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Sunday, August 30, 2009

सावधान! आप कार खरीदने तो नहीं जा रहे गर जा रहे हैं तो इसे पढ़ते जाइए।

कुछ दिन पहले की बात है लगभग महीने भर पहले की, मेरे एक जाननेवाले के साथ कुछ ऐसा हुआ जिसे मैंने क्या कभी मेरे जाननेवालों में से किसी ने नहीं सुना या देखा था। तभी से मैंने सोच लिया था कि इस बारे में जरूर से लिखूंगा और सबको आगाह करूंगा।

मेरे जाननेवाले एक बिल्डर की कंपनी में काम करते हैं। हर दिन सौ से ज्यादा लोगों से मिलना होता है। काफी दिन से सेंट्रो को चला रहे थे। एक दिन कहीं पर जाना था साथ में उनके बॉस भी थे, बॉस की गाड़ी में कुछ खराबी आगई थी। उस ड्राइव के बाद बॉस ने कहा कि बेहतर है कि दूसरी गाड़ी ले लो। बातों-बातों में बात निकली और तय होगया कि नई गाड़ी ली जाए। उनको पसंद थी होंडा सिटी।

कैसे ना कैसे करके 10 दिन के अंदर ही होंडा सिटी घर की पार्किंग में खड़ी थी। घर वाले काफी खुश थे। दोस्तों को पार्टी भी दी गई वो सब अलग। कहीं पर भी जाना होता तो होंडा सिटी से ही जाते। बेचारी सेंट्रो अपनी बारी आने की राह तकने लगी।

बहरहाल, गाड़ी खरीदने के एक महीने के बाद ही एक हादसा हो गया। एक महीने के बाद गाड़ी सर्विसिंग के लिए जाती है वैसे ही उनकी भी गई। सर्विसिग के दो-तीन दिन के बाद ही एक दिन जब वो ऑफिस जाने के लिए घर से उतरे तो देखा कि गाड़ी पार्किंग में मौजूद नहीं है। काटो तो खून नहीं जैसी स्थिति हो गई। उनके हाथ में गाड़ी की चाबी थी फिर गाड़ी गई तो गई कहां और कैसे?


तुरंत उन्होंने घर जाकर सबको बताया कि गाड़ी नहीं है पार्किंग में। कार साफ करने वाले से पूछा गया। उसने बताया कि गाड़ी आज उसने साफ की थी लगभग सुबह 7.45 के करीब। फिर जिस गार्ड की पार्किंग में ड्यूटी थी उस गार्ड से पूछा गया उसने भी बताया कि गाड़ी को खुद उसने सफाई होने के बाद चैक किया था। तुरंत दोस्तों को कॉल करके बुलाया गया कुछ ऑफिस जा रहे थे या कुछ रास्ते में थे सब वापिस सोसायटी आगए। सभी को बताया गया तो सब हैरान क्योंकि होंडा सिटी का दावा है कि उसकी डुप्लीकेट चाबी कोई बना नहीं सकता और बिना चाबी के वो खुल ही नहीं सकती। तो फिर गाड़ी कहां गई?

शाम तक ये साफ हो गया कि गाड़ी चोरी हो गई है। हम लोगों के प्रेशर के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली। पुलिस की शुरूआती तफ्तीश में एक ऐसी बात सामने आई कि जिसके कारण पैरों तले जमीन खिसक गई। पुलिस ने दूसरी चाबी की डिमांड की, तुरंत पेश की गई। और यहीं था सबसे बड़ा पेंच। दूसरी चाबी यानी की डुप्लीकेट चाबी जो कि आपको गाड़ी खरीदते वक्त दी जाती है वो इस होंडा सिटी की नहीं थी उस चाबी में फर्क था

पुलिस को शक हुआ डीलर के ऊपर और तुरंत उन लोगों को पकड़ा गया जिन्होंने डिलीवरी की थी गाड़ी की। डीलर के दो लोगों को पुलिस ने डिटेन किया। पर कुछ पता नहीं चला और फिर कई दिन तफ्तीश में निकलते चले गए। हम लोग यहां भागदौड़ कर रहे थे।

एक दिन दिल्ली पुलिस के रिनगर थाने से कॉल आया कि मेरे जानने वाले को कि गाड़ी मिल गई है। सभी पुलिस स्टेशन पहुंचे तो एक शख्स को पकड़ रखा था और गाड़ी को असम से रिकवर किया गया। गाड़ी के फर्जी कागजात यहां दिल्ली में ही बन रहे थे, तभी पुलिस ने इस शख्स को धर दबोचा।

उस गाड़ी चोर ने खुलासा किया कि 6 साल के अंदर अब तक 71 गाड़ियां चुरा चुका है। गाड़ियों को नॉर्थ इस्ट, उत्तराखंड जैसी जगहों पर ले जाकर बेच दिया जाता हैं। इस काम में पूरा गिरोह सक्रिय है और अधिकतर उन गाड़ियों को निशाना बनाया जाता हैं जो कि नई होती है क्योंकि उनमें एक भी पैसा नहीं लगता, सिर्फ कागजात बनवाने का खर्च आता है।

पर होंडा सिटी की चाबी कहां से मिली?

