"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
Friday, June 11, 2010
अब जोश और रोमांच के साथ जागो पूरी रात
Thursday, January 28, 2010
पैसे के लिए कुछ भी करेगा। कभी ख़फा होगा, कभी खुद मान जाएगा, पर पैसा तो नहीं छोड़ेगा।
Saturday, September 12, 2009
कल खुशी पर भारी पड़ा गम।
वैसे, मैं यहां पर बात क्या करने वाला था और क्या करने लग गया। कल के दिन खुशी मिली पर जब गम सामने आया तो वो खुशी पर भारी पड़ गया।
ऑफिस में इस बात का इंतजार हो रहा था कि क्या भारत आज का मैच जीत जाएगा। चार विकेट गिर चुके थे। मैं और मेरे साथ ही कुछ इस पर चर्चा भी कर रहे थे कि जब स्कोर छोटा होता है तो टीम इंडिया जरूर उतना ही मर मर कर जीतती है। ये नहीं कि शेर की तरह खेले और जल्दी जीत कर मैच को रफा-दफा करे। चार विकेट गिर चुके थे, द्रविड़ ने 65 मिनट क्रीज पर रहकर 45 गेंदों में महज 14 रन बनाए। द्रविड़ एक महान खिलाड़ी हैं पर क्यों द्रविड़ वन डे को भी टेस्ट की तरह खेलते हैं।
इस बीच एक खबर ने सब में रोमांच भर दिया। पहले था कि सीरीज जीतने पर ही टीम इंडिया नंबर वन बन पाएगी। पर अब ये खबर आई कि न्यूजीलैंड को हराने के साथ ही हम नंबर वन बन जाएंगे पर नंबर वन बने रहने के लिए कॉम्पेक कप जीतना जरूरी होगा। और थोड़ी देर बाद ही धोनी और रैना ने जीत दिला दी। धोनी और रैना दोनों की तारीफ करना चाहूंगा कि दोनों ने सूझबूझ कर बैटिंग की और अंत तक टिके रहे। आशीष नेहरा को मैन ऑफ द मैच से नवाजा गया। सचिन को सम्मान के रूप में बाइक दी गई जिसपर इस बार सचिन खुद ही बैठे धोनी को बैठने का मौका नहीं दिया।
अब बात गम की भी कर लें।
अभी ऑफिस से घर की तरफ निकले ही थे कि पता चला कि डीडी ने सेमीफाइनल और फाइनल के राइट्स खरीद लिए हैं। अब तो लगा कि वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारत का झंडा ऊंचा होगा और विजेंदर अपने बाउट जीतकर फाइनल की जंग में पहुंच जाएगा।
पूरे ऑफिस में बताया गया कि रात के 1.30 बजे है बाउट। मैं घर पहुंच कर खाना पीना करके टीवी खोलकर कभी कुछ कभी कुछ देखते हुए जगने की कोशिश में लग गया। बार-बार न्यूज पर वापिस आता कि जब तक क्रिकेट का ही लुत्फ ले लिया जाए। दिल में एक इच्छा थी कि विजेंदर जीत जाए क्योंकि हाल ही में करोड़ों का मुनाफा हुआ है विजेंदर को।
इतिहास तो विजेंदर ने भी रच ही दिया है। पहली बार कोई भारतीय बॉक्सर इस ऊंचाई तक पहुंच पाया है। यदि विजेंदर जीत जाए तो अच्छा होगा क्योंकि बहुत हो लिया क्रिकेट। पर ये ही सोचते-सोचते कब नींद आगई पता ही नहीं चला। सुबह जब उठा तो तुरंत टीवी चलाया देखा तो हर न्यूज चैनल पर सिर्फ क्रिकेट ही क्रिकेट चल रहा था। लग गया कि विजेंदर का क्या हुआ। यानी हार गया विजेंदर।
जी हां, उजबेकिस्तान बॉक्सर अब्बोस अतोव जिसकी रैंक इस चैंपियनशिप में चौथी थी उसने पहली रैंक विजेदर को 7-3 से मात दे दी। जबकि पहले राउंड में 0-1 से आगे चल रहा थे विजेंदर। पर दूसरे राउंड में ज्यादा डिफेंसिव मोड विजेंदर को हार के कगार पर ले गया। और उजबेक बॉक्सर ने दूसरे राउंड में 5 अंक बटोर लिए और फिर अंतिम राउंड में तो सिर्फ खानापूर्ति ही रह गई। अतोव ने 2007 में लाइट वेट में वर्ल्ड चैंपियनशिप में फाइनल जीता था और वो भी तब जब कि वो बाउट के दौरान प्रतिद्वंदी के पंच के कारण नीचे गिर गए थे। दूसरे राउंड के बाद स्कोर 5-1 था और अंत में 7-3 से विजेंदर हार गया और मुझे लगता है कि बॉक्सिंग का फ्यूचर भी हार गया।
