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Tuesday, January 13, 2009

हमारे न्यूज चैनल कितने परिपक्व?

जो भी न्यूज़ देखता है उनसे पूछा जाए कि न्यूज़ चैनल के लिए क्या जरूरी है खबर या टीआरपी, तो अधिकतर कहेंगे ‘खबर’, पर न्यूज चैनल टीआरपी पसंद करते हैं और अब न्यूज़ कहां। लेकिन कुछ दिनों से ये देखा जा रहा है कि न्यूज़ चैनलों पर न्यूज़ वापस लौटी है। वर्ना पहले न्यूज़ के सिवा हमारे देश के न्यूज़ चैनलों पर सब कुछ होता था। नाग-नागिन, भूत, ज्योतिष, भ्रम फैलाने वाली ख़बरें और इन पर होने वाले लंबी-लंबी चर्चा, एक ही तस्वीर बार-बार दिखाई जाती थी। पर नहीं बदली तो खेल की खबरें पहले भी सिर्फ क्रिकेट होता था और अब भी सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट ही होता है, किसी और खेल को जगह नहीं मिल पाती। क्यों? क्योंकि भारत में क्रिकेट के सिवा कुछ नहीं ‘बिकता’। कुछ अंग्रेजी चैनल खेल की खबरों में सभी खेलों को जगह देते दिख जाएंगे पर हिंदी न्यूज चैनलों पर तो सिर्फ ढाक के तीन पात याने क्रिकेट। दूसरे खेलों के हाल का अंदाजा हम इससे लगा सकते हैं कि पुलेला गोपीचंद को खेल मंत्री एम एस गिल ने नहीं पहचाना था, जबकि गुपीचंद की शागिर्द सायना नेहवाल के कंधे पर हाथ रख कर मंत्री जी खड़े थे। शायद मंत्री जी भी हिंदी न्यूज चैनल ही देखते होंगे।
वहीं गर दूसरे शब्दों में कहें, कि क्या हमारी न्यूज इंडस्ट्री इतनी परिपक्व हो गई है जितने की पश्चिमी देशों की न्यूज़ इंडस्ट्री? हमारे लिए न्यूज़ क्या है? यदि हम ये सवाल अपने आप से पूछें तो हमारे जहन में सबसे पहले ख्याल क्या आएगा? हमारी खबरों का दायरा सिर्फ और सिर्फ हमारे इर्द गिर्द ही घूमता है, आस पास की क्षेत्रीय हलचल पर हम ज्यादा ध्यान देते हैं। देश में क्या चल रहा है राजनीति के स्तर पर थोड़ा बहुत लोग पढ़ भी लेते हैं या जान लेने के इच्छुक होते हैं वर्ना दूसरे प्रदेश, या देश या फिर सात समंदर की खबरों को जानने के इच्छुक हम बहुत ही कम होते हैं।
मुंबई हमलों के दौरान बीबीसी पर पूरे दिन-रात सिर्फ और सिर्फ मुंबई की ख़बरें ही छाई रहीं। क्या ब्रिटेन में २६ से २९ तक कुछ भी ऐसा नहीं घट रहा था कि वो बीबीसी चैनल पर एयर टाइम ले पाता। हमारे देश में तो बहुत से रिएलिटी शो हैं जिन पर हर दिन दो-तीन घंटे आराम से निकल जाते हैं। बीबीसी पर पूरे समय मुंबई हमलों का क़हर ही चलता रहा। सेटेलाइट फोन के जरिए तस्वीरें दिखाई जा रहीं थी। साथ ही विदेशी मीडिया इस बात का भी ध्यान रख रहा था कि कहीं भी विचलित करने वाली तस्वीरें ना दिखाई जाएं, क्षत विक्षप्त शरीर नहीं दिखे या फिर सेना की मूवमेंट भी नहीं दिखाई जा रही थी। बीबीसी पर ब्लॉगर छाए रहे, जो अपने ब्लॉग पर कोई जानकारी दे रहे थे, उनसे वो फोन पर बात भी कर रहे थे।
