पाकिस्तान में श्रीलंका क्रिकेट टीम पर जो हमला हुआ है उसमें मुझे तो तीन थ्यौरी सामने आती हुई दिख रही हैं। जो तीन थ्यौरी हैं उन पर ही लगता है कि इस वक्त पाकिस्तान के हुक्मरान सोच रहे हैं। मेरे हिसाब से तीन थ्यौरी हैं---
१) तालिबान की करतूत
२) पाक के बाहर की शक्ति यानी भारत, एलटीटीई। (इसे वैसे तो खारिज कर दिया है पर फिर भी उंगली उठाने की फिराक में तो होंगे)
३) किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी।
अब बताते हैं कि क्यों ये तीन थ्यौरी सामने आ रही हैं।
पहली थ्यौरी यानी तालिबान की करतूत। पाकिस्तान के बहुत बड़े सियासी हल्कों में ये माना जा रहा है कि श्रीलंका की टीम पर जो हमला हुआ है वो तालिबान का पाकिस्तान पर बढ़ते वर्चस्व की निशानी है। जैसे कि तालिबान में हमेशा से ही पढ़ाई, सिनेमा, औरतों का बेपर्दा होने और खासतौर पर खेल पर काफी कड़े और सख्त कानून बनाए हुए हैं। तालिबानी नहीं चाहते कि क्रिकेट जैसा खेल वो या फिर उनके देश में खेला जाए और जब से स्वात पर अपना कब्जा तालिबान ने किया है तब से पाकिस्तान को अपने देश का हिस्सा मानने लग गया है तालिबान। साथ ही स्वात के बाद पूरे पाकिस्तान पर तालिबान अपना अधिपत्य जमाना चाहता है। वैसे अभी तक तफ्तीश में ज्यादातर अफगानियों को ही पकड़ा गया।
दूसरी थ्यौरी यानी पाक के बाहर की शक्ति भारत,एलटीटीई। मुंबई हमलों का दोषी पाकिस्तान को माना गया और अब तो ये साबित भी हो गया कि 26/11 की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी, हमलावर पाकिस्तान से आए थे और सारे दोषी पाकिस्तान में ही हैं। तो पाकिस्तान में ये मानने वालों की कमी नहीं है कि लाहौर हमला भारत के आंतकवादी गुट या फिर भारत की किसी खुफिया एजेंसी की कारसतानी है। बाघा बार्डर के रास्ते आए थे आतंकी पहला वक्तव्य था पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक आला अधिकारी का। दूसरी बात, लाहौर हमला मुंबई हमले का पार्ट-2 माना जा रहा है और इसी कारण से ये माना गया कि भारत की तरफ से उसी तरह इस हमले को अंजाम दिया गया जिस तरह से मुंबई हमलों को दिया गया था। यानी भारत ने बदला उतार लिया है। जब कि सारी दुनिया इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। श्रीलंका में एलटीटीई पर हमले के बाद से ये माना जा सकता था कि ये हमला वो भी करवा सकता है पर सोचने वाली बात ये है कि अभी तो वो श्रीलंका में ही अपने आप को बचाए रखने में असमर्थ हैं तो वो कहां से पाकिस्तान में अफगानी कपड़े पहनकर हमला करेंगे और यदि वो करते तो रॉकेट लॉन्चर और ग्रेनेड चूकता नहीं। पर इस थ्यौरी को पाकिस्तानी सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। अब देखेंगे कि पाकिस्तानी मीडिया क्या कहता है?
साथ ही बड़े केनवस पर देखें तो लोगों का ये मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत को इस हमले से कई फायदे हो सकते हैं। पाकिस्तान को एक आतंकवादी राष्ट्र घोषित किया जा सके(जो कि पाकिस्तान है)। साथ ही ये कि भारत कितना असुरक्षित है अपने पड़ोसी से और इस पड़ोसी से भारत को हमेशा ही खतरा बना हुआ है। आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण पाकिस्तान को अमेरिकी मदद भी नहीं मिलेगी।
तीसरी थ्यौरी यानी किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी। सबसे ज्यादा जो बात चल रही है कि ये जरूर से ही किसी घरेलू संगठन का हाथ हो सकता है। अंतिम वक्त पर बस के रूट में फेरबदल किया गया या नहीं किया गया वो ही रूट रखा जिससे एक दिन पहले गए थे इस पर भी शुरूआती बयान एक जैसे नहीं थे। माना ये भी जा रहा है कि किसी फोन के आने के बाद रूट में फेरबदल से इनकार किया गया था। जब दोनों टीमें एक साथ होटल से निकलती हैं तो पाकिस्तान की टीम श्रीलंका की टीम के साथ क्यों नहीं निकली। क्यों यूनुस खान ने अपनी टीम को ५ मिनट के लिए और रुकने को कहा? क्या कारण है इसके पीछे, ये सवाल तो खुद अंपायरों तक ने अपनी पीसी में कहा था।
जब ४८ घंटे पहले ही पंजाब प्रांत के पुलिस के आला अफसरों को ये बताया जा चुका था कि जल्द ही श्रीलंका की टीम को निशाना बनाया जा सकता है तब भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। खुद पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान ने सुरक्षा के इंतजामों पर सवाल उठाए हैं। जहां मिलने थे ७० सिपाही वहां मिले महज़ २५? तो क्या गलती ये सरासर लाहौर पुलिस की नहीं है। अंपायर क्रिस ब्राड ने ये बताया कि जब हमला हुआ तो पाकिस्तानी पुलिस वहां से भाग गई, कोई भी मदद के लिए नहीं था, हम वहां पर अकेले छूट गए थे। तो क्या इसे पुलिस की बुजदिली नहीं कहेंगे।
वैसे भी ये सही है जो अधिकतर आक्रमण करता हो तो उसे ये नहीं पता रहता कि बचाव कैसे करना है, वो ही हुआ पाकिस्तानी लोगों के साथ। अधिकतर वो भारत पर हमले की बात सोचते हैं जब हमला हुआ तो बचाव नहीं सोच सके।
यदि आतंकवादियों का मकसद श्रीलंका की टीम को मारना ही होता तो आतंकवादी एक रॉकेट लॉन्चर ही क्यों छोड़ते? वो भी ठीक निशाने पर नहीं? दो हेंड ग्रेनेड फेंकते पर इस तरह से कि दहशत पूरी दुनिया में फैल जाए पर निशाना चूक जाए।
इतने अच्छे-अच्छे एंगल से कैसे शूट किया इस पूरे हमले को? कैसे एक टीवी क्रू को पता चल गया कि ये हमला हो रहा है। और जहां से भी हो सके हर जगह, हर आतंकी की तस्वीरें उतारी गई। क्या ये बात हजम होती है? टीवी पत्रकार होने के कारण मुझे लगता है कि इतने एंगल से एक साथ तस्वीरों को लेना मुश्किल है। टॉप एंगल, साइड एंगल, फ्रंट एंगल इतने एंगल वो भी सिर्फ सेकेंड में कैसे संभव है, मुझे तो नहीं लगता। इससे ये साफ होता है कि हमले से पहले ही हमले की जानकारी थी उस क्रू को। और ये क्रिकेट जैसे खेल के साथ ये खेल किसी घर के ही सदस्य ने ही खेला है। सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए कि दहशत हम फैला सकते हैं और यदि जरूरत पड़ी तो पाकिस्तान में हम कुछ भी कर गुजर सकते हैं।
पर अब तो दूसरी थ्यौरी को सिरे से पाकिस्तान की सरकार ने खारिज कर दिया है। अब बात अंदर के गुनहगारों और ये तो पाकिस्तान क्रिकेट का दुर्भाग्य है,कि जिस मैदान पर पाकिस्तान क्रिकेट के स्वर्णिम अश्रर लिखे गए उसी गद्दाफी पर पाकिस्तान क्रिकेट पर कालिख पुत गई।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
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Friday, March 6, 2009
Wednesday, March 4, 2009
पाकिस्तान के लोग ऐसा क्यों सोचते हैं कि हमने ‘26/11-मुंबई हमलों’ का बदला लिया है।
मंगलवार की सुबह जब देर से उठा तो इल्म हुआ कि हां, रात देर से सोया था। अभी चाय के प्याले को मुंह तक लगा भी नहीं पाया था कि अल्साते मन को याद आया कि मैच भी है आज। टीवी खोलकर आंखें मलता हुआ स्कोर पढ़ा तो देखा कि अभी कुल 7-8 ओवर हुए थे सचिन-वीरू दोनों क्रीज पर थे। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन आज शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं पर फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
हमने तुरंत मैच से यूं ही न्यूज की तरफ ऱुख किया। आंख फटी की फटी रह गई। अरे, ये क्या? कहां हुआ हमला, किसने किया, किनपर किया? ये तो पाकिस्तान है, तो क्या पाक टीम पर हमला हुआ है नहीं ये तो श्रीलंका की टीम आतंक की शिकार बनी है। बेहद दुख हुआ और नहीं जानता कि आलस कहां गायब हो गया तकरीबन 3-4 घंटे तक लगातार यूं ही चैनल खंगालता रहा। कई बार तो गुस्से ने दिमाग के सभी तारों को झनझना दिया।

अरे, क्या पागल होगए हैं पाकिस्तान के अधिकारी। जितने भी बयान किसी आला अफसर की तरफ से आ रहे थे उनमें से कुछ और साथ ही कई पत्रकारों के सवाल के निशाने पर कहीं ना कहीं भारत था। कई पाकिस्तानी न्यूज चैनलों पर ये साफ चला कि ये आतंकवादी बाघा बार्डर के रास्ते आए थे। मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था कि पहले तो सुरक्षा में इतनी भारी चूक और उसपर तुर्रा देखिए कि अभी हालात को सामान्य करने की बजाय लगे हैं निशाना साधने पर।
इस पूरे हमले पर कई और कहां-कहां सवाल खड़े होते हैं पाकिस्तान के लिए----
1) कैसे हुई श्रीलंका की टीम की सुरक्षा में चूक? जब कि श्रीलंका की टीम को मिलती है ग्रेड ए यानी कि किसी दूसरे देश से आए हुए किसी भी राष्ट्राध्यक्ष जैसी सुरक्षा। श्रीलंका टीम के काफिले की सुरक्षा के लिए करीब 70 पुलिसवाले दिए गए थे। तो सवाल ये उठता है कि कहां गए 70 पुलिसकर्मी? यदि 70 पुलिसकर्मी वहां पर मौजूद थे तो 12 आतंकी उनको चकमा देने में कैसे कामयाब होगए, कैसे फरार हो गए सभी के सभी और वो भी 5-6 पुलिसवालों को मारकर?
