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Friday, August 28, 2009

11 दिन के बीते पन्ने

आखिरकार दो दिन के इंतजार के बाद हमारे कंप्यूटर के डॉक्टर साहब आए और फिर आते ही बेचारे को इंजेक्शन। पर इस बार एक ही इंजेक्शन में ठीक। जो 1 जीबी की रैम लगाई गई थी उसमें ही प्रोब्लम थी। जैसे ही बदली गई रैम कंप्यूटर जी दुरुस्त। बहरहाल, इस बीच कुछ मुद्दे ऐसे उठे जिन पर लिखने की काफी इच्छा कर रही थी। साथ ही वो मुद्दे ऐसे थे जिनको मैं अपने ब्लॉग पर सहेजना जरूर चाहूंगा। क्योंकि उनमें से कुछ घटनाएं ऐसी थी जो शायद कभी दोबारा नहीं होंगी।

शाहरुख को अमेरिका में एक एयरपोर्ट पर करीब दो घंटे तक रोके रखा गया, जसवंत सिंह की किताब पर बवाल, खेमों में बंटी बीजेपी, मोदी ने जसवंत की किताब पर लगाया बैन पर दूसरे बीजेपी शासित राज्यों के सीएम ने किया इनकार, बीजेपी से निकाले गए जसवंत सिंह और सुध्रींद्र कुलकर्णी, और वहीं दूसरी तरफ किताब पर अरुण शौरी के तीखे तेवर, अब यशवंत सिन्हा का भी आडवाणी पर निशाना। वसुंधरा राजे का नया मोर्चा, खेल की खबरों में ऐशेज में ऑस्ट्रेलिया हारा और खिसका चौथी रैंक पर वहीं भारत दूसरी पायदान पर, ओलंपियन और ब्रान्ज मेडलिस्ट मुक्केबाज विजेंद्र कुमार वर्ल्ड के दूसरे नंबर के बॉक्सर बन गए और ऐसी ही बहुत सी खबरें थीं जिनपर लिखना चाहते हुए भी मैं लिख नहीं पाया था।

सबसे पहले बात शाहरुख खान की।

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान आजादी के दिन एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए यूएस जाते हैं और वहां पर किंग खान को दो घंटे तक रोक कर पूछताछ की जाती है। बकौल शाहरुख उनसे पूछताछ उनके नाम में जुड़े ‘खान’ के कारण की गई। वहां शाहरुख के साथ ऐसा हुआ यहां देश में लोग आगबबूला हो गए। अंबिका सोनी ने तो यहां तक कह दिया कि अमेरिकन सेलिब्रिटिज जब भारत आएं तो उनके साथ भी ऐसा ही बर्ताव हो। पर वहीं सलमान खान सामने आए और फिर शुरू हुई खान वॉर। सल्लू ने कहा ये तो होता ही रहता है इसमें कोई नई बात नहीं है। पर अब उसी फजीहत से बचने के लिए सल्लू आने वाली फिल्म ‘वॉन्टेड’ के प्रमोशन के लिए अमेरिका नहीं जा रहे हैं।

शाहरुख ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सब सवालों के जवाब भी दिए। जब ये बात सामने आई तो शाहरुख ने कहा कि नेवार्क एयरपोर्ट के अधिकारियों का रवैया ठीक नहीं था पर जो हुआ सो हुआ अब इस बात को तूल नहीं देना चाहिए। फिर पहले तूल क्यों दिया गया? इस पर एस पी महासचिव और अमिताभ बच्चन के मुंह बोले भाई अमर सिंह बीच में कूद पड़े और कहा कि ये तो आने वाली फिल्म को लेकर शाहरुख खान का पब्लिसिटि स्टेंट है।

बीजेपी में किताब पर कलह।

शिमला में बीजेपी की चिंतन बैठक से पहले जसवंत की लिखी किताब पर उठी चिंता को दूर किया गया और उन्हें निष्कासित कर दिया गया। 30 साल की बफादारी एक फोन पर ही खत्म कर दी गई। आज तक भारतीय इतिहास में हम ये पढ़ते आए हैं कि भारत को आजादी महात्मा गांधी ने दिलवाई। आजादी में योगदान पंडित नेहरू और सरदार पटेल ने देश को एकजुट किया पर ये हमारे हीरो हैं। साथ ही जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग की और आजादी के साथ विभाजन के दर्द का विलेन उन्हें माना गया। पर जिन्ना को हीरो और पंडित नेहरू और सरदार मोदी को विलेन के कठघरे में लाकर जसवंत सिंह ने खड़ा कर दिया। यहीं से बवाल की शुरूआत हुई। मोदी ने किताब में सरदार पटेल के बारे में गलत लिखने पर गुजरात में बैन कर दिया। वहीं कुछ और बीजेपी शासित राज्यों में बैन नहीं लगाया गया। और ये टकराव सामने आया जो कि मोदी के खिलाफ खड़ा नजर आया। सुध्रींद्र कुलकर्णी को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। किताब और कई मुद्दों पर अरुण शौरी ने पार्टी नेतृत्व पर निशाना साधा और संघ को अपना चाबुक चलाने के लिए कहा।

