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Saturday, May 29, 2010

'ये यंगिस्तान की हार नहीं है...'


यंगिस्तान की हार, यंगिस्तान को धूल चटा दी, यंगिस्तान इसे एक सबक समझे, और ना जाने क्या-क्या सलोगन सुनने में आ रहे हैं। कल से ही कई लोगों की जुबान पर ये बात आ रही थी और आज सुबह अधिकतर अखबार इसी पटे हुए हैं। पर मेरा सवाल ये है कि क्या सचमुच में यंगिस्तान की हार हुई है? और हां, यहां पर एक बात साफ कर दूं कि जिम्बॉब्वे की टीम फिसड्डी नहीं है जैसा कि कई जगह बताया जा रहा है।

हां, यंगिस्तान की हार तो हुई है, जो मैदान में खेल रहा है हारेगा तो वो ही। पर क्या इस हार के जिम्मेदार भी पूरी तरह से वो ही हैं? हार की पूरी वजह भी यंगिस्तान ही है?

नहीं, इस हार को यदि प्रतिशत में देखूं तो 10 फीसदी गलती यंगिस्तान टीम की है जो कि कल मैदान में उतरी थी। जी हां, सिर्फ 10 फीसदी गलती मानता हूं टीम की। वन डे में 285 का लक्ष्य किसी भी दूसरी टीम के लिए कम मुश्किल चुनौती नहीं होता। पर क्या इस टीम के पास कोई भी ऐसा गेंदबाज था जो दूसरी टीम और लक्ष्य के बीच दीवार की तरह खड़ा हो जाता। जवाब है, नहीं। तीनों तेज गेंदबाज वन डे में अपनी पारी की शुरूआत कर रहे थे। तीनों ने पूरे 10 ओवर नहीं फेंके और साथ ही तीनों ने 6 की रन रेट से रन दिए। सफल इसमें विनय कुमार ही रहे पर महंगे भी साबित हुए। पर ऐसा क्यों हुआ कि तीन नए गेंदबाजों को एक साथ ही मैदान में उतारना पड़ा? क्या हमारे पास नेहरा, जहीर, प्रवीण को छोड़ कर गेंदबाज नहीं हैं।

नहीं ऐसा नहीं है, हमारे पास गेंदबाज हैं पर उनको मौका नहीं दिया गया। इरफान पठान, श्रीशांत, आरपी सिंह, अजीत अगरकर, जोगिंदर शर्मा को टीम के साथ भेजा जा सकता था पर क्यों नहीं टीम में शामिल किया गया ये तो सेलेक्टर्स ही बेहतर बता सकते हैं। उथप्पा, मनीष पांडे, रायडू, अभिषेक तिवारी, अभिषेक नायर इन नामों पर भी चर्चा हो सकती थी। शायद हुई भी हो पर इस टीम के साथ किसी भी सीनियर खिलाड़ी को ना भेजने के पीछे क्या लॉजिक था ये तो श्रीकांत एंड कंपनी ही बता सकती है। 70 फीसदी गलती सेलेक्टर्स की है।

20 फीसदी गलती है भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ियों की। जब कई खिलाड़ी छुट्टी मांग रहे हैं तो क्या भारतीय टीम के कप्तान धोनी को नहीं चाहिए था कि वो छुट्टी पर ना जाएं। क्यों सभी खिलाड़ियों ने एक साथ आराम की मांग की? और कैसे सेलेक्टर्स ने सभी को छुट्टी या आराम दे दिया। नेहरा ने ऐसा कौन सा पहाड़ तोड़ा था कि जिस कारण उन्हें आराम की जरूरत थी। सचिन तेंदुलकर ना तो वर्ल्ड टी-20 में गए फिर उनको आराम की जरूरत क्यों आ पड़ी।

हमारे टीम के सीनियर खिलाड़ियों से तो सिर्फ ये ही लगता है कि वो सभी अपने लिए खेलते हैं टीम या फिर देश के लिए नहीं खेलते। सब के सब आईपीएल में पैसा कमाने के लिए खेल सकते हैं पर देश की बात आए तो आराम की दरकार करते हैं। और सोने पर सुहागा सेलेक्टर्स, अपने ही पसंदीदा और क्षेत्र के खिलाड़ियों को ही टीम में शामिल करने में लगे रहते हैं।

इस हार को यंगिस्तान की हार मत कहिए, ये हार तो है हमारे बूढ़े सेलेक्टर्स और हमारे स्वार्थी सीनियर खिलाड़ियों की। इन सबको ये समझना चाहिए कि ये हार भारत की है और ये हार रिकॉर्डस में दर्ज भी जरूर होगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, May 19, 2010

ये फैसला तो जरूरी था।


पिछले वर्ल्ड टी 20 में मैंने एक पूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता से पूछा था कि कौन सी टीम सब से प्रबल दावेदार है कप की। उनके जवाब से मैं संतुष्ट नहीं हुआ। मैंने कहा कि पाकिस्तान को आप कम मत आंकिए ये कभी भी उल्टफेर करने का माद्दा रखती है। उनका जवाब क्या था वो आप को बाद में बताता हूं पहले बात इस बारे में।

ये तो जरूरी था।

7 दिन के अंदर नोटिस का जवाब देना होगा भारतीय टीम के 6 खिलाड़ियों को जिन्होंने वर्ल्ड टी-20 में भारत की शर्मनाक विदाई के बाद पब में पंगा किया था। युवराज सिंह, जहीर खान, आशीष नेहरा, रोहित शर्मा, पीयूष चावला और रवींद्र जडेजा को बोर्ड ने नोटिस जारी किया। वैसे तो हारने के बाद भारतीय जमीन पर कदम रखते ही आशीष नेहरा का पीछा ’पब’ ने नहीं छोड़ा था। पर पब के किसी भी तरह के पंगे से उन्होंने गुस्से की हंसी के साथ साफ-साफ इनकार किया था। साथ ही टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी युवराज सिंह ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर में कहा था कि उनका कोई पंगा नहीं हुआ।
वेस्टइंडीज टूर पर भारतीय टीम मैनेजर रंजीव बिस्वाल ने खिलाड़ियों के इनकार के बाद जो रिपोर्ट सौंपी उसमें ये साफ था कि ’पब में पंगा हुआ था पर हाथापाई नहीं हुई थी’।

कितनी शर्म की बात है कि सीनियर खिलाड़ियों ने ऐसा बर्ताव किया। हार गए और ऐसा बर्ताव। सीनियर खिलाड़ी बखूबी जानते हैं कि क्रिकेट को खुदा की तरह समझने वाले देश भारत के प्रशंसक कैसे हैं। इन्होंने गलती की और गलती के बाद झूठ बोला। एक बार नहीं बार-बार। वहीं दूसरी तरफ, हम यदि ये कहें कि हार का गम था और फैन्स को ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए था तो ये भी गलत है। ऐसा तो होना ही था पर हां उसको अंत कुछ इस तरह होगा ऐसा शायद ही किसी ने सोचा हो। ये अनुशासनात्मक कार्रवाई इन खिलाड़ियों के ऊपर होनी थी और ये जरूरी ’भी’ थी।

धोनी का बयान, ’एक तीर दो निशाने’

वहीं धोनी ने कहा कि टीम के चयन में चयनकर्ता उनकी सुनते नहीं है। तो ये बात पहले भी कही जा सकती थी। जब तक टीम जीत रही थी तब तक आपको भी कोई दिक्कत नहीं हुई पर जैसे ही टीम हारी आप भी खिलाड़ियों के साथ छोड़कर दूर खड़े होगए। जबकि ये बात आप खुद जानते हैं कि इस बार के टी-20 में आपके कई फैसलों पर सवालिया निशान लगाया जा रहा है। लेकिन धोनी कहीं ना कहीं टीम / बोर्ड की राजनीति को भी सामने लाना चाहते हैं।

बोर्ड भी कठघरे में

असल मायने में बोर्ड पर भी सवाल उठना चाहिए। ना वो कोच की सुनती ना ही वो कप्तान की सुनती, क्यों? याद है मुझे पिछले वर्ल्ड टी-20 में हार के बाद भी बोर्ड के एक सदस्य का ये ही कहना था जो कि इस बार भी दोहराया उन्होंने कि यदि खिलाड़ियों को थकान महसूस हो रही थी तो वो बताते तो हम उन्हें आराम देते। रटा-रटाया बयान फिर से जैसे पढ़ दिया गया हो। यानी की वो बोर्ड अधिकारी पुरानी गलतियों से सबक नहीं लेते हैं, इससे तो ये ही जाहिर होता है।
दूसरी बात, इस बात से मैं तो कतई इत्तेफाक नहीं रखता कि सहवाग की जगह मुरली विजय को भेजने का फैसला ठीक कहा जाएगा। आईपीएल की फॉर्म रॉबिन उथप्पा को भेजने की हिमायती दिखती है पर फिर ये फैसला क्यों लिया गया, शायद सेलेक्टर ही जानते हों। मुरली विजय जिस टीम से आईपीएल में खेलते हैं उस टीम के मेंबर बोर्ड में भी मेंबर हैं।

आईपीएल असर तो डालता ही है....

