"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
Saturday, November 15, 2008
क्या केक ऐसे काटा जाता है, नहीं, राज ठाकरे आपने तो केक चीरा है
ठाकरे के दिल में उत्तर भारतीयों के खिलाफ नफरत।
जन्मदिन का वीडियो या फिर नफरत का
वीडियो में दिख रहा है कि एक ऐसा केक काटा जा रहा है जिसपर लिखा था-भैया। भैया, इसका मतलब किसी को समझाने कि जरूरत नहीं है। भैया का मतलब होता है बिहार- यूपी के लोग।
सबसे ज्यादा एतराज केक को काटने में है। जिस तरह से केक को काटा गया उसे शायद हम में से कोई भी ये नहीं कह सकता कि वो केक काटा गया। साफ दिखता है कि केक काटा नहीं गया उसे चीरा गया। सीधे-सीधे राज ठाकरे ने केक को पहले बाएं से दाएं और
फिर दाएं से बाएं चीर दिया जिसपर लिखा था भैया। 40 सेकेंड के वीडियो में ये सब दिखाया गया है।
केक पर वैसे तो नाम ही लिखा जाता है उस शख्स का जिसका कि जन्मदिन होता है। उस केक पर लिखा था भैया, लेकिन क्या राज ठाकरे को भैया के नाम से जाना जाता है या उन्हें कोई राज ठाकरे के नाम से पुकारता है जिसे कि एमएनएस के लोग गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। तो ये बात तो यहीं पर खारिज हो जाती है कि राज ठाकरे को भैया के नाम का केक गिफ्ट किया गया।
राज की बहन या फिर कार्यकर्ता
फिर राज ठाकरे को कोई भैया कहकर बहन पुकारती हो और उसने ये तोहफे के तौर पर भेंट किया हो। बात तुरंत कहते के साथ ही सामने आई। एमएनएस की महिला शाखा की सचिव रीता गुप्ता राज ठाकरे की बहन के रूप में सामने आई। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि ये तो बड़ा ही पर्सनल वीडियो था इसे कैसे कोई सामने ला सकता है। साथ ही वो राज ठाकरे को भैया कहकर पुकारती हैं। तो उन्होंने गिफ्ट किया था अपनी ब्रेकरी में बना केक राज के जन्मदिन पर।
चलिए ये बात तो साफ हो गई कि केक बहन ने दिया था। पर केक काटने का तरीका सही था। रीता गुप्ता जी बार-बार इस सवाल को घुमा जाती। क्योंकि कोई जंगली भी इस तरीके से केक को नहीं काटता। मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति सिर्फ इस बात से ही है।
वीडियो पर सियासत
राज ठाकरे के तहलका मचाने वाले इस वीडियो को जारी करने वाले शख्स है किशोर समरीते। किशोर समरीते मध्यप्रदेश के लांजी क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के विधायक है। सवाल ये है समरीते के पास ये वीडियो कहां से आया.. समरीते इसका खुलासा नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि उनके एक दोस्त ने उन्हें ये वीडियो दिया है। सवाल ये भी है छह महीने पुराने इस वीडियो को अचानक प्रेस को क्यों दिया। माना जा रहा है कि समरीते अपनी सियासत चमकाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे है
राज ठाकरे के इस केक मामले पर सियासत भी गरमा गई है। जहां सभी पार्टी इस की निंदा कर रही हैं। वहीं राज ठाकरे को लालू प्रसाद यादव ने फिर से मेंटल करार दे दिया है।
सही मायने में तो राज ठाकरे ने इस केक को केक माना ही नहीं है। ये है राज ठाकरे की नफरत उत्तर भारतीयों के लिए। लेकिन राज ठाकरे का अपने जन्मदिन को मनाने का तरीका बड़ा ही अनोखा और विचित्र लगा। तो राज ठाकरे इस तरह मनाते हैं अपना जन्मदिन और फैलाते हैं नफरत की आग।
आपका अपना
नीतीश राज
Friday, October 31, 2008
राज ठाकरे, तुम्हारे कारण ही तो पैदा हुए हैं राहुल राज जैसे हमलावर
राहुल राज एक अनाड़ी हमलावर