मैंने टीवी बंद कर दिया था। सोच रहा था कि आज भी दो मैच हैं। जहां एक जगह टीम इंडिया श्रीलंका से भिड़ेगी, वहीं दूसरी तरफ जीतेगा भी भारत और हारेगा भी भारत। अमेरिकी ओपन टेनिस चैंपियनशिप में भूपति और पेस होंगे आमने-सामने। देखते हैं कि खुशी मिलती है या फिर आज का पार्ट-2।
Tuesday, September 1, 2009
चलो देख के अच्छा लगा कि मेरे देश में भी लोग फुटबॉल के दीवाने हैं। विलेन बना हीरो।
भारत में भी लोग फुटबॉल के दीवाने हैं ऐसा लगता नहीं था पर आज लगा। ऑफिस में अधिकतर लोग टीवी से चिपके हुए थे। लग रहा था कि ये फुटबॉल का नहीं बल्कि भारत बनाम पाकिस्तान के बीच कोई क्रिकेट का मुकाबला चल रहा हो।
दिल्ली में हो रहे नेहरू कप को देखने के लिए हजारों फुटबॉल प्रेमी अंबेडकर स्टेडियम पहुंचे। खचाखच भरे स्टेडियम में पिछली बार के चैंपियन भारत का मुकाबला पिछली ही बार की रनर अप सीरीया से था। 29 अगस्त, 2007 को भारत ने सीरीया को 1-0 से हराकर पहली बार नेहरू कप अपने नाम किया था। 31 अगस्त, 2009 को भारत ने फिर से सीरीया को हराकर दूसरी बार लगातार नेहरू कप पर कब्जा जमाया।
सीरीया की रैंकिंग पर यदि गौर करें तो वो भारत से 61 पायदान ऊपर है। जहां भारत की रैंकिंग श्रीलंका के बराबर 156 है वहीं सीरीया की रैंकिंग 95 है। नेहरू कप से पहले भारत के कप्तान और स्ट्राइकर बाइचंग भूटिया ने कप को फिर से अपने कब्जे में करने की बात कही थी और वो कर दिखाया।
लीग मैचों में सीरीया ने एक भी मैच नहीं गंवाया। वहीं भारत शुरूआती मुकाबला लेबनान से और लीगा का अंतिम मैच सीरीया से हारा। माना कि सीरीया के खिलाफ लीग मैच के दौरान भारत के चार स्टार खिलाड़ी नहीं खेल रहे थे। फाइनल में शुरूआत से ही दोनों टीमें एक दूसरे को टक्कर दे रही थी। सीरीया के लंबे कद काठी के खिलाड़ियों से पूरी तरह से कोच हॉटन की टीम टक्कर ले रही थी। 90 मिनट के बाद तक दोनों टीमें एक दूसरे पर गोल नहीं दाग सकी। इस 90 मिनटों में भारत के हाफ में बॉल ज्यादा रही पर फिर भी भारत के डिफेंडरों ने जान लगाकर बॉल को गोल के अंदर नहीं पहुंचने दिया। वहीं भारत की तरफ से गोल में ज्यादा बार निशाना साधा गया।
फिर मिला 30 मिनट के एक्स्ट्रा टाइम। अंतिम दस मिनटों के खेल में गर्मागर्मी भी कई बार हुई। भूटिया को गेंद लेजाते समय सीरीया के एक खिलाड़ी ने पीछे से जानबूझकर गिरा दिया। 114वें मिनट में भारत की तरफ से 8 नंबर की जर्सी पहने रेनेडी सिंह ने फ्री हिट ली। दाईं की तरफ से गेंद घूमी और फिर 5 खिलाड़ी की दीवार को झांसा देते हुए बाएं की तरफ घूमते हुए फुटबॉल गोलपोस्ट के अंदर समा गई। इस शानदार शॉट ने मुझे वर्ल्ड कप में बेखम की शॉट की याद दिला दी। भारत को बढ़त मिल चुकी थी। पर मैच की सीटी बजने से ठीक पहले सीरीया के ड्याब ने हेडर से गोल उतार दिया और एक्स्ट्रा टाइम के बाद स्कोर था 1-1। अब फैसला पेनेल्टी शूटआउट से होना था।
