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Tuesday, September 29, 2009

भारत में पाकिस्तान से ज्यादा पाकिस्तानी रहते हैं।



बहुत सोचने के बाद तकरीबन दो दिन सोचने के बाद मैंने ये फैसला किया कि इस बात को सब के साथ शेयर करूं।

हमारे देश की किस्मत ही है कि यहां रहने वाले ही उसकी पीठ में खंजर भोंकते हैं। ये हमारे देश में रहने वाले कुछ लोगों की फितरत है कि जिस थाली में खाते हैं वो उसी थाली में छेद करते हैं।

याद आता है कुछ साल पहले तक जब भारत-पाकिस्तान का मैच हुआ करता था तो सड़कें खाली हो जाया करती थीं। लोग घरों में टीवी, रेडियो से चिपककर बैठ जाया करते थे कि भारत-पाक का मैच आ रहा है। सब दिल, जज्बे और ना जाने क्या-क्या दांव पर लगा देते थे। पर इमरान खान की टीम कपिल देव और सुनील गावस्कर की टीम पर अधिकतर भारी पड़ती थी। हमारी हार होती थी तो लोगों के घरों में खाना नहीं बनता था, टीवी फोड़ दिए जाते थे, कुछ को दिल का दौरा पड़ जाया करता था, कोई खुदकुशी कर लेता था। ये सारी घटनाएं तो मैंने देखी और सुनी हैं।

याद आता है कि जब भारत की हार होती थी तो दूर-दूर तक सन्नाटा छा जाता था। कॉलोनियां-बस्तियां-गांव सब चुप हो जाते थे। पर तब भी कुछ जगह पर कुछ ऐसे लोग होते थे जिनके कदम से हर एक भारतीय आगबबूला हो जाता था।

यहां भारत हारी और कुछ इलाकों से जहां पर भी उनकी बहुलता होती थी वहां से पटाखे फोड़ने की आवाज़ें आती थी। जीत को मनाने और सब को बताने का साधन पटाखों से बेहतर कुछ नहीं होता। पर ये क्या भारत में रहकर भी कुछ लोग हैं जो कि पाकिस्तान की तरफ हैं और भारत की हार पर जश्न मना रहे हैं।

26 को भारत-पाक का मैच हुआ। मैच को पाकिस्तान की तरफ से जंग की तरह ही खेला गया और जिस बात का दावा पाक टीम के कप्तान ने किया वो कर भी दिया। अपनी गलती हो या फिर जज्बे की कमी हो जो भी मानें पर हम हार गए। मैदान में किसी एक टीम की हार और जीत तो होगी ही। कभी हम कभी वो ये सिलसिला तो बदस्तूर चलता ही रहेगा। 26 को जब भारत पाक से मैच हारा तो हमारे घर के पास ही कुछ लोगों ने जमकर पटाखे फोड़े और अपनी खुशी का इजहार किया। जिससे मैं हैरान-परेशान हूं।



क्या हर एक भारतीय को उस पाकिस्तानी की ललकार का जवाब देने के लिए नहीं खड़ा होना चाहिए। यदि मुट्ठी में कोई भी उंगली कम बंद हो तो वो मुट्ठी मजबूत नहीं रह जाती। वैसे ही गर एक भी भारतीय पाकिस्तानियों की तरह सोचता है तो मुट्ठी बंध ही नहीं पाएगी। और अगर कोई सोचता है तो बेहतर है कि वो भारत को घुन की तरह ना खाए जाकर पाकिस्तान में ही बसे अपने भाइयों के बीच



हर बार मुस्लिम होने पर परीक्षा क्यों देनी होगी? बहुत लोग ये सवाल पूछते हैं। हम तो कभी उनको पराया नहीं समझते, हम हर उस शख्स को पराया समझते हैं जो कि हमारे देश के खिलाफ हो फिर चाहे वो हिंदू हो, मुस्लिम हो, अंग्रेज हो, ईसाई हो, सिख हो। क्यों कुछ लोग ऐसे हैं जो कि भारत की हार पर खुश होते हैं? तो उन खुश होने वाले लोगों पर तो प्रश्नचिन्ह बिल्कुल जायज है।

