Friday, January 27, 2023

"जय हिन्द, फिर मिलेंगे"

काम से चलते समय मैंने अपने सहकर्मी से कहा, "सी यू लेटर।"

उसने पलटकर जवाब दिया, "फिर मिलेंगे"। साफ, शुद्ध, स्पष्ट हिन्दी में।

हम दोनों लगभग आठ महीने से साथ काम कर रहे हैं। वो गोरा है यहां की पैदाइश है, कीवी है और इतनी साफ हिन्दी। हम बात सिर्फ काम की या फिर क्रिकेट, रग्वी, बढ़ते क्राइम, बढ़ते दामों पर करते थे, कभी ना वो पर्सनल हुआ ना मैं।

पर जब उसने बोला 'फिर मिलेंगे'। तो मुझे आश्चर्य के साथ-साथ खुशी भी हुई। वो पहली बार था कि उसने मुझे आंखें मटकाते हुए भौहों को उचकाते हुए होठों पर मुस्कान के साथ शरारत के साथ देखा था। शायद आज उसका दिन अच्छा बीता था। मैंने भी एक भरी पूरी मुस्कान के साथ उत्तर दिया, 'जी, फिर मिलेंगे।'

मुझे लगा, फिर मिलेंगे एक मूवी का नाम है तो शायद उसको पसंद आई हो और शायद जहन में फिल्म की छवि अभी भी बरकरार है। वैसे भी जब से सबटाइटल का जमाना शुरू हुआ है तो फिल्में सिर्फ अपनी भाषा में ही नहीं देखी जाती।

अगले दिन फिर से काम खत्म करके जाने लगे तो इस बार मैंने कहा, 'फिर मिलेंगे'। उसने पलटकर कहा 'जरूर, भोले'। मैंने रुककर पूछा, 'क्या कहा'। ये ध्यान नहीं रहा कि वो अंग्रेज है उसे 'क्या कहा' समझ में नहीं आएगा। पर उसका जवाब सुनने के बाद वो मेरी पहली प्रतिक्रिया थी। पर वो समझ गया था उसने फिर उसी चंचलता के साथ कहा, 'जय भोले'। मैं मुस्कुराकर उत्तर दे पाता उससे पहले वो मुड़ा और जाते-जाते कह गया, 'जय हिन्द'।

बिना किसी की परवाह किए मैंने तेजी से जवाब दिया 'जय हिन्द, जय हिन्द'। गणतंत्र दिवस पर मेरे सहकर्मी के द्वारा दिया मेरे जीवन का अब तक का ये सबसे बहतरीन तोहफा था।

मैं उसी के बारे में सोचता हुआ आ रहा था। यहां देखता हूं कि हमारे धर्म को अपनाने वाले बहुत हैं, हमारी बोली बोलने के उत्तसुक बहुत हैं और बोल भी रहे हैं और एक हम हैं कि अपने शहर का या भारत का यहां पर कोई मिल जाए तो भी अंग्रेजी की टांग खींचते रहते हैं। 

कार पार्क में वो दूसरे सहकर्मी के साथ बातों में व्यस्त था। तभी पीछे से आवाज़ लगाई, "नीतीश, शिवरात्री कब है?"  अब मेरे अंदर की जिज्ञासा बहुत बढ़ चुकी थी। '19 फरवरी', मैंने जवाब दिया। फिर बातों में पता चला कि वो सदगुरू को फॉलो करते हैं और उनमे से एक शिवरात्री और एकादशी का उपवास भी रखते हैं। और महाशिवरात्री के दिन पूरी रात जग कर जप करते हैं। पूरी बात के बाद मैंने असमर्थता जताई क्योंकि मुझे कहीं जाना था और उनसे आज्ञा ली। वो तुरंत बोला "कोई बात नहीं, फिर मिलेंगे।"

शर्म आती है कभी-कभी कि हम अपने ही धर्म से दूर भाग रहे हैं और दुनिया उससे जुड़ रही है। अपना ही देश हमको ये सब अपनाने पर पिछड़ा कहता है और दुनिया उसको अपनाने पर धन्य होती रहती है। 

चलो फिर साथ चलें...

