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Friday, August 19, 2011

’हमें भूलने की बीमारी है।‘


बहुत लोगों कह रहे हैं कि अन्ना का ये अनशन एक ब्लैकमेलिंग है। अन्ना सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं। साथ ही अरविंद केजरीवाल का एक कमेंट, जनतंत्र में जनता की तानाशाही को ही जनतंत्र कहते हैं। डायलॉग था, अच्छा लगना ही था।

हमारे घर में घुसकर 164 से ज्यादा लोगों को मार देना और उस कातिल की हिफाजत के लिए करोड़ों खर्च करना, किसी लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी है। उन 164 लोगों के परिवार से पूछो कि वो क्या चाहते हैं और पूछो 300 से ज्यादा लोगों से जो उस हमले में घायल हो गए। हमें भूलने की बीमारी है

मैं इस अनशन को तानाशाही नहीं मानता, जब पानी सर से ऊपर चला जाता है तो ऐसी क्रांति होती है। सरकार को बताने के लिए कि अपनी मनमानी मत करो। जनता ही यहां की सिकंदर है।

वहीं मैं अपने उन दोस्तों से पूछना चाहता हूं कि जब सरकार किसी काम को करने की पहल ना करे। तब जनता उस काम को खत्म करने के लिए कदम आगे बढ़ाए तो क्या गलत है। लोग कह रहे हैं कि अन्ना का तरीका गलत है पर मैं कहता हूं कि इस तरीके में बुराई क्या है। सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठा रही और जो उठा रही है वो नाकाफी हैं। जिन पर लगाम लगाने की जरूरत है उन पर लगाम नहीं लगा रही तो सरकार की ऐसी कोशिशों का क्या फायदा? वो तो करप्शन को ही बढ़ावा दे रहे हैं।

लोग कह रहे हैं, हमारे देश में संसद है और संसद से बड़ी कोई चीज नहीं। हम भी कहते हैं कि हां संसद में ही लोकपाल बिल बने पर वो जन लोकपाल बिल हो। उस बिल में सांसदों, नेताओं और दबंग लोगों को रियायत ना मिले।

संसद के नुमाइंदे बनाएंगे लोकपाल। बनाओ, किस ने मना किया है। पर उस बिल से हमें शर्मिंदा ना होना पड़े। जैसे कि नोट फॉर वोट केस में होना पड़ा था। उन सांसदों को जनता ने ही चुना था। जिनको आज एतराज हो रहा है उन्होंने सांसदों को बड़ा भलाबुरा कहा था। जानता हूं कि हमें भूलने की बीमारी है

सरकार के मनीष तिवारी अन्ना पर आरोप लगाते रहे तब लोगों को ये क्यों नहीं लग रहाकि सरकार गलत कर रही है। सावंत कमिशन का हवाला देते हुए मनीष तिवारी ने तो अन्ना को सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी तक कह डाला। तब किसी ने 74 साल के उस शख्स के बारे में, जिसे अन्ना कहते हैं, नहीं सोचा। सरकार का मतलब साफ था कि आप अनशन करोगे या सरकार के खिलाफ बोलोगे तो हम आपके ऊपर इल्जाम लगाएंगे। इसे आप क्या कहेंगे भाईचारा’?

आज ऐसा जनसैलाब उमड़ा है वो टीम इंडिया के वर्ल्ड कप जीतने के बाद भी नहीं देखा गया था। लोग चल रहे हैं पानी में भीग कर साथ दे रहे हैं। आप भी साथ दो अन्ना का ना सही पर भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए आगे आओ। जब हम सुधरेंगे तब सिस्टम सुधरेगा। 
अब भी सोए रहे तो फिर कब जागोगे?

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, September 10, 2009

एंबुलेंस, ट्रैफिक और जिंदगी की कश्मकश


घर की सोसायटी से निकलते ही कुछ दूरी पर बाएं होते ही ट्रैफिक से सामना हो ही जाता है। रेंगती हुई चलती गाड़ियां ऐसे जैसे कोई अजगर शिकार निगलने के बाद धीर-धीरे रेंग कर किसी सुरक्षित स्थान पर लहराकर जा रहा हो। एनएच की राह पकड़ते-पकड़ते ही कई गाड़ी वाले अपना धैर्य खो देते हैं और आगे निकलने की होड़ में वो ऐसा काम करने लग जाते हैं जिसे हम सुबह-सुबह बोहनी खराब करना कहते हैं। पर अब तो आदत सी पड़ गई है फिर भी एनएच तक पहुंचने में ही काफी वक्त निकल जाता है।
एनएच पर गाड़ियों का काफिला एक दूसरे के पीछे और उनमें से कुछ ऐसे जो इस काफिले में सब से पीछे और हसरत सबसे आगे चलने की। रास्ते में सिर्फ और सिर्फ पों....पों....पों....पों.....की आवाज़। पता नहीं क्यों सारी दुनिया हॉर्न बजाने लग जाती है जब कि जानती है कि आगे वाला भी सड़क पर अपना घर बनाने नहीं आया। वो भी मौका पाते ही आगे बढ़ेगा और यदि वो आगे नहीं बढ़ रहा तो क्या हॉर्न बजाकर आप गाड़ी के ऊपर से निकल जाएंगे। पता नहीं क्यों लोग दिमाग से ज्यादा हॉर्न का इस्तेमाल करते हैं।
पीछे से एंबुलेंस के सायरन की आती आवाज़ ने मेरे ध्यान को भंग किया। टों....टों.....टों.... टों.....की आवाज़ दूर से ही अपने लिए रास्ता मांगते हुए लगी। अपनी बाइक की सीट से मैंने सायरन को देखने की कोशिश की। वो चारों तरफ गाड़ियों से घिरा सिर्फ और सिर्फ चीख रहा था जो वो कर सकता था। याद आता है बचपन में गुरूजी कहते थे कि बेटा एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस की गाड़ियों के लिए हमेशा रास्ता छोड़ देना चाहिए। शायद सायरन भी बार-बार बजते हुए ये ही कह रहा था कि मुझे रास्ता दो
कुछ इसी उधेड़बुन में मैं लगा हुआ था और धीर-धीरे आगे बढ़ रहा था पर एंबुलेंस को आगे बढ़ने की जगह नहीं मिल रही थी। सायरन अपनी ही आवाज़ में चिंघाड़ रहा था,....टों....टों..... टों....टों.....। आवाज़ तेज होती जा रही थी और रास्ता उतना ही सकरा।
रेड लाइट पर ट्रैफिक वालों और कुछ लोगों की मदद ने उस एंबुलेंस को निकालने की पहल की। ट्रैफिक तुरंत साफ करते हुए एंबुलेंस को निकाला गया। एंबुलेंस के निकलते ही काफी कारें एक साथ झपटीं, सब के दिमाग में ये ही चल रहा होगा कि एंबुलेंस के पीछे रहेंगे तो बिना रुकावट गंतव्य तक पहुंच जाएंगे।
मैंने अपनी बाइक की स्पीड थोड़ी तेज की और एंबुलेंस के पीछे पहुंच गया। जब रेड लाइट पर मेरे पास से गुजरी थी एंबुलेंस तो आंखों ने देखा कि उसमें एक महिला बैठी हुई थीं और ग्लूकोस स्टैंड था। जब एंबुलेंस ने मुझे क्रॉस किया तो एक हाथ ऊपर उठा और फिर नीचे गिर गया। बस। क्या चल रहा है इस एंबुलेंस में ये जानने का दिल कर गया। एंबुलेंस का ड्राइवर मरीज की हालत की गंभीरता को समझते हुए शायद 60 के ऊपर नहीं जा रहा था या फिर सड़क में हो चुके गढ्ढे उसे जाने नहीं दे रहे थे। पर सायरन अब भी उसी तेजी के साथ रास्ते के ऊपर भागता जा रहा था।
एंबुलेंस में एक लड़के पर ग्लूकोज लगा हुआ था और बार-बार लड़का अपना दूसरा हाथ ऊपर-नीचे कर रहा था। हाथ चाहे ऊपर हो या फिर नीचे बगल में बैठी महिला लगातार शून्य में देख रहीं थी। एंबुलेंस ने लेफ्ट साइड का इंडिकेटर दिया और एंबुलेंस बाएं जाने लगी, धीरे-धीरे मुझसे दूर, मेरा और उसका रास्ता जुदा हो गया था। जब तक वो मेरी आंखों से ओझल नहीं होगई मेरी आंखें उसी का पीछा करती रहीं। मुझे दाहिने मुड़ना था मैं आगे बढ़ा और फिर उसी ट्रैफिक में ये सोचते हुए गुम हो गया, क्यों हम खुद से किसी के लिए रास्ता नहीं छोड़ते, क्यों?
आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, September 1, 2009

चलो देख के अच्छा लगा कि मेरे देश में भी लोग फुटबॉल के दीवाने हैं। विलेन बना हीरो।

भारत में भी लोग फुटबॉल के दीवाने हैं ऐसा लगता नहीं था पर आज लगा। ऑफिस में अधिकतर लोग टीवी से चिपके हुए थे। लग रहा था कि ये फुटबॉल का नहीं बल्कि भारत बनाम पाकिस्तान के बीच कोई क्रिकेट का मुकाबला चल रहा हो।


दिल्ली में हो रहे नेहरू कप को देखने के लिए हजारों फुटबॉल प्रेमी अंबेडकर स्टेडियम पहुंचे। खचाखच भरे स्टेडियम में पिछली बार के चैंपियन भारत का मुकाबला पिछली ही बार की रनर अप सीरीया से था। 29 अगस्त, 2007 को भारत ने सीरीया को 1-0 से हराकर पहली बार नेहरू कप अपने नाम किया था। 31 अगस्त, 2009 को भारत ने फिर से सीरीया को हराकर दूसरी बार लगातार नेहरू कप पर कब्जा जमाया।


सीरीया की रैंकिंग पर यदि गौर करें तो वो भारत से 61 पायदान ऊपर है। जहां भारत की रैंकिंग श्रीलंका के बराबर 156 है वहीं सीरीया की रैंकिंग 95 है। नेहरू कप से पहले भारत के कप्तान और स्ट्राइकर बाइचंग भूटिया ने कप को फिर से अपने कब्जे में करने की बात कही थी और वो कर दिखाया।