अब दारोमदार था भारत के गोलकीपर के ऊपर। उस गोलकीपर के ऊपर जिसे कभी कोलकाता का कोई भी क्रिकेट क्लब लेने से मना कर देता था क्योंकि इस शख्स के ऊपर कई बार इल्जाम भी लगे थे। उन इल्जामों के बारे में आज भी सुब्रतो पाल बात नहीं करते। जहां तक मुझे याद आता है 5 दिसंबर, 2004 को सुब्रतो पाल शायद वो ही गोलकीपर थे जिससे टक्कर लगने के बाद विपक्षी टीम के एक खिलाड़ी की मौत हो गई थी। उस खिलाड़ी का नाम था क्रिस्टियानो जूनियर। पाल को दो महीने के लिए सस्पेंड कर दिया गया था। आज वो ही विलेन हीरो बन गया।
भारत की तरफ से पहली पेनेल्टी में क्लाइमेक्स ने गोल दाग दिया। सीरीया के राजा राफे ने गोल बराबर कर दिया। पर भारत की तरफ से फील्ड में एकमात्र गोल करने वाले रेनेडी सिंह की बॉल गोलपोस्ट पर जा लगी और मिस हो गई। पर सुब्रतो पाल ने सीरीया के अयान की गेंद को रोक कर मामला फिर से पटरी पर ला दिया।
दिल्ली के छेत्री ने भारत को लीड दिला दी वहीं सीरीया के अहमद हज की गेंद को कमाल की गोलकीपरिंग का नमूना दिखाते हुए उसे बाएं हाथ से रोक दिया। और फिर भारत के डयास ने कोई गलती नहीं की बढ़त को और आगे बढ़ाने में।
यदि ये गोल सीरीया नहीं कर पाता तो वो मैच हार जाता। इस बार गोलकीपर कप्तान बलहउस ने हिट ली और गोल। भारत के मेहराजुद्दीन अब जीत का गोल दागने गए पर चूक गए। वहीं सीरीया के अब्दुल फतह ने गोल दाग दिया और स्कोर बराबर होगया।
अब बारी थी ’स्डन डैथ’ की। भारत की तरफ से अनवर ने गोल दाग दिया और जोश की लहर पूरे स्टेडियम में गूंज गई। निडर और कूल लग रहे भारत के गोलकीपर ने जाकर गोलपोस्ट संभाला और सीरीया के अलाटोउनी ने किक ली और उस ऊपर उठती बॉल को सुब्रतो पाल ने गोलपोस्ट के ऊपर से बाहर का रास्ता दिखा दिया। और भारत जीत गया।
मैन ऑफ द मैच के अवॉर्ड से भारत के गोलकीपर सुब्रतो पाल को नवाजा गया और मैन ऑफ द टूर्नामेंट बाइचंग भूटिया को दिया गया।
दिल्ली के खचाखच भरे अंबेडकर स्टेडियम में चक दे गूंज उठा। देख कर अच्छा लगा कि चलो भारतीय फुटबॉल के भी चाहने वाले हैं वो अभी मरी नहीं है यानी अभी इसे आगे बढ़ना है।
आपका अपना
नीतीश राज
Friday, July 3, 2009
क्यों छापें काली लड़कियों को, बिक्री नहीं होगी पेपर की, है ना.......।
जब मैंने पिछली पोस्ट की तो कई लोगों ने कहा कि हां यार ये तो सही है कि सारी खबर हर जगह छपी और साथ ही कई चैनलों पर भी चली पर यार किसी भी पेपर में महिला खिलाड़ी की फोटो नहीं दिखी। मैंने कहा, हां क्यों दिखेगी। ढूंढने से भी नहीं मिलेगी किसी भी महिला की फोटो। यदि मिलेगी भी तो एक दो में जिस की बिक्री काफी कम होगी। कारण क्या है?
आम का सीजन चल रहा है और आम भी कई प्रकार के आ रहे हैं। चाहे इनको इंजेक्शन से वो पका रहे हों या फिर किसी भी कारण से पर रेट उनके वो ही ३० रु किलो होंगे। उनके एक किलो जब वो थोक में लेते होंगे तो १२-१३ रु प्रति किलो पड़ता होगा। फिर यदि वो आपको १५ में दे देगा तो खाएगा क्या और बचाएगा क्या?
