बोलने लगे थे। वो ख़ौफ़ का वक्त था, जो वक्त निकल गया।

कप्तानी के साथ कोटला से विदाई

अपने ३७वें जन्मदिन के मौके से कुछ दिनों पहले ही कुंबले को कप्तानी की कमान सौंपी गई थी। कोई भी नहीं जानता था कि
पाकिस्तान के खिलाफ घरेलू सीरीज में कुंबले को कप्तान बनाया जाएगा। २७ साल के बाद पाकिस्तान को हराने में कामयाब रहे। फिर सबसे विवादास्पद सीरीज जिसे की खुद कुंबले भी कठिन सीरीज मानते हैं। २-१ से भारत सीरीज हार गया था। साउथ अफ्रीका के खिलाफ से कुंबले की कप्तानी, गेंदबाजी, फील्डिंग पर असर दिखने लगा। श्रीलंका में तो जिस टीम से टेस्ट टीम हार कर आई थी उसी श्रीलंकाई टीम को हमारी वन डे टीम ने धो दिया था। इस सीरीज में तो शरीर भी साथ नहीं दे रहा था। सही समय पर, सही अंदाज में कुंबले ने संन्यास ले लिया।

नागपुर टेस्ट और अंतिम बार ड्रेसिंग रूम में कुंबले

कोटला में ही कह दिया था कुंबले ने कि वो नागपुर में भी ड्रेसिंग रूम का हिस्सा जरूर होना चाहेंगे। कहीं ना कहीं ये जरूर लगता ही है कि यदि चोट नहीं लगी होती तो नागपुर टेस्ट ही कुंबले का आखिरी टेस्ट होता। पर कुंबले ने अच्छा किया कि कोटला में संन्यास ले लिया। सारा ध्यान ठीक तरीके से कुंबले पर ही रहा वर्ना शायद वो बंट जाता और फिर शायद कहीं पर कुंबले की अपनी बात भी दब जाती।
नागपुर टेस्ट काफी अहम टेस्ट है। सौरव गांगुली इस टेस्ट के बाद ही संन्यास लेने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। साथ ही पहले टेस्ट में गांगुली ने शतक जमाया था क्या जाते हुए आखिरी टेस्ट में भी गांगुली ये करिश्मा दिखा पाएंगे। वहीं वीवीएस लक्ष्मण अपना १०० वां टेस्ट मैच खेलेंगे। १००वें टेस्ट में क्या वो सैंकड़ा लगा कर छठे खिलाड़ी बन पाएंगे। वैसे सिर्फ रिकी पॉन्टिंग ही एक मात्र ऐसे खिलाड़ी हैं जो कि अपने १००वें टेस्ट की दोनों पारियों में शतक जमा चुके हैं। साथ ही हरभजन सिंह को दरकार है सिर्फ एक विकेट की, फिर वो भी ३०० क्लब में शामिल हो जाएंगे।
लेकिन ये तो पक्का है कि हां, जंबो और दादा की कमी टीम इंडिया को खलेगी जरूर, याद बहुत आएंगे। सच एक युग और अध्याय को विराम लग जाएगा। एक तरफ सबसे ज्यादा मैच जीताने वाले गेंदबाज और दूसरी तरफ भारत के सबसे सफल कप्तान। इन्हें एक युग तो कहेंगे ही।


आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, August 12, 2008

क्या पांडव फिर कभी एक साथ खेल पाएंगे, मुझे लगता है ‘नहीं’