राहुल राज ने सभी को ये बताया कि वो किसी को कोईं भी हानि नहीं पहुंचाएगा। कंडेक्टर को उसने पकड़ा कि मोबाइल से पुलिस और राज ठाकरे से बात कराओ। युवक बेचैनी में कभी इधर तो कभी उधर जा रहा था। बस के सारे यात्री डर और सहम चुके थे। फिर बाद में उसने अधिकतर यात्रियों को बस से जाने दिया। इस बीच कंडेक्टर ने पुलिस को सूचित किया। करीब 50 मीटर दूर पर ही था थाना, पुलिस तुरंत मौके पर पहुंच गई। पुलिस के सामने उसने 10 और 50 के नोट पर लिख कर संदेश दिया कि वो राज ठाकरे से मिलना चाहता है। कई जगह ये बात भी सामने आई कि उस पर लिखा था कि वो पटना से आया है राज ठाकरे को मारने लेकिन इस की असलियत क्या है किसी को पता नहीं चल पाई है, पर हां, वो राज ठाकरे से मिलना जरूर चाहता था। पुलिस अपने काम पर लग चुकी थी। पुलिस ने पूरी बस को घेर लिया और जब राहुल बस के अगले हिस्से में जाता तो पुलिस पीछे से चढ़ने की कोशिश करती और जब वो पीछे आता तो आगे से चढ़ती। राहुल राज दूसरी स्टोरी पर चला गया। इस बीच उसने पुलिस को डराने के लिए और ये दिखाने के लिए की उसके पास असली हथियार है उसने जमीन पर एक फायर किया। जब तक राहुल बस के ऊपरी हिस्से तक पहुंचता तब तक पुलिस ने हवा में दो फायर किए। जवाब में राहुल ने भी दो फायर हवा में किए। पुलिस बस के अंदर घुस चुकी थी लेकिन तभी हड़बड़ाए राहुल से एक गोली चली जो कि एक यात्री के पैर में लग गई। पुलिस ने फायर खोल दिया। राहुल को तीन गोली लगी और पुलिस का ये अभियान खत्म हुआ। बेस्ट की एक बस को अगवा करने की कोशिश को नाकाम कर दिया गया।
पुलिस की अपनी थ्यौरी
पूरे मामले में महाराष्ट्र पुलिस की पीठ ठोंकी गई और साथ ही पूरे मामले पर सियासत भी शुरू होगई। पुलिस ने अपने काम को सराहया और अपने कदम को सही भी ठहराया। पुलिस का कहना था कि यदि किसी भी कारण से उस शख्स की बंदूक से निकली गोली किसी भी यात्री को मार डालती तो पूरी दुनिया एक सुर में ये इल्जाम लगाती कि पुलिस को पहले ही उस शख्स को गोली मार देनी चाहिए थी। तो यदि पुलिस कुछ सही भी करती है तो भी उस पर इल्जाम लग जाता है। वैसे, पुलिस को आतंकवाद से लड़ने के लिए महाराष्ट्र में ये हिदायत है कि यदि कोई भी बंदुक से जवाब दे तो पुलिस भी फिर गोली का जवाब गोली से दे सकती है, और ये ही काम पुलिस ने भी किया। किसी के चेहरे पर ये नहीं लिखा है कि वो आतंकवादी नहीं है।
दो मंत्रियों की सोच में अंतर
वहीं महाराष्ट्र के गृहमंत्री का मानना है कि पुलिस ने जो भी किया वो ठीक है। जो भी नियम और कानून तोड़ेगा उसको हम ऐसे ही सबक सिखाएंगे। पर राज ठाकरे और एमएनएस के मामले में शायद वो ये सब भूल जाते हैं। राज ठाकरे ने पाबंदी के बावजूद मीडिया में अपनी सुरक्षा को कम किए जाने पर इंटरव्यू दिया है। वहीं, इस घटना के बाद सरकार ने राज ठाकरे को जेड श्रेणी की सिक्योरिटी वापस दे दी है। पर क्या महाराष्ट्र के ये बड़बोले गृहमंत्री और उप मुख्यमंत्री राज ठाकरे की जमानत रद्द करवाएंगे, या फिर कुछ भी कार्रवाई होगी। शायद नहीं। वहीं दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री का कहना है कि यदि पुलिस चाहती तो राहुल राज को पकड़ा जा सकता था। लेकिन ये मुंबई पुलिस की नाकामी है कि वो ऐसा करने में नाकाम रही और राहुल को मार गिराया। ये बातें दो मंत्रियों ने कहीं हैं और दोनों ही ऊंचे पद पर आसीन हैं। तो क्या कारण है कि दो मंत्रियों की राय एक नहीं हो पा रही है?
