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Sunday, August 30, 2009

सावधान! आप कार खरीदने तो नहीं जा रहे गर जा रहे हैं तो इसे पढ़ते जाइए।

कुछ दिन पहले की बात है लगभग महीने भर पहले की, मेरे एक जाननेवाले के साथ कुछ ऐसा हुआ जिसे मैंने क्या कभी मेरे जाननेवालों में से किसी ने नहीं सुना या देखा था। तभी से मैंने सोच लिया था कि इस बारे में जरूर से लिखूंगा और सबको आगाह करूंगा।

मेरे जाननेवाले एक बिल्डर की कंपनी में काम करते हैं। हर दिन सौ से ज्यादा लोगों से मिलना होता है। काफी दिन से सेंट्रो को चला रहे थे। एक दिन कहीं पर जाना था साथ में उनके बॉस भी थे, बॉस की गाड़ी में कुछ खराबी आगई थी। उस ड्राइव के बाद बॉस ने कहा कि बेहतर है कि दूसरी गाड़ी ले लो। बातों-बातों में बात निकली और तय होगया कि नई गाड़ी ली जाए। उनको पसंद थी होंडा सिटी।

कैसे ना कैसे करके 10 दिन के अंदर ही होंडा सिटी घर की पार्किंग में खड़ी थी। घर वाले काफी खुश थे। दोस्तों को पार्टी भी दी गई वो सब अलग। कहीं पर भी जाना होता तो होंडा सिटी से ही जाते। बेचारी सेंट्रो अपनी बारी आने की राह तकने लगी।

बहरहाल, गाड़ी खरीदने के एक महीने के बाद ही एक हादसा हो गया। एक महीने के बाद गाड़ी सर्विसिंग के लिए जाती है वैसे ही उनकी भी गई। सर्विसिग के दो-तीन दिन के बाद ही एक दिन जब वो ऑफिस जाने के लिए घर से उतरे तो देखा कि गाड़ी पार्किंग में मौजूद नहीं है। काटो तो खून नहीं जैसी स्थिति हो गई। उनके हाथ में गाड़ी की चाबी थी फिर गाड़ी गई तो गई कहां और कैसे?


तुरंत उन्होंने घर जाकर सबको बताया कि गाड़ी नहीं है पार्किंग में। कार साफ करने वाले से पूछा गया। उसने बताया कि गाड़ी आज उसने साफ की थी लगभग सुबह 7.45 के करीब। फिर जिस गार्ड की पार्किंग में ड्यूटी थी उस गार्ड से पूछा गया उसने भी बताया कि गाड़ी को खुद उसने सफाई होने के बाद चैक किया था। तुरंत दोस्तों को कॉल करके बुलाया गया कुछ ऑफिस जा रहे थे या कुछ रास्ते में थे सब वापिस सोसायटी आगए। सभी को बताया गया तो सब हैरान क्योंकि होंडा सिटी का दावा है कि उसकी डुप्लीकेट चाबी कोई बना नहीं सकता और बिना चाबी के वो खुल ही नहीं सकती। तो फिर गाड़ी कहां गई?

शाम तक ये साफ हो गया कि गाड़ी चोरी हो गई है। हम लोगों के प्रेशर के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली। पुलिस की शुरूआती तफ्तीश में एक ऐसी बात सामने आई कि जिसके कारण पैरों तले जमीन खिसक गई। पुलिस ने दूसरी चाबी की डिमांड की, तुरंत पेश की गई। और यहीं था सबसे बड़ा पेंच। दूसरी चाबी यानी की डुप्लीकेट चाबी जो कि आपको गाड़ी खरीदते वक्त दी जाती है वो इस होंडा सिटी की नहीं थी उस चाबी में फर्क था

पुलिस को शक हुआ डीलर के ऊपर और तुरंत उन लोगों को पकड़ा गया जिन्होंने डिलीवरी की थी गाड़ी की। डीलर के दो लोगों को पुलिस ने डिटेन किया। पर कुछ पता नहीं चला और फिर कई दिन तफ्तीश में निकलते चले गए। हम लोग यहां भागदौड़ कर रहे थे।

