आखिरकार दो दिन के इंतजार के बाद हमारे कंप्यूटर के डॉक्टर साहब आए और फिर आते ही बेचारे को इंजेक्शन। पर इस बार एक ही इंजेक्शन में ठीक। जो 1 जीबी की रैम लगाई गई थी उसमें ही प्रोब्लम थी। जैसे ही बदली गई रैम कंप्यूटर जी दुरुस्त। बहरहाल, इस बीच कुछ मुद्दे ऐसे उठे जिन पर लिखने की काफी इच्छा कर रही थी। साथ ही वो मुद्दे ऐसे थे जिनको मैं अपने ब्लॉग पर सहेजना जरूर चाहूंगा। क्योंकि उनमें से कुछ घटनाएं ऐसी थी जो शायद कभी दोबारा नहीं होंगी।
शाहरुख को अमेरिका में एक एयरपोर्ट पर करीब दो घंटे तक रोके रखा गया, जसवंत सिंह की किताब पर बवाल, खेमों में बंटी बीजेपी, मोदी ने जसवंत की किताब पर लगाया बैन पर दूसरे बीजेपी शासित राज्यों के सीएम ने किया इनकार, बीजेपी से निकाले गए जसवंत सिंह और सुध्रींद्र कुलकर्णी, और वहीं दूसरी तरफ किताब पर अरुण शौरी के तीखे तेवर, अब यशवंत सिन्हा का भी आडवाणी पर निशाना। वसुंधरा राजे का नया मोर्चा, खेल की खबरों में ऐशेज में ऑस्ट्रेलिया हारा और खिसका चौथी रैंक पर वहीं भारत दूसरी पायदान पर, ओलंपियन और ब्रान्ज मेडलिस्ट मुक्केबाज विजेंद्र कुमार वर्ल्ड के दूसरे नंबर के बॉक्सर बन गए और ऐसी ही बहुत सी खबरें थीं जिनपर लिखना चाहते हुए भी मैं लिख नहीं पाया था।
सबसे पहले बात शाहरुख खान की।
बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान आजादी के दिन एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए यूएस जाते हैं और वहां पर किंग खान को दो घंटे तक रोक कर पूछताछ की जाती है। बकौल शाहरुख उनसे पूछताछ उनके नाम में जुड़े ‘खान’ के कारण की गई। वहां शाहरुख के साथ ऐसा हुआ यहां देश में लोग आगबबूला हो गए। अंबिका सोनी ने तो यहां तक कह दिया कि अमेरिकन सेलिब्रिटिज जब भारत आएं तो उनके साथ भी ऐसा ही बर्ताव हो। पर वहीं सलमान खान सामने आए और फिर शुरू हुई खान वॉर। सल्लू ने कहा ये तो होता ही रहता है इसमें कोई नई बात नहीं है। पर अब उसी फजीहत से बचने के लिए सल्लू आने वाली फिल्म ‘वॉन्टेड’ के प्रमोशन के लिए अमेरिका नहीं जा रहे हैं।
शाहरुख ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सब सवालों के जवाब भी दिए। जब ये बात सामने आई तो शाहरुख ने कहा कि नेवार्क एयरपोर्ट के अधिकारियों का रवैया ठीक नहीं था पर जो हुआ सो हुआ अब इस बात को तूल नहीं देना चाहिए। फिर पहले तूल क्यों दिया गया? इस पर एस पी महासचिव और अमिताभ बच्चन के मुंह बोले भाई अमर सिंह बीच में कूद पड़े और कहा कि ये तो आने वाली फिल्म को लेकर शाहरुख खान का पब्लिसिटि स्टेंट है।
बीजेपी में किताब पर कलह।
शिमला में बीजेपी की चिंतन बैठक से पहले जसवंत की लिखी किताब पर उठी चिंता को दूर किया गया और उन्हें निष्कासित कर दिया गया। 30 साल की बफादारी एक फोन पर ही खत्म कर दी गई। आज तक भारतीय इतिहास में हम ये पढ़ते आए हैं कि भारत को आजादी महात्मा गांधी ने दिलवाई। आजादी में योगदान पंडित नेहरू और सरदार पटेल ने देश को एकजुट किया पर ये हमारे हीरो हैं। साथ ही जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग की और आजादी के साथ विभाजन के दर्द का विलेन उन्हें माना गया। पर जिन्ना को हीरो और पंडित नेहरू और सरदार मोदी को विलेन के कठघरे में लाकर जसवंत सिंह ने खड़ा कर दिया। यहीं से बवाल की शुरूआत हुई। मोदी ने किताब में सरदार पटेल के बारे में गलत लिखने पर गुजरात में बैन कर दिया। वहीं कुछ और बीजेपी शासित राज्यों में बैन नहीं लगाया गया। और ये टकराव सामने आया जो कि मोदी के खिलाफ खड़ा नजर आया। सुध्रींद्र कुलकर्णी को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। किताब और कई मुद्दों पर अरुण शौरी ने पार्टी नेतृत्व पर निशाना साधा और संघ को अपना चाबुक चलाने के लिए कहा।
