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Friday, August 7, 2009

ये इबादत नहीं है...शक्ति प्रदर्शन का एक जरिया है।

कल रात 11 बजे जब मैं ऑफिस में था तब एक खबर आई कि दिल्ली में दो आतंकवादियों को धर दबोचा गया है। पहली नजर में लगा कि 15 अगस्त से पहले तो गिरफ्तारी लाजमी है ही और वैसे भी खुफिया तंत्र ने दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस से पहले अलर्ट जारी कर रखा है। फिर ख़बर में अपडेट हुआ कि दोनों को दरियागंज से पकड़ा गया है और दोनों आतंकी दिल्ली में अपने मोड्यूल से मिलने आए थे। दोनों आतंकी हिजबुल के थे और जम्मू-कश्मीर के रहने वाले और पाक में ट्रैनिंग लेकर के दिल्ली आए थे। दोनों के पास से एक-47, कारतूस, हैंड ग्रेनेड मिले थे यानी देखा जाए तो दोनों दिल्ली के किसी भी हिस्से में कोहराम मचा सकते थे और साथ ही मुंबई 26/11 जैसी वारदात को अंजाम दे सकते थे।

इस खबर के आने के लगभग 10-15 मिनट के बाद ऑफिस से गए हुए एक साथी का फोन आया कि आईटीओ पर पूरा जाम लगा हुआ है। एक बाइक पर ४-४ लड़के, किसी भी टू व्हीलर पर ३ से कम तो कतई नहीं निकले हुए हैं। मुझे पता था कि वो सब कहां जा रहे हैं मैंने तुरंत उनको बताया कि आज शब-ए-रात है और सारे मुसलमान इबादत के लिए जामा मस्जिद जाते हैं साथ ही इनकी तादाद कुछ ज्यादा ही होती है तो बेहतर ये कि पंगा मत लेना क्योंकि भीड़ पागल होती है और भीड़ के लिए कोई कानून नहीं होता है।

मेरे साथी ने जवाब दिया कि ट्रैफिक, जाम, इबादत और हुड़दंग में अंतर करना उन्हें आता है। ये हुड़दंग है, ये शक्ति प्रदर्शन है जिसे चाह रहे हैं ये लोग उल्टा-सीधा कहकर आगे निकल जा रहे हैं। इनकी तादाद भी इतनी ज्यादा है कि कोई पंगा क्या कुछ बोल नहीं सकता। पुलिस सिर्फ देख रही है और कुछ कर नहीं पा रही है उसमें भी सोने पर सुहागा दो हवलदार खड़े होकर ट्रैफिक संभाल रहे है बाकी सब बैठे हुए हैं। मैं भी सहमत था कि सच कायदे कानून को तो मानना चाहिए। खासकर टू व्हीलर पर ४-४ लोग बैठें हुए बिना हेल्मेट के हजारों लोग घूम रहे हैं क्यों। जब ऑफिस खत्म करके मैं भी गया तो ये ही हाल था हजारों की तादाद में आईटीओ पर कानून की धज्जियां पुलिस हेडक्वाटर के सामने ही उड़ाई जारही थीं। हमारे साथ आ रहे एक साथी की कार में भी कुछ लड़के बाइक से उतरकर जबर्दस्ती घुसने की कोशिश कर रहे थे। ये तो शुक्र है कि मौके पर पुलिस पहुंच गई वर्ना कुछ और ही होता।

मैंने तुरंत काउंटर किया कि याद है, कुछ दिन पहले कावड़ियों के कारण भी इसी तरह हम लोग त्रस्त थे, कितनी परेशानी होती थी। वो भी सहमत था मेरी बात से। मैं सोच में पड़ गया कि क्यों हमें जरूरत पड़ती है अपने धर्म को दिखाने के लिए शक्ति प्रदर्शन की। क्यों जरूरत पड़ती है हमें लाउडस्पीकर की और उस पर चीख-चीख कर लोगों को अपने अल्लाह का नाम दूसरों को जबर्दस्ती सुनाने की। क्यों हमें जरूरत पड़ती है लगातार, बार-बार घंटी बजाने की। लोग कहते हैं कि भगवान चीखने से नहीं साधना से मिलता है। तो क्या हमारा धर्म के नाम पर ये शक्ति प्रदर्शन ठीक है?