2) गद्दाफी स्टेडियम तक जाने के कई रास्ते हैं। ऐसा बताया गया है कि टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक हर रोज दूसरे रास्ते से ले जाया जाता हैं। तो ये चूक कहां से हुई कि आतंकवादी जान गए वो रास्ता जिस रास्ते से आज टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक पहुंचना था?
3) दूसरे टेस्ट के दूसरे दिन जिस रास्ते का इस्तेमाल किया गया था टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक लाने के लिए, तीसरे दिन भी उसी रास्ते का इस्तेमाल क्यों किया गया? रूट में हमेशा की तरह बदलाव क्यों नहीं किया गया?
4) पहले से ही सरकार को आगाह किया जा रहा था कि नवाज शरीफ और उनके भाई को पंजाब प्रांत से चुनाव ना लड़ने देने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पंजाब सूबे में नवाज शरीफ का जो रुतबा है वो पूरे पाकिस्तान के किसी भी प्रांत में जरदारी या फिर गिलानी का नहीं होगा। पंजाब सूबे के लोग नवाज के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
5) 12 आतंकवादी ये प्लान बनाते हैं कि मेहमान टीम पर हमला करना है। इस बात का मतलब ये है कि आतंकी काफी दिनों से इस योजना को अंजाम देने की कोशिश में जुटे हुए थे। तो क्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी सो रही थी?
6) स्वात पर तालिबान का कब्जा हो गया है और वहां पर पाकिस्तान का नहीं तालिबान का फरमान चलता है और ये धमकी पहले से ही दी जा रही थी कि सिर्फ स्वात के बाद निशाना पूरे पाकिस्तान पर है, और खासतौर पर इस प्रांत।
7) पाकिस्तान के अधिकारी कह रहे हैं कि ये हमला पूरी तरह से देखने पर लगता है कि जैसे मुंबई हमलों को अंजाम दिया गया था बिल्कुल उसी तरह इस का प्लान लाहौर में भी किया गया। याने कि वो हमला भी पाकिस्तान में प्लान किया गया था और ये हमला भी अंदर के लोगों ने ही प्लान किया है।
8) अभी तक जो माना गया है कि ये अटैक सुनियोजित था और 12 के 12 आतंकवादी अपने में पूरे ट्रेनेंड थे। शायद वो पूरी श्रीलंका की टीम को बंदी बनाना चाहते थे। पर देखने से जो लगा कि उनके पास अस्ला, बारूद, सामान काफी था पर फिर भी उसके बाद सवाल ये उठता है कि यदि वो सब ट्रेनेंड थे तो फिर सवाल ये कि मास्क पहन कर हमला करना और फिर मास्क फैंक देना, क्यों? जिस बैग को आप हमेशा अपने साथ, पीठ पर लादे रख रहे थे फिर उनको छोड़कर भागने का औचित्य क्या? गन, ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर इन सब को यूंही छोड़ कर क्यों भाग गए आतंकवादी? या फिर ये भी पहले से ही प्लान्ड था कि इनको छोड़ना था। बस पर इतने पास से रॉकेट दागा जाता है पर उसका निशाना चूक जाता है? बस के सामने से आकर बस पर ग्रेनेड फेंकने की कोशिश की जाती है और वो आतंकी के हाथ से छूटकर दूर गिर जाता है? क्या ऐसी ही ट्रेनेंड आतंकी थे जिन्होंने मुंबई पर हमला किया था?
9) सबसे बड़ा सवाल कि पाकिस्तान के इतने भरे-पूरे इलाके में 12 लोग हमला करते हैं और फिर मौका-ए-वारदात से गायब हो जाते हैं। एनकाउंटर तो दूर की बात लगभग 15 मिनट तक वो गोलीबारी करते हैं और फिर फरार हो जाते हैं और वहां कि पुलिस किसी को दबोचना तो दूर की बात उनका पता तक नहीं लगा पाती कि वो गए कहां। कोई भी वहां का निवासी ये बताने को राज़ी नहीं है कि आखिरकार वो किस तरफ गए हैं या उनको कहां देखा गया है। वैसे लाहौर के मॉडल टाउन इलाके से संदिग्ध 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और इस मामले पर अब तक 60 लोगों को हिरासत में लिया गया।
10) दूसरी तरफ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस पूरे हमले के पीछे वहीं पाकिस्तान की अंदरूनी रंजिश हो। किसी भी आतंकी का ना तो पकड़ा जाना और ना ही घायल होना, दाल को कहीं ना कहीं काला जरूर बनाता है।
तो ये सब सवाल खड़े हैं अपना मुंह खोले कि क्या कोई दे पाएगा इनका जवाब। लाहौर से बाघा बॉर्डर महज 20 किलोमीटर की दूरी पर है। तो कई की आशंका है कि वो सारे आतंकवादी वहां से भागकर सबसे सुरक्षित स्थान भारत में दाखिल हो सकते हैं। तो फिर यदि देखा जाए तो कोई भी सुरक्षित नहीं है। ना इस पार के ना उस पार के। पाकिस्तानियों को ये समझना चाहिए कि ये हमला उनके देश में बैठे कुछ नापाक दहश्तगर्दों ने करवाया है। हम मुंबई हमलों के लिए किसी को माफ नहीं कर सकते, लेकिन अपनी पर आजाएं तो उसकी कीमत चुकाने की औकात इस जमाने में नहीं।

हम तो शुक्रगुजार हैं भगवान के उस बंदे का जो श्रीलंका टीम की बस का ड्राइवर था जिसने हिम्मत दिखाते हुए टीम को सकुशल गद्दाफी तक पहुंचा दिया। जिसके सामने वाले शीशे पर गोलियां टकरा रहीं थी और उसने एक्सीलेटर और अपने पैर पर विश्वास करके पाकिस्तान, क्रिकेट और आईसीसी के साथ-साथ दुनिया को शर्मिंदगी उठाने से बचा लिया और अकेले आतंक को मात देने में कामयाब रहा।
आपका अपना
नीतीश राज
(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)
हमने तुरंत मैच से यूं ही न्यूज की तरफ ऱुख किया। आंख फटी की फटी रह गई। अरे, ये क्या? कहां हुआ हमला, किसने किया, किनपर किया? ये तो पाकिस्तान है, तो क्या पाक टीम पर हमला हुआ है नहीं ये तो श्रीलंका की टीम आतंक की शिकार बनी है। बेहद दुख हुआ और नहीं जानता कि आलस कहां गायब हो गया तकरीबन 3-4 घंटे तक लगातार यूं ही चैनल खंगालता रहा। कई बार तो गुस्से ने दिमाग के सभी तारों को झनझना दिया।

अरे, क्या पागल होगए हैं पाकिस्तान के अधिकारी। जितने भी बयान किसी आला अफसर की तरफ से आ रहे थे उनमें से कुछ और साथ ही कई पत्रकारों के सवाल के निशाने पर कहीं ना कहीं भारत था। कई पाकिस्तानी न्यूज चैनलों पर ये साफ चला कि ये आतंकवादी बाघा बार्डर के रास्ते आए थे। मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था कि पहले तो सुरक्षा में इतनी भारी चूक और उसपर तुर्रा देखिए कि अभी हालात को सामान्य करने की बजाय लगे हैं निशाना साधने पर।
इस पूरे हमले पर कई और कहां-कहां सवाल खड़े होते हैं पाकिस्तान के लिए----
1) कैसे हुई श्रीलंका की टीम की सुरक्षा में चूक? जब कि श्रीलंका की टीम को मिलती है ग्रेड ए यानी कि किसी दूसरे देश से आए हुए किसी भी राष्ट्राध्यक्ष जैसी सुरक्षा। श्रीलंका टीम के काफिले की सुरक्षा के लिए करीब 70 पुलिसवाले दिए गए थे। तो सवाल ये उठता है कि कहां गए 70 पुलिसकर्मी? यदि 70 पुलिसकर्मी वहां पर मौजूद थे तो 12 आतंकी उनको चकमा देने में कैसे कामयाब होगए, कैसे फरार हो गए सभी के सभी और वो भी 5-6 पुलिसवालों को मारकर?