श्रीलंका से सीरीज गवांने का दुख तो है पर उस से ज्यादा है पांडवों का नहीं चलना। सब से ज्यादा उम्मीदें इन से ही थीं और ये ही नहीं चले। अब एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं क्योंकि जो होना था वो होगया। हम सीरीज हार गए। पर सवाल ये हैं कि क्या ये पांडव हीं हैं इस हार के सबसे बड़े दोषी? क्या ये हीं हैं जो हैं हार के गुनहगार? भई, सबसे ज्यादा अनुभव इन के पास ही था। जब टीम देश से रवाना हो रही थी तो कप्तान कुंबले ने कहा था कि मेंडिस की काट हमारे अनुभवी बल्लेबाज ढूंढ निकालेंगे। लेकिन मेंडिस ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया। पहली सीरीज में सबसे ज्यादा विकेट लेने का कीर्तिमान हासिल कर लिया।
कुंबले जी के दो अरमान थे कि सचिन इस टूर में लारा का रिकॉर्ड तोड़ दें लेकिन
सचिन ने तो अरमानों पर ऐसा पानी फेरा कि अब कभी कुंबले अरमान ही नहीं करेंगे, और वो भी खासतौर पर सचिन से। दूसरा अरमान था कि सीरीज हम बेहतर अंतर से जीतें। लेकिन यहां पर पूरी टीम ने और बाकी बचे अनुभव ने लुटिया डूबो दी। कुंबले अब कहते फिर रहे हैं कि बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले....।
जहां तक सचिन की बात है तो सचिन एक लेजेंड हैं। उनके ऊपर पिछले समय में भी कई आरोप लगे लेकिन जब उन्होंने वापसी कि तो सबके मुंह बंद होगए। सचिन क्रिकेट मे गॉड की भूमिका रखते हैं खासकर भारत के लिए तो और ब्रैडमैन से उनकी तुलना यूं ही नहीं की जाती। लेकिन क्या सचिन की चोटें और उम्र अब उन पर हावी होने लगी हैं। दबाव जो कि धोनी की तरफ से उन पर आया है वो भी कुछ कम नहीं है। यहां पर बीसीसीआई को एक सलाह है कि एक-दो सीरीज बांग्लादेश और कीनिया के साथ रखकर सचिन का रिकॉर्ड बनावा दें और फिर सचिन को कहें की गुरू अब क्या बुढापे में भी खेलोगे, संन्यास ले लो। वैसे सचिन की किस्मत मैं ये नहीं था कि विदेशी धरती पर वो रिकॉर्ड बनाए। ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाली 4 टेस्ट मैचों की सीरीज में शायद वो ये रिकॉर्ड बना लें। पहला टेस्ट बैंगलोर में चिन्नास्वामी स्टेडियम में 9 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक होगा। भगवान ने चाहा तो इसी मैदान पर हम सचिन को ये कीर्तिमान हासिल करते देखेंगे।
दादा, द्रविड़ और लक्ष्मण तो पहले से ही निशाने पर हैं और अब इस प्रदर्शन ने तो और भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। वहीं द्रविड़ ने 4 मैच में 179 रन बनाए जिसमें सर्वाधिक 68 रहे और मैदान में सिर्फ 4 कैच में उनका योगदान रहा। दादा ने 4 मैच में 132 रन बनाए, सर्वाधिक 35 रन और 2 कैच लपके। वहीं लक्ष्मण ने 4 मैच में 215 रन बनाए, सर्वाधिक 61 नाबाद और 4 कैच लपके। ये आंकड़े हैं पूरी सीरीज के। लेकिन कप्तान साहब ने तो कमाल कर दिया जहां दूसरी टीम के गेंदबाज कमाल कर गए, वहीं कुंबले ने 4 मैच में सिर्फ 11 विकेट लिए और सर्वश्रेष्ठ रहा 30 पर 3 विकेट। बल्ले से मात्र 29 रन चार मैचों में। इनसे अच्छा तो भज्जी का प्रदर्शन रहा जिन्होंने सीरीज में 20 विकेट झटके और बेस्ट रहा 102 पर 6 विकेट, एक मैच में 10 विकेट भी लिए और 77 रन भी बनाए।


क्या लगता है कि इन आंकड़ों के साथ ये 5 पांडव फिर वापसी कर पाएंगे, मुझे तो नहीं लगता कि वापसी संभव हो पाएगी। इनमें से जो भी खिलाड़ी एक सीरीज के लिए बाहर हुआ तो उस को मान लेना चाहिए कि अब टीम इंडिया में वापसी के दरवाजे उसके लिए बंद हो गए और हो सके तो फिर उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए।

आपका अपना
नीतिश राज

क्या पांडव फिर कभी एक साथ खेल पाएंगे, मुझे लगता है ‘नहीं’