आपका अपना
नीतीश राज

(दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस के जज्बे को सलाम करना चाहूंगा कि दरियागंज जैसे इलाके से इतनी सफाई से दो आतंकी पकड़ लेना और वो भी इबादत की रात में एक कामयाबी ही कहूंगा। वर्ना यदि थोड़ी सी भी चूक हो गई होती तो बाटला जैसा इल्जाम फिर लग सकता था।)

Friday, March 6, 2009

लाहौर हमला, तीन थ्यौरी पर भारत महफूज

पाकिस्तान में श्रीलंका क्रिकेट टीम पर जो हमला हुआ है उसमें मुझे तो तीन थ्यौरी सामने आती हुई दिख रही हैं। जो तीन थ्यौरी हैं उन पर ही लगता है कि इस वक्त पाकिस्तान के हुक्मरान सोच रहे हैं। मेरे हिसाब से तीन थ्यौरी हैं---
१) तालिबान की करतूत
२) पाक के बाहर की शक्ति यानी भारत, एलटीटीई। (इसे वैसे तो खारिज कर दिया है पर फिर भी उंगली उठाने की फिराक में तो होंगे)
३) किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी।
अब बताते हैं कि क्यों ये तीन थ्यौरी सामने आ रही हैं।
पहली थ्यौरी यानी तालिबान की करतूत। पाकिस्तान के बहुत बड़े सियासी हल्कों में ये माना जा रहा है कि श्रीलंका की टीम पर जो हमला हुआ है वो तालिबान का पाकिस्तान पर बढ़ते वर्चस्व की निशानी है। जैसे कि तालिबान में हमेशा से ही पढ़ाई, सिनेमा, औरतों का बेपर्दा होने और खासतौर पर खेल पर काफी कड़े और सख्त कानून बनाए हुए हैं। तालिबानी नहीं चाहते कि क्रिकेट जैसा खेल वो या फिर उनके देश में खेला जाए और जब से स्वात पर अपना कब्जा तालिबान ने किया है तब से पाकिस्तान को अपने देश का हिस्सा मानने लग गया है तालिबान। साथ ही स्वात के बाद पूरे पाकिस्तान पर तालिबान अपना अधिपत्य जमाना चाहता है। वैसे अभी तक तफ्तीश में ज्यादातर अफगानियों को ही पकड़ा गया।
दूसरी थ्यौरी यानी पाक के बाहर की शक्ति भारत,एलटीटीई। मुंबई हमलों का दोषी पाकिस्तान को माना गया और अब तो ये साबित भी हो गया कि 26/11 की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी, हमलावर पाकिस्तान से आए थे और सारे दोषी पाकिस्तान में ही हैं। तो पाकिस्तान में ये मानने वालों की कमी नहीं है कि लाहौर हमला भारत के आंतकवादी गुट या फिर भारत की किसी खुफिया एजेंसी की कारसतानी है। बाघा बार्डर के रास्ते आए थे आतंकी पहला वक्तव्य था पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक आला अधिकारी का। दूसरी बात, लाहौर हमला मुंबई हमले का पार्ट-2 माना जा रहा है और इसी कारण से ये माना गया कि भारत की तरफ से उसी तरह इस हमले को अंजाम दिया गया जिस तरह से मुंबई हमलों को दिया गया था। यानी भारत ने बदला उतार लिया है। जब कि सारी दुनिया इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। श्रीलंका में एलटीटीई पर हमले के बाद से ये माना जा सकता था कि ये हमला वो भी करवा सकता है पर सोचने वाली बात ये है कि अभी तो वो श्रीलंका में ही अपने आप को बचाए रखने में असमर्थ हैं तो वो कहां से पाकिस्तान में अफगानी कपड़े पहनकर हमला करेंगे और यदि वो करते तो रॉकेट लॉन्चर और ग्रेनेड चूकता नहीं। पर इस थ्यौरी को पाकिस्तानी सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। अब देखेंगे कि पाकिस्तानी मीडिया क्या कहता है?