तब जो पता चला उसने हमारे होश ही उड़ा दिए। डीलर के यहां निचले तबके पर इनके गिरोह के लोग काम करते हैं। जब गाड़ी की डिलीवरी करनी होती है तब गाड़ी लाने के लिए उन लोगों से ही कहा जाता है। यही वो वक्त होता है जब वो खेल जाते हैं सबसे बड़ा खेल। तब वो एक्सीडेंटल गाड़ियों की चाबी के साथ उस नई नवेली गाड़ी की चाबी को बदल देते हैं और खुशी से लबरेज ग्राहक दोनों चाबियों को चैक करके नहीं देखते। अधिकतर लोग उस चाबी से ही ओपरेट करते हैं जिसमें कि रिमोट इन बिल्ट होता है और दूसरी चाबी को यूं ही बिना चैक किए जेब के हवाले कर देते हैं। जब उनकी गाड़ी सर्विसिंग के लिए आती है तो वहां पर भी गिरोह के लोग होते हैं। अधिकतर गाड़ी घर पर ही डिलीवर की जाती है तो एड्रेस(घर का) का पता चल जाता है। गर डिलीवरी घर पर नहीं होनी है तब गिरोह का दूसरा साथी सर्विस सेंटर के बाहर मौजूद होता है। जैसे ही गाड़ी मालिक गाड़ी लेकर जाता है तो बाहर खड़ा शख्स गाड़ी का पीछा करके घर तक पहुंच जाता है। फिर दो-तीन दिन तक लगातार गाड़ी के मालिक पर नजर रखकर किसी दिन भी हाथ साफ कर दिया जाता है। शान से बिना आवाज़ किए काम हो जाता है और ड्राइवर की सीट पर बैठकर चोर गाड़ी उड़ा ले जाता है।

तो ये है आज के हाईटेक चोरों की हकीकत। तो संभल जाइए कहीं आप अपने हाथ से ही चोरों को अपनी गाड़ी की चाबी तो नहीं दे कर आ रहे। कहीं आप गाड़ी खरीदने जा रहे हों तो आप तो वो गलती नहीं कर रहे। जब भी कोई भी चाबी लें तो सभी चाबियों को चैक जरूर करें और संतुष्ट होने के बाद ही वहां से हटें। तब थोड़ा वक्त गर आप लगा देंगे तो बाद में बहुत सा वक्त और आपकी गाड़ी बच जाएगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, August 7, 2009

ये इबादत नहीं है...शक्ति प्रदर्शन का एक जरिया है।

कल रात 11 बजे जब मैं ऑफिस में था तब एक खबर आई कि दिल्ली में दो आतंकवादियों को धर दबोचा गया है। पहली नजर में लगा कि 15 अगस्त से पहले तो गिरफ्तारी लाजमी है ही और वैसे भी खुफिया तंत्र ने दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस से पहले अलर्ट जारी कर रखा है। फिर ख़बर में अपडेट हुआ कि दोनों को दरियागंज से पकड़ा गया है और दोनों आतंकी दिल्ली में अपने मोड्यूल से मिलने आए थे। दोनों आतंकी हिजबुल के थे और जम्मू-कश्मीर के रहने वाले और पाक में ट्रैनिंग लेकर के दिल्ली आए थे। दोनों के पास से एक-47, कारतूस, हैंड ग्रेनेड मिले थे यानी देखा जाए तो दोनों दिल्ली के किसी भी हिस्से में कोहराम मचा सकते थे और साथ ही मुंबई 26/11 जैसी वारदात को अंजाम दे सकते थे।