एनकाउंटर पर सियासत
राहुल राज के एनकाउंटर पर राजनीति भी गरमा गई, सब सियासत चमकाने लगे। एक के बाद एक दल ने राज्य सरकार पर साधा निशाना। सभी एक सुर में राज ठाकरे और उसकी पार्टी पर पाबंदी लगाने की मांग करने लगे। राज्य सरकार पर भी इसी बहाने निशाना साधा गया। अब तो शिवसेना को भी लगने लगा कि आखिर मुंबई में ये क्या हो रहा है। इस प्रकरण के बाद से शिवसेना बैकफुट पर दिखी। दो दिन तक राहुल राज के घर पर आने जाने वाले नेताओं का जमघट लगा रहा। कभी सीबीआई से जांच की मांग की जाती तो कोई जांच आयोग गठित करने की मांग करता। राहुल राज के घर के बाहर दिन भर लोगों को तांता लगा रहा, वहां नारेबाजी चलती रही। इसी बहाने अमर सिंह अमिताभ और राज ठाकरे का मसला फिर से उछालने से बाज नहीं आए। अमर सिंह ने लालू यादव और पासवान पर निशाना साधा। कुछ नेताओं ने राष्ट्रपति शासन की मांग भी कर दी महाराष्ट्र में।
एनकाउंटर या हत्या?
राहुल राज का एनकाउंटर हुआ है या हत्या? इस बारे में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। गर पुलिस चाहती तो उस नौसिखिए हमलावर को थोड़ी देर में ही पकड़ भी सकती थी। लेकिन शायद पुलिस ने ये कोशिश नहीं की। 15 मिनट के इस ड्रामे में क्या पुलिस को कोई भी मौका नहीं मिला कि वो राहुल के पिस्तौल वाले हाथ पर निशाना लगा सकें। क्या पुलिस उस के पैरों पर गोली नहीं चला सकती थी। क्या जरूरत पड़ी थी कि उसके शरीर पर एक साथ तीन गोलियां मारने की, क्या एक गोली से काम नहीं चल सकता था। उसके दोनों हाथ पर गोली मारी जा सकती थी। या पुलिस बिहारी या उत्तर भारतियों से इतना ज्यादा कुपित होगई है कि इस एपिसोड को खत्म करने के लिए उसने एक नौजवान की गोली मारकर हत्या कर दी। क्यों नहीं ये ही रणनीति ये आतंकवादी या किसी डॉन के साथ करते।
चिता जली पर सवाल बाकी
इस से दुखद पहलु क्या हो सकता है कि एक जवान बेटे का शव बाप के कंधे पर शमशान जा रहा हो। जिस दिन पूरे देश में दीए जलाकर रोशनी की जा रही थी उस दिन राहुल की चिता जली और उस बाप के ऊपर क्या बीती होगी जब दीवाली के रोज उसने अपने जवान बेटे की चिता को मुखाग्नि दी होगी। चिता तो जल गई है पर सवाल अभी बाकी हैं। मुंह बाए खड़े हैं कुछ सवाल जिनके जवाब कुछ तो राहुल की चिता के साथ जल गए और कुछ उस चिता की चिंगारियों से उठ खड़े हुए हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
Thursday, October 23, 2008
राज्य सरकार ने राज ठाकरे को पिटने से बचाने के लिए खेला ये खेल
ये कोई पहेली नहीं है ये है कल्याण कोर्ट की कहानी। राज ठाकरे के खिलाफ सरकार ने जो प्लान बनाया था वो काफी अच्छा था। पर सरकार भी ये जानती थी कि यदि इस शख्स को लोगों तक पहुंचने दिया तो ये राज्य सरकार के लिए ठीक नहीं होगा। तो खेल खेला गया। एक ऐसा खेल जिससे दिखाने के लिए काम भी हो जाए और राज ठाकरे भी पिटने से भी बच जाए।