जसवंत सिंह ने हाल ही में कहा था कि उन्होंने आडवाणी को बचाया। उसी बात को ब्रजेश मिश्र और यशवंत सिन्हा दोनों ने आगे बढ़ाया। वहीं राजनाथ और आडवाणी के फरमान को दरकिनार करते हुए वसुंधरा राजे आज भी पद पर कायम हैं। कुछ भी हो आगे आने वाले दिनों में संघ का प्रभुत्व बीजेपी पर भारी पड़ेगा। जैसे कि पहले हुआ करता था। अभी जल्द ही कुछ और फेरबदल देखने को मिल सकता है।

नाक कट गई ऑस्ट्रेलिया की

इंग्लैंड से एशेज सीरीज 2-1 से हारकर ऑस्ट्रेलिया चौथे नंबर पर पहुंच गया। टेस्ट रैंकिंग में वो कभी चौथे पायदान पर लुढ़क जाएगा शायद ऐसा कभी ऑस्ट्रेलिया ने नहीं सोचा होगा। ये इतिहास में पहली बार हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया के एक ही कप्तान ने दो बार अपने कार्यकाल में एशेज गंवाई हो। 2005 के बाद 2009 ने ऑस्ट्रेलिया की शर्मनाक हार हुई। वहीं इंग्लैंड के ऑलराउंडर एंड्रयू फ्लिंटॉफ को उनकी टीम ने एक खूबसूरत विदाई दी। विवादित खिलाड़ी फ्लिंटॉफ को हम भारतीय तो युवराज के कारण ही याद रखेंगे जब कि 20-20 में युवी से फ्लिंटॉफ नहीं भिड़े होते तो ब्रोड को युवी 6 छक्के नहीं मार पाते।

डीडीसीए में जिस्मफरोशी

सहवाग के इल्जामों की झड़ी अभी रुकी नहीं थी कि कीर्ती आजाद ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि दिल्ली के क्रिकेट में लड़कियां सप्लाई की जाती है। मतलब साफ था कि यदि किसी खिलाड़ी को चुना जाना है तो उसे कीमत अदा करनी होगी और वो कीमत लड़की के रूप में देनी होगी। युवराज ने भी आरोप लगाए कि उनके साथ भी छोटे स्तर पर भेदभाव हो चुका है और ये सब उनको सहना पड़ा है। पर ये पता नहीं कहा तक सच है क्योंकि योगराज के बेटे के साथ यदि नाइंसाफी हो सकती है तो फिर किसी के साथ भी हो सकती है।

कुछ और खबरों के अलावा ये वो खबरें थीं जिन पर मैं लिख नहीं सका पर हां इतिहास के पन्नों को फिर से पलट कर देखने की इच्छा हो उठी क्योंकि कुछ बातें तो जसवंत सिंह ने सही कहीं हैं पर मैं उनकी हर बात से इत्तेफाक नहीं रखता। मैंने इसके पीछे काफी रिसर्च की है। जिन्ना यदि इतने ही सेकुलर थे या फिर इतने ही बड़े आजादी के नेता थे तो कहीं पर भी उनका जिक्र क्यों नहीं आता। क्यों सिर्फ पाकिस्तान में ही वो जाने जाते हैं। क्यों 1927 के बाद ही उनकी तरफ से ये पहल हुई कि मुस्लमानों के लिए एक अलग राष्ट्र होना चाहिए थे। सुभाष चंद्र बोस क्या बंगालियों के लिए लड़ रहे थे। इतिहासकार कहते हैं कि यदि बोस गायब नहीं हुए होते तो शायद भारत 1945 में ही आजाद हो गया होता। तो जिन्ना को हीरो बनाने के पीछे क्या कारण है। और सबसे बड़ा सवाल जिन्ना के दादा हिंदू थे फिर भी हिंद राष्ट्र से क्यों जलन थी जिन्ना को। कौन थे ये कायदे आजम। भारत के इतिहास के पन्नों पर लिखी आजादी के वो अनछपे पन्नों के बारे में लिखने की कोशिश में।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 11, 2009

नस्लवाद तो कहीं है पर क्या कोई तुम्हारे घर के सामने पे... करेगा तो तुम चुप बैठोगे?

कहीं और ले गई। समय का चक्र दोनों की जिंदगी के साथ चलता रहा और फिर समय की हवा ने उन दो जिंदगियों को जवानी की दहलीज पर एक बार फिर एक ही शहर में लाकर खड़ा कर दिया। पर वो तो हवा का झौंका था एक को शहर के इस कोने और दूसरे को शहर के दूसरे कोने पर फेंक दिया। फिर समय ही दोनों को वापिस एक छत के नीचे लेकर आया और तब से लेकर आजतक दस साल पीछे मुड़ कर दोनों ने नहीं देखा। पहले से ही वो मेरे बहुत करीब था, दोस्त था पर कब भाई बन गया पता ही नहीं चला।

कल उसका फोन आया कि उसका जाना तय हो गया है। फोन पर ही पता चल रहा था कि वो बहुत खुश है। मैंने मुबारकबाद दी और पूछा कि मियां, आखिर जा कहां रहे हो? उसने बोला जिसकी तैयारी मैं इतने समय से कर रहा था। मैंने सोचा कि जो ये विदेश जाने की तैयारी कर रहा था लगता है कि इसको बाहर नौकरी मिल गई है। उसने बताया कि नतीजा आ गया है और अगले महीने की 10 तारीख को वो 'मेलबर्न' जा रहा है। वहां की यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो गया है और करीब एक साल का कोर्स है।