जसवंत सिंह ने हाल ही में कहा था कि उन्होंने आडवाणी को बचाया। उसी बात को ब्रजेश मिश्र और यशवंत सिन्हा दोनों ने आगे बढ़ाया। वहीं राजनाथ और आडवाणी के फरमान को दरकिनार करते हुए वसुंधरा राजे आज भी पद पर कायम हैं। कुछ भी हो आगे आने वाले दिनों में संघ का प्रभुत्व बीजेपी पर भारी पड़ेगा। जैसे कि पहले हुआ करता था। अभी जल्द ही कुछ और फेरबदल देखने को मिल सकता है।
नाक कट गई ऑस्ट्रेलिया की
इंग्लैंड से एशेज सीरीज 2-1 से हारकर ऑस्ट्रेलिया चौथे नंबर पर पहुंच गया। टेस्ट रैंकिंग में वो कभी चौथे पायदान पर लुढ़क जाएगा शायद ऐसा कभी ऑस्ट्रेलिया ने नहीं सोचा होगा। ये इतिहास में पहली बार हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया के एक ही कप्तान ने दो बार अपने कार्यकाल में एशेज गंवाई हो। 2005 के बाद 2009 ने ऑस्ट्रेलिया की शर्मनाक हार हुई। वहीं इंग्लैंड के ऑलराउंडर एंड्रयू फ्लिंटॉफ को उनकी टीम ने एक खूबसूरत विदाई दी। विवादित खिलाड़ी फ्लिंटॉफ को हम भारतीय तो युवराज के कारण ही याद रखेंगे जब कि 20-20 में युवी से फ्लिंटॉफ नहीं भिड़े होते तो ब्रोड को युवी 6 छक्के नहीं मार पाते।
डीडीसीए में जिस्मफरोशी
सहवाग के इल्जामों की झड़ी अभी रुकी नहीं थी कि कीर्ती आजाद ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि दिल्ली के क्रिकेट में लड़कियां सप्लाई की जाती है। मतलब साफ था कि यदि किसी खिलाड़ी को चुना जाना है तो उसे कीमत अदा करनी होगी और वो कीमत लड़की के रूप में देनी होगी। युवराज ने भी आरोप लगाए कि उनके साथ भी छोटे स्तर पर भेदभाव हो चुका है और ये सब उनको सहना पड़ा है। पर ये पता नहीं कहा तक सच है क्योंकि योगराज के बेटे के साथ यदि नाइंसाफी हो सकती है तो फिर किसी के साथ भी हो सकती है।
कुछ और खबरों के अलावा ये वो खबरें थीं जिन पर मैं लिख नहीं सका पर हां इतिहास के पन्नों को फिर से पलट कर देखने की इच्छा हो उठी क्योंकि कुछ बातें तो जसवंत सिंह ने सही कहीं हैं पर मैं उनकी हर बात से इत्तेफाक नहीं रखता। मैंने इसके पीछे काफी रिसर्च की है। जिन्ना यदि इतने ही सेकुलर थे या फिर इतने ही बड़े आजादी के नेता थे तो कहीं पर भी उनका जिक्र क्यों नहीं आता। क्यों सिर्फ पाकिस्तान में ही वो जाने जाते हैं। क्यों 1927 के बाद ही उनकी तरफ से ये पहल हुई कि मुस्लमानों के लिए एक अलग राष्ट्र होना चाहिए थे। सुभाष चंद्र बोस क्या बंगालियों के लिए लड़ रहे थे। इतिहासकार कहते हैं कि यदि बोस गायब नहीं हुए होते तो शायद भारत 1945 में ही आजाद हो गया होता। तो जिन्ना को हीरो बनाने के पीछे क्या कारण है। और सबसे बड़ा सवाल जिन्ना के दादा हिंदू थे फिर भी हिंद राष्ट्र से क्यों जलन थी जिन्ना को। कौन थे ये कायदे आजम। भारत के इतिहास के पन्नों पर लिखी आजादी के वो अनछपे पन्नों के बारे में लिखने की कोशिश में।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
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Friday, August 28, 2009
Sunday, July 19, 2009
अंग्रेजों की नीति अपना रहा है अमेरिका, भारत-पाक को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है।
किसी भी देश का कोई प्रतिनिधि यदि किसी देश का दौरा करता है तो सबसे पहले माना ये जाता है कि दोनों देशों के बीच संबंध मधुर होंगे और साथ ही कुछ नई राह खुलेंगी। कुछ समझौतों भी हो सकते हैं साथ ही कुछ नए प्रोजेक्ट पर भी चर्चा होगी। और यदि वो देश आतंकवाद का शिकार रहा है तो फिर आतंक से निपटने की बात भी होगी।
जब अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत के दौरे पर मुंबई पहुंची तो लगा कि भारत-अमेरीका के रिश्तों में ये एक अच्छी शुरूआत होगी। अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति के पद से चूक चुकीं हिलेरी ने भारत में आकर रिश्तों को आगे तो बढ़ाया पर इस रिश्ते पर सवाल भी खड़ा कर दिया।
