किसने किए दिल्ली के महरौली में ब्लास्ट? क्या उन्होंने जो ये बताना चाहते थे कि चाहे कितनों को पकड़ लो, चाहे कितनों को मार दो, हमारी तादाद कम नहीं होगी? या फिर वो जो कि ये बताना चाहते थे कि उन संगठनों के अलावा हम भी हैं या फिर वो जो कि हमेशा ही ऐसे समय का इंतजार करते हैं कि जब की कोई त्यौहार आने वाला हो तभी इस तरह की दहशत फैला कर के सारी दिल्ली को बैकफुट पर ढकेल दें। चाहे किसी और जगह पर बम को रखने की थ्योरी भी सामने आ रही है पर इस बात से एतराज नहीं किया जा सकता कि दहलनी तो दिल्ली ही थी। इन नौसिखियों आतंकवादियों की वजह से वहां पर नहीं ऱखा जा सका बम और अफरातफरी में बम ऐसे ही फेंक कर वो भाग गए। महरौली में ब्लास्ट का क्या मतलब कोई लगा सकता है? ना तो कोई भी बड़ी जगह, ना तो ऐसा चर्चित मार्केट जहां पर रश इतना ज्यादा रहता हो कि अधिक से अधिक लोग हताहत हों। लेकिन इस बार के ब्लास्ट के बारे में ये ही कहा जा सकता है कि दहशतगर्दों की कोशिश थी दहशत फैलाने की।
कुछ भी कहें पर महरौली ब्लास्ट ने एक १३ साल के मासूम की जान लेली साथ ही एक नौजवान की भी। वो १३ साल का मासूम वो ही बच्चा है जो कि पॉलीथिन गिरने पर उसने उठाया था और उन आतंकवादियों को भईया संबोधित करते हुए कहा था कि आपका सामान गिर गया है। उस बेचारे मासूम को क्या पता था कि वो शब्द उसकी जिंदगी के आखिरी शब्द होंगे। साथ ही जिनको वो भईया बोल रहा है वो देश के दुश्मन हैं। उस नौजवान के पिता जो कि इस ब्लास्ट की भेंट चढ़ गया वो कहते हैं कि आतंकवादियों को सड़क पर गोली मार देनी चाहिए। वो एक मुस्लिम पिता की आवाज़ है। उसमें कोई धर्म नहीं, कोई जात नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ छुपा है तो एक पिता का दर्द।
पुलिस ने भी जल्द ही खून के धब्बे धो डाले। ये बात हज्म नहीं हुई। पुलिस को लगा होगा कि शायद लोग दहशत से उबर जाएं, वरना खून दिखता रहेगा तो याद उतनी ही ज्यादा रहेगी। लेकिन फोरेंसिक टीम को नमूने क्यों नहीं लेने दिए। बहरहाल शिवराज पाटील जी ने अब मुंह खोलने से ही इनकार कर दिया है। अच्छा है वरना रटारटाया बयान फिर सुनने को मिलते। बीजेपी के सीएम इन वेटिंग विजय कुमार मल्होत्रा ने तुरंत आनन-फानन में महरौली का रुख किया। मुझे मेरे कुछ रिपोर्टरों ने बताया कि पुलिस से लेकर आम लोग भी नहीं चाहते कि ऐसे मौके पर तुरंत किसी भी वीवीआईपी का दौरा हो। पुलिस अपना काम छोड़कर उनकी तिमारदारी में लग जाती है। खुद नेताओं को भी सोचना चाहिए। साथ ही नेतागण ये भी सोचें कि क्या बोलना है और क्या नहीं तो बेहतर ही होगा। सभी के पीछे पुलिस नहीं लगाई जा सकती पर ये समय नहीं है कि ऐसी लाइनें बोली जाएं।
ये दहशत फैलाने की कोशिश लगातार जारी है, फरीदाबाद में भी बम जैसी वस्तु मिली। जानबूझकर बरगलाने के लिए फोन किया जाता है।बार-बार कॉल किया जाता है। कभी कहीं से तो कभी कहीं से, कहीं के लिए कॉल। पुलिस भी परेशान हैं। लेकिन ये आतंकवादी नहीं जानते कि ये दिल्ली का दिल है जो ऐसे धड़कना बंद नहीं कर सकता,पर डर तो लगता है ही, वो भी खत्म हो जाएगा। कितनी ही कोशिश कर लो, पर दिल्ली झुकने वाली नहीं दहशतगर्दों।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
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Tuesday, September 30, 2008
Thursday, September 18, 2008
सिमरन की मदद क्या कोई करेगा?