ऐसे लोग मेरे देश मे गर हैं तो बेहतर है कि वो निकल जाएं और गर नहीं जा सकते तो बेहतरी इसी में है कि दशहरे के मौके पर रावण के साथ अपने दुर्भाव जला दें। यदि नहीं जला सकते तो रावण के साथ खुद जल जाएं। क्योंकि कोई भी भारतीय भारत की हार पर पटाखे बर्दाश्त नहीं कर सकता।

आपका अपना
नीतीश राज



Friday, March 6, 2009

लाहौर हमला, तीन थ्यौरी पर भारत महफूज

पाकिस्तान में श्रीलंका क्रिकेट टीम पर जो हमला हुआ है उसमें मुझे तो तीन थ्यौरी सामने आती हुई दिख रही हैं। जो तीन थ्यौरी हैं उन पर ही लगता है कि इस वक्त पाकिस्तान के हुक्मरान सोच रहे हैं। मेरे हिसाब से तीन थ्यौरी हैं---
१) तालिबान की करतूत
२) पाक के बाहर की शक्ति यानी भारत, एलटीटीई। (इसे वैसे तो खारिज कर दिया है पर फिर भी उंगली उठाने की फिराक में तो होंगे)
३) किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी।
अब बताते हैं कि क्यों ये तीन थ्यौरी सामने आ रही हैं।
पहली थ्यौरी यानी तालिबान की करतूत। पाकिस्तान के बहुत बड़े सियासी हल्कों में ये माना जा रहा है कि श्रीलंका की टीम पर जो हमला हुआ है वो तालिबान का पाकिस्तान पर बढ़ते वर्चस्व की निशानी है। जैसे कि तालिबान में हमेशा से ही पढ़ाई, सिनेमा, औरतों का बेपर्दा होने और खासतौर पर खेल पर काफी कड़े और सख्त कानून बनाए हुए हैं। तालिबानी नहीं चाहते कि क्रिकेट जैसा खेल वो या फिर उनके देश में खेला जाए और जब से स्वात पर अपना कब्जा तालिबान ने किया है तब से पाकिस्तान को अपने देश का हिस्सा मानने लग गया है तालिबान। साथ ही स्वात के बाद पूरे पाकिस्तान पर तालिबान अपना अधिपत्य जमाना चाहता है। वैसे अभी तक तफ्तीश में ज्यादातर अफगानियों को ही पकड़ा गया।
दूसरी थ्यौरी यानी पाक के बाहर की शक्ति भारत,एलटीटीई। मुंबई हमलों का दोषी पाकिस्तान को माना गया और अब तो ये साबित भी हो गया कि 26/11 की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी, हमलावर पाकिस्तान से आए थे और सारे दोषी पाकिस्तान में ही हैं। तो पाकिस्तान में ये मानने वालों की कमी नहीं है कि लाहौर हमला भारत के आंतकवादी गुट या फिर भारत की किसी खुफिया एजेंसी की कारसतानी है। बाघा बार्डर के रास्ते आए थे आतंकी पहला वक्तव्य था पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक आला अधिकारी का। दूसरी बात, लाहौर हमला मुंबई हमले का पार्ट-2 माना जा रहा है और इसी कारण से ये माना गया कि भारत की तरफ से उसी तरह इस हमले को अंजाम दिया गया जिस तरह से मुंबई हमलों को दिया गया था। यानी भारत ने बदला उतार लिया है। जब कि सारी दुनिया इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। श्रीलंका में एलटीटीई पर हमले के बाद से ये माना जा सकता था कि ये हमला वो भी करवा सकता है पर सोचने वाली बात ये है कि अभी तो वो श्रीलंका में ही अपने आप को बचाए रखने में असमर्थ हैं तो वो कहां से पाकिस्तान में अफगानी कपड़े पहनकर हमला करेंगे और यदि वो करते तो रॉकेट लॉन्चर और ग्रेनेड चूकता नहीं। पर इस थ्यौरी को पाकिस्तानी सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। अब देखेंगे कि पाकिस्तानी मीडिया क्या कहता है?