आईपीएल ने फायदा दिया या घाटा पहुंचाया इस पर बहुत समय से बहस हो रही है पर जहां पर जिस देश में आईपीएल ने जन्म लिया और उस देश का कप्तान ये कहे कि ’थैंक्स, अगली बार पहले वर्ल्ड कप है बाद में आईपीएल’। इस बयान से आप एक कप्तान की व्यथा जान ही सकते हैं कि आईपीएल में कितना ’पेंच’ होता है। शायद ये ही कारण है कि इस बार आईपीएल के किसी भी खिलाड़ी ने वहां पर परचम नहीं लहराया।

जाते-जाते----अच्छा हुआ कि इंग्लैंड जीता कप

पिछले वर्ल्ड टी 20 में मैंने एक भूतपूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता से पूछा था कि कौन सी टीम सब से प्रबल दावेदार है इस बार वर्ल्ड टी 20 की। उनके जवाब से मैं संतुष्ट नहीं था। मैंने कहा कि पाकिस्तान को आप कम मत आंकिए ये कभी भी उल्टफेर करने का माद्दा रखती है। उनका जवाब था कि नए खिलाड़ी हैं क्या जीतेंगे। जवाब में मैंने कहा कि पिछली बार भी तो भारत जीत गया था सभी बच्चे थे। पाकिस्तान की ये टीम नहीं जीत सकती, उन्होंने जवाब दिया।
जब पाकिस्तान ने कप जीता, मेरा उनसे आमना-सामना कई बार हुआ अब वो कभी बातचीत में ऐसी कोई लाइन नहीं लेते कि ये तो नहीं हो सकता।
अच्छा हुआ फिर इस बार वो टीम जीती जिसे दावेदार की सूची में नहीं रखा जा रहा था। जितने लोग थे उतने चैंपियन थे, कोई कह रहा था वेस्टइंडीज, द. अफ्रीका, पाकिस्तान शायद भारत भी...। पर अच्छा हुआ कि इंग्लैड जीत गया। पहली बार इतिहास में इंग्लैंड ने कोई ऐसा खिताब जीता है। इंग्लैंड में शुरू हुआ क्रिकेट आज तक एक बार भी 50-50 का चैंपियन नहीं बन पाया है। ब्रिटेन की लेबर पार्टी की सचमुच में हार हुई और ब्रिटेन में बदलाव आ ही गया।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, September 12, 2009

कल खुशी पर भारी पड़ा गम।


कहीं खुशी, कहीं गम, ये ही हाल रहा दो दिन के बारे में कहूं तो। दिल्ली में बारिश ही बारिश। हरियाणा से यमुना में पानी भी छोड़ा गया जिसके कारण दिल्ली में बाढ़ जैसे हालात हो गए हैं। पता नहीं कितने सालो बाद ऐसी बारिश हुई है। शायद 98 में दिल्ली में ऐसा ही एक बार हुआ था जब कि यमुना पुश्ता पर पानी भर गया था और दिल्ली में बाढ़ आई थी।
एक गाना हुआ करता था रिमझिम गिरे सावन....पर अब तो सावन बीत जाए और फिर रिमझिम शुरू हो जाए। ये हाल हो गया है मौसम का।

वैसे, मैं यहां पर बात क्या करने वाला था और क्या करने लग गया। कल के दिन खुशी मिली पर जब गम सामने आया तो वो खुशी पर भारी पड़ गया।

ऑफिस में इस बात का इंतजार हो रहा था कि क्या भारत आज का मैच जीत जाएगा। चार विकेट गिर चुके थे। मैं और मेरे साथ ही कुछ इस पर चर्चा भी कर रहे थे कि जब स्कोर छोटा होता है तो टीम इंडिया जरूर उतना ही मर मर कर जीतती है। ये नहीं कि शेर की तरह खेले और जल्दी जीत कर मैच को रफा-दफा करे। चार विकेट गिर चुके थे, द्रविड़ ने 65 मिनट क्रीज पर रहकर 45 गेंदों में महज 14 रन बनाए। द्रविड़ एक महान खिलाड़ी हैं पर क्यों द्रविड़ वन डे को भी टेस्ट की तरह खेलते हैं।

इस बीच एक खबर ने सब में रोमांच भर दिया। पहले था कि सीरीज जीतने पर ही टीम इंडिया नंबर वन बन पाएगी। पर अब ये खबर आई कि न्यूजीलैंड को हराने के साथ ही हम नंबर वन बन जाएंगे पर नंबर वन बने रहने के लिए कॉम्पेक कप जीतना जरूरी होगा। और थोड़ी देर बाद ही धोनी और रैना ने जीत दिला दी। धोनी और रैना दोनों की तारीफ करना चाहूंगा कि दोनों ने सूझबूझ कर बैटिंग की और अंत तक टिके रहे। आशीष नेहरा को मैन ऑफ द मैच से नवाजा गया। सचिन को सम्मान के रूप में बाइक दी गई जिसपर इस बार सचिन खुद ही बैठे धोनी को बैठने का मौका नहीं दिया।

अब बात गम की भी कर लें।

अभी ऑफिस से घर की तरफ निकले ही थे कि पता चला कि डीडी ने सेमीफाइनल और फाइनल के राइट्स खरीद लिए हैं। अब तो लगा कि वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारत का झंडा ऊंचा होगा और विजेंदर अपने बाउट जीतकर फाइनल की जंग में पहुंच जाएगा।

पूरे ऑफिस में बताया गया कि रात के 1.30 बजे है बाउट। मैं घर पहुंच कर खाना पीना करके टीवी खोलकर कभी कुछ कभी कुछ देखते हुए जगने की कोशिश में लग गया। बार-बार न्यूज पर वापिस आता कि जब तक क्रिकेट का ही लुत्फ ले लिया जाए। दिल में एक इच्छा थी कि विजेंदर जीत जाए क्योंकि हाल ही में करोड़ों का मुनाफा हुआ है विजेंदर को।

इतिहास तो विजेंदर ने भी रच ही दिया है। पहली बार कोई भारतीय बॉक्सर इस ऊंचाई तक पहुंच पाया है। यदि विजेंदर जीत जाए तो अच्छा होगा क्योंकि बहुत हो लिया क्रिकेट। पर ये ही सोचते-सोचते कब नींद आगई पता ही नहीं चला। सुबह जब उठा तो तुरंत टीवी चलाया देखा तो हर न्यूज चैनल पर सिर्फ क्रिकेट ही क्रिकेट चल रहा था। लग गया कि विजेंदर का क्या हुआ। यानी हार गया विजेंदर।

जी हां, उजबेकिस्तान बॉक्सर अब्बोस अतोव जिसकी रैंक इस चैंपियनशिप में चौथी थी उसने पहली रैंक विजेदर को 7-3 से मात दे दी। जबकि पहले राउंड में 0-1 से आगे चल रहा थे विजेंदर। पर दूसरे राउंड में ज्यादा डिफेंसिव मोड विजेंदर को हार के कगार पर ले गया। और उजबेक बॉक्सर ने दूसरे राउंड में 5 अंक बटोर लिए और फिर अंतिम राउंड में तो सिर्फ खानापूर्ति ही रह गई। अतोव ने 2007 में लाइट वेट में वर्ल्ड चैंपियनशिप में फाइनल जीता था और वो भी तब जब कि वो बाउट के दौरान प्रतिद्वंदी के पंच के कारण नीचे गिर गए थे। दूसरे राउंड के बाद स्कोर 5-1 था और अंत में 7-3 से विजेंदर हार गया और मुझे लगता है कि बॉक्सिंग का फ्यूचर भी हार गया।

मैंने टीवी बंद कर दिया था। सोच रहा था कि आज भी दो मैच हैं। जहां एक जगह टीम इंडिया श्रीलंका से भिड़ेगी, वहीं दूसरी तरफ जीतेगा भी भारत और हारेगा भी भारत। अमेरिकी ओपन टेनिस चैंपियनशिप में भूपति और पेस होंगे आमने-सामने। देखते हैं कि खुशी मिलती है या फिर आज का पार्ट-2।
आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 18, 2009

धोनी के हाथ में कमान नहीं

आधी रात तक टीवी के आगे आंख गड़ाए रखना, मैच के जुनून के कारण घर में सभी से झगड़ा करके टीवी के सामने डटे रहना, एक भी गेंद नागा जाने नहीं देना। हर गेंद पर विश्लेषण करते रहना और लग रहा था कि टीम इंडिया यदि कैसे भी 125-130 तक दक्षिण अफ्रीका को रोक दे तो फिर जीत हाथ में होगी। हुआ भी वो ही भारत ने उनको रोक तो दिया और यदि डीविलियर्स के साथ भारतीय गेंदबाजों ने चूक ना की होती तो ये स्कोर और भी शायद कम होता। पर 131 का टारगेट ठीक था और लग रहा था कि टीम जीत जाएगी। टीम इंडिया की बैटिंग आई तो लगा कि दोनों ओपनर पिछली हार से सबक ले चुके है। 6 ओवर तक बिना विकेट खोए टीम इंडिया का स्कोर 47 रन हो चुका था। अब लगा कि 84 गेंद पर 83 रन जीत के लिए टीम इंडिया को चाहिए थे तो जीत के भरोसे के साथ अधिकतर लोग सो गए पर सुबह ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया।

सुबह सबको पता चला कि भारत 12 रन से हार गया। मुझे याद है कि जब मैंने मैच देखना बंद किया था ठीक उसके एक रन के बाद ही गंभीर आउट हो गए। और भारत ने मात्र 22 रन के अंतर पर अपने 5 विकेट खो दिए। जिसमें गंभीर,रैना, रोहित, कप्तान धोनी, सुपर हीरो यूसुफ पठान सब पवेलियन लौट चुके थे। हाइलाइट्स देखने के बाद लगा कि ये कैसा गेम खेली है टीम इंडिया। रैना ने पिछले तीनों मैच में ऐसी ही गैर जिम्मेदाराना शॉट खेलकर अपना विकेट खो दिया। कप्तान धोनी ने फर्राटा दौड़ लगाने के बाद अपना विकेट गंवा दिया। यदि युवराज पूरी तरह से फिट होते तो शायद वो रन हो जाता वर्ना वो रन किसी भी कीमत पर नहीं था। साथ ही साथ धोनी ने ये भी देखना उचित नहीं समझा कि उनके सहयोगी अपनी क्रीज से एक कदम भी नहीं आगे बढ़े हैं और धोनी सुपरफास्ट तरीके से आधी क्रीज पार कर गए और आउट होकर चलते बने। आईपीएल के हीरो यूसुफ पठान तो कैच प्रैक्टिस कराके चलते बने। और इस तरह भारत ने महज 22 रन के अंदर आधी टीम लौट गई। दिल पे लेने वाले अधिकतर आहत हुए। तो क्या कारण था कि टीम इंडिया टी-20 में इस बार क्यों हारी?