वो नन्हीं पांच साल की सिमरन अपने बड़े और छोटे मामा के साथ ऑफिस आई। कितनी प्यारी बच्ची है। ऑफिस में जैसे-जैसे ये पता चलता रहा तो अधिकतर उससे मिलने पहुंचे। कोई उसके जख्मों पर मरहम नहीं लगाने गया। जो भी गया वो ये देखने गया कि इस बच्ची को देख तो लें जिसने इतना सहा है। किसी के हाथ में चॉकलेट, तो कोई बिस्कुट के पैकेट के साथ, तो कोई टॉफी, जूस लेकर उसके पास पहुंचे। मामा को सिर्फ ये चिंता थी कि क्या वो सिमरन के पिता के अरमान पूरे कर पाएंगे। अशोक कुमार जो कि सिमरन के पिता थे वो अपनी बच्ची के लिए बड़े-बड़े सपने देखते थे। शायद हर पिता देखता है पर जब से सिमरन के छोटे भाई की मौत हुई थी तब से ही वो चाहते थे कि सिमरन को कुछ बड़ा जरूर बनाना है। वो सोचते कि अब बेटे की कमी को सिमरन ही पूरा करेगी। पर ये किसी को क्या पता था कि जब सिमरन पांच साल की होगी, तो उस अरमानों वाले पिता का हाथ ही, उसके सर से उठ जाएगा। मां की हालत सुधरी भी है लेकिन उस सदमें से वो अभी तक उभर नहीं पाई है। मामा ने बात छेड़ी कि सरकार तो कुछ कर नहीं रही है, अब तो रिश्तेदार ही हैं जो कुछ कर सकते हैं, यदि आप की तरफ से ये लोगों तक अपील हो जाए तो इस बच्ची का भला होजाएगा।
ये वही सिमरन है जो कि करोलबाग के गफ्फार मार्केट की ४२ नंबर गली में रहती है। जहां पर इन ब्लास्ट का सबसे ज्यादा असर हुआ है। बच्ची सिमरन तो आधे घंटे में दो-चार शब्दों के अलावा कुछ नहीं बोली। उसको देखने से ही लग रहा था कि सिमरन अब बड़ी हो गई है।
लोगों के लिए फोन कॉल खोल दिए गए। फोनों की तो बाढ़ सी आगई। हम बात करना चाहते हैं सिमरन से। कई लोग तो ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। आवाज से ही पता चलता था कि गला रूंधा हुआ है। फिर हमने लोगों को समझाया कि ये कार्यक्रम जो हम आपको दिखा रहे हैं वो महज आपकी हमदर्दी पाने के लिए नहीं है, पूरे देश की हमदर्दी इस बच्ची के साथ है। पर हम चाहते हैं कि कोई इस की मदद के लिए तो सामने आए। फिर कई फोन आए कि हम सिमरन को गोद लेना चाहते हैं। फिर हमने समझाया कि गोद तो आप ले नहीं सकते क्योंकि उसका परिवार है। हम ये लगातार बता रहे थे कि कैसे सिमरन की मदद हो सकती है।
बैंक ऑफ इंडिया के करोल बाग ब्रांच में उसकी माता कमलेश और पिता अशोक कुमार का ज्वाइंट अकाउंट है। बैंक अकाउंट नंबर है-600610110000836.