अब जब कि बहुत हद तक साफ हो गया है कि मुंबई हमलों में पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है। साथ ही कसाब को भी पाकिस्तानी मान लिया गया है। लेकिन मुंबई हमला भारतीय मीडिया के लिए एक नया अनुभव साबित हुआ। क्या रोल हो मीडिया का इस बारे में बात अगली बार। इस तरह की कमांडों कार्रवाई पहली बार हमारी मीडिया ने देखी। यदि गौर करें तो श्रीनगर या फिर बोर्डर एरिया को छोड़कर कहां पर हमें याद आता है कि कमांडो कार्रवाई की गई जिसे इतने बड़े पैमाने पर कवर किया गया। अमृतसर के स्वर्णमंदिर में कमांडो कार्रवाई हुई थी पर तब कितना सजग था मीडिया। कुछ चुनिंदा अखबार हुआ करते थे लोगों के पास टीवी भी नहीं था। तो किसी शहर में वो भी मैट्रो सिटी में इस तरह आतंकवादियों का क़हर बरपाना और साथ ही सबसे आगे निकलने की होड़ ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से इतनी बड़ी गलती करवाई जिसका सीधे-सीधे फायद पाकिस्तान में बैठे इन आतंकवादियों के आकाओं को मिला और बिना बाहर देखे वो कमांडो की हर कार्रवाई के बार में आसानी से जान जाते और हमारी सेना को इसका काफी खामियाजा भुगतना पड़ता। लगता तो ये है कि सबसे पहले और आगे निकलने की होड़ ने हमारी इलैक्ट्रोनिक मीडिया और एजेंसियों को कभी परिपक्व ही नहीं होने दिया।
यहां पर ये गौर करने वाली बात है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात बन गए हैं। साथ ही दोनों देशों में साइबर वॉर छिड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ मीडिया के बीच भी एक तरह की कोल्ड वॉर छिड़ गई है। ये समय होता है कि दोनों देश अपने आप में संयम बरतें पर ऐसा दिख नहीं रहा है। मीडिया की बात है तो कुछ कायदे, कानून, नियम, सरकार को बनाने ही होंगे जो कि ऐसी आपतकाल स्थितियों में मीडिया पर लागू हो। सरकार ही मीडिया को कुछ फुटेज और घंटे दर घंटे ब्रीफिंग करे और हालात से वाकिफ कराए। जब चाहे सरकार आपात स्थितियों में दुनिया के सामने जैसे चाहे हालात दिखाना चाहे वो दिखाए। याने कि जिस तरह की कवरेज से दूसरे समूह याने कि हमलावरों को फायदा नहीं पहुंचे। वैसे सरकार जल्द ही इस मामले में कुछ नियम कानून की व्यवस्था करने में जुट गई है। पर देखना तो ये होगा कि ये नियम आते कितने वक्त में हैं और न्यूज चैनल कितना इन नियमों पर अमल करते हैं। कुछ नियम एनबीए याने न्यूज ब्रॉडकास्ट एसो. ने भी बनाए हैं याने की वो संस्था जो कि मीडिया में रहकर मीडिया पर सख़्त नज़र रखती है। उनपर एक नज़र अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, August 12, 2008