धोनी मान रहे हैं कि जब टीम का सलेक्शन हुआ तब ही काफी खिलाड़ी 100 फीसदी फिट नहीं थे
सुपर 8 में सुपर फ्लॉप, आईसीसी वर्ल्ड टी 20 में इस बार भारत ने 5 मुकाबले खेले और सिर्फ 2 में ही जीत हासिल की वो भी उन टीमों के साथ जो शायद इस टूर्नामेंट की सबसे कमजोर टीमें थी। 2007 में टीम इंडिया ने सुपर 8 में तीन मैच खेले थे और दो में जीत दर्ज की थी पर इस बार 2009 में टीम इंडिया ने फिर 3 मैच खेले और तीनों में हार का मुंह देखना पड़ा।

अब बात सामने आती है क्यों ऐसा हुआ? क्यों टीम इंडिया सुपर 8 में अपने सारे मैच हार गई? क्यों टीम इंडिया को इस वर्ल्ड कप की सबसे फेवरेट टीम माना जा रहा था पर फिर भी वो हर क्षेत्र में फेल रही? क्यों टीम इंडिया के खिलाड़ी इस वर्ल्ड कप में पर्फोर्म नहीं कर पाई? क्या हुआ जो कि एकजुट टीम बिखरी हुई नजह आई? पहली बार ऐसा क्या हुआ कि कप्तान और कोच आमने-सामने आकर खड़े हो गए? क्यों इस बार चयनकर्ता और बोर्ड एक ही सुर में बोलते हुए कोच के पीछे पड़ गए उस कोच के पीछे जिसे वो अब तक का सबसे बेहतरीन कोच मान रहे थे?

तो क्या है इन सब के पीछे की बात। पहली बात तो ये कि टीम इंडिया को फेवरेट क्यों माना जा रहा था क्योंकि भारत पूर्व चैंपियन था। वर्ना भारत ने पिछले वर्ल्ड कप 2007 से 2009 वर्ल्ड कप तक सिर्फ 5 मैच 20-20 टीम की तरह खेले और उसमें 3 में हार मिली। पिछले वर्ल्ड कप का जादू टीम इंडिया नहीं दिखा सकी। पिछली बार ये सभी देशों के लिए एक नया फॉरमेट रहा पर भारत के पास मजबूत, चुस्त, फुर्तीले, जवान, जोशीले, खिलाड़ी थे जिन्होंने अपने जोश के कारण टीम को जीत दिला दी। और साथ ही पिछला वर्ल्ड कप धोनी ने एक चैलेंज की तरह लिया था पर इस बार ऐसा नहीं था। 'हमारे सारे खिलाड़ी टूर्नामेंट से पहले बुरी तरह थके हुए थे' कोच ने कहा। कप्तान ने इससे अलग कहा, नहीं हम थके नहीं थे पर बाद में पलट गए कि हम थके जरूर थे पर उतने नहीं जितना श्रीलंका सीरीज से पहले। अब धोनी मान रहे हैं कि जब टीम का सलेक्शन हुआ तब ही काफी खिलाड़ी 100 फीसदी फिट नहीं थे। अरे, धोनी साहब हार गए तो अब सब बोलने लगे।

वर्ल्ड कप 2007 से 2009 वर्ल्ड कप तक सिर्फ 5 मैच 20-20 टीम की तरह खेले और उसमें 3 में हार मिली।

यदि देखा जाए तो भारत के खिलाड़ी हर जगह दूसरी टीम के साथ चैक मेट किए गए। जिस खिलाड़ी को शॉट पिट गेंदें खेलने में दिक्कत होती थी तो दूसरी टीम ने इस पर खूब होमवर्क किया और उस खिलाड़ी को कोई दूसरी गेंद नहीं फेंकी गई। रोहित और रैना आईपीएल में मजबूत दिखे पर यहां पर बुत बन कर ही रह गए खासकर कि रैना जिनसे शॉट पिच गेंदें खेली ही नहीं गई। सुपर 8 में तीन में से दो बार रैना इस गेंद का ही शिकार बनें। वहीं धोनी ने बाद में खुद कबूला कि हां वो 100 फीसदी नहीं दे पाए। जहां तक गेंदबाजी की बात है तो दूसरी टीम के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होने वाले ईशांत शर्मा को कुछ यूं मार्क किया गया कि ईशांत को बांग्लादेश के खिलाफ सिर्फ दो विकेट मिले और अब तक खेले 8 मैचों में सिर्फ 4 विकेट का उनका कैरियर रहा। वहीं ईशांत के कारण ही आरपी सिंह बाहर बैठे जो कि पिछली बार टीम विनर साबित हुए थे। सेलेक्टर को इस बात पर ध्यान रखते हुए ईशांत को और ट्रेनिंग देनी चाहिए। हर कीमत पर फील्डिंग भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती नजर आई। खुद धोनी ने इस बार रन आउट और स्टंपिंग छोड़ी। साथ ही युवराज के घुटने की चोट इतनी ज्यादा थी कि वो झुक नहीं पा रहे थे। इंग्लैंड से भारत सिर्फ ३ रन से हारा था उसका कारण यदि सीनियर खिलाड़ियों को माना जाए तो वो कम नहीं है। सरासर वो धोनी की गलती थी कि आरपी सिंह के 1 ओवर होते हुए भज्जी को ओवर दिया गया और भज्जी ने 10 रन उस ओवर में दे दिए। साथ ही अंतिम गेंद पर यदि युवराज थोड़ा झुक जाते और अपने पैर के नीचे से गेंद को नहीं निकलने देते तो शायद वो चौका नहीं होता पर अनफिट युवी वो चौका नहीं रोक सके और भारत 3 रन से हार गया।

कोच ने इल्जाम लगाया कि थकी हुई टीम उनको मिली वर्ल्ड कप से पहले मिली थी। वहीं सेलेक्टर कहते हैं कि आईपीएल से नुकसान नहीं हुआ और दूसरे देशों को तो फायदा हुआ फिर गैरी कैसे कह रहे हैं। सेलेक्टर ऐसा कैसे कह सकते हैं। दूसरे देश के खिलाड़ी अनुभव लेकर अपनी टीम के साथ जाकर मिल गए पर वहीं टीम इंडिया के खिलाड़ी साथ होकर भी साथ नहीं थे। हम आईपीएल में आपस में ही लड़ रहे थे, कोई ये तो बताए कि हम टीम की तरह न्यूजीलैंड के दौरे के बाद कब खेले? पिछले 12 महीने में भारत ने 11 महीने क्रिकेट खेली है। क्यों झूठ कहने पर तुले हुए हैं बोर्ड और चयनकर्ता।


जून 2008 में किटप्लाई कप
जून-जुलाई 2008 में एशिया कप
जुलाई-अगस्त 2008 में भारत का श्रीलंका दौरा
अक्टूबर-नवंबर 2008 में भारत के दौरे पर ऑस्ट्रेलिया
नवंबर-दिसंबर 2008 में इंग्लैंड का भारत दौरा
जनवरी-फरवरी 2008 में भारत का श्रीलंका दौरा
फरवरी-अप्रैल 2009 में भारत का न्यूजीलैंड दौरा
18 अप्रैल से द.अफ्रीका में आईपीएल
5 जून से आईसीसी वर्ल्ड टी-20
अब 26 जून 2009 से वेस्टइंडीज दौरा

तीसरा सबसे बड़ा कारण है इस कप के शुरूआत में ही धोनी की सहवाग संग लड़ाई। इसने टीम को खेमों में बांट दिया। कप्तान को आकर मीडिया के सामने, दुनिया के सामने बयान देना पड़ा। वहीं, दूसरी तरफ धोनी ने अपना कूल टेंप्रामेंट खो दिया और मीडिया के साथ वाकयुद्ध में उलझ गए जो कि सरासर गलत था खासकर कि किसी भी टूर्नामेंट से पहले। इससे साफ पता चलता था कि धोनी टीम पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते थे और वहीं टीम में गुट बनने लगे थे। युवराज, गंभीर, रैना सब अलग-थलग रहे पूरे टूर्नामेंट के दौरान। वहीं उपकप्तान के नाम पर गंभीर के नाम का सुझाव देना भी किसी संशय को जन्म देता है। युवराज का उपकप्तान बनते ही युवी का मीडिया से पीसी में कहना कि हम अभ्यास आपसे(मीडिया से) पूछ कर नहीं करेंगे और हम जानते हैं कि हमें कब प्रैक्टिस करनी है, कल के नतीजे बता देंगे कि हमें प्रैक्टिस करनी चाहिए थी या नहीं। अगले दिन इंग्लैंड से हार गई टीम। और टीम के कुछ खिलाड़ी हार के बाद हंसते हुए दिखाई दिए कैमरे पर। जब युवी पीसी में ये बात कर रहे थे तब दूसरी तरफ वहीं धोनी प्रैक्टिस कर रहे थे इससे साफ लगता है कि धोनी के हाथ में कमान नहीं रह गई है।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, June 15, 2009

धोनी तूने ये क्या किया, भारत को आईसीसी वर्ल्ड टी-२० से बाहर किया।

....और भारत हार गया। पूर्व चैंपियन भारत सेमीफाइनल की रेस से बाहर होगया। इंग्लैंड ने 3 रन से दी मात। काश! भारतीय कप्तान अब होने वाले दर्द को पहले समझे होते तो बेहतर होता, पर जबतक समझते तब तक बहुत देर हो गई।
धोनी ने कहा कि वो दबाव में युवराज को नहीं भेजना चाहते थे।

गलतियों का पिटारा बने कप्तान

हार का ठीकरा कई गलतियां कर बैठे धोनी, सारी रणनीति बेकार होगई, इस बार ऐसा लगा कि धोनी में वो जीत की भूख कहीं खत्म हो गई है, वो आग जिसके कारण पिछला टी 20 वर्ल्ड कप जीता था। कहां गई धोनी की टीम को साथ लेकर चलने की काब्लियत। कहां काफुर हो गया वो कूल एटिट्यूड जिसके कारण माही जाने जाते थे। कई गलतियां की इस बार के टी 20 में कप्तान साहब ने।

ये धोनी तुझे हुआ क्या?