लीग मैचों में सीरीया ने एक भी मैच नहीं गंवाया। वहीं भारत शुरूआती मुकाबला लेबनान से और लीगा का अंतिम मैच सीरीया से हारा। माना कि सीरीया के खिलाफ लीग मैच के दौरान भारत के चार स्टार खिलाड़ी नहीं खेल रहे थे। फाइनल में शुरूआत से ही दोनों टीमें एक दूसरे को टक्कर दे रही थी। सीरीया के लंबे कद काठी के खिलाड़ियों से पूरी तरह से कोच हॉटन की टीम टक्कर ले रही थी। 90 मिनट के बाद तक दोनों टीमें एक दूसरे पर गोल नहीं दाग सकी। इस 90 मिनटों में भारत के हाफ में बॉल ज्यादा रही पर फिर भी भारत के डिफेंडरों ने जान लगाकर बॉल को गोल के अंदर नहीं पहुंचने दिया। वहीं भारत की तरफ से गोल में ज्यादा बार निशाना साधा गया।


फिर मिला 30 मिनट के एक्स्ट्रा टाइम। अंतिम दस मिनटों के खेल में गर्मागर्मी भी कई बार हुई। भूटिया को गेंद लेजाते समय सीरीया के एक खिलाड़ी ने पीछे से जानबूझकर गिरा दिया। 114वें मिनट में भारत की तरफ से 8 नंबर की जर्सी पहने रेनेडी सिंह ने फ्री हिट ली। दाईं की तरफ से गेंद घूमी और फिर 5 खिलाड़ी की दीवार को झांसा देते हुए बाएं की तरफ घूमते हुए फुटबॉल गोलपोस्ट के अंदर समा गई। इस शानदार शॉट ने मुझे वर्ल्ड कप में बेखम की शॉट की याद दिला दी। भारत को बढ़त मिल चुकी थी। पर मैच की सीटी बजने से ठीक पहले सीरीया के ड्याब ने हेडर से गोल उतार दिया और एक्स्ट्रा टाइम के बाद स्कोर था 1-1। अब फैसला पेनेल्टी शूटआउट से होना था।


अब दारोमदार था भारत के गोलकीपर के ऊपर। उस गोलकीपर के ऊपर जिसे कभी कोलकाता का कोई भी क्रिकेट क्लब लेने से मना कर देता था क्योंकि इस शख्स के ऊपर कई बार इल्जाम भी लगे थे। उन इल्जामों के बारे में आज भी सुब्रतो पाल बात नहीं करते। जहां तक मुझे याद आता है 5 दिसंबर, 2004 को सुब्रतो पाल शायद वो ही गोलकीपर थे जिससे टक्कर लगने के बाद विपक्षी टीम के एक खिलाड़ी की मौत हो गई थी। उस खिलाड़ी का नाम था क्रिस्टियानो जूनियर। पाल को दो महीने के लिए सस्पेंड कर दिया गया था। आज वो ही विलेन हीरो बन गया।


भारत की तरफ से पहली पेनेल्टी में क्लाइमेक्स ने गोल दाग दिया। सीरीया के राजा राफे ने गोल बराबर कर दिया। पर भारत की तरफ से फील्ड में एकमात्र गोल करने वाले रेनेडी सिंह की बॉल गोलपोस्ट पर जा लगी और मिस हो गई। पर सुब्रतो पाल ने सीरीया के अयान की गेंद को रोक कर मामला फिर से पटरी पर ला दिया।


दिल्ली के छेत्री ने भारत को लीड दिला दी वहीं सीरीया के अहमद हज की गेंद को कमाल की गोलकीपरिंग का नमूना दिखाते हुए उसे बाएं हाथ से रोक दिया। और फिर भारत के डयास ने कोई गलती नहीं की बढ़त को और आगे बढ़ाने में।


यदि ये गोल सीरीया नहीं कर पाता तो वो मैच हार जाता। इस बार गोलकीपर कप्तान बलहउस ने हिट ली और गोल। भारत के मेहराजुद्दीन अब जीत का गोल दागने गए पर चूक गए। वहीं सीरीया के अब्दुल फतह ने गोल दाग दिया और स्कोर बराबर होगया।


अब बारी थी स्डन डैथ की। भारत की तरफ से अनवर ने गोल दाग दिया और जोश की लहर पूरे स्टेडियम में गूंज गई। निडर और कूल लग रहे भारत के गोलकीपर ने जाकर गोलपोस्ट संभाला और सीरीया के अलाटोउनी ने किक ली और उस ऊपर उठती बॉल को सुब्रतो पाल ने गोलपोस्ट के ऊपर से बाहर का रास्ता दिखा दिया। और भारत जीत गया।


मैन ऑफ द मैच के अवॉर्ड से भारत के गोलकीपर सुब्रतो पाल को नवाजा गया और मैन ऑफ द टूर्नामेंट बाइचंग भूटिया को दिया गया।


दिल्ली के खचाखच भरे अंबेडकर स्टेडियम में चक दे गूंज उठा। देख कर अच्छा लगा कि चलो भारतीय फुटबॉल के भी चाहने वाले हैं वो अभी मरी नहीं है यानी अभी इसे आगे बढ़ना है।

आपका अपना

नीतीश राज

Friday, August 7, 2009

ये इबादत नहीं है...शक्ति प्रदर्शन का एक जरिया है।

कल रात 11 बजे जब मैं ऑफिस में था तब एक खबर आई कि दिल्ली में दो आतंकवादियों को धर दबोचा गया है। पहली नजर में लगा कि 15 अगस्त से पहले तो गिरफ्तारी लाजमी है ही और वैसे भी खुफिया तंत्र ने दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस से पहले अलर्ट जारी कर रखा है। फिर ख़बर में अपडेट हुआ कि दोनों को दरियागंज से पकड़ा गया है और दोनों आतंकी दिल्ली में अपने मोड्यूल से मिलने आए थे। दोनों आतंकी हिजबुल के थे और जम्मू-कश्मीर के रहने वाले और पाक में ट्रैनिंग लेकर के दिल्ली आए थे। दोनों के पास से एक-47, कारतूस, हैंड ग्रेनेड मिले थे यानी देखा जाए तो दोनों दिल्ली के किसी भी हिस्से में कोहराम मचा सकते थे और साथ ही मुंबई 26/11 जैसी वारदात को अंजाम दे सकते थे।

इस खबर के आने के लगभग 10-15 मिनट के बाद ऑफिस से गए हुए एक साथी का फोन आया कि आईटीओ पर पूरा जाम लगा हुआ है। एक बाइक पर ४-४ लड़के, किसी भी टू व्हीलर पर ३ से कम तो कतई नहीं निकले हुए हैं। मुझे पता था कि वो सब कहां जा रहे हैं मैंने तुरंत उनको बताया कि आज शब-ए-रात है और सारे मुसलमान इबादत के लिए जामा मस्जिद जाते हैं साथ ही इनकी तादाद कुछ ज्यादा ही होती है तो बेहतर ये कि पंगा मत लेना क्योंकि भीड़ पागल होती है और भीड़ के लिए कोई कानून नहीं होता है।

मेरे साथी ने जवाब दिया कि ट्रैफिक, जाम, इबादत और हुड़दंग में अंतर करना उन्हें आता है। ये हुड़दंग है, ये शक्ति प्रदर्शन है जिसे चाह रहे हैं ये लोग उल्टा-सीधा कहकर आगे निकल जा रहे हैं। इनकी तादाद भी इतनी ज्यादा है कि कोई पंगा क्या कुछ बोल नहीं सकता। पुलिस सिर्फ देख रही है और कुछ कर नहीं पा रही है उसमें भी सोने पर सुहागा दो हवलदार खड़े होकर ट्रैफिक संभाल रहे है बाकी सब बैठे हुए हैं। मैं भी सहमत था कि सच कायदे कानून को तो मानना चाहिए। खासकर टू व्हीलर पर ४-४ लोग बैठें हुए बिना हेल्मेट के हजारों लोग घूम रहे हैं क्यों। जब ऑफिस खत्म करके मैं भी गया तो ये ही हाल था हजारों की तादाद में आईटीओ पर कानून की धज्जियां पुलिस हेडक्वाटर के सामने ही उड़ाई जारही थीं। हमारे साथ आ रहे एक साथी की कार में भी कुछ लड़के बाइक से उतरकर जबर्दस्ती घुसने की कोशिश कर रहे थे। ये तो शुक्र है कि मौके पर पुलिस पहुंच गई वर्ना कुछ और ही होता।

मैंने तुरंत काउंटर किया कि याद है, कुछ दिन पहले कावड़ियों के कारण भी इसी तरह हम लोग त्रस्त थे, कितनी परेशानी होती थी। वो भी सहमत था मेरी बात से। मैं सोच में पड़ गया कि क्यों हमें जरूरत पड़ती है अपने धर्म को दिखाने के लिए शक्ति प्रदर्शन की। क्यों जरूरत पड़ती है हमें लाउडस्पीकर की और उस पर चीख-चीख कर लोगों को अपने अल्लाह का नाम दूसरों को जबर्दस्ती सुनाने की। क्यों हमें जरूरत पड़ती है लगातार, बार-बार घंटी बजाने की। लोग कहते हैं कि भगवान चीखने से नहीं साधना से मिलता है। तो क्या हमारा धर्म के नाम पर ये शक्ति प्रदर्शन ठीक है?