एक दिन दिल्ली पुलिस के रिनगर थाने से कॉल आया कि मेरे जानने वाले को कि गाड़ी मिल गई है। सभी पुलिस स्टेशन पहुंचे तो एक शख्स को पकड़ रखा था और गाड़ी को असम से रिकवर किया गया। गाड़ी के फर्जी कागजात यहां दिल्ली में ही बन रहे थे, तभी पुलिस ने इस शख्स को धर दबोचा।

उस गाड़ी चोर ने खुलासा किया कि 6 साल के अंदर अब तक 71 गाड़ियां चुरा चुका है। गाड़ियों को नॉर्थ इस्ट, उत्तराखंड जैसी जगहों पर ले जाकर बेच दिया जाता हैं। इस काम में पूरा गिरोह सक्रिय है और अधिकतर उन गाड़ियों को निशाना बनाया जाता हैं जो कि नई होती है क्योंकि उनमें एक भी पैसा नहीं लगता, सिर्फ कागजात बनवाने का खर्च आता है।

पर होंडा सिटी की चाबी कहां से मिली?

तब जो पता चला उसने हमारे होश ही उड़ा दिए। डीलर के यहां निचले तबके पर इनके गिरोह के लोग काम करते हैं। जब गाड़ी की डिलीवरी करनी होती है तब गाड़ी लाने के लिए उन लोगों से ही कहा जाता है। यही वो वक्त होता है जब वो खेल जाते हैं सबसे बड़ा खेल। तब वो एक्सीडेंटल गाड़ियों की चाबी के साथ उस नई नवेली गाड़ी की चाबी को बदल देते हैं और खुशी से लबरेज ग्राहक दोनों चाबियों को चैक करके नहीं देखते। अधिकतर लोग उस चाबी से ही ओपरेट करते हैं जिसमें कि रिमोट इन बिल्ट होता है और दूसरी चाबी को यूं ही बिना चैक किए जेब के हवाले कर देते हैं। जब उनकी गाड़ी सर्विसिंग के लिए आती है तो वहां पर भी गिरोह के लोग होते हैं। अधिकतर गाड़ी घर पर ही डिलीवर की जाती है तो एड्रेस(घर का) का पता चल जाता है। गर डिलीवरी घर पर नहीं होनी है तब गिरोह का दूसरा साथी सर्विस सेंटर के बाहर मौजूद होता है। जैसे ही गाड़ी मालिक गाड़ी लेकर जाता है तो बाहर खड़ा शख्स गाड़ी का पीछा करके घर तक पहुंच जाता है। फिर दो-तीन दिन तक लगातार गाड़ी के मालिक पर नजर रखकर किसी दिन भी हाथ साफ कर दिया जाता है। शान से बिना आवाज़ किए काम हो जाता है और ड्राइवर की सीट पर बैठकर चोर गाड़ी उड़ा ले जाता है।

तो ये है आज के हाईटेक चोरों की हकीकत। तो संभल जाइए कहीं आप अपने हाथ से ही चोरों को अपनी गाड़ी की चाबी तो नहीं दे कर आ रहे। कहीं आप गाड़ी खरीदने जा रहे हों तो आप तो वो गलती नहीं कर रहे। जब भी कोई भी चाबी लें तो सभी चाबियों को चैक जरूर करें और संतुष्ट होने के बाद ही वहां से हटें। तब थोड़ा वक्त गर आप लगा देंगे तो बाद में बहुत सा वक्त और आपकी गाड़ी बच जाएगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, August 7, 2009

ये इबादत नहीं है...शक्ति प्रदर्शन का एक जरिया है।

कल रात 11 बजे जब मैं ऑफिस में था तब एक खबर आई कि दिल्ली में दो आतंकवादियों को धर दबोचा गया है। पहली नजर में लगा कि 15 अगस्त से पहले तो गिरफ्तारी लाजमी है ही और वैसे भी खुफिया तंत्र ने दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस से पहले अलर्ट जारी कर रखा है। फिर ख़बर में अपडेट हुआ कि दोनों को दरियागंज से पकड़ा गया है और दोनों आतंकी दिल्ली में अपने मोड्यूल से मिलने आए थे। दोनों आतंकी हिजबुल के थे और जम्मू-कश्मीर के रहने वाले और पाक में ट्रैनिंग लेकर के दिल्ली आए थे। दोनों के पास से एक-47, कारतूस, हैंड ग्रेनेड मिले थे यानी देखा जाए तो दोनों दिल्ली के किसी भी हिस्से में कोहराम मचा सकते थे और साथ ही मुंबई 26/11 जैसी वारदात को अंजाम दे सकते थे।