हंसता हुआ, लंबे बाल वाला वो लड़का जब भी कीपिंग करता तो दुश्मन देश के जनरल के मन को भी लुभा जाता। जब से कप्तानी संभाली धोनी के ऊपर सीनियर्स को दरकिनार करने का इल्जाम लगता रहा। इसी कारण से जब सहवाग की बात सामने आई तो कोई भी धोनी पर यकीन नहीं कर पा रहा था। जब ध्यान मैच और प्रैक्टिस पर होना चाहिए था तब वो टीम की एकता परेड कराने में जुटा हुए थे। क्योंकि धोनी को अपने नाम को बचाने की चिंता जयादा सताने लगी थी। धोनी ने शायद कहीं ना कहीं क्रिकेटरों का विश्वास खोया है जिसका एहसास धोनी को भी हो गया है।
रवींद्र जडेजा को चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करने का मौका क्यों दिया गया?

ड्रेसिंग रूम में राजनीति! और अपनों ने डुबोई लुटिया

टीम में बने रहने के लिए गुटबाजी करना तो धोनी की आदत बन गई और आरपी सिंह के मामले में तो वो सेलेक्टर से दो-चार भी हो लिए। वहीं जब सहवाग की छुट्टी हुई तो उपकप्तान कौन हो इस पर चर्चा शुरु हुई। सीनियर भज्जी, युवराज को छोड़कर धोनी ने गौतम गंभीर का नाम सामने रखा। वेस्टइंडीज से मैच खेलने से ठीक पहले इस तरह की राजनीति, क्यों?
टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी का फैसला क्या इसलिए भी लिया गया क्योंकि धोनी ने हाल ही में प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये बयान दिया था कि भारतीय टीम दबाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन करती है। पर पहले गेंदबाजी भारत ने की और हमेशा की तरह ईशांत शर्मा कोई कमाल नहीं कर सके। अभी तक ईशांत ने टी-20 में 8 मैच खेले हैं और 4विकेट लिए हैं। हमारे पेसर में सबसे घटिया प्रदर्शन गर किसी का है तो वो ईशांत ही हैं। तेज गेंद डालने की फिराक में स्विंग भी हाथ से निकल रही है और विकेट भी हाथ में नहीं आरहे।

सबसे सफल गेंदबाज आरपी से अंतिम ओवर नहीं कराया गया क्यों? क्यों??

वहीं रवींद्र जडेजा को चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करने का मौका क्यों दिया गया? जहां पर जाकर जडेजा ने ३५ गेंद की मदद से सिर्फ २५ रन बनाए जिसमें १ ही चौका शामिल था। २०-२० के मुकाबले में १० गेंद खाली जाने का मतलब समझ सकता है कोई। चौथे नंबर पर सचिन, वेंगसरकर, अजहरुद्दीन, युवराज जैसे खिलाड़ी खेलते रहे हैं। ये वो क्रम है जिस पर टीम का पूरा दारोमदार होता है। युवराज हमेशा से ही इस नंबर पर खेलते रहे हैं और इस करो या मरो के मुकाबले में हमारे सबसे महत्वपूर्ण क्रम के साथ ही ये फेरबदल क्या सोच कर किया गया?

वैसे भी धोनी कहते रहे हैं कि टीम इंडिया दबाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन करती है, यदि ये बात सही थी तो फिर धोनी खुद क्यों दबाव में ठीक प्रदर्शन तक नहीं कर पाए। बाद में धोनी ने कहा कि वो दबाव में युवराज को नहीं भेजना चाहते थे। क्या नहीं लगता कि धोनी अपनी ही बातों से मुकरने लगे हैं। यदि धोनी चाहते तो जडेजा की जगह पर यूसुफ को भेज सकते थे।

खुद का प्रर्दशन हुआ धुंआ-धुंआ

ईशांत और आरपी बैटिंग में बिग जीरों हैं। ईशांत ने तो अब तक सिर्फ ३ रन बल्ले से बनाए हैं और ८ मैच में महज़ ४ विकेट लिए हैं।
आरपी सिंह को इरफान पठान की जगह खिलाया गया। आरपी ने प्रदर्शन भी सही किया महज ३ ओवर में १३ रन देकर १ सफलता भी ली। सबसे सफल गेंदबाज से अंतिम ओवर नहीं कराया गया क्यों? क्यों?? ईशांत और आरपी बैटिंग में बिग जीरों हैं। ईशांत ने तो अब तक सिर्फ ३ रन बल्ले से बनाए हैं। वहीं इरफान पठान बल्ले से तो ईशांत से काफी ठीक हैं। फिर क्यों ये फेरबदल किया गया।

ये कहानी रही दोस्तों की पर वहीं खुद के प्रदर्शन ने धोनी को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। आईसीसी वर्ल्ड २००९ में धोनी का प्रदर्शन-बांग्लादेश- 26 रन-21गेंद पर, आयरलैंड 14 रन-13 गेंद, वेस्टइंडीज 11 रन-23 गेंद, इंग्लैंड 30 रन-20 गेंद। करो या मरो मुकाबले में कप्तान क्रीज पर हो और टीम हार जाए। इसका क्या मतलब लगाया जाए? चौदहवें ओवर में मैदान पर पहुंच थे कप्तान तब जीत के लिए चाहिए थे ३९ गेंद पर 69 रन पर दो धुरंधर क्रीज पर थे और स्कोर नहीं पा सके, इतनी खराब बल्लेबाजी कि एक छक्का भी धोनी से नहीं लगा। एक कप्तान के लिए इससे शर्मनाक क्या हो सकता है कि उस के क्रीज पर रहते हुए मैच हार जाए। पर फिर भी ना तो बैटिंग ऑर्डर में फेरबदल की गलती मानी और ना ही टीम पर चढ़ी थकान।

चलते-चलते

इंग्लैंड की तरफ से बल्लेबाजी में बोपारा के ३७, पीटरसन के २७ गेंद पर ४६ रन, मैस्क्रेनेस ने नाबाद २५ रन बनाए। पर साथ ही भारत ने १६ रन एक्स्ट्रा दिए जिसमें १४ रन वाइड से गए। भज्जी ने ३, जडेजा ने २, आरपी और जहीर ने १-१ विकेट लिए। जिसमें आरपी से पूरा स्पैल भी नहीं कराया गया।
भारत की तरफ से नहीं चले रोहित और रैना। पता नहीं क्यों शॉट पिच बॉल से इतना क्यों घबराता है रैना, इंडीज के खिलाफ भी इसी तरफ आउट और इतने निर्णायक मैच में भी फिर से वही गलती। गंभीर टिके पर वो लय और आग नहीं दिखी जो दिखनी चाहिए थी। अंदर की राजनीति का शिकार गंभीर सिर्फ २६ रन पर अपना विकेट मैस्क्रेनेस के ओवर में ब्रोड के हाथों में देकर वापिस हो लिए। जडेजा ने अपना पूरा जोर लगा लिया पर गेंद ने उनके बल्ले को चूम कर बाउंडरी पार करने से मना कर दिया और धोनी के साथ मिलकर जडेजा ने टीम इंडिया को सेमीफाइनल की रेस से बाहर कर दिया। युवराज नहीं चाहते थे कि जडेजा के आउट होते ही उस खिलाड़ी के साथ साझेदारी करनी पड़े जिससे खट्टास मैदान और मैदान के बाहर दिखती है। पर हुआ ऐसा ही तो युवराज विकेट कीपर फोस्टर के ग्लब्ज से अपना स्टंप उखड़वाकर चलते बने। और फिर ना तो धोनी और ना ही यूसुफ पठान कुछ कर सके और भारत ने लगातार दूसरा मैच लॉर्ड्स में गंवा दिया।

मैच से एक दिन पहले युवी ने कहा था कि हम जानते हैं कि हमें कब अभ्यास करना है और कब नहीं ये आप मीडिया वालों से पूछकर हम फैसला नहीं करेंगे। हमने देख लिया युवी की आज युवराज नाम के उस सुपर फील्डर के पैर के नीचे से बॉल चली गई और वो फील्डर झुक कर बॉल रोक तक नहीं पाया। खूब मस्ती की गई है और आगे करोगे भी ये हम जानते हैं।

पर इतना याद रखो युवराज-धोनी, जब हॉकी टूटी थी और भारत की टीम ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाई थी तब कुछ चुनिंदा लोगों ने हॉकी में लग चुके जंग और गिल के तानाशाह रवैये को खत्म करने का बीड़ा उठाया था कहीं तुम्हार साथ भी ऐसा ना हो। होटल के कमरों में बंद चारदीवारी का सच जब तक अंदर है तब तक ही सुरक्षित है जिस दिन बाहर आगया तो वो तूफान तुमको यूं निगल जाएगा कि दुनिया को पता भी नहीं चलेगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, June 13, 2009

धोनी गलतियों का पिटारा मत बनो, एक ही हारे हो, राजनीति ना करो तो जीत सकते हो कप।

1983 में कपिल के रणबांकुरों ने इसी लॉर्ड्स के मैदान पर वेस्टइंडीज की धुरंधर टीम को मात देकर वर्ल्ड कप जीता था। उस दिन कपिल देव ने विवियन रिचर्डस का कैच लपका था आज उसी मैदान पर सिमोन्स ने उसी तरह गंभीर का कैच पकड़ा। सुपर 8 के अपने पहले ही मुकाबले में चैंपियन भारत हार गया। कप्तान धोनी की कप्तानी नहीं चली और ना ही काम आई युवराज की शानदार पारी। भारत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। फैसला तब गलत साबित होने लगा जब भारत के तीन बल्लेबाज महज 29 रन पर पवैलियन लौट गए। गौतम गंभीर 14 रन, रोहित शर्मा और सुरेश रैना 5 रन।

कप्तान-उपकप्तान से आस, पर कप्तान ने किया निराश

फिर क्रीज पर थे कप्तान और उप कप्तान। दोनों से टीम को बहुत उम्मीदें थीं। पर कप्तान धोनी बल्ले से कुछ भी कमाल नहीं दिखा सके और महज 11 रन बनाकर पवैलियन लौट गए। इन 11 रन को बनाने के लिए धोनी ने गेंद खेली 23 और इस 11 रन में धोनी किसी भी गेंद को बाउंड्री के पार नहीं पहुंचा सके। वहीं दूसरी तरफ मैच से पहले उपकप्तान बने युवराज सिंह ने लाज बचा ली। युवी ने 43 गेंद का सामना करते हुए 67 रन की पारी खेली। इस पारी में 6 चौके और 2 छक्के शामिल थे। एडवर्डस ने अपनी ही गेंद पर कैच लपककर युवी की पारी को समाप्त किया।