इस खबर के आने के लगभग 10-15 मिनट के बाद ऑफिस से गए हुए एक साथी का फोन आया कि आईटीओ पर पूरा जाम लगा हुआ है। एक बाइक पर ४-४ लड़के, किसी भी टू व्हीलर पर ३ से कम तो कतई नहीं निकले हुए हैं। मुझे पता था कि वो सब कहां जा रहे हैं मैंने तुरंत उनको बताया कि आज शब-ए-रात है और सारे मुसलमान इबादत के लिए जामा मस्जिद जाते हैं साथ ही इनकी तादाद कुछ ज्यादा ही होती है तो बेहतर ये कि पंगा मत लेना क्योंकि भीड़ पागल होती है और भीड़ के लिए कोई कानून नहीं होता है।

मेरे साथी ने जवाब दिया कि ट्रैफिक, जाम, इबादत और हुड़दंग में अंतर करना उन्हें आता है। ये हुड़दंग है, ये शक्ति प्रदर्शन है जिसे चाह रहे हैं ये लोग उल्टा-सीधा कहकर आगे निकल जा रहे हैं। इनकी तादाद भी इतनी ज्यादा है कि कोई पंगा क्या कुछ बोल नहीं सकता। पुलिस सिर्फ देख रही है और कुछ कर नहीं पा रही है उसमें भी सोने पर सुहागा दो हवलदार खड़े होकर ट्रैफिक संभाल रहे है बाकी सब बैठे हुए हैं। मैं भी सहमत था कि सच कायदे कानून को तो मानना चाहिए। खासकर टू व्हीलर पर ४-४ लोग बैठें हुए बिना हेल्मेट के हजारों लोग घूम रहे हैं क्यों। जब ऑफिस खत्म करके मैं भी गया तो ये ही हाल था हजारों की तादाद में आईटीओ पर कानून की धज्जियां पुलिस हेडक्वाटर के सामने ही उड़ाई जारही थीं। हमारे साथ आ रहे एक साथी की कार में भी कुछ लड़के बाइक से उतरकर जबर्दस्ती घुसने की कोशिश कर रहे थे। ये तो शुक्र है कि मौके पर पुलिस पहुंच गई वर्ना कुछ और ही होता।

मैंने तुरंत काउंटर किया कि याद है, कुछ दिन पहले कावड़ियों के कारण भी इसी तरह हम लोग त्रस्त थे, कितनी परेशानी होती थी। वो भी सहमत था मेरी बात से। मैं सोच में पड़ गया कि क्यों हमें जरूरत पड़ती है अपने धर्म को दिखाने के लिए शक्ति प्रदर्शन की। क्यों जरूरत पड़ती है हमें लाउडस्पीकर की और उस पर चीख-चीख कर लोगों को अपने अल्लाह का नाम दूसरों को जबर्दस्ती सुनाने की। क्यों हमें जरूरत पड़ती है लगातार, बार-बार घंटी बजाने की। लोग कहते हैं कि भगवान चीखने से नहीं साधना से मिलता है। तो क्या हमारा धर्म के नाम पर ये शक्ति प्रदर्शन ठीक है?

आपका अपना
नीतीश राज

(दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस के जज्बे को सलाम करना चाहूंगा कि दरियागंज जैसे इलाके से इतनी सफाई से दो आतंकी पकड़ लेना और वो भी इबादत की रात में एक कामयाबी ही कहूंगा। वर्ना यदि थोड़ी सी भी चूक हो गई होती तो बाटला जैसा इल्जाम फिर लग सकता था।)

Sunday, June 14, 2009

रेप करोगे तो ऐसे ही पिटोगे, भीड़ ने जमकर धुना बलात्कारियों को, न्याय का नया रूप।

दिल खुश होगया, मज़ा आगया। आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। बताता हूं, जैसे ही मेरी नजर उस फुटेज पर पड़ी तो लगा कि ये क्या हो रहा है। भीड़ कैसे पागलों की तरह उस लड़के को पीट रही है। क्या कारण है कि पीट रही है क्या किया है उन लड़कों ने। ये पुलिसवाला कुछ कर क्यों नहीं पा रहा है, सिर्फ देख रहा है। अरे इस पुलिसवाले ने तो बंदूक भी निकाल रखी है पर लोगों को काबू क्यों नहीं कर पा रहा है। आखिर क्या कारण है।

गुस्सा भी क्या चीज है, कभी इतना गलत काम करवा जाता है कि जिंदगी भर खुद को उस घृणत कृत्य के लिए आप खुद को माफ नहीं कर सकते। पर कभी-कभी सही काम भी करवा जाता है ये गुस्सा।
लोग पहुंचे गए मुंह पर कपड़ा बांधकर और जैसे ही वो तीनों सामने पड़े तो लोग बेकाबू हो गए और फिर शुरू हुआ उन तीनों को पीटने का दौर