साथ ही बड़े केनवस पर देखें तो लोगों का ये मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत को इस हमले से कई फायदे हो सकते हैं। पाकिस्तान को एक आतंकवादी राष्ट्र घोषित किया जा सके(जो कि पाकिस्तान है)। साथ ही ये कि भारत कितना असुरक्षित है अपने पड़ोसी से और इस पड़ोसी से भारत को हमेशा ही खतरा बना हुआ है। आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण पाकिस्तान को अमेरिकी मदद भी नहीं मिलेगी।
तीसरी थ्यौरी यानी किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी। सबसे ज्यादा जो बात चल रही है कि ये जरूर से ही किसी घरेलू संगठन का हाथ हो सकता है। अंतिम वक्त पर बस के रूट में फेरबदल किया गया या नहीं किया गया वो ही रूट रखा जिससे एक दिन पहले गए थे इस पर भी शुरूआती बयान एक जैसे नहीं थे। माना ये भी जा रहा है कि किसी फोन के आने के बाद रूट में फेरबदल से इनकार किया गया था। जब दोनों टीमें एक साथ होटल से निकलती हैं तो पाकिस्तान की टीम श्रीलंका की टीम के साथ क्यों नहीं निकली। क्यों यूनुस खान ने अपनी टीम को ५ मिनट के लिए और रुकने को कहा? क्या कारण है इसके पीछे, ये सवाल तो खुद अंपायरों तक ने अपनी पीसी में कहा था।
जब ४८ घंटे पहले ही पंजाब प्रांत के पुलिस के आला अफसरों को ये बताया जा चुका था कि जल्द ही श्रीलंका की टीम को निशाना बनाया जा सकता है तब भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। खुद पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान ने सुरक्षा के इंतजामों पर सवाल उठाए हैं। जहां मिलने थे ७० सिपाही वहां मिले महज़ २५? तो क्या गलती ये सरासर लाहौर पुलिस की नहीं है। अंपायर क्रिस ब्राड ने ये बताया कि जब हमला हुआ तो पाकिस्तानी पुलिस वहां से भाग गई, कोई भी मदद के लिए नहीं था, हम वहां पर अकेले छूट गए थे। तो क्या इसे पुलिस की बुजदिली नहीं कहेंगे।
वैसे भी ये सही है जो अधिकतर आक्रमण करता हो तो उसे ये नहीं पता रहता कि बचाव कैसे करना है, वो ही हुआ पाकिस्तानी लोगों के साथ। अधिकतर वो भारत पर हमले की बात सोचते हैं जब हमला हुआ तो बचाव नहीं सोच सके।
यदि आतंकवादियों का मकसद श्रीलंका की टीम को मारना ही होता तो आतंकवादी एक रॉकेट लॉन्चर ही क्यों छोड़ते? वो भी ठीक निशाने पर नहीं? दो हेंड ग्रेनेड फेंकते पर इस तरह से कि दहशत पूरी दुनिया में फैल जाए पर निशाना चूक जाए।
इतने अच्छे-अच्छे एंगल से कैसे शूट किया इस पूरे हमले को? कैसे एक टीवी क्रू को पता चल गया कि ये हमला हो रहा है। और जहां से भी हो सके हर जगह, हर आतंकी की तस्वीरें उतारी गई। क्या ये बात हजम होती है? टीवी पत्रकार होने के कारण मुझे लगता है कि इतने एंगल से एक साथ तस्वीरों को लेना मुश्किल है। टॉप एंगल, साइड एंगल, फ्रंट एंगल इतने एंगल वो भी सिर्फ सेकेंड में कैसे संभव है, मुझे तो नहीं लगता। इससे ये साफ होता है कि हमले से पहले ही हमले की जानकारी थी उस क्रू को। और ये क्रिकेट जैसे खेल के साथ ये खेल किसी घर के ही सदस्य ने ही खेला है। सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए कि दहशत हम फैला सकते हैं और यदि जरूरत पड़ी तो पाकिस्तान में हम कुछ भी कर गुजर सकते हैं।
पर अब तो दूसरी थ्यौरी को सिरे से पाकिस्तान की सरकार ने खारिज कर दिया है। अब बात अंदर के गुनहगारों और ये तो पाकिस्तान क्रिकेट का दुर्भाग्य है,कि जिस मैदान पर पाकिस्तान क्रिकेट के स्वर्णिम अश्रर लिखे गए उसी गद्दाफी पर पाकिस्तान क्रिकेट पर कालिख पुत गई।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, January 13, 2009