साथ ही बड़े केनवस पर देखें तो लोगों का ये मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत को इस हमले से कई फायदे हो सकते हैं। पाकिस्तान को एक आतंकवादी राष्ट्र घोषित किया जा सके(जो कि पाकिस्तान है)। साथ ही ये कि भारत कितना असुरक्षित है अपने पड़ोसी से और इस पड़ोसी से भारत को हमेशा ही खतरा बना हुआ है। आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण पाकिस्तान को अमेरिकी मदद भी नहीं मिलेगी।
तीसरी थ्यौरी यानी किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी। सबसे ज्यादा जो बात चल रही है कि ये जरूर से ही किसी घरेलू संगठन का हाथ हो सकता है। अंतिम वक्त पर बस के रूट में फेरबदल किया गया या नहीं किया गया वो ही रूट रखा जिससे एक दिन पहले गए थे इस पर भी शुरूआती बयान एक जैसे नहीं थे। माना ये भी जा रहा है कि किसी फोन के आने के बाद रूट में फेरबदल से इनकार किया गया था। जब दोनों टीमें एक साथ होटल से निकलती हैं तो पाकिस्तान की टीम श्रीलंका की टीम के साथ क्यों नहीं निकली। क्यों यूनुस खान ने अपनी टीम को ५ मिनट के लिए और रुकने को कहा? क्या कारण है इसके पीछे, ये सवाल तो खुद अंपायरों तक ने अपनी पीसी में कहा था।
जब ४८ घंटे पहले ही पंजाब प्रांत के पुलिस के आला अफसरों को ये बताया जा चुका था कि जल्द ही श्रीलंका की टीम को निशाना बनाया जा सकता है तब भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। खुद पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान ने सुरक्षा के इंतजामों पर सवाल उठाए हैं। जहां मिलने थे ७० सिपाही वहां मिले महज़ २५? तो क्या गलती ये सरासर लाहौर पुलिस की नहीं है। अंपायर क्रिस ब्राड ने ये बताया कि जब हमला हुआ तो पाकिस्तानी पुलिस वहां से भाग गई, कोई भी मदद के लिए नहीं था, हम वहां पर अकेले छूट गए थे। तो क्या इसे पुलिस की बुजदिली नहीं कहेंगे।
वैसे भी ये सही है जो अधिकतर आक्रमण करता हो तो उसे ये नहीं पता रहता कि बचाव कैसे करना है, वो ही हुआ पाकिस्तानी लोगों के साथ। अधिकतर वो भारत पर हमले की बात सोचते हैं जब हमला हुआ तो बचाव नहीं सोच सके।
यदि आतंकवादियों का मकसद श्रीलंका की टीम को मारना ही होता तो आतंकवादी एक रॉकेट लॉन्चर ही क्यों छोड़ते? वो भी ठीक निशाने पर नहीं? दो हेंड ग्रेनेड फेंकते पर इस तरह से कि दहशत पूरी दुनिया में फैल जाए पर निशाना चूक जाए।
इतने अच्छे-अच्छे एंगल से कैसे शूट किया इस पूरे हमले को? कैसे एक टीवी क्रू को पता चल गया कि ये हमला हो रहा है। और जहां से भी हो सके हर जगह, हर आतंकी की तस्वीरें उतारी गई। क्या ये बात हजम होती है? टीवी पत्रकार होने के कारण मुझे लगता है कि इतने एंगल से एक साथ तस्वीरों को लेना मुश्किल है। टॉप एंगल, साइड एंगल, फ्रंट एंगल इतने एंगल वो भी सिर्फ सेकेंड में कैसे संभव है, मुझे तो नहीं लगता। इससे ये साफ होता है कि हमले से पहले ही हमले की जानकारी थी उस क्रू को। और ये क्रिकेट जैसे खेल के साथ ये खेल किसी घर के ही सदस्य ने ही खेला है। सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए कि दहशत हम फैला सकते हैं और यदि जरूरत पड़ी तो पाकिस्तान में हम कुछ भी कर गुजर सकते हैं।
पर अब तो दूसरी थ्यौरी को सिरे से पाकिस्तान की सरकार ने खारिज कर दिया है। अब बात अंदर के गुनहगारों और ये तो पाकिस्तान क्रिकेट का दुर्भाग्य है,कि जिस मैदान पर पाकिस्तान क्रिकेट के स्वर्णिम अश्रर लिखे गए उसी गद्दाफी पर पाकिस्तान क्रिकेट पर कालिख पुत गई।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, September 29, 2008

“बाटला के L-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है”