चिंता तो अब शुरू होती थी। मैंने पूछा कि क्यों जा रहा है वहां अभी तो सिचुएशन वैसे भी बड़ी टेंस है? आए दिन देख और सुन रहे हैं कि नस्लवाद के जहर के कारण कोई ना कोई भारतीय वहां पर पिट रहा है। कभी किसी का सामान छीन लिया जाता है तो कभी किसी की गाड़ी फूंक दी जा रही है। घर में भी घुसकर वो लोग मारपीट कर रहे हैं। जिसका भी मन चल रहा है किसी को भी पीटने लग रहा है। कोई पीट रहा है तो दूसरे जो जानते भी नहीं हैं वो भी पटीने लग जाते हैं। साथ ही पुलिस और सरकार का रवैया भी संतोषजनक नहीं है।

कई तर्क उसने मुझे दिए और उन तर्कों के बीच कई जवाब। उसने कहा कि क्या यहां पर अपने देश में ऐसा नहीं हो रहा है? तो मेरा जवाब था कि यहां नस्लभेद के कारण ऐसा नहीं हो रहा है। वो बोला, हर जगह पर लूटपाट की वारदातें होती हैं लेकिन यदि कोई तुम से तुम्हारा सामान छीनने लगे तो क्या तुम यूं ही दे दोगे। नहीं। पर वहां पर भारतीय यहां से कैसे-कैसे करके तो जा रहे हैं उस पर कोई सामान छीनने लगे तो मारपीट तो होनी ही है। वहां के गुंडे कुछ भारी पड़ रहे हैं अब सरकार भी कह रही है कि वो सुरक्षा देगी भारतीयों को। ऑस्ट्रेलिया के स्टूडेंट को लगता है कि भारतीय कहीं कम पैसों में वो काम कर लेते हैं जो कि वो इतने कम पैसों में नहीं करते। जैसे कि दिल्ली में बिहारी कम पैसों पर काम करके उत्तरप्रदेश, हिमाचली और दिल्ली के लोगों के दुश्मन बने हुए हैं। भारतीय वहां पर कम पैसों पर काम करते हैं और वहां की नागरिकता लेकर वहीं ठहर जाते हैं, जैसे कि मुंबई में राज ठाकरे ने उठाया था बाहर के लोगों का मुद्दा।

दूसरी बात, जहां पर 4 स्टूडेंट को रहने के लिए जगह दी गई हो वहां पर 10-12 स्टूडेंट रहते हैं, क्यों? जब छड़े रहेंगे तो रात में शोर भी होगा ही, बाहर अंडरवियर में चले आते हैं, कहीं पर खड़े होकर पेशाब करने लग जाते हैं, लड़कियों को देखकर फब्तियां कसते हैं, तो कभी ना कभी वहां के लोगों का गुबार निकलेगा ही ना। उसने मुझ पर ही सवाल दाग दिया कि यदि तुम्हारे घर के पीछे या फिर पार्क में कोई सरेआम 'पेशाब' करने लगे तो क्या करोगे?

ये सब बातें करने के बाद मैं खुद सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या जो ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है वो सही है? जहां तक मैने सोचा या यूं कहूं कि जिस नतीजे पर मैं पहुंचा वो ये था कि चाहे जो भी गलतियां भारतीय वहां पर कर रहे हों पर उस कारण से मारपीट करना वाजिब नहीं है वो गैरकानूनी है। यदि हम अपनी काब्लियत की बदौलत कोई नौकरी पाते हैं और कम पैसों पर काम करने का पैमाना तो सबका अलग-अलग होता है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रति व्यक्ति आय अलग-अलग हैं। हम कम पैसों में भी काम कर सकते हैं आप नहीं कर सकते तो ये आपकी प्रोब्लम है हमारी नहीं। हम उसी डिग्री के लिए ज्यादा खर्च करते हैं जिसे आप काफी कम पैसों पर पा लेते हैं।

वैसे ऑस्ट्रेलिया में सीनियर्स से बात हुई है वो कह रहे हैं कि थोड़ी बहुत दिक्कतें तो आती ही रहतीं थीं पर अब कि बार वो कुछ ज्यादा ही सामने आगईं हैं। कोई डरने की बात नहीं है बाकी ऑस्ट्रेलिया में सब ठीक है। हमारी तो यही दुआ है कि जल्द ही ये नस्लवाद का काला चक्र खत्म हो।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, November 19, 2008