मैंने बताया कि एक टीवी या फिर मॉनिटर की कीमत १०-१२ हजार के करीब होती है। हमारे ऑफिस में हो ना हो तो तीन हजार के करीब टीवी और मॉनिटर लगे हुए हैं। तो सोचो १० साउंड मिक्सर, १०० के करीब कैमरा, हजारों लाइटस, हजारों कंप्यूटर की कीमत कहां तक पहुंच जाती होगी। इलैक्ट्रोनिक मीडिया में इसलिए कोई भी वो ख़बर जो टीआरपी नहीं दे सकती वो ज्यादा नहीं चल सकती।
वैसे ही जहां तक अखबार का सवाल है तो भई वो भी तो ऐसा ही करते हैं ना। यदि लीड स्टोरी है और फोटो अच्छी नहीं है तो उसे लीड बनाएंगे पर फोटो दूसरी या फिर तीसरी लीड की लगा देंगे। यदि तीनों स्टोरी की फोटो अच्छी नहीं है तो बस ब्रह्मास्त्र याने की एड की कोई तस्वीर।
कभी कोई क्यों छापने लगा काली-पीली लड़कियों को। पर मैंने उनको रोक कर बताया कि वैसे हम सब को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हां रंग, चेहरा, इन सब को देख कर कोई भी फैसला नहीं होना चाहिए। वैसे सभी को मैं मिला देता हूं ममता खरब से। पहचान लीजिए, कहीं मिले तो शुक्रिया अदा कीजिएगा। सच्ची श्रद्धा से देश के लिए काम करने के लिए दीजिएगा शुक्रिया।

~~~~ये हैं ममता खरब। (दिल से कह रहा हूं बहुत मुश्किल से देश की महिला हॉकी प्लेयर की फोटो गूगल पर ढूंढ पाया हूं।)
आपका अपना
नीतीश राज
Thursday, July 2, 2009
कौशिक जी, ये तो होना ही था, आपकी लड़कियां इतनी सुंदर जो नहीं हैं।
हमारे देश में कौन जानता है कि सीता गोसाई, मुधु यादव, प्रीतम सिवाच, रानी रामपाल, सुरिंदर कौर, सबा अंजुम। चक दे के कारण ममता खरब को लोग जानने और पहचाने लगे वर्ना ममता खरब को भी कोई नहीं जानता। अरे, महिला हॉकी टीम की कप्तान कौन है? कौन बताएगा? यदि सर्वे कराया जाए तो शायद ही पूरे देश में आंकड़ा १०० को छू पाएगा। मैं प्रतिशत की बात नहीं कर रहा हूं कौशिक जी, पूरे देश में १०० लोग भी नहीं बता पाएंगे। यदि महिला हॉकी टीम के परिवार, रिश्तेदार और आस-पड़ोस को छोड़ दें तो। आप तो महिला हॉकी टीम की बात कर रहे हैं मैं ये दावा करता हूं कि पूरे देश में ५०० से ज्यादा लोग ये नहीं जानते होंगे कि पुरुष भारतीय हॉकी टीम का कप्तान कौन है। शर्त वो ही कि परिवार वगैरा को छोड़ कर साथ ही इंटरनेट में सर्च नहीं कर सकेंगे। आखिरकार ये आपके देश का राष्ट्रीय खेल है। है कि नहीं है, मुझे तो इस पर भी कई बार शक होता है।
>अरे कौशिक जी आप ने तो मुगालता पाल रखा है कि आप की टीम गर कोई टूर्नामेंट जीतकर आएगी तो आपकी लड़कियों को कोई सर-आंखों पर बैठाएगा। जी कौशिक साहब आपको तो जाते हुए इस बात का एहसास हो जाना चाहिए था जब कि आपकी लड़कियां पूरी रात एयरपोर्ट पर खड़ी रहीं और उनका ट्रांजित वीजा नहीं आया। और इस कारण से वो इस टूर्नामेंट में एक दिन की देरी से पहुंची। नहीं जी नहीं, कतई नहीं बदल सकता इनका भविष्य। आप मेहनत करके देखना चाहते हैं तो देख लीजिए पर कोई फायदा नहीं, आप अपने मन के खुद मालिक हैं। अरे हमारे देश में तो हमारे खेल मंत्री पुलेला गोपीचंद को भी नहीं जानते।
आपके देश के पीएम भी दो दिन बाद बधाई संदेश भेजते हैं। अब से कुछ देर पहले ही पीआईबी ने प्रेस रिलीज जारी किया गया है। गर ये ही हाल पुरुष हॉकी टीम के साथ हुआ होता तो पहाड़ टूट जाता और इससे भी अधिक यदि ये ही हाल यदि भारतीट क्रिकेट टीम यानी टीम इंडिया के साथ हुआ होता तो भूचाल आजाता।