खेल खेल में गई जान

चंडीगढ़ में कहीं खुशी मनाई जा रही थी तो कहीं पर गम पसर गया। अभिनव बिंद्रा को स्वर्ण पदक अभी मिल कर भी नहीं हटा था कि खेल खेल में ही 19 साल का मोहित ना जाने कहां खो गया। एक न्यूज चैनल पर वो तस्वीरें हिला देने वाली थी। देखने से ही लग रहा था कि भगवान कह रहा हो कि जा तुझे एक मौका और दिया लेकिन जवानी के जोश में वो आगे बढ़ता चला गया और ना जाने पानी में कहां खो गया। पानी का बहाव ही इतना तेज था कि उसे ढूंढने के सारे प्रयास विफल रहे।

चंडीगढ़ में 16 सेक्टर के रोज गार्डन में तीन दोस्त पिकनिक मनाने गए थे। तीनों ही हम उम्र थे और तीनों बारिश का लुत्फ लेना चाहते थे। लेकिन तभी एक हादसा हो गया। मोहित नाम का लड़का पता नहीं क्यों इतनी मस्ती में उतर आया कि उसको ये इल्म भी नहीं रहा कि पानी की रफ्तार उसकी सारी ताकत से कहीं ज्यादा है। उस पानी की रफ्तार में मस्ती करना उस को भारी पड़ गया। पहले तो वो वहां पर पानी के साथ खेल रहा था। पास में लगी लोहे की चैन को पकड़कर पानी की तेज धारा से लड़ते हुए अटखेलियां कर रहा था कि तभी उस के पैर पानी के बहाव को सहन नहीं कर पाए और उखड़ गए लेकिन चैन पर उस की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो सिर्फ झूल गया। इस बार तो वो बच गया। बचने के बाद उसने सब को हाथ हिलाया जैसे कह रहा हो कि मैं सुरक्षित हूं। मुझे लगता है कि ये ही एक अवसर था उसके पास जब कि भगवान ने उसे मौका दिया था कि अब भी वक्त है संभल जा। लेकिन वो नहीं संभला और फिर लोहे की उस चैन को पकड़कर पानी के बीचों बीच खड़ा होगया। पर इस बार उसके हाथों की पकड़ ने उस का साथ नहीं दिया। थोड़ी देर तक तो वो पानी के बहाव को सहन करता रहा। पानी का बहाव इतना तेज था कि वो वहां पर ही गिर गया। लेकिन जांबाजी दिखाने के चक्कर में कभी वो पानी में समा जाता तो कभी पानी के ऊपर आजाता। उसके दोस्तों ने जो कि इस बहाव से बाहर खड़े थे उसका खेल मान रहे थे। जब उसने अपने को बचाने के लिए हाथ उठाया और आवाज़ लगाई तो वो पानी की तेज आवाज में कही डूब गई। और तभी उसका एक हाथ उठा और फिर दूसरे हाथ की पकड़ लोहे की जंजीर से छूट गई और वो बहता हुआ जाने लगा। फिर उसने कोशिश की पेड़ की शाखा को पकड़ने की जो कि पानी के ऊपर लटक रही थी। उसने वो पकड़ी भी लेकिन पानी का बहाव ही इतना तेज था कि वो पकड़ कायम नहीं रह सकी और वो बहता हुआ पानी में डूब गया। ये पानी वहां के एक चौड़े नाले की तरफ जाता है। जहां पर पुलिस ने बचाव का काम जारी रखा लेकिन उसका कोई भी पता नहीं चल पाया।शायद तबतक बहुत देर होचुकी थी। पुलिस को उसके दोस्तों ने ही बुलाया जब कि वो उसे खोज पाने में नाकामयाब रहे।

इस जगह पर मैं एक बात बताना चाहूंगा कि ये तस्वीरें वहां पर मौजूद एक कैमरामैन ने खींची थी जो कि बारिश की कुछ तस्वीरें और साथ में बारिश में खेलते हुए लोगों के कटवेज लेने कि लिए उस रोज गार्डन में गया था। वो इस सब तस्वीरों को कैमरे में कैद कर रहा था और पास में खड़े एक शख्स की आवाज़ आ रही थी कि ये गिर जाएगा और ऐसा ही हुआ। शायद उस आदमी को भी नहीं पता होगा कि ऐसा भयानक हादसा हो जाएगा। साथ ही, मोहित जो डूब गया शायद ये स्टंट भी इसी चक्कर में करने चला गया कि कैमरे में उस की तस्वीरें कैद हो रही हैं। वो कैमरे की तरफ बार-बार देख कर हाथ भी हिला रहा था, पर अब वो तस्वीरें ही बची हैं जो कि एक कैमरे में कैद हैं, वो नहीं।

आपका अपना

नीतीश राज

(ये शायद ठीक से पब्लिस नहीं हुआ इस कारण से दोबारा डाला है।)