भारत अर्श पर, ऑस्ट्रेलिया फर्श पर, अब इंग्लैंड होगा फर्श पर

भारत की रैंकिंग ऑस्ट्रेलिया को हराने के बाद से बढ़ गई और भारत दूसरे पायदान पर आकर टेस्ट रैंकिंग में खड़ा हो गया। जहां भारत ने 40 मैच खेलते हुए 4659 अंक हासिल किए और रैंकिंग अंक 116 मिले हैं वहीं दूसरी तरफ द.अफ्रीका के भी रैंकिंग अंक 116 ही हैं पर उसके 34 मैचों के साथ 3953 अंक हैं। भारत दूसरे पायदान पर खड़ा हो पाया क्योंकि उसने पहले नंबर पर खड़े घमंडी कंगारुओं को 2-0 से सीरीज में मात दी। वैसे ऑस्ट्रेलिया के 121 अंक हैं और अभी तो खास तौर पर वो पहले पायदान पर आराम से खड़ा हुआ है पर भारत दूसरे पायदान पर कैसे आया ये वाकई एक सफर है खासतौर पर पिछली सीरीज में तो।
ये चमत्कार हुआ है टीम वर्क से, इस बार हम श्रीलंका में हुई सीरीज की तरह दब कर नहीं खेले। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फर्क इतना था कि टीम इंडिया के शेर दहाड़ते हुए दिखे और कंगारू पूरी तरह लाचार।
जहां भारत के गेंदबाज और सलामी बल्लेबाज के साथ-साथ स्पिन का जादू भी चला तो वहीं दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया की पूरी टीम फिसड्डी दिखी। जहां ईशांत शर्मा चार मैचों में 27.06 की औसत और 55.2 की स्ट्राइक रेट के साथ 15 विकेट चटकाकर सबसे कामयाब गेंदबाज रहे, वहीं दूसरी ओर ब्रेट ली 4 मैच में आठ विकेट ही झटक सके। वो भी 61.62 के औसत और 111 के स्ट्राइक रेट से। ली की धार इस बार फीकी रही जबकि जॉनसन ऑस्ट्रेलियाई खेमें से सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले बने रहे जिन्होंने 4 मैच में 13 विकेट लिए। अमित मिश्रा और हरभजन सिंह के जादू ने भी सीरीज़ का पलड़ा भारत की तरफ झुकाने में अहम किरदार निभाया। हरभजन ने 3 मैच में 15 विकेट लेकर ईशांत के साथ रहकर नंबर वन की कुर्सी पर छाए रहे। तो दूसरी तरफ अमित ने 3 मैच में 14 विकेट झटककर कुंबले की कमी को पूरा किया।
यदि हम अब नजर डालें भारतीय बल्लेबाजी पर तो, गौतम गंभीर तीन मैचों में 77.16 के औसत से 463 रन बनाकर अव्वल रहे और दूसरे नंबर पर रहे सचिन 4 मैच में 396 रन बनाए वहीं हसी ने 4 मैच में 394 रन बनाए और मैथ्यू हेडन की हालत पूरी सीरीज में खराब रही।
भारत के गेम प्लान के सामने कंगारुओं का गेमप्लान ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। पूरी सीरीज के दौरान ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में पंटर और ली के बीच की खींचातानी से पन्ने भरे रहे। पंटर की कप्तानी पर दिग्गजों ने सवाल खड़े किए। ये एक ऐसा मौका था जब कि पंटर की सेना पर तीर छोड़े जा रहे थे और वो कुछ कर भी नहीं पा रही थी। ये वर्ल्ड क्रिकेट में भारत की नई उड़ान है ये नंबर वन की कुर्सी की ओर बढ़ा एक मजबूत कदम है ये बदला है, बदला उस टीम से जिसने पिछली बार बेइमानी से भारत को सीरीज़ में हाराया था।
अब इंग्लैंड की बारी है। इंग्लैंड के कप्तान पीटरसन और फ्लिंटॉफ ने सीरीज शुरू होने से पहले कहा था कि पूरी सीरीज में वो भारत के ऊपर हावी रहेंगे। साथ ही सीरीज शुरु होने से पहले अभ्यास मैच में इंग्लैंड ने दो मैच खेले थे और एक जीता था और एक हारा था। दूसरे मैच में इंग्लैंड की पूरी टीम 100 के आंकड़े को भी छू नहीं पाई थी और 98 पर ऑल आउट होगई थी और मैच 124 रन से गवां दिया था। तब पीटरसन ने कहा था कि हम तो यूं ही खेल रहे थे। शायद अब दो मैच के बाद भी लगता तो ये ही है कि वो यूं ही खेल रहे हैं। जहां इंग्लैंड में अखबारों के पन्ने पूरी तरह से भारतीय टीम की तारीफ से अटे पड़े हैं वहीं दूसरी तरफ पीटरसन और उनकी टीम पर बार-बार निशाना साधा जा रहा है।
अब देखना तो ये होगा कि युवराज-गंभीर की आंधी को पीटरसन की सेना कैसे रोक पाएगी। राजकोट, इंदौर और अब कानपुर के ग्रीनपार्क स्टेडियम में ये देखना होगा कि क्या भारत फिर से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा पाएगा जबकि अब तो ईशांत भी पूरी तरह फिट हो चुके हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, November 6, 2008

मेरी नजर से, कुंबले की कुछ चुनिंदा यादें

मेरी नजर से कुंबले की कुछ चुनिंदा यादें हैं जो कि मैं हमेशा ही याद रखना चाहूंगा। वैसे तो हाल ही में मैंने अपने एक आर्टिकल में मोहाली टेस्ट के बाद ही ये कह दिया था कि अब कुंबले को हम भूलने लगे हैं और बेहतर हो कि कुंबले संन्यास ले लें। सारी दुनिया ये जानती है कि वो ढीले फील्डर के रूप में जाने जाते रहे हैं चाहे उन्होंने ६० कैच ही क्यों ना पकड़े हों। अनिल बल्लेबाजी भी कुछ खास नहीं माने जाते रहे, भले ही उन्होंने एक शतक वो भी नाबाद और पांच अर्द्धशतक लगाए हों जबकि वो अंतिम पायदान पर ही आते थे। शुरुआत में गेंदबाजी में विभिन्नता(वैरिएशन) के कारण जाने जाते रहे जबकि वो बॉल उतना घुमा नहीं पाते थे। हां, लेकिन उनकी रफ्तार किसी भी मध्यम तेज गेदबाज की तरह होती थी। कोई भी नहीं कहता था कि ये इंजीनियर कम गेंदबाज इतना सफल हो पाएगा।