इस खबर के आने के लगभग 10-15 मिनट के बाद ऑफिस से गए हुए एक साथी का फोन आया कि आईटीओ पर पूरा जाम लगा हुआ है। एक बाइक पर ४-४ लड़के, किसी भी टू व्हीलर पर ३ से कम तो कतई नहीं निकले हुए हैं। मुझे पता था कि वो सब कहां जा रहे हैं मैंने तुरंत उनको बताया कि आज शब-ए-रात है और सारे मुसलमान इबादत के लिए जामा मस्जिद जाते हैं साथ ही इनकी तादाद कुछ ज्यादा ही होती है तो बेहतर ये कि पंगा मत लेना क्योंकि भीड़ पागल होती है और भीड़ के लिए कोई कानून नहीं होता है।

मेरे साथी ने जवाब दिया कि ट्रैफिक, जाम, इबादत और हुड़दंग में अंतर करना उन्हें आता है। ये हुड़दंग है, ये शक्ति प्रदर्शन है जिसे चाह रहे हैं ये लोग उल्टा-सीधा कहकर आगे निकल जा रहे हैं। इनकी तादाद भी इतनी ज्यादा है कि कोई पंगा क्या कुछ बोल नहीं सकता। पुलिस सिर्फ देख रही है और कुछ कर नहीं पा रही है उसमें भी सोने पर सुहागा दो हवलदार खड़े होकर ट्रैफिक संभाल रहे है बाकी सब बैठे हुए हैं। मैं भी सहमत था कि सच कायदे कानून को तो मानना चाहिए। खासकर टू व्हीलर पर ४-४ लोग बैठें हुए बिना हेल्मेट के हजारों लोग घूम रहे हैं क्यों। जब ऑफिस खत्म करके मैं भी गया तो ये ही हाल था हजारों की तादाद में आईटीओ पर कानून की धज्जियां पुलिस हेडक्वाटर के सामने ही उड़ाई जारही थीं। हमारे साथ आ रहे एक साथी की कार में भी कुछ लड़के बाइक से उतरकर जबर्दस्ती घुसने की कोशिश कर रहे थे। ये तो शुक्र है कि मौके पर पुलिस पहुंच गई वर्ना कुछ और ही होता।

मैंने तुरंत काउंटर किया कि याद है, कुछ दिन पहले कावड़ियों के कारण भी इसी तरह हम लोग त्रस्त थे, कितनी परेशानी होती थी। वो भी सहमत था मेरी बात से। मैं सोच में पड़ गया कि क्यों हमें जरूरत पड़ती है अपने धर्म को दिखाने के लिए शक्ति प्रदर्शन की। क्यों जरूरत पड़ती है हमें लाउडस्पीकर की और उस पर चीख-चीख कर लोगों को अपने अल्लाह का नाम दूसरों को जबर्दस्ती सुनाने की। क्यों हमें जरूरत पड़ती है लगातार, बार-बार घंटी बजाने की। लोग कहते हैं कि भगवान चीखने से नहीं साधना से मिलता है। तो क्या हमारा धर्म के नाम पर ये शक्ति प्रदर्शन ठीक है?

आपका अपना
नीतीश राज

(दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस के जज्बे को सलाम करना चाहूंगा कि दरियागंज जैसे इलाके से इतनी सफाई से दो आतंकी पकड़ लेना और वो भी इबादत की रात में एक कामयाबी ही कहूंगा। वर्ना यदि थोड़ी सी भी चूक हो गई होती तो बाटला जैसा इल्जाम फिर लग सकता था।)

Sunday, June 14, 2009

रेप करोगे तो ऐसे ही पिटोगे, भीड़ ने जमकर धुना बलात्कारियों को, न्याय का नया रूप।

दिल खुश होगया, मज़ा आगया। आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। बताता हूं, जैसे ही मेरी नजर उस फुटेज पर पड़ी तो लगा कि ये क्या हो रहा है। भीड़ कैसे पागलों की तरह उस लड़के को पीट रही है। क्या कारण है कि पीट रही है क्या किया है उन लड़कों ने। ये पुलिसवाला कुछ कर क्यों नहीं पा रहा है, सिर्फ देख रहा है। अरे इस पुलिसवाले ने तो बंदूक भी निकाल रखी है पर लोगों को काबू क्यों नहीं कर पा रहा है। आखिर क्या कारण है।