कोई नहीं जानता कि रानी रामपाल हमारी टीम में सबसे कम उम्र की खिलाड़ी हैं। १६ साल की इस बाला ने इस टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा गोल किए हैं। रानी पुरुष टीम के दिवाकर राम की तरह मानी जा रही हैं। पर लोग उसे क्यों जानेंगे वो सानिया मिर्जा कि तरह सुंदर जो नहीं है। वो सायना नेहवाल की तरह गुड लुकिंग भी नहीं है। वर्ना हमारे खेल दिग्गज तो ये कहते हैं कि आजकल सानिया मिर्जा को बहुत पीछे छोड़ दिया है सायना ने। पर कहीं देखी थी सायना की वो खबर जब सायना ने चीन की वॉग को हराकर चैंपियनशिप जीती थी। शायद नहीं। सानिया क्वार्टर फाइनल में भी पहुंचे तो खबर हो जाती है।
मुझे किसी भी खिलाड़ी से कोई शिकायत नहीं पर सोच ये है कि चेहरा और कद देख कर खासकर देश के मामले में प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए। एक दो अखबार को छोड़ दें तो किसी ने भी महिला टीम की तस्वीर नहीं छापी। क्यों छापें काली लड़कियों को, बिक्री नहीं होगी पेपर की, है ना.......।
नीतीश राज
Thursday, June 18, 2009
धोनी के हाथ में कमान नहीं
आधी रात तक टीवी के आगे आंख गड़ाए रखना, मैच के जुनून के कारण घर में सभी से झगड़ा करके टीवी के सामने डटे रहना, एक भी गेंद नागा जाने नहीं देना। हर गेंद पर विश्लेषण करते रहना और लग रहा था कि टीम इंडिया यदि कैसे भी 125-130 तक दक्षिण अफ्रीका को रोक दे तो फिर जीत हाथ में होगी। हुआ भी वो ही भारत ने उनको रोक तो दिया और यदि डीविलियर्स के साथ भारतीय गेंदबाजों ने चूक ना की होती तो ये स्कोर और भी शायद कम होता। पर 131 का टारगेट ठीक था और लग रहा था कि टीम जीत जाएगी। टीम इंडिया की बैटिंग आई तो लगा कि दोनों ओपनर पिछली हार से सबक ले चुके है। 6 ओवर तक बिना विकेट खोए टीम इंडिया का स्कोर 47 रन हो चुका था। अब लगा कि 84 गेंद पर 83 रन जीत के लिए टीम इंडिया को चाहिए थे तो जीत के भरोसे के साथ अधिकतर लोग सो गए पर सुबह ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया।
सुबह सबको पता चला कि भारत 12 रन से हार गया। मुझे याद है कि जब मैंने मैच देखना बंद किया था ठीक उसके एक रन के बाद ही गंभीर आउट हो गए। और भारत ने मात्र 22 रन के अंतर पर अपने 5 विकेट खो दिए। जिसमें गंभीर,रैना, रोहित, कप्तान धोनी, सुपर हीरो यूसुफ पठान सब पवेलियन लौट चुके थे। हाइलाइट्स देखने के बाद लगा कि ये कैसा गेम खेली है टीम इंडिया। रैना ने पिछले तीनों मैच में ऐसी ही गैर जिम्मेदाराना शॉट खेलकर अपना विकेट खो दिया। कप्तान धोनी ने फर्राटा दौड़ लगाने के बाद अपना विकेट गंवा दिया। यदि युवराज पूरी तरह से फिट होते तो शायद वो रन हो जाता वर्ना वो रन किसी भी कीमत पर नहीं था। साथ ही साथ धोनी ने ये भी देखना उचित नहीं समझा कि उनके सहयोगी अपनी क्रीज से एक कदम भी नहीं आगे बढ़े हैं और धोनी सुपरफास्ट तरीके से आधी क्रीज पार कर गए और आउट होकर चलते बने। आईपीएल के हीरो यूसुफ पठान तो कैच प्रैक्टिस कराके चलते बने। और इस तरह भारत ने महज 22 रन के अंदर आधी टीम लौट गई। दिल पे लेने वाले अधिकतर आहत हुए। तो क्या कारण था कि टीम इंडिया टी-20 में इस बार क्यों हारी?
