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Friday, July 24, 2009

ये दो बयान हैं एक मिट्टी के

अब इस बात को ही आगे बढ़ाता हूं, पिछली पोस्ट (मरवा दी आतंकवादियों से अपनी बेटी, चुप क्यों बैठे हो, क्या वो हत्यारे तुम्हारे भाई हैं?) में कई ब्लॉगर भाइयों ने समझा कि मैं पुरानी बातों पर से पर्दा उजागर कर रहा हूं। पर नहीं मैंने बात छेड़ी थी बिल्कुल नई। क्योंकि कुछ दिन पहले ही शोपियां से महज कुछ किलोमीटर दूर एक लड़की को मार दिया गया और परिवार का कहना है कि लड़की को बेमतलब, बिना वजह मारा गया। और मारने वाले हमारे देश के दुश्मन आतंकवादी हैं। पर किसी भी संगठन ने इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई।

वहीं यदि देखें तो शोपियां केस पर ही दो तरह के बयान पढ़ने को मिले हैं। उसी मसले पर मैंने कुछ पढ़ा है वो आपको भी पढ़ाता हूं.....अब उन से ही मैं ये सवाल पूछना चाहता हूं कि अब क्यों चुप हैं ये अलगाववादी। क्या अब उनकी मां-बहन के साथ अन्याय नहीं हुआ।
"......शोपियां के लोगों को सलाम कि भारतीय व्यवस्था से न्याय की आशा उन्होंने नहीं छोड़ी है। शोपियां में आंदोलन चला रही मजलिस-ए-मुशावरत ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मियां अब्दुल कयूम और विधि विशेषज्ञ सैयद तसद्दुक हुसैन सीबीआई जांच चाहते हैं। उनकी मायूसी के नतीजे अच्छे नहीं होंगे। मुशावरत ने चेतावनी भी दे दी है कि इंसाफ के लिए वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक जाएगी। दुनिया के मुस्लिम मुद्दों पर विचार के लिए अमेरिकी प्रशासन की विशेष दूत फारहा पंडित से संपर्क करने की आवाजें उठने लगी हैं।"
वहीं दूसरी तरफ ये भी पढ़ा था....
".....हमारे लिए उससे अधिक चिंताजनक आसिया और नीलोफर केस का अंतरराष्ट्रीयकरण होना चाहिए। किसी भी फौजी तैयारी से हजार गुना ज्यादा असरदार कश्मीरी अवाम का यह यकीन होगा कि भारत का निजाम नाइंसाफी नहीं होने देगी। शोपियां का हादसा एक केस स्टडी है कि हम राष्ट्र राज्य की जड़ों को किस तरह मजबूत करना चाहते हैं। न्याय और अन्याय का अहसास तय करेगा कि रूस के चेचेन्या और चीन के उइगुर सूबे से कश्मीर क्यों और किस तरह भिन्न और भारत का अभिन्न अंग है।"

हैं ना दो अलग-अलग बयान, क्या कहेंगे? ये दोनों बयान कश्मीर से ही निकले हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ एक जैसे ही लोग वहां पर रहते हैं पर हां अभी वहां को काफी सुधार की गुंजाइश बाकी है।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, July 23, 2009

मरवा दी आतंकवादियों से अपनी बेटी, चुप क्यों बैठे हो, क्या वो हत्यारे तुम्हारे भाई हैं?

क्यों मेरे ब्लॉगर भाइयों, देश की सेना पर सवाल उठाने से तो तुम्हारे हांथ नहीं कांपते पर आतंकवादियों के खिलाफ....।


सभी को याद होगी शोपियां की वो घटना जिसने भारत में एक बहस को जन्म दिया था। कई बार ये भारत कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है फिर भी भारत की अवाम और निजाम दोनों पर ये इल्जाम लगता रहा है कि वो उनके साथ अपनों जैसा व्यवहार नहीं करते। राज्य में घुसपैठियों-आतंकवादियों के कारण हमेशा ही सेना अपनी जान दांव पर लगाकर रक्षा करती रहती है। पर जब शोपियां केस हुआ तो इस इल्जाम ने राज्य में सेना के होने पर ही सवालिया निशान लगा दिया। 29 मई को शोपिया में दो युवतियों के साथ रेप फिर हत्या का मामला सामने आया था। पूरा जम्मू-कश्मीर लामबंद हो गया था। अलगाववादियों ने आह्वान किया कि शोपिया चलो। अलगाववादियों के भड़काने पर तब पूरा कश्मीर सड़कों पर उतर आया। सरकार ने भी एक नहीं दो-दो बार जांच और पोस्टमार्टम करवाए। पहला पोस्टमार्टम करने वालीं डॉक्टर से वहां के लोगों और भाइयों ने कुरान पर हाथ रखवाकर पूछा कि क्या रेप हुआ तो वो फूट पड़ीं और बता दिया कि लगता तो है कि १५-१८ लोगों ने रेप किया था। तो देश भर से आवाज़ उठी कि जिन्होंने भी रेप किया है उन्हें सज़ा जरूर मिलनी चाहिए।

फिर एक लड़की शिकार हुई है वहीं श्रीनगर के शोपियां में। पर इस बार ये बर्बरता पुलिस ने नहीं आतंकवादियों ने मचाई है।


अब अलगाववादियों की बारी थी और ४७ दिन तक कश्मीर की सड़कों पर कोहराम मचा रहा। मजलिस-ए-मुशव्वरात ने हड़ताल का आह्वान किया सभी दुकानें और बिजनेस प्रतिष्ठान पर वो ऐसे हावी हो गए जैसे कि वो खुद सरकार हों और जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा।


आप सोच रहे होंगे कि मैं गड़े मुर्दे क्यों उखाड़ रहा हूं? क्योंकि फिर एक लड़की शिकार हुई है वहीं श्रीनगर के शोपियां में। पर इस बार ये बर्बरता पुलिस ने नहीं आतंकवादियों ने मचाई है लेकिन हर बार आवाज़ उठाने वाले अलगाववादी इस पर पूरी तरह से खामोश हैं। करीब तीन-चार दिन पहले तीन आतंकवादी रात में एक लड़की के घर में रुके, फिर खाना खाया और जाते-जाते उस लड़की को खाने का नजराना उसकी मौत के रूप में दे गए वो भी बिना वजह। उन्होंने लड़की को गोलियों से भून दिया। और ये सब हुआ महज शोपियां से दस किलोमीटर की दूरी पर। उस दसवीं की छात्रा के जनाजे में कोई नेता, अलगाववादियों की तरफ से कश्मीरियों का रहनुमा, यहां तक कि गांव के लोग भी शरीक नहीं हुए। ना ही किसी पार्टी ने हड़ताल का आह्वान किया ना ही किसी ने कोई पुकार लगाई ना ही कोई सड़कों पर उतरा। क्योंकि वो तीनों आतंकवादी थे।

उस दसवीं की छात्रा के जनाजे में कोई नेता, अलगाववादियों की तरफ से कश्मीरियों का रहनुमा, यहां तक कि गांव के लोग भी शरीक नहीं हुए।


मैं इधर पुलिस वालों को क्लीन चिट देने नहीं बैठा हूं। मैं यहां पर देश के धोखेबाजों से पूछने बैठा हूं कि एक लड़की की मौत पर बवाल तो वहीं दूसरी की मौत पर सौतेली नीति क्यों? यदि एक मौत की कीमत अलगाव है तो दूसरी मौत की कीमत भी अलगाव होनी चाहिए। क्यों अब वहां के कट्टरपंथी आगे नहीं आ रहे हैं उन लोगों को सजा दिलाने के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठा रहे हैं। क्या वो आतंकी उनके भाई है?


ये वो ही शोपियां है ना जहां पर उन दो मासूमों की मौत के बाद बाद सियासत की आग भी खूब लगी थी। अलगाववादियों ने सेना पर निशाना साधा था, राज्य से बाहर निकालने की बात कही थी। लोगो का जीना मुहाल हो गया था। पर अब क्या हुआ कश्मीर के चाहने वाले, मौकापरस्त कौम कहां है? क्यों आगे आकर इसी सरकार से दर्ख्वास्त करती कि इन आतंकवादियों को निकालो यहां से। पर पहले खुद इन्हें पनाह देना बंद करना होगा। अफसोस, इस घटना पर अब कोई आवाज उठानेवाला भी नहीं है।


क्यों मेरे ब्लॉगर भाइयों, देश की सेना पर सवाल उठाने से तो तुम्हारे हांथ नहीं कांपते पर आतंकवादियों के खिलाफ लिखने पर तुम्हें क्या हो जाता है। जनतंत्र है...जनतंत्र.....जवाब दो