सरकार को राज ठाकरे ने रत्नागिरी में चैलेंज किया था कि अगर हिम्मत है तो पकड़ के दिखाओ और फिर देखना कि महाराष्ट्र कैसे जलता है। राज्य सरकार काफी दिनों से ये धमकियां सुन रही थी। और इस बार तो दबाव भी केंद्र से बन गया था(सीएम देशमुख ने कहा कि राज्य सरकार पर कोई दबाव नहीं था, वहीं शिवराज पाटील ने कहा है कि गृहमंत्रालय ने चिट्ठी लिखी थी और फोन पर खुद उन्होंने बात की थी। सच्चा कौन?)।
तभी राज्य सरकार को पता चला, राज ठाकरे के खिलाफ जारी हो चुका है एक गैर जमानती वारंट। राज्य सरकार तुरंत हरकत में आगई। यदि जमशेदपुर पुलिस राज ठाकरे को अपने साथ ले गई तो फिर राज्य में राजनीति कौन करेगा। कौन मारेगा-पीटेगा उत्तर भारतीयों को, जिनकी तादाद मुंबई-ठाणे में ज्यादा हैं। पता नहीं कहीं जमशेदपुर ले जाते हुए कोई भी सुरक्षा में चूक होगई और राज ठाकरे को बिहारियों के साथ झारखंडियों ने मिलकर पीट दिया या फिर कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर अलगाव को नहीं रोका जा सकेगा। राज्य सरकार ने घोड़े दौड़ाए और ३००-३५० किलोमीटर दूर बैठे राज ठाकरे को रात के २.३० बजे के करीब गिरफ्तार कर लिया गया।
खबर फैली हर जगह उत्पात होना ही था और हुआ भी। लेकिन इस बार सिर्फ महाराष्ट्र में ही उत्पात नहीं हुआ। इस चिंगारी की आग पटना तक गई। वहां पर स्टेशन पर तोड़फोड़ की गई। बहरहाल ये बात बाद में।
कोर्ट में राज की पेशी होती है। सुरक्षा कारणों से देरी होती है और फिर बांद्रा कोर्ट से राज को जमानत मिल जाती है। पर राज्य सरकार ने पूरा इंतजाम कर रखा था। अब बारी थी कल्याण कोर्ट की। कल्याण कोर्ट में एक दूसरे मामले में राज को पेश किया जाना था पर देरी की वजह से एक पूरी रात मानपाड़ा थाने की हवालात में काटनी पड़ती है राज ठाकरे को। हर पुलिसकर्मी जेल में बैठे उस ढ़ोंगी के वक्तव्य सुनता रहता है और जी हुजूरी करता रहता है। रात कट जाती है फिर सुबह पेश किया जाता है पर अदालत में खड़ी उस देवी के आंखें में पट्टी है साथ ही वो पट्टी कान के ऊपर से निकलती है इसलिए ना वो किसी का दर्द सुन सकती है और ना देख सकती है। अदालत ने अपना काम किया इतना तेज चाबुक मारा, कि दीवाली भी जेल में काटने का इंतजाम कर दिया, ५ नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया। फिर शरीर पर लगने से पहले ही पकड़ भी लिया, कोर्ट ने सिर्फ १५००० के निजी मुचलके पर जमानत भी दे दी। साथ ही देखा कि रेलवे पुलिस खड़ी है राज ठाकरे को पकड़ कर लेजाने के लिए और इतनी देर हो चुकी है कि वकील चाहे कुछ भी करें तब भी रात तो हवालात में काटनी ही होगी। और राज ठाकरे कमजोर भी दिख रहे हैं। तुरंत २४ तक हर मामले में अदालत ने राज ठाकरे को अंतरिम राहत दे दी। यानि की अब जब भी कार्रवाई होगी वो होगी २५ को याने कि जमशेदपुर कोर्ट से जारी वारंट का इलाज मिल गया। और शनिवार को कोर्ट में इस याचिका के खिलाफ पहले ही अर्जी डाली जा चुकी है। तो राज ठाकरे राज्य सरकार की राजनीति की वजह से राजशाही ठाठबाट पाते रहेंगे।
राजनीति इसे ही कहते हैं मेरे दोस्त। राज्य सरकार ने अपना उल्लू भी सीधा कर दिया और साथ ही राज की मुश्किल भी हल कर दी। वर्ना यदि राज ठाकरे को महाराष्ट्र छोड़कर जाना पड़ता तो क्या होता राज ठाकरे का इसका अनुमान सब लगा सकते हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