चश्मा पहनें वो शांत, गंभीर, लंबा, इंजीनियर लड़का

चश्मा पहने एक लंबा लड़का, जिसकी टांगें उसको एक अलग शख्स के रूप में दिखाती थी। कोई भी ये नहीं कहता कि ये लड़का क्रिकेट की दुनिया में चल भी पाएगा। पर अपने जुझारूपन के कारण उसने अपने करियर की शुरूआत की और फिर जो शुरुआत की तब से कभी पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। इंग्लैंड के खिलाफ ९ अगस्त १९९० में मैनचेस्टर में कुंबले ने अपनी पारी की शुरूआत की। इक्तेफाक देखिए १९९० में पहले ही मैच में कुंबले ने तीन विकेट लिए थे और अपनी आखिरी पारी कोटला में भी उन्होंने तीन विकेट ही लिए। वो मैच भी ड्रॉ हुआ था और ये मैच भी ड्रॉ हुआ। उस समय की टीम में नरेंद्र हिरवानी जैसे दिग्गज हुआ करते थे, जिन्होंने एक मैच में १६ विकेट लेने का करिश्मा दिखाया था, पर गायब कब हुए पता ही नहीं चला। लेकिन धीरे-धीरे इस खिलाड़ी ने टीम में जगह पक्की कर ली, कभी फिलिपर गेंद डालकर तो कभी मीडियम पेसर की रफ्तार से गेंद डालकर।

१९९९ में फिरोजशाह कोटला में कीर्तिमान

स्कोरबोर्ड पर १०१ रन बन चुके थे और एक भी विकेट पाकिस्तान का गिरा नहीं था। प्रसाद और श्रीनाथ दोनों गेंदबाजों को कामयाबी नहीं मिली थी। पहले सत्र में तो सभी गेंदबाजों को अनवर-आफरीदी की जोड़ी ने खूब ठोंका। लेकिन दूसरे सत्र की शुरूआत में ही कुंबले ने आफरीदी को मोंगिया के हाथों कैच आउट करवा दिया। फिर अगली ही गेंद पर इजाज अहमद को चलता कर दिया। ऑन द हैट्रिक थे कुंबले पर हैट्रिक ले नहीं पाए। दो ओवर के बाद ही इंजमाम ने एक लेजी सॉट खेली और गेंद खुद स्टंप को चूम गई। इस ओवर की पांचवीं गेंद पर यूसुफ योहाना को भी कुंबले ने अपना शिकार बना दिया। आफरीदी और युहाना दोनों ही इस बात से संतुष्ट नजर नहीं आए थे। जबकि आफरीदी तो साफ कॉट बिहाइंड थे और युहाना तो स्टंप के सामने ही पगबाधा हुए थे। फिर मोइन खान का स्लिप पर गांगुली ने शानदार कैच लपका। साथ ही सईद अनवर का कैच लक्ष्मण ने लपका। फिर भारत के सामने थे सिर्फ सलीम मलिक और कप्तान वसीम अकरम। कुंबले कहते हैं कि, ‘यदि इनको आउट कर दें तो फिर समझो कि मैच हमारे कब्जे में, लेकिन ये काम इतना आसान नहीं दिख रहा था’। एक साल पुराने भी नहीं हुए हरभजन सिंह की गेंद पर वसीम ने जमकर चौकों की बरसात शुरू कर दी। पर तुरंत ही सलीम मलिक को कुंबले ने क्लीन बोल्ड कर दिया। मुस्ताक अहमद और सकलेन मुश्ताक को दो लगातार गेंदों पर आउट कर दिया। फिर कुंबले ऑन द हैट्रिक थे लेकिन ओवर खत्म हो चुका था। और ये किसी को भी पता नहीं था कि अगले ओवर में ये जोड़ी टिकी रहेगी। तभी श्रीनाथ को गेंदबाजी सौंपी गई और वहां कुंबले मैदान में भगवान से ये दुआ करने लग गए कि ये आखिरी विकेट भी कुंबले को ही मिले। श्रीनाथ ने सारी गेंदें बाहर फेंकी इस कारण दो गेंद वाइड भी हो गई। कोई विकेट लेना नहीं चाहता था। फिर कुंबले के हाथ में गेंद आई और वसीम अकरम को सिली पाइंट पर लक्ष्मण को कैच आउट करवा दिया और लिख दिया इतिहास जो कभी टूट नहीं सकता। इस रिकॉर्ड की बराबरी हो सकती है पर कोई तोड़ नहीं सकता।

२००२ में टूटे जबड़े से भी जीवट प्रदर्शन

मैंने अपने एक आर्टिकल में इस बात का पहले ही जिक्र किया हुआ है। टूटे जबड़े से भी कुंबले ने जुझारुपन दिखाते हुए लारा को आउट कर अपना काम कर दिया था। इतनी चोट लगने के बावजूद भी कुंबले ने १४ ओवर फेंके थे। भारत वेस्टइंडीज से वो मैच ड्रॉ करने में कामयाब रहा था।