सभी लोग इस अकाउंट में अपना योगदान करके सिमरन की मदद कर सकते हैं। पर उस आधे घंटे में दो-चार को छोड़कर किसी ने भी हमदर्दी के साथ मदद का भरोसा नहीं दिलाया। पर अब देखना तो ये हैं कि क्या कुछ मदद लोग कर पाते हैं इस बच्ची की।
आपका अपना
नीतीश राज
(नोट- यदि आप में से कोई भी मदद करना चाहे तो ऊपर अकाउंट नंबर दिया हुआ है।)
ये वही सिमरन है जो कि करोलबाग के गफ्फार मार्केट की ४२ नंबर गली में रहती है। जहां पर इन ब्लास्ट का सबसे ज्यादा असर हुआ है। बच्ची सिमरन तो आधे घंटे में दो-चार शब्दों के अलावा कुछ नहीं बोली। उसको देखने से ही लग रहा था कि सिमरन अब बड़ी हो गई है।
लोगों के लिए फोन कॉल खोल दिए गए। फोनों की तो बाढ़ सी आगई। हम बात करना चाहते हैं सिमरन से। कई लोग तो ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। आवाज से ही पता चलता था कि गला रूंधा हुआ है। फिर हमने लोगों को समझाया कि ये कार्यक्रम जो हम आपको दिखा रहे हैं वो महज आपकी हमदर्दी पाने के लिए नहीं है, पूरे देश की हमदर्दी इस बच्ची के साथ है। पर हम चाहते हैं कि कोई इस की मदद के लिए तो सामने आए। फिर कई फोन आए कि हम सिमरन को गोद लेना चाहते हैं। फिर हमने समझाया कि गोद तो आप ले नहीं सकते क्योंकि उसका परिवार है। हम ये लगातार बता रहे थे कि कैसे सिमरन की मदद हो सकती है।
बैंक ऑफ इंडिया के करोल बाग ब्रांच में उसकी माता कमलेश और पिता अशोक कुमार का ज्वाइंट अकाउंट है। बैंक अकाउंट नंबर है-600610110000836.
सभी लोग इस अकाउंट में अपना योगदान करके सिमरन की मदद कर सकते हैं। पर उस आधे घंटे में दो-चार को छोड़कर किसी ने भी हमदर्दी के साथ मदद का भरोसा नहीं दिलाया। पर अब देखना तो ये हैं कि क्या कुछ मदद लोग कर पाते हैं इस बच्ची की।
आपका अपना
नीतीश राज
(नोट- यदि आप में से कोई भी मदद करना चाहे तो ऊपर अकाउंट नंबर दिया हुआ है।)
Tuesday, July 29, 2008
"सुषमा स्वराज चुप रहो..."
कैसा है ये मेरा देश? एक तरफ लोग मर रहे हैं और दूसरी तरफ इन्हीं मरे लोगों पर हमारे द्वारा चुने लोग सियासी चाल चल रहे हैं ये हमारे देश के नेता। सवाल उठता है कि क्या ये ही होती है राजनीति? कोई भी दीन-इमान नहीं। ये देश के राजनेता हैं, हमारे नेता हैं या फिर सिर्फ किसी पार्टी के।
राजनीति मैं कोई अपना नहीं होता, सिर्फ होता है तो दल, उनकी अपनी पार्टी। अब तो पार्टी भी अपनी नहीं। उस पार्टी के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं। कितने ही झूठे आरोप दूसरों पर लगा सकते हैं। जब से विश्वास मत मनमोहन सरकार ने हासिल किया है तभी से आरोपों का दौर चल निकला है। धमाकों के बाद तो ये और तेज होगया। सूरत अब भी बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। इसकी शायद किसी को परवाह नहीं। वो तो राजनीति करने में लगे हैं। हर दिन वहां से जिंदा बम मिल रहे हैं। सूरत में विस्फोटकों से भरी कार मिलने के बाद एक चैनल पर केंद्र सरकार के नुमाइंदे और राज्य सरकार के प्रवक्ता कुत्ते-बिल्ली की तरह एक घंटे तक लड़ते रहे। एक दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगाते रहे। वैसे तो ये आए दिन चल ही रहा है लेकिन अब इसको आगे बढ़ाया बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुष्मा स्वराज ने। सुष्मा तो दो कदम आगे ही निकल गईं और केंद्र सरकार को इस घिनौनी वारदात का सरगना ही बता दिया।