 बहुत वक्त से सोच रहा था कि लिखने का क्रम फिर से शुरू करूं। तो लगभग दस साल के बाद फिर से ब्लॉग की दुनिया में कदम रख रहा हूं। वैसे तो बहुत से माध्यम हो चले हैं तब से अब तक अपनी बात को रखने के लिए पर ब्लॉग का अपना ही एक अनुभव है। जब लिखा करता था तो बहुत से लोगों का साथ मिला था। कुछ दूर तक चले और कुछ कभी कभार मिल जाते। कुछ साथी याद करके चुटकी लेते "क्यों, दवात में स्याही नहीं बची, यार लिखा करो।"

तो चलिए, फिर इस सफर पर निकल पड़ते हैं। बस आप सब का साथ और मेरे प्रभु का आशीर्वाद बना रहे।

Tuesday, June 19, 2012

टीम अन्ना विकल्प के साथ आओ, गुमराह मत करो

अन्ना टीम को क्या हो गया है?
इनका हाल ये है कि 2x2=5।
अन्ना टीम- आपने जो हल निकाला वो गलत हैं।
हमने पूछा कि सही क्या है।
सही जवाब क्या है ये तो पता नहीं पर ये आपका जवाब गलत है।

प्लीज अन्ना और अन्ना टीम, सारी दुनिया पर भ्रष्ट होने का आरोप लगा रहे हैं तो प्लीज कौन भ्रष्ट नहीं है वो भी तो बताइए। जनता जिस को चुनती है उसको आप भ्रष्ट करार दे देते हैं।

सवाल खड़े किए हैं तो जवाब भी तो ले कर आइए।

याद है आपको वो कहानी...शायद याद होगी...
एक चित्रकार था उसने अपने द्वारा बनाया हुआ एक चित्र रेलवे स्टेशन पर लगा दिया और फिर लिखा कि इसमें क्या गलती है वो बताइए। हर निकलने वाले शख्स ने उसमें अपनी टिप्पणी लिख दी या कलम चला दी।
दूसरे दिन फिर वो ही चित्र उसी स्टेशन पर उस चित्रकार ने वो ही चित्र लगाया और लिखा जो गलती हो उसे बताए नहीं कृप्या ठीक कर दें...दो दिन बाद भी उस तस्वीर में सिर्फ धूल चढ़ी लेकिन किसी ने गलती नहीं बताई।

अन्ना टीम, ये बहुत ही आसान होता है कि किसी पर उंगली उठा दी जाए पर ये बहुत मुश्किल होता है कि उंगली उठाते हुए उस का विकल्प भी साथ में दें

हर कांग्रेसी आपकी नजर में गुनहगार है और साथ है वो भ्रष्ट भी है। तो क्या बीजेपी या फिर बीएसपी या फिर एसपी में से कोई भी भ्रष्ट नहीं है। या फिर लेफ्ट को हम लोग क्यों चुन कर नहीं लाते सत्ता में, क्या वहां पर भी सब करप्ट हैं। यदि हैं तो कौन नहीं करप्ट है ये साथ में बताइए वर्ना लोगों को गुमराह करना छोड़ दीजिए या फिर राष्ट्रपति शासन लगावने की वकालत कीजिए।

धन्यवाद

Friday, August 19, 2011

MERE SAPNE MERE APNE: ’हमें भूलने की बीमारी है।‘

MERE SAPNE MERE APNE: ’हमें भूलने की बीमारी है।‘: बहुत लोगों कह रहे हैं कि अन्ना का ये अनशन एक ब्लैकमेलिंग है। अन्ना सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं। साथ ही अरविंद केजरीवाल का एक कमेंट, ‘ जन...

’हमें भूलने की बीमारी है।‘


बहुत लोगों कह रहे हैं कि अन्ना का ये अनशन एक ब्लैकमेलिंग है। अन्ना सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं। साथ ही अरविंद केजरीवाल का एक कमेंट, ‘जनतंत्र में जनता की तानाशाही को ही जनतंत्र कहते हैं’। डायलॉग था, अच्छा लगना ही था।

हमारे घर में घुसकर 164 से ज्यादा लोगों को मार देना और उस कातिल की हिफाजत के लिए करोड़ों खर्च करना, किसी लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी है। उन 164 लोगों के परिवार से पूछो कि वो क्या चाहते हैं और पूछो 300 से ज्यादा लोगों से जो उस हमले में घायल हो गए। ’हमें भूलने की बीमारी है।‘