2) गद्दाफी स्टेडियम तक जाने के कई रास्ते हैं। ऐसा बताया गया है कि टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक हर रोज दूसरे रास्ते से ले जाया जाता हैं। तो ये चूक कहां से हुई कि आतंकवादी जान गए वो रास्ता जिस रास्ते से आज टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक पहुंचना था?
3) दूसरे टेस्ट के दूसरे दिन जिस रास्ते का इस्तेमाल किया गया था टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक लाने के लिए, तीसरे दिन भी उसी रास्ते का इस्तेमाल क्यों किया गया? रूट में हमेशा की तरह बदलाव क्यों नहीं किया गया?
4) पहले से ही सरकार को आगाह किया जा रहा था कि नवाज शरीफ और उनके भाई को पंजाब प्रांत से चुनाव ना लड़ने देने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पंजाब सूबे में नवाज शरीफ का जो रुतबा है वो पूरे पाकिस्तान के किसी भी प्रांत में जरदारी या फिर गिलानी का नहीं होगा। पंजाब सूबे के लोग नवाज के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
5) 12 आतंकवादी ये प्लान बनाते हैं कि मेहमान टीम पर हमला करना है। इस बात का मतलब ये है कि आतंकी काफी दिनों से इस योजना को अंजाम देने की कोशिश में जुटे हुए थे। तो क्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी सो रही थी?
6) स्वात पर तालिबान का कब्जा हो गया है और वहां पर पाकिस्तान का नहीं तालिबान का फरमान चलता है और ये धमकी पहले से ही दी जा रही थी कि सिर्फ स्वात के बाद निशाना पूरे पाकिस्तान पर है, और खासतौर पर इस प्रांत।
7) पाकिस्तान के अधिकारी कह रहे हैं कि ये हमला पूरी तरह से देखने पर लगता है कि जैसे मुंबई हमलों को अंजाम दिया गया था बिल्कुल उसी तरह इस का प्लान लाहौर में भी किया गया। याने कि वो हमला भी पाकिस्तान में प्लान किया गया था और ये हमला भी अंदर के लोगों ने ही प्लान किया है।
8) अभी तक जो माना गया है कि ये अटैक सुनियोजित था और 12 के 12 आतंकवादी अपने में पूरे ट्रेनेंड थे। शायद वो पूरी श्रीलंका की टीम को बंदी बनाना चाहते थे। पर देखने से जो लगा कि उनके पास अस्ला, बारूद, सामान काफी था पर फिर भी उसके बाद सवाल ये उठता है कि यदि वो सब ट्रेनेंड थे तो फिर सवाल ये कि मास्क पहन कर हमला करना और फिर मास्क फैंक देना, क्यों? जिस बैग को आप हमेशा अपने साथ, पीठ पर लादे रख रहे थे फिर उनको छोड़कर भागने का औचित्य क्या? गन, ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर इन सब को यूंही छोड़ कर क्यों भाग गए आतंकवादी? या फिर ये भी पहले से ही प्लान्ड था कि इनको छोड़ना था। बस पर इतने पास से रॉकेट दागा जाता है पर उसका निशाना चूक जाता है? बस के सामने से आकर बस पर ग्रेनेड फेंकने की कोशिश की जाती है और वो आतंकी के हाथ से छूटकर दूर गिर जाता है? क्या ऐसी ही ट्रेनेंड आतंकी थे जिन्होंने मुंबई पर हमला किया था?
9) सबसे बड़ा सवाल कि पाकिस्तान के इतने भरे-पूरे इलाके में 12 लोग हमला करते हैं और फिर मौका-ए-वारदात से गायब हो जाते हैं। एनकाउंटर तो दूर की बात लगभग 15 मिनट तक वो गोलीबारी करते हैं और फिर फरार हो जाते हैं और वहां कि पुलिस किसी को दबोचना तो दूर की बात उनका पता तक नहीं लगा पाती कि वो गए कहां। कोई भी वहां का निवासी ये बताने को राज़ी नहीं है कि आखिरकार वो किस तरफ गए हैं या उनको कहां देखा गया है। वैसे लाहौर के मॉडल टाउन इलाके से संदिग्ध 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और इस मामले पर अब तक 60 लोगों को हिरासत में लिया गया।
10) दूसरी तरफ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस पूरे हमले के पीछे वहीं पाकिस्तान की अंदरूनी रंजिश हो। किसी भी आतंकी का ना तो पकड़ा जाना और ना ही घायल होना, दाल को कहीं ना कहीं काला जरूर बनाता है।
तो ये सब सवाल खड़े हैं अपना मुंह खोले कि क्या कोई दे पाएगा इनका जवाब। लाहौर से बाघा बॉर्डर महज 20 किलोमीटर की दूरी पर है। तो कई की आशंका है कि वो सारे आतंकवादी वहां से भागकर सबसे सुरक्षित स्थान भारत में दाखिल हो सकते हैं। तो फिर यदि देखा जाए तो कोई भी सुरक्षित नहीं है। ना इस पार के ना उस पार के। पाकिस्तानियों को ये समझना चाहिए कि ये हमला उनके देश में बैठे कुछ नापाक दहश्तगर्दों ने करवाया है। हम मुंबई हमलों के लिए किसी को माफ नहीं कर सकते, लेकिन अपनी पर आजाएं तो उसकी कीमत चुकाने की औकात इस जमाने में नहीं।

हम तो शुक्रगुजार हैं भगवान के उस बंदे का जो श्रीलंका टीम की बस का ड्राइवर था जिसने हिम्मत दिखाते हुए टीम को सकुशल गद्दाफी तक पहुंचा दिया। जिसके सामने वाले शीशे पर गोलियां टकरा रहीं थी और उसने एक्सीलेटर और अपने पैर पर विश्वास करके पाकिस्तान, क्रिकेट और आईसीसी के साथ-साथ दुनिया को शर्मिंदगी उठाने से बचा लिया और अकेले आतंक को मात देने में कामयाब रहा।
आपका अपना
नीतीश राज
(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)
पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला, पाक में आतंक के आगे हारा क्रिकेट।
पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला हुआ। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब कि विदेशी दौरे पर गई किसी टीम पर आतंकवादी हमला किया गया हो। श्रीलंका की टीम की जगह वो भारत की भी टीम हो सकती थी। जनवरी-फरवरी में भारत को पाकिस्तान का दौरा भी करना था। ऑस्ट्रेलिया और भारत के मना करने के बाद श्रीलंका ने दो फेज में पाकिस्तान का दौरा करना कबूला। जनवरी में वन डे और फरवरी-मार्च में दो टेस्ट।