गुस्सा भी क्या चीज है, कभी इतना गलत काम करवा जाता है कि जिंदगी भर खुद को उस घृणत कृत्य के लिए आप खुद को माफ नहीं कर सकते। पर कभी-कभी सही काम भी करवा जाता है ये गुस्सा।
लोग पहुंचे गए मुंह पर कपड़ा बांधकर और जैसे ही वो तीनों सामने पड़े तो लोग बेकाबू हो गए और फिर शुरू हुआ उन तीनों को पीटने का दौर

सूरत में हुई एक शर्मनाक हरकत जिसने बिगाड़ दी शहर की सूरत। तीन मनचले सुबह के समय पर निकले तफरी के लिए। उसमें से दो पुलिसवालों की औलाद। ट्यूशन पढ़ने गई नाबालिग लड़की और उसके दोस्त को गाड़ी में बहला फुसलाकर बैठा लिया। वो लड़की नाबालिग, सिर्फ 17 साल की। उन तीनों ने दो घंटे तक उस लड़की को नोचा, काटा, खाया, नहीं सुनी उसकी आवाज़, नहीं सुनी उसकी चीख और दो घंटे तक कार में करते रहे बलात्कार। लड़की के जिस्म को निचोड़ने के बाद फेंक कर चल दिए। लेकिन उस से पहले उन रईसजादों ने मोबाइल से उस लड़की की अश्लील वीडियो भी खींच ली। लड़की ने पुलिस से शिकायत की और मैडिकल रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि भी हो गई।

पुलिस महकमा हरकत में आया और तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया। इस बीच सूरत के पुलिस कमिश्नर का तबादला भी कर दिया गया और मामले की सुनवाई फास्ट ट्रेक कोर्ट में करवाने का फैसला भी हो गया। पुलिस उन तीनों आरोपियों को मेडिकल जांच के लिए लेगई। बस फिर क्या था लोग खासे नाराज़ थे और उन्हें लग रहा था कि इन तीनों को बचाया जाएगा क्योंकि ये पुलिसवालों के बच्चे हैं। इसलिए लोग पहुंचे गए मुंह पर कपड़ा बांधकर और जैसे ही वो तीनों सामने पड़े तो लोग बेकाबू हो गए और फिर शुरू हुआ उन तीनों को पीटने का दौर। तीनों पिटाई से बाप-बाप करते रहे और पुलिस लोगों को बंदूक दिखाकर रोकने की कोशिश। पर लोग कहां रुकने वाले थे औरतों ने भी जमकर लात मारी। ना तो पुलिस का डंडा काम आया ना ही बंदूक लोगों ने तबियत से की धुनाई। अस्पताल में जिसे भी पता चला उसने ही अपने हाथ-पैर सब साफ कर लिए। लोगों ने तीनों को घेर करके मारा पुलिस यहां बचाती तो वहां से पड़ता और वहां से बचाती तो यहां से पड़ता। जब लोगों को तसल्ली होगई तब जाकर पुलिसवाले हालात को काबू में कर सके और तीनों को ले जा सके।

पहले तो बलात्कार, फिर नाबालिग से रेप, घंटों रेप, सड़क पर फैलाई दहशत, कार में किया रेप, फिर खींचा वीडियो इतना सब काफी था उन लड़कों को पीटने का कारण साथ ही पुलिसवालों की औलाद तो धुनाई तो तबियत से होनी ही थी। ऐसे ही न्याय से इस तरह के गंदे काम करने वालों से छुटकारा मिल सकता है आम जनता को। इसे ही कहते हैं भीड़ का कानून पर ये तब तक ही ठीक है जब तक की ये सही काम के लिए हो वर्ना ये ही ताकत गुंडागर्दी को भी जन्म देती है।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, October 31, 2008