सुष्मा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'जहां तक इन दो घटनाओं का सवाल है बैंगलोर और अहमदाबाद का मुझे इसमें एक साजिश की गंध आती है और ये बात मैंने कल भी कही थी एक पब्लिक मीटिंग में, और आज भी दोहराना चाहती हूं, कि मुझे इसमें एक मेजर कॉन्सपिरेसी की बू आती है कि ये कैश फोर वोट स्कैंडल से ध्यान बटाने के लिए और अमेरिका परस्ती के कारण जो मुस्लिम वोट इन से छिटक गया है उस को भाजापा का कृतिम भय दिखाकर अपने खेमें में लाने के लिए की गई साजिश है और मुझे लगता है कि इस साजिश का जल्दी ही पर्दाफाश होगा।' फिर आगे कहती हैं, 'दो राज्यों को टारगेट बनाया जाए और दोनों में एक तरह से ब्लास्ट हों और विश्वास मत के चार दिन बाद हों, विश्वास मत जीतने के 4 दिन के अंदर-अंदर दो राज्य सरकारें और दोनों राज्य बीजेपी शासित हों और दोनों जगह पर सीरियल ब्लास्ट हों, कहीं 18 तो कहीं 24 इसके कोई मायनें हैं कि नहीं और इसलिए जो मैंने बात कही है circumstancial avidence से प्रूव होती है।' तो ये है वक्तव्य बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज के।
सुष्मा जी ने अपने ब्यान में केंद्र को उन 50 लोगों का क़ातिल करार दे दिया जिनकी इन ब्लास्ट में मौत हुई। क्या ये सच हो सकता है? किस आधार पर वो ये सब कह गईं इस राष्ट्र की जन्ता से? क्या उनके पास कोई भी ऐसे सबूत हैं जिससे ये केंद्र सरकार नंगी हो सके। इस देश की जनता ये जानना चाहती है। आप के माध्यम से बीजेपी ने पूरे दम के साथ इस खून खराबे की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर थोपी है। यदि आप के पास सबूत हैं और आप नहीं बता रहीं हैं तो फिर आप भी इन्हीं लोगों की श्रेणी में आजाती हैं। और यदि सबूत नहीं है तो चुप हो जाइए सुष्मा जी।।।।। यहां पर अभी सियासत का ये सियासी खेल मत खेलिए। सवाल तो ये भी उठता है कि क्या ऐसे काम आप और आपकी पार्टी
ने किए हैं जब वो सत्ता में थी? या जब भी बीजेपी पर कोई भी मुसीबत आती है तो बीजेपी इस तरह से ही निपटती थी इन मुसीबतों से? शायद बीजेपी ही करती थी ऐसा। याद है देश को वो रथयात्रा जो कि एक विध्वंस पर जाकर खत्म हुई थी।
बिना किसी बात के दूसरों पर झूठे आरोप लगाना ही सियासत है। पर शवों पर राजनीति के इस खेल को खेल कर ये राजनीतिक पार्टियां देश की राजनीति को गरक में ले जा रही है। देखना तो अभी ये है कि ऐसे और कितने घिनौने खेल ये लोग हमारे साथ खेलते हैं और राजनीति में लिप्त 'ये' कितने नीचे जाते हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
राजनीति मैं कोई अपना नहीं होता, सिर्फ होता है तो दल, उनकी अपनी पार्टी। अब तो पार्टी भी अपनी नहीं। उस पार्टी के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं। कितने ही झूठे आरोप दूसरों पर लगा सकते हैं। जब से विश्वास मत मनमोहन सरकार ने हासिल किया है तभी से आरोपों का दौर चल निकला है। धमाकों के बाद तो ये और तेज होगया। सूरत अब भी बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। इसकी शायद किसी को परवाह नहीं। वो तो राजनीति करने में लगे हैं। हर दिन वहां से जिंदा बम मिल रहे हैं। सूरत में विस्फोटकों से भरी कार मिलने के बाद एक चैनल पर केंद्र सरकार के नुमाइंदे और राज्य सरकार के प्रवक्ता कुत्ते-बिल्ली की तरह एक घंटे तक लड़ते रहे। एक दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगाते रहे। वैसे तो ये आए दिन चल ही रहा है लेकिन अब इसको आगे बढ़ाया बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुष्मा स्वराज ने। सुष्मा तो दो कदम आगे ही निकल गईं और केंद्र सरकार को इस घिनौनी वारदात का सरगना ही बता दिया।