नहीं दिखा यूसुफ पठान का जलवा

यूसुफ पठान का जलवा वैसा नहीं दिखा जैसा आईपीएल में दिखा था। जैसी उम्मीद यूसुफ से थी उसके पासंग भी नहीं फटके यूसुफ मियां। कई बार सिर्फ बल्ला घुमाते नजर आए। जब पठान से उम्मीद थी कि वो 2-4 छक्के मार कर टीम के स्कोर को मजबूती की तरफ ले जाएंगे वहीं पर वो विफल रहे। 23 गेंद पर 31 रन जिसमें 3 चौके और 1 छक्का। इरफान भी कोई कमाल बल्ले से नहीं कर पाए। पर अंत में भज्जी ने हाथ जमाते हुए महज़ 4 गेंदों पर 3 चौकों की मदद से नाबाद 13 रन बनाए।
टीम इंडिया ने युवराज के आउट होने के बाद अंतिम 20 गेंदों पर सिर्फ 23 रन जोड़े जो कि हार का एक मुख्य कारण बने। वेस्टइंडीज की तरफ से ब्रावो ने 4 और एडवर्डस ने 3 विकेट झटके और किसी अन्य गेंदबाज को कोई भी सफलता नहीं मिली। भारत की पूरी टीम पर ये दो गेंदबाज ही भारी पड़े।

इंडीज की बैटिंग, शुरूआती झटके के बाद कमाल

154 रन का पीछा करते हुए वेस्टइंडीज को शुरुआत में ही इरफान ने फ्लेचर को आउट कर दिया। पर दूसरी तरफ गेल जमे रहे और भारत की मुश्किलें बढ़ाते रहे। यूसुफ पठान ने जब जहीर के हाथों केच लपकवाकर गेल को 22 के स्कोर पर आउट किया तो लगा कि टीम जीत सकती है पर ये दिन टीम इंडिया के लिए नहीं था। सिमोन्स और ब्रावो ने सारे गेंदबाजों को पीटा। ब्रावो ने सब गेंदबाजों को धुना। सिमोन्स को ओझा ने इरफान के हाथों कैच आउट किया। 5 चौकों की मदद से 37 गेंद पर सिमोन्स ने 44 रन बनाए। वहीं ब्रावो ने सिर्फ 36 गेंद पर शानदार नाबाद 66 रन बनाए, इसमें 4 चौके और 3 छक्के शामिल थे। ब्रावो बने मैन ऑफ द मैच। भारत की तरफ से भज्जी ने क्रिस गेल के सामने ओवर मेडिन डाला।

ना चला बल्ला, ना चली कप्तानी, कीपिंग में भी कांपे हाथ

बल्लेबाजी के ऑर्डर में फेरबदल, क्या होगया धोनी को? इस महत्वपूर्ण मुकाबले से ठीक पहले धोनी ने बल्लेबाजी क्रम में फेरबदल किया। अभ्यास मैच और लीग मुकाबलों में धोनी ने 3 नंबर पर बल्लेबाजी की, तो क्या वजह थी कि इस महत्वपूर्ण मुकाबले में धोनी ने फेरबदल किया और रैना को 3 नंबर पर भेजा। धोनी ने कीपिंग में भी गलती की। सिमोन्स को रन आउट करने का मौका धोनी ने गंवा दिया और साथ ही ब्रावो का कैच छोड़ना ये काफी भारी पड़ा। धोनी के दिमाग में क्या चल रहा है ये बता पाना तो मुश्किल है लेकिन उसकी बानगी देखने को मिली जब कि धोनी ने वीरू के जाने के बाद पूछा गया कि कौन हो टीम इंडिया का उपकप्तान। तो धोनी ने युवराज की जगह गंभीर का नाम लिया। ऐसा क्यों? क्या धोनी अपने ऊपर कोई भी सीनियर टीम में नहीं चाहते। पर अभी पूरा वर्ल्ड कप बाकी है धोनी यदि सब को साथ लेकर चलें तो ये कप हमसे कोई नहीं छीन सकता।

इस मैच की हार से ये भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्टेडियम में भारतीय प्रशंसकों का दिमाग इतना खराब हुआ कि उन्होंने भारत के खिलाफ वेस्टइंडीज के लिए नारे लगाने लगे। वैसे आज इस मैच को देखने के लिए वो शख्स भी लॉर्ड्स के स्टे़डियम में मौजूद था जिसे पूरा भरोसा है कि टीम इंडिया ये कप किसी और को नहीं लेने देगी। सचिन तेंदुलकर भी स्टेडियम में मौजूद थे शायद निराश होंगे कि भारत इतनी बुरी तरह से हार गया।


आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, June 10, 2009

उपकप्तान तो आउट, Now Mind it Captain Dhoni

आईपीएल सीजन-2 में जब-जब दिल्ली डेयरडेविल्स का मुकाबला किसी टीम से होता तो हर बार चर्चा का विष्य होते वीरू और गंभीर, हर बार बोला जाता कि पता नहीं क्या हो गया है हमारी सलामी जोड़ी को। बार-बार ये दुआ की जाती रही कि दोनों ओपनर फॉर्म में आजाएं। पर किसी को क्या पता था कि सहवाग की जिस तूफानी पारी का इंतजार सभी को था वो इस वर्ल्ड टी-20 में हम नहीं देख पाएंगे। कंधे की चोट सहवाग को इंग्लैंड से सीधे ऑपरेशन टेबिल पर ले गई। अब लगभग दो महीने के लिए तो वो टीम में वापसी नहीं ही कर सकते। सच लग रहा है कि हमारी इस सलामी जोड़ी को कहीं ना कहीं तो नजर लग गई है।

सहवाग को चोट इतनी बुरी लगी कि वो बल्ला तक ठीक से नहीं पकड़ पा रहे थे। प्रैक्टिस सेशन के दौरान वीरू को कंधे में चोट लगी थी। वैसे यदि देखें तो ये सहवाग के लिए ये वक्त किस बुरे सपने से कम नहीं है। दो महीने बाद 31 साल के सहवाग के लिए वापसी कोई आसान बात नहीं होगी। लेकिन ये बात तो सही है कि इस खबर से उन धुरंधर गेंदबाजों ने राहत की सांस ली होगी जिनको वीरू के खिलाफ गेंदबाजी करनी होती थी।

जब सहवाग को इतनी गहरी चोट लगी हुई थी तो बोर्ड ने ये बात छुपा के क्यों रखी। क्यों बोर्ड ये बताने से कतराता रहा कि वीरू पूरी तरह से फिट नहीं हैं? इसका खामियाजा पूरी टीम को उठाना पड़ा। धोनी और वीरू के बीच की खाई बढ़ती चली गई और फिर वो इतनी बढ़ी कि धोनी ने पूरी टीम की एकता परेड करा दी जो कि अब तक दिखावा थी या एकता ये समझ में नहीं आपाई है। वहीं दूसरी तरफ जब धोनी से मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वीरू के खेलने के बारे में पूछा गया तो धोनी का जवाब था 'नो कमेंट', बोर्ड से पूछें। थोड़ी ही देर में बीसीसीआई ने एक प्रेस रिलीज जारी किया जिसमें वीरू को पूरे वर्ल्ड टी-20 से चोट के कारण आउट कर दिया गया।

वैसे सहवाग की जगह पर दिनेश कार्तिक को इंग्लैंड भेजा जा रहा है। कार्तिक के जाने से भारत के लिए दूसरे कीपर की समस्या भी खत्म हो गई। और जहां तक सवाल है रोहित शर्मा का तो रोहित ने सहवाग की जगह पर ओपनर के रूप में पहले दो अभ्यास मैच में न्यूजीलैंड के खिलाफ 31, पाकिस्तान के खिलाफ 80 और पहले मैच में बांग्लादेश के खिलाफ 36 रन बनाए थे।

टीम इंडिया के लिए वीरू का जाना एक बहुत बड़ा झटका है। अभी तक भले ही सहवाग की कमी नहीं अखरी हो पर जैसे-जैसे टूर्नामेंट अपने अंजाम तक पहुंचता रहेगा टीम को वीरू की कमी खलेगी। वीरु का जाना धोनी के लिए किसी कड़े इम्तिहान से कम नहीं है। धोनी को उपकप्तान की गैर मौजूदगी में अपनी रणनीति फिर से बनानी होगी। साथ ही क्या रोहित और युवराज मिलकर भी सहवाग की खाली जगह को भर पाएंगे? ये सवाल धोनी के लिए एक पहेली जरूर रहेगा।


आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 4, 2009

भारत ने पाकिस्तान को धो डाला, 20-20 में जमाई पाक पर जीत की हैट्रिक

पूर्व टी-20 चैंपियन भारत अपना पहला अभ्यास मैच न्यूजीलैंड से हार चुका था। लेकिन दूसरे अभ्यास मैच में अभ्यास अच्छा हुआ। पाकिस्तान के साथ इस अभ्यास मैच में फील्डिंग छोड़ कर भारत का स्तर एक चैंपियन की तरह ही दिखा।
पाकिस्तान ने टॉस जीत कर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। मैच की शुरुआत में तो लगा कि पाकिस्तान इस बार कुछ गजब कर के ही मानेगा। लेकिन पहले ही ओवर में प्रवीण कुमार ने ओपनर हसन को बिना खाता खोले क्लीन बोल्ड कर दिया। भारत के प्रशंसकों में खुसी की लहर दौड़ गई। पर दूसरे ओवर से चौथे ओवर तक खुश होना पाकिस्तान के खेमे में लिखा था। कामरान अकमल के साथ 17 साल के अहमद शहजाद ने हर ओवर की गेंदों को बाउंडरी पार पहुंचाना शुरू कर दिया। देखते-देखते महज चार ओवर में पाक का स्कोर 45 पहुंच गया।
अब खुश होने की बारी भारत की थी। कामरान अकमल को रैना ने शानदार फील्डिंग का नमूना दिखाते हुए रन आउट कर दिया। पांचवें ओवर में ही ईशांत की आखरी गेंद पर शहजाद ने लंबी शॉट खेलने में चूक कर दी और फिर रैना ने एक आसमान चूमती गेंद को लपककर पाक खेमें में सनसनी फैला दी। पर अभी तो कहर बाकी था। अगले ओवर में पठान की पहली ही गेंद पर कप्तान धोनी ने शानदार कैच लपककर शाहिद आफरीदी को बिना खाता खोले पवैलियन लौटा दिया।
कप्तान यूनिस खान और शोहेब मलिक ने टीम को संभालने की कोशिश की पर मलिक ने ओझा की एक गेंद में चूक कर दी और धोनी ने कोई गलती नहीं की। यूनिस खान ने कुछ शानदार शॉट खेले पर हरभजन सिंह की फिरकी में फंस कर वो क्रीज से नहीं निकलना चाहते हुए भी आगे निकल आए और धोनी ने वापसी का मौका नहीं दिया। मिसबाह और यासिर अराफात ने मिलकर स्कोर को 113 से 158 तक पहुंचा दिया वो भी सिर्फ 25 गेंदों में। भारत के सामने जीत का लक्ष्य था 159।
भारत बिना सहवाग के खेल रही थी। तो ओपनिंग की बागडोर संभाली रोहित शर्मा और गंभीर ने। शुरूआत से ही दोनों ने हाथ दिखाने शुरू कर दिए। गेंदबाज ये समझने में दिक्कत महसूस करने लगे कि गेंद डालें तो कहां? इस मैच में रोहित शर्मा ने ही गेंद को हवा में बाऊंड्री के पार पहुंचाया। रोहित ने महज 53 गेंदों में 80 रन बनाए जिसमें 9 चौके और दो शानदार छक्के शामिल थे। आमेर ने शहजाद के हाथों 16वें ओवर में भारत के 140 के आंकड़े पर रोहित को कैच आउट करवा दिया। तब भारत को जीत के लिए 18 रन की दरकार थी। जिसे गंभीर और धोनी ने मिलकर 18 गेंद रहते ही हासिल कर लिया। गंभीर ने 5 चौकों की मदद से 47 गेंद पर 52 रन बनाए और वो धोनी के साथ अंत तक नाबाद रहे। आखिर एक ओपनर तो फॉर्म में लौटा।
20-20 फॉर्मेट में ये भारत की पाकिस्तान पर लगातार तीसरी जीत थी।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, March 9, 2009

सचिन ने पूरा किया अपने चाहने वालों का अरमान

जब ये सीरीजी शुरू हुई तो सबसे पहले मैंने इस बात पर ही जोर दिया था कि क्या सचिन पूरा कर सकोगे अपने चाहने वालों के अरमान? थोड़ी-थोड़ी उम्मीद थी और थोड़ी-थोड़ी नहीं भी। पर सचिन एक महान बल्लेबाज की तरह पूरे मैच में खेले और उस अधूरे काम को पूरा कर दिया जिसे वो बहुत पहले से करना चाहते थे। न्यूजीलैंड में शतक मारने के सपने को सचिन ने सच कर दिखाया। वैसे भारत ने अपनी पारी में मारे 18 छक्के जो कि किसी भी पारी में मारे गए छक्कों के बराबर है।
न्यूजीलैंड ने टॉस जीतकर की फील्डिंग।
क्राइस्टचर्च में भारत ने अभी तक ५ वन डे खेले थे और एक भी नहीं जीता था। 6ठे वन डे में भारत क्राइस्टचर्च में जीत की दरकार के साथ फील्ड पर उतरा। डेनियल विटोरी की पत्नी प्रेग्नेंट हैं तो विटोरी अपनी पत्नी के पास रहे पर मैच में बीच-बीच में दिखते रहे। इस लिए आज मैच की कप्तानी पहली बार मैक्कुलम ने की और टॉस जीतकर विटोरी के ना होने पर पहले फील्डिंग चुनी। पर मैक्कुलम को क्या पता था कि उनकी कप्तानी में रिकॉर्ड बनने वाला है न्यूजीलैंड में न्यूजीलैंड के खिलाफ सबसे ज्यादा रन। शुरुआत में लगा कि मैक्कुलम का ये फैसला टीम के लिए सही साबित हुआ जब कि सहवाग महज 3 रन बनाकर एक सीधी गेंद को छोटी बाउंडरी से बाहर पहुंचाने के चक्कर में मिस कर गए और क्लीन बोल्ड हो गए। भारत ने अपना पहला विकेट 15 के स्कोर पर खो दिया। फिर गंभीर ने सचिन का साथ दिया और सचिन अपनी लय में खेल रहे थे। तभी गंभीर 15 के निजी स्कोर पर बटलर का शिकार बने। भारत के स्कोरबोर्ड पर 13 ओवर में 65 रन हो चुके थे पर 2 विकेट भी खो दिए थे।
सचिन-युवराज की जोड़ी ने क्राइस्टचर्च में मचाया कोहराम।
युवराज आते के साथ ही सचिन के साथ टीम का स्कोर आगे बढ़ाने में लगे। तीसरे विकेट के लिए दोनों के बीच 132 रन की पार्टनरशिप हुई। इसमें युवराज ने 60 गेंदों में 87 रने बनाए। जिसमें 10 जानदार चौके और 6 शानदार छक्के शामिल थे। इस से आप हिसाब लगा सकते हैं कि युवराज ने चौके-छक्के से ही 76 रन बनाए सिर्फ 11 रन दौड़कर लिए। इस बीच सचिन युवराज का साथ देते रहे और स्ट्राइक ज्यादा से ज्यादा युवी को देते रहे और दर्शक सचिन के कलात्मक खेल का लुत्फ लेते रहे। भारत का स्कोर तब 203 था जब 145 की स्ट्राइक रेट से बैटिंग कर रहे युवराज 30 ओवर में एलियट की दूसरी गेंद का शिकार बने, सिर्फ 13 रन से शतक से चूके पर सबको बता दिया कि फॉर्म में आ चुका हूं।
सचिन रिटायर्ड हर्ट।
युवराज के बाद कप्तान धोनी 5वें नंबर पर बैटिंग करने उतरे। युवराज के जाने के बाद ऐसा लग रहा था जैसे सचिन ने युवराज की जगह ले ली है और भारत के स्कोर को तेजी से बढ़ाने लगे। सचिन ने मैदान के हर कोने में स्ट्रोक खेले। पर कप्तान और सचिन के बीच की साझेदारी 135 रन की ही हो सकी। लेकिन इस बीच सचिन काफी देर से एक दिक्कत से गुजर रहे थे। सचिन के पेट की मसल खिंच चुकी थी जिसे की वो काफी देर से दबा कर खेल रहे थे। पर अब बात बढ़ चुकी थी। सचिन दोहरे शतक से सिर्फ 37 रन दूर थे तब वो मैदान से बाहर आगए।
सचिन की इस पारी के लिए न्यूजीलैंड के कप्तान मैक्कुलम ने कहा कि, 'मैंने ऐसी पारी काफी कम देखी हैं। हर शॉट उनके बल्ले के मिडल से गया।' इस शानदार पारी के लिए सचिन को मैन ऑफ द मैच मिला।

रैना बने रनमशीन।
18 गेंदें, 38 रन, 5 छक्के। ये था रैना का आंकड़। इस पूरी सीरीज में रैना ने कमाल की बैटिंग की है। पहले वन डे में भी रैना ने 5 चौके और 4 छक्के लगाए थे। जब भारत का स्कोर 382 पहुंचा तो धोनी 5 चौके और 2 छक्कों की मदद से 68 रन पर मिल्स की गेंद का शिकार बने। लेकिन तब तक भारत की तरफ से क्राइस्टचर्च के पांच नायक काम कर चुके थे। भारत ने न्यूजीलैंड के सामने रखा 393 का लक्ष्य। ये न्यूजीलैंड में किसी भी टीम का सर्वाधिक स्कोर था।

भारत को मिली कड़ी टक्कर।
राइडर और इस मैच के लिए कप्तान बने मैक्कुलम ने बताया कि वो भी दम रखते हैं। राइडर ने शुरू से समझदारी से बैटिंग की और साथ ही मैक्कुलम को जब भी कहीं रन लेने का मौका मिला वहां पर उन्होंने रन चुराया। शुरूआत में भारत की फिल्डिंग अप टू डेट नहीं थी और कई बार मिस फिल्डिंग हुई और इस का फायदा न्यूजीलैंड के ओपनरों ने खूब उठाया। पूरा ओवर ठीक पड़ता लेकिन दो गेंद गलत हुई नहीं कि जितने की दरकार थी उनको वो रन निकालते। दोनों ओपनर गेंदबाजों के पास उन दोनों बल्लेबाजों का तोड़ नहीं मिल रहा था। गेंदबाजों को बदला गया लेकिन फिर भी कोई भी फायदा नहीं हुआ और न्यूजीलैंड ने 50 फिर 100 और फिर 150 रन बिना विकेट खोए बना लिए। फिर एक छोटी सी चूक और रैना की फुर्ती ने मैक्कुलम को रन आउट कर दिया और यहां से गेम पलट गया। मैक्कुलम ने 71 रन बनाए जिसमें 6 चौके और 3 छक्के शामिल थे। पहला विकेट 166, दूसरा 179, तीसरा 182, चौथा 188, पांचवां 203, छठा विकेट 217, सांतवा 218 यानी कि इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिर्फ 52 रन के अंदर 7 खिलाड़ी न्यूजीलैंड ने खो दिए। बाकि तो कुछ नहीं कर पाए लेकिन राइडर को भज्जी ने आउट किया जब कि राइडर 105 पर खेल रहे थे जिसमें 12 चौके और 4 छक्के लगाए थे।
आंठवें विकेट के लिए 83 रन की साझेदारी ने भारत के लिए एक बार तो मुश्किल खड़ी कर दी थी। लग ये रहा था कि कभी भी ये मैच भारत के हाथ से निकल सकता है। यहां पर विटोरी की कमी न्यूजीलैंड को और भारत को ईशांत शर्मा की कमी खली। सबसे ज्यादा खेल के लिहाज से गलत ये हुआ कि जब भारतीय टीम को विकेट नहीं मिल रहे थे तब मुनाफ पटेल ने दो लगातार बीमर डाल दी जिसके कारण अंपायर ने उन्हें बॉल करने से मना कर दिया। पर फिर एक विकेट यूसुफ और दूसरा विकेट प्रवीण कुमार ने लेकर न्यूजीलैंड की टीम की पारी समाप्त कर दी।
कुछ दिलचस्प जानकारी
इस मैच की दोनों पारियों में 726 रन बने जो कि दूसरा एक मैच में सबसे ज्यादा स्कोर रहा। सचिन को 58वीं बार मैन ऑफ द मैच का खिताब मिला जो कि सबसे ज्यादा है। दोनों पारियों में लगे 31 छक्के जो कि अपने में एक रिकॉर्ड है। भारत ने लगाए एक पारी में 18 छक्के जो कि रिकॉर्ड की बराबरी है।
पर कुछ भी हो सचिन ने अपने चाहने वालों का अरमान पूरा तो कर ही दिया।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, March 4, 2009