हमारे न्यूज चैनल कितने परिपक्व?

जो भी न्यूज़ देखता है उनसे पूछा जाए कि न्यूज़ चैनल के लिए क्या जरूरी है खबर या टीआरपी, तो अधिकतर कहेंगे ‘खबर’, पर न्यूज चैनल टीआरपी पसंद करते हैं और अब न्यूज़ कहां। लेकिन कुछ दिनों से ये देखा जा रहा है कि न्यूज़ चैनलों पर न्यूज़ वापस लौटी है। वर्ना पहले न्यूज़ के सिवा हमारे देश के न्यूज़ चैनलों पर सब कुछ होता था। नाग-नागिन, भूत, ज्योतिष, भ्रम फैलाने वाली ख़बरें और इन पर होने वाले लंबी-लंबी चर्चा, एक ही तस्वीर बार-बार दिखाई जाती थी। पर नहीं बदली तो खेल की खबरें पहले भी सिर्फ क्रिकेट होता था और अब भी सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट ही होता है, किसी और खेल को जगह नहीं मिल पाती। क्यों? क्योंकि भारत में क्रिकेट के सिवा कुछ नहीं ‘बिकता’। कुछ अंग्रेजी चैनल खेल की खबरों में सभी खेलों को जगह देते दिख जाएंगे पर हिंदी न्यूज चैनलों पर तो सिर्फ ढाक के तीन पात याने क्रिकेट। दूसरे खेलों के हाल का अंदाजा हम इससे लगा सकते हैं कि पुलेला गोपीचंद को खेल मंत्री एम एस गिल ने नहीं पहचाना था, जबकि गुपीचंद की शागिर्द सायना नेहवाल के कंधे पर हाथ रख कर मंत्री जी खड़े थे। शायद मंत्री जी भी हिंदी न्यूज चैनल ही देखते होंगे।
वहीं गर दूसरे शब्दों में कहें, कि क्या हमारी न्यूज इंडस्ट्री इतनी परिपक्व हो गई है जितने की पश्चिमी देशों की न्यूज़ इंडस्ट्री? हमारे लिए न्यूज़ क्या है? यदि हम ये सवाल अपने आप से पूछें तो हमारे जहन में सबसे पहले ख्याल क्या आएगा? हमारी खबरों का दायरा सिर्फ और सिर्फ हमारे इर्द गिर्द ही घूमता है, आस पास की क्षेत्रीय हलचल पर हम ज्यादा ध्यान देते हैं। देश में क्या चल रहा है राजनीति के स्तर पर थोड़ा बहुत लोग पढ़ भी लेते हैं या जान लेने के इच्छुक होते हैं वर्ना दूसरे प्रदेश, या देश या फिर सात समंदर की खबरों को जानने के इच्छुक हम बहुत ही कम होते हैं।
मुंबई हमलों के दौरान बीबीसी पर पूरे दिन-रात सिर्फ और सिर्फ मुंबई की ख़बरें ही छाई रहीं। क्या ब्रिटेन में २६ से २९ तक कुछ भी ऐसा नहीं घट रहा था कि वो बीबीसी चैनल पर एयर टाइम ले पाता। हमारे देश में तो बहुत से रिएलिटी शो हैं जिन पर हर दिन दो-तीन घंटे आराम से निकल जाते हैं। बीबीसी पर पूरे समय मुंबई हमलों का क़हर ही चलता रहा। सेटेलाइट फोन के जरिए तस्वीरें दिखाई जा रहीं थी। साथ ही विदेशी मीडिया इस बात का भी ध्यान रख रहा था कि कहीं भी विचलित करने वाली तस्वीरें ना दिखाई जाएं, क्षत विक्षप्त शरीर नहीं दिखे या फिर सेना की मूवमेंट भी नहीं दिखाई जा रही थी। बीबीसी पर ब्लॉगर छाए रहे, जो अपने ब्लॉग पर कोई जानकारी दे रहे थे, उनसे वो फोन पर बात भी कर रहे थे।