सूरत में हुई एक शर्मनाक हरकत जिसने बिगाड़ दी शहर की सूरत। तीन मनचले सुबह के समय पर निकले तफरी के लिए। उसमें से दो पुलिसवालों की औलाद। ट्यूशन पढ़ने गई नाबालिग लड़की और उसके दोस्त को गाड़ी में बहला फुसलाकर बैठा लिया। वो लड़की नाबालिग, सिर्फ 17 साल की। उन तीनों ने दो घंटे तक उस लड़की को नोचा, काटा, खाया, नहीं सुनी उसकी आवाज़, नहीं सुनी उसकी चीख और दो घंटे तक कार में करते रहे बलात्कार। लड़की के जिस्म को निचोड़ने के बाद फेंक कर चल दिए। लेकिन उस से पहले उन रईसजादों ने मोबाइल से उस लड़की की अश्लील वीडियो भी खींच ली। लड़की ने पुलिस से शिकायत की और मैडिकल रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि भी हो गई।

पुलिस महकमा हरकत में आया और तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया। इस बीच सूरत के पुलिस कमिश्नर का तबादला भी कर दिया गया और मामले की सुनवाई फास्ट ट्रेक कोर्ट में करवाने का फैसला भी हो गया। पुलिस उन तीनों आरोपियों को मेडिकल जांच के लिए लेगई। बस फिर क्या था लोग खासे नाराज़ थे और उन्हें लग रहा था कि इन तीनों को बचाया जाएगा क्योंकि ये पुलिसवालों के बच्चे हैं। इसलिए लोग पहुंचे गए मुंह पर कपड़ा बांधकर और जैसे ही वो तीनों सामने पड़े तो लोग बेकाबू हो गए और फिर शुरू हुआ उन तीनों को पीटने का दौर। तीनों पिटाई से बाप-बाप करते रहे और पुलिस लोगों को बंदूक दिखाकर रोकने की कोशिश। पर लोग कहां रुकने वाले थे औरतों ने भी जमकर लात मारी। ना तो पुलिस का डंडा काम आया ना ही बंदूक लोगों ने तबियत से की धुनाई। अस्पताल में जिसे भी पता चला उसने ही अपने हाथ-पैर सब साफ कर लिए। लोगों ने तीनों को घेर करके मारा पुलिस यहां बचाती तो वहां से पड़ता और वहां से बचाती तो यहां से पड़ता। जब लोगों को तसल्ली होगई तब जाकर पुलिसवाले हालात को काबू में कर सके और तीनों को ले जा सके।

पहले तो बलात्कार, फिर नाबालिग से रेप, घंटों रेप, सड़क पर फैलाई दहशत, कार में किया रेप, फिर खींचा वीडियो इतना सब काफी था उन लड़कों को पीटने का कारण साथ ही पुलिसवालों की औलाद तो धुनाई तो तबियत से होनी ही थी। ऐसे ही न्याय से इस तरह के गंदे काम करने वालों से छुटकारा मिल सकता है आम जनता को। इसे ही कहते हैं भीड़ का कानून पर ये तब तक ही ठीक है जब तक की ये सही काम के लिए हो वर्ना ये ही ताकत गुंडागर्दी को भी जन्म देती है।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, October 23, 2008