राज ठाकरे, तुम्हारे कारण ही तो पैदा हुए हैं राहुल राज जैसे हमलावर

मुंबई में जब सभी की निगाहें अटकी पड़ी थी कि शुक्रवार के काले दिन के बाद बाजार किस करवट बैठेगा तब मुंबई की एक बेस्ट बस में 23 साल का एक युवक चढ़ा और चंद मिनटों में सारी बस पर हावी हो गया। क्या सोच कर आया था वो युवक राहुल राज, क्या चाहता था वो, किसी को तब तक पता नहीं चल पा रहा था। आवाज और भाषा से लग रहा था कि वो मराठी नहीं है, और उसके हाथ में हथियार लहरा रहा था। बेस्ट की डबल डेकर बस में वो बार-बार चिल्ला रहा था कि उसे राज ठाकरे से मिलना है। कोई उस की बात पुलिस और मीडिया से कराए। बार-बार सिर्फ एक ही बात कि उसे राज ठाकरे से मिलवाओ, फोन पर पुलिस और मीडिया से बात कराओ। बताया जाता है वो राज ठाकरे के खिलाफ नारे भी लगा रहा था।

राहुल राज एक अनाड़ी हमलावर

राहुल राज ने सभी को ये बताया कि वो किसी को कोईं भी हानि नहीं पहुंचाएगा। कंडेक्टर को उसने पकड़ा कि मोबाइल से पुलिस और राज ठाकरे से बात कराओ। युवक बेचैनी में कभी इधर तो कभी उधर जा रहा था। बस के सारे यात्री डर और सहम चुके थे। फिर बाद में उसने अधिकतर यात्रियों को बस से जाने दिया। इस बीच कंडेक्टर ने पुलिस को सूचित किया। करीब 50 मीटर दूर पर ही था थाना, पुलिस तुरंत मौके पर पहुंच गई। पुलिस के सामने उसने 10 और 50 के नोट पर लिख कर संदेश दिया कि वो राज ठाकरे से मिलना चाहता है। कई जगह ये बात भी सामने आई कि उस पर लिखा था कि वो पटना से आया है राज ठाकरे को मारने लेकिन इस की असलियत क्या है किसी को पता नहीं चल पाई है, पर हां, वो राज ठाकरे से मिलना जरूर चाहता था। पुलिस अपने काम पर लग चुकी थी। पुलिस ने पूरी बस को घेर लिया और जब राहुल बस के अगले हिस्से में जाता तो पुलिस पीछे से चढ़ने की कोशिश करती और जब वो पीछे आता तो आगे से चढ़ती। राहुल राज दूसरी स्टोरी पर चला गया। इस बीच उसने पुलिस को डराने के लिए और ये दिखाने के लिए की उसके पास असली हथियार है उसने जमीन पर एक फायर किया। जब तक राहुल बस के ऊपरी हिस्से तक पहुंचता तब तक पुलिस ने हवा में दो फायर किए। जवाब में राहुल ने भी दो फायर हवा में किए। पुलिस बस के अंदर घुस चुकी थी लेकिन तभी हड़बड़ाए राहुल से एक गोली चली जो कि एक यात्री के पैर में लग गई। पुलिस ने फायर खोल दिया। राहुल को तीन गोली लगी और पुलिस का ये अभियान खत्म हुआ। बेस्ट की एक बस को अगवा करने की कोशिश को नाकाम कर दिया गया।

पुलिस की अपनी थ्यौरी

पूरे मामले में महाराष्ट्र पुलिस की पीठ ठोंकी गई और साथ ही पूरे मामले पर सियासत भी शुरू होगई। पुलिस ने अपने काम को सराहया और अपने कदम को सही भी ठहराया। पुलिस का कहना था कि यदि किसी भी कारण से उस शख्स की बंदूक से निकली गोली किसी भी यात्री को मार डालती तो पूरी दुनिया एक सुर में ये इल्जाम लगाती कि पुलिस को पहले ही उस शख्स को गोली मार देनी चाहिए थी। तो यदि पुलिस कुछ सही भी करती है तो भी उस पर इल्जाम लग जाता है। वैसे, पुलिस को आतंकवाद से लड़ने के लिए महाराष्ट्र में ये हिदायत है कि यदि कोई भी बंदुक से जवाब दे तो पुलिस भी फिर गोली का जवाब गोली से दे सकती है, और ये ही काम पुलिस ने भी किया। किसी के चेहरे पर ये नहीं लिखा है कि वो आतंकवादी नहीं है।