श्रीलंका से सीरीज गवांने का दुख तो है पर उस से ज्यादा है पांडवों का नहीं चलना। सब से ज्यादा उम्मीदें इन से ही थीं और ये ही नहीं चले। अब एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं क्योंकि जो होना था वो होगया। हम सीरीज हार गए। पर सवाल ये हैं कि क्या ये पांडव हीं हैं इस हार के सबसे बड़े दोषी? क्या ये हीं हैं जो हैं हार के गुनहगार? भई, सबसे ज्यादा अनुभव इन के पास ही था। जब टीम देश से रवाना हो रही थी तो कप्तान कुंबले ने कहा था कि मेंडिस की काट हमारे अनुभवी बल्लेबाज ढूंढ निकालेंगे। लेकिन मेंडिस ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया। पहली सीरीज में सबसे ज्यादा विकेट लेने का कीर्तिमान हासिल कर लिया।
कुंबले जी के दो अरमान थे कि सचिन इस टूर में लारा का रिकॉर्ड तोड़ दें लेकिन सचिन ने तो अरमानों पर ऐसा पानी फेरा कि अब कभी कुंबले अरमान ही नहीं करेंगे, और वो भी खासतौर पर सचिन से। दूसरा अरमान था कि सीरीज हम बेहतर अंतर से जीतें। लेकिन यहां पर पूरी टीम ने और बाकी बचे अनुभव ने लुटिया डूबो दी। कुंबले अब कहते फिर रहे हैं कि बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले....।
जहां तक सचिन की बात है तो सचिन एक लेजेंड हैं। उनके ऊपर पिछले समय में भी कई आरोप लगे लेकिन जब उन्होंने वापसी कि तो सबके मुंह बंद होगए। सचिन क्रिकेट मे गॉड की भूमिका रखते हैं खासकर भारत के लिए तो और ब्रैडमैन से उनकी तुलना यूं ही नहीं की जाती। लेकिन क्या सचिन की चोटें और उम्र अब उन पर हावी होने लगी हैं। दबाव जो कि धोनी की तरफ से उन पर आया है वो भी कुछ कम नहीं है। यहां पर बीसीसीआई को एक सलाह है कि एक-दो सीरीज बांग्लादेश और कीनिया के साथ रखकर सचिन का रिकॉर्ड बनावा दें और फिर सचिन को कहें की गुरू अब क्या बुढापे में भी खेलोगे, संन्यास ले लो। वैसे सचिन की किस्मत मैं ये नहीं था कि विदेशी धरती पर वो रिकॉर्ड बनाए। ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाली 4 टेस्ट मैचों की सीरीज में शायद वो ये रिकॉर्ड बना लें। पहला टेस्ट बैंगलोर में चिन्नास्वामी स्टेडियम में 9 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक होगा। भगवान ने चाहा तो इसी मैदान पर हम सचिन को ये कीर्तिमान हासिल करते देखेंगे।
दादा, द्रविड़ और लक्ष्मण तो पहले से ही निशाने पर हैं और अब इस प्रदर्शन ने तो और भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। वहीं द्रविड़ ने 4 मैच में 179 रन बनाए जिसमें सर्वाधिक 68 रहे और मैदान में सिर्फ 4 कैच में उनका योगदान रहा। दादा ने 4 मैच में 132 रन बनाए, सर्वाधिक 35 रन और 2 कैच लपके। वहीं लक्ष्मण ने 4 मैच में 215 रन बनाए, सर्वाधिक 61 नाबाद और 4 कैच लपके। ये आंकड़े हैं पूरी सीरीज के। लेकिन कप्तान साहब ने तो कमाल कर दिया जहां दूसरी टीम के गेंदबाज कमाल कर गए, वहीं कुंबले ने 4 मैच में सिर्फ 11 विकेट लिए और सर्वश्रेष्ठ रहा 30 पर 3 विकेट। बल्ले से मात्र 29 रन चार मैचों में। इनसे अच्छा तो भज्जी का प्रदर्शन रहा जिन्होंने सीरीज में 20 विकेट झटके और बेस्ट रहा 102 पर 6 विकेट, एक मैच में 10 विकेट भी लिए और 77 रन भी बनाए।
क्या लगता है कि इन आंकड़ों के साथ ये पांडव फिर वापसी कर पाएंगे, मुझे तो नहीं लगता कि वापसी संभव हो पाएगी। इनमें से जो भी खिलाड़ी एक सीरीज के लिए बाहर हुआ तो उस को मान लेना चाहिए कि अब टीम इंडिया में वापसी के दरवाजे उसके लिए बंद हो गए और हो सके तो फिर उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए।

आपका अपना


नीतिश राज

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”