आपका अपना
नीतीश राज

Friday, March 6, 2009

लाहौर हमला, तीन थ्यौरी पर भारत महफूज

पाकिस्तान में श्रीलंका क्रिकेट टीम पर जो हमला हुआ है उसमें मुझे तो तीन थ्यौरी सामने आती हुई दिख रही हैं। जो तीन थ्यौरी हैं उन पर ही लगता है कि इस वक्त पाकिस्तान के हुक्मरान सोच रहे हैं। मेरे हिसाब से तीन थ्यौरी हैं---
१) तालिबान की करतूत
२) पाक के बाहर की शक्ति यानी भारत, एलटीटीई। (इसे वैसे तो खारिज कर दिया है पर फिर भी उंगली उठाने की फिराक में तो होंगे)
३) किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी।
अब बताते हैं कि क्यों ये तीन थ्यौरी सामने आ रही हैं।
पहली थ्यौरी यानी तालिबान की करतूत। पाकिस्तान के बहुत बड़े सियासी हल्कों में ये माना जा रहा है कि श्रीलंका की टीम पर जो हमला हुआ है वो तालिबान का पाकिस्तान पर बढ़ते वर्चस्व की निशानी है। जैसे कि तालिबान में हमेशा से ही पढ़ाई, सिनेमा, औरतों का बेपर्दा होने और खासतौर पर खेल पर काफी कड़े और सख्त कानून बनाए हुए हैं। तालिबानी नहीं चाहते कि क्रिकेट जैसा खेल वो या फिर उनके देश में खेला जाए और जब से स्वात पर अपना कब्जा तालिबान ने किया है तब से पाकिस्तान को अपने देश का हिस्सा मानने लग गया है तालिबान। साथ ही स्वात के बाद पूरे पाकिस्तान पर तालिबान अपना अधिपत्य जमाना चाहता है। वैसे अभी तक तफ्तीश में ज्यादातर अफगानियों को ही पकड़ा गया।
दूसरी थ्यौरी यानी पाक के बाहर की शक्ति भारत,एलटीटीई। मुंबई हमलों का दोषी पाकिस्तान को माना गया और अब तो ये साबित भी हो गया कि 26/11 की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी, हमलावर पाकिस्तान से आए थे और सारे दोषी पाकिस्तान में ही हैं। तो पाकिस्तान में ये मानने वालों की कमी नहीं है कि लाहौर हमला भारत के आंतकवादी गुट या फिर भारत की किसी खुफिया एजेंसी की कारसतानी है। बाघा बार्डर के रास्ते आए थे आतंकी पहला वक्तव्य था पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक आला अधिकारी का। दूसरी बात, लाहौर हमला मुंबई हमले का पार्ट-2 माना जा रहा है और इसी कारण से ये माना गया कि भारत की तरफ से उसी तरह इस हमले को अंजाम दिया गया जिस तरह से मुंबई हमलों को दिया गया था। यानी भारत ने बदला उतार लिया है। जब कि सारी दुनिया इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। श्रीलंका में एलटीटीई पर हमले के बाद से ये माना जा सकता था कि ये हमला वो भी करवा सकता है पर सोचने वाली बात ये है कि अभी तो वो श्रीलंका में ही अपने आप को बचाए रखने में असमर्थ हैं तो वो कहां से पाकिस्तान में अफगानी कपड़े पहनकर हमला करेंगे और यदि वो करते तो रॉकेट लॉन्चर और ग्रेनेड चूकता नहीं। पर इस थ्यौरी को पाकिस्तानी सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। अब देखेंगे कि पाकिस्तानी मीडिया क्या कहता है?
साथ ही बड़े केनवस पर देखें तो लोगों का ये मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत को इस हमले से कई फायदे हो सकते हैं। पाकिस्तान को एक आतंकवादी राष्ट्र घोषित किया जा सके(जो कि पाकिस्तान है)। साथ ही ये कि भारत कितना असुरक्षित है अपने पड़ोसी से और इस पड़ोसी से भारत को हमेशा ही खतरा बना हुआ है। आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण पाकिस्तान को अमेरिकी मदद भी नहीं मिलेगी।
तीसरी थ्यौरी यानी किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी। सबसे ज्यादा जो बात चल रही है कि ये जरूर से ही किसी घरेलू संगठन का हाथ हो सकता है। अंतिम वक्त पर बस के रूट में फेरबदल किया गया या नहीं किया गया वो ही रूट रखा जिससे एक दिन पहले गए थे इस पर भी शुरूआती बयान एक जैसे नहीं थे। माना ये भी जा रहा है कि किसी फोन के आने के बाद रूट में फेरबदल से इनकार किया गया था। जब दोनों टीमें एक साथ होटल से निकलती हैं तो पाकिस्तान की टीम श्रीलंका की टीम के साथ क्यों नहीं निकली। क्यों यूनुस खान ने अपनी टीम को ५ मिनट के लिए और रुकने को कहा? क्या कारण है इसके पीछे, ये सवाल तो खुद अंपायरों तक ने अपनी पीसी में कहा था।
जब ४८ घंटे पहले ही पंजाब प्रांत के पुलिस के आला अफसरों को ये बताया जा चुका था कि जल्द ही श्रीलंका की टीम को निशाना बनाया जा सकता है तब भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। खुद पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान ने सुरक्षा के इंतजामों पर सवाल उठाए हैं। जहां मिलने थे ७० सिपाही वहां मिले महज़ २५? तो क्या गलती ये सरासर लाहौर पुलिस की नहीं है। अंपायर क्रिस ब्राड ने ये बताया कि जब हमला हुआ तो पाकिस्तानी पुलिस वहां से भाग गई, कोई भी मदद के लिए नहीं था, हम वहां पर अकेले छूट गए थे। तो क्या इसे पुलिस की बुजदिली नहीं कहेंगे।
वैसे भी ये सही है जो अधिकतर आक्रमण करता हो तो उसे ये नहीं पता रहता कि बचाव कैसे करना है, वो ही हुआ पाकिस्तानी लोगों के साथ। अधिकतर वो भारत पर हमले की बात सोचते हैं जब हमला हुआ तो बचाव नहीं सोच सके।
यदि आतंकवादियों का मकसद श्रीलंका की टीम को मारना ही होता तो आतंकवादी एक रॉकेट लॉन्चर ही क्यों छोड़ते? वो भी ठीक निशाने पर नहीं? दो हेंड ग्रेनेड फेंकते पर इस तरह से कि दहशत पूरी दुनिया में फैल जाए पर निशाना चूक जाए।
इतने अच्छे-अच्छे एंगल से कैसे शूट किया इस पूरे हमले को? कैसे एक टीवी क्रू को पता चल गया कि ये हमला हो रहा है। और जहां से भी हो सके हर जगह, हर आतंकी की तस्वीरें उतारी गई। क्या ये बात हजम होती है? टीवी पत्रकार होने के कारण मुझे लगता है कि इतने एंगल से एक साथ तस्वीरों को लेना मुश्किल है। टॉप एंगल, साइड एंगल, फ्रंट एंगल इतने एंगल वो भी सिर्फ सेकेंड में कैसे संभव है, मुझे तो नहीं लगता। इससे ये साफ होता है कि हमले से पहले ही हमले की जानकारी थी उस क्रू को। और ये क्रिकेट जैसे खेल के साथ ये खेल किसी घर के ही सदस्य ने ही खेला है। सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए कि दहशत हम फैला सकते हैं और यदि जरूरत पड़ी तो पाकिस्तान में हम कुछ भी कर गुजर सकते हैं।
पर अब तो दूसरी थ्यौरी को सिरे से पाकिस्तान की सरकार ने खारिज कर दिया है। अब बात अंदर के गुनहगारों और ये तो पाकिस्तान क्रिकेट का दुर्भाग्य है,कि जिस मैदान पर पाकिस्तान क्रिकेट के स्वर्णिम अश्रर लिखे गए उसी गद्दाफी पर पाकिस्तान क्रिकेट पर कालिख पुत गई।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, January 13, 2009

हमारे न्यूज चैनल कितने परिपक्व?