हिलेरी क्लिंटन ने मुंबई में 26/11 आतंकवादी हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी साथ ही उसकी तुलना अमेरिका में हुए 9/11 हमलों से कर दी। ताज होटल के कर्मचारियों के जज्बे की तारीफ और बहादुरी की तारीफ की “....मैं आपके जज्बे को सैल्यूट करती हूं...मैं सलाम करती हूं मुंबई के साहस को ...”। हिलेरी वहां मौजूद थी जहां आंतकवादियों ने क़हर बरपाया था। ताज होटल की लॉबी में वो उस जगह पर मौजूद थीं, जहां 26/11 की याद में 'ट्री ऑफ लाइफ' बनाया गया था।
एक तरफ तो हिलेरी ने देशवासियों को ये याद दिला दिया कि अमेरिका भारत के साथ है आतंकवाद की लड़ाई में। पर दूसरी तरफ ट्री ऑफ लाइफ के पास खड़ीं हिलेरी ने पाकिस्तान की तारीफ में कसीदे भी पढ़ दिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी आतंकवाद को खत्म करने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ वो यहीं पर नहीं रुकी उन्होंने ये भी कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठा रहा है। यहां इस बात का हवाला देने का क्या मतलब। क्या वो यहां पर पाक की पैरोकार बन कर आईं हैं। शायद नहीं क्योंकि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कह दिया था कि वो सिर्फ भारत-अमेरिका के रिश्तों पर ही बात करेंगी। तो फिर पाकिस्तान की तारीफ करने का क्या मतलब? या वो भारत में अमेरिका का स्टेंड साफ कर रहीं थी कि अमेरिका क्या सोचता है?
हाल ही में जरदारी ने कहा था कि अमेरिका पर 9/11 हमलों के बाद पाकिस्तान के लिए ही पाक टुकड़ों पर पलने वाले आतंकवादी खतरे का सबब बन चुके हैं। हिलेरी जी को शायद ये नहीं पता कि पाकिस्तान भारत सियालकोट सीमा पर अपने बंकर खड़े कर रहा है। यदि अफ्गानिस्तान का मामला या यूं कहें कि गृह युद्ध की नौबत नहीं होती स्वात, बलुचिस्तान, लाहौर में तो पाकिस्तान अपनी सीमा से सेना कम नहीं करता।
इस सब बातों को देखकर लगता है कि अमेरिका फिर दोतरफा चाल चल रहा है। एक तरफ तो भारत के साथ मिलकर आतंकवाद खत्म करने की बात कर रहा है वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान को भी क्लीन चिट देने में लगा हुआ है। इस कूटनीति को भारत को समझना चाहिए और हो सके तो कुछ मुद्दों पर अमेरिका का हस्ताक्षेप बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।
आपका अपना
नीतीश राज
जब अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत के दौरे पर मुंबई पहुंची तो लगा कि भारत-अमेरीका के रिश्तों में ये एक अच्छी शुरूआत होगी। अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति के पद से चूक चुकीं हिलेरी ने भारत में आकर रिश्तों को आगे तो बढ़ाया पर इस रिश्ते पर सवाल भी खड़ा कर दिया।
हिलेरी क्लिंटन ने मुंबई में 26/11 आतंकवादी हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी साथ ही उसकी तुलना अमेरिका में हुए 9/11 हमलों से कर दी। ताज होटल के कर्मचारियों के जज्बे की तारीफ और बहादुरी की तारीफ की “....मैं आपके जज्बे को सैल्यूट करती हूं...मैं सलाम करती हूं मुंबई के साहस को ...”। हिलेरी वहां मौजूद थी जहां आंतकवादियों ने क़हर बरपाया था। ताज होटल की लॉबी में वो उस जगह पर मौजूद थीं, जहां 26/11 की याद में 'ट्री ऑफ लाइफ' बनाया गया था।
एक तरफ तो हिलेरी ने देशवासियों को ये याद दिला दिया कि अमेरिका भारत के साथ है आतंकवाद की लड़ाई में। पर दूसरी तरफ ट्री ऑफ लाइफ के पास खड़ीं हिलेरी ने पाकिस्तान की तारीफ में कसीदे भी पढ़ दिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी आतंकवाद को खत्म करने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ वो यहीं पर नहीं रुकी उन्होंने ये भी कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठा रहा है। यहां इस बात का हवाला देने का क्या मतलब। क्या वो यहां पर पाक की पैरोकार बन कर आईं हैं। शायद नहीं क्योंकि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कह दिया था कि वो सिर्फ भारत-अमेरिका के रिश्तों पर ही बात करेंगी। तो फिर पाकिस्तान की तारीफ करने का क्या मतलब? या वो भारत में अमेरिका का स्टेंड साफ कर रहीं थी कि अमेरिका क्या सोचता है?