‘बाटला के एल-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है’। ये मैं नहीं कह रहा हूं ये वो तीन आतंकवादी कह रहे हैं जो कि एनकाउंटर के बाद से दक्षिण दिल्ली से पकड़े गए हैं। शकील, जिया और साकिब ये तीनों रो रहे हैं अपने गुनाहों के लिए अल्लाह से रहम की जगह मौत मांग रहे हैं। ये पुलिस से भी मौत मांग रहे हैं। कस्टडी में जब भी इनको कोई पुलिसवाला दिख जाता है तभी ये रोना शुरू कर के गिड़गि़ड़ाते हुए उनसे अपने गुनाहों का वास्ता देते हुए सज़ा की भीख मांगते हैं। क्या आपने कभी आतंकवादियों को भीख मांगते हुए देखा है? शायद नहीं ही देखा होगा ये तो वो जालिम होते हैं जो कि औरों से भीख मंगवाते हैं। लेकिन आज ये खुद भीख मांग रहे हैं अपनी मौत की। दिन में रोते हैं, रात में रोते हैं, जमीन-दीवार पर सर मार-मार कर रोते हैं। लेकिन सच जो कि अर्द्धसत्य नहीं कि ये भीख उन्हें कोई भी नहीं दे सकता।
अभी कई बार पढ़ा कि लोग सवाल उठा रहे हैं कि एल-18 में जो एनकाउंटर हुआ वो फर्जी था। मैंने सबकी दलीलें सुनी हैं, साथ में ‘बड़े-बड़े’ लोगों की दलीलें भी सुनी हैं। दलीलें हैं हमने वहां पर आसपास के परिवार वालों से बातें की। जितने मुंह उतनी बातें। अब ये समझ में नहीं आता कि जब हर जगह से अलग-अलग कहानी सुनने को मिल रही हैं तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि उन सारी कहानियों में से कोई एक भी सही है। फिर पुलिस के बयान को भी एक दलील मान कर सच माना जा सकता है।
हर कोई जानना चाहता है सच। ये सच या तो सैफ बता सकता है जो कि वहां से पकड़ा गया या फिर एक शख्स और है जो असलियत बता सकता है। कुछ का मानना है कि भई, सैफ को तो वहां लाया गया था उसे कैसे पता होगा। तो जवाब है, क्यों आंखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या सैफ ने। चलो, मान लें कि सैफ को कुछ भी नहीं पता।
उस दूसरे शख्स को पूछते हैं कि भई, क्या हुआ था। वो हैं कांस्टेबल बलवंत। उस मुठभेड़ में गोली इस शख्स को भी लगी। एम्स ट्रामा सेंटर में इलाज चल रहा है। एक हाथ जो कि चोटिल हुआ वो बच पाया तो बहुत ही होगा। ये बात जो मैं बताने जा रहा हूं वो बलवंत ने किसी मीडियाकर्मी या फिर पुलिस-डॉक्टर को नहीं बताई है। ये बात उसने अपने साथ काम करने वाले एक साथी को बताई है वो भी सबके सामने नहीं बिल्कुल निजी तौर पर।
बलवंत ने अपने साथी के पूछने पर ये बताया कि पूरा घटनाक्रम कैसे-क्या हुआ बताया ही नहीं जा सकता लेकिन मोटा-मोटा क्या हुआ बता देता हूं। उन्होंने बोलना शुरू किया,
‘हम साहब(स्व.इंस्पेक्टर शर्मा) के साथ उपर गए। सेल्समैन बनें हमारे सहयोगी ने हमें कमरा-कमरे का नक्शा यानी समान कहां-कहां रखा है, हथियार दिखे कि नहीं और जो भी उसने देखा था, कम शब्दों में, सब बता दिया था। साहब आगे थे हम सब लोग पीछे, अपनी-अपनी जगह चुनते हुए, खड़े होते रहे, मैं साहब के साथ ही था। साहब ने जाते ही दरवाजे में ठोकर मारी और खोलने के लिए आवाज़ लगाई। लेकिन जब खोलने में देर होने लगी तो साहब ने दरवाजे में दो तीन ठोकरें और जड़ दीं साथ ही ‘जल्दी खोलो’ की आवाज़ भी लगाई। फिर क्या हुआ असल में समझ में नहीं आया, नहीं पता चला कि क्या हुआ। चीख चिल्लाहट के बीच गोलियां चलने लगी और उसके आगे कि तो तुम रोज ही पढ़ते रहते होगे’