जो भी न्यूज़ देखता है उनसे पूछा जाए कि न्यूज़ चैनल के लिए क्या जरूरी है खबर या टीआरपी, तो अधिकतर कहेंगे ‘खबर’, पर न्यूज चैनल टीआरपी पसंद करते हैं और अब न्यूज़ कहां। लेकिन कुछ दिनों से ये देखा जा रहा है कि न्यूज़ चैनलों पर न्यूज़ वापस लौटी है। वर्ना पहले न्यूज़ के सिवा हमारे देश के न्यूज़ चैनलों पर सब कुछ होता था। नाग-नागिन, भूत, ज्योतिष, भ्रम फैलाने वाली ख़बरें और इन पर होने वाले लंबी-लंबी चर्चा, एक ही तस्वीर बार-बार दिखाई जाती थी। पर नहीं बदली तो खेल की खबरें पहले भी सिर्फ क्रिकेट होता था और अब भी सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट ही होता है, किसी और खेल को जगह नहीं मिल पाती। क्यों? क्योंकि भारत में क्रिकेट के सिवा कुछ नहीं ‘बिकता’। कुछ अंग्रेजी चैनल खेल की खबरों में सभी खेलों को जगह देते दिख जाएंगे पर हिंदी न्यूज चैनलों पर तो सिर्फ ढाक के तीन पात याने क्रिकेट। दूसरे खेलों के हाल का अंदाजा हम इससे लगा सकते हैं कि पुलेला गोपीचंद को खेल मंत्री एम एस गिल ने नहीं पहचाना था, जबकि गुपीचंद की शागिर्द सायना नेहवाल के कंधे पर हाथ रख कर मंत्री जी खड़े थे। शायद मंत्री जी भी हिंदी न्यूज चैनल ही देखते होंगे।
वहीं गर दूसरे शब्दों में कहें, कि क्या हमारी न्यूज इंडस्ट्री इतनी परिपक्व हो गई है जितने की पश्चिमी देशों की न्यूज़ इंडस्ट्री? हमारे लिए न्यूज़ क्या है? यदि हम ये सवाल अपने आप से पूछें तो हमारे जहन में सबसे पहले ख्याल क्या आएगा? हमारी खबरों का दायरा सिर्फ और सिर्फ हमारे इर्द गिर्द ही घूमता है, आस पास की क्षेत्रीय हलचल पर हम ज्यादा ध्यान देते हैं। देश में क्या चल रहा है राजनीति के स्तर पर थोड़ा बहुत लोग पढ़ भी लेते हैं या जान लेने के इच्छुक होते हैं वर्ना दूसरे प्रदेश, या देश या फिर सात समंदर की खबरों को जानने के इच्छुक हम बहुत ही कम होते हैं।
मुंबई हमलों के दौरान बीबीसी पर पूरे दिन-रात सिर्फ और सिर्फ मुंबई की ख़बरें ही छाई रहीं। क्या ब्रिटेन में २६ से २९ तक कुछ भी ऐसा नहीं घट रहा था कि वो बीबीसी चैनल पर एयर टाइम ले पाता। हमारे देश में तो बहुत से रिएलिटी शो हैं जिन पर हर दिन दो-तीन घंटे आराम से निकल जाते हैं। बीबीसी पर पूरे समय मुंबई हमलों का क़हर ही चलता रहा। सेटेलाइट फोन के जरिए तस्वीरें दिखाई जा रहीं थी। साथ ही विदेशी मीडिया इस बात का भी ध्यान रख रहा था कि कहीं भी विचलित करने वाली तस्वीरें ना दिखाई जाएं, क्षत विक्षप्त शरीर नहीं दिखे या फिर सेना की मूवमेंट भी नहीं दिखाई जा रही थी। बीबीसी पर ब्लॉगर छाए रहे, जो अपने ब्लॉग पर कोई जानकारी दे रहे थे, उनसे वो फोन पर बात भी कर रहे थे।
अब जब कि बहुत हद तक साफ हो गया है कि मुंबई हमलों में पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है। साथ ही कसाब को भी पाकिस्तानी मान लिया गया है। लेकिन मुंबई हमला भारतीय मीडिया के लिए एक नया अनुभव साबित हुआ। क्या रोल हो मीडिया का इस बारे में बात अगली बार। इस तरह की कमांडों कार्रवाई पहली बार हमारी मीडिया ने देखी। यदि गौर करें तो श्रीनगर या फिर बोर्डर एरिया को छोड़कर कहां पर हमें याद आता है कि कमांडो कार्रवाई की गई जिसे इतने बड़े पैमाने पर कवर किया गया। अमृतसर के स्वर्णमंदिर में कमांडो कार्रवाई हुई थी पर तब कितना सजग था मीडिया। कुछ चुनिंदा अखबार हुआ करते थे लोगों के पास टीवी भी नहीं था। तो किसी शहर में वो भी मैट्रो सिटी में इस तरह आतंकवादियों का क़हर बरपाना और साथ ही सबसे आगे निकलने की होड़ ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से इतनी बड़ी गलती करवाई जिसका सीधे-सीधे फायद पाकिस्तान में बैठे इन आतंकवादियों के आकाओं को मिला और बिना बाहर देखे वो कमांडो की हर कार्रवाई के बार में आसानी से जान जाते और हमारी सेना को इसका काफी खामियाजा भुगतना पड़ता। लगता तो ये है कि सबसे पहले और आगे निकलने की होड़ ने हमारी इलैक्ट्रोनिक मीडिया और एजेंसियों को कभी परिपक्व ही नहीं होने दिया।
यहां पर ये गौर करने वाली बात है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात बन गए हैं। साथ ही दोनों देशों में साइबर वॉर छिड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ मीडिया के बीच भी एक तरह की कोल्ड वॉर छिड़ गई है। ये समय होता है कि दोनों देश अपने आप में संयम बरतें पर ऐसा दिख नहीं रहा है। मीडिया की बात है तो कुछ कायदे, कानून, नियम, सरकार को बनाने ही होंगे जो कि ऐसी आपतकाल स्थितियों में मीडिया पर लागू हो। सरकार ही मीडिया को कुछ फुटेज और घंटे दर घंटे ब्रीफिंग करे और हालात से वाकिफ कराए। जब चाहे सरकार आपात स्थितियों में दुनिया के सामने जैसे चाहे हालात दिखाना चाहे वो दिखाए। याने कि जिस तरह की कवरेज से दूसरे समूह याने कि हमलावरों को फायदा नहीं पहुंचे। वैसे सरकार जल्द ही इस मामले में कुछ नियम कानून की व्यवस्था करने में जुट गई है। पर देखना तो ये होगा कि ये नियम आते कितने वक्त में हैं और न्यूज चैनल कितना इन नियमों पर अमल करते हैं। कुछ नियम एनबीए याने न्यूज ब्रॉडकास्ट एसो. ने भी बनाए हैं याने की वो संस्था जो कि मीडिया में रहकर मीडिया पर सख़्त नज़र रखती है। उनपर एक नज़र अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, January 6, 2009

क्यों हमारे देश भीख मांगने आ रहे हो मुशर्रफ?

अभी हाल ही में ये खबर सामने आई थी कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्ऱफ भारत आ सकते हैं। वैसे मुशर्रफ इसलिए भारत नहीं आ रहे कि मुंबई हमलों के मामले में भारत की कुछ मदद कर सकें। दरअसल मुशर्रफ भविष्य में अपनी राजनीतिक गतिविधियों के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से भारत, अमेरिका, हांगकांग, चीन, यूरोपीय देशों की यात्रा कर विशेष व्याख्यान देंगे। इन सभी देशों में जाकर वो अपने संवादों के जरिए अपना नजरिया लोगों तक पहुंचाएंगे। और वैसे भी मियां मुशर्रफ के पास अभी दो साल का वक्त भी है क्योंकि दो साल याने नवंबर २००९ से पहले वो राजनीति में नहीं उतर सकते। सत्ता छोड़ने के बाद से ही ये पाबंदी लगी हुई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये आता है कि जहां एक तरफ तो मुशर्रफ भारत के सबूत देने के बाद भी अपना बचाव करने में लगे हुए हैं साथ ही युद्ध तक की धमकी देने से गुरेज नहीं कर रहे तो भारत आकर व्याख्यान के जरिए भारत की जनता से अपने जीवनयापन और अपने स्वार्थ के लिए भीख मांगने की जरूरत क्या है। यदि लड़ाई रखनी है तो खुल के रखो। एक तरफ तो आप पीठ में खंजर भोंक रहे हैं, भारत को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में जलील करने से भी नहीं चूक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने स्वार्थ के लिए आप भारत में आकर भारत के पैसों से, भारत का निवाला खाकर भारत के खिलाफ ज़हर उगलने की तैयारी कर रहे हैं।
यदि देखता हूं तो अपनी सरकार की ही राजनीतिक अस्थिरता ज्यादा नज़र आती है। क्यों हमारे फैसले अडिग नहीं रहते? यदि किसी देश ने आपका जीना दुर्भर कर रखा है तो बेहतरी इसी में है कि कुछ समय के लिए उस देश का बहिष्कार कर दो। दूसरे देश को इस बात से कितना असर पड़ेगा इस बात की चिंता करने की हमें जरूरत नहीं है। हमें अपने कड़े कदम उठाने की जरूरत है और साथ ही दुनिया को ये भी बताने की जरूरत है कि हम ये कड़े कदम उठा रहे हैं। यदि पाकिस्तान से दोस्ती के बढ़े हाथ लाहौर बस सेवा, ट्रेन सेवा और हवाई सेवा को कुछ समय के लिए रोक दिया जाए तो पता चलता है कि हां आपने अपना रुख साफ किया है। एक तरफ तो क्रिकेट टीम, हॉकी टीम पर रोक लगा दी गई है वहीं दूसरी तरफ आतंकवादी एक देश से दूसरे देश आ-जा रहे हैं इन सेवाओं के जरिए। और यदि उस सेवाओं को बंद करने पर किसी को ऐतराज है तो बेहतर है कि वो पाकिस्तान में जाकर बस जाए मेरे देश भारत में इनके लिए जगह नहीं हैं। आतंकवाद के नाम पर अमेरिका किसी देश पर हमला कर दे तो चलेगा तो क्या हम आतंकवाद के नाम पर अपने देश की सुरक्षा के लिए कुछ कड़े कदम तो ले ही सकते हैं।
हमारी सरकार को चाहिए कि कड़े कदम उठाते हुए मियां मुशर्रफ को देश में आने से रोकें वर्ना पता नहीं वो कौन शख्स हो पर जिस बात का पता है वो है कि जूता कानपुर का ही रहेगा और यकीन मानिए चेहरा मुशर्रफ का ही होगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, December 25, 2008