हाल ही में जरदारी ने कहा था कि अमेरिका पर 9/11 हमलों के बाद पाकिस्तान के लिए ही पाक टुकड़ों पर पलने वाले आतंकवादी खतरे का सबब बन चुके हैं। हिलेरी जी को शायद ये नहीं पता कि पाकिस्तान भारत सियालकोट सीमा पर अपने बंकर खड़े कर रहा है। यदि अफ्गानिस्तान का मामला या यूं कहें कि गृह युद्ध की नौबत नहीं होती स्वात, बलुचिस्तान, लाहौर में तो पाकिस्तान अपनी सीमा से सेना कम नहीं करता।
इस सब बातों को देखकर लगता है कि अमेरिका फिर दोतरफा चाल चल रहा है। एक तरफ तो भारत के साथ मिलकर आतंकवाद खत्म करने की बात कर रहा है वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान को भी क्लीन चिट देने में लगा हुआ है। इस कूटनीति को भारत को समझना चाहिए और हो सके तो कुछ मुद्दों पर अमेरिका का हस्ताक्षेप बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।
आपका अपना
नीतीश राज
Saturday, October 4, 2008
‘प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री अब तो जागो या आदत पड़ चुकी है फरियाद पर ही जागोगे’
क्या आपको पता है पीएम मनमोहन सिंह साहब और रक्षा मंत्री ए के एंटनी, की परिवार का कोई सदस्य यदि बंधक हो तो परिवार वालों पर क्या बीतती है। 19 दिन के बाद भी परिवार वालों की सुध लेने वाला सरकार की तरफ से कोई नहीं है। सिर्फ और सिर्फ आश्वासनों का दौर चल रहा है। हम अभी कार्रवाई कर रहे हैं, जल्द ही नतीजा आपके सामने होगा। अरे, क्या कार्रवाई कर रहे हैं, कब तक होगी कार्रवाई क्या आप बता सकते हैं। एक्शन लेने तक से तो आप डरते हैं। दूसरे देश अपनी नौसेना भेज रहे हैं। हमारे देश की नौसेना कह रही है कि वो बंधकों को रिहा करवाना चाहती है तो फिर कोई भी निर्णय लेने में हमारे देश की सरकार क्यों घबरा रही है। क्यो पीछे हट रहे हैं हम। अमेरिकी नौसेना वहां पर मौजूद है साथ ही रूस की तरफ से भी मदद दी जा रही है। रूस की नौसेना की टुकड़ी जिसमें कि तकरीबन 200 क्रू मैंबर हैं पहुंचने वाले हैं। यूक्रेन का भी एक जहाज इसी इलाके में बंधक खड़ा हुआ है जिसपर की अमेरिका आंखें गड़ाए बैठा है साथ ही इसमें रूस के लोग भी बंधक बने हुए हैं। जब दो देश की सेना वहां पहुंची हुई है तो फिर आप को क्या चिंता सता रही है। या तो मदद दो या फिर उनसे मदद लो लेकिन यदि अमेरिका या रूस जैसा बनना है तो फिर फैसला तो कुछ कड़ा ही लेना होगा क्योंकि कब तक कोई यूं ही हमारी मदद करता रहेगा। माना कि बंधकों में से आपका कोई भी नहीं है पर क्या जिन्होंने बंधक बनाया है वो आपके जान पहचान के हैं जो कि इतने दिन बाद भी इतनी ढिलाई बरती जा रही है।
15 सितंबर को सोमालिया कोस्ट पर एक व्यापारिक ऑयल टैंकर ‘स्टोल्ट वेलोर(Stolt valor)’ को बंधक बनाया गया था। जहाज पर 22 लोग हैं जिसमें से 18 भारतीय हैं। बाकी बचे 4 विदेशी हैं। हमारी सरकार कोई भी ठोस कदम या यूं कहें कि बल प्रयोग करने के पक्ष में नहीं है। रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया है। हमारी सरकार घटना घट जाने के बाद अपने काम में लग चुकी है यानी कि अब नीति बनाई जा रही इन समुद्री लुटेरों से लड़ने के लिए। वाह ! चलो सांप तो निकल गया अब लाठी मारने का काम दिखावे के लिए तो कर लें।
क्या सोमालिया कोस्ट और यमन क्षेत्र के इन समुद्री लुटेरों के बारे में हम नहीं जानते। इनकी क्या रणनीति होती है क्या हमें नहीं पता। ये जहाज भी उड़ाना या डुबाना जानते हैं। इनका क़हर बरपा हुआ है। जनवरी 2008 से लेकर अब तक 55 जहाजों को अगवा कर चुके हैं जिसमें से 11 जहाज अब भी इनके कब्जे में हैं। इन समुद्री लुटेरों ने इस जहाज को छोड़ने के एवज में 6 करोड़ की मांग की है। कई बार तो इन लुटेरों से बातचीत महीने-महीने चल जाती है, नहीं तो कम से कम 30 दिन का समय तो लगता ही है। तब तक क्या होगा इन 22 लोगों का जो कि अभी तक तो सुरक्षित हैं पर क्या आगे भी रह पाएंगे।