आपका अपना
नीतीश राज

(दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस के जज्बे को सलाम करना चाहूंगा कि दरियागंज जैसे इलाके से इतनी सफाई से दो आतंकी पकड़ लेना और वो भी इबादत की रात में एक कामयाबी ही कहूंगा। वर्ना यदि थोड़ी सी भी चूक हो गई होती तो बाटला जैसा इल्जाम फिर लग सकता था।)

Saturday, July 11, 2009

दोस्त के पिता का इंतकाल और निगमबोध घाट का हादसा

उसका जवाब होता कि, सिर्फ वो सांस ही खुद ले सकते हैं।
सुबह-सुबह पता चला कि हमारे साथ काम करने वाले एक सहयोगी के बाबूजी की हालत नाजुक है। वैसे भी उसके पिताजी काफी दिन से बीमार चल रहे थे। उनकी किडनी जवाब दे चुकीं थी उपर से वो डायबेटिक भी थे। काफी दिन से उनका इलाज गंगाराम और एम्स में इलाज चल रहा था। बार-बार खून चढ़ाया जाता और बदला जाता, पहले तो उनका हर रोज डायलिसिस होता था पर फिर थोड़ा अंतराल के बाद होने लगा। अब तो आते-आते उनके शरीर के कई हिस्सों में दर्द होने लगा था। जब भी कोई उससे पूछता कि तुम्हारे पिताजी कैसे हैं? उसका जवाब होता कि, सिर्फ वो सांस ही खुद ले सकते हैं। तो उसके जवाब ही पूरी तबीयत बयान कर देते हैं। साथ में ये वो जरूर जोड़ता कि वो दिमाग से अब भी बहुत पक्के हैं, वहां कमजोरी की कोई झलक नहीं दिखती यानी यार्दाश्त हमसे भी अच्छी।
मैं निगम बोध घाट देर से पहुंचा, पर वक्त पर पहुंचा। उसके पिताजी अपनी अंतिम यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके थे। मेरा सहयोगी अंतिम चक्कर लगा कर मुखाग्नि देने को झुक चुका था।
हम में से कुछ ने तो सुबह ही ये मान लिया था
कि शायद ही अब वो बचें। पर जहां तक हमारी बात थी तो हमें उसकी छुट्टी की आदत पड़ चुकी थी। वो एक-दो दिन की छुट्टी करता और फिर ऑफिस ज्वाइन कर जाता। हमें इस बार भी ऐसा ही लग रहा था। पर पता नहीं कैसे बातों ही बातों में एक सहयोगी के मुंह से निकल भी गया कि अरे अब तो वो लंबी छुट्टी पर गया। ये महज सुबह का इक्तेफाक भर था पर शाम का सच बन गया।
मैं निगम बोध घाट देर से पहुंचा, पर वक्त पर पहुंचा। उसके पिताजी अपनी अंतिम यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके थे। मेरा सहयोगी अंतिम चक्कर लगा कर मुखाग्नि देने को झुक चुका था। मैं हाथ जोड़कर कायदे अनुसार उस सेज पर एक लकड़ी रख ऑफिस से ही आए एक दूसरे साथी के पास खड़ा होगया। वो अपने रीति-रिवाज के साथ उस काम को अंजाम देने में लगा था जिसे इस धरती पर सबसे बड़ा(कड़ा या भारी) माना जाता है। हम सब शून्य में ताक रहे थे और पुजारी, हवा में हम रुकावट ना बनें, हमें वहां से हटाने में लगे थे।
सभी कोने में खड़े हो गए और फिर अंकल जी के बारे में बात शुरू हो गई।मैं उसके पास पहुंचा तो उसने कहा कि आज १० तारीख है, मुझे भी याद है ये तारीख क्योंकि पिछले महीने ही उसने और मैंने पार्टी का प्रोग्राम बनाया था और कल तक सब ठीक था और आज...। यहां हम बात कर रहे थे और उधर ‘कपाल क्रिया’ का वक्त आ गया। सहयोगी ने जा कर इस काम को भी पूरा किया और वापस आ कर बैठ गया। जब भी कपाल क्रिया होती है तब उसके बाद घी डाला जाता है। वहां पर अधिकतर को इस बारे में नहीं पता था। मेरा सहयोगी गया और चला आया पर पंडित जी ने नहीं बताया कि क्या करना होता है। घी का पूरा एक कैन वहां पर रखा हुआ था पर उसका इस्तेमाल नहीं किया गया। एक दो हमारे से बड़े भी खड़े थे उनमें से एक ने कहा कि जाकर देखो तो घी कुछ है या नहीं। तो छोटे ने जाकर देखा और पाया कि घी वैसा का वैसा ही रखा हुआ था। उसने वेदी पर पूरा घी डाल दिया।
जिसे जहां से लूटने का मौका मिल रहा है वो वहां लूटने में लगा है।
वक्त आ गया था कि जब हम अपने अजीज को
वहां जलती हुई और चिताओं के साथ नित्य अकेला छोड़ चलें। जैसे ही शमशान घाट से बाहर निकल कर पार्किंग में आए तो मेरे होश उड़ गए। आज मैं कार से नहीं बाइक से आया क्योंकि शाम को जाम में एक बार फंसे तो रात कब हो जाएगी पता नहीं चलेता। मेरी बाइक की डिक्की टूटी हुई थी और उसमें रखा सामान गायब था। कहीं रास्ते में बारिश ना आजाए और मेरे को रुक कर अपने पर्स को पन्नी में डाल कर डिक्की में ना रखना पड़े तो ये काम मैंने घर पर ही कर लिया था। अलबत्ता जब मेरे साथियों ने पूछताछ की तो किसी ने बताया कि बंदर डिक्की तोड़ गया है और वो बटुआ लेकर भागा है। थोड़ी मशक्कत के बाद मेरा बटुआ मुझे मिल गया जो-जो चीज बटुए में थी वो भी मिल गई। हां, करीब ५०० का चूना लग गया पर ये बहुत बढ़िया रहा कि मेरे कार्ड मुझे मिल गए वर्ना बहुत दिक्कत होती। वो लोग भी जानते हैं कि जिसका भी पर्स मारेंगे वो कुछ कहेगा नहीं क्योंकि गम में आया है। तो थोड़ा सावधान रहिएगा।
इसे कहते हैं कलयुग। एक पंडा शव के ऊपर पड़ने वाले घी की चोरी करना चाहता था और वहीं दूसरी तरफ गम में डूबे लोगों को चूना लगाया जा रहा था। इल्जाम लगाया जा रहा है कि बंदर बटुआ लेकर भागा। बंदर को और कोई समान नहीं मिला डिक्की में से, देखिए ये भी एक अलग बात है कि बंदर को भी इतना ज्ञान हो गया है कि ये दुनिया सिर्फ पैसों से ही चलती है।
जिसे जहां से लूटने का मौका मिल रहा है वो वहां लूटने में लगा है। यहां मैं कमाना जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा क्योंकि कमाते तो मजदूर लोग हैं लूटते तो लुटेरे हैं। शुरू से अंत तक लुटिए, अब अंतिम पड़ाव पर भी आपको चैन नहीं। हम सब उसके घर आगए और प्रार्थना की, भगवान वो जहां भी हों उनकी आत्मा को शांति दीजिएगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, July 1, 2009

मैं तो चला अपने मेहमान के स्वागत में और आप.....।


बीती रात के बाद सुबह और फिर शाम को फुहार पड़ने के बाद सभी के मुंह से निकल रहा था 'बरसो राम धड़ाके से...'।

बड़े
दिनों से जिसका इंतजार था वो मेहमान पिछली रात घर पर आई।
छम छम करते हुए किसी के आंगन में तो किसी के घर की छत पर अपने कदमों की आहट से सभी को चकित कर गई। अपनी इस अदा से सब को बता गई कि देखो मैं तुम्हारे पास आ चुकी हूं अब घबराने की बात नहीं है। पर ऐसा नहीं था कि वो मेहमान हर समय के लिए आ गई थी। नहीं, वो तो सभी को अपना बना कर और खुद दूसरे की हो कर, राहत की रात देकर, रात की थोड़ी देर की मुसाफिर कुछ देर रुक कर चली गई। पर जाते-जाते फिर आगे आने के वादे के साथ। और वो आई फिर सुबह आई और फिर शाम को भी आई।

जी हां, दिल्ली में हमारी प्यारी बरखा रानी आखिरकार आ ही गईं। सुबह की फुहार के बाद तो ये लगा कि मानसून की दस्तक हो गई है। पर जैसे ही दिन चढ़ने लगा तो लगा नहीं कुछ फैसले जल्दबाजी में नहीं करने चाहिए। जहां सुबह खुशगंवार थी वहीं दोपहर होते-होते उमस से सराबोर हो चुका था दिन। पर शाम होते-होते हमेशा ही गलत जानकारियों के लिए प्रसिद्ध मौसम विभाग ने भी अपना फरमान का पर्चा जारी कर दिया कि अगले २४ से ४८ घंटों तक दिल्ली यूं ही सुबह-शाम भीगती रहेगी। साथ ही ये भी कह दिया कि दिल्लीवासियों के लिए खुशखबरी है कि मानसून पहुंच चुका है। पर शाम होते-होते तो उमस का बोलबाला हो चुका था। पर शाम घिरते के साथ ही फुहारों ने फिर से दिल्ली को भिगोना शुरू कर दिया। रास्ते में आते हुए मैंने बहुत लोगों को देखा कि वो बाइक पर पैदल, साइकिल पर खुश होकर भीगते हुए चले जा रहे थे। किसी को भी इस बात की परवाह नहीं थी कि वो गीले या भीग जाएंगे। शायद इसी बात का तो सभी इंतजार कर रहे थे।

बीती रात के बाद सुबह और फिर शाम को फुहार पड़ने के बाद सभी के मुंह से निकल रहा था 'बरसो राम धड़ाके से...'। पर जब तके दो-तीन घंटों की लगातार बारिश नहीं होगी तो इस चिपचिपी गर्मी से थोड़ी निजात नहीं मिलेगी। वैसे तो सभी जानते हैं कि ये चिपचिपाहट अभी जाने वाली नहीं है या यूं कहें कि अभी तो शुरूआत ही है। वैसे देखा जाए तो हर साल की तरह दिल्ली में इस बार भी मानसून ने समय पर ही दस्तक दी है।

दिल्ली के बाद लगता है कि मॉनसून देश के कोने-कोने में पहुंचने को तैयार हैं। दक्षिण भारत और दिल्ली के बाद अब पूरे देश में मॉनसूनी हवाएं बदलों के साथ पहुंच चुकी हैं। अनुमान है कि अगले 24 से 48 घंटे में दिल्ली के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, और जेके में बारिश तपती धरती के ताप को कम करेगी।

वैसे, अभी तो हम इस मेहमान की आवभगत में लगे ही हुए हैं पर हां थोड़े दिन बाद हम अगले साल का वादा लेकर इस मेहमान को बड़े ही प्यार से रुखसत करेंगे। पिछले साल के कोशी के कोप के बारे में सोच कर ही दिल दहलता है। २६ जुलाई, २००५ को याद करते ही रूह कांपती है। पर छोड़ो अभी तो ये जश्न मनाने का वक्त है मेहमान के स्वागत का वक्त है। मैं तो चला अपने मेहमान के स्वागत में और आप.....आप भी दिल से स्वागत कीजिएगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 4, 2009

अपनी मां का क़त्ल, २४ वार, तब तक मारा जब तक मर नहीं गई वो। क्या नैतिक पतन हो रहा है महिलाओं का?

क्या हवस-वासना के आगे हम अंधे हो जाते हैं? क्या हवस इतनी बड़ी चीज होती है कि कोई उस पर काबू नहीं रख पाए? ‘लस्ट’ याने काम भोग की इच्छा करना और यदि इस इच्छा के बीच में कोई आए तो उस को रास्ते से हटा देना। क्यों बरसात के समय में जानवरों के इलाकों में जाने की मनाई होती है। उसका कारण है कि जानवर जब संभोग करता रहे तो गर कोई उसे इस बीच तंग करे तो वो हमला कर देता है। क्या इंसान फिर से जानवर की तरह ही बनता जा रहा है?