राज्य सरकार ने राज ठाकरे को पिटने से बचाने के लिए खेला ये खेल

राज ठाकरे को पुलिस ने पकड़ा, किसके कहने पर सरकार के कहने पर। सरकार ने पहल करके ये बताना चाहा कि बहुत हो चुका अब इस बड़बोले शख्स को जेल की हवा खिलानी ही होगी। कानून ने एक तरफ तो न्याय का चाबुक चलाया और दूसरी तरफ चाबुक शरीर पर लगने से पहले ही पकड़ भी लिया। वहीं दूसरी तरफ कानून की वो देवी जो कि आंखों पर पट्टी बांधे रखती है वो फिर किसी तरह से जागी और फिर चाबुक चमड़ी उधेड़ने के लिए उठा लेकिन शरीर पर पड़ने से पहले ही चाबुक पकड़ लिया। हिम्मत के आगे कानून जीता, हिम्मत हारी।
ये कोई पहेली नहीं है ये है कल्याण कोर्ट की कहानी। राज ठाकरे के खिलाफ सरकार ने जो प्लान बनाया था वो काफी अच्छा था। पर सरकार भी ये जानती थी कि यदि इस शख्स को लोगों तक पहुंचने दिया तो ये राज्य सरकार के लिए ठीक नहीं होगा। तो खेल खेला गया। एक ऐसा खेल जिससे दिखाने के लिए काम भी हो जाए और राज ठाकरे भी पिटने से भी बच जाए।
सरकार को राज ठाकरे ने रत्नागिरी में चैलेंज किया था कि अगर हिम्मत है तो पकड़ के दिखाओ और फिर देखना कि महाराष्ट्र कैसे जलता है। राज्य सरकार काफी दिनों से ये धमकियां सुन रही थी। और इस बार तो दबाव भी केंद्र से बन गया था(सीएम देशमुख ने कहा कि राज्य सरकार पर कोई दबाव नहीं था, वहीं शिवराज पाटील ने कहा है कि गृहमंत्रालय ने चिट्ठी लिखी थी और फोन पर खुद उन्होंने बात की थी। सच्चा कौन?)।
तभी राज्य सरकार को पता चला, राज ठाकरे के खिलाफ जारी हो चुका है एक गैर जमानती वारंट। राज्य सरकार तुरंत हरकत में आगई। यदि जमशेदपुर पुलिस राज ठाकरे को अपने साथ ले गई तो फिर राज्य में राजनीति कौन करेगा। कौन मारेगा-पीटेगा उत्तर भारतीयों को, जिनकी तादाद मुंबई-ठाणे में ज्यादा हैं। पता नहीं कहीं जमशेदपुर ले जाते हुए कोई भी सुरक्षा में चूक होगई और राज ठाकरे को बिहारियों के साथ झारखंडियों ने मिलकर पीट दिया या फिर कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर अलगाव को नहीं रोका जा सकेगा। राज्य सरकार ने घोड़े दौड़ाए और ३००-३५० किलोमीटर दूर बैठे राज ठाकरे को रात के २.३० बजे के करीब गिरफ्तार कर लिया गया।
खबर फैली हर जगह उत्पात होना ही था और हुआ भी। लेकिन इस बार सिर्फ महाराष्ट्र में ही उत्पात नहीं हुआ। इस चिंगारी की आग पटना तक गई। वहां पर स्टेशन पर तोड़फोड़ की गई। बहरहाल ये बात बाद में।
कोर्ट में राज की पेशी होती है। सुरक्षा कारणों से देरी होती है और फिर बांद्रा कोर्ट से राज को जमानत मिल जाती है। पर राज्य सरकार ने पूरा इंतजाम कर रखा था। अब बारी थी कल्याण कोर्ट की। कल्याण कोर्ट में एक दूसरे मामले में राज को पेश किया जाना था पर देरी की वजह से एक पूरी रात मानपाड़ा थाने की हवालात में काटनी पड़ती है राज ठाकरे को। हर पुलिसकर्मी जेल में बैठे उस ढ़ोंगी के वक्तव्य सुनता रहता है और जी हुजूरी करता रहता है। रात कट जाती है फिर सुबह पेश किया जाता है पर अदालत में खड़ी उस देवी के आंखें में पट्टी है साथ ही वो पट्टी कान के ऊपर से निकलती है इसलिए ना वो किसी का दर्द सुन सकती है और ना देख सकती है। अदालत ने अपना काम किया इतना तेज चाबुक मारा, कि दीवाली भी जेल में काटने का इंतजाम कर दिया, ५ नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया। फिर शरीर पर लगने से पहले ही पकड़ भी लिया, कोर्ट ने सिर्फ १५००० के निजी मुचलके पर जमानत भी दे दी। साथ ही देखा कि रेलवे पुलिस खड़ी है राज ठाकरे को पकड़ कर लेजाने के लिए और इतनी देर हो चुकी है कि वकील चाहे कुछ भी करें तब भी रात तो हवालात में काटनी ही होगी। और राज ठाकरे कमजोर भी दिख रहे हैं। तुरंत २४ तक हर मामले में अदालत ने राज ठाकरे को अंतरिम राहत दे दी। यानि की अब जब भी कार्रवाई होगी वो होगी २५ को याने कि जमशेदपुर कोर्ट से जारी वारंट का इलाज मिल गया। और शनिवार को कोर्ट में इस याचिका के खिलाफ पहले ही अर्जी डाली जा चुकी है। तो राज ठाकरे राज्य सरकार की राजनीति की वजह से राजशाही ठाठबाट पाते रहेंगे।
राजनीति इसे ही कहते हैं मेरे दोस्त। राज्य सरकार ने अपना उल्लू भी सीधा कर दिया और साथ ही राज की मुश्किल भी हल कर दी। वर्ना यदि राज ठाकरे को महाराष्ट्र छोड़कर जाना पड़ता तो क्या होता राज ठाकरे का इसका अनुमान सब लगा सकते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”