Stolt valor भारतीय जहाज नहीं है, इसका रजिस्ट्रेशन हांगकांग में किया गया और मालिक जापानी है। क्रू पूरा भारतीय है तो सोचना तो भारतीय सरकार को ही होगा।सबसे बड़ी अड़चन जो भारत सरकार के सामने आ रही है शायद वो है कि सोमालिया के क्षेत्र में वो ही देश कार्रवाई कर सकता है जिस देश का झंडा उस बंधक जहाज पर लगा हो और उस पर भारत का झंडा नहीं है। ये प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हाल ही में पारित हुआ था। लेकिन हम हाथ पर हाथ धरे उन २२ लोगों को भगवान भरोसे तो नहीं ही छोड़ सकते।
तब से अब तक 19 दिन बीत चुके हैं। परिवार वाले मारे-मारे फिर रहे हैं। मंत्रियों के दर- दर की ठोकरें खा रहे हैं। कैप्टन पी के गोयल की पत्नी सीमा गोयल और साथ में बंधक परिवार के सदस्य भी हर समय कभी इस न्यूज चैनल तो कभी दूसरे, कि सरकार कैसे तो इनकी आवाज़ सुनें, और देश के लोगों तक उनकी आवाज़ पहुंचे, और तभी सरकार कोई कारगर कदम उठाए। साथ ही सीमा गोयल और बंधकों के परिवार वाले १० जनपथ जाकर राहुल गांधी से भी गुहार लगा चुके हैं और साथ ही साउथ ब्लाक भी फरियाद करके आगए हैं। पर क्या हमारी सरकार को परिवार वालों के फरियाद और गुहार करने के बाद ही फैसले के बारे में सोचना होगा। क्यों सरकार सोती रहती है कि जब कोई फरियादी उन तक आएगा तब जाकर सरकार कोई कदम उठाएगी? ऐसा क्यों?
आपका अपना
नीतीश राज
15 सितंबर को सोमालिया कोस्ट पर एक व्यापारिक ऑयल टैंकर ‘स्टोल्ट वेलोर(Stolt valor)’ को बंधक बनाया गया था। जहाज पर 22 लोग हैं जिसमें से 18 भारतीय हैं। बाकी बचे 4 विदेशी हैं। हमारी सरकार कोई भी ठोस कदम या यूं कहें कि बल प्रयोग करने के पक्ष में नहीं है। रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया है। हमारी सरकार घटना घट जाने के बाद अपने काम में लग चुकी है यानी कि अब नीति बनाई जा रही इन समुद्री लुटेरों से लड़ने के लिए। वाह ! चलो सांप तो निकल गया अब लाठी मारने का काम दिखावे के लिए तो कर लें।
क्या सोमालिया कोस्ट और यमन क्षेत्र के इन समुद्री लुटेरों के बारे में हम नहीं जानते। इनकी क्या रणनीति होती है क्या हमें नहीं पता। ये जहाज भी उड़ाना या डुबाना जानते हैं। इनका क़हर बरपा हुआ है। जनवरी 2008 से लेकर अब तक 55 जहाजों को अगवा कर चुके हैं जिसमें से 11 जहाज अब भी इनके कब्जे में हैं। इन समुद्री लुटेरों ने इस जहाज को छोड़ने के एवज में 6 करोड़ की मांग की है। कई बार तो इन लुटेरों से बातचीत महीने-महीने चल जाती है, नहीं तो कम से कम 30 दिन का समय तो लगता ही है। तब तक क्या होगा इन 22 लोगों का जो कि अभी तक तो सुरक्षित हैं पर क्या आगे भी रह पाएंगे।
Stolt valor भारतीय जहाज नहीं है, इसका रजिस्ट्रेशन हांगकांग में किया गया और मालिक जापानी है। क्रू पूरा भारतीय है तो सोचना तो भारतीय सरकार को ही होगा।सबसे बड़ी अड़चन जो भारत सरकार के सामने आ रही है शायद वो है कि सोमालिया के क्षेत्र में वो ही देश कार्रवाई कर सकता है जिस देश का झंडा उस बंधक जहाज पर लगा हो और उस पर भारत का झंडा नहीं है। ये प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हाल ही में पारित हुआ था। लेकिन हम हाथ पर हाथ धरे उन २२ लोगों को भगवान भरोसे तो नहीं ही छोड़ सकते।
तब से अब तक 19 दिन बीत चुके हैं। परिवार वाले मारे-मारे फिर रहे हैं। मंत्रियों के दर- दर की ठोकरें खा रहे हैं। कैप्टन पी के गोयल की पत्नी सीमा गोयल और साथ में बंधक परिवार के सदस्य भी हर समय कभी इस न्यूज चैनल तो कभी दूसरे, कि सरकार कैसे तो इनकी आवाज़ सुनें, और देश के लोगों तक उनकी आवाज़ पहुंचे, और तभी सरकार कोई कारगर कदम उठाए। साथ ही सीमा गोयल और बंधकों के परिवार वाले १० जनपथ जाकर राहुल गांधी से भी गुहार लगा चुके हैं और साथ ही साउथ ब्लाक भी फरियाद करके आगए हैं। पर क्या हमारी सरकार को परिवार वालों के फरियाद और गुहार करने के बाद ही फैसले के बारे में सोचना होगा। क्यों सरकार सोती रहती है कि जब कोई फरियादी उन तक आएगा तब जाकर सरकार कोई कदम उठाएगी? ऐसा क्यों?