कब तक डरपोक बने रहेंगे हम? हर दिन के मरने से तो बेहतर है कि एक बार ही मर जाएं।

जब-जब भारत पर आतंकी हमला हुआ है तब-तब भारत की सरकार ने बड़ा ही कड़ा रुख इख्तियार किया है। हर बार पाकिस्तान की तरफ ही निशाना रहा। भारत की तरफ से सबूत भी पाक सरकार को दिए गए। हर बार भारत के कड़े रुख के बाद पाक का रवैया क्या रहा? क्या पाकिस्तान ने कभी भी इस बात को स्वीकार किया कि वो आतंकवादी हमला पाकिस्तान की जमीन से किया गया। नहीं, भारत के हर कड़े रुख का जवाब पाकिस्तान ने और भी तीखे तेवरों में दिया। कोई भी कुछ कहता रहा, पर पाकिस्तान ने किसी की भी नहीं सुनी। भारत ने पूरे विश्व का समर्थन हासिल किया लेकिन पाकिस्तान का रवैया उतना ही सख्त रहा, उसने कभी नहीं माना कि आतंकियों को पाक जमीन मुहैया है।
भारत की संसद पर हमला हुआ, विमान अपहरण कांड और दिल्ली, बैंगलोर, राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, भारत के हर प्रदेश पर संकट के काले बादल अपना क़हर बरपाते रहे। भारत को सबूत के तौर पर कुछ आतंकवादी मिलते रहे लेकिन कभी भी पाकिस्तनी सरकार ने ये कबूल नहीं किया कि उनकी जमीन ही है दहशतगर्दों की पनाहगाह। पाक अधिकृत कश्मीर में तो आतंकवादियों के गढ़ के इतने पुख्ता सबूत मिले जिसे की दरकिनार नहीं किया जा सकता था पर पाकिस्तानी सरकार ने इसे कभी नहीं माना और आज भी वहां कई आतंकवादी संगठन अपना गढ़ बनाए बैठे हैं और उनकी मदद कर रहा है आईएसआई। जिसके पुख्ता सबूत बकौल भारत सरकार भारत के पास हैं और कुछ तो पाक और यूएन को भी दिए जा चुके हैं।
करगिल, क्या किसी को याद नहीं है, अभी हम नहीं भूले हैं, पाकिस्तान की सरकार पर करगिल करवाने का इल्जाम लगा। जब तक कि पाक सरकार पर काबिज नवाज शरीफ कुछ कर पाते तब तक उन्हें ही देश से ऱुखसत करवा दिया गया। आज भी नवाज शरीफ इस बात से इनकार नहीं करते कि करगिल पाकिस्तान पर काबिज समानान्तर सरकार की ही देन थी जिसे कि उस समय के जनरल परवेज मुशर्रफ चला रहे थे। वो दौर था जब कि भारत के राजनीतिक और आपसी संबंध पाकिस्तान के साथ काफी सौहार्दपूर्ण हो गए थे। लेकिन ठीक इसी दौर के बाद पाकिस्तान को एक ऐसा जनरल कम नेता मिला जो कि चाणक्य की तरह सोचता था। उसने कई मामलों में भारत के साथ ऐसी कूटनीति खेली कि भारत के चाणक्य कुछ कर नहीं सके। हमारे देश में आकर ही पाक सरकार का वो जनरल अपनी अधिकतर बातें मनवा के चला गया। आगरा वर्ता के असफल होने का ठीकरा भी भारतीय सरकार के ऊपर ही फोड़ दिया गया। जनरल परवेज मुशर्रफ ने यूएन तक में जाकर हमारे कई तथ्यों को दरकिनार कर दिया और साथ ही पीठ में छुरा भोंकने से भी वो बाज नहीं आया।
अब बात आती है कि घुसपैठ तो पहले भी भारत की लगी पाक सीमा से भारत की जमीन पर होती ही रही हैं। लेकिन इस बार मुंबई में फिदाइनों ने मासूम जनता पर क़हर बरपा दिया। इस हमले ने भारत की आर्थिक राजधानी के साथ-साथ पूरे देश को दहशत से भर दिया। २०० से ज्यादा लोग मारे गए उसमें २० से ज्यादा विदेशी भी थे। पूरे विश्व में इस हमले की निंदा हुई। लेकिन पहली बार किसी फिदाइन हमलावर को जिंदा पकड़ा जा सका। उस आतंकवादी अजमल आमिर कसाब ने ये कबूला कि वो पाकिस्तानी है। आतंकवादी के कबूलनामें के बाद इस समय की सरकार को बाहर से सहयोग देने वाले नवाज शरीफ ने भी ये मान लिया कि कसाब पाकिस्तानी है। पाक मीडिया की जुबानी पूरी दुनिया ने ये जाना कि खुद कसाब के पिता और उस गांव फरीदकोट के लोगों ने ये माना कि कसाब पाकिस्तानी है पर पाकिस्तान को अब भी सबूत की दरकार रही।
भारत एक तरफ डर-डर कर ये बात कहता रहा कि भारत के सारे विकल्प खुले हुए हैं। भारत के विदेश मंत्री और पीएम ने कहा कि हम तो आतंकवाद को ख़त्म करने की बात कर रहे हैं। पाकिस्तान अपनी जमीन से जितनी जल्दी हो आतंकवादियों को पनाह देना बंद करे। दूसरी तरफ पीएम ने साफ शब्दों में कहा कि भारत का मुद्दा युद्ध नहीं, आतंकवाद है। पर दूसरी तरफ पाकिस्तान डंके की चोट पर कार्रवाई करने से मना कर रहा है। पाकिस्तान के आर्मी चीफ परवेज कयानी ने तो यहां तक साफ कह दिया कि
‘पाकिस्तान की आर्मी पूरी तरह तैयार है और यदि भारत कोई भी कदम उठाता है तो भारत के हर कदम का जवाब एक मिनट के अंदर दे दिया जाएगा।’
जहां भारत सूझबूझ का परिचय दे रहा है वहीं पाकिस्तान अकड़ और अड़ियल रवैया अपना रहा है। पाकिस्तान ने अपने रैंजर्स राजस्थान और गुजरात सीमा से हटा कर वहां पर फौज की तैनाती कर रहा है। जबकि पाकिस्तान के इस कदम को भारत रुटीन कार्रवाई मान कर अभी अपनी सेना की तैनाती पर विचार कर रहा है। जबकि भारत की तरफ से एहतियातन कदम उठाए जा रहे हैं। सेना को अलर्ट पर रख दिया गया है लेकिन सीमा पर अभी भी बीएसएफ ही है।
मुंबई हमारे देश का हिस्सा है जब मुंबई पर हमला हुआ तो बैकफुट पर भारत क्यों है। कब तक हम ये सोचते रहेंगे कि अमेरिका हस्ताक्षेप करेगा तभी कोई फैसला होगा। क्या जब सबूत हमारे पास हैं तो क्या हम कार्रवाई नहीं कर सकते। पाकिस्तान के ऊपर जब अमेरिका को शक हुआ था तो उनके घर में घुसकर अमेरिकी सेना ने कार्रवाई की थी। मुशर्रफ को पूरा सहयोग देना पड़ा था, पाक के जितने कठमुल्ला थे सब मियां मुशर्रफ के खिलाफ हो गए थे। लेकिन अमेरिका ही आकर जज की भूमिका क्यों निभाए। हम फैसले बाद में लेते हैं अब जब कि पाकिस्तान पूरे एक्शन में आ गया है तो सरकार भी अपनी सीमा पर सुरक्षा तैनात करना शुरू कर देगी। ये ही समय होता है जब कि भारत की सरजमीं पर आतंकवादी सबसे ज्यादा आते हैं उन बर्फीली चोटियों से जो कि भारत का मस्तक है।
मेरा भारत महान, हम आजाद हैं, मेरे देश की तरफ जो भी निगाह उठा कर देखेगा हम उनकी आंखें नोच लेंगे। असल मायने में हम बस कहते रहते हैं, डरपोक हैं हम, डरते हैं हम, हर दिन हम जीते हैं पर डरते हुए, कब कोई गोली हमें मौत के आगोश में डाल दे। मौत से भरी जिंदगी से हमें शिकवा नहीं पर एक दिन में ये फैसला नहीं कर सकते कि इस जिल्लत से भरी जिंदगी नहीं चाहिए। अरे आज हम खुश नहीं हैं कल हमारे बच्चे खुश नहीं रहेंगे परसों उनके बच्चे। क्या करना है इस बात का फैसला भी हम अपने अनुसार नहीं लेते। क्यों आखिर क्यों? हम दूसरों की तरफ नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं कि या तो वो आकर फैसला कर दे या फिर जब तक दूसरा कोई हरकत नहीं करेगा तब तक हम कोई हल्ला नहीं बोलेंगे। और जब हल्ला बोलेंगे और पैर पर गिरकर माफी मांगने लगेगा तो फिर हमसे बड़ा दानवीर इस धरती पर कोई नहीं। १९७१ में यदि बांग्लादेश बना तो हमारे कारण लेकिन पाकिस्तानियों के घर में घुसकर उन्हें हमने औकात दिखाई थी। पर जंग जीतने के बाद भी भारत ने क्या किया। वो जो भारत और पाकिस्तान के बीच की जड़ थी उस को खत्म नहीं किया। हम जंग जीत चुके थे तब भी हमने पीओके वापस नहीं लिया। क्यों, क्यों नहीं लिया आज वहां पर आतंकवादियों ने हमारी ही जमीन पर आतंक के कैंप लगा रखे हैं। अरे, मुंबई मेरा अपना है, मेरे देश का हिस्सा है, करगिल हमारा है, उसपर किसी ने आंखें उठाई थी, तुमने आंखें तो नोच ली पर ये क्या साथ में उन आंखों को ठीक करने के लिए दवा दारू सब कुछ खुद मुहैया करा दिया। मैंने देखी थी लाशें, जब जवानों को ताबूत में से निकाला जाता था और पूरा गांव दहाड़ें मार मारकर रोता था उस सफेद पाउडर से लिपे बिना हरकत के जिस्म को।
भारत के साथ-साथ अमेरिका तक ने भी ये कह दिया कि पाकिस्तान अपनी जमीन से आतंकवादी वारदातें बंद करे। सख्त बात कोई भी देश नहीं कर रहा है। साथ ही विश्व ये चाहता है कि ये पड़ोसी देशों का आपसी मामला है और हो सके तो दोनों देश ही मिलकर इस मसले को सुलझाएं। सभी ये जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु सक्षम देश हैं और यदि लड़ाई हुई तो नुकसान विश्व का होगा। इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तान ये गेम खेलता है, जब भी पाक पर आतंकियों को पनाह देने की बात आती है तब ही वो सीमा पर ऐसा माहौल बना देता है कि जिससे लगे कि तनावपूर्ण स्थति बन चुकी है। ये भारत को समझना होगा कि पाकिस्तान हर बार इसी गेम प्लान के अंतर्गत काम करता है। भारत अब तक बहुत संयम का परिचय दे चुका है लेकिन हमारे संयमपन को हमारी कायरता ना समझा जाए, हम बार-बार ये बात कह चुके हैं लेकिन हमने कभी भी ये दिखाया नहीं है। देश का हर बाशिंदा इस खौफ के साए से अपने आप को निकालना चाहता है। हमारा साथ हमारी सरकार के साथ है, हम एक जुबान में कहते हैं कि अब कहने का नहीं करने का वक्त आ गया है।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, December 21, 2008