न्यूजीलैंड में भारत जीता, पाकिस्तान में क्रिकेट हारा।

ट्वेंटी-20 सीरीज हारने के बाद धोनी और धोनी की टीम के लिए पहला वन डे बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने था। धोनी के लिए फिर टॉस अच्छा रहा, और टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला। ओपनर के रूप में जैसा कि सोचा जा रहा था वो ही हुआ सहवाग के साथ गंभीर नहीं सचिन ही थे। सचिन से लोगों को काफी उम्मीदें, सचिन ने जमने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ सहवाग अपने रंग में आ चुके थे। जहां सहवाग अर्ध शतक के नजदीक थे वहीं सचिन अभी डबल फिगर को छू ही पाए थे।

सचिन ने भी अपने हाथ दिखाए और दो शानदार चौके लगाए। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं, फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सचिन से सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल की रफ्तार और हवा से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
जिसकी उम्मीद थी बिल्कुल उससे हटके हुआ। जहां लोग सोच रहे थे कि लेफ्ट-राइट का कॉम्बिनेशन देने के लिए कोई लेफ्टी आएगा याने कि सबसे सफल जोड़ी फिर होगी क्रीज पर, पर ऐसा हुआ नहीं। लोगों और मीडिया की खरी-खरी सुनने के बाद अपना पसंदीदा नंबर 7 छोड़ कप्तान धोनी 3 नंबर पर बैटिंग करने पहुंचे। अपने इस निर्णय को साबित करने के लिए धोनी ने धीमे और सधी शुरुआत करी। वहां वीरू का बल्ला बोल रहा था। अब तक वीरू 56 गेंदों पर 11 चौके और 1 छक्के की मदद से 77 रन बना चुके थे। विटोरी की गेंद पर एक लाजवाब शॉट सहवाग ने खेली और सर्कल के अंदर खड़े टेलर ने उससे भी शानदार कैच लपक वीरू की शानदार पारी पर ब्रेक लगा दी। चौथे नंबर पर टीम के युवराज आए और
कप्तान के साथ दूसरे रन के फेर में पड़कर पवैलियन की राह पर निकल लिए। अब टी-20 के स्टार सुरेश रैना की बारी थी। 20-20 के क्रम को आगे बढ़ाते हुए रैना ने मैदान के हर कोने में बॉल पहुंचाई और शानदार 4 छक्के और 5 चौंकों की मदद से महज 39 गेंदों पर 66 रन बनाकर छक्के मारने के प्रयास में एलिट की गेंद पर ब्रायन को कैच थमा बैठे। वहीं दूसरे छोर पर कप्तान ने पारी संभाल रखी थी। अब धोनी का साथ देने क्रीज पर आए यूसुफ पठान आए और 10 गेंदों पर 1 छक्के और 2 चौकों की मदद से 20 रन बनाए। धोनी की इस समझदारी भरी पारी में सिर्फ ६ चौकों की मदद से 89 गेंदों पर 84 रन बनाए। न्यूजीलैंड के सामने 7.20 की औसत के साथ लक्ष्य 38 ओवरों में 274 रहा।
वैसे, इस बीच न्यूजीलैंड में झमाझम बारिश होने लगी और पाकिस्तान में श्रीलंका टीम की बस पर दनादन फायरिंग। पाकिस्तान में दूसरे टेस्ट के साथ-साथ दौरा भी खटाई में पड़ गया। खेल और क्रिकेट के इतिहास का काला दिन। वहीं दूसरी तरफ न्यूजीलैंड में बारिश के कारण पहला वन डे के ओवर कम कर दिए गए, मैच 38-38 ओवरों का हो गया।
इरफान की जगह टीम में आए प्रवीण कुमार ने बिना खाता खोले न्यूजीलैंड को दूसरे ओवर में ही पहला झटका मैक्कुलम के रूप में दिया। न्यूजीलैंड की तरफ से टी-20 का सितारा अस्त हो गया था। दूसरा विकेट भी प्रवीण कुमार की झोली में गया। गुप्टिल और टेलर जब खेल रहे थे तो लग रहा था कि औसर रन रेट तो बढ़ता जा रहा है पर फिर भी यदि ये दोनों टिके रहे तो मैच को कभी भी पलटने की काब्लियत रखते हैं। १६वें ओवर में यूसुफ पठान ने घातक होते टेलर को सचिन के हाथों कैच करवाकर न्यूजीलैंड की मुसीबत और बढ़ा दी। एलिट को सहवाग के सपाट थ्रू ने रन आउट कर दिया और बारिश शुरू हो गई।
डकवर्थ लुईस नियम को लागू किया गया और फिर जो टार्गेट न्यूजीलैंड के सामने था वो लगभग नामुमकिन सा ही था। 43 गेंद पर 111 रन। जब चौथा विकेट गिरा था तो न्यूजीलैंड को 102 गेंद पर 163 रन चाहिए थे और उनके हाथ में 6 खिलाड़ी थे।
जब मैच शुरू हुआ तो स्कोर को आगे बढ़ाने के कारण ओरम युवराज का शिकार बने। अब लगने लगा कि यदि गुप्टिल का विकेट भारत कैसे भी झटक ले तो फिर पूरी तरह मैच भारत के पक्ष में हो जाएगा। और हुआ भी कुछ यूं ही, पर अब बारी थी भज्जी की। चार गेंद पर भज्जी ने 3 विकेट झटक लिए। सबसे पहले गुप्टिल, फिर ब्रूम और फिर मिल्स को आउट कर न्यूजीलैंड की हार में चारों तरफ कील ठोंक दी। कहां एक समय 132 पर 5 विकेट थे वहीं 9 विकेट भी होगए। अब बस खानापूर्ति ही शेष रह गई थी। और भारत ने पहला वन डे 53 रन से डकवर्थ लुईस नियम से जीत लिया। मैन ऑफ द मैच चुने गए टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी।

जब टीम इंडिया बैटिंग कर रही थी तब ये खबर फैल चुकी थी कि श्रीलंका की टीम पर हमला हो गया है। और दोनों टीमों ने हाथ पर काली पट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज कराया। धोनी ने कहा कि अच्छा हुआ कि भारतीय टीम ने पाकिस्तान का दौरा नहीं किया और शायद ही अब कोई भी खिलाड़ी पाकिस्तान में जाकर खेलना पसंद करेगा।
पर सच तो ये है कि पाक में पनपे आतंक के सच से खुद पाकिस्तानियों को लड़ना होगा और क्रिकेट को जिंदा रखने के लिए तालिबानी ताकतों के सामने घुटने नहीं टेकने होंगे। फिल्म के बाद अब इन दहशतगर्दों के निशाने पर है क्रिकेट पर आतंक से तो लड़ना होगा ही।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)

