Showing posts with label Terrorist. Show all posts
Showing posts with label Terrorist. Show all posts

Wednesday, April 8, 2009

पढ़ना तो पूरा पढ़ना, वर्ना मत पढ़ना।

‘समीर लाल जी आपकी फरमाइश’

जब भी कभी टूर से वापस लौटता तो अकसर दोस्त-यार मुझसे पूछते हैं कि क्यों कैसा रहा? हमेशा की तरह जवाब होता, बस दुआ है। पर इस बार हाल पूछने पर, ना मालूम मेरे मुंह में इन शब्दों का अकाल क्यों पड़ गया? हर बार इस जवाब को मैं टालता जा रहा था, पर जब मेरे अपनों ने मेरे दिल में छुपी आवाज़ को बाहर निकालने के लिए आवाज़ लगाई तो सोचा कि जुबानी नहीं, अल्फाज के जरिए सब को बता दूं कि आखिर मेरे अंदर कि वो आवाज़ किस तरह जख्मी पड़ी है, जो मुझे लगातार, हर वक्त, मुझे खुद से जुदा किए जा रही है।

आजमगढ़, बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद आतंक की इस जमीन को तलाशने के लिए मैं आजमगढ़ पहुंचा। नाम ले-लेकर कहा जा रहा था कि ये सारे आतंकी आजमगढ़ की ही मिट्टी ने उगले हैं। जब आजमगढ़ पहुंचा तो कुछ चाहने वालों ने कहा, ‘शम्स भाई यहां तक तो ठीक है पर हो सके तो सरायमीर या सनजरपुर नहीं जाना, दो दिन पहले ही कुछ पत्रकारों को पीट चुके हैं और कुछ को तो कई घंटे तक बंधक बना कर रखा, लोगों के अंदर बेइंत्हा गुस्सा है’। जाहिर है मंजिल के इतने करीब पहुंचकर मकसद से भटक मैं सकता नहीं था। आजमगढ़ के अपने साथी राजीव कुमार को साथ लेकर मैं मंजिल की तरफ निकल पड़ा।

आजमगढ़ से करीब तीस किलोमीटर दूर सरायमीर हमारा पहला पड़ाव था। गाड़ी से उतरते ही एक भाई ने दुआ-सलाम के बाद सड़क किनारे दवा की दुकान के बाहर कुर्सी दे दी। अभी हम वहां के ताजा हालात पर बात कर ही रहे थे कि तभी एक लड़का चाय और पानी ले आया। राजीव और हमारे ड्राइवर को ग्लास देने के बाद वो मेरी तरफ बढ़ा। मेरा हाथ मेरी जांघ से उठकर ग्लास की तरफ बढ़ता इस से पहले ही तिफलू भाई बोल पड़े-‘अरे शम्स भाई को मत देना इनका रोजा होगा। क्यों शम्स भाई रोजे से तो हैं ना आप?’ इतना सुनते ही मैं मन मसोस कर और हाथ मल कर मैं रह गया।

तिफलू भाई का इलाके में अच्छा रौब था और वहां के हालात को देखते हुए अब आगे के सफर में उनको अपने साथ रखना एक दानिशमंदाना फैसला था। सबसे पहले हमने रुख किया गुजरात बम धमाकों के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले अबू बशर के गांव बीना पाड़ा का। गांव के प्रधान को पहले ही तिफलू भाई से खबर लग चुकी थी। जब हम पहुंचे तो सीधे अबू बशर के घर के दरवाजे के बाहर ही चारपाई बिछा दी गई थी।
अब हम जिस घर के सामने थे वो था एक आतंकवादी का घर, गुजरात धमाकों के मास्टरमाइंड अबू बशर का घर।

कुछ पल के बाद ही हमें एक बुजुर्ग से मिलवाया गया। शम्स, ये हैं बाकर साहब, अबू बशर के वालिद। उन्हें एक तरफ से फालिज ने मार रखा था। इधर-उधर की बातों के दौरान जितना अबू बशर को उसके वालिद के जरिए टटोल सकता था मैं टटोलने लगा। पर मगर बातचीत के दौरान ही एक ऐसा हादसा हुआ जिसे कि मैं अब भी जेहन से निकाल नहीं पा रहा हूं। बाकर साहब की पीठ उनकी घर की तरफ थी जबकि मेरा मुंह ठीक उनके घर के सदर दरवाजे की तरफ था। बातचीत के दौरान अचानक १४-१५ साल का एक लड़का अबू बशर के घर का दरवाजा खोलता है और फिर बाहर निकलते के साथ ही उस दरवाजे को वापस बंद कर देता है। सिर्फ पांच सेकेंड के लिए घर के अंदर का जो मंजर मैंने देखा तो उसे करीब से देखने के लिए मैं अंदर जाने को आतुर हो गया। पर सवाल ये था कि जाऊं कैसे? इस सवाल के हल के लिए मैंने तुरंत तिफलू भाई को अलग से बुलाकर अपनी ख्वाहिश बता दी।