अब जब कि बहुत हद तक साफ हो गया है कि मुंबई हमलों में पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है। साथ ही कसाब को भी पाकिस्तानी मान लिया गया है। लेकिन मुंबई हमला भारतीय मीडिया के लिए एक नया अनुभव साबित हुआ। क्या रोल हो मीडिया का इस बारे में बात अगली बार। इस तरह की कमांडों कार्रवाई पहली बार हमारी मीडिया ने देखी। यदि गौर करें तो श्रीनगर या फिर बोर्डर एरिया को छोड़कर कहां पर हमें याद आता है कि कमांडो कार्रवाई की गई जिसे इतने बड़े पैमाने पर कवर किया गया। अमृतसर के स्वर्णमंदिर में कमांडो कार्रवाई हुई थी पर तब कितना सजग था मीडिया। कुछ चुनिंदा अखबार हुआ करते थे लोगों के पास टीवी भी नहीं था। तो किसी शहर में वो भी मैट्रो सिटी में इस तरह आतंकवादियों का क़हर बरपाना और साथ ही सबसे आगे निकलने की होड़ ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से इतनी बड़ी गलती करवाई जिसका सीधे-सीधे फायद पाकिस्तान में बैठे इन आतंकवादियों के आकाओं को मिला और बिना बाहर देखे वो कमांडो की हर कार्रवाई के बार में आसानी से जान जाते और हमारी सेना को इसका काफी खामियाजा भुगतना पड़ता। लगता तो ये है कि सबसे पहले और आगे निकलने की होड़ ने हमारी इलैक्ट्रोनिक मीडिया और एजेंसियों को कभी परिपक्व ही नहीं होने दिया।
यहां पर ये गौर करने वाली बात है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात बन गए हैं। साथ ही दोनों देशों में साइबर वॉर छिड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ मीडिया के बीच भी एक तरह की कोल्ड वॉर छिड़ गई है। ये समय होता है कि दोनों देश अपने आप में संयम बरतें पर ऐसा दिख नहीं रहा है। मीडिया की बात है तो कुछ कायदे, कानून, नियम, सरकार को बनाने ही होंगे जो कि ऐसी आपतकाल स्थितियों में मीडिया पर लागू हो। सरकार ही मीडिया को कुछ फुटेज और घंटे दर घंटे ब्रीफिंग करे और हालात से वाकिफ कराए। जब चाहे सरकार आपात स्थितियों में दुनिया के सामने जैसे चाहे हालात दिखाना चाहे वो दिखाए। याने कि जिस तरह की कवरेज से दूसरे समूह याने कि हमलावरों को फायदा नहीं पहुंचे। वैसे सरकार जल्द ही इस मामले में कुछ नियम कानून की व्यवस्था करने में जुट गई है। पर देखना तो ये होगा कि ये नियम आते कितने वक्त में हैं और न्यूज चैनल कितना इन नियमों पर अमल करते हैं। कुछ नियम एनबीए याने न्यूज ब्रॉडकास्ट एसो. ने भी बनाए हैं याने की वो संस्था जो कि मीडिया में रहकर मीडिया पर सख़्त नज़र रखती है। उनपर एक नज़र अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, December 21, 2008