मैं इस अनशन को तानाशाही नहीं मानता, जब पानी सर से ऊपर चला जाता है तो ऐसी क्रांति होती है। सरकार को बताने के लिए कि अपनी मनमानी मत करो। जनता ही यहां की सिकंदर है।

वहीं मैं अपने उन ’दोस्तों’ से पूछना चाहता हूं कि जब सरकार किसी काम को करने की पहल ना करे। तब जनता उस काम को खत्म करने के लिए कदम आगे बढ़ाए तो क्या गलत है। लोग कह रहे हैं कि अन्ना का तरीका गलत है पर मैं कहता हूं कि इस तरीके में बुराई क्या है। सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठा रही और जो उठा रही है वो नाकाफी हैं। जिन पर लगाम लगाने की जरूरत है उन पर लगाम नहीं लगा रही तो सरकार की ऐसी कोशिशों का क्या फायदा? वो तो करप्शन को ही बढ़ावा दे रहे हैं।

लोग कह रहे हैं, हमारे देश में संसद है और संसद से बड़ी कोई चीज नहीं। हम भी कहते हैं कि हां संसद में ही लोकपाल बिल बने पर वो जन लोकपाल बिल हो। उस बिल में सांसदों, नेताओं और दबंग लोगों को रियायत ना मिले।

संसद के नुमाइंदे बनाएंगे लोकपाल। बनाओ, किस ने मना किया है। पर उस बिल से हमें शर्मिंदा ना होना पड़े। जैसे कि ‘नोट फॉर वोट केस’ में होना पड़ा था। उन सांसदों को जनता ने ही चुना था। जिनको आज एतराज हो रहा है उन्होंने सांसदों को बड़ा भलाबुरा कहा था। जानता हूं कि ’हमें भूलने की बीमारी है।‘

सरकार के मनीष तिवारी अन्ना पर आरोप लगाते रहे तब लोगों को ये क्यों नहीं लग रहाकि सरकार गलत कर रही है। सावंत कमिशन का हवाला देते हुए मनीष तिवारी ने तो अन्ना को सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी तक कह डाला। तब किसी ने 74 साल के उस शख्स के बारे में, जिसे अन्ना कहते हैं, नहीं सोचा। सरकार का मतलब साफ था कि आप अनशन करोगे या सरकार के खिलाफ बोलोगे तो हम आपके ऊपर इल्जाम लगाएंगे। इसे आप क्या कहेंगे ‘भाईचारा’?

आज ऐसा जनसैलाब उमड़ा है वो टीम इंडिया के वर्ल्ड कप जीतने के बाद भी नहीं देखा गया था। लोग चल रहे हैं पानी में भीग कर साथ दे रहे हैं। आप भी साथ दो अन्ना का ना सही पर भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए आगे आओ। जब हम सुधरेंगे तब सिस्टम सुधरेगा। 
अब भी सोए रहे तो फिर कब जागोगे?

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, June 7, 2011

हमारा ही पीएम सबसे मजबूर क्यों?

ऑफिस में काम पूरा करके दफ्तर के साथियों के साथ गप्पे मारते हुए नीचे उतरा। रात आधी से ज्यादा निकल चुकी थी पर हमारे लिए काफी बाकी थी। रास्ते में एक सहयोगी के फोन की घंटी बजी और उसका जवाब था ‘आ रहा हूं,। क्या हुआ। कोई खबर है, चलता हूं। जाओ, मैने जवाब दिया।


मैं कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि तभी उस सहयोगी का फोन आ गया। यार रामलीला मैदान में महाभारत हो गई है। और फिर काम की व्यस्तता की वजह से उसे फोन काटना पड़ा। मैंने सोचा कि दो दिन से सोच रहा था कि रामलीला मैदान जाऊंगा पर जा नहीं पाया चलो गाड़ी उधर घुमा लेता हूं। वहीं दूसरे ख्याल ने कदम रोक दिए कि ऑफिस को इस वक्त मेरी जरूरत ज्यादा होगी, चलो ऑफिस का रुख करो।