Wednesday, November 19, 2008

नंबर 1 टीम मैन है एम एस धोनी

सौरव गांगुली ने कहा था कि धोनी के पास वो एक्स्ट्र लक है जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत एक कप्तान को होती है। एम एस धोनी के हाथों में कप्तानी की बागडोर देकर कुंबले को भी अच्छा लगा होगा और सौरव को भी ये देखकर अच्छा लगा होगा कि जो स्पार्क टीम इंडिया को उन्होंने दिया था वो वैसा ही है।
महेंद्र सिंह धोनी को शायद ही कोई खिलाड़ी इस पूरे नाम से कभी बुलाता हो वर्ना वो सबके लिए धोनी या फिर माही है। टीम क्या पूरे भारत और क्रिकेट जगत के लिए धोनी को इन दो नामों से ही जाना जाता है। धोनी इस समय बल्लेबाजी में वन डे रैंकिंग में 784 अंकों के साथ नंबर 1 पर हैं। मेरी नजर में वो नंबर 1 बल्लेबाज ही नहीं हैं बल्कि नंबर 1 कप्तान भी हैं और यहां तक पहुंचने के लिए धोनी का जोश में होश ना खोना ही सबसे अहम है।
शायद कोई सोच भी नहीं सकता कि धोनी के पास विकेट के पीछे से दुश्मन पर दांव चलाने का हुनर है। नागपुर टेस्ट का दूसरा दिन, पहली पारी में भारत के पास 441 रन का बड़ा स्कोर था और दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक ऑस्ट्रेलिया ने 189-2 बना लिए थे। मैच के तीसरे दिन आस्ट्रेलिया अपनी पारी दो विकेट पर 189 रन से आगे बढाने उतरा। धोनी ने पहले ही सोच रखा था कि पहले सत्र तक उन्हें क्या करना है और पूरे उस सत्र में महज 42 निकले वो भी पूरे 24 ओवर में। धोनी ने नई रणनीति बनाई मैदान की 8 खिलाड़ी आफ साइड में औऱ सिर्फ 2 फील्डर आन साइड में रखे थे और गेंदबाजों को बोल दिया कि गेंद सिर्फ आफ स्टंप के बाहर रखो। हसी औऱ कैटिच लगातार ऑफ स्टंप के बाहर की गेंदों को खेलते-खेलते उकता गये। तमाम क्रिकेट पंडित धोनी को कोस रहे थे लेकिन धोनी जानते थे कि वो क्या कर रहे हैं, उन्हें सिर्फ अपना मकसद दिख रहा था। नतीजा ये रहा कि जो टीम 2 विकेट पर 189 रन बटोर चुकी थी वो अगले 166 रनों में बाकी आठ विकेट गंवा बैठी।
दूसरी पारी में भी धोनी ने तेज औऱ फिरकी गेंदबाजों को बड़ी सूझबूझ से लगाया। दूसरी पारी में कंगारू 50वें ओवर में मैच छोड़ चुके थे। इस दौरान सिर्फ भज्जी ही एक ऐसे गेंदबाज थे जिन्होंने 19 ओवर तक फेंके वर्ना सब ने बराबर के लगभग ही ओवर डाले थे। मैथ्य़ू हेडन भज्जी की गेंदो को बार-बार बाउंड्री के बाहर भेज रहे थे। लेकिन धोनी ने भज्जी को हटा कर अपने मंसूबों पर पानी नहीं फेरा। और फिर भज्जी की एक गेंद ने हेडन को गच्चा दे दिया औऱ फिर तो कंगारु मैच को पकड़ सकने में भी कामयाब नहीं रह पाए। टीम इंडिया ने 2-0 से कंगारुओं को सीरीज में मात देकर जो इतिहास रचा है उसे जब-जब याद किया जायेगा माही का जिक्र जरुर आयेगा।
वैसे गर देखें तो धोनी टीम मैन है। कुंबले को कंधे पर उठाने का हौसला बहुत ही कम दिखा सकते थे। जब सीरीज की ट्रॉफी दी जा रही थी तो धोनी ने कुंबले को साथ लेजाकर, कुंबले को ये सम्मान दिया कि जिसे खुद कुंबले के साथ-साथ सब याद रखना चाहेंगे। धोनी ने ये ही काम श्रीलंका में भी किया था। वहीं दूसरी तरफ सौरव गांगुली अपना अंतिम मैच खेल रहे थे और धोनी ने दादा से अंतिम मैच के अंतिम क्षणों में कप्तानी देकर एक ऐसा काम किया जो शायद कोई और नहीं कर पाता और दूसरों के लिए एक मिसाल भी रख दी। और जब-जब इन दोनों सितारों के संन्यास की बात आएगी तब धोनी का नाम हमेशा आएगा।
अब इंग्लैंड के साथ भी माही का जुझारुपन दिख रहा है। साथ ही टीम मैन वाली बात भी हमेशा सामने आती है। बाइक मिली युवराज को धोनी ने पूरे मैदान में खुद युवराज का सारथी बनकर घुमाई। इसी जज्बे के साथ धोनी और धोनी की टीम जिसने २०-२० वर्ल्ड कप जीता था अभी तक इंग्लैंड से इस सीरीज में २-० से आगे हैं। धोनी को मछ्ली की आंख दिख रही है हम भी चाहेंगे कि धोनी अपने लक्ष्य से ना भटके।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, August 28, 2008

टीम इंडिया ने रच दिया इतिहास

भारत ने पहली बार वन डे में श्रीलंका से श्रीलंका में सीरीज जीती है। 23 साल भारत ने रचा है इतिहास। अब तक श्रीलंका के साथ भारत ने श्रीलंका में 5 सीरीज खेली हैं जिसमें से दो श्रीलंका के नाम और दो ड्रॉ रही हैं। पांचवीं सीरीज पर कब्जा जमाकर भारत ने रच दिया इतिहास। ये दो देशों के बीच की सीरीज थी वैसे कई और टूर्नामेंट भारत ने श्रीलंका में अपने नाम पहले किए हैं। लेकिन दो देशों की सीरीज में पहली बार भारत को ये गौरव हासिल हुआ।
इस जीत में सबसे बड़ा योगदान सुरेश रैना और कप्तान धोनी का रहा। सुरेश रैना को शानदार बल्लेबाजी और दो सुपर कैचों के लिए मैन ऑफ द मैच चुना गया। सुरेश रैना ने जबरदस्त 76 रन का योगदान दिया मात्र 78 गेंद में। जिसमें 6 चौके और एक शानदार छक्का शामिल था। कोहली के साथ मिलकर रैना ने दो विकेट के बाद टीम को संभाला। कोहली 7 चौकों की मदद से 54 रन बनाने के बाद तुषारा का शिकार बने। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने कप्तानी पारी खेली। रैना के साथ मिलकर 143 रन की साझेदारी ने भारत की नैया पार लगा दी। धोनी ने 80 गेंद पर 71 रन का योगदान दिया। भारत ने श्रीलंका के सामने 259 का लक्ष्य रखा। इस बीच श्रीलंका के लिए सिर्फ एक खुशखबरी थी कि चमिंडा वास ने युवराज का विकेट चटकाकर 400 विकेट पूरे किए। तुषारा ने कमाल की गेंदबाजी की और 5 विकेट झटके।
जयशूर्या ने आते के साथ ही हाथ दिखाने शुरू कर दिए। ऐसा लग रहा था कि वो जल्दी से जल्दी मैच जीतने की फिराक में हैं। पर मुनाफ ने दूसरे छोर पर खड़े बर्नापुरा का विकेट झटक लिया। पटेल ने संगकारा का भी विकेट झटक लिया। फिर तो कप्तान जयवर्द्धना की कोशिशें भी श्रीलंका को हार से नहीं बचा पाई। थोड़ी बहुत कोशिश तुषारा ने की पर जहीर खान की गेंद पर रैना ने शानदार कैच लपक भारत की जीत पर मुहर लगा दी। भज्जी ने फिर गेंद से कमाल दिखाया 3 विकेट झटके।
धोनी ने दिखा दिया की वो एक शानदार कप्तान हैं। पहला वन डे हारने के बाद धोनी ने मेंडिस की तारीफ की थी और फिर दूसरे मैच से उसे धोनी ने पढ़ लिया। पूरी टीम को दिया मूलमंत्र 'पीटो मेंडिस को, मारो मुरली को'। रणनीति कामयाब रही और टीम पर छाया एम फेक्टर का खौफ खत्म हो गया। हम सीरीज जीत चुके हैं और साथ ही अब चयनसमीति ये सोचने पर मजबूर होगई है कि क्या धोनी को टेस्ट टीम की भी कप्तानी दे देनी चाहिए? वैसे हर जगह आवाज़ उठ चुकी है।


आपका अपना
नीतीश राज

Monday, July 7, 2008

‘MIND IT, MR. DHONI’



क्या हुआ धोनी जी, फिर फाइनल फिसल गया? कोई कटाक्ष नहीं कर रहा हूं मैं आप पर। लेकिन ये क्या बत्ती क्यों बुझ गई फाइनल में? इस मैच को खेलते हुए सोचा भी था कि ऐसा होगा, हार हाथ लगेगी। जिस विपक्षी टीम के 12 ओवर में 4 खिलाड़ी सर झुकाए वापस पवेलियन लौट गए हों, वो १०० रन से हरा देगी। उनके खिलाड़ी आउट होने पर आप बहुत खुश थे। चेहरे से साफ झलक रहा था कि मन ही मन आप कह रहे हों कि भई इस फाइनल में तो बत्ती गुल नहीं हो पाएगी लेकिन अफसोस, गलत जवाब, बत्ती गुल होगई। सोचा होगा चलो कि जीत गए तो भी अच्छा, नहीं जीते तो भी। तब भी आप मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे जब मुल्तान के सुल्तान सहवाग (जो पाकिस्तान में करिशमा ही दिखा देते हैं) बल्ले से आग बरसा रहे थे। मैंने ऊपर ‘नहीं जीते तो भी’ इस लिए लिखा क्योंकि नहीं जीतने पर सारा ठीकरा ‘ज्यादा खेल, कम आराम’ पर फोड़ने वाले हैं? लेकिन जो भी हो, यहां भी आप की टीम फाइनल तक पहुंची ये काबिलेतारीफ है।
धोनी, लेकिन अब ये वक्त आगया है कि आप सोचें कि गलती कहां है? सीरीज के सभी मैच अच्छे खेले जाते हैं. फिर फाइनल को क्यों इतना हौवा मानकर खिलाड़ी, अपना बेहतरीन नहीं दे पा रहे हैं। या आप को अपनी सोच में कुछ परिवर्तन लाना होगा। क्या कारण है, भारत को गेंद और बल्ले दोनों से इतना अच्छा स्टार्ट मिला लेकिन हम उसे कैश नहीं कर पाए। हमने शुरुआत में गेंद से कमाल दिखाया। १२ ओवर में ही ४ खिलाड़ियों का पत्ता काट दिया और वो भी मात्र ६६ के स्कोर पर। माना कि डेंजर मैन तब भी क्रीज पर था। वो पूरे मैच का रुख बदलने के लिए अकेला ही काफी है और शायद ये ही हुआ भी। पर हमें ये याद रखना होगा कि सनथ का कैच ५६ रन के स्कोर पर आरपी सिंह ने छोड़ दिया था, जो कि बहुत महंगा पड़ गया। पांचवें विकेट के बीच १३१ रन की साझेदारी हुई। डेंजर मैन अपना काम करके जा चुका था। फिर भी २७३ का लक्ष्य अंतिम के पुछल्लों ने दिया वो काफी होता है। यदि २५० का भी टार्गेट मिलता तो भी दबाव में हम कुछ सोचा सकते थे।
हम सही खेल रहे थे, जहां तक बल्ले का सवाल आता है। ४२ गेंदों पर हमारे ५० रन हो चुके थे। गंभीर की वापसी हो चुकी थी। सहवाग २६ गेंदों पर ५० बना चुके थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि हम १०० रन से हार गए। फाइनल में इस तरह घुटने टेकना अच्छा नहीं लगता। वहीं, यदि दूसरी तरफ देखें ५९ वीं गेंद पर श्रीलंका ने अपने ५० रन पूरे किए थे और उनके दो खिलाड़ी आउट भी हो चुके थे। लेकिन ऐसा क्या हुआ जो मैच हम....।
अब जो दूसरी बात समझ आती है, इन हारों से बचने के लिए, घर आकर फाइनल के लिए पूजा पाठ कीजिए। दूसरों के बारे में कुछ भी बोलने से पहले जरा सोचिए। आपका फाइनल का सितारा बुझा हुआ है उसे जलाने के लिए हवन करवाएं। एंड....माइंड इट धोनी......बैटर....माइंड इट।
आपका अपना,
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”