सुष्मा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'जहां तक इन दो घटनाओं का सवाल है बैंगलोर और अहमदाबाद का मुझे इसमें एक साजिश की गंध आती है और ये बात मैंने कल भी कही थी एक पब्लिक मीटिंग में, और आज भी दोहराना चाहती हूं, कि मुझे इसमें एक मेजर कॉन्सपिरेसी की बू आती है कि ये कैश फोर वोट स्कैंडल से ध्यान बटाने के लिए और अमेरिका परस्ती के कारण जो मुस्लिम वोट इन से छिटक गया है उस को भाजापा का कृतिम भय दिखाकर अपने खेमें में लाने के लिए की गई साजिश है और मुझे लगता है कि इस साजिश का जल्दी ही पर्दाफाश होगा।' फिर आगे कहती हैं, 'दो राज्यों को टारगेट बनाया जाए और दोनों में एक तरह से ब्लास्ट हों और विश्वास मत के चार दिन बाद हों, विश्वास मत जीतने के 4 दिन के अंदर-अंदर दो राज्य सरकारें और दोनों राज्य बीजेपी शासित हों और दोनों जगह पर सीरियल ब्लास्ट हों, कहीं 18 तो कहीं 24 इसके कोई मायनें हैं कि नहीं और इसलिए जो मैंने बात कही है circumstancial avidence से प्रूव होती है।' तो ये है वक्तव्य बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज के।
सुष्मा जी ने अपने ब्यान में केंद्र को उन 50 लोगों का क़ातिल करार दे दिया जिनकी इन ब्लास्ट में मौत हुई। क्या ये सच हो सकता है? किस आधार पर वो ये सब कह गईं इस राष्ट्र की जन्ता से? क्या उनके पास कोई भी ऐसे सबूत हैं जिससे ये केंद्र सरकार नंगी हो सके। इस देश की जनता ये जानना चाहती है। आप के माध्यम से बीजेपी ने पूरे दम के साथ इस खून खराबे की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर थोपी है। यदि आप के पास सबूत हैं और आप नहीं बता रहीं हैं तो फिर आप भी इन्हीं लोगों की श्रेणी में आजाती हैं। और यदि सबूत नहीं है तो चुप हो जाइए सुष्मा जी।।।।। यहां पर अभी सियासत का ये सियासी खेल मत खेलिए। सवाल तो ये भी उठता है कि क्या ऐसे काम आप और आपकी पार्टी
ने किए हैं जब वो सत्ता में थी? या जब भी बीजेपी पर कोई भी मुसीबत आती है तो बीजेपी इस तरह से ही निपटती थी इन मुसीबतों से? शायद बीजेपी ही करती थी ऐसा। याद है देश को वो रथयात्रा जो कि एक विध्वंस पर जाकर खत्म हुई थी।बिना किसी बात के दूसरों पर झूठे आरोप लगाना ही सियासत है। पर शवों पर राजनीति के इस खेल को खेल कर ये राजनीतिक पार्टियां देश की राजनीति को गरक में ले जा रही है। देखना तो अभी ये है कि ऐसे और कितने घिनौने खेल ये लोग हमारे साथ खेलते हैं और राजनीति में लिप्त 'ये' कितने नीचे जाते हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
Monday, July 28, 2008
'मेरे पापा कहां गए?' जवाब दो मोदी

एक बच्चा रो रहा है, मासूम सा बच्चा, पूछ रहा है अपनी पूरी मासूमियत के साथ, सब से कि बताओ 'मेरे पापा कहां गए'? क्या जवाब है किसी के पास। मोदी जवाब दो उस रोते हुए बच्चे के इस मासूम सवाल का। क्या जवाब है तुम्हारे पास। तुम्हारे पास तो कतई नहीं है मोदी। नहीं तुम्हारे में इतनी हिम्मत ही नहीं कि पोछ सको उस मासूम के आंसू किसी के भी आंसू और दे सको जवाब। होता तो तुम आतंकवादियों के निशाने पर नहीं होते। क्या किसी के पास भी है उस छोटे से बच्चे के सवालों का जवाब? वो बच्चा कह रहा है कि वो अनाथ हो गया है। पूरी जिंदगी बिना पिता के साये के कैसे काटेगा। 'जवाब दो मोदी, जवाब दो'।