दूसरे टेस्ट का तीसरा दिन, श्रीलंकाई टीम की बस होटल से गद्दाफी स्टेडियम जहां पर दूसरा टेस्ट खेला जा रहा था वहां के लिए रवाना हुई। साथ में आगे पीछे सुरक्षा दस्ता। सब ठीक चल रहा था, श्रीलंका की टीम इस पर हल्की चर्चा करने में मश्गूल थी कि कैसे गेंदबाजी करनी है। पाकिस्तान के समय अनुसार सुबह 8.40 पर टीम की बस गद्दाफी स्टेडियम के पास लिबर्टी चौक के पास पहुंची। जैसे ही राउंडअबॉयुट याने गोलचक्कर पर घूमी, चारों तरफ से बस और बस को सुरक्षा दे रहे पुलिस के दस्ते पर हमला कर दिया गया। 12 आतंकवादी बस पर अंधाधुंध गोलियां चला रहे थे जिसमें श्रीलंका की क्रिकेट टीम बैठी थी।
सामने से आ रही गोलियों से बच पाना बस के आगे चल रहे पुलिस दस्ते के लिए मुमकिन नहीं था। 7 पुलिसवाले मौके पर ही ढेर हो गए। बस पर ताबड़तोड़ गोलियां लग रहीं थी, और इधर खिलाड़ियों की चीख निकलने लगी।
6 खिलाड़ियों को गोलियां लगी।
फायरिंग की आवाज़ सुनते के साथ ही खिलाड़ियों ने झुकना शुरू कर दिया। चमिंडा वास ने बताया कि, फायरिंग के समय यदि वो झुके नहीं होते तो गोली लग सकती थी, गोली ठीक उनके ऊपर से गई थी। श्रीलंकाई बस के ड्राइवर मेहर मोहम्मद ने बताया कि गोली की आवाज़ के बाद पहले तो लगा कि कोईं पटाखे चला रहा है पर तुरंत पीछे बैठे किसी खिलाड़ी ने पीछे से आवाज़ लगाई कि ‘चलो, जल्दी चलो(go)’। ड्राइवर ने समझदारी का काम किया एक्सीलेटर पर रखा पैर और बस को गद्दाफी स्टेडियम के अंदर पर पहुंचाकर ही दम लिया। जो खिलाड़ी घायल हुए----

--कप्तान महेला जयवर्द्धने के पांव में टखना(ankle) में हल्का सा कट लगा, याने कोई खतरा नहीं।
--उप कप्तान कुमार संगकार के कंधे में गोली लगी, खतरे से बाहर।
--अजंथा मेंडिस-पीठ पर किसी चीज के गहरा घाव।
--थरंगा परनाविथाना-सीने में लगी गोलीघाव।
--थीलाना समरवीरा-जांघ में लगी गोली, खतरे से बाहर पर पूरी तरह नहीं। समरवीरा टीम के टॉप के बल्लेबाज जिसने पिछले टेस्ट और दूसरे टेस्ट की पहली पारी में दोहरा शतक जड़ा था।
--पॉल फरबरेस-श्रीलंकाई टीम के सहायक कोच के हाथ में गहरा घाव।
श्रीलंकाई टीम की बस के पीछे एलिट अंपायर की वैन भी आ रही थी। 5 अंपायरों के इस काफिले पर भी आतंकवादियों ने निशाना साधा और इसमें रिजर्व अंपायर एहसान रज़ा गंभीर रूप से घायल हो गए। अभी भी एहसान रज़ा अस्पताल में भर्ती हैं पर अभी-अभी पता चला है कि वो ख़तरे से बाहर हैं। लेकिन इस वैन को जो ड्राइवर थे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
पुलिस की तफ्तीश के बाद पता चला कि 12 आतंकवादियों का ये काम था और उन्होंने हमले में ऑटोमैटिक गन, हैंड ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर और स्टार डायमंड पिस्टल का इस्तेमाल किया। कुछ का कहना ये है कि ये अटैक पूरा 26/11 मुंबई हमलों की तर्ज पर किया गया है।
वैसे ही पाकिस्तान में कोई भी खिलाड़ी जाकर नहीं खेलना चाहता। 2008 में ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पाक का दौरा रद्द किया था। उसके बाद चैंपियंस ट्रॉफी रद्द की गई। फिर भारत ने मुंबई हमलों के बाद दौरा रद्द कर दिया, जिसे की आज पूरा विश्व सही ठहरा रहा है। जब ये फैसला लिया गया था तो मुझे याद है कि दुनिया और कुछ पाक के खिलाड़ी जैसे आफरीदी ने काफी कुछ उल्टा सीधा कहा था। श्रीलंका की टीम ने हौसला दिखाया और उसके इस निर्णय पर कई सवाल भी उठे थे।

इस हमले के तुरंत बाद श्रीलंकाई टीम का पाकिस्तान दौरा रद्द कर दिया गया। कोई भी खिलाड़ी इलाज कराने के लिए भी पाक में नहीं रुकना चाहता था। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ये हुआ होगा कि किसी टीम को मैदान से ही हेलिकॉप्टर से दूसरे देश ले जाया गया और फिर वहां से वो रात तक वापिस अपने देश में पहुंच जाएंगे।
आपका अपना
नीतीश राज

दूसरे टेस्ट का तीसरा दिन, श्रीलंकाई टीम की बस होटल से गद्दाफी स्टेडियम जहां पर दूसरा टेस्ट खेला जा रहा था वहां के लिए रवाना हुई। साथ में आगे पीछे सुरक्षा दस्ता। सब ठीक चल रहा था, श्रीलंका की टीम इस पर हल्की चर्चा करने में मश्गूल थी कि कैसे गेंदबाजी करनी है। पाकिस्तान के समय अनुसार सुबह 8.40 पर टीम की बस गद्दाफी स्टेडियम के पास लिबर्टी चौक के पास पहुंची। जैसे ही राउंडअबॉयुट याने गोलचक्कर पर घूमी, चारों तरफ से बस और बस को सुरक्षा दे रहे पुलिस के दस्ते पर हमला कर दिया गया। 12 आतंकवादी बस पर अंधाधुंध गोलियां चला रहे थे जिसमें श्रीलंका की क्रिकेट टीम बैठी थी।
सामने से आ रही गोलियों से बच पाना बस के आगे चल रहे पुलिस दस्ते के लिए मुमकिन नहीं था। 7 पुलिसवाले मौके पर ही ढेर हो गए। बस पर ताबड़तोड़ गोलियां लग रहीं थी, और इधर खिलाड़ियों की चीख निकलने लगी।
6 खिलाड़ियों को गोलियां लगी।
फायरिंग की आवाज़ सुनते के साथ ही खिलाड़ियों ने झुकना शुरू कर दिया। चमिंडा वास ने बताया कि, फायरिंग के समय यदि वो झुके नहीं होते तो गोली लग सकती थी, गोली ठीक उनके ऊपर से गई थी। श्रीलंकाई बस के ड्राइवर मेहर मोहम्मद ने बताया कि गोली की आवाज़ के बाद पहले तो लगा कि कोईं पटाखे चला रहा है पर तुरंत पीछे बैठे किसी खिलाड़ी ने पीछे से आवाज़ लगाई कि ‘चलो, जल्दी चलो(go)’। ड्राइवर ने समझदारी का काम किया एक्सीलेटर पर रखा पैर और बस को गद्दाफी स्टेडियम के अंदर पर पहुंचाकर ही दम लिया। जो खिलाड़ी घायल हुए----

--कप्तान महेला जयवर्द्धने के पांव में टखना(ankle) में हल्का सा कट लगा, याने कोई खतरा नहीं।
--उप कप्तान कुमार संगकार के कंधे में गोली लगी, खतरे से बाहर।
--अजंथा मेंडिस-पीठ पर किसी चीज के गहरा घाव।
--थरंगा परनाविथाना-सीने में लगी गोलीघाव।
--थीलाना समरवीरा-जांघ में लगी गोली, खतरे से बाहर पर पूरी तरह नहीं। समरवीरा टीम के टॉप के बल्लेबाज जिसने पिछले टेस्ट और दूसरे टेस्ट की पहली पारी में दोहरा शतक जड़ा था।