एक मां सारे कष्टों को सहते हुए अपने बच्चों को अपना रूप देने की कोशिश करती है, सही इंसान बनाने की कोशिश करती है। पर क्या गलती हो गई थी उस मां से, जिसने अपनी बेटी को वो करने से रोका जो कि मां को गलत लगा था। शायद उस मां ने भी सोचा होगा कि बस बहुत हो चुका, अब आगे नहीं। बेटी को गलत करने से रोकना ही होगा। मां ने रोका और बेटी ने मां पर तब तक वार किए जब तक की वो मर नहीं गई।

एक, दो, तीन नहीं दर्जन से ज्यादा ब्वॉयफ्रेंड थे साक्षी के। वो अधिकतर अपने घर पर ही उनको बुलाती थी जब कि परिवार वाले घर पर नहीं होते थे। ऐसे ही उसने अपने एक ब्वॉयफ्रैंड को बुलाया और दोनों लिप्त हो गए उस कांड में जिसे की उसकी मां सत्संग से थोड़ा जल्दी वापस आने पर देख नहीं सकी। पर हवस-वासना की आग ने बेटी और उस लड़के से वो करवा दिया जो वो होश में नहीं कर सकते थे। पहले सर पर बीयर की बोतल, फिर सर पर प्रैस से चोट, फिर चाकू और पेचकस से वार। पूरा कमरा खून से लथपथ। उसके बाद लूटपाट की प्लानिंग। पुलिस ने अब तक ये ही जानकारी दी है। पर वहीं दूसरी तरफ पिता और पड़ोसियों की मानें तो ये कि साक्षी पढ़ने में अच्छी थी साथ ही अब वो पढ़ा भी रही थी। और कभी भी कोई शिकायत किसी के सामने नहीं आई थी।

क्या ये मानें कि २६ साल की जवान लड़की गर घर में अविवाहित होगी तो ऐसा होना स्वाभाविक है? क्या ये नारी का नैतिक पतन है? इस एक वाक्ये के कारण ही नहीं कई और भी वाक्ये सामने आए हैं पिछले कुछ समय में जो इस सवाल पर सोचने को मजबूर करते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, January 9, 2009

वो सफर, जो मुझे हमेशा याद रहेगा। मेरी पहली हवाई यात्रा-2।

आगे...
...इतने बड़े ग्राउंड में अपने प्लेन को ढूंढने की असमंजस में मैं इधर-उधर ताकने लगा। कई बस आजा रही थी इतनी देर में ये तो जान गया था कि ये जगह एयरपोर्ट है ना कि कोई बस अड्डा। लेकिन क्या करूं याद आ रही थी बस अड्डे की जहां पर कोई ना कोई जरूर आवाज़ लगाता रहता है, मैं ये ही सोच रहा था कि कोई आवाज़ लगाए कि मुंबई-मुंबई, कोलकाता-कोलकाता,बैंगलोर-बैंगलोर...और मैं पैदल ही वहां का रुख कर लूं। लेकिन ये जगह है इतनी बड़ी कि पैदल ढूंढना भी बहुत मुश्किल है। दिमाग में सिर्फ और सिर्फ ये ही सब घूम रहा था और लगातार दौड़ रहा था पर पैर थे कि जम से गए थे। सुबह के 5.45 बज रहे थे। ठंड भी बहुत थी लेकिन अब तो पसीना आने लगा था। साथ ही वहां पर अभी तक सिर्फ मैं ही अकेला खड़ा हुआ था तो और घबराहट हो रही थी कि कहीं देर तो नहीं होगई। लेकिन तभी वहां पर टाई पहने एक लड़का आया। उसके हाथ में वॉकी टॉकी भी था और उसने मुझे बताया कि अभी बस आएगी और आपको आपके प्लेन तक ले जाएगी।
अब आई सांस में सांस। लेकिन अब दूसरी चिंता सताने लगी और वो चिंता हमेशा ही गलत समय पर आती है वो है लघुशंका की। अब समझ में नहीं आ रहा था कि कहां फारिग होऊं। ग्राउंड स्टाफ कहां जाता है इसका तो पता नहीं था पर यदि जाऊं और बस फिर छूट जाए तो क्या होगा। इसी द्वंद में फंसा हुआ था कि बस आगई और कुछ सह यात्री भी आगए। बस थोड़ी देर रुक कर तकरीबन 15 यात्री को लेकर बस प्लेन की तरफ चल दी। लघुशंका का निवारण तो अब प्लेन में जाकर ही होगा। ये प्लेन होगा हमारा, बस नहीं रुकी, तो ये होगा, ये भी नहीं। करते-करते तकरीबन आधा किलोमीटर घूमने के बाद हम अपने प्लेन तक पहुंचे। या तो मेरे प्रेशर का मामला था या पता नहीं क्या, पर तुरंत मैं बस से उतर कर सीढ़ियों के पास तक जा पहुंचा और मेरे टिकट को आधा फाड़कर चैकर ने आधा मुझे पकड़ा दिया। ऊपर पहुंचा तो दो ऑटियों ने मेरे इस्तकबाल किया और अंदर की तरफ इशारा किया। पहले बिजनेस क्लास पड़ा और तुरंत ही तकरीबन 186 सीटों का इकॉनमी क्लास। अब कहां बैठूं? कुछ दिन पहले ही एक अंग्रेजी मूवी देखी थी कि एयरहोस्टेस खुद बताती हैं कि कहां बैठना है। पर यहां तो ऐसा नहीं था। मैंने तुरंत बोर्डिंग पास पर नजर डाली तो उसमें सीट नंबर लिखा हुआ था 12A। याने समझते देर नहीं लगी कि मुझे कहां बैठना है।
अरे, ये क्या मुझे तो खिड़की के बगल वाली सीट मिली है। कहीं ए नंबर की सीट कोई और तो नहीं होती, पर ऐसा नहीं था और पूरे इत्मीनान के साथ बैठ गया। बैठते ही लघुशंका की शंका का निवारण करने की इच्छा जाग्रित हुई और मैं चल दिया बाथरुम की ओर। मैं जिस से बड़ी देर से त्रस्त था उस से निजात पा लिया। थोड़ी ही देर में मेरी सीट के आगे लगी स्क्रीन पर जो कि मेरे आगे वाले की सीट की बैक थी उस पर संदेश आने लगे। अधिकतर फिल्मों में देखा है कि पहली बार सफर करने वाले को बेल्ट लगाने में बड़ी दिक्कत होती है पर मुझे नहीं हुई। सीढ़ियां हटा ली गईं थी। एयरहोस्टेस जो कि उदघोषिता भी थी उसने सूचना दी कि थोड़ी देर में फ्लाइट उड़ने के लिए तैयार है और उदघोषणा बंद होगई।
धीरे-धीरे विमान बड़ी आवाज़ करते हुए सरकने लगा और रनवे तक पहुंच गया। विमान थोड़ा रुका और मैंने धरती को जी भरकर पास से देखा क्योंकि मेरे बगल में तो कोई था नहीं लेकिन जो भी सहयात्री आजू-बाजू थे वो अपने दोनों हाथ जोड़कर बैठे हुए थे। उनमें से कुछ पढ़ भी रहे थे और कुछ सिर्फ सामने शून्य में देख रहे थे। मैं अपने बगल में बांयी और की विंग को देखने लगा। विमान रनवे पर चल दिया फिर तेज आवाज़ के जरिए दौड़ने लगा। बस एक छोटे से हल्के झटके के साथ मैं आसमान की तरफ बढ़ गया। धरती पीछे और नीचे छूटती जा रही थी और मैं लगातार नीचे देखता जा रहा था। पर ये क्या, प्लेन की लेफ्ट विंग नीचे की तरफ क्यों झुक रही है। मेरा तो कलेजा मुंह को ही आ रहा था और मैं नीचे देखने से डरने लगा। साथ ही मैं दूसरी तरफ झुकने लगा। ऐसा लगा कि कहीं नीचे ही ना गिर जाएं। वो एहसास बड़ा ही खतरनाक था। लग रहा था कि खड़ा हो जाऊं क्योंकि प्लेन एक तरफ काफी झुक गया था और ठीक मेरे नीचे दिल्ली या फिर उसके आसपास के इलाके रहे होंगे। यदि कोई बाईचांस मुझे देख रहा होता तो वो पहचान जाता कि ये मेरी पहली हवाई यात्रा है। मेरी हवाईयां उड़ी हुई थी।
थोड़ा ऊपर जाकर विमान ठीक से चलने लगा। एहसास हो रहा था कि जैसे चढ़ाई में कुछ दिक्कत हुई है और अब वो समतल सड़क पर ठीक से चलने लगा है। पर लगता था कि बीच-बीच में सड़क में बहुत गड़्ढ़े हैं और प्लेन में काफी आवाज़ हो रही थी। लेकिन ऊपस से धरती को देखना का सुख मुझे बहुत ही प्रफुल्लित कर रहा था। साथ ही लग रहा था कि गूगलअर्थ में जो चित्र उभरते हैं वो सचमुच में ही काफी सही और जीवंत लगते हैं।

'बादलों के ऊपर जहां और भी हैं। ऐसा लग रहा था।'