वैसे, अब बात धमाकों के आतंक की, बैंगलोर और अहमदाबाद के बाद रविवार को सूरत को दहलाने की फिराक में थे आतंकवादी। अहमदाबाद के बाद सूरत ही था उनके निशाने पर। हमें अपने ही देश में अपनों से खतरा है। हमारे देश में ही कुछ ऐसे बैठें हैं जो कि हमारी ही जड़ काटे जा रहे हैं। बैंगलोर में 7 ब्लास्ट और अहमदाबाद में सिलसिलेवार 16 धमाके इस बात के गवाह हैं कि आतंकवादियों के हौसले पहले से ज्यादा बुलंद हो रखे हैं। सुबह ही सूरत में एक काले रंग की वैगन आर कार मिली, जो की विस्फोटकों से भरी हुई थी। यदि बम निरोधक दस्ते की बात मानें तो उस में इतना बारूद था कि 25 धमाके तो आराम से किए जा सकते थे। तो खुद सोचिए कि वो २५ जगह कहां-कहां हो सकती थी। मतलब की बारूद के ढेर पर अब भी बैठ हुआ है गुजरात। सूरत से ही एक जिंदा बम भी निष्क्रिय किया गया। यदि इस बम में विस्फोट हो जाता तो इतना नुकसान होता कि आंकलन भी नहीं हो पाता क्योंकि इसमें काफी अधिकमात्रा में विस्फोटक थे। चलिए ये तो शुक्र मनाइए कि उस बम का क़हर ढाने से पहले ही बम निरोधक दस्ते ने उसे निष्क्रिय कर दिया।
अहमदाबाद के साथ-साथ सूरत में भी हलचल बढ़ गई थी। पूरे देश की निगाहें सूरत पर थी। शाम होते-होते एक और कार बरामद की गई। ये कार भी विस्फोटकों से भरी हुई थी। ये एक लाल रंग की वैगन आर कार थी। ये कार भी पिछली कार की सीरीज में ही थी। इन दोनों कारों के नंबर भी फर्जी थे। समय रहते लोगों की सूझबूझ से पुलिस ने इस कार को भी अपने कब्जे में कर इस में से बरामद 4 जिंदा बमों को निष्क्रिय कर दिया और विस्फोटकों से भरी ये कार जिस काम के लिए इसका इस्तेमाल होना वाली थी, नहीं हो सकी। लेकिन इस बात से साफ जाहिर हो गया कि आतंकवादियों के क्या मनसूबे क्या थे। वो पूरे गुजरात को हिला के रख देना चाहते थे। पूरे देश को दिखा देना चाहते थे कि वो क्या कर सकते हैं और साथ ही खुफिया तंत्र कितना लचर हो चला है कि वो कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वो खुफिया विभाग के मुंह पर तमाचा मारना चाहते थे।
पहले ई-मेल भेज कर धमकी के साथ-साथ सूचना देना कि देखो हम ये करने वाले हैं। हमें रोक सको तो रोक लो। फिर जगह-जगह विस्फोट होते हैं और फिर वो आगे-आगे हमारी खुफिया एजेंसी पीछे-पीछे। वो और आगे निकलते जाते हैं और खुफिया तंत्र और पीछे रहते जाते हैं। वो देश छोड़ कर विदेश में बैठ, अपना नेटवर्क चलाते हैं हम देश में उनकी तलाश जारी रखते हैं। कुछ वक्त के बाद जैसा इनवैस्टिगेशन जयपुर ब्लास्ट में हुआ, कुछ हिरासत में लिए गए, कुछ से पूछताछ चली फिर वो ही हाल 'ढाक के तीन पात'।
क्यों आतंकवादियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं। यदि देश में सक्रिय देश के विरोधी संगठनों पर भी खुफिया विभाग कुछ कार्रवाई नहीं कर पाती य़ा उन पर नजर नहीं रख
सकती तो फिर मानिए कि देश का ऊपर वाला ही रखवाला है।
वैसे, पूरे देश में अलर्ट घोषित कर दिया गया है। दिल्ली, मुंबई, भोपाल जैसे शहरों के साथ ही और महानगरों में हाई अलर्ट जारी किया गया है। हमें आतंकवादियों से खतरा है या फिर देश में बैठे कुछ गद्दारों से। लेकिन कुछ भी हो उन मांओं का क्या जिन्होंने अपनी आंख के तारे खो दिए। उन बच्चों का क्या जो की अनाथ हो गए। उस बूढ़े बाप का क्या दोष जिसको अपने ही बेटे की अर्थी को कंधा देना पड़ा। उस मां-बाप का क्या जो बैठे तो थे अपनी बेटी को डोली में विदा करने के लिए, लेकिन विदा कर रहे हैं हमेशा के लिए। क्या इन सबने किसी का कुछ भी बिगाड़ा था? इस खामोश सवाल का जवाब कौन देगा? क्या सरकार में है इतना दम जो जवाब दे सके। या फिर वो जवाब देंगे जिन्होंने इस को अंजाम दिया है। नापाक इरादे वालों क्या है तुम्हारे पास कोई जवाब। तुम्हारे भी तो होंगे कहीं पर कोई
अपने। क्या तुम दे सकते हो इस सब सवालों के जवाब। क्या मोदी दे पाएंगे उस रोते हुए मासूम बच्चे के सवाल का जवाब, 'मेरे पापा कहां गए'?
आपका अपना
नीतीश राज
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“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”