।
तो ये थी बलवंत की अपने साथी से बातचीत। अब और तो शायद ही प्रमाण कोई दे सकता हो। फिर और भी बातें हुईं, वो कुछ महकमे की, कुछ घर परिवार की, कुछ स्व. शर्मा जी के परिवार की।
पुलिस ने एल-18 से जो चीजें बरामद की हैं उनमें से कई चीजें ऐसी हैं जो कि इन आतंकवादियों को ओवरस्मार्ट साबित करती हैं। 900 से ज्यादा फोटों उनके लैपटॉप से बरामद हुई हैं। इन तस्वीरों में ब्लास्ट की तस्वीरें हैं। कुछ वीडियों भी मिले हैं जो कि ब्लास्ट के तुरंत बाद के हैं। उन तस्वीरों में कुछ तो वो हैं जैसे कि मणिनगर में साइकिल की जिसमें कि शकील और जिया ने बम लगाया था। उन सभी कारों की तस्वीरें हो जो कि अहमदाबाद में उपयोग की गईं। बम और टाइमर कार के अंदर प्लांट करते हुए की तस्वीरें हैं। कार के अंदर बम रखा हुआ है, फोटो पर समय बता रहा है शाम के 5.45 और फिर दूसरी तस्वीर भी वहीं कि ब्लास्ट के 5 मिनट बाद की 6.25। साथ ही ऐसा करते हुए इनको लगता था कि पुलिस हो या स्थानीय लोग इन्हें मीडिया का समझेंगे कोई भी हाथ नहीं लगाएगा। इसके अलावा और क्या सबूत दें। और लीजिए सबूत। ये सब फोटो और वीडियो सीडी और मेल के साथ एटैच करके भेजी जाती थीं। देखिए हमने कितने अच्छे ढ़ंग से काम को अंजाम दिया है। कई-कई सिम और ब्लास्ट के बाद और पहले भी एक ही सिम पर कॉल किया गया।
जैसे ही पुलिस को टिप मिली थी इन लड़कों के बारे में जो कि एल-18 में रहते हैं तो उस दिन से ही इनका फोन सर्विलांस पर लग चुका था। पुलिस ने इनकी बातें सुनीं। इनके कारगुजारियों के किस्से भी सुने। लेकिन कभी भी बातचीत में इन्होंने हथियार के बार में जिक्र नहीं किया। ये ही कारण था कि स्व. इस्पेक्टर शर्मा बिना किसी लाइफ गार्ड के दरवाजा खटखटाने चले गए।
सब ये सोच जरूर रहे होंगे कि शकील, जिया और साकिब रो क्यों रहे थे। पुलिस की मार से या क्या कारण था। स्पेशल सेल ने उनको अहमदाबाद ब्लास्ट और बैंगलोर ब्लास्ट के साथ-साथ दिल्ली के दर्द की तस्वीरें भी दिखाईं हैं। इन तस्वीरों को देख कर वो अपने को माफ नहीं कर पा रहे हैं। अब वो बताते हैं कि उन्हें तो मुंबई के दंगों, बाबरी मस्जिद, गोधरा के दंगों की तस्वीरें दिखाई हैं। बोला गया उनको तकरीरें दी गईं हैं और कई न्यूज चैनलों की वो स्टोरी दिखाई गईं हैं जो कि ब्लास्ट के बाद किसी मुस्लिम परिवार पर कवर की गईं थी। वो बताते हैं कि हमें तो कभी रॉ सामान नहीं मिलता था। हम से कहा जाता कि ये सामान वहां रखकर आ जाना है। सिर्फ रखने का झंझट रहता था और वो भी पहले से ही तयशुदा रहता था कि कैसे-क्या करना हैं।
आधा सच जानकर ना जाने ये नौजवान क्यों बहक जाते हैं। पूर्ण सच की तलाश कठिन तो होती है पर नामुमकिन नहीं। लेकिन सच सच ही होता है उसमें से ना घटाया जा सकता है और ना ही उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद कुछ सच और सामने आएंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, September 22, 2008