नीचे धरती, उसके ऊपर बादल, उसके ऊपर हमारा विमान और हमारे विमान के ऊपर सिर्फ और सिर्फ साफ आसमान। सूरज ऊगने की फिराक में धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए। बड़ी ही मनमोहक तस्वीर उभरकर सामने आ रही थी। थोड़ी देर बाद नाश्ता आया और पता चला कि हवाई ब्रेकफास्ट कैसा होता है। उस समय हम समुद्र तल से 10700 मीटर की ऊंचाई पर थे और बाहर हवा का तापमान था -46 डिग्री, जी हां, शून्य से 46 डिग्री नीचे। मैं अपने इयरपीस पर गाने सुनता हुआ जा रहा था। चलचित्र और गानों की व्यवस्था भी अंदर थी उसी स्क्रीन पर जहां पर पहले संदेश आ रहे थे। सिर्फ पौने दो घंटे में मैं मुंबई पहुंच गया। पूरी उड़ान के वक्त मैं एक अलग एहसास होता रहा जो कि बिल्कुल अलग था।
जाने में तो वक्त का पता ही नहीं चला। शाम को एक शो करना था शो करके अगले दिन दोपहर की फ्लाइट पकड़कर दिल्ली वापिस हो लिया। लेकिन इस बार की फ्लाइट में कोई दिक्कत नहीं हुई। ऊपर ऐसा लग रहा था कि जैसे सड़क सुधार दी गई हैं जो भी ऊबड़-खाबड़ रास्ते थे वो पाट दिए गए हैं। लेकिन जैसे ही दिल्ली के करीब पहुंचे और उतरने के लिए उदघोषणा हुई सब ने तैयारी कर ली पर ये क्या, प्लेन तो हवा में ही उड़ा जा रहा है। क्या हुआ कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं। कैप्टन ने बताया कि अभी नीचे ट्रैफिक है तो इंतजार कीजिए। अब लगा प्लेन राउंड-राउंड घूमने और यहां मेरी हालत खराब होने लगी। उस समय ऊंचाई ज्यादा नहीं थी और लेफ्ट साइड पूरी तरफ झुक जाती तो लगता कि अब गिरे और तब। जब कोई हवाई यात्रा के सफर पर जाता था और उसके साथ ऐसी कोई घटना होती थी तो हम बहुत चहकते हुए कहते थे कि पैसे तो दो घंटे के लिए दिए थे और ढ़ाई घंटे की मौज ली है, मजा बहुत आया होगा। अब पता चलता है कि क्या हालत होती है जब हवा में अटके रहते हैं तो। 15 मिनट के बाद हमारी फ्लाइट नीचे उतर गई पर अंतरराष्ट्रीय रनवे पर। और वहां से घरेलू रनवे तक हम विमान में दौड़ते हुए आए जिसकी गति लगभग 30 कि.मी. थी।
पर जो कुछ भी था फ्लाइट में आनंद आ गया बस एक बात थी कि बाईं तरफ प्लेन जब झुकता है तो कलेजा मुंह को आता है।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, January 7, 2009

वो सफर, जो मुझे हमेशा याद रहेगा। मेरी पहली हवाई यात्रा।

मेरी पहली हवाई यात्रा कुछ ऐसी रही जिसकी कल्पना भी मैं नहीं कर सकता था और वो हो भी गई यूं ही अचानक। अभी हाल फिलहाल में ही मुंबई हमले के बाद जब कि ये खबर आ रही थी कि अब आतंकवादियों के निशाने पर है एयर रूट याने कि हवा के जरिए आक्रमण। ऑफिस में काम कर रहा था कि तभी हुजूरेवाला ने आदेश के स्वर में पूछा कि कल कौन सी शिफ्ट है। यही, जो आज कर रहा हूं। तो कल तुम्हारी ये शिफ्ट नहीं है। फिर कल सुबह तुमको मुंबई जाना है अपना रिक्रुजेशन भर दो सुबह की ही फ्लाइट है। बहुत दिनों के बाद ये कुछ ऐसा फरमान था जो कि अच्छा लगा। वाह! ऐसे फरमान तो रोज आएं तो सुभानअल्लाह।
जब तक कि एयरपोर्ट के दरवाजे पर नहीं पहुंच गया तब तक मुंह कलेजे को आ रहा था। लग रहा था पता नहीं ऑफिस में कब, कौन से दोस्त रूपी दुश्मन मज़ा बेकार कर दे। क्योंकि कुछ ने तो बहुत प्रयास किए थे, पर भला हो फरमान वाले का कि उस फरमान पर कोई डोरे ना डाल सका। लेकिन कई बार तो ये लगता रहा कि पूरे दिन ये खबर चली है कि अब वायु आक्रमण ही करेंगे आतंकवादी इस लिए लगता है कि ऑफिस के वो लोग जो कि बाज कि तरह ऐसे असाइनमेंट पर नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं उन्होंने इस बार मेरे पर नजरें गड़ा दी, और मुझे बनाया है बलि का बकरा। लगातार जगते हुए मुझे करीब २२ घंटे हो चुके थे साथ ही इस सोच के बावजूद मेरी आंखों में नींद का नामो निशान नहीं था। लगातार जगते हुए मुझे करीब २२ घंटे हो चुके थे पर इस खुशी के आगे आंखों में नींद का नामो निशान नहीं था।
दिल्ली एयरपोर्ट पर जैसे ही गाड़ी ने छोड़ा तो लगा कि अब तो पहली बार हवाई यात्रा हो ही जाएगी। लेकिन परेशानी ये थी कि इस से पहले मैं कभी भी एयरपोर्ट नहीं आया था। दो-चार बार दोस्तों को छोड़ने आया था तो बस ये पता था कि यहां पर छोड़ते हैं और इस जगह के आगे आप नहीं जा सकते। मैंने एक हाथ में टिकट रख लिया और गेट पर पहुंचा और लाइन में लग गया। एक सिक्योरिटी गार्ड ने मेरे हाथ में ई-टिकट देखकर उसने कहा कि आप चाहें तो वहां(दूसरे गेट) से भी एंट्री कर सकते हैं। मैं उस राह हो लिया। मेरा आईडी कार्ड और टिकट चैक करने के बाद मैंने पहली बार किसी भी एयरपोर्ट पर पहली बार कदम रखा।
अंदर तो मैं आ गया था पर सबसे बड़ी बात ये लग रही थी कि अब आगे क्या। क्या करना हैं, मुझे कहां जाना होगा? कुछ भी तो पता नहीं था, पर सुना था कि कोई बोर्डिंग पास लेना होता है सिर्फ इस टिकट से काम नहीं चलता। पर ये मिलेगा कहां? तो देखा कि सामान की चैकिंग भी हो रही थी। तो क्या पहले सामान की चैकिंग करवाऊं या कि बोर्डिंग पास लूं। दिमाग का फैसला था कि टिकट ले लिया जाए। वहीं पास में एंट्री काउंटर था जहां पर मैंने पूछा कि क्या ये एयर इंडिया का काउंटर है तो उन्होंने कहा कि पहले आप को यहां से टिकट पर स्टैंप लगवानी होगी फिर आप को वहां जाना होगा और उसका काउंटर वो है किसी में भी लाइन में लग जाइए। वहां से निकलकर बोर्डिंग पास की राह पर चल दिया। इस के बाद मैंने सामान की को रखवाना ही उचित समझा। सामान जहां पर कि बैंड लग रहे थे जैसे पहुंचा तो उसने कहा कि नहीं आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं क्योंकि इसे हम हैंडबैग की तरह ही समझते हैं। ओ.के.। अब बोर्डिंग पास काउंटर की तरफ मैं बढ़ गया, तो किस लाइन में लगूं इकॉनमी या फिर बिजनेस क्लास में? इस ई-टिकट पर तो कुछ भी नहीं लिखा। या कुछ इनीसिएल बनें हों तो मुझे पता नहीं। लाइन में दो शख्स ही थे तुरंत मेरा नंबर आ गया। लेकिन हैंड बैग पर उस शख्स को मैंने एक कार्ड सा लगाते हुए देखा जो कि एयर इंडिया का ही था। मैंने भी उसे अपने बैग के साथ लटका लिया। तुरंत बोर्डिंग पास मिल गया। अब तो मेरा जाना पक्का हो ही गया। काउंटर पर ही बता दिया गया था कि वहां से एंट्री होगी। एक लाइन थी मैं भी लग गया। तुरंत चार-पांच आदमी लाइन से चैक होते-होते वहां पर बढ़े जा रहे थे जहां पर कि हैंड बैग चैक किये जा रहे थे। ये गार्ड सिर्फ आईडी प्रुफ और बोर्डिंग पास चैक कर रहे थे। मेरे आईकार्ड और बोर्डिंग पास चैक होगया और जैसे ही मैंने आगे बढ़ने की कोशिश की तभी मुझे एक गार्ड ने रोक दिया।
मुझे लगा कि जरूर से ही कोई बात होगी। पता चला कि नहीं आगे वालों की चैकिंग नहीं हुई है तो मुझे और मेरे पीछे की जनता को रोक दिया गया। मैं देख रहा था कि एक ट्रे में सब मोबाइल और पर्स तक निकाल के रख रहे हैं साथ ही जैकेट भी। मैंने भी पूरी तैयारी कर ली। जैसे ही आगे जाने का आदेश हुआ तुरंत सब चीजें ऐसे रखी जैसे कि रोज आना जाना लगा रहता है, साथ में बैग भी रख दिया। मशीन के अंदर से चैक होता बैग आगे गया। साथ ही मेरे को भी एक ऑफिसर ने चैक किया बारिकी से फिर मैं आगे बढ़ गया। अब सब चैक पूरे हो चुके थे और जो मैंने बैग में कार्ड लटकाया था उस पर सिक्योरिटी चैक की मुहर भी लग चुकी थी। फिर वही समस्या कि जाना कहां है याने कि अब क्या?
देखा कुछ लोगों को एक महिला बड़े ही प्यार से बात करते हुए साथ ही खड़े पुरुष महोदय चैकिंग करते हुए बैग पर लटके उस कार्ड और बोर्डिंग पास की उन्हें आगे भेज रहे थे। लेकिन आगे कहां? अरे वहां पर खड़े हैं विमान तो! ओह हो! मतलब कि चलो जल्दी से लघुशंका भी जाना है हरदम गलत समय पर ही लगती है। मैं हीरो की तरह उस दरवाजे की तरफ बढ़ा। महिला को कार्ड दिखाया तो महिला ने देखा और मुझे दिशा निर्देश देते हुए बताया कि आपको मुंबई के लिए प्लीज उस गेट से जाना होगा। मैं इतने देर में समझ चुका था कि मामला कुछ गड़बड़ है और साथ ही ऊपर लगे प्लाजमा में इस फ्लाइट का नंबर भी नहीं था। ओह हो मुंबई के लिए वो काउंटर है ओ. के.। थैंक्स। कहते हुए मैं आगे बढ़ गया। उस काउंटर पर जैसे ही पहुंचा मेरा सभी सुरक्षा तंत्रों को चैक करने के बाद उस मोटे से आदमी ने मुझे अंदर जाने कि इजाजत दे दी। मैं ये ही सोच रहा था कि बैंगलोर जाने वालों की अगवानी के लिए महिला और मुंबई जाने वालों के लिए ये भैंसा, सांड। इसी सोच में वहां खड़ी बस निकल गई। लगा कि अब तो फ्लाइट जरूर से छूट जाएगी। अब इतनी विशाल जगह पर अपने प्लेन को कहां ढूंढूंगा।
जारी है...
हमें तो आदत रही है ट्रेन और बस की। जहां पर आप खुद के जिम्मेदार स्वंय हैं। यदि गाड़ी छूटी तो टिकट बेकार। पर प्लेन के सफर में ऐसा नहीं होता। ये बात हमको बाद में पता चली कि बोर्डिंग पास लेने के बाद तो ये एयरलाइंस की जिम्मेदारी बन जाती है कि वो हमें पुकार लगा-लगा के बुलाए और हमें बैठाए। पर हम जैसे अनाड़ी की हालत उस पैसेंजर बस के छूटने के बाद क्या हुई और हवाई सफर आखिर कटा कैसा। अपने तमाम अनुभव अगली पोस्ट में।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, October 1, 2008