अब बात सामने आती है क्यों ऐसा हुआ? क्यों टीम इंडिया सुपर 8 में अपने सारे मैच हार गई? क्यों टीम इंडिया को इस वर्ल्ड कप की सबसे फेवरेट टीम माना जा रहा था पर फिर भी वो हर क्षेत्र में फेल रही? क्यों टीम इंडिया के खिलाड़ी इस वर्ल्ड कप में पर्फोर्म नहीं कर पाई? क्या हुआ जो कि एकजुट टीम बिखरी हुई नजह आई? पहली बार ऐसा क्या हुआ कि कप्तान और कोच आमने-सामने आकर खड़े हो गए? क्यों इस बार चयनकर्ता और बोर्ड एक ही सुर में बोलते हुए कोच के पीछे पड़ गए उस कोच के पीछे जिसे वो अब तक का सबसे बेहतरीन कोच मान रहे थे?
तो क्या है इन सब के पीछे की बात। पहली बात तो ये कि टीम इंडिया को फेवरेट क्यों माना जा रहा था क्योंकि भारत पूर्व चैंपियन था। वर्ना भारत ने पिछले वर्ल्ड कप 2007 से 2009 वर्ल्ड कप तक सिर्फ 5 मैच 20-20 टीम की तरह खेले और उसमें 3 में हार मिली। पिछले वर्ल्ड कप का जादू टीम इंडिया नहीं दिखा सकी। पिछली बार ये सभी देशों के लिए एक नया फॉरमेट रहा पर भारत के पास मजबूत, चुस्त, फुर्तीले, जवान, जोशीले, खिलाड़ी थे जिन्होंने अपने जोश के कारण टीम को जीत दिला दी। और साथ ही पिछला वर्ल्ड कप धोनी ने एक चैलेंज की तरह लिया था पर इस बार ऐसा नहीं था। 'हमारे सारे खिलाड़ी टूर्नामेंट से पहले बुरी तरह थके हुए थे' कोच ने कहा। कप्तान ने इससे अलग कहा, नहीं हम थके नहीं थे पर बाद में पलट गए कि हम थके जरूर थे पर उतने नहीं जितना श्रीलंका सीरीज से पहले। अब धोनी मान रहे हैं कि जब टीम का सलेक्शन हुआ तब ही काफी खिलाड़ी 100 फीसदी फिट नहीं थे। अरे, धोनी साहब हार गए तो अब सब बोलने लगे।
यदि देखा जाए तो भारत के खिलाड़ी हर जगह दूसरी टीम के साथ चैक मेट किए गए। जिस खिलाड़ी को शॉट पिट गेंदें खेलने में दिक्कत होती थी तो दूसरी टीम ने इस पर खूब होमवर्क किया और उस खिलाड़ी को कोई दूसरी गेंद नहीं फेंकी गई। रोहित और रैना आईपीएल में मजबूत दिखे पर यहां पर बुत बन कर ही रह गए खासकर कि रैना जिनसे शॉट पिच गेंदें खेली ही नहीं गई। सुपर 8 में तीन में से दो बार रैना इस गेंद का ही शिकार बनें। वहीं धोनी ने बाद में खुद कबूला कि हां वो 100 फीसदी नहीं दे पाए। जहां तक गेंदबाजी की बात है तो दूसरी टीम के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होने वाले ईशांत शर्मा को कुछ यूं मार्क किया गया कि ईशांत को बांग्लादेश के खिलाफ सिर्फ दो विकेट मिले और अब तक खेले 8 मैचों में सिर्फ 4 विकेट का उनका कैरियर रहा। वहीं ईशांत के कारण ही आरपी सिंह बाहर बैठे जो कि पिछली बार टीम विनर साबित हुए थे। सेलेक्टर को इस बात पर ध्यान रखते हुए ईशांत को और ट्रेनिंग देनी चाहिए। हर कीमत पर फील्डिंग भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती नजर आई। खुद धोनी ने इस बार रन आउट और स्टंपिंग छोड़ी। साथ ही युवराज के घुटने की चोट इतनी ज्यादा थी कि वो झुक नहीं पा रहे थे। इंग्लैंड से भारत सिर्फ ३ रन से हारा था उसका कारण यदि सीनियर खिलाड़ियों को माना जाए तो वो कम नहीं है। सरासर वो धोनी की गलती थी कि आरपी सिंह के 1 ओवर होते हुए भज्जी को ओवर दिया गया और भज्जी ने 10 रन उस ओवर में दे दिए। साथ ही अंतिम गेंद पर यदि युवराज थोड़ा झुक जाते और अपने पैर के नीचे से गेंद को नहीं निकलने देते तो शायद वो चौका नहीं होता पर अनफिट युवी वो चौका नहीं रोक सके और भारत 3 रन से हार गया।