रामलीला मैदान की उस काली स्याह रात के एक-एक दृश्य, एक-एक तस्वीर दिमाग को हिला रहे थे। एकबार तो बाबा रामदेव का चहरा फक पड़ चुका था जब कि मंच पर पुलिस उनको गिरफ्तार करने पहुंची। पर दूसरे ही पल हिमालय की गुफाओं में किए तप और योग की शक्ति ने उनके अंदर वो जज्बा और फुर्ति पैदा कर दी कि वो अपने सहयोगियों के बीच कूद पड़े। 46 साल का कोई भी शख्स 12-14 फीट के प्लेटफॉर्म से ऐसे नहीं कूद सकता, शायद योग का कमाल था। पर ना तो वहां मौजूद बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों को इस बारे में जानकारी थी और ना ही बाबा के समर्थकों को कि दिल्ली पुलिस वो पुलिस है जो चाहने पर मुर्दे को भी जिंदा कर दे, जो अपनी पर आ जाए तो यमदूत भी रहम के लिए पनाह मांगने लगे।


कंधे से उतर कर बाबा रामदेव मंच पर आकर बैठ गए और बोतल से पानी पीने लगे। फिर उसी बोतल को बाबा रामदेव ने माइक समझकर अपने उत्तेजित हो रहे समर्थकों को शांत करने लगे। उस समय हर मिनट तस्वीरें बदल रही थी। उस दौरान जब भी कैमरा बाबा के ऊपर होता तो मैंने पूरे समय बाबा को समझाते हुए ही देखा। कहीं भी भावों से ऐसा नहीं लग रहा था कि वो अपने सहयोगियों, समर्थकों को उत्तेजित कर रहे थे।


मेरे एक सहयोगी ने मेरे से कहा कि यदि ये रात बाबा रामदेव निकाल गए तो कल बाबा रामदेव के लिए एक नई सुबह होगी। मैंने जवाब दिया, लाख लोग हैं और दिल्ली में इतनी पुलिस नहीं, जो लाख लोगों को खदेड़ दे। पर मैं गलत था तस्वीर बदली और नई तस्वीर में रेपिड एक्शन फोर्स भी मौके पर दिखी। हम समझ गए कि ये रात बाबा के लिए जीवन की सबसे लंबी रात होने वाली है।


मंच से बोलते बाबा रामदेव को एकदम से सहयोगियों ने भीड़ में पीछे-पीछे करना शुरु किया। उनके समर्थक महिलाओं को सामने रखते हुए बाबा को मंच के पीछे ले जा रहे थे। बाबा की आवाज़ पीछे से आ रही थी पर थोड़ी देर बाद बाबा रामदेव का पता नहीं चला। पंडाल में आंसूगैस छोड़ी जाने लगी। पंडाल में लोग तितर-बितर होने लगे। डंडे, पत्थर सब चल रहे थे। पंडाल में आग लग गई और बाबा रामदेव का मंच खाली हो गया। पंडाल में गिने चुने लोग दिखने लगे। वहां मौजूद थी तो सिर्फ पुलिस और पुलिस। लोगों को उठा-उठा कर लेजाती हुई। ये सब मंजर बर्बरता दिखा रहे थे। आंखों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि रात तक भरा पूरा रामलीला मैदान दो घंटे के अंदर खाली करवाया जा चुका था।


फिर इसके बाद उस रात को क्या हुआ कितना एक लोकतांत्रिक देश के लोगों का साथ छल हुआ ये सब को पता है। बार-बार मुझे ऑस्ट्रेलिया की वो घटना याद आ रही थी। जब भारतीयों पर हमले के खिलाफ सभी भारतीय मेलबर्न की सड़कों पर इक्ट्ठा हुए थे और पुलिस ने जो कार्रवाई की थी उसकी आलोचना पूरे विश्व में हुई थी। तब ये ही हमारी सत्तारूढ़ सरकार के नेतागणों ने उसकी निंदा की थी साथ ही उच्चायुक्त को बुलाकर इसके लिए आगाह भी किया था। क्यों आज उसकी को दोहराने की ये निंदा नहीं कर पा रहे और साथ ही क्या ये तस्वीरें इनको दुख नहीं दे रही, कि अब भारत की निंदा पूरे विश्व में होगी।


इस बात का मैं साक्षी हूं कि रात 10.45 पर सुबोध कांत सहाय ने ये कहा था कि हमने अपनी मांग लीखित बाबा के पास भेज दी हैं। और दो घंटे बाद रामलीला मैदान पर पुलिस हमला कर चुकी थी।