फिर अगले ही मिनट मैं गुजरात धमाकों के मास्टरमाइंड और सिमी के सबसे खूंखार आतंकवादी अबू बशर के घर के अंदर था। दरवाजे से घुसते ही सामने एक ओसारा था, जिसके नीचे लकड़ी की एक चौकी पड़ी थी। चौकी के दो पांव को ईटों से सहारा दिया गया था। चौकी के सिरहाने(सर की तरफ) बेहद पुराना बिस्तर पड़ा था। जबकि चौकी की बाईं तरफ बगैर गैस के खाली गैस स्टोव करीब आठ ईटों पर रखा हुआ था। स्टोव और ईटों के बीच कुछ साबुत और कुछ अधजली लकड़ियां पड़ी थी। वहीं बराबर में कालिख हो चुके पांच बर्तनों के बराबर में मिट्टी का एक घड़ा रखा था।

उस घर में सिर्फ एक कमरा था। हम उस कमरे को भी देखना चाहते थे पर झिझक थी कि कहीं अंदर कोई महिला ना हो। तिफलू भाई ने हमारी वो परेशानी भी हल कर दो और हमें अंदर लेगए। उस कमरे में सिर्फ अबू बशर की मां ही थी। कमर या फिर कूल्हे पर उन्हें कुछ ऐसी परेशानी है जिसकी वजह से वो चल-फिर नहीं सकतीं। जितनी उनकी उम्र उस से भी उम्रदराज चारपाई पर वो एक मटमैली चादर पर लेटी हुईं थी।

कमरे को चारों तरफ से जब ध्यान से देखा तो लोहे के दो पुराने बक्से और एक ब्रीफकेस के अलावा अंदर कुछ नहीं था। पिता को फालिज और मां का ये दर्द। अबू बशर के दोनों छोटे भाई ही घर का सारा काम-काज करते हैं और साथ ही उन चार बर्तनों में खाना भी वो ही बनाते हैं। तिफलू भाई ने घर से बाहर निकलते वक्त घर के सदर दरवाजे पर नीले रंग का एक सरकारी निशान भी हमें दिखाया। ये निशान गांव के उन घरों के बाहर लगाया गया है जो गरीबी रेखा के नीचे हैं।
दुआ-सलाम के बाद हम वहां से अपने अगले पड़ाव की तरफ बढ़ गए। अगले पड़ावों पर कुछ लोग ऐस मिले जो की सिर्फ मीडिया पर ही दोष मड़ते नज़र आए। वहां पर काफी लोग इस बात से नाराज थे कि हम आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी कैसे कह रहे हैं? मैंने विश्वास दिलाया और तत्काल प्रभाव से उस शब्द को कहीं दूर फिकवा दिया। अबू बशर के घर को तो हम बहुत पीछे छोड़ आए थे पर ना मालूम क्यों अब भी अबू बशर का घर मेरा पीछा ही नहीं छोड़ पा रहा?

शम्स ताहिर खान
(एंकर और क्राइम हेड, आजतक)

(समीर लाल जी की इच्छा थी कि वो ‘आतंकवादी का घर’ पढ़ना चाहते थे। साथ ही मैं अपने सहयोगी शिवेंद्र श्रीवास्तव और सुप्रतिम बनर्जी का शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने शम्स ताहिर खान के ये जज्बात छापने की इज्जात दी।)

****इस स्क्रिप्ट में थोड़ा फेरबदल किया गया है।

Wednesday, March 4, 2009

पाकिस्तान के लोग ऐसा क्यों सोचते हैं कि हमने ‘26/11-मुंबई हमलों’ का बदला लिया है।

मंगलवार की सुबह जब देर से उठा तो इल्म हुआ कि हां, रात देर से सोया था। अभी चाय के प्याले को मुंह तक लगा भी नहीं पाया था कि अल्साते मन को याद आया कि मैच भी है आज। टीवी खोलकर आंखें मलता हुआ स्कोर पढ़ा तो देखा कि अभी कुल 7-8 ओवर हुए थे सचिन-वीरू दोनों क्रीज पर थे। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन आज शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं पर फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
हमने तुरंत मैच से यूं ही न्यूज की तरफ ऱुख किया। आंख फटी की फटी रह गई। अरे, ये क्या? कहां हुआ हमला, किसने किया, किनपर किया? ये तो पाकिस्तान है, तो क्या पाक टीम पर हमला हुआ है नहीं ये तो श्रीलंका की टीम आतंक की शिकार बनी है। बेहद दुख हुआ और नहीं जानता कि आलस कहां गायब हो गया तकरीबन 3-4 घंटे तक लगातार यूं ही चैनल खंगालता रहा। कई बार तो गुस्से ने दिमाग के सभी तारों को झनझना दिया।