Headlines Today (Aajtak) की महिला पत्रकार की गोली मारकर हत्या

हेडलाइंस टुडे की युवा पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की सोमवार देर रात गोली मार कर हत्या कर दी गई। पहले तो ये एक हादसा माना जा रहा था लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ये खुलासा हुआ कि ये कोई हादसा नहीं है, सौम्या की किसी ने गोली मारकर हत्या की है। अमुमन तो उसकी सिफ्ट रात १२ बजे तक की होती थी और फिर वो खुद ड्राइव करके अपने घर वसंत कुंज जाया करती थी। लेकिन सोमवार को ब्रेकिंग न्यूज (साबरकांठा और मालेगांव में ब्लास्ट) की वजह से डेस्क पर काम कर रहीं प्रोड्यूसर सौम्या को देर रात तक रुकना पड़ा। जब वो तकरीबन रात के ३ बजे घर के लिए रवाना हुईं तो किसी ने भी ये नहीं सोचा था कि सौम्या के लिए इस रात की सुबह नहीं होगी।
सोमवार की काली रात पूरे ऑफिसवालों के लिए काली ही बन गई। केरला की रहने वाली सौम्या विश्ववनाथन स्वभाव से ही सौम्य थी। २६ साल की सौम्या की हेडलाइंस टुडे में सभी तारीफ किया करते थे। वो शांत और गंभीर स्वभाव की थी।
सोमवार की रात तकरीबन ३ बजकर ४० मिनट। ऑफिस से काम खत्म करके सौम्या अपनी सफेद रंग की जेन कार में घर वापस जा रहीं थी। घर पहुंचने से १० मिनट पहले उसने घर पर अपने पापा को फोन पर बताया था कि वो ५-१० मिनट के अंदर घर पहुंच जाएगी। लेकिन जब वो १५ मिनट तक घर नहीं पहुंची तो उसके पापा ने उसे फोन किया लेकिन घंटी जाती रही किसी ने फोन नहीं उठाया।
सुबह किसी राहगीर ने पुलिस को फोन करके इस बात की जानकारी दी कि नेल्सन मंडेला रोड पर किसी का एक्सीडेंट होगया है। जब तक उसको अस्पताल ले जाते तब तक वो दम तोड़ चुकी थी। उसकी गाड़ी के शीशे टूटे हुए थे। ड्राइवर सीट के शीशे से उस को टारगेट करके गोली चलाई गई थी। गोली सौम्या के सर के पीछे वाले भाग में लगी थी। साथ ही पीछे की सीट पर सौम्या के बाल इधर-उधर पड़े हुए थे, जो की मौत की अलग कहानी बयां कर रहे हैं। सौम्या की गाड़ी का आगे का टायर पंचर था। बाद में पता चला कि पहले उसकी गाड़ी के टायर को गोली मारकर पंचर किया गया था, फिर उसे गोली मारी गई थी। कार का बैलेंस बिगड़ने के बाद कार सड़क के बीचो-बीच डिवाइडर से टकरा कर करीब सौ फीट तक घिसटती रही। पुलिस ने मामला दर्ज कर दिया है। राजन भगत दिल्ली पुलिस के पीआरओ ने ये आश्वासन दिया है कि कार्रवाई जल्द से जल्द पूरी कर ली जाएगी और दोषियों को सख्त से सख्त सज़ा दी जाएगी। पुलिस एक अलग थ्यौरी पर भी काम कर रही है कि रास्ते में सौम्या का किसी से झगड़ा हो गया हो या फिर किसी ने उसके साथ छेड़खानी की कोशिश की हो और विरोध करने पर उसे गोली मारकर भाग गया हो। पर पता नहीं क्या हुआ पर सौम्या अब हमारे बीच नहीं है। हम सभी सौम्या के परिवार के साथ है जिनके ऊपर ये दुख का पहाड़ टूट पड़ा है और साथ ही ये उम्मीद करते हैं कि इंसाफ की खातिर पुलिस दोषियों को जल्द ही गिरफ्तार कर लेगी। इस कुकर्म करने वाले को पुलिस नहीं बख्शेगी।
पर सवाल ये ही खड़ा होता है कि दो हफ्ते पहले धमाकों से दिल्ली दहल गई थी। फिर पिछले हफ्ते ही महरौली में भी ब्लास्ट हुआ था। तो क्या पुलिस अब भी सो रही हैं। क्या दिल्ली अकेली लड़की या यूं कहें कि सभी के लिए असुरक्षित है?

सौम्या तुम चली गई पर हमेशा हमारे दिल में जीती रहोगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, September 30, 2008

कितनी ही कोशिश कर लो, पर दिल्ली झुकने वाली नहीं दहशतगर्दों।

किसने किए दिल्ली के महरौली में ब्लास्ट? क्या उन्होंने जो ये बताना चाहते थे कि चाहे कितनों को पकड़ लो, चाहे कितनों को मार दो, हमारी तादाद कम नहीं होगी? या फिर वो जो कि ये बताना चाहते थे कि उन संगठनों के अलावा हम भी हैं या फिर वो जो कि हमेशा ही ऐसे समय का इंतजार करते हैं कि जब की कोई त्यौहार आने वाला हो तभी इस तरह की दहशत फैला कर के सारी दिल्ली को बैकफुट पर ढकेल दें। चाहे किसी और जगह पर बम को रखने की थ्योरी भी सामने आ रही है पर इस बात से एतराज नहीं किया जा सकता कि दहलनी तो दिल्ली ही थी। इन नौसिखियों आतंकवादियों की वजह से वहां पर नहीं ऱखा जा सका बम और अफरातफरी में बम ऐसे ही फेंक कर वो भाग गए। महरौली में ब्लास्ट का क्या मतलब कोई लगा सकता है? ना तो कोई भी बड़ी जगह, ना तो ऐसा चर्चित मार्केट जहां पर रश इतना ज्यादा रहता हो कि अधिक से अधिक लोग हताहत हों। लेकिन इस बार के ब्लास्ट के बारे में ये ही कहा जा सकता है कि दहशतगर्दों की कोशिश थी दहशत फैलाने की।
कुछ भी कहें पर महरौली ब्लास्ट ने एक १३ साल के मासूम की जान लेली साथ ही एक नौजवान की भी। वो १३ साल का मासूम वो ही बच्चा है जो कि पॉलीथिन गिरने पर उसने उठाया था और उन आतंकवादियों को भईया संबोधित करते हुए कहा था कि आपका सामान गिर गया है। उस बेचारे मासूम को क्या पता था कि वो शब्द उसकी जिंदगी के आखिरी शब्द होंगे। साथ ही जिनको वो भईया बोल रहा है वो देश के दुश्मन हैं। उस नौजवान के पिता जो कि इस ब्लास्ट की भेंट चढ़ गया वो कहते हैं कि आतंकवादियों को सड़क पर गोली मार देनी चाहिए। वो एक मुस्लिम पिता की आवाज़ है। उसमें कोई धर्म नहीं, कोई जात नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ छुपा है तो एक पिता का दर्द।
पुलिस ने भी जल्द ही खून के धब्बे धो डाले। ये बात हज्म नहीं हुई। पुलिस को लगा होगा कि शायद लोग दहशत से उबर जाएं, वरना खून दिखता रहेगा तो याद उतनी ही ज्यादा रहेगी। लेकिन फोरेंसिक टीम को नमूने क्यों नहीं लेने दिए। बहरहाल शिवराज पाटील जी ने अब मुंह खोलने से ही इनकार कर दिया है। अच्छा है वरना रटारटाया बयान फिर सुनने को मिलते। बीजेपी के सीएम इन वेटिंग विजय कुमार मल्होत्रा ने तुरंत आनन-फानन में महरौली का रुख किया। मुझे मेरे कुछ रिपोर्टरों ने बताया कि पुलिस से लेकर आम लोग भी नहीं चाहते कि ऐसे मौके पर तुरंत किसी भी वीवीआईपी का दौरा हो। पुलिस अपना काम छोड़कर उनकी तिमारदारी में लग जाती है। खुद नेताओं को भी सोचना चाहिए। साथ ही नेतागण ये भी सोचें कि क्या बोलना है और क्या नहीं तो बेहतर ही होगा। सभी के पीछे पुलिस नहीं लगाई जा सकती पर ये समय नहीं है कि ऐसी लाइनें बोली जाएं।
ये दहशत फैलाने की कोशिश लगातार जारी है, फरीदाबाद में भी बम जैसी वस्तु मिली। जानबूझकर बरगलाने के लिए फोन किया जाता है।बार-बार कॉल किया जाता है। कभी कहीं से तो कभी कहीं से, कहीं के लिए कॉल। पुलिस भी परेशान हैं। लेकिन ये आतंकवादी नहीं जानते कि ये दिल्ली का दिल है जो ऐसे धड़कना बंद नहीं कर सकता,पर डर तो लगता है ही, वो भी खत्म हो जाएगा। कितनी ही कोशिश कर लो, पर दिल्ली झुकने वाली नहीं दहशतगर्दों।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, September 29, 2008

“बाटला के L-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है”