खेल खेल में मौत

चंडीगढ़ में कहीं खुशी मनाई जा रही थी तो कहीं पर गम पसर गया। अभिनव बिंद्रा को स्वर्ण पदक अभी मिल कर भी नहीं हटा था कि खेल खेल में ही 19 साल का मोहित ना जाने कहां खो गया। एक न्यूज चैनल पर वो तस्वीरें हिला देने वाली थी। देखने से ही लग रहा था कि भगवान कह रहा हो कि जा तुझे एक मौका और दिया लेकिन जवानी के जोश में वो आगे बढ़ता चला गया और ना जाने पानी में कहां खो गया। पानी का बहाव ही इतना तेज था कि उसे ढूंढने के सारे प्रयास विफल रहे।
चंडीगढ़ में 16 सेक्टर के रोज गार्डन में तीन दोस्त पिकनिक मनाने गए थे। तीनों ही हम उम्र थे और तीनों बारिश का लुत्फ लेना चाहते थे। लेकिन तभी एक हादसा हो गया। मोहित नाम का लड़का पता नहीं क्यों इतनी मस्ती में उतर आया कि उसको ये इल्म भी नहीं रहा कि पानी की रफ्तार उसकी सारी ताकत से कहीं ज्यादा है। उस पानी की रफ्तार में मस्ती करना उस को भारी पड़ गया। पहले तो वो वहां पर पानी के साथ खेल रहा था। पास में लगी लोहे की चैन को पकड़कर पानी की तेज धारा से लड़ते हुए अटखेलियां कर रहा था कि तभी उस के पैर पानी के बहाव को सहन नहीं कर पाए और उखड़ गए लेकिन चैन पर उस की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो सिर्फ झूल गया। इस बार तो वो बच गया। बचने के बाद उसने सब को हाथ हिलाया जैसे कह रहा हो कि मैं सुरक्षित हूं। मुझे लगता है कि ये ही एक अवसर था उसके पास जब कि भगवान ने उसे मौका दिया था कि अब भी वक्त है संभल जा। लेकिन वो नहीं संभला और फिर लोहे की उस चैन को पकड़कर पानी के बीचों बीच खड़ा होगया। पर इस बार उसके हाथों की पकड़ ने उस का साथ नहीं दिया। थोड़ी देर तक तो वो पानी के बहाव को सहन करता रहा। पानी का बहाव इतना तेज था कि वो वहां पर ही गिर गया। लेकिन जांबाजी दिखाने के चक्कर में कभी वो पानी में समा जाता तो कभी पानी के ऊपर आजाता। उसके दोस्तों ने जो कि इस बहाव से बाहर खड़े थे उसका खेल मान रहे थे। जब उसने अपने को बचाने के लिए हाथ उठाया और आवाज़ लगाई तो वो पानी की तेज आवाज में कही डूब गई। और तभी उसका एक हाथ उठा और फिर दूसरे हाथ की पकड़ लोहे की जंजीर से छूट गई और वो बहता हुआ जाने लगा। फिर उसने कोशिश की पेड़ की शाखा को पकड़ने की जो कि पानी के ऊपर लटक रही थी। उसने वो पकड़ी भी लेकिन पानी का बहाव ही इतना तेज था कि वो पकड़ कायम नहीं रह सकी और वो बहता हुआ पानी में डूब गया। ये पानी वहां के एक चौड़े नाले की तरफ जाता है। जहां पर पुलिस ने बचाव का काम जारी रखा लेकिन उसका कोई भी पता नहीं चल पाया।शायद तबतक बहुत देर होचुकी थी। पुलिस को उसके दोस्तों ने ही बुलाया जब कि वो उसे खोज पाने में नाकामयाब रहे।
इस जगह पर मैं एक बात बताना चाहूंगा कि ये तस्वीरें वहां पर मौजूद एक कैमरामैन ने खींची थी जो कि बारिश की कुछ तस्वीरें और साथ में बारिश में खेलते हुए लोगों के कटवेज लेने कि लिए उस रोज गार्डन में गया था। वो इस सब तस्वीरों को कैमरे में कैद कर रहा था और पास में खड़े एक शख्स की आवाज़ आ रही थी कि ये गिर जाएगा और ऐसा ही हुआ। शायद उस आदमी को भी नहीं पता होगा कि ऐसा भयानक हादसा हो जाएगा। साथ ही, मोहित जो डूब गया शायद ये स्टंट भी इसी चक्कर में करने चला गया कि कैमरे में उस की तस्वीरें कैद हो रही हैं। वो कैमरे की तरफ बार-बार देख कर हाथ भी हिला रहा था, पर अब वो तस्वीरें ही बची हैं जो कि एक कैमरे में कैद हैं, वो नहीं।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, August 9, 2008

“हां, सेल्समैन बन गया है मीडिया”