Tuesday, October 21, 2008
सरकार ने दिखाई हिम्मत, राज ठाकरे गिरफ्तार
वैसे यहां पर सरकार ने थोड़ी हिम्मत तो दिखा ही दी। माना तो ये भी जा रहा है कि जमशेदपुर कोर्ट के गैरजमानती वारंट के बाद ही मुंबई सरकार जागी है। अब इसके पीछे क्या कारण है कहा नहीं जासकता कहीं राज ठाकरे को रांची की अदालत में जाने से रोकने के कारण ये गिरफ्तारी तो नहीं की गई। बहरहाल,राज ठाकरे ने रत्नागिरी में सरकार को चुनौती दी थी कि है हिम्मत तो कर लो गिरफ्तार, और फिर देखना महाराष्ट्र कैसे जलता है। सरकार ने ये हौसला तो दिखा दिया और राज ठाकरे को गिरफ्तार कर भी लिया। साथ ही गिरफ्तारी से पहले 1100 समर्थकों को भी पकड़ लिया था। पुणे से भी 50 कार्यकर्ताओं को पकड़ा गया। लेकिन गिरफ्तारी के बाद कार्यकर्ता भड़क उठे और फिर शुरू हुआ मुंबई की सड़कों पर उत्पात। कई गाड़ियों को फूंक दिया गया, कई टैक्सियों को तोड़ा दिया गया साथ ही ऑटो रिक्शे भी तोड़े गए। संजय निरुपम के दफ्तर पर भी हमला किया गया। सुबह-सुबह भी सोलापुर-पुणे हाईवे पर तीन ट्रक को आग के हवाले कर दिया गया। ये ही एमएनएस की राजनीति पक्ष-विपक्ष दोनों में वो सिर्फ तोड़फोड़ करना ही जानते हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
Tuesday, September 23, 2008
कसम खा रखी है राज ठाकरे के गुंडों ने, 'हम नहीं सुधरेंगे'
चाहे कुछ हो जाए पर हम नहीं सुधरेंगे। शायद इसी राह पर चल रहे हैं राज ठाकरे के गुंडे। एमएनएस यानी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने एक बार फिर जमकर गुंडागर्दी मचाई। एक डॉक्टर के नर्सिंग होम में घुसकर उन्होंने जमकर तोड़फोड़ की और डॉक्टर दंपत्ति को जमकर पीटा। इस बार जो एमएनएस के गुंडों के हत्थे चढ़े वो हैं मलाड के जीवन नर्सिंग होम के डॉक्टर रमेश रेलन और उनकी पत्नी सरीना रेलन। दोनों को जमकर पीटा गया और साथ ही उनके चेहरे पर कालिख बी पोती गई। वो डॉक्टर हाथ जोड़ जोड़ कर माफी की भीख मांगता रहा और वो उसे लिटा लिटा कर उस पर लात घूंसे बरसाते रहे। डॉक्टर रमेश रेलन तो चलो पुरुष हैं पर उनकी पत्नी को भी बुरी तरह पीटा गया। ऐसा लग रहा था कि आतंकवादी लोगों के हत्थे चढ़ चुके हैं और ये आज उनसे हर बात का बदला लेकर रहेंगे।
दरअसल मामला देखा जाए तो ये था कि एक महिला जिसका नाम ट्रीसा है उसने डॉक्टर पर आरोप लगाया कि डॉक्टर ने 9 महीने पहले उसका ऑपरेशन किया था। ऑपरेशन तो सफल हुआ पर उस महिला के पेट में टॉवल छूट गया। जब महिला को पेट में कुछ तकलीफ हुई तो उसने इसकी शिकायत डॉक्टर रमेश से की लेकिन डॉक्टर ने उन्हें पेट की दवाई दे दी। लेकिन महिला की हालत में सुधार नहीं हुआ। फिर महिला ने दूसरे नर्सिंग होम में चैकअप कराया जहां पर इस बात का पता चला कि उसके पेट में टॉवल छूट गया है। उस महिला ने डॉक्टर से शिकायत की पर डॉक्टर ने टालमटोली शुरू कर दी। फिर क्या था महिला पुलिस के पास जाने के बजाय सीधे पहुंच गई आज के उभरते हुए गुंडों के पास यानी कि एमएनएस। एमएनएस के कार्यकर्ताओं ने अपने ही ढ़ंग से उस महिला को इंसाफ दिलवाया। नर्सिंग होम के घुसकर डॉक्टर की जमकर धुनाई की और फिर वो ही पुरानी हरकत कालिख पोती।राज ठाकरे जानते हैं कि उनको किसी की राह पकड़नी है और मुंबई पर कब्जा कैसे करना है। साथ ही उसको किस का उत्तराधिकारी बनना है।