मांग करने वालों की तादाद बढ़ी तो अब सबकी जुबान चुप क्यों?

बिना तथ्यों के बात करना गलत होता है, यदि तथ्य हैं तो बेहतर हो कि उजागर भी हों। अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं वो पुराने तथ्यों से कुछ अलग हैं। जो पुराने तथ्य सामने आए थे वो ये थे कि करकरे, सालस्कर, काम्टे और साथ में बैठे तीनों सिपाही जब शहीद हुए तो उनके पास टाइम ही नहीं था कि वो आतंकवादियों की गोली का जवाब दे पाते। साथ ही तीनों अधिकारियों को पीछे की तरफ से गोली मारी गई थी। सबकुछ इतना अचानक हो गया कि किसी को भी पता नहीं चल सका था कि क्या हुआ। 27 की रात 1 बजे के करीब जब ये ख़बर आई थी कि हमारे तीन आला अधिकारियों को गोली लग गई है जिसमें से करकरे को ताज के पास और सालस्कर, काम्टे को कामा के पास गोली लगी है। पर थोड़ी देर बाद ये दुखद समाचार आया कि करकरे नहीं रहे, पर ये क्या सालस्कर भी नहीं रहे, और तीसरा फ्लैश था कि काम्टे भी शहीद। मुंबई के साथ-साथ पूरा देश आतंकित हो गया। हेमंत करकरे का नाम हर दिन सुनने को आ रहा था कारण था साध्वी का। तो फिर एकदम से खबर आना कि आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला कर दिया है और इन आतंकियों ने हमारे तीन आला अधिकारियों को मार दिया है तो ख़ौफ़ की बात तो थी ही। क्या आतंकवादी इतने ताकतवर होकर आए हैं कि पूरे मुंबई को कब्जे में कर लेंगे। फिर एक घंटे बाद ही ये साफ हो गया कि तीनों अधिकारी कामा के पास शहीद हुए। लेकिन जिस क्वालिस में करकरे थे उस क्वालिस में सिर्फ एक सिपाही घायल अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहा था। अभी तक जो भी सच सामने आया है वो है खुद जाधव की जुबानी। जो भी हमने जाना है वो हमें जाधव ने बताया है। उस में ही ये सच सामने आया कि उस क्वालिस में किसी ने भी बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहन रखी थी। दूसरी बात जो सामने आई थी वो ये कि इतना मौका किसी के पास भी नहीं था कि कोई संभल कर आतंकवादियों का जवाब दे पाता।
पर अब, जो बात सामने आ रही है वो है कसाब की जुबानी। अजमल आमिर कसाब वो आतंकवादी, जो मुंबई में कहर बरपाने वाले देहश्तगर्द गुट का सदस्य था। कसाब को गिरगांव चौपाटी से जिंदा धर दबोचा गया था और इसका साथी इस्माइल मारा गया था। इन्हीं दोनों आतंकवादियों ने अधिकारियों को मारा और फिर इन्हीं की गाड़ी लेकर गिरगांव चौपाटी भाग निकले। अब कसाब का इकबाले जुर्म सामने आया है। कसाब का बयान जो सामने आया है वो बिल्कुल अलग है। आतंकवादी कसाब के मुताबिक जब वो कामा में क़हर बरपाने के बाद जैसे ही कामा से बाहर निकले तो पुलिस से उनका सामना हुआ। एके 47 का मुंह उन्होंने पुलिस पर खोल दिया। तभी वहां पर दूर से पुलिस की गाड़ियां भी आती दिखाई दी। पहली गाड़ी कामा के पीछे वाले गेट से आगे वाले गेट की तरफ बढ़ गई। थोड़े फासले से आती दूसरी गाड़ी पीछे वाले गेट के पास धीरे हो गई। धीरे होते के साथ क्वालिस में आगे की सीट पर बैठे पुलिसवाले ने उन्हें पहचान लिया था जिसके हाथ में एक 47 थी। गाड़ी रुकते के साथ ही पुलिस ने फायर खोल दिया। गोली कसाब के हाथ को चीरते हुए निकल गई। तभी इस्माइल ने गोलियां चलानी शुरू कर दी और सभी के सभी पुलिसवालों को मार दिया। तीन शव को गाड़ी से बाहर फेंक कर वो गाड़ी से मुंबई में ख़ौफ़ का क़हर, बरपाते हुए चले गए और गिरगांव चौपाटी पर पकड़े गए।
लेकिन यहीं पर बात जो सामने आती है वो है कि दो अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। ये बात भी सामने आ रही है कि ये दोनों छिपे हुए थे और जिस जगह पर छिपे थे वो गाड़ी के बांयी ओर थी और जो गोलियां अधिकारियों को लगी हैं वो दाहिने तरफ लगी हैं। जब आतंकवादी बांयी तरफ थे तो दायीं तरफ से और पीछे से गोली कैसे चली। मान लिया चलगई पता नहीं कैसे चल गई, कहां से चल गई। लेकिन हेमंत करकरे की बुलेट प्रूफ जैकेट कहां है? जब करकरे की मौत की खबर आई तो नरीमन हाउस में इस ख़बर का तालियों से स्वागत किया गया।
दूसरी बात कि हेमंत करकरे के सीने में तीन गोली लगी जब गोली पीछे से चलाई गईं तो गोली सीने में कैसे लगी? सीएसटी पर जब वो मोर्चा लेने के लिए निकले थे तो उन्होंने बुलेटप्रूफ जैकेट और साथ ही हेल्मेट भी लगा रखा था तो फिर उन्होंने ये उतार क्यों दिया? क्या हेमंत करकरे जैसे सीनियर ऑफिसर इस आतंकवादी घटना को कम आंक रहे थे। या कि फिर ओवर कॉनफिडेंस ने इन आतंकवादियों को इतना मौका दे दिया कि हमने देश का सच्चा सिपाही खो दिया। वो सिपाही जो कि देश को आने वाले दिनों में एक ऐसे सच से रूबरू कराने वाला था जो कि अभी तक भारत के इतिहास में नहीं हुआ था। जिसके कारण वो पूरे देश का दुश्मन बन गया था।
सालस्कर को भी गोली दाहिने तरफ ही लगी है। तो क्या इन दोनों थ्यौरियों में कुछ लोच है या फिर असलियत अभी आना बाकी है। मैं कसाब की थ्यौरी को तबज्जो नहीं देता लेकिन जाधव की भी बात कहीं ना कहीं अधुरी लगती है। जांच की मांग जो की जा रही है वो इन्हीं तथ्यों के कारण की जा रही है। पूरा देश ये मानता है कि तीनों ऑफिसर हमारे नगीना थे, अभी मुंबई को इनकी जरूरत थी शायद देश को भी, पर कुछ हैं जो कि मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। वो इस शहीद को खोने के हमारे ग़म को भी हमारा नहीं होने देना चाहते। अंतुले के बाद कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी है, साथ ही हर दिन कोई ना कोई इस जांच को कराने की वकालत कर रहा है तो फिर कुछ चुनिंदा लोग जांच क्यों नहीं होने देना चाहते। क्या कुछ पर्दे के पीछे है जो कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते की सामने आए?

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”