ग्रेग चैपल का ख़ौफ़

ग्रेग चैपल का भारतीय क्रिकेट पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि काफी समय तक सब कुछ सिर्फ और सिर्फ चैपल तक ही सिमट कर रह गया। जितने भी सीनियर खिलाड़ी थे उन सब पर चैपल ने निशाना साधा। सबसे पहले गांगुली, फिर द्रविड़ को अपने साथ मिलाकर गांगुली और द्रविड़ को भिड़ाना। शायद ये अध्याय भारतीय क्रिकेट इतिहास के लिए काला अध्याय था। फिर इस समय के महान खिलाड़ी सचिन पर भी साधा निशाना। कुंबले और लक्ष्मण दोनों ऐसे खिलाड़ी थे जो कि कभी भी बाहर का रास्ता देख सकते थे। कई बार कुंबले ने द्रविड़ के साथ इस बारे में बात भी की। द्रविड़ हमेशा ही समझाते कि अभी तो कुछ नहीं होने जा रहा है। फिर एक बार सचिन के साथ बात करते हुए कुंबले ने संन्यास की बात भी कही थी। सचिन का जवाब था कि बस परफोर्म करते रहो और यदि फिर भी कुछ होता है तो पहले निशाने पर मैं हूं उसके बाद किसी और का नंबर आएगा। उस समय सचिन की फॉर्म पर सवालिया निशान तो लग ही रहे थे। चैपल ने यहां तक कह दिया था कि सचिन सिर्फ अपने लिए खेलते हैं। कुंबले उस दौर को अपने क्रिकेट जीवन का सबसे कठिन समय मानते थे। इस दौरान ही एक-दो बार कुंबले ने पूरी टीम को अपने घर पर दावत भी दी। एयरपोर्ट से कुंबले के घर सचिन सीधे चले आते थे बिना झिझक के। इस समय में चाहे कुंबले पहले से भी कम बोलने लगे थे। वो ख़ौफ़ का वक्त था, जो वक्त निकल गया।

कप्तानी के साथ कोटला से विदाई

अपने ३७वें जन्मदिन के मौके से कुछ दिनों पहले ही कुंबले को कप्तानी की कमान सौंपी गई थी। कोई भी नहीं जानता था कि
पाकिस्तान के खिलाफ घरेलू सीरीज में कुंबले को कप्तान बनाया जाएगा। २७ साल के बाद पाकिस्तान को हराने में कामयाब रहे। फिर सबसे विवादास्पद सीरीज जिसे की खुद कुंबले भी कठिन सीरीज मानते हैं। २-१ से भारत सीरीज हार गया था। साउथ अफ्रीका के खिलाफ से कुंबले की कप्तानी, गेंदबाजी, फील्डिंग पर असर दिखने लगा। श्रीलंका में तो जिस टीम से टेस्ट टीम हार कर आई थी उसी श्रीलंकाई टीम को हमारी वन डे टीम ने धो दिया था। इस सीरीज में तो शरीर भी साथ नहीं दे रहा था। सही समय पर, सही अंदाज में कुंबले ने संन्यास ले लिया।

नागपुर टेस्ट और अंतिम बार ड्रेसिंग रूम में कुंबले

कोटला में ही कह दिया था कुंबले ने कि वो नागपुर में भी ड्रेसिंग रूम का हिस्सा जरूर होना चाहेंगे। कहीं ना कहीं ये जरूर लगता ही है कि यदि चोट नहीं लगी होती तो नागपुर टेस्ट ही कुंबले का आखिरी टेस्ट होता। पर कुंबले ने अच्छा किया कि कोटला में संन्यास ले लिया। सारा ध्यान ठीक तरीके से कुंबले पर ही रहा वर्ना शायद वो बंट जाता और फिर शायद कहीं पर कुंबले की अपनी बात भी दब जाती।
नागपुर टेस्ट काफी अहम टेस्ट है। सौरव गांगुली इस टेस्ट के बाद ही संन्यास लेने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। साथ ही पहले टेस्ट में गांगुली ने शतक जमाया था क्या जाते हुए आखिरी टेस्ट में भी गांगुली ये करिश्मा दिखा पाएंगे। वहीं वीवीएस लक्ष्मण अपना १०० वां टेस्ट मैच खेलेंगे। १००वें टेस्ट में क्या वो सैंकड़ा लगा कर छठे खिलाड़ी बन पाएंगे। वैसे सिर्फ रिकी पॉन्टिंग ही एक मात्र ऐसे खिलाड़ी हैं जो कि अपने १००वें टेस्ट की दोनों पारियों में शतक जमा चुके हैं। साथ ही हरभजन सिंह को दरकार है सिर्फ एक विकेट की, फिर वो भी ३०० क्लब में शामिल हो जाएंगे।
लेकिन ये तो पक्का है कि हां, जंबो और दादा की कमी टीम इंडिया को खलेगी जरूर, याद बहुत आएंगे। सच एक युग और अध्याय को विराम लग जाएगा। एक तरफ सबसे ज्यादा मैच जीताने वाले गेंदबाज और दूसरी तरफ भारत के सबसे सफल कप्तान। इन्हें एक युग तो कहेंगे ही।


आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, November 5, 2008

मेरी नजर से, कुंबले की कोटला से विदाई

कभी-कभी अनायास ही कुछ ऐसा हो जाता है जिसके बारे में मालुम तो पहले से होता है लेकिन अनायास कारणों से अनायास ही निर्णय लेना पड़ जाता है। क्रिकेट में कहते हैं कि एक गेंद ही होती है जो तकदीर बदल देती है। वसीम अकरम की एक गेंद ही थी जो के.श्रीकांत के हेल्मेट पर लगी थी और वो रिटायर्ड हर्ट हो गए थे। हेल्मेट होने के बावजूद भी श्रीकांत को वो गेंदे इतनी चोट पहुंचा गई थी कि फिर कभी भी वो वसीम अकरम को ठीक से खेल नहीं पाए और हर मैच में उनका ही शिकार हो जाते। श्रीकांत का करियर खत्म हो गया। कैच लपकने की कोशिश में जंबो की बाएं हाथ की छोटी उंगली में इतनी गहरी चोट लगी कि ११ टांके लगे और फिर वो फैसला हो गया जिसे की उन्होंने सीरीज के आखिरी मैच के लिए बचा के रख रखा था, एक मैच पहले ही कुंबले को संन्यास लेना पड़ा।
कोटला टेस्ट में कुंबले को चोट लगी तब उनकी पत्नी चेतना दिल्ली एयरपोर्ट पर बैंगलोर के लिए फ्लाइट लेने के इंतजार में खड़ीं थीं। तभी पता चला कि कुंबले को हाथ में चोट लगी है और उनको अपोलो अस्पताल में भेज दिया गया है। तुरंत वो अपोलो पहुंची और फिर पता चला कि ऊंगली में ११ टांके लगे हैं और शायद ये भी हो सकता है कि नागपुर टेस्ट के साथ-साथ वो ये टेस्ट भी ना खेल पाएं। दोनों ने मिलकर ये फैसला किया कि बस ये टेस्ट ही आखिरी टेस्ट होगा क्योंकि अगले टेस्ट में कुंबले को शायद मौका भी ना मिले। वो खेलते हुए संन्यास लेना चाहते थे, मैदान में रहते हुए संन्यास।
आखिरकार १९ साल के लंबे खेल करियर को विराम लग ही गया। आए दिन कयास लगाए जा रहे थे कि अनिल कुंबले भी सौरव गांगुली की तरह कभी भी संन्यास का एलान कर देंगे। इस सीरीज में इस जीवट खिलाड़ी के ऊपर शक किया जाने लगा था कि आखिर कब तक कुंबले? लोगों कि तरफ से आवाज़ भी आने लगी कि क्या टीम पर बोझ बन गए हैं जंबो?
इस सब सवालों पर एकदम से विराम लगाते हुए ऑस्ट्रेलिया के साथ कोटला में तीसरे टेस्ट के आखिरी दिन जब कमेंट्री के दौरान ये एलान हुआ कि कुंबले संन्यास ले रहे हैं, थोड़ी देर तक तो सुनने वालों को इस बात का पर यकीन ही नहीं हुआ पर तभी स्क्रीन पर लिखा आया----

“Anil Kumble Decides To Retire From International Cricket.
Please Wait Till The End To Cheer Anil Kumble”.



सारी दुनिया को यकीं हो गया कि कुंबले संन्यास ले रहे हैं। उसी कोटला मैदान पर संन्यास का फैसला लिया जिस पर उन्होंने १९९९ में एक पारी में १० विकेट लेने का कीर्तिमान हासिल किया था जिसे सिर्फ एक खिलाड़ी ही उनके साथ बांट रहा है। साथ ही ये वो रिकॉर्ड है जिसे कि कोई भी तोड़ नहीं सकता बस पा सकता है। सब बस मैच खत्म होने का इंतजार करने लगे।
और मैच खत्म हो गया। सभी खिलाड़ी कुंबले से हाथ मिलाने लगे और गले मिलने का सिलसिला शुरू होगया। कुंबले को सम्मान देने के लिए कमेंट्रीटेटर ने लोगों से अपील की कि सभी खड़े होकर इस महान गेंदबाज को सम्मान दें।

फिर पूरा कोटला खड़ा होगया अपने पैरों पर और वहीं कुंबले को हाथों में उठा लिया उनके पुराने दोस्त और सहयोगी राहुल द्रविड़ और जहीर खान ने। पिच से मैदान के एक छोर तक की दूरी ही काफी लगने लगी और वहां ये आवाज़ आने लगी कि कुंबले को और ऊंचा उठाया जाए। पूरे समय १९ साल से कदम-दर-कदम साथ चल रहे सचिन यहां भी उनके साथ ही चल रहे
थे। सहवाग दौड़ते हुए आए साथ में आर पी सिंह भी। तभी पीछे से एक शख्स और दौड़ता हुआ आया जो बार-बार कहने लगा कि मैं बैठाता हूं कंधे पर कुंबले को। आर पी सिंह ने इशारा किया कि बैठाओ हम उठाते हैं कुंबले को और वो शख्स अपने कंधे पर बैठा कर जंबो को आगे बढ़ चला।

जी हां, महेंद्र सिंह धोनी को कप्तानी की कमान भी सौंपी गई है और माही ने ही अपने कंधों का एहसास कराकर जंबो को बता दिया कि ये कंधे भी तुम्हारे कंधों की तरह ही मजबूत हैं। और फिर वो जंबो को लेकर मैदान का चक्कर लगाने लगे।

यदि देखें तो जंबो सच में जंबो ही हैं लेकिन धोनी को ऐसा करते देख अच्छा ही लगा और सच, ये भी लगा कि हां सिर्फ ऑस्ट्रेलियन ही अपनों की विदाई ऐसे नहीं करते हम भी कह सकते हैं कुछ इसी शान से अपनों को बाय बाय, कुंबले।