अरे, क्या पागल होगए हैं पाकिस्तान के अधिकारी। जितने भी बयान किसी आला अफसर की तरफ से आ रहे थे उनमें से कुछ और साथ ही कई पत्रकारों के सवाल के निशाने पर कहीं ना कहीं भारत था। कई पाकिस्तानी न्यूज चैनलों पर ये साफ चला कि ये आतंकवादी बाघा बार्डर के रास्ते आए थे। मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था कि पहले तो सुरक्षा में इतनी भारी चूक और उसपर तुर्रा देखिए कि अभी हालात को सामान्य करने की बजाय लगे हैं निशाना साधने पर।
इस पूरे हमले पर कई और कहां-कहां सवाल खड़े होते हैं पाकिस्तान के लिए----
1) कैसे हुई श्रीलंका की टीम की सुरक्षा में चूक? जब कि श्रीलंका की टीम को मिलती है ग्रेड ए यानी कि किसी दूसरे देश से आए हुए किसी भी राष्ट्राध्यक्ष जैसी सुरक्षा। श्रीलंका टीम के काफिले की सुरक्षा के लिए करीब 70 पुलिसवाले दिए गए थे। तो सवाल ये उठता है कि कहां गए 70 पुलिसकर्मी? यदि 70 पुलिसकर्मी वहां पर मौजूद थे तो 12 आतंकी उनको चकमा देने में कैसे कामयाब होगए, कैसे फरार हो गए सभी के सभी और वो भी 5-6 पुलिसवालों को मारकर?
2) गद्दाफी स्टेडियम तक जाने के कई रास्ते हैं। ऐसा बताया गया है कि टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक हर रोज दूसरे रास्ते से ले जाया जाता हैं। तो ये चूक कहां से हुई कि आतंकवादी जान गए वो रास्ता जिस रास्ते से आज टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक पहुंचना था?
3) दूसरे टेस्ट के दूसरे दिन जिस रास्ते का इस्तेमाल किया गया था टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक लाने के लिए, तीसरे दिन भी उसी रास्ते का इस्तेमाल क्यों किया गया? रूट में हमेशा की तरह बदलाव क्यों नहीं किया गया?
4) पहले से ही सरकार को आगाह किया जा रहा था कि नवाज शरीफ और उनके भाई को पंजाब प्रांत से चुनाव ना लड़ने देने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पंजाब सूबे में नवाज शरीफ का जो रुतबा है वो पूरे पाकिस्तान के किसी भी प्रांत में जरदारी या फिर गिलानी का नहीं होगा। पंजाब सूबे के लोग नवाज के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
5) 12 आतंकवादी ये प्लान बनाते हैं कि मेहमान टीम पर हमला करना है। इस बात का मतलब ये है कि आतंकी काफी दिनों से इस योजना को अंजाम देने की कोशिश में जुटे हुए थे। तो क्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी सो रही थी?
6) स्वात पर तालिबान का कब्जा हो गया है और वहां पर पाकिस्तान का नहीं तालिबान का फरमान चलता है और ये धमकी पहले से ही दी जा रही थी कि सिर्फ स्वात के बाद निशाना पूरे पाकिस्तान पर है, और खासतौर पर इस प्रांत।
7) पाकिस्तान के अधिकारी कह रहे हैं कि ये हमला पूरी तरह से देखने पर लगता है कि जैसे मुंबई हमलों को अंजाम दिया गया था बिल्कुल उसी तरह इस का प्लान लाहौर में भी किया गया। याने कि वो हमला भी पाकिस्तान में प्लान किया गया था और ये हमला भी अंदर के लोगों ने ही प्लान किया है।
8) अभी तक जो माना गया है कि ये अटैक सुनियोजित था और 12 के 12 आतंकवादी अपने में पूरे ट्रेनेंड थे। शायद वो पूरी श्रीलंका की टीम को बंदी बनाना चाहते थे। पर देखने से जो लगा कि उनके पास अस्ला, बारूद, सामान काफी था पर फिर भी उसके बाद सवाल ये उठता है कि यदि वो सब ट्रेनेंड थे तो फिर सवाल ये कि मास्क पहन कर हमला करना और फिर मास्क फैंक देना, क्यों? जिस बैग को आप हमेशा अपने साथ, पीठ पर लादे रख रहे थे फिर उनको छोड़कर भागने का औचित्य क्या? गन, ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर इन सब को यूंही छोड़ कर क्यों भाग गए आतंकवादी? या फिर ये भी पहले से ही प्लान्ड था कि इनको छोड़ना था। बस पर इतने पास से रॉकेट दागा जाता है पर उसका निशाना चूक जाता है? बस के सामने से आकर बस पर ग्रेनेड फेंकने की कोशिश की जाती है और वो आतंकी के हाथ से छूटकर दूर गिर जाता है? क्या ऐसी ही ट्रेनेंड आतंकी थे जिन्होंने मुंबई पर हमला किया था?
9) सबसे बड़ा सवाल कि पाकिस्तान के इतने भरे-पूरे इलाके में 12 लोग हमला करते हैं और फिर मौका-ए-वारदात से गायब हो जाते हैं। एनकाउंटर तो दूर की बात लगभग 15 मिनट तक वो गोलीबारी करते हैं और फिर फरार हो जाते हैं और वहां कि पुलिस किसी को दबोचना तो दूर की बात उनका पता तक नहीं लगा पाती कि वो गए कहां। कोई भी वहां का निवासी ये बताने को राज़ी नहीं है कि आखिरकार वो किस तरफ गए हैं या उनको कहां देखा गया है। वैसे लाहौर के मॉडल टाउन इलाके से संदिग्ध 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और इस मामले पर अब तक 60 लोगों को हिरासत में लिया गया।
10) दूसरी तरफ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस पूरे हमले के पीछे वहीं पाकिस्तान की अंदरूनी रंजिश हो। किसी भी आतंकी का ना तो पकड़ा जाना और ना ही घायल होना, दाल को कहीं ना कहीं काला जरूर बनाता है।
तो ये सब सवाल खड़े हैं अपना मुंह खोले कि क्या कोई दे पाएगा इनका जवाब। लाहौर से बाघा बॉर्डर महज 20 किलोमीटर की दूरी पर है। तो कई की आशंका है कि वो सारे आतंकवादी वहां से भागकर सबसे सुरक्षित स्थान भारत में दाखिल हो सकते हैं। तो फिर यदि देखा जाए तो कोई भी सुरक्षित नहीं है। ना इस पार के ना उस पार के। पाकिस्तानियों को ये समझना चाहिए कि ये हमला उनके देश में बैठे कुछ नापाक दहश्तगर्दों ने करवाया है। हम मुंबई हमलों के लिए किसी को माफ नहीं कर सकते, लेकिन अपनी पर आजाएं तो उसकी कीमत चुकाने की औकात इस जमाने में नहीं।