कोच ने इल्जाम लगाया कि थकी हुई टीम उनको मिली वर्ल्ड कप से पहले मिली थी। वहीं सेलेक्टर कहते हैं कि आईपीएल से नुकसान नहीं हुआ और दूसरे देशों को तो फायदा हुआ फिर गैरी कैसे कह रहे हैं। सेलेक्टर ऐसा कैसे कह सकते हैं। दूसरे देश के खिलाड़ी अनुभव लेकर अपनी टीम के साथ जाकर मिल गए पर वहीं टीम इंडिया के खिलाड़ी साथ होकर भी साथ नहीं थे। हम आईपीएल में आपस में ही लड़ रहे थे, कोई ये तो बताए कि हम टीम की तरह न्यूजीलैंड के दौरे के बाद कब खेले? पिछले 12 महीने में भारत ने 11 महीने क्रिकेट खेली है। क्यों झूठ कहने पर तुले हुए हैं बोर्ड और चयनकर्ता।
जून 2008 में किटप्लाई कप
जून-जुलाई 2008 में एशिया कप
जुलाई-अगस्त 2008 में भारत का श्रीलंका दौरा
अक्टूबर-नवंबर 2008 में भारत के दौरे पर ऑस्ट्रेलिया
नवंबर-दिसंबर 2008 में इंग्लैंड का भारत दौरा
जनवरी-फरवरी 2008 में भारत का श्रीलंका दौरा
फरवरी-अप्रैल 2009 में भारत का न्यूजीलैंड दौरा
18 अप्रैल से द.अफ्रीका में आईपीएल
5 जून से आईसीसी वर्ल्ड टी-20
अब 26 जून 2009 से वेस्टइंडीज दौरा
तीसरा सबसे बड़ा कारण है इस कप के शुरूआत में ही धोनी की सहवाग संग लड़ाई। इसने टीम को खेमों में बांट दिया। कप्तान को आकर मीडिया के सामने, दुनिया के सामने बयान देना पड़ा। वहीं, दूसरी तरफ धोनी ने अपना कूल टेंप्रामेंट खो दिया और मीडिया के साथ वाकयुद्ध में उलझ गए जो कि सरासर गलत था खासकर कि किसी भी टूर्नामेंट से पहले। इससे साफ पता चलता था कि धोनी टीम पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते थे और वहीं टीम में गुट बनने लगे थे। युवराज, गंभीर, रैना सब अलग-थलग रहे पूरे टूर्नामेंट के दौरान। वहीं उपकप्तान के नाम पर गंभीर के नाम का सुझाव देना भी किसी संशय को जन्म देता है। युवराज का उपकप्तान बनते ही युवी का मीडिया से पीसी में कहना कि हम अभ्यास आपसे(मीडिया से) पूछ कर नहीं करेंगे और हम जानते हैं कि हमें कब प्रैक्टिस करनी है, कल के नतीजे बता देंगे कि हमें प्रैक्टिस करनी चाहिए थी या नहीं। अगले दिन इंग्लैंड से हार गई टीम। और टीम के कुछ खिलाड़ी हार के बाद हंसते हुए दिखाई दिए कैमरे पर। जब युवी पीसी में ये बात कर रहे थे तब दूसरी तरफ वहीं धोनी प्रैक्टिस कर रहे थे इससे साफ लगता है कि धोनी के हाथ में कमान नहीं रह गई है।
आपका अपना
नीतीश राज
Saturday, June 13, 2009
धोनी गलतियों का पिटारा मत बनो, एक ही हारे हो, राजनीति ना करो तो जीत सकते हो कप।
कप्तान-उपकप्तान से आस, पर कप्तान ने किया निराश
फिर क्रीज पर थे कप्तान और उप कप्तान। दोनों से टीम को बहुत उम्मीदें थीं। पर कप्तान धोनी बल्ले से कुछ भी कमाल नहीं दिखा सके और महज 11 रन बनाकर पवैलियन लौट गए। इन 11 रन को बनाने के लिए धोनी ने गेंद खेली 23 और इस 11 रन में धोनी किसी भी गेंद को बाउंड्री के पार नहीं पहुंचा सके। वहीं दूसरी तरफ मैच से पहले उपकप्तान बने युवराज सिंह ने लाज बचा ली। युवी ने 43 गेंद का सामना करते हुए 67 रन की पारी खेली। इस पारी में 6 चौके और 2 छक्के शामिल थे। एडवर्डस ने अपनी ही गेंद पर कैच लपककर युवी की पारी को समाप्त किया।