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Saturday, September 20, 2008
“I am selling my virginity in 7 Crore”, Want to have me?'
“I am selling my virginity in 7 Crore”, want to have me'. ये सवाल आप के सामने लेकर कोई खड़ा हो जाए तो क्या कहेंगे आप? पहली प्रतिक्रिया ये ही होगी कि क्या 'Virginity' भी बिकने लगी है। जी हां,....इटली की एक मॉडल अपनी Virginity यानी कुंवारेपन को बेचने के लिए तैयार है। वो ये किसी को भी बेच सकती है बशर्ते कि उस की कीमत अदा की जाए। लेकिन उस हसीन ने अपनी कीमत जो लगाई है वो लाखों में नहीं बल्कि करोड़ों में है। यानी की उस को जो 'पाएगा' वो कोई कम अमीर व्यक्ति नहीं होगा। अरबों-खरबों में खेलने वाला ही एक रात के लिए करोड़ों खर्च कर सकता है। ये हसीना इस साल की शुरूआत में इटली के बिग ब्रदर शो में हिस्सा भी ले चुकी हैं। तो ऐसा नहीं है कि ये कोई अन्जान चेहरा है, ये चेहरा मॉडलिंग की दुनिया और छोटे पर्दे का जाना पहचाना चेहरा है।
कुंवारेपन को वो मॉडल अपनी सबसे बड़ी 'पूंजी'
बताती हैं और इस कारण ही उस मॉ़डल का भाई अपनी बहन की इस पूंजी को पाक साफ बताने के लिए अपनी मरी हुई मां की कसम तक खा रहा है।
"She's never had a boyfriend. I swear on my mother's grave. She's a devout Catholic and prays to Padre Pio every night," her brother told the magazine.
वो मॉडल हैं इटली की Showgirl और Men’s magazine की मॉडल Raffella Fico है। Raffella की उम्र महज अभी 20 साल ही है। वैसे विदेशों में माना जाता है कि मॉडलिंग के लिए 20 की उम्र ढलती हुई होजाती है। Raffella ने अपनी Virginity को बेचने के लिए जो कीमत लगाई है वो है 1 मिलियन यूरो। यानी कि भारतीय रुपय में यदि देखें तो 1 यूरो की कीमत है 65 रु.98 पैसे। यानी कि लगभग 7 करोड़।
अब कोई इन कुंवारेपन को बेचने वाली हसीना से पूछे कि वो ऐसा, कर क्यों रही हैं? तो जवाब बिल्कुल ही अटपटा, रोम में एक घर लेना चाहती हैं और साथ ही एक्टिंग सीखने के लिए एक्टिंग क्लास से जुडेंगी। साथ ही ये भी कहना है कि यदि 'ये पहला सेक्स पसंद नहीं आया तो एक ग्लास वाइन पीकर इसे भुला देंगी।'
ऐसा नहीं है कि इस से पहले किसी भी मॉडल ने अपने कुंवारेपन को ‘नीलाम’ नहीं किया हो(मैं तो इसे बेचना ही कहूंगा)। एक 18 साल की अमेरिकी छात्रा ने अपने स्कूल की फीस को भरने के लिए 1 मिलियन डॉलर में पहली बार सेक्स का सौदा किया था। और दूसरा मामला था कि एक पेरू की 18 साल की मॉ़डल ने अपने परिवार के इलाज के लिए ऐसी बात सोची थी।
कहीं मजबूरी तो कहीं वजह ऐश। ये पहली बार है कि किसी ने खुले तौर पर ऐशोअराम के लिए अपने कुंवारेपन को नीलाम करने के बारे में सोचा है। कहीं ऐसा ना होजाए कि इस तरह की सोच रखने वाली मॉडलों को लोग वैश्या समझने लगें। क्या हम इतना गिर गए हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
(नोट--माफी चाहूंगा ऐसी तस्वीर के लिए, लेकिन तस्वीर भी जरूरी थी
साभार: telegraph.co.uk)
कुंवारेपन को वो मॉडल अपनी सबसे बड़ी 'पूंजी'
बताती हैं और इस कारण ही उस मॉ़डल का भाई अपनी बहन की इस पूंजी को पाक साफ बताने के लिए अपनी मरी हुई मां की कसम तक खा रहा है।"She's never had a boyfriend. I swear on my mother's grave. She's a devout Catholic and prays to Padre Pio every night," her brother told the magazine.