हम तो शुक्रगुजार हैं भगवान के उस बंदे का जो श्रीलंका टीम की बस का ड्राइवर था जिसने हिम्मत दिखाते हुए टीम को सकुशल गद्दाफी तक पहुंचा दिया। जिसके सामने वाले शीशे पर गोलियां टकरा रहीं थी और उसने एक्सीलेटर और अपने पैर पर विश्वास करके पाकिस्तान, क्रिकेट और आईसीसी के साथ-साथ दुनिया को शर्मिंदगी उठाने से बचा लिया और अकेले आतंक को मात देने में कामयाब रहा।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)

न्यूजीलैंड में भारत जीता, पाकिस्तान में क्रिकेट हारा।

ट्वेंटी-20 सीरीज हारने के बाद धोनी और धोनी की टीम के लिए पहला वन डे बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने था। धोनी के लिए फिर टॉस अच्छा रहा, और टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला। ओपनर के रूप में जैसा कि सोचा जा रहा था वो ही हुआ सहवाग के साथ गंभीर नहीं सचिन ही थे। सचिन से लोगों को काफी उम्मीदें, सचिन ने जमने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ सहवाग अपने रंग में आ चुके थे। जहां सहवाग अर्ध शतक के नजदीक थे वहीं सचिन अभी डबल फिगर को छू ही पाए थे।

सचिन ने भी अपने हाथ दिखाए और दो शानदार चौके लगाए। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं, फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सचिन से सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल की रफ्तार और हवा से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
जिसकी उम्मीद थी बिल्कुल उससे हटके हुआ। जहां लोग सोच रहे थे कि लेफ्ट-राइट का कॉम्बिनेशन देने के लिए कोई लेफ्टी आएगा याने कि सबसे सफल जोड़ी फिर होगी क्रीज पर, पर ऐसा हुआ नहीं। लोगों और मीडिया की खरी-खरी सुनने के बाद अपना पसंदीदा नंबर 7 छोड़ कप्तान धोनी 3 नंबर पर बैटिंग करने पहुंचे। अपने इस निर्णय को साबित करने के लिए धोनी ने धीमे और सधी शुरुआत करी। वहां वीरू का बल्ला बोल रहा था। अब तक वीरू 56 गेंदों पर 11 चौके और 1 छक्के की मदद से 77 रन बना चुके थे। विटोरी की गेंद पर एक लाजवाब शॉट सहवाग ने खेली और सर्कल के अंदर खड़े टेलर ने उससे भी शानदार कैच लपक वीरू की शानदार पारी पर ब्रेक लगा दी। चौथे नंबर पर टीम के युवराज आए और
कप्तान के साथ दूसरे रन के फेर में पड़कर पवैलियन की राह पर निकल लिए। अब टी-20 के स्टार सुरेश रैना की बारी थी। 20-20 के क्रम को आगे बढ़ाते हुए रैना ने मैदान के हर कोने में बॉल पहुंचाई और शानदार 4 छक्के और 5 चौंकों की मदद से महज 39 गेंदों पर 66 रन बनाकर छक्के मारने के प्रयास में एलिट की गेंद पर ब्रायन को कैच थमा बैठे। वहीं दूसरे छोर पर कप्तान ने पारी संभाल रखी थी। अब धोनी का साथ देने क्रीज पर आए यूसुफ पठान आए और 10 गेंदों पर 1 छक्के और 2 चौकों की मदद से 20 रन बनाए। धोनी की इस समझदारी भरी पारी में सिर्फ ६ चौकों की मदद से 89 गेंदों पर 84 रन बनाए। न्यूजीलैंड के सामने 7.20 की औसत के साथ लक्ष्य 38 ओवरों में 274 रहा।
वैसे, इस बीच न्यूजीलैंड में झमाझम बारिश होने लगी और पाकिस्तान में श्रीलंका टीम की बस पर दनादन फायरिंग। पाकिस्तान में दूसरे टेस्ट के साथ-साथ दौरा भी खटाई में पड़ गया। खेल और क्रिकेट के इतिहास का काला दिन। वहीं दूसरी तरफ न्यूजीलैंड में बारिश के कारण पहला वन डे के ओवर कम कर दिए गए, मैच 38-38 ओवरों का हो गया।
इरफान की जगह टीम में आए प्रवीण कुमार ने बिना खाता खोले न्यूजीलैंड को दूसरे ओवर में ही पहला झटका मैक्कुलम के रूप में दिया। न्यूजीलैंड की तरफ से टी-20 का सितारा अस्त हो गया था। दूसरा विकेट भी प्रवीण कुमार की झोली में गया। गुप्टिल और टेलर जब खेल रहे थे तो लग रहा था कि औसर रन रेट तो बढ़ता जा रहा है पर फिर भी यदि ये दोनों टिके रहे तो मैच को कभी भी पलटने की काब्लियत रखते हैं। १६वें ओवर में यूसुफ पठान ने घातक होते टेलर को सचिन के हाथों कैच करवाकर न्यूजीलैंड की मुसीबत और बढ़ा दी। एलिट को सहवाग के सपाट थ्रू ने रन आउट कर दिया और बारिश शुरू हो गई।
डकवर्थ लुईस नियम को लागू किया गया और फिर जो टार्गेट न्यूजीलैंड के सामने था वो लगभग नामुमकिन सा ही था। 43 गेंद पर 111 रन। जब चौथा विकेट गिरा था तो न्यूजीलैंड को 102 गेंद पर 163 रन चाहिए थे और उनके हाथ में 6 खिलाड़ी थे।
जब मैच शुरू हुआ तो स्कोर को आगे बढ़ाने के कारण ओरम युवराज का शिकार बने। अब लगने लगा कि यदि गुप्टिल का विकेट भारत कैसे भी झटक ले तो फिर पूरी तरह मैच भारत के पक्ष में हो जाएगा। और हुआ भी कुछ यूं ही, पर अब बारी थी भज्जी की। चार गेंद पर भज्जी ने 3 विकेट झटक लिए। सबसे पहले गुप्टिल, फिर ब्रूम और फिर मिल्स को आउट कर न्यूजीलैंड की हार में चारों तरफ कील ठोंक दी। कहां एक समय 132 पर 5 विकेट थे वहीं 9 विकेट भी होगए। अब बस खानापूर्ति ही शेष रह गई थी। और भारत ने पहला वन डे 53 रन से डकवर्थ लुईस नियम से जीत लिया। मैन ऑफ द मैच चुने गए टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी।