कोटला में कुंबले के अंतिम पल

मेरी नजर से कुंबले की कुछ चुनिंदा यादें अगले अंक में।

आपका अपना
नीतीश कुमार

Thursday, October 23, 2008

मोहाली में मन्नत पूरी

मोहाली टेस्ट जीतने के बाद ये तो साबित होगया कि कंगारुओं को उनकी औकात दिखाने का हौसला यदि कोई टीम रखती है तो वो है टीम इंडिया। पर साथ ही ये भी साफ होगया कि किसी भी जीत के लिए ठोस नीव की जरूरत होती है। और हमारे बूढ़ों याने की फेब फोर ने अच्छा काम किया। और वहीं दूसरी तरफ तीन साल के भीतर भारत से दूसरी बार ऑस्ट्रेलिया को हार का मुंह देखना पड़ा है। ऑस्ट्रेलिया में पंटर(पॉन्टिंग)को पड़ने लगे हैं हंटर। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व खिलाड़ी ये मांग करने लगे हैं कि शेन वॉर्न और साइमंडस को वापस टीम में लिया जाए। कंगारुओं की करारी हार के लिए पूर्व खिलाड़ी टीम के नए चेहरे, अनुभव के अभाव और टीम में स्पिनर का ना होना मानते हैं। हमें भी ये जरूर सोचना होगा कि क्या वक्त आगया है कि फेब फाइव को टीम से विदा कर दिया जाए या अभी विकल्प ढूंढने बाकी हैं। पर चाहे जो भी हो मोहाली में भारत ने बाजी मारी और साथ ही कई रिकॉर्ड भी बने। टीम ने भी बनाया और साथ ही कई खिलाड़ियों के लिए ये मैदान बहुत ही भाग्यशाली रहा और साथ ही यादगार भी।

१) टीम इंडिया ने टेस्ट इतिहास में सबसे बड़ी रनों से जीत दर्ज की है। पारी की जीत को छोड़ दें तो टीम इंडिया ने विश्व चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को 320 रन से मात देकर मोहाली में नया कीर्तिमान रच दिया।
२) मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने सबसे पहले तो ब्रायन लारा के रिकॉर्ड को तोड़ा और फिर 12000 रन के शिखर को भी छू लिया जहां पर अभी तक कोई भी नहीं पहुंचा है। और जो अभी खेल रहे हैं वो इस आंकड़े से लगभग 1700 रन पीछे हैं। और वो हैं राहुल द्रविड़।
३) सचिन ने अर्द्धशतकों की भी हाफ सेंचुरी पूरी कर ली है। विश्व के वो तीसरे नंबर पर हैं उनसे ज्यादा अर्द्धशतक राहुल द्रविड़(53) और एलन बोर्डर(63) के हैं। यदि सचिन एक कैच और पकड़ लेते तो भारत की तरफ से 5वें खिलाड़ी बन जाते जिन्होंने कैच पकड़ने की शतकीय पारी खेली है।
४) अपनी अंतिम सीरीज में दादा सौरव गांगुली ने 7000 रन पूरे कर लिए और साथ ही 16वां शतक जड़ कर अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया।
५) महेंद्र सिंह धोनी ने पहले ही टेस्ट में कप्तानी करते हुए जीत हासिल की।
६) अमित मिश्रा जिन्हें पांच साल के बाद मौका मिला और अपने पहले ही टेस्ट में 5 विकेट लेकर दूसरी टीम की नींव को इतना कमजोर कर दिया कि हार ही उनको नसीब हुई।
७) हरभजन सिंह बस एक विकेट से चूक गए वर्ना 300 विकेट लेने वाले तीसरे भारतीय खिलाड़ी हो जाते। अनिल कुंबले और कपिल देव के बाद अगले मैच में एक विकेट लेते ही वो तीसरे भारतीय हो जाएंगे जो कि तीन सौ के क्लब में शामिल हो जाएंगे।

ये तो बात होगई कुछ रिकॉर्डस की जो बन भी पाए और कुछ सिर्फ 1 के हेर फेर से चूक गए। पर यहां पर सौरव गांगुली के बाद अब अनिल कुंबले के ऊपर संन्यास के बादल मंडराने लगे हैं। दुनिया में तीसरे नंबर के सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं जंबो जिनके भारत में सबसे ज्यादा विकेट हैं 616 और इनके आस पास दुनिया का अभी तो कोई भी गेंदबाज दिखाई नहीं देता। खेलने वाले गेंदबाजों में श्रीलंका के चमंडा वास है जिन्होंने 348 विकेट लिए हैं। जंबो ने 35 बार 5 विकेट और 8 बार 10 विकेट लिए हैं।

यहां पर एक घटना जंबो की बताना चाहूंगा। 2002 में एंटिगुआ में वेस्टइंडीज के खिलाफ जब जबड़े की हड्डी टूट गई थी तब टीम को बचाने के लिए अपने चेहरे पर पट्टी बांधकर वो बॉलिंग करने आए थे और तब सबसे घातक बल्लेबाज ब्रायन लारा को सस्ते में एलबीडब्ल्यू आउट किया था। शायद हमें वो पल जरूर याद होगा पर अब कंधे की चोट शायद जंबो को इसी सीरीज में संन्यास लेने के लिए मजबूर कर सकती है।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”