सबूत पे सबूत मांगते हो, कार्रवाई करोगे या फिर...।

सबूत, सबूत, सबूत, सबूत मांगता है पाकिस्तान। कितने सबूत चाहिए पाकिस्तान को और किस बात के सबूत चाहिए। अब क्या आकाशवाणी होगी कि पाकिस्तान ही है जिम्मेदार। वो ही है मुंबई के २०० लोगों का हत्यारा और करोड़ों लोगों के दिल को दुखाने और दहशत भरने का जिम्मेदार। क़ातिल ने खुद मान लिया कि हां मैंने ही क़त्ल किया है। करोड़ों लोगों के सामने उसने नरसंहार किया। ऐसा नहीं कि तुम(पाक) नहीं देख रहे थे उस हत्याकांड को। पाक को भी पता चल रहा था कि हां ये उनके ही आदमी है लेकिन कबूल कर तो वो सकता ही नहीं।
मुंबई हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को सबूत दिए साथ ही २० मोस्ट वांटेड लोगों की लिस्ट भी थमा दी। पाक ने तुरंत इस बात से मना कर दिया कि उनके देश में मोस्ट वांटेड नहीं हैं। साथ ही यदि होंगे भी तो हम भारत को नहीं सौपेंगे, जो भी करना होगा हम पाकिस्तान की अदालत में ही करेंगे। मतलब उनका भी साफ था कि पाकिस्तान फिर से अंग्रेजों के शासनकाल में लौट जाएगा जहां पर हर कानून उनका अपना होता था, जज से लेकर पैरोकार तक। भारत ने वो ही सबूत यूएन के पास भी भेजे थे। यूएन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए तुरंत पाक को आगाह किया और पाक के एक आतंकवादी संगठन पर कार्रवाई होगई। फिर पाक किस बात के सबूत मांग रहा है। जब एक तरफ तो हमारे दिए हुए सबूत पर कार्रवाई कर रहा है तो फिर किस बात के सबूत।
दूसरी तरफ जब कसाब ने ये खुद कबूल किया है कि वो पाकिस्तानी है और साथ ही पाक के फरीदकोट का रहने वाला है तो फिर भी पाकिस्तान को भरोसा नहीं हो रहा है। चलो भई कसाब को हमने और हमारी पुलिस ने खूब पीटा और फिर उससे जबर्दस्ती ये लिखवाया और बुलवाया जा रहा है तो चलो कसाब की बात भी छोड़ देते हैं।
पाकिस्तान के फरीदकोट का रहने वाला एक शख्स जो कि अपना नाम आमिर बताता है उसने बोला है कि टीवी पर दिखलाए जाने वाला आतंकवादी जिसने की मुंबई में नरसंहार किया वो उसका ही बेटा है। उस पिता ने तो यहां तक कहा कि वो कई दिन तक ये सोचते रहे कि कैसे कबूल करें कि अजमल आमिर कसाब उनकी ही औलाद है।
फरीदकोट के इस शख्स को रातों रात कहां गायब कर दिया जाता है कि पता ही नहीं चलता। दूसरी तरफ बीबीसी के संवाददाता जब वहां जाकर तहकीकात करता है तो उसे कसाब के घर सादी ड्रेस में पुलिस का पहरा दिखता है। पुलिस का पहरा क्यों? कोई जवाब देने के लिए। फिर उस रिपोर्टर को वहां से चले जाने के लिए कहा जाता है।
पाकिस्तान का नेशनल टीवी डॉन, एक स्टिंग ऑपरेशन करता है वो भी कसाब के गांव का। कैमरे पर तो नहीं पर हिडन कैमरे पर सभी लोगों ने कसाब की असलियत खोल दी।
अब पाकिस्तान की दो ऐसी शख्सियत ये बोल रही हैं कि अजमल आमिर कसाब पाकिस्तानी है। नवाज शरीफ ने एक पाक टीवी को दिए इंटरव्यू में ये साफ साफ कह दिया कि कसाब पाकिस्तानी है और जरदारी इस सच को सामने आने देना नहीं चाहते। साथ ही पाकिस्तान में इस सच को कबूल करने वाले तो बहुत मिल जाएंगे लेकिन सामने लाने वाला नहीं। नवाज शरीफ ने ये भी कहा कि खुद नवाज ने इस बात का पता लगाया है कि फरीदकोट का ही रहने वाला है कसाब और उसका परिवार भी वहीं रहता है और साथ ही उसके परिवार पर हर समय पेहरा है। सीधे उन्होंने ये बात कही है कि यदि कसाब पाकिस्तानी नहीं है तो फरीदकोट में इतनी सुरक्षा क्यों है।
अब पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की अध्यक्ष असमा जहांगीर ने ये माना है कि पाकिस्तान का ही है कसाब। साथ ही उन्होंने ये भी माना कि बेहतर हो कि पाकिस्तान सीधे-सीधे इस बात को मान ले और फिर क्या अब भी सबूत की जरूरत है पाकिस्तान को, ये असमा जहांगीर ने कहा।
पाकिस्तान और पाक मीडिया इस बात को कहीं और से जोड़ कर देख रहे हैं। पाक के मैरियट होटल को उड़ाने के अंदाजे से आरडीएक्स से भरा ट्रक होटल से टक्करा दिया जाता है वहां पर इस बात को भारत की तरफ से कार्रवाई माना जा रहा है। पाक मीडिया और विश्लेषक भी जरदारी राग अलापने में लगे हुए हैं। भारत को इस बार कड़ा कदम उठाना होगा।
कहीं से भी छोटी से भूल भारत-पाक को युद्ध की ओर लेजा सकती है। दोनों देशों को बचाना तो इस युद्ध से ही है क्योंकि अलगाववादी ये ही तो चाहते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, December 18, 2008

करकरे की शहादत पर सवाल नहीं पर मौत की जांच तो होनी ही चाहिए, क्या गलत कहा है अंतुले ने।

कई बार लगता है कि आग शांत होने की राह तकती रहती है लेकिन कुछ उस आग में घी डालकर उसे जलाए रखना चाहते हैं। चाहे किसी वजह से भी। कुछ घाव ऐसे होते हैं जो कि समय के साथ भर जाते हैं लेकिन अपने निशान छोड़ जाते हैं, पर कुछ घाव ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार-बार छेड़ा जाता है, कचोटा जाता है, लेकिन बार-बार क्यों छेड़ा जाता है उन घावों को? क्योंकि वो घाव नासूर की शक्ल इखित्यार कर ले।
कुछ लोगों को शायद शहीदों की शहादत पर सवालिया निशान लगाने की आदत से हो गई है। पहले इंस्पेक्टर शर्मा की शहादत पर उठाए गए थे सवाल, तब भी बहुत बखेड़ा हुआ था। कुछ लोगों ने तो उस दिल्ली के बाटला एनकाउंटर तक को फर्जी करार दे दिया था। कुछ ने तो यहां तक कह दिया था कि खुद पुलिस की गोली का शिकार हुए थे इंस्पेक्टर शर्मा। फिर अब आवाज़ उठने लगी है कि शहीद करकरे क्या वाकई में शहीद हुए हैं? क्या इस बार मुंबई पर हुए हमले को भी कुछ लोग फर्जी करार देंगे, जहां पर 200 लोग मारे गए।
शायद कुछ लोग शहीद हेमंत करकरे के नाम के साथ जुड़े इस शहीद तमगे को पचा नहीं पा रहे हैं। तभी तो कोई ना कोई इस शहीद की शहादत पर सवालिया निशान जरूर लगा देता है।
अब की बार बारी है केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले की। बिना तोल के बोलकर फंस गए अंतुले। अंतुले ने हेमंत करकरे पर कहा कि ‘उन्हें आतंकवादियों ने मारा या फिर किसी और ने’। जब मामला उठा तो अंतुले ने लोकसभा में जरा तोल कर जवाब दिया 'मैंने कहा था कि बजाए इसके कि करकरे, काम्टे, सालस्कर समेत एटीएस दल ताज होटल या ओबेराय भेजा जाता, उन्हें कामा अस्पताल भेजा गया। इन जवां मर्दों को एक ही गाड़ी में सवार होकर कामा अस्पताल जाने का निर्देश किसने दिया इस मामले की जांच कराने के बारे में मैंने कहा था।'
मैं नहीं जानता कि कितने लोग गलत समय पर दिए अंतुले के इस बयान से इत्तेफाक रखते होंगे।
अंतुले के इस बयान से पर मैं तो पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूं।