जब टीम इंडिया बैटिंग कर रही थी तब ये खबर फैल चुकी थी कि श्रीलंका की टीम पर हमला हो गया है। और दोनों टीमों ने हाथ पर काली पट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज कराया। धोनी ने कहा कि अच्छा हुआ कि भारतीय टीम ने पाकिस्तान का दौरा नहीं किया और शायद ही अब कोई भी खिलाड़ी पाकिस्तान में जाकर खेलना पसंद करेगा।
पर सच तो ये है कि पाक में पनपे आतंक के सच से खुद पाकिस्तानियों को लड़ना होगा और क्रिकेट को जिंदा रखने के लिए तालिबानी ताकतों के सामने घुटने नहीं टेकने होंगे। फिल्म के बाद अब इन दहशतगर्दों के निशाने पर है क्रिकेट पर आतंक से तो लड़ना होगा ही।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)

पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला, पाक में आतंक के आगे हारा क्रिकेट।

पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला हुआ। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब कि विदेशी दौरे पर गई किसी टीम पर आतंकवादी हमला किया गया हो। श्रीलंका की टीम की जगह वो भारत की भी टीम हो सकती थी। जनवरी-फरवरी में भारत को पाकिस्तान का दौरा भी करना था। ऑस्ट्रेलिया और भारत के मना करने के बाद श्रीलंका ने दो फेज में पाकिस्तान का दौरा करना कबूला। जनवरी में वन डे और फरवरी-मार्च में दो टेस्ट।

दूसरे टेस्ट का तीसरा दिन, श्रीलंकाई टीम की बस होटल से गद्दाफी स्टेडियम जहां पर दूसरा टेस्ट खेला जा रहा था वहां के लिए रवाना हुई। साथ में आगे पीछे सुरक्षा दस्ता। सब ठीक चल रहा था, श्रीलंका की टीम इस पर हल्की चर्चा करने में मश्गूल थी कि कैसे गेंदबाजी करनी है। पाकिस्तान के समय अनुसार सुबह 8.40 पर टीम की बस गद्दाफी स्टेडियम के पास लिबर्टी चौक के पास पहुंची। जैसे ही राउंडअबॉयुट याने गोलचक्कर पर घूमी, चारों तरफ से बस और बस को सुरक्षा दे रहे पुलिस के दस्ते पर हमला कर दिया गया। 12 आतंकवादी बस पर अंधाधुंध गोलियां चला रहे थे जिसमें श्रीलंका की क्रिकेट टीम बैठी थी।
सामने से आ रही गोलियों से बच पाना बस के आगे चल रहे पुलिस दस्ते के लिए मुमकिन नहीं था। 7 पुलिसवाले मौके पर ही ढेर हो गए। बस पर ताबड़तोड़ गोलियां लग रहीं थी, और इधर खिलाड़ियों की चीख निकलने लगी।
6 खिलाड़ियों को गोलियां लगी।
फायरिंग की आवाज़ सुनते के साथ ही खिलाड़ियों ने झुकना शुरू कर दिया। चमिंडा वास ने बताया कि, फायरिंग के समय यदि वो झुके नहीं होते तो गोली लग सकती थी, गोली ठीक उनके ऊपर से गई थी। श्रीलंकाई बस के ड्राइवर मेहर मोहम्मद ने बताया कि गोली की आवाज़ के बाद पहले तो लगा कि कोईं पटाखे चला रहा है पर तुरंत पीछे बैठे किसी खिलाड़ी ने पीछे से आवाज़ लगाई कि ‘चलो, जल्दी चलो(go)’। ड्राइवर ने समझदारी का काम किया एक्सीलेटर पर रखा पैर और बस को गद्दाफी स्टेडियम के अंदर पर पहुंचाकर ही दम लिया। जो खिलाड़ी घायल हुए----