वो मॉडल हैं इटली की Showgirl और Men’s magazine की मॉडल Raffella Fico है। Raffella की उम्र महज अभी 20 साल ही है। वैसे विदेशों में माना जाता है कि मॉडलिंग के लिए 20 की उम्र ढलती हुई होजाती है। Raffella ने अपनी Virginity को बेचने के लिए जो कीमत लगाई है वो है 1 मिलियन यूरो। यानी कि भारतीय रुपय में यदि देखें तो 1 यूरो की कीमत है 65 रु.98 पैसे। यानी कि लगभग 7 करोड़।
अब कोई इन कुंवारेपन को बेचने वाली हसीना से पूछे कि वो ऐसा, कर क्यों रही हैं? तो जवाब बिल्कुल ही अटपटा, रोम में एक घर लेना चाहती हैं और साथ ही एक्टिंग सीखने के लिए एक्टिंग क्लास से जुडेंगी। साथ ही ये भी कहना है कि यदि 'ये पहला सेक्स पसंद नहीं आया तो एक ग्लास वाइन पीकर इसे भुला देंगी।'
ऐसा नहीं है कि इस से पहले किसी भी मॉडल ने अपने कुंवारेपन को ‘नीलाम’ नहीं किया हो(मैं तो इसे बेचना ही कहूंगा)। एक 18 साल की अमेरिकी छात्रा ने अपने स्कूल की फीस को भरने के लिए 1 मिलियन डॉलर में पहली बार सेक्स का सौदा किया था। और दूसरा मामला था कि एक पेरू की 18 साल की मॉ़डल ने अपने परिवार के इलाज के लिए ऐसी बात सोची थी।
कहीं मजबूरी तो कहीं वजह ऐश। ये पहली बार है कि किसी ने खुले तौर पर ऐशोअराम के लिए अपने कुंवारेपन को नीलाम करने के बारे में सोचा है। कहीं ऐसा ना होजाए कि इस तरह की सोच रखने वाली मॉडलों को लोग वैश्या समझने लगें। क्या हम इतना गिर गए हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
(नोट--माफी चाहूंगा ऐसी तस्वीर के लिए, लेकिन तस्वीर भी जरूरी थी
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Thursday, September 4, 2008
एक चिट्ठी से सरकारी गलियारे में हलचल
अगर भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका करार से हट सकता है। इस बात की जानकारी
बुश प्रशासन की 9 महीने पुरानी चिट्ठी से हुई है। बुश प्रशासन ने ये चिट्ठी यूएस कांग्रेस को लिखी थी। ये चिट्ठी छपी है अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट में। चिट्ठी में लिखा है कि अगर भारत ने दोबारा परमाणु परिक्षण किया तो अमेरिका करार तोड़ देगा। यदि ऐसा अमेरिका करता है तो फिर भारत के हाथ करार पर इतना आगे बढ़ने के बाद भी खाली ही रहेंगे। ना तो भारत को परमाणु ईंधन मिलेगा और ना ही भारत को परमाणु इंधन को उपयोग करने के लिए तकनीकी मदद।
देश में हलचल तो स्वाभाविक थी। पीएम आवास पर तुरंत कांग्रेस की एक बैठक हुई। और भारत सरकार की तरफ से ये साफ किया गया कि भारत और अमेरिका के बीच हुए परमाणु करार में कोई भी फेरबदल नहीं होगा। परमाणु परीक्षण पर भारत ने खुद ही अपनी तरफ से पाबंदी लगा रखी है। भारत पर इस मामले में कोई भी दबाव नहीं है। भारत अमेरिका के अंदरुनी मामलों में हस्ताक्षेप नहीं करता। पर सवाल उठता है कि यदि इन सब बातों की जानकारी मनमोहन सिंह को थी तो फिर आननफानन में बैठक क्यों बुलाई गई।
क्या इस चिट्ठी में जो भी लिखा है उसकी जानकारी भारत सरकार को थी। मनमोहन सिंह बार-बार ये

कहते रहे है कि इस करार से हमारी स्वतंत्रता पर कोई भी असर नहीं पड़ेगा। इसका मतलब कि भारत के परमाणु कार्यक्रमों पर इस करार का कोई भी असर नहीं पड़ना। जबकि अमेरिकी राजदूत डेविड मलफर्ड का कहना है कि इस चिट्ठी के कंटेंट के बारे में भारत सरकार को पूरी जानकारी है।