मलाड के डॉक्टर दंपत्ति ने जो काम किया वो सचमुच ऐसा था कि उनको हवालात में होना चाहिए था। मैं कोई उस डॉक्टर के पक्ष में नहीं हूं पर मैं इस बात का भी समर्थन नहीं करता कि कोई भी आदमी खुद जाकर इंसाफ करने लग जाए। वहशी और दरिंदों की भीड़ ने अब तक कई बार कई लोगों की जान ली है एमएनएस मुझे उस वहशी भीड़ से ज्यादा कुछ भी नहीं लगती। मेरा सवाल ये है कि क्या उस महिला को पुलिस के पास पहले नहीं जाना चाहिए था? क्या बिगाड़ा था डॉक्टर रमेश की पत्नी ने जो उस के साथ भी हाथापाई की गई साथ ही उसको इतना जलील किया गया? क्या इंसाफ पाने का ये ढ़ंग सही है? माना कि डॉक्टर रमेश को पुलिस के हवाले कर दो, अंदर बंद करवा दो पर क्या ये रवैया ठीक है? घसीट-घसीट कर किसी को मारना कहां तक उचित है? एक महिला के साथ ऐसा व्यवहार करना एमएनएस की कार्यकर्ताओं को वो भी महिला कार्यकर्ताओं को शोभा देता है? एक महिला दूसरी महिला को पुरुष की मदद से पीट रही है साथ ही कभी पुरुष भी महिला पर हाथ साफ करदेता है क्या ये सही है? क्यों बनी हुई है एक महिला ही दूसरी महिला की दुश्मन, आखिर क्यों?
लोग यदि अभी नहीं संभले तो एक दिन ये एमएनएस के कार्यकर्ता किसी और बात पर खुद उन्हीं के घर में घुसकर उनको मारेंगे जिन्होंने कभी उनसे मदद ली होगी, और वो भी किसी और की शिकायत पर, क्योंकि गुंडों की राजनीति में कोई भी भाई हमेशा भाई नहीं होता।
आपका अपना
नीतीश राज
Thursday, July 31, 2008
आखिर तुम से पल्ला झाड़ ही लिया
बाबू, यहां पर अलग-अलग तरह के रंग मिलते हैं। इनके रंग भी बिल्कुल अलग हैं, सबसे निराले रंग हैं, अपने में सबसे अनोखे। गिरगिट की तरह रंग बदलना तो कोई इन से सीखे। गिरगिट भी सामने आ जाए तो इनकी रंग बदलने की फितरत से गश खाकर गिर जाए, कहे, मैं चाह कर भी इन जैसा नहीं बन सकता, नहीं बदल सकता इतनी तेजी से रंग। लेकिन कुछ भी हो इनके रंग बदलने की अदा देखकर ही मजा आ जाता है। आज जो सगा है वो कल सौतेला और परसों कोई और, फिर एक दिन दुश्मन या फिर किसी दिन प्रेस ब्रीफिंग में कह देंगे कि, 'याद नहीं, हम नहीं जानते'। याद दिलाने की कोशिश भी करेंगे तो आपके सवालों का जवाब, सवाल बन कर ही सामने आएगा आपके।बीजेपी ने अपनी नियमित प्रेस ब्रीफिंग में सुषमा स्वराज से, अपना पल्ला झाड़ लिया। कह दिया ये सुषमा जी कि निजी राय है। ये राय बीजेपी की नहीं है। जो भी सुषमा जी ने कहा है वो राय राजग याने एनडीए की भी नहीं है। बीजेपी पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर जब ये कह रहे थे तो पत्रकारों ने सवाल दागा कि आज आप किस अधिकार से बोल रहे हैं क्योंकि यहीं पर बैठकर सुषमा जी ने जो बयान एक दिन पहले दिया था। उस पर आप आकर सफाई भी दे रहे हैं और पूरी तरह से पल्ला भी झाड़ रहे हैं। तब जावड़ेकर जी को बोलना पड़ा कि