--कप्तान महेला जयवर्द्धने के पांव में टखना(ankle) में हल्का सा कट लगा, याने कोई खतरा नहीं।
--उप कप्तान कुमार संगकार के कंधे में गोली लगी, खतरे से बाहर।
--अजंथा मेंडिस-पीठ पर किसी चीज के गहरा घाव।
--थरंगा परनाविथाना-सीने में लगी गोलीघाव।
--थीलाना समरवीरा-जांघ में लगी गोली, खतरे से बाहर पर पूरी तरह नहीं। समरवीरा टीम के टॉप के बल्लेबाज जिसने पिछले टेस्ट और दूसरे टेस्ट की पहली पारी में दोहरा शतक जड़ा था।
--पॉल फरबरेस-श्रीलंकाई टीम के सहायक कोच के हाथ में गहरा घाव।

श्रीलंकाई टीम की बस के पीछे एलिट अंपायर की वैन भी आ रही थी। 5 अंपायरों के इस काफिले पर भी आतंकवादियों ने निशाना साधा और इसमें रिजर्व अंपायर एहसान रज़ा गंभीर रूप से घायल हो गए। अभी भी एहसान रज़ा अस्पताल में भर्ती हैं पर अभी-अभी पता चला है कि वो ख़तरे से बाहर हैं। लेकिन इस वैन को जो ड्राइवर थे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
पुलिस की तफ्तीश के बाद पता चला कि 12 आतंकवादियों का ये काम था और उन्होंने हमले में ऑटोमैटिक गन, हैंड ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर और स्टार डायमंड पिस्टल का इस्तेमाल किया। कुछ का कहना ये है कि ये अटैक पूरा 26/11 मुंबई हमलों की तर्ज पर किया गया है।
वैसे ही पाकिस्तान में कोई भी खिलाड़ी जाकर नहीं खेलना चाहता। 2008 में ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पाक का दौरा रद्द किया था। उसके बाद चैंपियंस ट्रॉफी रद्द की गई। फिर भारत ने मुंबई हमलों के बाद दौरा रद्द कर दिया, जिसे की आज पूरा विश्व सही ठहरा रहा है। जब ये फैसला लिया गया था तो मुझे याद है कि दुनिया और कुछ पाक के खिलाड़ी जैसे आफरीदी ने काफी कुछ उल्टा सीधा कहा था। श्रीलंका की टीम ने हौसला दिखाया और उसके इस निर्णय पर कई सवाल भी उठे थे।

इस हमले के तुरंत बाद श्रीलंकाई टीम का पाकिस्तान दौरा रद्द कर दिया गया। कोई भी खिलाड़ी इलाज कराने के लिए भी पाक में नहीं रुकना चाहता था। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ये हुआ होगा कि किसी टीम को मैदान से ही हेलिकॉप्टर से दूसरे देश ले जाया गया और फिर वहां से वो रात तक वापिस अपने देश में पहुंच जाएंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, September 30, 2008