नहीं दिखा यूसुफ पठान का जलवा
यूसुफ पठान का जलवा वैसा नहीं दिखा जैसा आईपीएल में दिखा था। जैसी उम्मीद यूसुफ से थी उसके पासंग भी नहीं फटके यूसुफ मियां। कई बार सिर्फ बल्ला घुमाते नजर आए। जब पठान से उम्मीद थी कि वो 2-4 छक्के मार कर टीम के स्कोर को मजबूती की तरफ ले जाएंगे वहीं पर वो विफल रहे। 23 गेंद पर 31 रन जिसमें 3 चौके और 1 छक्का। इरफान भी कोई कमाल बल्ले से नहीं कर पाए। पर अंत में भज्जी ने हाथ जमाते हुए महज़ 4 गेंदों पर 3 चौकों की मदद से नाबाद 13 रन बनाए।
टीम इंडिया ने युवराज के आउट होने के बाद अंतिम 20 गेंदों पर सिर्फ 23 रन जोड़े जो कि हार का एक मुख्य कारण बने। वेस्टइंडीज की तरफ से ब्रावो ने 4 और एडवर्डस ने 3 विकेट झटके और किसी अन्य गेंदबाज को कोई भी सफलता नहीं मिली। भारत की पूरी टीम पर ये दो गेंदबाज ही भारी पड़े।
इंडीज की बैटिंग, शुरूआती झटके के बाद कमाल
154 रन का पीछा करते हुए वेस्टइंडीज को शुरुआत में ही इरफान ने फ्लेचर को आउट कर दिया। पर दूसरी तरफ गेल जमे रहे और भारत की मुश्किलें बढ़ाते रहे। यूसुफ पठान ने जब जहीर के हाथों केच लपकवाकर गेल को 22 के स्कोर पर आउट किया तो लगा कि टीम जीत सकती है पर ये दिन टीम इंडिया के लिए नहीं था। सिमोन्स और ब्रावो ने सारे गेंदबाजों को पीटा। ब्रावो ने सब गेंदबाजों को धुना। सिमोन्स को ओझा ने इरफान के हाथों कैच आउट किया। 5 चौकों की मदद से 37 गेंद पर सिमोन्स ने 44 रन बनाए। वहीं ब्रावो ने सिर्फ 36 गेंद पर शानदार नाबाद 66 रन बनाए, इसमें 4 चौके और 3 छक्के शामिल थे। ब्रावो बने मैन ऑफ द मैच। भारत की तरफ से भज्जी ने क्रिस गेल के सामने ओवर मेडिन डाला।
ना चला बल्ला, ना चली कप्तानी, कीपिंग में भी कांपे हाथ
बल्लेबाजी के ऑर्डर में फेरबदल, क्या होगया धोनी को? इस महत्वपूर्ण मुकाबले से ठीक पहले धोनी ने बल्लेबाजी क्रम में फेरबदल किया। अभ्यास मैच और लीग मुकाबलों में धोनी ने 3 नंबर पर बल्लेबाजी की, तो क्या वजह थी कि इस महत्वपूर्ण मुकाबले में धोनी ने फेरबदल किया और रैना को 3 नंबर पर भेजा। धोनी ने कीपिंग में भी गलती की। सिमोन्स को रन आउट करने का मौका धोनी ने गंवा दिया और साथ ही ब्रावो का कैच छोड़ना ये काफी भारी पड़ा। धोनी के दिमाग में क्या चल रहा है ये बता पाना तो मुश्किल है लेकिन उसकी बानगी देखने को मिली जब कि धोनी ने वीरू के जाने के बाद पूछा गया कि कौन हो टीम इंडिया का उपकप्तान। तो धोनी ने युवराज की जगह गंभीर का नाम लिया। ऐसा क्यों? क्या धोनी अपने ऊपर कोई भी सीनियर टीम में नहीं चाहते। पर अभी पूरा वर्ल्ड कप बाकी है धोनी यदि सब को साथ लेकर चलें तो ये कप हमसे कोई नहीं छीन सकता।
इस मैच की हार से ये भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्टेडियम में भारतीय प्रशंसकों का दिमाग इतना खराब हुआ कि उन्होंने भारत के खिलाफ वेस्टइंडीज के लिए नारे लगाने लगे। वैसे आज इस मैच को देखने के लिए वो शख्स भी लॉर्ड्स के स्टे़डियम में मौजूद था जिसे पूरा भरोसा है कि टीम इंडिया ये कप किसी और को नहीं लेने देगी। सचिन तेंदुलकर भी स्टेडियम में मौजूद थे शायद निराश होंगे कि भारत इतनी बुरी तरह से हार गया।
आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”