पीएम के रूप में मनमोहन सिंह सबसे ज्यादा मजबूर दिखाई देते हैं। ये सिर्फ मेरी राय नहीं है कि वो अब तक सभी पीएम में सबसे कमजोर हैं। घोटालें हों या करप्शन सब में वो मजबूर हैं। ओसामा जी कहने वाले दिग्विजय सिंह की जुबान चुप कराने में भी शायद वो मजबूर हैं। रात के इस पूरे प्रकरण को दमन चक्र ही कहा जाएगा पीएम साहब। उस प्रेमलता से पूछो जिसको आपकी मजबूरी ने बिस्तर पर मजबूर बना दिया।




आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, June 4, 2011

ये 'ब्लैकमेल' है तो ये ‘ब्लैकमेल’ अच्छा है।


बात कुछ ऐसी है कि बच्चे को पढ़ाई करने के लिए कहना और यदि बच्चा ना सुने तो माता-पिता का अनशन पर बैठना।

भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर कुछ दिन पहले ही एक आंदोलन, ‘अन्ना का अनशन’ शुरु हुआ था। पहले दिन से ही वो देश की आवाज़ बन गया। जिसने सरकार की नींव हिला कर रख दी। तभी से बाबा रामदेव को भी लगने लगा था कि वो अन्ना के साथ मिलकर इस आंदोलन को नई दिशा दे सकते हैं। और बाबा, अन्ना के साथ उस राह पर चलने लगे जिस राह पर नंगे पांव अन्ना और उनके सहयोगी चल रहे थे।

कुछ दिन में ही सरकार जान गई कि सड़क किनारे से उठी ये मुहिम सरकार के सारे पेंच ढ़ीले कर सकती है। यहां तक कि गद्दी सिरे से भी उखड़ सकती है। सरकार बचाने की होड़ में सरकार ने अन्ना की बातें मान ली और लोकपाल बिल के मसौदे पर एक कमेटी बनाई गई जो कि 30 जून तक विधेयक का मसौदा तैयार कर देगी। जो अभी तो असंभव सा लगता है।

वहीं दूसरी तरफ.....
उस दिन नंगे पांव कुछ दूर तक चलने में ही ऐसा लगा था कि हां, मंजिल दूर नहीं, मुझे भी मिल सकती है मंजिल। नंगे पांव खेतों में, कांटों पर भी चलने की आदत, पर उस दिन पेड़ों की छांव में भी चलने के बावजूद पड़े पांव पर छाले नई मंजिल की तलाश करना चाहते थे। पांव की वो टीस जो तलवों से ज्यादा दिल में उठ रही थी। बरसों से उठ रही दिल की आवाज से मिलकर उस टीस ने रामकृष्ण यादव उर्फ बाबा रामदेव को मजबूर किया कि वो 4 जून से सरकार को सरकार का काम याद दिलाए।


बाबा रामदेव के कहने पर लोग सर्द रातों में उठकर सुबह योग करने के लिए कहीं भी पहुंच जाते। दो-चार नहीं हजारों की तादाद में लोग आते। धीर-धीरे लोकप्रियता ने लोगों को अपने घर में सुबह उठकर योग करने पर मजबूर किया। आलसी भारतियों के अंदर ये जज्बा उस योगी ने भरा। हर जगह, किसी भी वक्त लोगों को योग करते देखा जा सकता था। योग को पेटेंट कराने से लेकर देश के सभी मुद्दों पर बाबा खुलकर सामने आए। बाबा की प्रसिद्धी राजनेता, अभिनेता या किसी भी खिलाड़ी से कम नहीं। उस प्रसिद्धी ने मजबूर कर दिया कि वो देश के लिए कुछ करें। पहले मुद्दे और अब ये अनशन उस राह में दूसरा कदम है।