--पॉल फरबरेस-श्रीलंकाई टीम के सहायक कोच के हाथ में गहरा घाव।
श्रीलंकाई टीम की बस के पीछे एलिट अंपायर की वैन भी आ रही थी। 5 अंपायरों के इस काफिले पर भी आतंकवादियों ने निशाना साधा और इसमें रिजर्व अंपायर एहसान रज़ा गंभीर रूप से घायल हो गए। अभी भी एहसान रज़ा अस्पताल में भर्ती हैं पर अभी-अभी पता चला है कि वो ख़तरे से बाहर हैं। लेकिन इस वैन को जो ड्राइवर थे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
पुलिस की तफ्तीश के बाद पता चला कि 12 आतंकवादियों का ये काम था और उन्होंने हमले में ऑटोमैटिक गन, हैंड ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर और स्टार डायमंड पिस्टल का इस्तेमाल किया। कुछ का कहना ये है कि ये अटैक पूरा 26/11 मुंबई हमलों की तर्ज पर किया गया है।
वैसे ही पाकिस्तान में कोई भी खिलाड़ी जाकर नहीं खेलना चाहता। 2008 में ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पाक का दौरा रद्द किया था। उसके बाद चैंपियंस ट्रॉफी रद्द की गई। फिर भारत ने मुंबई हमलों के बाद दौरा रद्द कर दिया, जिसे की आज पूरा विश्व सही ठहरा रहा है। जब ये फैसला लिया गया था तो मुझे याद है कि दुनिया और कुछ पाक के खिलाड़ी जैसे आफरीदी ने काफी कुछ उल्टा सीधा कहा था। श्रीलंका की टीम ने हौसला दिखाया और उसके इस निर्णय पर कई सवाल भी उठे थे।

इस हमले के तुरंत बाद श्रीलंकाई टीम का पाकिस्तान दौरा रद्द कर दिया गया। कोई भी खिलाड़ी इलाज कराने के लिए भी पाक में नहीं रुकना चाहता था। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ये हुआ होगा कि किसी टीम को मैदान से ही हेलिकॉप्टर से दूसरे देश ले जाया गया और फिर वहां से वो रात तक वापिस अपने देश में पहुंच जाएंगे।
आपका अपना
नीतीश राज
Tuesday, January 13, 2009
हमारे न्यूज चैनल कितने परिपक्व?
जो भी न्यूज़ देखता है उनसे पूछा जाए कि न्यूज़ चैनल के लिए क्या जरूरी है खबर या टीआरपी, तो अधिकतर कहेंगे ‘खबर’, पर न्यूज चैनल टीआरपी पसंद करते हैं और अब न्यूज़ कहां। लेकिन कुछ दिनों से ये देखा जा रहा है कि न्यूज़ चैनलों पर न्यूज़ वापस लौटी है। वर्ना पहले न्यूज़ के सिवा हमारे देश के न्यूज़ चैनलों पर सब कुछ होता था। नाग-नागिन, भूत, ज्योतिष, भ्रम फैलाने वाली ख़बरें और इन पर होने वाले लंबी-लंबी चर्चा, एक ही तस्वीर बार-बार दिखाई जाती थी। पर नहीं बदली तो खेल की खबरें पहले भी सिर्फ क्रिकेट होता था और अब भी सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट ही होता है, किसी और खेल को जगह नहीं मिल पाती। क्यों? क्योंकि भारत में क्रिकेट के सिवा कुछ नहीं ‘बिकता’। कुछ अंग्रेजी चैनल खेल की खबरों में सभी खेलों को जगह देते दिख जाएंगे पर हिंदी न्यूज चैनलों पर तो सिर्फ ढाक के तीन पात याने क्रिकेट। दूसरे खेलों के हाल का अंदाजा हम इससे लगा सकते हैं कि पुलेला गोपीचंद को खेल मंत्री एम एस गिल ने नहीं पहचाना था, जबकि गुपीचंद की शागिर्द सायना नेहवाल के कंधे पर हाथ रख कर मंत्री जी खड़े थे। शायद मंत्री जी भी हिंदी न्यूज चैनल ही देखते होंगे।
वहीं गर दूसरे शब्दों में कहें, कि क्या हमारी न्यूज इंडस्ट्री इतनी परिपक्व हो गई है जितने की पश्चिमी देशों की न्यूज़ इंडस्ट्री? हमारे लिए न्यूज़ क्या है? यदि हम ये सवाल अपने आप से पूछें तो हमारे जहन में सबसे पहले ख्याल क्या आएगा? हमारी खबरों का दायरा सिर्फ और सिर्फ हमारे इर्द गिर्द ही घूमता है, आस पास की क्षेत्रीय हलचल पर हम ज्यादा ध्यान देते हैं। देश में क्या चल रहा है राजनीति के स्तर पर थोड़ा बहुत लोग पढ़ भी लेते हैं या जान लेने के इच्छुक होते हैं वर्ना दूसरे प्रदेश, या देश या फिर सात समंदर की खबरों को जानने के इच्छुक हम बहुत ही कम होते हैं।
मुंबई हमलों के दौरान बीबीसी पर पूरे दिन-रात सिर्फ और सिर्फ मुंबई की ख़बरें ही छाई रहीं। क्या ब्रिटेन में २६ से २९ तक कुछ भी ऐसा नहीं घट रहा था कि वो बीबीसी चैनल पर एयर टाइम ले पाता। हमारे देश में तो बहुत से रिएलिटी शो हैं जिन पर हर दिन दो-तीन घंटे आराम से निकल जाते हैं। बीबीसी पर पूरे समय मुंबई हमलों का क़हर ही चलता रहा। सेटेलाइट फोन के जरिए तस्वीरें दिखाई जा रहीं थी। साथ ही विदेशी मीडिया इस बात का भी ध्यान रख रहा था कि कहीं भी विचलित करने वाली तस्वीरें ना दिखाई जाएं, क्षत विक्षप्त शरीर नहीं दिखे या फिर सेना की मूवमेंट भी नहीं दिखाई जा रही थी। बीबीसी पर ब्लॉगर छाए रहे, जो अपने ब्लॉग पर कोई जानकारी दे रहे थे, उनसे वो फोन पर बात भी कर रहे थे।
अब जब कि बहुत हद तक साफ हो गया है कि मुंबई हमलों में पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है। साथ ही कसाब को भी पाकिस्तानी मान लिया गया है। लेकिन मुंबई हमला भारतीय मीडिया के लिए एक नया अनुभव साबित हुआ। क्या रोल हो मीडिया का इस बारे में बात अगली बार। इस तरह की कमांडों कार्रवाई पहली बार हमारी मीडिया ने देखी। यदि गौर करें तो श्रीनगर या फिर बोर्डर एरिया को छोड़कर कहां पर हमें याद आता है कि कमांडो कार्रवाई की गई जिसे इतने बड़े पैमाने पर कवर किया गया। अमृतसर के स्वर्णमंदिर में कमांडो कार्रवाई हुई थी पर तब कितना सजग था मीडिया। कुछ चुनिंदा अखबार हुआ करते थे लोगों के पास टीवी भी नहीं था। तो किसी शहर में वो भी मैट्रो सिटी में इस तरह आतंकवादियों का क़हर बरपाना और साथ ही सबसे आगे निकलने की होड़ ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से इतनी बड़ी गलती करवाई जिसका सीधे-सीधे फायद पाकिस्तान में बैठे इन आतंकवादियों के आकाओं को मिला और बिना बाहर देखे वो कमांडो की हर कार्रवाई के बार में आसानी से जान जाते और हमारी सेना को इसका काफी खामियाजा भुगतना पड़ता। लगता तो ये है कि सबसे पहले और आगे निकलने की होड़ ने हमारी इलैक्ट्रोनिक मीडिया और एजेंसियों को कभी परिपक्व ही नहीं होने दिया।