दो मंत्रियों की सोच में अंतर

वहीं महाराष्ट्र के गृहमंत्री का मानना है कि पुलिस ने जो भी किया वो ठीक है। जो भी नियम और कानून तोड़ेगा उसको हम ऐसे ही सबक सिखाएंगे। पर राज ठाकरे और एमएनएस के मामले में शायद वो ये सब भूल जाते हैं। राज ठाकरे ने पाबंदी के बावजूद मीडिया में अपनी सुरक्षा को कम किए जाने पर इंटरव्यू दिया है। वहीं, इस घटना के बाद सरकार ने राज ठाकरे को जेड श्रेणी की सिक्योरिटी वापस दे दी है। पर क्या महाराष्ट्र के ये बड़बोले गृहमंत्री और उप मुख्यमंत्री राज ठाकरे की जमानत रद्द करवाएंगे, या फिर कुछ भी कार्रवाई होगी। शायद नहीं। वहीं दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री का कहना है कि यदि पुलिस चाहती तो राहुल राज को पकड़ा जा सकता था। लेकिन ये मुंबई पुलिस की नाकामी है कि वो ऐसा करने में नाकाम रही और राहुल को मार गिराया। ये बातें दो मंत्रियों ने कहीं हैं और दोनों ही ऊंचे पद पर आसीन हैं। तो क्या कारण है कि दो मंत्रियों की राय एक नहीं हो पा रही है?

एनकाउंटर पर सियासत

राहुल राज के एनकाउंटर पर राजनीति भी गरमा गई, सब सियासत चमकाने लगे। एक के बाद एक दल ने राज्य सरकार पर साधा निशाना। सभी एक सुर में राज ठाकरे और उसकी पार्टी पर पाबंदी लगाने की मांग करने लगे। राज्य सरकार पर भी इसी बहाने निशाना साधा गया। अब तो शिवसेना को भी लगने लगा कि आखिर मुंबई में ये क्या हो रहा है। इस प्रकरण के बाद से शिवसेना बैकफुट पर दिखी। दो दिन तक राहुल राज के घर पर आने जाने वाले नेताओं का जमघट लगा रहा। कभी सीबीआई से जांच की मांग की जाती तो कोई जांच आयोग गठित करने की मांग करता। राहुल राज के घर के बाहर दिन भर लोगों को तांता लगा रहा, वहां नारेबाजी चलती रही। इसी बहाने अमर सिंह अमिताभ और राज ठाकरे का मसला फिर से उछालने से बाज नहीं आए। अमर सिंह ने लालू यादव और पासवान पर निशाना साधा। कुछ नेताओं ने राष्ट्रपति शासन की मांग भी कर दी महाराष्ट्र में।

एनकाउंटर या हत्या?

राहुल राज का एनकाउंटर हुआ है या हत्या? इस बारे में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। गर पुलिस चाहती तो उस नौसिखिए हमलावर को थोड़ी देर में ही पकड़ भी सकती थी। लेकिन शायद पुलिस ने ये कोशिश नहीं की। 15 मिनट के इस ड्रामे में क्या पुलिस को कोई भी मौका नहीं मिला कि वो राहुल के पिस्तौल वाले हाथ पर निशाना लगा सकें। क्या पुलिस उस के पैरों पर गोली नहीं चला सकती थी। क्या जरूरत पड़ी थी कि उसके शरीर पर एक साथ तीन गोलियां मारने की, क्या एक गोली से काम नहीं चल सकता था। उसके दोनों हाथ पर गोली मारी जा सकती थी। या पुलिस बिहारी या उत्तर भारतियों से इतना ज्यादा कुपित होगई है कि इस एपिसोड को खत्म करने के लिए उसने एक नौजवान की गोली मारकर हत्या कर दी। क्यों नहीं ये ही रणनीति ये आतंकवादी या किसी डॉन के साथ करते।

चिता जली पर सवाल बाकी

इस से दुखद पहलु क्या हो सकता है कि एक जवान बेटे का शव बाप के कंधे पर शमशान जा रहा हो। जिस दिन पूरे देश में दीए जलाकर रोशनी की जा रही थी उस दिन राहुल की चिता जली और उस बाप के ऊपर क्या बीती होगी जब दीवाली के रोज उसने अपने जवान बेटे की चिता को मुखाग्नि दी होगी। चिता तो जल गई है पर सवाल अभी बाकी हैं। मुंह बाए खड़े हैं कुछ सवाल जिनके जवाब कुछ तो राहुल की चिता के साथ जल गए और कुछ उस चिता की चिंगारियों से उठ खड़े हुए हैं।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”