‘बाटला के एल-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है’। ये मैं नहीं कह रहा हूं ये वो तीन आतंकवादी कह रहे हैं जो कि एनकाउंटर के बाद से दक्षिण दिल्ली से पकड़े गए हैं। शकील, जिया और साकिब ये तीनों रो रहे हैं अपने गुनाहों के लिए अल्लाह से रहम की जगह मौत मांग रहे हैं। ये पुलिस से भी मौत मांग रहे हैं। कस्टडी में जब भी इनको कोई पुलिसवाला दिख जाता है तभी ये रोना शुरू कर के गिड़गि़ड़ाते हुए उनसे अपने गुनाहों का वास्ता देते हुए सज़ा की भीख मांगते हैं। क्या आपने कभी आतंकवादियों को भीख मांगते हुए देखा है? शायद नहीं ही देखा होगा ये तो वो जालिम होते हैं जो कि औरों से भीख मंगवाते हैं। लेकिन आज ये खुद भीख मांग रहे हैं अपनी मौत की। दिन में रोते हैं, रात में रोते हैं, जमीन-दीवार पर सर मार-मार कर रोते हैं। लेकिन सच जो कि अर्द्धसत्य नहीं कि ये भीख उन्हें कोई भी नहीं दे सकता।
अभी कई बार पढ़ा कि लोग सवाल उठा रहे हैं कि एल-18 में जो एनकाउंटर हुआ वो फर्जी था। मैंने सबकी दलीलें सुनी हैं, साथ में ‘बड़े-बड़े’ लोगों की दलीलें भी सुनी हैं। दलीलें हैं हमने वहां पर आसपास के परिवार वालों से बातें की। जितने मुंह उतनी बातें। अब ये समझ में नहीं आता कि जब हर जगह से अलग-अलग कहानी सुनने को मिल रही हैं तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि उन सारी कहानियों में से कोई एक भी सही है। फिर पुलिस के बयान को भी एक दलील मान कर सच माना जा सकता है।
हर कोई जानना चाहता है सच। ये सच या तो सैफ बता सकता है जो कि वहां से पकड़ा गया या फिर एक शख्स और है जो असलियत बता सकता है। कुछ का मानना है कि भई, सैफ को तो वहां लाया गया था उसे कैसे पता होगा। तो जवाब है, क्यों आंखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या सैफ ने। चलो, मान लें कि सैफ को कुछ भी नहीं पता।
उस दूसरे शख्स को पूछते हैं कि भई, क्या हुआ था। वो हैं कांस्टेबल बलवंत। उस मुठभेड़ में गोली इस शख्स को भी लगी। एम्स ट्रामा सेंटर में इलाज चल रहा है। एक हाथ जो कि चोटिल हुआ वो बच पाया तो बहुत ही होगा। ये बात जो मैं बताने जा रहा हूं वो बलवंत ने किसी मीडियाकर्मी या फिर पुलिस-डॉक्टर को नहीं बताई है। ये बात उसने अपने साथ काम करने वाले एक साथी को बताई है वो भी सबके सामने नहीं बिल्कुल निजी तौर पर।
बलवंत ने अपने साथी के पूछने पर ये बताया कि पूरा घटनाक्रम कैसे-क्या हुआ बताया ही नहीं जा सकता लेकिन मोटा-मोटा क्या हुआ बता देता हूं। उन्होंने बोलना शुरू किया,
‘हम साहब(स्व.इंस्पेक्टर शर्मा) के साथ उपर गए। सेल्समैन बनें हमारे सहयोगी ने हमें कमरा-कमरे का नक्शा यानी समान कहां-कहां रखा है, हथियार दिखे कि नहीं और जो भी उसने देखा था, कम शब्दों में, सब बता दिया था। साहब आगे थे हम सब लोग पीछे, अपनी-अपनी जगह चुनते हुए, खड़े होते रहे, मैं साहब के साथ ही था। साहब ने जाते ही दरवाजे में ठोकर मारी और खोलने के लिए आवाज़ लगाई। लेकिन जब खोलने में देर होने लगी तो साहब ने दरवाजे में दो तीन ठोकरें और जड़ दीं साथ ही ‘जल्दी खोलो’ की आवाज़ भी लगाई। फिर क्या हुआ असल में समझ में नहीं आया, नहीं पता चला कि क्या हुआ। चीख चिल्लाहट के बीच गोलियां चलने लगी और उसके आगे कि तो तुम रोज ही पढ़ते रहते होगे’

तो ये थी बलवंत की अपने साथी से बातचीत। अब और तो शायद ही प्रमाण कोई दे सकता हो। फिर और भी बातें हुईं, वो कुछ महकमे की, कुछ घर परिवार की, कुछ स्व. शर्मा जी के परिवार की।
पुलिस ने एल-18 से जो चीजें बरामद की हैं उनमें से कई चीजें ऐसी हैं जो कि इन आतंकवादियों को ओवरस्मार्ट साबित करती हैं। 900 से ज्यादा फोटों उनके लैपटॉप से बरामद हुई हैं। इन तस्वीरों में ब्लास्ट की तस्वीरें हैं। कुछ वीडियों भी मिले हैं जो कि ब्लास्ट के तुरंत बाद के हैं। उन तस्वीरों में कुछ तो वो हैं जैसे कि मणिनगर में साइकिल की जिसमें कि शकील और जिया ने बम लगाया था। उन सभी कारों की तस्वीरें हो जो कि अहमदाबाद में उपयोग की गईं। बम और टाइमर कार के अंदर प्लांट करते हुए की तस्वीरें हैं। कार के अंदर बम रखा हुआ है, फोटो पर समय बता रहा है शाम के 5.45 और फिर दूसरी तस्वीर भी वहीं कि ब्लास्ट के 5 मिनट बाद की 6.25। साथ ही ऐसा करते हुए इनको लगता था कि पुलिस हो या स्थानीय लोग इन्हें मीडिया का समझेंगे कोई भी हाथ नहीं लगाएगा। इसके अलावा और क्या सबूत दें। और लीजिए सबूत। ये सब फोटो और वीडियो सीडी और मेल के साथ एटैच करके भेजी जाती थीं। देखिए हमने कितने अच्छे ढ़ंग से काम को अंजाम दिया है। कई-कई सिम और ब्लास्ट के बाद और पहले भी एक ही सिम पर कॉल किया गया।
जैसे ही पुलिस को टिप मिली थी इन लड़कों के बारे में जो कि एल-18 में रहते हैं तो उस दिन से ही इनका फोन सर्विलांस पर लग चुका था। पुलिस ने इनकी बातें सुनीं। इनके कारगुजारियों के किस्से भी सुने। लेकिन कभी भी बातचीत में इन्होंने हथियार के बार में जिक्र नहीं किया। ये ही कारण था कि स्व. इस्पेक्टर शर्मा बिना किसी लाइफ गार्ड के दरवाजा खटखटाने चले गए।
सब ये सोच जरूर रहे होंगे कि शकील, जिया और साकिब रो क्यों रहे थे। पुलिस की मार से या क्या कारण था। स्पेशल सेल ने उनको अहमदाबाद ब्लास्ट और बैंगलोर ब्लास्ट के साथ-साथ दिल्ली के दर्द की तस्वीरें भी दिखाईं हैं। इन तस्वीरों को देख कर वो अपने को माफ नहीं कर पा रहे हैं। अब वो बताते हैं कि उन्हें तो मुंबई के दंगों, बाबरी मस्जिद, गोधरा के दंगों की तस्वीरें दिखाई हैं। बोला गया उनको तकरीरें दी गईं हैं और कई न्यूज चैनलों की वो स्टोरी दिखाई गईं हैं जो कि ब्लास्ट के बाद किसी मुस्लिम परिवार पर कवर की गईं थी। वो बताते हैं कि हमें तो कभी रॉ सामान नहीं मिलता था। हम से कहा जाता कि ये सामान वहां रखकर आ जाना है। सिर्फ रखने का झंझट रहता था और वो भी पहले से ही तयशुदा रहता था कि कैसे-क्या करना हैं।
आधा सच जानकर ना जाने ये नौजवान क्यों बहक जाते हैं। पूर्ण सच की तलाश कठिन तो होती है पर नामुमकिन नहीं। लेकिन सच सच ही होता है उसमें से ना घटाया जा सकता है और ना ही उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद कुछ सच और सामने आएंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, September 20, 2008