यहां पर ये गौर करने वाली बात है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात बन गए हैं। साथ ही दोनों देशों में साइबर वॉर छिड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ मीडिया के बीच भी एक तरह की कोल्ड वॉर छिड़ गई है। ये समय होता है कि दोनों देश अपने आप में संयम बरतें पर ऐसा दिख नहीं रहा है। मीडिया की बात है तो कुछ कायदे, कानून, नियम, सरकार को बनाने ही होंगे जो कि ऐसी आपतकाल स्थितियों में मीडिया पर लागू हो। सरकार ही मीडिया को कुछ फुटेज और घंटे दर घंटे ब्रीफिंग करे और हालात से वाकिफ कराए। जब चाहे सरकार आपात स्थितियों में दुनिया के सामने जैसे चाहे हालात दिखाना चाहे वो दिखाए। याने कि जिस तरह की कवरेज से दूसरे समूह याने कि हमलावरों को फायदा नहीं पहुंचे। वैसे सरकार जल्द ही इस मामले में कुछ नियम कानून की व्यवस्था करने में जुट गई है। पर देखना तो ये होगा कि ये नियम आते कितने वक्त में हैं और न्यूज चैनल कितना इन नियमों पर अमल करते हैं। कुछ नियम एनबीए याने न्यूज ब्रॉडकास्ट एसो. ने भी बनाए हैं याने की वो संस्था जो कि मीडिया में रहकर मीडिया पर सख़्त नज़र रखती है। उनपर एक नज़र अगली बार।
आपका अपना
नीतीश राज
वहीं गर दूसरे शब्दों में कहें, कि क्या हमारी न्यूज इंडस्ट्री इतनी परिपक्व हो गई है जितने की पश्चिमी देशों की न्यूज़ इंडस्ट्री? हमारे लिए न्यूज़ क्या है? यदि हम ये सवाल अपने आप से पूछें तो हमारे जहन में सबसे पहले ख्याल क्या आएगा? हमारी खबरों का दायरा सिर्फ और सिर्फ हमारे इर्द गिर्द ही घूमता है, आस पास की क्षेत्रीय हलचल पर हम ज्यादा ध्यान देते हैं। देश में क्या चल रहा है राजनीति के स्तर पर थोड़ा बहुत लोग पढ़ भी लेते हैं या जान लेने के इच्छुक होते हैं वर्ना दूसरे प्रदेश, या देश या फिर सात समंदर की खबरों को जानने के इच्छुक हम बहुत ही कम होते हैं।
मुंबई हमलों के दौरान बीबीसी पर पूरे दिन-रात सिर्फ और सिर्फ मुंबई की ख़बरें ही छाई रहीं। क्या ब्रिटेन में २६ से २९ तक कुछ भी ऐसा नहीं घट रहा था कि वो बीबीसी चैनल पर एयर टाइम ले पाता। हमारे देश में तो बहुत से रिएलिटी शो हैं जिन पर हर दिन दो-तीन घंटे आराम से निकल जाते हैं। बीबीसी पर पूरे समय मुंबई हमलों का क़हर ही चलता रहा। सेटेलाइट फोन के जरिए तस्वीरें दिखाई जा रहीं थी। साथ ही विदेशी मीडिया इस बात का भी ध्यान रख रहा था कि कहीं भी विचलित करने वाली तस्वीरें ना दिखाई जाएं, क्षत विक्षप्त शरीर नहीं दिखे या फिर सेना की मूवमेंट भी नहीं दिखाई जा रही थी। बीबीसी पर ब्लॉगर छाए रहे, जो अपने ब्लॉग पर कोई जानकारी दे रहे थे, उनसे वो फोन पर बात भी कर रहे थे।
अब जब कि बहुत हद तक साफ हो गया है कि मुंबई हमलों में पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है। साथ ही कसाब को भी पाकिस्तानी मान लिया गया है। लेकिन मुंबई हमला भारतीय मीडिया के लिए एक नया अनुभव साबित हुआ। क्या रोल हो मीडिया का इस बारे में बात अगली बार। इस तरह की कमांडों कार्रवाई पहली बार हमारी मीडिया ने देखी। यदि गौर करें तो श्रीनगर या फिर बोर्डर एरिया को छोड़कर कहां पर हमें याद आता है कि कमांडो कार्रवाई की गई जिसे इतने बड़े पैमाने पर कवर किया गया। अमृतसर के स्वर्णमंदिर में कमांडो कार्रवाई हुई थी पर तब कितना सजग था मीडिया। कुछ चुनिंदा अखबार हुआ करते थे लोगों के पास टीवी भी नहीं था। तो किसी शहर में वो भी मैट्रो सिटी में इस तरह आतंकवादियों का क़हर बरपाना और साथ ही सबसे आगे निकलने की होड़ ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से इतनी बड़ी गलती करवाई जिसका सीधे-सीधे फायद पाकिस्तान में बैठे इन आतंकवादियों के आकाओं को मिला और बिना बाहर देखे वो कमांडो की हर कार्रवाई के बार में आसानी से जान जाते और हमारी सेना को इसका काफी खामियाजा भुगतना पड़ता। लगता तो ये है कि सबसे पहले और आगे निकलने की होड़ ने हमारी इलैक्ट्रोनिक मीडिया और एजेंसियों को कभी परिपक्व ही नहीं होने दिया।
यहां पर ये गौर करने वाली बात है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात बन गए हैं। साथ ही दोनों देशों में साइबर वॉर छिड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ मीडिया के बीच भी एक तरह की कोल्ड वॉर छिड़ गई है। ये समय होता है कि दोनों देश अपने आप में संयम बरतें पर ऐसा दिख नहीं रहा है। मीडिया की बात है तो कुछ कायदे, कानून, नियम, सरकार को बनाने ही होंगे जो कि ऐसी आपतकाल स्थितियों में मीडिया पर लागू हो। सरकार ही मीडिया को कुछ फुटेज और घंटे दर घंटे ब्रीफिंग करे और हालात से वाकिफ कराए। जब चाहे सरकार आपात स्थितियों में दुनिया के सामने जैसे चाहे हालात दिखाना चाहे वो दिखाए। याने कि जिस तरह की कवरेज से दूसरे समूह याने कि हमलावरों को फायदा नहीं पहुंचे। वैसे सरकार जल्द ही इस मामले में कुछ नियम कानून की व्यवस्था करने में जुट गई है। पर देखना तो ये होगा कि ये नियम आते कितने वक्त में हैं और न्यूज चैनल कितना इन नियमों पर अमल करते हैं। कुछ नियम एनबीए याने न्यूज ब्रॉडकास्ट एसो. ने भी बनाए हैं याने की वो संस्था जो कि मीडिया में रहकर मीडिया पर सख़्त नज़र रखती है। उनपर एक नज़र अगली बार।
आपका अपना
नीतीश राज
Tuesday, January 6, 2009
क्यों हमारे देश भीख मांगने आ रहे हो मुशर्रफ?