जो जितना अच्छा सेल्समैन वो उतना ही बड़ा और बढ़िया एड़िटर। इस बात को साबित करने की होड़ बहुत दिन से चल रही थी और बहुत लोग जुगत में भी थे और अब ये बात साबित भी हो गई है। आपको माल बेचना आता है कि नहीं। अपने सामान यानी शो को बेकने की कला जिसको भी आगई वो सबसे आगे और जो नहीं बेच पाया तो समझो कि उस की खैर नहीं। ज्यादा दिन तक वो कुर्सी उस शख्स का भार सहन नहीं कर पाएगी।
अब उस कुर्सी पर बैठने के लिए मार्केटिंग के गुणों का होना भी जरूरी है। अब सभी चैनलों में कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ इस के लिए होते हैं कि दूसरे चैनल कर क्या रहे हैं। कब दूसरा चैनल अधिकतर राइवल चैनल क्या दिखा रहा है और साथ ही साथ उसने उस कार्यक्रम की मार्केटिंग कब से और किस ढंग से की। चैनल अब प्रोग्राम से ज्यादा इस बात की ओर ज्यादा अग्रसर हो चले हैं या यूं कहें कि ज्यादा तबज्जो देने लगे हैं कि कैसे अपने इस टाइम बैंड को बेचना है। अब बेचने के हिसाब से प्रोग्राम तय किए जाते हैं। किस तरह के प्रोग्राम किस टाइम बैंड पर जाएगा, लोगों की नब्ज किस तरह पकड़नी है इन सब पर देश और विदेशों में भी बैठकें होती हैं।
यहां पर पहले बात छेड़ते हैं न्यूज चैनलों की। अब हर न्यूज चैनलों पर आप को बड़ी ही आसानी से हास्य के फूहड़ शो देखने को मिल जाएंगे। एक हंसइया, कम से कम दो, नहीं तो तीन चैनलों पर तो आराम से दिख जाएगा वो भी एक ही समय पर। वो ही बे-सर पैर की बात और वो ही द्वि अर्थी संवाद। पता नहीं ये जज लोगों को क्या उस प्रोग्राम में सरीक होने का और उस हंसइयों को झेलने का भी पैसा मिलता है। शायद इसे ही मार्केटिंग कहते हैं।
तो अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या न्यूज चैनल अब इंटरटेनमेंट चैनल बन गए हैं? क्योंकि अब हर चैनल के कुछ टाइम बैंड तो फिक्स हैं जहां पर ये हंसोड़े आप को हर रोज बिना नागा दिख ही जाएंगे। यदि ये ही चीज इंटरटेनमेंट चैनलों पर चलनी ही है तो फिर न्यूज चैनलों पर ये क्यों दिखाए जाते हैं? तो जवाब शायद है कि ये न्यूज चैनलों पर इन कार्यक्रमों की मार्केटिंग।
अब कुछ टाइम बैंड ऐसे हैं कि जहां पर आप भविष्य देख सकते हैं हर रोज। कुछ लोग इन भविष्यफल बताने वालों से खुश हैं तो कुछ त्रस्त।
ये सब चलता है तो क्या न्यूज चैनलों की परिभाषा बदल गई है? क्या न्यूज चैनलों पर राशिफल, नाच गाने जैसे कार्यक्रम होने चाहिए। इसी कारण से हमेशा ये आवाज़ उठती रहती है कि जो न्यूज़ चैनल ये सब दिखाते हैं उनको अलग श्रेणी में रखना चाहिए।
अब तो ख़बरों को भी बेकने के अंदाज से ही बनाया जाता है। खबर ऐसे जैसे कि दूसरे को रोचक लगे। अलग-अलग प्रयोग किए जाते हैं। इस पर कई बार लगता है कि खबर को बेचने के चक्कर में खबर की असलियत ही मर जाती है।
अब तो चैनल पर दिखने वाली हर चीज टीआरपी को ध्यान में रखकर की जाती है। एडिटर टीआरपी ही खाते, सोते, पहनते हैं। हर समय सिर्फ इस की ही बात होती है। एक स्क्रीन को दुल्हन मान कर, उस पर किस तरह से लीपा पोती की जाए कि वो और भी हसीन लगने लगे। कई बार तो ऐसा लगता है कि स्क्रीन पर कंटेंट ज्यादा हो गया, तस्वीरों के मुकाबले। तस्वीरें तो लगता है कि छुप ही गई हैं। कोई बैंड ऊपर से, नीचे से साइड से, बीच से हर जगह चलते रहते हैं, स्क्रीन को भर दिया जाता है। दर्शक एक को पढ़ने के चक्कर में कुछ भी नहीं पढ़ पाता। लेकिन कोशिश ये की जाती है कि स्क्रीन को कैसे लुभावना बनाया जाए। जैसे कि स्क्रीन एक दुकान हो ना कि कोई एक बार आजाए तो जा ना सके कुछ टीआरपी दिए। न्यूज चैनलों में कई बार तो खबर ढूंढने से भी नहीं मिलती।
इंटरटेनमेंट चैनलों में एक अलग तरह की होड़ है। जब आईपीएल के मैच चल रहे थे तो सेट मैक्स चैनल की टीआरपी सबसे ज्यादा थी। कोई भी चैनल आसपास तक नहीं फड़क पाया था इस चैनल के। इंटरटेनमेंट चैनल जैसे स्टार, जी सभी ने अपने आने वाले क्रार्यक्रमों की मार्केटिंग जोर-शोर से शुरू कर दी लेकिन उस दौरान कोई भी नया प्रोग्राम लॉन्च नहीं किया। जो भी किया गया वो सुपर फ्लॉप रहा।
कभी-कभी सोचने पर लगता है कि क्या टीआरपी ही सिर्फ सबकुछ है। खासतौर पर न्यूज चैनल जो कि समाज का एक आयना होते हैं कि क्या वो सिर्फ और सिर्फ टीआरपी के लिए या फिर पॉपुलरिटी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। कुछ भी अनाप सनाप दिखाने को तैयार हो जाते हैं। क्या इन पर ऐसे में लगाम लगाने की जरूरत नहीं है?


आपका अपना
नीतीश राज

फोटो साभार-गूगल

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”