‘लाइव एनकाउंटर-मीडिया का रोल’, अनाप-शनाप बकना नहीं चलेगा।

दिल्ली के एक रिहायशी इलाके में दिन के ११ बजे ताबड़तोड़ गोलियां चलती हैं। पूरा का पूरा इलाका कांप कर रह जाता है। जब तक की लोग समझते, संभलते, बाहर निकलते, जानते कि आखिर माजरा क्या है? तब तक धीरे-धीरे पुलिस का काफिला उस इलाके को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लेता है। सारे रास्ते रोक दिए जाते हैं। लाउड स्पीकर से ये घोषणा कि सभी अपने-अपने घर में ही रहें, कोई बाहर ना निकले, क्योंकि आम आदमी और आतंकवादी में क्या फर्क होता है शायद ये कोई भी नहीं जानता।
थोड़ी देर बाद ही बाटला हाऊस का ये इलाका जो कि जामिया नगर में आता है वर्दी वालों से पट जाता है। जहां देखो, वहां पर सिर्फ और सिर्फ वर्दी। एनएसजी के कमांडों भी मौके पर पहुंच चुके थे। जिससे पता चलता है कि मामला कितना गंभीर था। रमजान के पाक महीने में, रोजे का १८वां दिन, जुमे का दिन, खलीउल्लाह मस्जिद के पास, ये लाइव एनकाउंटर, गंभीरता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। साथ ही ये इलाका मुस्लिम बहुल। पुलिस की भी पीठ थपथपानी होगी, इतने कारणों के बाद भी वो यहां गए और आतंकवादियों को पकड़ने की कोशिश की। कुछ वक्त और निकलता है और फिर पहुंचता है मीडिया। बस शुरू होजाती है लाइव एनकाउंटर रिपोर्टिंग।
लाइव एनकाउंटर रिपोर्टिंग यहां पर थोड़ी देर पहले ये हुआ, यहां पर उसके बाद ये हुआ, हां जी, आपने क्या देखा.....और आपने.....हम इस समय उस बिल्डिंग के ठीक पीछे हैं जहां पर थोड़ी ही देर पहले एनकाउंटर चल रहा था.....सबसे पहले हम ये दिखा रहे हैं.....सबसे पहले हम...नहीं हम...हमारे चैनल ने आपको बताया....देखिए हम आप को सामने से सही तस्वीरें दिखा रहे हैं तो दूसरों का चैनल देखना बंद कीजिए और हमारा देखिए.... अरे भाड़ में गई रिपोर्टिंग पहले सेल्समैनगीरी तो कर लें।
सच क्या अंदाज था रिपोर्टिंग का। रिपोर्टिग के बीच कैसे अपने चैनल को लोकप्रिय बनाया जाए, ये कला तो कोई इन रिपोर्टर से सीखे। हम यहां सबसे पहले...सबसे तेज...और कई रिपोर्टर तो ये तक भूल गए कि वो रिपोर्टिंग कर रहे हैं। वो तो प्रचार में जुट गए।
आतिर खान की रमजान लीला-स्टार के आतिर खान तो बार-बार लोगों को ये ध्यान दिलाने में लगे रहे कि ये रमजान का पाक महीना है और रोजे चल रहे हैं साथ ही आज जुमे का भी दिन है, इस बिल्डिंग के पास ही खलीउल्लाह मस्जिद है। वो शायद ये कहना चाहते थे कि रमजान के महीने में तो कभी भी आतंकवादियों की धरपकड़ नहीं करनी चाहिए थी। ऐसे समय में क्या आतिर खान को ये नहीं पता कि किस तरह की रिपोर्टिंग की जानी चाहिए। किन शब्दों का इस्तेमाल करना है और किन शब्दों से बचना ये तो इनको बेहतर जानना होगा। रिपोर्टर को तो खास तौर पर घी डालने का काम नहीं करना चाहिए। मैंने स्टार के ऑफिस में फोन कर के कहा कि इतने आदमियों के बीच में आतिर खड़ा होकर ये सब कह रहा है पब्लिक भड़क भी सकती है और सामने ही सामने लोगों ने नारे लगाने शुरू कर दिए।
थोड़ी ही देर में सभी चैनलों पर फर्जी रिपोर्टिंग शुरू हो गई। १०-२० लोगों को इक्ट्ठा करके रिपोर्टरों ने ये कहलवाना शुरू किया कि मस्जिद तो बहुत दूर है और मस्जिद का इस एनकाउंटर से कोई भी लेना देना नहीं है। आतिर का किया दीपक चौरसिया ने धोना शुरू किया। साथ ही एल १८ से मस्जिद की दूरी को भी बताया। काबिले तारीफ था ये सब। दूसरे चैनलों पर भी एहतियातन देखा कि सब पर ये शुरू हो चुका था कि मस्जिद का कुछ भी लेना देना नहीं है। लोग जुमे की नवाज अता करने जा रहे हैं और कोई भी दिक्कत की बात नहीं। दूसरी तरफ नीरज राजपूत और जावेद हुसैन सबसे पहले...सबसे पहले...सबसे पहले का राग अलापते रहे। ज्यादा स्टार देख रहा था इसलिए उसके बारे में बता पा रहा हूं। लेकिन फिर रुख मैंने सभी चैनलों का किया सभी चैनलों पर कमोबेश कुछ ये ही हाल चल रहा था। लेकिन स्टार और इंडिया टीवी ने एक साथ ये बताया कि एनकाउंटर खत्म हो गया है। जबकि ज़ी टीवी, आजतक, एनडी,न्यूज २४ सभी पर एनकाउंटर जारी ही चलता रहा। तकरीबन आधे घंटे बाद ये पट्टी उनकी ब्रेकिंग न्यूज के बैंड से हटी।
एनडीटीवी का अपना एक अलग ही स्टाइल है। एनडीटीवी के एक रिपोर्टर के पास जमायत-ए-इस्लामी के सदस्य के तौर पर डॉ इस्माइल आकर कहते हैं कि हम को विश्वास में तो लेना ही चाहिए था। क्या हम एनकाउंटर से मना कर देते। लेकिन हमें तो पता चलना ही चाहिए था। रिपोर्टर ने तपाक से कहा कि जनाब गृह मंत्रालय को नहीं पता तो आप कौन। और आतंकवादियों का कोई दीन इमान तो होता नहीं किसी को भी गोली मार सकते थे। शायद उन शख्स के ये बात दिमाग में घुस गई हो लेकिन पता नहीं। एक शख्स सामने आए और कहा कि हमें वहां तक ना जाने दें लेकिन मीडिया को तो जाने दें। कैसे और क्यों जाने दें? इस सवाल का जवाब नहीं था। लोग क्यों नहीं सोचते कि हर चीज एक साथ संभव नहीं है। मीडिया को लाइफ सेविंग जैकेट दें या खुद के लिए रखें। मीडिया के पास ट्रेनिंग के नाम पर कुछ भी नहीं है। और मीडिया के नाम पर तकरीबन १५० लोग होंगे पुलिस बल से भी ज्यादा। बेकार में सवाल करने की लोगों की आदत है। फिर एक ने सवाल उठाया कि फर्जी एनकाउंटर भी तो हो सकता है ये।
उस रिपोर्टर का जवाब था कि सन २००० में लाल किले पर हमले के बाद भी यहां पर एनकाउंटर हुआ था। इसी जगह पर दो आतंकवादियों को मार गिराया गया था।साथ ही यहां पास में ही जाकिर नगर में सिमी का दफ्तर थोड़ी ही दूर पर २००१ में दिल्ली पुलिस ने सील कर दिया था। ये थी अलग और बिना किसी लाग लपेट के निश्पक्ष रिपोर्टिंग। ये ना तो सरकार के साथ थे और ना ही अपनी धारणा बना रहे थे बस रिपोर्टिंग कर रहे थे।
एक नियम के तहत ही रिपोर्टिंग करने की इजाजत दी जानी चाहिए रिपोर्टर को नहीं तो उनपर भी बैन लगाने के बारे में सरकार को सोचना चाहिए और कदम उठाना चाहिए। लेकिन जानता हूं कि सरकार कोई भी कदम ना तो उठाएगी और ना ही उठा सकती है।

आपका अपना
नीतीश राज

दिल्ली में 'ये लाइव एनकाउंटर'

पुलिस को पता चला था कि बाटला हाऊस के इलाके में जो कि जामिया नगर इलाके में है उस की बिल्डिंग नंबर-एल १८ के चौथे फ्लोर पर कुछ आतंकवादी छुपे हुए हैं। बस इसके बाद का जो वाक्या है कोई नहीं जानता। एक बॉडी को जल्दी से ले जाया जा रहा है, कपड़े से लिपटी थी वो बॉडी। एक पुलिसवाला जो कि खून से लथपथ है उसे कुछ पुलिसकर्मी जल्दी से अस्पताल ले जाते हैं। फिर एक शख्स को पकड़कर उसपर चादर डालकर पुलिस ले जा रही हैं। बिल्कुल घालमेल सा पता चलता है, कहीं से, कुछ भी पुख्ता नहीं। ना ही किसी चैनल के पास ना ही कोई अधिकारी बोलने के लिए तैयार। बाद में पता चला कि आतंकवादियों के पास से ८ राउंड गोलियां चलाई गई, और दिल्ली पुलिस ने २२ राउंड फायर किए। कहा तो ये भी गया कि पुलिस वहां पर इन्वेस्टिगेट करने गई थी लेकिन आतंकवादियों ने पहले फायर खोलकर पुलिस को चुनौती दी।
धीरे-धीरे जानकारी मिलना शुरू हुई और फिर शाम ४ बजे डडवाल जीकी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ही खत्म हुई। फिर भी कई सवाल अनसुलझे।
पुलिस दिल्ली ब्लास्ट के बाद से ही इस कोशिश में लगी हुई थी कि उन्हें कोई टिप मिले और वो उस पर काम कर सके क्योंकि सबूत तो पूरे जुटा लिए गए थे। जैसे ही इन आतंकवादियों के ठहरने का पता चला तो स्पेशल सेल हरकत में आगया। वो नहीं चाहते थे कि इस मौके को कैसे भी छोड़ें। जिनको भी इस बारे में पता था वो सब चल दिए और पुलिस बल का बंदोबस्त पीछे से किया जा रहा था। सब को पता था कि वो बाटला में सघन तलाशी अभियान चलाएंगे। लेकिन इस तलाशी अभियान ने एनकाउंटर का रूप ले लिया। जिसमें कि दो आतंकवादी मारे गए और एक को पकड़ लिया गया। एक मारे गए आतंकी का नाम आतिफ उर्फ बशीर बताया गया, दूसरे का नाम साजिद और जो पकड़ा गया है उसका नाम सैफ है उसके पैर में लगी है गोली। और सबसे शर्मनाक ये की दो भाग गए।
तीनों के तीनों आजमगढ़ के हैं। इस जगह से एक एके ४७, दो रेगुल्यर पिस्टल, कंप्यूटर भी मिले, साथ ही काफी कागजात और नक्शे भी। दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा जो ऑपरेशन को लीड कर रहे थे उन्हें तीन गोली लगीं, तुरंत उपचार के लिए उन्हें होली फैमिली अस्पताल भेज दिया गया। दो गोली निकाल दी गई लेकिन तीसरी गोली जो कि उनके पेट में लगी थी उसने उनकी जान ले ली। ७ वीरता पुरस्कार और १५० इनाम से सम्मानित थे शहीद इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा, उन्होंने ७५ एनकाउंटर किए जिसमें ३५ आतंकवादियों को मार गिराया और ८५ आतंकियों को कानून के शिकंजे तक पहुंचाया। एसीपी राजबीर सिंह के साथ भी इंस्पेक्टर शर्मा ने कई एनकाउंटर में हाथ बटाया था। हेड कांन्सटेबल बलवंत को भी गोली लगी थी और एम्स में उनका उपचार चला, खतरे से वो बाहर हैं।
पुलिस ने जो जानकारी दी वो बहुत ही काबिले गौर करने वाली है। अबु बशर जिसको की गुजरात से दिल्ली लाया गया उसकी निशानदेही पर ये धरपकड़ नहीं हुई। जयपुर, बैंगलोर, अहमदाबाद, और अब दिल्ली में जितने भी ब्लास्ट हुए सभी चार जगहों का जायज़ा इस आतिफ और तौकीर ने लिया था। तौकीर ने ही भेजे हैं सारी जगह पर मेल और सभी मेल खुद तौकीर ने ही लिखे हैं। इन आतंकवादियों को पकड़ने के लिए दिल्ली धमाकों के बाद से ही २२ टीमें अलग अलग काम कर रहीं थीं। तकरीबन ५० हजार मोबाइल की कॉल डिटेल निकाले गए। दिल्ली पुलिस गुजरात पुलिस के संपर्क में भी थी। वहीं पर ये आतंकवादी दिल्ली की जगहों का जायजा जुटा कर गुजरात निकल गए। १२ लोगों की टीम गुजरात गई और २४ को अहमदाबाद पहुंचे। २६ को धमाकों के बाद फिर २७ को दिल्ली वापिस आ गए। वैसे इस बिल्डिंग एल-१८ में ये आतंकी लगभग २ महीने से रह रहे थे। दिल्ली में ही बैठकर ये सारी जगहों का प्लान किया गया।
अब दिल्ली पुलिस को किसी भी अंजाम तक ले जा सकता है तो वो है पकड़ा गया तीसरा आतंकवादी सैफ। वो ही बता सकेगा कि बचकर भागने वालों में कहीं तौकीर ही तो नहीं था?

लाइव एनकाउंटर पर मीडिया का रोल अगली बार।
जारी है...

आपका अपना
नीतीश राज
(शहीद इंस्पेक्टर शर्मा को श्रद्धाजलि)
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”