अभी हाल ही में ये खबर सामने आई थी कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्ऱफ भारत आ सकते हैं। वैसे मुशर्रफ इसलिए भारत नहीं आ रहे कि मुंबई हमलों के मामले में भारत की कुछ मदद कर सकें। दरअसल मुशर्रफ भविष्य में अपनी राजनीतिक गतिविधियों के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से भारत, अमेरिका, हांगकांग, चीन, यूरोपीय देशों की यात्रा कर विशेष व्याख्यान देंगे। इन सभी देशों में जाकर वो अपने संवादों के जरिए अपना नजरिया लोगों तक पहुंचाएंगे। और वैसे भी मियां मुशर्रफ के पास अभी दो साल का वक्त भी है क्योंकि दो साल याने नवंबर २००९ से पहले वो राजनीति में नहीं उतर सकते। सत्ता छोड़ने के बाद से ही ये पाबंदी लगी हुई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये आता है कि जहां एक तरफ तो मुशर्रफ भारत के सबूत देने के बाद भी अपना बचाव करने में लगे हुए हैं साथ ही युद्ध तक की धमकी देने से गुरेज नहीं कर रहे तो भारत आकर व्याख्यान के जरिए भारत की जनता से अपने जीवनयापन और अपने स्वार्थ के लिए भीख मांगने की जरूरत क्या है। यदि लड़ाई रखनी है तो खुल के रखो। एक तरफ तो आप पीठ में खंजर भोंक रहे हैं, भारत को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में जलील करने से भी नहीं चूक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने स्वार्थ के लिए आप भारत में आकर भारत के पैसों से, भारत का निवाला खाकर भारत के खिलाफ ज़हर उगलने की तैयारी कर रहे हैं।
यदि देखता हूं तो अपनी सरकार की ही राजनीतिक अस्थिरता ज्यादा नज़र आती है। क्यों हमारे फैसले अडिग नहीं रहते? यदि किसी देश ने आपका जीना दुर्भर कर रखा है तो बेहतरी इसी में है कि कुछ समय के लिए उस देश का बहिष्कार कर दो। दूसरे देश को इस बात से कितना असर पड़ेगा इस बात की चिंता करने की हमें जरूरत नहीं है। हमें अपने कड़े कदम उठाने की जरूरत है और साथ ही दुनिया को ये भी बताने की जरूरत है कि हम ये कड़े कदम उठा रहे हैं। यदि पाकिस्तान से दोस्ती के बढ़े हाथ लाहौर बस सेवा, ट्रेन सेवा और हवाई सेवा को कुछ समय के लिए रोक दिया जाए तो पता चलता है कि हां आपने अपना रुख साफ किया है। एक तरफ तो क्रिकेट टीम, हॉकी टीम पर रोक लगा दी गई है वहीं दूसरी तरफ आतंकवादी एक देश से दूसरे देश आ-जा रहे हैं इन सेवाओं के जरिए। और यदि उस सेवाओं को बंद करने पर किसी को ऐतराज है तो बेहतर है कि वो पाकिस्तान में जाकर बस जाए मेरे देश भारत में इनके लिए जगह नहीं हैं। आतंकवाद के नाम पर अमेरिका किसी देश पर हमला कर दे तो चलेगा तो क्या हम आतंकवाद के नाम पर अपने देश की सुरक्षा के लिए कुछ कड़े कदम तो ले ही सकते हैं।
हमारी सरकार को चाहिए कि कड़े कदम उठाते हुए मियां मुशर्रफ को देश में आने से रोकें वर्ना पता नहीं वो कौन शख्स हो पर जिस बात का पता है वो है कि जूता कानपुर का ही रहेगा और यकीन मानिए चेहरा मुशर्रफ का ही होगा।
आपका अपना
नीतीश राज
यदि देखता हूं तो अपनी सरकार की ही राजनीतिक अस्थिरता ज्यादा नज़र आती है। क्यों हमारे फैसले अडिग नहीं रहते? यदि किसी देश ने आपका जीना दुर्भर कर रखा है तो बेहतरी इसी में है कि कुछ समय के लिए उस देश का बहिष्कार कर दो। दूसरे देश को इस बात से कितना असर पड़ेगा इस बात की चिंता करने की हमें जरूरत नहीं है। हमें अपने कड़े कदम उठाने की जरूरत है और साथ ही दुनिया को ये भी बताने की जरूरत है कि हम ये कड़े कदम उठा रहे हैं। यदि पाकिस्तान से दोस्ती के बढ़े हाथ लाहौर बस सेवा, ट्रेन सेवा और हवाई सेवा को कुछ समय के लिए रोक दिया जाए तो पता चलता है कि हां आपने अपना रुख साफ किया है। एक तरफ तो क्रिकेट टीम, हॉकी टीम पर रोक लगा दी गई है वहीं दूसरी तरफ आतंकवादी एक देश से दूसरे देश आ-जा रहे हैं इन सेवाओं के जरिए। और यदि उस सेवाओं को बंद करने पर किसी को ऐतराज है तो बेहतर है कि वो पाकिस्तान में जाकर बस जाए मेरे देश भारत में इनके लिए जगह नहीं हैं। आतंकवाद के नाम पर अमेरिका किसी देश पर हमला कर दे तो चलेगा तो क्या हम आतंकवाद के नाम पर अपने देश की सुरक्षा के लिए कुछ कड़े कदम तो ले ही सकते हैं।
हमारी सरकार को चाहिए कि कड़े कदम उठाते हुए मियां मुशर्रफ को देश में आने से रोकें वर्ना पता नहीं वो कौन शख्स हो पर जिस बात का पता है वो है कि जूता कानपुर का ही रहेगा और यकीन मानिए चेहरा मुशर्रफ का ही होगा।
आपका अपना
नीतीश राज
Sunday, December 21, 2008
मांग करने वालों की तादाद बढ़ी तो अब सबकी जुबान चुप क्यों?
बिना तथ्यों के बात करना गलत होता है, यदि तथ्य हैं तो बेहतर हो कि उजागर भी हों। अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं वो पुराने तथ्यों से कुछ अलग हैं। जो पुराने तथ्य सामने आए थे वो ये थे कि करकरे, सालस्कर, काम्टे और साथ में बैठे तीनों सिपाही जब शहीद हुए तो उनके पास टाइम ही नहीं था कि वो आतंकवादियों की गोली का जवाब दे पाते। साथ ही तीनों अधिकारियों को पीछे की तरफ से गोली मारी गई थी। सबकुछ इतना अचानक हो गया कि किसी को भी पता नहीं चल सका था कि क्या हुआ। 27 की रात 1 बजे के करीब जब ये ख़बर आई थी कि हमारे तीन आला अधिकारियों को गोली लग गई है जिसमें से करकरे को ताज के पास और सालस्कर, काम्टे को कामा के पास गोली लगी है। पर थोड़ी देर बाद ये दुखद समाचार आया कि करकरे नहीं रहे, पर ये क्या सालस्कर भी नहीं रहे, और तीसरा फ्लैश था कि काम्टे भी शहीद। मुंबई के साथ-साथ पूरा देश आतंकित हो गया। हेमंत करकरे का नाम हर दिन सुनने को आ रहा था कारण था साध्वी का। तो फिर एकदम से खबर आना कि आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला कर दिया है और इन आतंकियों ने हमारे तीन आला अधिकारियों को मार दिया है तो ख़ौफ़ की बात तो थी ही। क्या आतंकवादी इतने ताकतवर होकर आए हैं कि पूरे मुंबई को कब्जे में कर लेंगे। फिर एक घंटे बाद ही ये साफ हो गया कि तीनों अधिकारी कामा के पास शहीद हुए। लेकिन जिस क्वालिस में करकरे थे उस क्वालिस में सिर्फ एक सिपाही घायल अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहा था। अभी तक जो भी सच सामने आया है वो है खुद जाधव की जुबानी। जो भी हमने जाना है वो हमें जाधव ने बताया है। उस में ही ये सच सामने आया कि उस क्वालिस में किसी ने भी बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहन रखी थी। दूसरी बात जो सामने आई थी वो ये कि इतना मौका किसी के पास भी नहीं था कि कोई संभल कर आतंकवादियों का जवाब दे पाता।