वहीं तीसरी बात.....
बाबा योग सिखाइए और खुश रहिए। इस राजनीति में मत उतरिए। कुछ हासिल नहीं होगा और दामन पर कीचड़ जरूर लग जाएगा। कुछ लोगों की राय लगभग ऐसी ही थी।
इस बात का साफ मतलब ये था कि बाबा, क्यों पचड़े में पड़ते हो हमें खाने दो और यदि बोलो तो हम आपको भी खिला देते हैं। दिग्विजय सिंह को ये समझना चाहिए कि अब वो दिन गए जब कि नेता करोड़ों के घपले करते थे और कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाता था। 13-14 वीवीवीआईपी नेता गण तिहाड़ की शोभा बढ़ा रहे हैं। नेता लोग खाते रहें और स्विस बैंकों में अपना पैसा डालते रहें। देश को चूना लगाते रहें और आम नागरिक कुछ कहता है तो उसे ब्लैकमेलिंग का नाम लगा दो। नहीं...नहीं...नहीं अब ये नहीं होगा, नहीं चुप रहेगा भारतीय नागरिक।

एनसीपी नेता तारिक अनवर कहते हैं कि पहले अन्ना और अब बाबा सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं। यदि इसे ब्लैकमेल कहते हैं तारिक अनवर साहब तो हम इस ब्लैकमेलिंग को सही ठहराते हैं। मुझे और साथ ही किसी भी भारतीय को जो कि देश का भला सोचता होगा उसे इस तरह की ब्लैकमेलिंग से कोई भी आपत्ति नहीं। बाबा करो ब्लैकमेल, जितना कर सकते हो करो। यदि भ्रष्टाचार के मुंह पर तमाचा ऐसे लग सकता है तो ये ‘ब्लैकमेल’ अच्छा है।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, June 13, 2010

ये हुई ना बात


कल पूरा दिन बहुत उतार-चढाव के साथ बीता। पूरे दिन में सिर्फ एक बार, ऐसा वक्त आया जब एक सवाल ने कुछ राहत दी या यूं कहूं कि खुश किया। मेरे जाननेवाले और अधिकतर मेरे दोस्त जब भी कहीं फंसते हैं खासकर खेल के मामले में तो मुझ से पूछ ही लेते हैं।

शाम मेरे एक मित्र का फोन आया, हाल-चाल जानने के बाद सीधे उसने काम का सवाल दाग दिया। यार, एक बात बता, आज भारत का भी मैच है? मैंने भी चुटकी ली, क्या मियां, सटिया गए हो, जो कि फीफा में भारत की बात कर रहे हो?
अरे नहीं यार, टी-20 मैच है आज भारत का?

दिल को बहुत खुशी हुई। मेरा वो दोस्त और उसकी क्रिकेट मंडली दीवानी है क्रिकेट की। अब सोचो की क्रिकेट के दीवानों को ही नहीं पता कि टी-20 में भारत का मुकाबला है। जिन्हें खाना याद नहीं रहा करता था उन्हें अब क्रिकेट याद नहीं था। मैंने उनको स्कोर बताया और ’गुड न्यूज’ दी, भारत 6 विकेट से जिंबाब्वे से जीत गया। उन्होंने बताया कि वो उस समय पब में बैठकर अर्जेंटीना का मैच देखने की तैयारी कर रहे थे। तो उन पर चढ़ा था फुटबॉल फीवर।

अर्जेंटीना ने निराश किया।

सबसे ज्यादा इंतजार था अर्जेंटीना के पहल मैच का पर अर्जेंटीना ने मैच तो जीता मगर दिल नहीं। एक मात्र गोल हैंज ने किया जो कि डिफेंडर के रूप में खेलते हैं। मैसी ने कई मूव बनाए पर उससे ज्यादा उसने गंवाए। मैसी पूरी तरह अपने लिए ही खेलते नजर आए। एक शख्स जिसकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा हो तो उससे वैसी ही परफॉर्मेंस की उम्मीद दुनिया करती है। पर कल दो-तीन बार तो ऐसे मौके मैसी ने गंवाए गर कोई और खिलाड़ी होता तो वो शायद गोल कर देता। साथ ही तारीफ करनी होगी नाइजीरियन गोलकीपर की। जितनी बार मैसी गोलपोस्ट तक पहुंचे हर वार को उसने विफल कर दिया। अब आगे देखना होगा कि अर्जेंटीना आगे कैसा खेलती है।
वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के खिलाफ इंग्लैंड ने भी निराश किया। यूएसए ने इंग्लैंड को बराबरी पर रोक दिया। जहां नाइजीरिया के गोलकीपर ने कमाल किया वहीं यहां पर इंग्लैंड के गोलकीपर ने हाथ में आती गेंद को गोलपोस्ट में फेंक दिया। वैसे, इंग्लैंड और अर्जेंटीना को साफ समझ लेना चाहिए कि ये राह आसान नहीं है।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, June 11, 2010