कितनी ही कोशिश कर लो, पर दिल्ली झुकने वाली नहीं दहशतगर्दों।

किसने किए दिल्ली के महरौली में ब्लास्ट? क्या उन्होंने जो ये बताना चाहते थे कि चाहे कितनों को पकड़ लो, चाहे कितनों को मार दो, हमारी तादाद कम नहीं होगी? या फिर वो जो कि ये बताना चाहते थे कि उन संगठनों के अलावा हम भी हैं या फिर वो जो कि हमेशा ही ऐसे समय का इंतजार करते हैं कि जब की कोई त्यौहार आने वाला हो तभी इस तरह की दहशत फैला कर के सारी दिल्ली को बैकफुट पर ढकेल दें। चाहे किसी और जगह पर बम को रखने की थ्योरी भी सामने आ रही है पर इस बात से एतराज नहीं किया जा सकता कि दहलनी तो दिल्ली ही थी। इन नौसिखियों आतंकवादियों की वजह से वहां पर नहीं ऱखा जा सका बम और अफरातफरी में बम ऐसे ही फेंक कर वो भाग गए। महरौली में ब्लास्ट का क्या मतलब कोई लगा सकता है? ना तो कोई भी बड़ी जगह, ना तो ऐसा चर्चित मार्केट जहां पर रश इतना ज्यादा रहता हो कि अधिक से अधिक लोग हताहत हों। लेकिन इस बार के ब्लास्ट के बारे में ये ही कहा जा सकता है कि दहशतगर्दों की कोशिश थी दहशत फैलाने की।
कुछ भी कहें पर महरौली ब्लास्ट ने एक १३ साल के मासूम की जान लेली साथ ही एक नौजवान की भी। वो १३ साल का मासूम वो ही बच्चा है जो कि पॉलीथिन गिरने पर उसने उठाया था और उन आतंकवादियों को भईया संबोधित करते हुए कहा था कि आपका सामान गिर गया है। उस बेचारे मासूम को क्या पता था कि वो शब्द उसकी जिंदगी के आखिरी शब्द होंगे। साथ ही जिनको वो भईया बोल रहा है वो देश के दुश्मन हैं। उस नौजवान के पिता जो कि इस ब्लास्ट की भेंट चढ़ गया वो कहते हैं कि आतंकवादियों को सड़क पर गोली मार देनी चाहिए। वो एक मुस्लिम पिता की आवाज़ है। उसमें कोई धर्म नहीं, कोई जात नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ छुपा है तो एक पिता का दर्द।
पुलिस ने भी जल्द ही खून के धब्बे धो डाले। ये बात हज्म नहीं हुई। पुलिस को लगा होगा कि शायद लोग दहशत से उबर जाएं, वरना खून दिखता रहेगा तो याद उतनी ही ज्यादा रहेगी। लेकिन फोरेंसिक टीम को नमूने क्यों नहीं लेने दिए। बहरहाल शिवराज पाटील जी ने अब मुंह खोलने से ही इनकार कर दिया है। अच्छा है वरना रटारटाया बयान फिर सुनने को मिलते। बीजेपी के सीएम इन वेटिंग विजय कुमार मल्होत्रा ने तुरंत आनन-फानन में महरौली का रुख किया। मुझे मेरे कुछ रिपोर्टरों ने बताया कि पुलिस से लेकर आम लोग भी नहीं चाहते कि ऐसे मौके पर तुरंत किसी भी वीवीआईपी का दौरा हो। पुलिस अपना काम छोड़कर उनकी तिमारदारी में लग जाती है। खुद नेताओं को भी सोचना चाहिए। साथ ही नेतागण ये भी सोचें कि क्या बोलना है और क्या नहीं तो बेहतर ही होगा। सभी के पीछे पुलिस नहीं लगाई जा सकती पर ये समय नहीं है कि ऐसी लाइनें बोली जाएं।
ये दहशत फैलाने की कोशिश लगातार जारी है, फरीदाबाद में भी बम जैसी वस्तु मिली। जानबूझकर बरगलाने के लिए फोन किया जाता है।बार-बार कॉल किया जाता है। कभी कहीं से तो कभी कहीं से, कहीं के लिए कॉल। पुलिस भी परेशान हैं। लेकिन ये आतंकवादी नहीं जानते कि ये दिल्ली का दिल है जो ऐसे धड़कना बंद नहीं कर सकता,पर डर तो लगता है ही, वो भी खत्म हो जाएगा। कितनी ही कोशिश कर लो, पर दिल्ली झुकने वाली नहीं दहशतगर्दों।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, September 29, 2008

“बाटला के L-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है”

‘बाटला के एल-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है’। ये मैं नहीं कह रहा हूं ये वो तीन आतंकवादी कह रहे हैं जो कि एनकाउंटर के बाद से दक्षिण दिल्ली से पकड़े गए हैं। शकील, जिया और साकिब ये तीनों रो रहे हैं अपने गुनाहों के लिए अल्लाह से रहम की जगह मौत मांग रहे हैं। ये पुलिस से भी मौत मांग रहे हैं। कस्टडी में जब भी इनको कोई पुलिसवाला दिख जाता है तभी ये रोना शुरू कर के गिड़गि़ड़ाते हुए उनसे अपने गुनाहों का वास्ता देते हुए सज़ा की भीख मांगते हैं। क्या आपने कभी आतंकवादियों को भीख मांगते हुए देखा है? शायद नहीं ही देखा होगा ये तो वो जालिम होते हैं जो कि औरों से भीख मंगवाते हैं। लेकिन आज ये खुद भीख मांग रहे हैं अपनी मौत की। दिन में रोते हैं, रात में रोते हैं, जमीन-दीवार पर सर मार-मार कर रोते हैं। लेकिन सच जो कि अर्द्धसत्य नहीं कि ये भीख उन्हें कोई भी नहीं दे सकता।
अभी कई बार पढ़ा कि लोग सवाल उठा रहे हैं कि एल-18 में जो एनकाउंटर हुआ वो फर्जी था। मैंने सबकी दलीलें सुनी हैं, साथ में ‘बड़े-बड़े’ लोगों की दलीलें भी सुनी हैं। दलीलें हैं हमने वहां पर आसपास के परिवार वालों से बातें की। जितने मुंह उतनी बातें। अब ये समझ में नहीं आता कि जब हर जगह से अलग-अलग कहानी सुनने को मिल रही हैं तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि उन सारी कहानियों में से कोई एक भी सही है। फिर पुलिस के बयान को भी एक दलील मान कर सच माना जा सकता है।
हर कोई जानना चाहता है सच। ये सच या तो सैफ बता सकता है जो कि वहां से पकड़ा गया या फिर एक शख्स और है जो असलियत बता सकता है। कुछ का मानना है कि भई, सैफ को तो वहां लाया गया था उसे कैसे पता होगा। तो जवाब है, क्यों आंखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या सैफ ने। चलो, मान लें कि सैफ को कुछ भी नहीं पता।
उस दूसरे शख्स को पूछते हैं कि भई, क्या हुआ था। वो हैं कांस्टेबल बलवंत। उस मुठभेड़ में गोली इस शख्स को भी लगी। एम्स ट्रामा सेंटर में इलाज चल रहा है। एक हाथ जो कि चोटिल हुआ वो बच पाया तो बहुत ही होगा। ये बात जो मैं बताने जा रहा हूं वो बलवंत ने किसी मीडियाकर्मी या फिर पुलिस-डॉक्टर को नहीं बताई है। ये बात उसने अपने साथ काम करने वाले एक साथी को बताई है वो भी सबके सामने नहीं बिल्कुल निजी तौर पर।
बलवंत ने अपने साथी के पूछने पर ये बताया कि पूरा घटनाक्रम कैसे-क्या हुआ बताया ही नहीं जा सकता लेकिन मोटा-मोटा क्या हुआ बता देता हूं। उन्होंने बोलना शुरू किया,
‘हम साहब(स्व.इंस्पेक्टर शर्मा) के साथ उपर गए। सेल्समैन बनें हमारे सहयोगी ने हमें कमरा-कमरे का नक्शा यानी समान कहां-कहां रखा है, हथियार दिखे कि नहीं और जो भी उसने देखा था, कम शब्दों में, सब बता दिया था। साहब आगे थे हम सब लोग पीछे, अपनी-अपनी जगह चुनते हुए, खड़े होते रहे, मैं साहब के साथ ही था। साहब ने जाते ही दरवाजे में ठोकर मारी और खोलने के लिए आवाज़ लगाई। लेकिन जब खोलने में देर होने लगी तो साहब ने दरवाजे में दो तीन ठोकरें और जड़ दीं साथ ही ‘जल्दी खोलो’ की आवाज़ भी लगाई। फिर क्या हुआ असल में समझ में नहीं आया, नहीं पता चला कि क्या हुआ। चीख चिल्लाहट के बीच गोलियां चलने लगी और उसके आगे कि तो तुम रोज ही पढ़ते रहते होगे’