जांच जरूर होनी चाहिए। ये कोई माखौल नहीं था कि तीन आला अफसर हम लोगों ने यूं ही गवां दिए। मैं पूछता हूं आज हम बार-बार कह रहे हैं कि हेमंत करकरे, सालस्कर और काम्टे शहीद हुए, पर क्या उन तीनों में से किसी को भी इतना मौका मिला था कि वो अपनी आत्मरक्षा में गोली चला पाएं। क्या सच मायने में वो शहीद हुए हैं। शहीद का दर्जा तो हम उनको देते हैं जो कि दुश्मन से लड़ते हुए, टक्कर लेते हुए दुश्मन की गोली से मारा जाए ना कि सरकार, प्रशासन और डिपार्टमेंट की बेवकूफी से।
जम्मू-कश्मीर में हर दो-चार दिन में एक जवान शहीद हो जाता है। शायद ही किसी को ये पता चलता हो कि कोई शहीद हो गया। ना कोई इनाम ना कोई पोस्टर ना कोई तमगा। फिर भी हर रोज उसी मुस्तैदी के साथ सभी जवान डटे रहते हैं।

२६ नवंबर की वो काली रात को जब आतंकवादियों ने सीएसटी पर क़हर बरपाया था और कुछ पुलिसकर्मी उनसे लोहा ले रहे थे और उन बेचारों की खुटल, जंग खाई बंदूक ठस हो गई थी तो उन सिपाहियों को वहां से भागना पड़ा था। कुछ लोगों ने इन सिपाहियों को भगोड़ा कहा था लेकिन मैं इन को हीरो कहता हूं। जब आतंकवादी इन पर गोलियां बरसा रहे थे तो आसपास की दीवारों से धुआं उठ रहा था तब भी काफी देर तक ये डटे रहे। सलाम करता हूं उस सिपाहियों को। तब कहीं ये खबर हेमंत करकरे, सालस्कर और अशाक काम्टे के पास पहुंची थी। पहले भी मुंबई की लाइफ लाइन माने जाने वाली लोकल ट्रेन पर हमले हो चुके हैं तो सभी के सभी इस बात को ध्यान में रखते हुए सीएसटी की तरफ भागे।
अंतिम बार वीडियो में हम सबने हेमंत करकरे को सीएसटी पर ही देखा था। तब ध्यान होगा सबको कि उस समय उन्होंने आसमानी शर्ट पर हेल्मेट लगा रखा था। साथ ही एक सिपाही ने उनके हाथ में बंदूक दी थी। तब सबसे पहले मेरे दिमाग में ख्याल आया था कि कहीं शर्मा की तरह ये भी बुलेटप्रूफ जैकेट ना पहन के जाएं। पर थोड़ी देर बाद कुछ सिपाहियों के साथ करकरे को फ्रंट पर जाते देखा था। सीएसटी के अंदर कुछ सिपाहियों के साथ जाते देखा था। याने कि एक बात तो सही है कि वो मुकाबला करने के लिए ही उस जगह पर गए थे। पर जाते समय उनके शरीर पर जो था वो था दंगा निरोधक दस्ता का बुलेट प्रूफ या कहें कि लाठी प्रूफ जैकेट जिसे की बाद में खुद पुलिस के आला अफसरों ने माना है।
तभी पता चलता है कि आतंकवादी सीएसटी छोड़ चुके हैं और कामा अस्पताल की तरफ गए हैं और सदानंद दाते कामा पर घायल हो गए हैं और मैट्रो के पास से भी गोलियों की आवाज़ें सुनी गई हैं। हेमंत करकरे अपने ड्राइवर के साथ कामा की तरफ कूच करने के लिए निकलने लगे। पर तभी सालस्कर और काम्टे भी वहां पहुंच गए। फिर तीनों के तीनों एक साथ कामा की तरफ चल दिए। पर इस बार गाड़ी की कमान खुद सालस्कर ने संभाल रखी थी। आगे की सीट पर सालस्कर के साथ काम्टे बैठे थे और क्वालिस की बीच की सीट पर हेमंत करकरे बैठे हुए थे और पीछे की सीट पर ड्राइवर के साथ चार सिपाही जिसमें जाधव भी थे। पर निकलते वक्त सभी ने बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं पहने हुए थी शायद सब ने सीएसटी पर ही छोड़ दी, क्यों। बीच-बीच में पुलिस की ये क्वालिस रुकते हुए सिपाहियों और लोगों से पूछते हुए आगे बढ़ रही थी कामा अस्पताल के पास सदानंद को की मदद के लिए ये तीनों वहां आए थे। गाड़ी रुकती है तभी पेड़ के पीछे से दो आतंकवादी कसाब और इस्माइल निकले और क्वालिस पर अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे। कुछ पल में ही मुंबई ने अपने तीनों अफसर खो दिए। साथ ही तीन सिपाही भी एक सिपाही जाधव घायल अवस्था में क्वालिस में ही पड़े मिले। जब तक कि पुलिस ने वहां आकर सभी को अस्पताल नहीं पहुंचाया, अस्पताल में जाधव का इलाज चलने लगा लेकिन उनके साहब शहीद हो चुके थे। पर सवाल यहीं खड़े होते हैं कि इन आतंकियों का मकसद क्या था। क्या वो बिना किसी मकसद के भारत में आतंक फैलाने के लिए आए थे। क्या वो विदेशियों पर हमला करने आए थे। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में हमारी नाक नीचे करने के लिए आए थे। क्या करने आए थे वो यहां पर। क्या और कोई भी कारण हमें समझ में नहीं आता। ताज होटल, ओबेराय होटल समझ में आता है कि वहां पर विदेशी थे और साथ ही वो मुंबई की पहचान है, सीएसटी, नरीमन भी समझ में आते हैं। पर क्या कारण था कि कामा, मैट्रो और पुलिस मुख्यालय की पास की जगह को क्यों निशाना बनाया गया। जहां पर विदेशी ढूंढे से भी नहीं मिलेंगे। कोई बताए फिर उस पर ही निशाना क्यों?
२५ नवंबर को पुणे के एक पुलिस थाने में एक फोन कॉल आता है जो कि मराठी में बोलता है कि हेमंत करकरे को दो-तीन दिन में बम ब्लास्ट में जान से मार देंगे। अगले दिन वो मार भी दिए जाते हैं। क्या इस की जांच नहीं होनी चाहिए कहीं कोई हमारे देश में ही गद्दार तो नहीं। लेकिन एक बात तो सारी दुनिया मानेगी कि वो आतंकवादियों से मुकाबला करने के लिए ही गए थे पर ये उनकी किस्मत ही थी कि मुंबई के तीन आला पुलिस अधिकारी बिना किसी को आघात पहुंचाए उन आतंकवादियों के घात लग गए। पर उन तीनों से शहीद का तमगा आने वाले कल में भी कोई नहीं छीन पाएगा वो फ्रंट पर ही शहीद हुए हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, December 3, 2008

इजरायली अपने लोगों का शव बिना पोस्टमार्टम के ले गए, लेकिन हमले का तो हमें पोस्टमार्टम करना होगा।

मुंबई धमाकों को क्या कोई याद रखना चाहेगा? शायद नहीं, ये वो डरावनी हकीकत है जिसे दोबारा कोई नहीं देखना चाहेगा। लेकिन यदि हम चाहते हैं कि ये दोबारा हमारे देश के साथ नहीं हो तो इस घाव को हमें हमेशा याद रखना होगा। जहां तक मेरा मानना है कि ये पहली बार है कि हम हारे हैं और आतंकवादी जीते हैं। वो जो करने आए थे वो उससे ज्यादा कर गए। अब तक वो छुप कर हमला करते थे। श्रीनगर, घाटी के तर्ज पर इस बार फिदाइन हमला किया गया। हर बार वो छुपकर वार करते थे इस बार अपना दस्ता भेजकर, बिना चेहरा छुपाए, चेहरे पर कोइ नकाब नहीं, चेहरा दिखाकर हमला किया। २००२ अक्षरधाम सबको याद ही होगा, ऐसे वाक्ये बहुत ही कम हैं। हम इस हमले को गर भूल गए तो याद रखिए कि फिर आतंकवाद पलट कर आएगा और वार होगा हमारे नासूर बन चुके घाव पर।

कैसे घुसे आतंकवादी ?