पर अब, जो बात सामने आ रही है वो है कसाब की जुबानी। अजमल आमिर कसाब वो आतंकवादी, जो मुंबई में कहर बरपाने वाले देहश्तगर्द गुट का सदस्य था। कसाब को गिरगांव चौपाटी से जिंदा धर दबोचा गया था और इसका साथी इस्माइल मारा गया था। इन्हीं दोनों आतंकवादियों ने अधिकारियों को मारा और फिर इन्हीं की गाड़ी लेकर गिरगांव चौपाटी भाग निकले। अब कसाब का इकबाले जुर्म सामने आया है। कसाब का बयान जो सामने आया है वो बिल्कुल अलग है। आतंकवादी कसाब के मुताबिक जब वो कामा में क़हर बरपाने के बाद जैसे ही कामा से बाहर निकले तो पुलिस से उनका सामना हुआ। एके 47 का मुंह उन्होंने पुलिस पर खोल दिया। तभी वहां पर दूर से पुलिस की गाड़ियां भी आती दिखाई दी। पहली गाड़ी कामा के पीछे वाले गेट से आगे वाले गेट की तरफ बढ़ गई। थोड़े फासले से आती दूसरी गाड़ी पीछे वाले गेट के पास धीरे हो गई। धीरे होते के साथ क्वालिस में आगे की सीट पर बैठे पुलिसवाले ने उन्हें पहचान लिया था जिसके हाथ में एक 47 थी। गाड़ी रुकते के साथ ही पुलिस ने फायर खोल दिया। गोली कसाब के हाथ को चीरते हुए निकल गई। तभी इस्माइल ने गोलियां चलानी शुरू कर दी और सभी के सभी पुलिसवालों को मार दिया। तीन शव को गाड़ी से बाहर फेंक कर वो गाड़ी से मुंबई में ख़ौफ़ का क़हर, बरपाते हुए चले गए और गिरगांव चौपाटी पर पकड़े गए।
लेकिन यहीं पर बात जो सामने आती है वो है कि दो अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। ये बात भी सामने आ रही है कि ये दोनों छिपे हुए थे और जिस जगह पर छिपे थे वो गाड़ी के बांयी ओर थी और जो गोलियां अधिकारियों को लगी हैं वो दाहिने तरफ लगी हैं। जब आतंकवादी बांयी तरफ थे तो दायीं तरफ से और पीछे से गोली कैसे चली। मान लिया चलगई पता नहीं कैसे चल गई, कहां से चल गई। लेकिन हेमंत करकरे की बुलेट प्रूफ जैकेट कहां है? जब करकरे की मौत की खबर आई तो नरीमन हाउस में इस ख़बर का तालियों से स्वागत किया गया।
दूसरी बात कि हेमंत करकरे के सीने में तीन गोली लगी जब गोली पीछे से चलाई गईं तो गोली सीने में कैसे लगी? सीएसटी पर जब वो मोर्चा लेने के लिए निकले थे तो उन्होंने बुलेटप्रूफ जैकेट और साथ ही हेल्मेट भी लगा रखा था तो फिर उन्होंने ये उतार क्यों दिया? क्या हेमंत करकरे जैसे सीनियर ऑफिसर इस आतंकवादी घटना को कम आंक रहे थे। या कि फिर ओवर कॉनफिडेंस ने इन आतंकवादियों को इतना मौका दे दिया कि हमने देश का सच्चा सिपाही खो दिया। वो सिपाही जो कि देश को आने वाले दिनों में एक ऐसे सच से रूबरू कराने वाला था जो कि अभी तक भारत के इतिहास में नहीं हुआ था। जिसके कारण वो पूरे देश का दुश्मन बन गया था।
सालस्कर को भी गोली दाहिने तरफ ही लगी है। तो क्या इन दोनों थ्यौरियों में कुछ लोच है या फिर असलियत अभी आना बाकी है। मैं कसाब की थ्यौरी को तबज्जो नहीं देता लेकिन जाधव की भी बात कहीं ना कहीं अधुरी लगती है। जांच की मांग जो की जा रही है वो इन्हीं तथ्यों के कारण की जा रही है। पूरा देश ये मानता है कि तीनों ऑफिसर हमारे नगीना थे, अभी मुंबई को इनकी जरूरत थी शायद देश को भी, पर कुछ हैं जो कि मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। वो इस शहीद को खोने के हमारे ग़म को भी हमारा नहीं होने देना चाहते। अंतुले के बाद कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी है, साथ ही हर दिन कोई ना कोई इस जांच को कराने की वकालत कर रहा है तो फिर कुछ चुनिंदा लोग जांच क्यों नहीं होने देना चाहते। क्या कुछ पर्दे के पीछे है जो कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते की सामने आए?
आपका अपना
नीतीश राज
पर अब, जो बात सामने आ रही है वो है कसाब की जुबानी। अजमल आमिर कसाब वो आतंकवादी, जो मुंबई में कहर बरपाने वाले देहश्तगर्द गुट का सदस्य था। कसाब को गिरगांव चौपाटी से जिंदा धर दबोचा गया था और इसका साथी इस्माइल मारा गया था। इन्हीं दोनों आतंकवादियों ने अधिकारियों को मारा और फिर इन्हीं की गाड़ी लेकर गिरगांव चौपाटी भाग निकले। अब कसाब का इकबाले जुर्म सामने आया है। कसाब का बयान जो सामने आया है वो बिल्कुल अलग है। आतंकवादी कसाब के मुताबिक जब वो कामा में क़हर बरपाने के बाद जैसे ही कामा से बाहर निकले तो पुलिस से उनका सामना हुआ। एके 47 का मुंह उन्होंने पुलिस पर खोल दिया। तभी वहां पर दूर से पुलिस की गाड़ियां भी आती दिखाई दी। पहली गाड़ी कामा के पीछे वाले गेट से आगे वाले गेट की तरफ बढ़ गई। थोड़े फासले से आती दूसरी गाड़ी पीछे वाले गेट के पास धीरे हो गई। धीरे होते के साथ क्वालिस में आगे की सीट पर बैठे पुलिसवाले ने उन्हें पहचान लिया था जिसके हाथ में एक 47 थी। गाड़ी रुकते के साथ ही पुलिस ने फायर खोल दिया। गोली कसाब के हाथ को चीरते हुए निकल गई। तभी इस्माइल ने गोलियां चलानी शुरू कर दी और सभी के सभी पुलिसवालों को मार दिया। तीन शव को गाड़ी से बाहर फेंक कर वो गाड़ी से मुंबई में ख़ौफ़ का क़हर, बरपाते हुए चले गए और गिरगांव चौपाटी पर पकड़े गए।
लेकिन यहीं पर बात जो सामने आती है वो है कि दो अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। ये बात भी सामने आ रही है कि ये दोनों छिपे हुए थे और जिस जगह पर छिपे थे वो गाड़ी के बांयी ओर थी और जो गोलियां अधिकारियों को लगी हैं वो दाहिने तरफ लगी हैं। जब आतंकवादी बांयी तरफ थे तो दायीं तरफ से और पीछे से गोली कैसे चली। मान लिया चलगई पता नहीं कैसे चल गई, कहां से चल गई। लेकिन हेमंत करकरे की बुलेट प्रूफ जैकेट कहां है? जब करकरे की मौत की खबर आई तो नरीमन हाउस में इस ख़बर का तालियों से स्वागत किया गया।
दूसरी बात कि हेमंत करकरे के सीने में तीन गोली लगी जब गोली पीछे से चलाई गईं तो गोली सीने में कैसे लगी? सीएसटी पर जब वो मोर्चा लेने के लिए निकले थे तो उन्होंने बुलेटप्रूफ जैकेट और साथ ही हेल्मेट भी लगा रखा था तो फिर उन्होंने ये उतार क्यों दिया? क्या हेमंत करकरे जैसे सीनियर ऑफिसर इस आतंकवादी घटना को कम आंक रहे थे। या कि फिर ओवर कॉनफिडेंस ने इन आतंकवादियों को इतना मौका दे दिया कि हमने देश का सच्चा सिपाही खो दिया। वो सिपाही जो कि देश को आने वाले दिनों में एक ऐसे सच से रूबरू कराने वाला था जो कि अभी तक भारत के इतिहास में नहीं हुआ था। जिसके कारण वो पूरे देश का दुश्मन बन गया था।
सालस्कर को भी गोली दाहिने तरफ ही लगी है। तो क्या इन दोनों थ्यौरियों में कुछ लोच है या फिर असलियत अभी आना बाकी है। मैं कसाब की थ्यौरी को तबज्जो नहीं देता लेकिन जाधव की भी बात कहीं ना कहीं अधुरी लगती है। जांच की मांग जो की जा रही है वो इन्हीं तथ्यों के कारण की जा रही है। पूरा देश ये मानता है कि तीनों ऑफिसर हमारे नगीना थे, अभी मुंबई को इनकी जरूरत थी शायद देश को भी, पर कुछ हैं जो कि मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। वो इस शहीद को खोने के हमारे ग़म को भी हमारा नहीं होने देना चाहते। अंतुले के बाद कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी है, साथ ही हर दिन कोई ना कोई इस जांच को कराने की वकालत कर रहा है तो फिर कुछ चुनिंदा लोग जांच क्यों नहीं होने देना चाहते। क्या कुछ पर्दे के पीछे है जो कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते की सामने आए?
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“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”