आतंक का अड्डा आजमगढ़

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ का मैंने पहले कई बार नाम राजनीति के धुरंधरों के कारण सुना तो था पर इस जगह को ठीक तरह से जानता नहीं था। थोड़े समय बाद फिर दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम और फिर अबू सलेम जैसे गुंडों और अंडरवर्ल्ड डॉन के कारनामों के कारण इस जगह को जानने लग गया। वाराणसी, गोरखपुर, जयपुर, बैंगलोर, अहमदाबाद, और फिर दिल्ली को दहलाने के बाद इस जगह का बार-बार जिक्र होता रहता था। कभी कोई हथियार या फिर आरडीएक्स के चक्कर में पकड़ा जाता तो फिर इस जगह का जिक्र हो ही जाता था।
दिल्ली में 13 सितंबर को हुए धमाकों में पकड़े गए लोगों के रिश्ते आजमगढ़ से मिले। चाहे वो आतिफ हो या फिर जिया-उर्र-रहमान या फिर शाकिब निसार। तीनों आतंक के गढ़ आजमगढ के निकले। यदि गौर करें तो ये जगह अब वाकई आतंक का अड्डा बनते जा रही है। इसके पीछे जो कारण है वो साफ है, यहां की राजनीति, युवाओं में जल्दी ही अबू सलेम जैसा अमीर बनने की चाह और साथ ही यहां के बदमाशों तक पुलिस की ढीली पहुंच या यूं कहें कि कानून का लिजलिजा पन। साथ ही यहां के युवाओं के अंदर यहां से बने डॉन की हीरो जैसी छवि। अबू सलेम ने अपने घर सरायमीर में एक शानदार कोठी बनवाई जबकि कुछ साल पहले तक उसकी हैसियत बिल्कुल मामूली थी। सलेम को मिला मोनिका का साथ और विदेश में रहने का मौका। कुछ वक्त बाद ही यहां के युवक चल पड़े अबू सलेम बनने और मुंबई पहुंचकर किसी गिरोह में शामिल होकर या तो आपसी रंजिश में मर गए या फिर शूटर बन गए और फिर पुलिस या फिर किसी डॉन के गुर्गे की गोली का शिकार बन गए। यहां से ही मुंबई में ब्लैक फ्राइडे को अंजाम देने वालों की लिस्ट सबसे ज्यादा थी। मुंबई या देश के बाहर से चल रहा हवाला कारोबार, हथियारों का जखीरा, ड्रग्स का फुलप्रुफ मार्केट बन चुका है। यहीं से दाऊद को गुर्गों की फौज भेजी जाती है साथ ही इंडियन मुजाहिद्दीन और सिमी को हाथ और हथियार।
आजमगढ़ से सिमी का रिश्ता भी बहुत ही पुराना है। सिमी का संगठन ख़ड़ा करने वाला शाहिद बद्र फलाही भी आजमगढ़ का ही था। टाडा के तहत भारत में पहली गिरफ्तारी भी यहीं से ही हुई थी। अबू हाशिम को इसी अड्डे से ही पकड़ा गया था। चंद रोज अहमदाबाद ब्लास्ट का मास्टरमाइंड अबू बशर भी तो यहीं का ही है। सिमी का ख़ौफनाक चेहरा यहां के युवकों को आतंकी वारदातों के लिए तैयार करता है। ये संगठन यहां के लोगों के दिमाग में हमेशा ही जहर भरता रहा है। साथ ही शाहिद बद्र फलाही ने जो सिमी की नीव रखी उस आगे बढ़ाते हुए अबू बशर ने नौजवानों में वो जहर भरा कि आज पूरा देश उस की चपेट में आ गया है।
वैसे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की राजनीति भी यहीं से चलती है। मायावती को जैसे ही पता चला कि आजमगढ़ पर स्पेशल सेल का कहर बरस रहा है तो मायावती ने मुलायम सिंह पर मुलायम सा क़हर बरपा दिया। साथ ही माया ने अपनी माया का मायाजाल बुनते हुए केद्र पर भी निशाना साधा। पर कहर बरपा तो मुलायम पर था पर आग हमेशा की तरह उनके सेनापति अमर सिंह को लगी। फिर शुरू हुआ गंदी राजनीति का दौर। नहीं तुम्हारे शासन में गुंडे ज्यादा फले फूले, नहीं तुमने उन्हें शय दे रखी है। आजमगढ़ पर राजनीति शुरू होगई पर किसी ने ये नहीं सोचा कि जो हुआ सो हुआ अब तो युवाओं की फौज को बचा लो। वरना ये होता रहेगा कि बाप तो राजनेता और बेटा उनसे भी दो कदम आगे आतंकवादी। एल 18 से पकड़े सैफ के पिता समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे हैं। क्या ये राजनीति के सौदागर राजनेता उन युवकों को सहारा देने का काम करेंगे जो राह भटक गए हैं? यूपी, पंजाब और कश्मीर ना ही बने तो बेहतर।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”