वो यहां पर पार्टी के प्रवक्ता की हैस्यित से ही आए हैं। इन नेताओं के भी क्या कहने, कभी भी किसी को भी गच्चा दे जाते हैं।सवाल ये कि क्या पार्टी से बड़ी हो गई हैं सुषमा स्वराज, जो कि बिना पार्टी या फिर घटग दलों से मशवरा करके अपनी राय दे रहीं हैं? नियमित प्रेस ब्रीफिंग क्यों की जाती है? क्योंकि इस समय जब कि देश आतंकवाद से जूझ रहा है और बीजेपी के ही दो शासित प्रदेशों में ये विपदा आई हैं तो सभी जानना चाहते हैं कि आप की पार्टी और राज्य सरकार क्या सोच रखती है और क्या फैसले लिए जा रहे हैं। माना कि वरिष्ठ नेता हैं सुषमा जी बीजेपी की। उनको जो भी बोलना था तो सोच समझकर बोलना चाहिए था। सुषमा जी पर भी दबाव बनाया गया तो सामने आकर उन्होंने कह दिया कि “ये पूरी तरह से मेरी निजी राय है साथ ही मैंने ये नहीं कहा था, केंद्र सरकार ने ये सब करवाया है, मैंने तो ये कहा था कि यूपीए में कुछ लोग ऐसा कर सकते हैं। जो कि वोट-नोट प्रकरण से ध्यान हटवाना चाहते हों”। कितनी अच्छी हैं आप सुषमा जी तुरंत पलट गई। जब ही आपको अपना रोल नेता मानकर आप ही की पार्टी के ८ नेता वोट देते हुए पलट गए। जब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का यही हाल है और इस बयानबाजी में पड़े हुए हैं तो फिर तो पार्टी का अल्लाह ही मालिक है। (मेरे पिछले आर्टिकल 'सुषमा स्वाराज चुप रहो' में पूरा बयान है सुषमा स्वाराज का) ।
कई बार लगता है कि कुछ वरिष्ठ या यूं कहूं कि कुछ बूढ़े नेता सटिया गए हैं तो गलत नही होगा। माना ये जाता है कि उम्र के साथ अकल और तजुर्बा भी बढ़ता है। लेकिन इन नेताओं के साथ तो उल्टा ही है। बुढ़ापे में जोश जोर मार रहा है।
श्री प्रकाश जायसवाल जी को क्या सूझा कि वो पागलों की तरह गोधरा प्रकरण को उछालने लगे। राज्य सरकार पर तोहमत लगानी है तो सुरक्षा के मामलों पर लगाइये। गुजरात में दो जगह सूरत और अहमदाबाद में ४८-५० बम मिल चुके हैं। और आतंकवादियों का साहस तो देखिए जब मोदी सुरक्षा का जायजा लेने सूरत की गलियों में घूम रहे थे तब वो बम को प्लांट कर रहे थे। ऐसे हौसले हो गए हैं दहशतगर्दों के। राज्य सरकार को लताड़ पिलानी है तो इस मुद्दे पर पिलाइये। लेकिन ये क्या आप लगे सांप्रदायिकता को हवा देने। यदि सांप्रदायिक दंगे भड़क जाते हैं तो कांग्रेस इस दंगों पर अपनी राजनीति की रोटियां सेकने लग जाएगी। अगर दंगे फैले तो दिग्विजय सिंह और जायसवाल भी उतने ही जिम्मेदार होंगे जितने की खुद मोदी हैं।
अधिकतर नेता अब राज ठाकरे की तरज पर काम करने लगे हैं या यूं कहें की बनते जा रहे हैं। राज ठाकरे की तरह सिर्फ ऐसी बातें बोलना जिससे अपने पर कैमरे की लाइट पड़े। और वो अगली सुबह हर पेपर और न्यूज़ चैनलों की हेडलाइन बनें। इन कैमरे वालों को भी कुछ मसाला चाहिए होता है तभी वो लोग कुछ सेल्समैनी कर पाएंगे, कुछ बेच पाएंगे (कभी ये सेल्समैन भी निशाने पर आएंगे)। यदि अब नहीं सुधरे तो एक दिन ये ही होगा कि दोनों पछताएंगे।
आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”