यदि ऐसा है तो चिट्ठी में लिखी बातों का असर भारत और अमेरिका के संबंधों पर नहीं पड़ेगा और इस से भारत को घबराने की जरूरत भी नहीं है। बुश प्रशासन या यूं कहें कि अमेरिका को भी इतना आसान नहीं होगा इस करार से पल्ला झाड़ना। खुद अमेरिका इस करार को लेकर इतना आगे आ गया है कि इतनी आसानी से तो वो पीछे हट नहीं सकता।
पर भारत के लिए मुश्किल ये है कि ये चिट्ठी उस वक्त आई है जब कि भारत 45 देशों के न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप याने एनएसजी को परमाणु करार पर राजी कराने में जुटा है। देश में बहुमत मिल जाने से और सरकार बचा लेने से ये साबित नहीं होता कि करार होगया। अभी तो मंजिल बहुत दूर है।
आपका अपना
नीतीश राज
बुश प्रशासन की 9 महीने पुरानी चिट्ठी से हुई है। बुश प्रशासन ने ये चिट्ठी यूएस कांग्रेस को लिखी थी। ये चिट्ठी छपी है अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट में। चिट्ठी में लिखा है कि अगर भारत ने दोबारा परमाणु परिक्षण किया तो अमेरिका करार तोड़ देगा। यदि ऐसा अमेरिका करता है तो फिर भारत के हाथ करार पर इतना आगे बढ़ने के बाद भी खाली ही रहेंगे। ना तो भारत को परमाणु ईंधन मिलेगा और ना ही भारत को परमाणु इंधन को उपयोग करने के लिए तकनीकी मदद।देश में हलचल तो स्वाभाविक थी। पीएम आवास पर तुरंत कांग्रेस की एक बैठक हुई। और भारत सरकार की तरफ से ये साफ किया गया कि भारत और अमेरिका के बीच हुए परमाणु करार में कोई भी फेरबदल नहीं होगा। परमाणु परीक्षण पर भारत ने खुद ही अपनी तरफ से पाबंदी लगा रखी है। भारत पर इस मामले में कोई भी दबाव नहीं है। भारत अमेरिका के अंदरुनी मामलों में हस्ताक्षेप नहीं करता। पर सवाल उठता है कि यदि इन सब बातों की जानकारी मनमोहन सिंह को थी तो फिर आननफानन में बैठक क्यों बुलाई गई।
क्या इस चिट्ठी में जो भी लिखा है उसकी जानकारी भारत सरकार को थी। मनमोहन सिंह बार-बार ये

कहते रहे है कि इस करार से हमारी स्वतंत्रता पर कोई भी असर नहीं पड़ेगा। इसका मतलब कि भारत के परमाणु कार्यक्रमों पर इस करार का कोई भी असर नहीं पड़ना। जबकि अमेरिकी राजदूत डेविड मलफर्ड का कहना है कि इस चिट्ठी के कंटेंट के बारे में भारत सरकार को पूरी जानकारी है।
यदि ऐसा है तो चिट्ठी में लिखी बातों का असर भारत और अमेरिका के संबंधों पर नहीं पड़ेगा और इस से भारत को घबराने की जरूरत भी नहीं है। बुश प्रशासन या यूं कहें कि अमेरिका को भी इतना आसान नहीं होगा इस करार से पल्ला झाड़ना। खुद अमेरिका इस करार को लेकर इतना आगे आ गया है कि इतनी आसानी से तो वो पीछे हट नहीं सकता।
पर भारत के लिए मुश्किल ये है कि ये चिट्ठी उस वक्त आई है जब कि भारत 45 देशों के न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप याने एनएसजी को परमाणु करार पर राजी कराने में जुटा है। देश में बहुमत मिल जाने से और सरकार बचा लेने से ये साबित नहीं होता कि करार होगया। अभी तो मंजिल बहुत दूर है।
आपका अपना
नीतीश राज
फोटो साभार-गूगल
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मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”