तो ये थी बलवंत की अपने साथी से बातचीत। अब और तो शायद ही प्रमाण कोई दे सकता हो। फिर और भी बातें हुईं, वो कुछ महकमे की, कुछ घर परिवार की, कुछ स्व. शर्मा जी के परिवार की।
पुलिस ने एल-18 से जो चीजें बरामद की हैं उनमें से कई चीजें ऐसी हैं जो कि इन आतंकवादियों को ओवरस्मार्ट साबित करती हैं। 900 से ज्यादा फोटों उनके लैपटॉप से बरामद हुई हैं। इन तस्वीरों में ब्लास्ट की तस्वीरें हैं। कुछ वीडियों भी मिले हैं जो कि ब्लास्ट के तुरंत बाद के हैं। उन तस्वीरों में कुछ तो वो हैं जैसे कि मणिनगर में साइकिल की जिसमें कि शकील और जिया ने बम लगाया था। उन सभी कारों की तस्वीरें हो जो कि अहमदाबाद में उपयोग की गईं। बम और टाइमर कार के अंदर प्लांट करते हुए की तस्वीरें हैं। कार के अंदर बम रखा हुआ है, फोटो पर समय बता रहा है शाम के 5.45 और फिर दूसरी तस्वीर भी वहीं कि ब्लास्ट के 5 मिनट बाद की 6.25। साथ ही ऐसा करते हुए इनको लगता था कि पुलिस हो या स्थानीय लोग इन्हें मीडिया का समझेंगे कोई भी हाथ नहीं लगाएगा। इसके अलावा और क्या सबूत दें। और लीजिए सबूत। ये सब फोटो और वीडियो सीडी और मेल के साथ एटैच करके भेजी जाती थीं। देखिए हमने कितने अच्छे ढ़ंग से काम को अंजाम दिया है। कई-कई सिम और ब्लास्ट के बाद और पहले भी एक ही सिम पर कॉल किया गया।
जैसे ही पुलिस को टिप मिली थी इन लड़कों के बारे में जो कि एल-18 में रहते हैं तो उस दिन से ही इनका फोन सर्विलांस पर लग चुका था। पुलिस ने इनकी बातें सुनीं। इनके कारगुजारियों के किस्से भी सुने। लेकिन कभी भी बातचीत में इन्होंने हथियार के बार में जिक्र नहीं किया। ये ही कारण था कि स्व. इस्पेक्टर शर्मा बिना किसी लाइफ गार्ड के दरवाजा खटखटाने चले गए।
सब ये सोच जरूर रहे होंगे कि शकील, जिया और साकिब रो क्यों रहे थे। पुलिस की मार से या क्या कारण था। स्पेशल सेल ने उनको अहमदाबाद ब्लास्ट और बैंगलोर ब्लास्ट के साथ-साथ दिल्ली के दर्द की तस्वीरें भी दिखाईं हैं। इन तस्वीरों को देख कर वो अपने को माफ नहीं कर पा रहे हैं। अब वो बताते हैं कि उन्हें तो मुंबई के दंगों, बाबरी मस्जिद, गोधरा के दंगों की तस्वीरें दिखाई हैं। बोला गया उनको तकरीरें दी गईं हैं और कई न्यूज चैनलों की वो स्टोरी दिखाई गईं हैं जो कि ब्लास्ट के बाद किसी मुस्लिम परिवार पर कवर की गईं थी। वो बताते हैं कि हमें तो कभी रॉ सामान नहीं मिलता था। हम से कहा जाता कि ये सामान वहां रखकर आ जाना है। सिर्फ रखने का झंझट रहता था और वो भी पहले से ही तयशुदा रहता था कि कैसे-क्या करना हैं।
आधा सच जानकर ना जाने ये नौजवान क्यों बहक जाते हैं। पूर्ण सच की तलाश कठिन तो होती है पर नामुमकिन नहीं। लेकिन सच सच ही होता है उसमें से ना घटाया जा सकता है और ना ही उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद कुछ सच और सामने आएंगे।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”