सब जानते हैं कि कहीं तो चूक हुई है पर ये चूक हुई किस-किस मोड़ पर है। तो लगता है कि शुरू से लेकर आखिर तक हर मोड़ पर सिर्फ हमारी ही गलती है। थ्यौरी तो कई सामने आ रही हैं पर जिस पर विश्वास करना पड़ेगा वो है जो कि पुलिस ने अपने आप को बचाने कि लिए दी है। पकिस्तान के कराची में पहले १० आतंकवादी इकट्ठा हुए, फिर समुद्री रास्ते के जरिए भारतीय सीमा पर एक जहाज को अगवा कर के मुंबई पहुंचे और फिर टैक्सियों में भरकर दो-दो के गुट में ५ जगह अपने-अपने मुकाम की तरफ चल दिए।
पर पेंच तो यही आता है कि पहले तो कराची से मुंबई आने के लिए पानी के रास्ते ४ दिन का समय लगता है। क्या इन चार दिन के अंदर खुफिया सूत्रों को एक बार भी ये पता नहीं चला कि समंदर के रास्ते पर कुछ हलचल है। एक जहाज को कब्जे में किया जाता है जिस का नाम कुबेर बताया गया। पुलिस ने जहाज पर मौजूद अमर सिंह टंडेल का रिकॉर्ड पहले से अच्छा नहीं माना है। ये जानकारी भी है कि गैरकानूनी काम के चलते अमर सिंह टंडेल को १ साल की कैद पाक में काटनी पड़ी थी। क्या ऐसे लोगों पर हमेशा नजर नहीं रखनी चाहिए थी। हो सकता है कि अमर सिंह टंडेल भी उनसे मिला हुआ हो और भारत तक लाने का जिम्मा उसका ही हो पर जैसे ही वो भारत की सीमा में पहुंचे उन्होंने टंडेल को मार दिया। समुद्री रास्ते से आगाह करती यूपी पुलिस की वो रिपोर्ट कहां है? कोई पूछे इंटेलिजेंस, रॉ, राज्य सरकार, सीबीआई से। ये तो सच है कि वो सब आए समुद्र के रास्ते से ही थे। जिसे हमारे गृहराज्यमंत्री जायसवाल और महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्यमंत्री समुद्री रास्ते से हुई चूक को अपनी गलती मान चुके हैं। लेकिन जब पता था कि समुद्री रास्ते पर सुरक्षा कमजोर है तो फिर क्या वहां पर ध्यान नहीं देना चाहिए था। अब ध्यान देत क्या होत जब आतंकी कर गए २०० ढेर।

कितने थे आतंकवादी ?

गुमराह करने की कोशिश है कि वो सिर्फ १० आतंकवादी ही थे। ये मैं नहीं मानता कि वो १० थे। माना कि वो समुद्र के रास्ते से आए थे और मान लें कि आए भी १० ही हों पर आतंकवादी १० नहीं थे। कुछ पहले से ही मुंबई में उनका रास्ता देख रहे थे। वहीं दूसरी तरफ, जिस जहाज को उन्होंने अगवा किया था, कुबेर को, उसमें से १५ जैकेट मिले हैं। पुलिस ने ये पहले कहा था कि शायद कुछ लोग बच कर निकल गए हों। पर अब पुलिस ने ये कह दिया है कि सिर्फ १० जैकेट ही मिले हैं क्योंकि वो भी लोगों को दहशत में नहीं रखना चाहती। जब कि पब्लिक ये जानती है कि मुंबई की धरती पर आतंकी हैं। लेकिन सवाल ये ही उठता है कि जब जैकेट १५ मिले तो लोग घट कर १० क्यों रह गए? आनन फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की जाती है और इस बात का खंडन किया जाता है कि कुबेर में सिर्फ १५ जैकेट मिले हैं। हम भी जानते हैं कि यदि ये बात फैल गई कि मुंबई या देश में ५ आतंकी घूम रहे हैं तो अफरातफरी मच जाएगी। विलासराव क्या मनमोहन की गद्दी भी ख़तरे में पड़ जाएगी।
मैं ये कतई नहीं मानता कि मुंबई में ६० घंटे तक आतंक का राज चलाने वाले सिर्फ और सिर्फ १० आतंकवादी थे। मैं अपने कमांडो फोर्स को इतना कमजोर या हमारी पुलिस की तरह निकम्मा नहीं मानता। कमांडो कह रहे थे कि इन आतंकवादियों को पूरे होटल का लेयआउट पता था। किस फ्लोर पर कितने कमरे हैं, हर कमरे के पास क्या है, वो यहां से गोली चलाते जब तक हम घूम कर देखते तो दूसरे पल तीसरे फ्लोर से फायरिंग होने लगती, हम अपनी निगाह वहां गड़ाते तो वो छठे फ्लोर से फायरिंग करने लगते, फिर ५वें से, फिर पहले तक से फायरिंग करने लगते और फिर ग्रेनेड हमला। उन आतंकियों को होटल के चप्पे-चप्पे के बारे में पता था और ये मैं शर्त के साथ कह सकता हूं कि ताज को सिर्फ और सिर्फ ४ आतंकवादियों ने अपने कब्जे में नहीं किया। वो भी दो आतंकी बाद में आए उस से पहले तक वो दो आतंकी मुंबई में कोहराम मचा रहे थे। २७ की रात जब ओबरॉय पर कार्रवाई की जा रही थी तब ये खबर आने लगी कि ताज में सिर्फ एक आतंकी बाकी रह गया है और वो भी घायल हालत में है। सबने सोचा था कि आज ताज को छुड़ा लिया जाएगा लेकिन अगले दिन दोपहर आते-आते तो इतनी गोलीबारी होने लगी कि लग गया कि वहां पर और भी आतंकी हैं। तो और आतंकी जब कि सेना ने पूरे ताज को घेर रखा था तब वो दो कहां से आए? जैसे कि पुलिस ने कहा कि दो आतंकी बाद में आकर पहले वाले आतंकियों से मिले।
इस बीच एक माता-पिता को फोन आता है। फोन के दूसरी तरफ होता है मौत के मुंह में झूल रहा खुद उनका बेटा। जो कि ताज होटल में इंटरनसिप कर रहा था और उसने अपनी आखरी इच्छा पूरी कर ली, मरने से पहले अपने घर फोन कर अपने घर वालों से बात कर ली। लेकिन जो जानकारी दी वो भयंकर थी, माता-पिता दोनों एक पल के लिए तो सन्न रह गए। अंतिम सांसे लेते हुए बेटा बोल रहा था कि
आतंकवादियों का हमला ताज पर हो चुका है और उसे गोली लग गई है, लेकिन गोली आतंकवादियों ने नहीं मारी, मारी तो उस शख्स ने है जो कि ताज में, हमारे साथ पिछले ५-६ महीने से इंटरनसिप (काम) कर रहा था।
तो क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि फिर वो पांचवां कहां गया? चार आतंकियों की लाश तो मिल गई तो क्या ये शख्स भाग गया या मर गया? वैसे पुलिस ने ये बात शुरू में कही थी कि नरीमन हाउस में रहने वाले दो लड़के ताज में काम करते थे फिर इस बात को किस बात के कारण से दबा दिया गया। जानता हूं क्योंकि ताज है भी बहुत बड़ा और बहुत बड़े लोग हैं।
ये बात पुलिस ने बिल्कुल सही कही है कि वो सीधे कराची से आए थे और फिर क़हर बरपाने मुंबई में फैल गए। तो, नरीमन हाउस पर ठीक उसी समय पर पांच-छह लड़कों को देखे जाने की बात थी तो वो कौन थे? क्या है किसी के पास इस का जवाब? नहीं, तो अगली पोस्ट।

जारी है...

आपका अपना
नीतीश कुमार

Tuesday, December 2, 2008

ताज..,नरीमन..,ओबरॉय..और मेरे विचार

कई दिन से सोच रहा था कि मुंबई आतंकवादी हमले पर मेरा लिखना बनता है। कई मेल भी आए अपने ब्लॉगर भाइयों के, कि इस मुद्दे पर अब तक तुम्हारे ब्लॉग की तरफ से कुछ आया ही नहीं। तो सबको बता दूं कि कुछ और प्रोजेक्ट पर लगा हुआ था और फिर जब से ये हमला हुआ है तो तब से अधिकतर वक्त ऑफिस में ही निकल जाता।
२६ को प्रगति मैदान गए थे, शाम तक घूमते-घूमते हालत ऐसी हो गई कि उस दिन फिर कुछ लिख नहीं सका। शाम को सोचा था कि प्रगति मैदान पर लचर सुरक्षा व्यवस्था पर जरूर लिखूंगा लेकिन थकान ही इतनी ज्यादा थी कि कुछ लिख नहीं पाया। साथ ही यदि आपका बॉस कान का कच्चा हो तो और भी दिक्कत होजाती है और रात में उनसे एक बात को लेकर बहस हो गई(मेरे बॉस ये जानते हैं कि मैं लिखता हूं और जब वो इसे पढ़ेंगे तब तो)। मैंने सोचा था कि २७ को इस पर कुछ लिखूंगा लेकिन मुझे क्या पता था कि २६ की रात ऐसी आपदा देश पर आएगी कि देश के साथ-साथ पूरा विश्व उस घटना से हतप्रभ सा रह जाएगा।
२६ की रात को जब तक मैंने देखा तब तक अपुष्ट खबरें आ रही थीं कि शायद ये आतंकवादी हो सकते हैं। पर लगा कि मुंबई में सुरक्षा व्यवस्था तो इतनी कमजोर नहीं रह गई है जब से कि एटीएस का निर्माण हुआ है लेकिन आतंकवादी मुंबई में हैं ये बात कुछ हजम नहीं हो रही थी। सब चैनलों पर ये चल रहा था कि दो गुट में फायरिंग हुई है। लगा कि अंडरवर्ल्ड के दो गुटों में जमकर फायरिंग हो रही है पर ये आतंकवादी नहीं हो सकते दिल नहीं मान रहा था। थोड़ी देर में पता चला कि नहीं ये तो कुछ और ही है। ये महज कुछ क्षण के लिए फायरिंग नहीं हो रही है मुंबई पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है।
सुबह मुझे देर तक सोने की आदत है, घर में सब उठ चुके थे, मैंने उठ कर सबसे पहले अपना चैनल देखा तो आंख फटी की फटी रह गई। ४ साल के बेटे ने पूछा, पापा क्या हुआ? पत्नी भी मेरे बगल में आकर बैठ गईं। हम दोनों को ऐसे बैठे देख, बेटू भी टीवी देखने लगे। फिर सवाल शुरू हुए बेटे के। लेकिन उन सवालों के जवाब मेरे पास क्या किसी के पास भी नहीं हो सकते। पापा ये स्मार्ट अंकल कौन हैं और इनके हैंड में क्या है? क्यों ये ढिसुम ढिसुम कर रहे हैं? अंकल लोग क्यों भाग रहे हैं? फिर खबरें देखते-देखते ही खाना वगैरा चलता रहा और दूसरी तरफ हमारे बेटू बार-बार ये बोलते रहे कि पापा अपना वाला चैनल चला लूं(कार्टून नेटवर्क)। लेकिन मैं मना करता रहा। बेटे ने भी ज्यादा जिद नहीं की। थोड़े समय के बाद मैं ऑफिस के लिए चला गया वहां पता चला कि २६ की रात से ही लाइव बुलेटिन चल रहे हैं। फिर तो काम करने में जुट गए। २८ की सुबह ६ बजे तक मैं ऑफिस में लाइव बुलेटिन करता रहा। रात बारह बजे लग रहा था कि ओबरॉय को छोड़कर दोनों जगहें आतंकियों के कब्जे से छुड़ा ली जाएंगी। पूरी रात नरीमन, ओबरॉय और ताज में फायरिंग होती रही, ग्रेनेड फेंकने का सिलसिला जारी रहा। ऑफिस से घर सोने के लिए फिर उठते ही वापस ऑफिस की राह। और यूं ही सुबह ६ बजे तक लाइव चलता रहता। तीन दिन कुछ यूं ही सिलसिला चलता रहा। पता नहीं चल पा रहा था कि कितने और शहीद होंगे। दुख हुआ कि करकरे, सालास्कर, शहीद होगए, पर क्या वो सच में शहीद हुए। बार-बार खबरें आती रही कि यहां से इतने हताहत हुए और वहां से संख्या बढ़ गई है। थोड़ी देरी की शांति के बाद फिर फायरिंग या ग्रेनेड हमला। इस बीच एक फैसला जरूर अच्छा हुआ कि मीडिया पर लाइव तस्वीरें दिखाने की मनाई हो गई। इस के पीछे कई लोगों ने कई बात बनाई। पर ये फैसला काफी अच्छा था। मैंने अपने सीनियर के सामने ये बात रखी थी कि कमांडो कहां पर हैं ये हमें नहीं दिखाना चाहिए। पर शायद उन्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने कुछ भी जवाब नहीं दिया, साथ ही कहा कि फिर हम दिखाएंगे क्या? और साथ ही कि दोनों होटलों के केबल कनेक्शन काट दिए गए हैं, तो उन्हें पता कैसे चलेगा। मेरा जवाब था कि फोन और सेटेलाइट फोन के जरिए। कहीं पर भी उनके आका देख रहे होंगे जो उनको इस बात की जानकारी दे रहे होंगे। लेकिन थोड़ी देर के बाद ही इस बात को मान लिया गया था। बहुत खुशी हुई जब कमांडो कार्रवाई के दौरान तीनों जगह को आजाद करा लिया गया। पर शायद बहुत देर में हमने अपना पिंड इन आतंकियों से छुड़ाया। गलती किसकी? इस बारे में सिर्फ तथ्यों के साथ अगली पोस्ट में लौटूंगा।
लेकिन ये ५-६ दिन ऐसे थे कि ना चाहते हुए भी लगा कि हमने इस बार बहुत खोया है। कई सवाल मन में उठ रहे हैं। उन सब सवालों के जवाब और उन पर उठते सवालों के साथ अगली पोस्ट में सब लिखूंगा। अभी के लिए इतना ही।


आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, September 30, 2008

कितनी ही कोशिश कर लो, पर दिल्ली झुकने वाली नहीं दहशतगर्दों।

किसने किए दिल्ली के महरौली में ब्लास्ट? क्या उन्होंने जो ये बताना चाहते थे कि चाहे कितनों को पकड़ लो, चाहे कितनों को मार दो, हमारी तादाद कम नहीं होगी? या फिर वो जो कि ये बताना चाहते थे कि उन संगठनों के अलावा हम भी हैं या फिर वो जो कि हमेशा ही ऐसे समय का इंतजार करते हैं कि जब की कोई त्यौहार आने वाला हो तभी इस तरह की दहशत फैला कर के सारी दिल्ली को बैकफुट पर ढकेल दें। चाहे किसी और जगह पर बम को रखने की थ्योरी भी सामने आ रही है पर इस बात से एतराज नहीं किया जा सकता कि दहलनी तो दिल्ली ही थी। इन नौसिखियों आतंकवादियों की वजह से वहां पर नहीं ऱखा जा सका बम और अफरातफरी में बम ऐसे ही फेंक कर वो भाग गए। महरौली में ब्लास्ट का क्या मतलब कोई लगा सकता है? ना तो कोई भी बड़ी जगह, ना तो ऐसा चर्चित मार्केट जहां पर रश इतना ज्यादा रहता हो कि अधिक से अधिक लोग हताहत हों। लेकिन इस बार के ब्लास्ट के बारे में ये ही कहा जा सकता है कि दहशतगर्दों की कोशिश थी दहशत फैलाने की।
कुछ भी कहें पर महरौली ब्लास्ट ने एक १३ साल के मासूम की जान लेली साथ ही एक नौजवान की भी। वो १३ साल का मासूम वो ही बच्चा है जो कि पॉलीथिन गिरने पर उसने उठाया था और उन आतंकवादियों को भईया संबोधित करते हुए कहा था कि आपका सामान गिर गया है। उस बेचारे मासूम को क्या पता था कि वो शब्द उसकी जिंदगी के आखिरी शब्द होंगे। साथ ही जिनको वो भईया बोल रहा है वो देश के दुश्मन हैं। उस नौजवान के पिता जो कि इस ब्लास्ट की भेंट चढ़ गया वो कहते हैं कि आतंकवादियों को सड़क पर गोली मार देनी चाहिए। वो एक मुस्लिम पिता की आवाज़ है। उसमें कोई धर्म नहीं, कोई जात नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ छुपा है तो एक पिता का दर्द।
पुलिस ने भी जल्द ही खून के धब्बे धो डाले। ये बात हज्म नहीं हुई। पुलिस को लगा होगा कि शायद लोग दहशत से उबर जाएं, वरना खून दिखता रहेगा तो याद उतनी ही ज्यादा रहेगी। लेकिन फोरेंसिक टीम को नमूने क्यों नहीं लेने दिए। बहरहाल शिवराज पाटील जी ने अब मुंह खोलने से ही इनकार कर दिया है। अच्छा है वरना रटारटाया बयान फिर सुनने को मिलते। बीजेपी के सीएम इन वेटिंग विजय कुमार मल्होत्रा ने तुरंत आनन-फानन में महरौली का रुख किया। मुझे मेरे कुछ रिपोर्टरों ने बताया कि पुलिस से लेकर आम लोग भी नहीं चाहते कि ऐसे मौके पर तुरंत किसी भी वीवीआईपी का दौरा हो। पुलिस अपना काम छोड़कर उनकी तिमारदारी में लग जाती है। खुद नेताओं को भी सोचना चाहिए। साथ ही नेतागण ये भी सोचें कि क्या बोलना है और क्या नहीं तो बेहतर ही होगा। सभी के पीछे पुलिस नहीं लगाई जा सकती पर ये समय नहीं है कि ऐसी लाइनें बोली जाएं।
ये दहशत फैलाने की कोशिश लगातार जारी है, फरीदाबाद में भी बम जैसी वस्तु मिली। जानबूझकर बरगलाने के लिए फोन किया जाता है।बार-बार कॉल किया जाता है। कभी कहीं से तो कभी कहीं से, कहीं के लिए कॉल। पुलिस भी परेशान हैं। लेकिन ये आतंकवादी नहीं जानते कि ये दिल्ली का दिल है जो ऐसे धड़कना बंद नहीं कर सकता,पर डर तो लगता है ही, वो भी खत्म हो जाएगा। कितनी ही कोशिश कर लो, पर दिल्ली झुकने वाली नहीं दहशतगर्दों।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”