अब जोश और रोमांच के साथ जागो पूरी रात


बचपन से ही आदत रही देर रात तक जग कर पढ़ने की। वहीं दूसरी तरफ घर में किसी को भी देर रात जगने की आदत नहीं थी। सब के सब जल्द सो जाते थे। वहां वो सोते यहां पर मेरा जगना और लगभग कई बार तो सुबह तक पढ़ना जारी रहता था। याद है वो रातें जब मैं पढ़ा करता था।

पर हर चार साल बाद वो वक्त जरूर आता जब कि मैं रात को नहीं पढ़ता था चाहे फिर परीक्षा ही क्यों ना हो। लगभग पूरी रात टीवी के सामने बैठा रहता। याद आता है घर में सिर्फ टीवी चलता रहता था और वो भी ना के बराबर आवाज़ में। ड्रॉइंग रूम में रोशनी हुआ करती थी सिर्फ टीवी की। बिना पलक झपकाए निरंतर टीवी पर नजरें गड़ाए पूरे 90 मिनट दम साधे देखना। ये आदत बनी रही और आज भी कायम है। आज से फिर शुरू हो रहा है फुटबॉल का जादू जिसका कोई भी मुकाबला नहीं।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में फुटबॉल के दीवाने नहीं हैं। हैं...और बहुत तादाद में हैं। पर फुटबॉल को बैकफुट पर रखा गया है। कभी भी खेल मंत्रालय और मीडिया की तरफ से फुटबॉल और हॉकी को ठीक से आगे बढ़ाया ही नहीं गया। हमारे देश में किसी से भी पूछ लीजिए कि रोनॉल्डो, मैसी, काका, बेकहम कौन है तो बहुत लोग शायद बता दें पर उन्हीं से पूछ लीजिए कि भरत छेत्री कौन है तो शायद वो नहीं बता पाएं। भूटिया का नाम बता दिया जाएगा पर और किसी का....?? अंग्रेजी चैनल तो बेहरहाल थोड़ा वक्त देंगे कि फुटबॉल के ग्राउंड में क्या हो रहा है पर हिंदी चैनलों में से किसी के पास इतनी हिम्मत नहीं है कि वो राखी सावंत या गंगू बाई के ऊपर फुटबॉल को रख लें।

बेहरहाल, बचपन से ही मैं अर्जेंटीना का दीवाना रहा हूं। गैब्रियल बतिस्तुता, डिएगो माराडोना, अमैरिको गैलिगो, डैनियल पासारेला, रोबर्टो अयाला मैदान में कमाल करते थे। कुछ का मानना है कि बतिस्तुता में माराडोना से ज्यादा काबलियत थी, बतिस्तुता ने अर्जेंटीना की तरफ से अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा 56 गोल किए हैं। वहीं क्रेस्पो के 36 गोल के बाद माराडोना तीसरे नंबर पर 34 गोलों के साथ हैं।

1986 का वर्ल्ड कप याद ही होगा। क्वार्टर फाइनल में इंग्लैंड से अर्जेंटीना की भिड़ंत। माराडोना के दो गोल की बदौलत इंग्लैड को हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश किया था। अधिकतर लोगों को ये याद है कि माराडोना ने हाथ की मदद से एक गोल किया था और उस गोल को ’हैंड ऑफ गॉड’ के नाम से जाना जाता है। अधिकतर लोग इस गोल की ही चर्चा करते हैं। लेकिन इसी मैच के दूसरे गोल को ’द गोल ऑफ सेंचुरी’ दिया गया। 60 मीटर की लंबी दौड साथ ही इंग्लैंड के 6 खिलाड़ियों को छक्काते हुए माराडोना ने सदी का गोल किया था। वो मैच दागदार और यादगार दोनों रहा।

इस बार फिर उम्मीद की जा रही है कि कोच माराडोना, मैसी, तेवेज, सरजिओ, डिएगो मिलिटो, वॉल्टर सेम्यूल, गैब्रियल हैंज, वेरोन की मदद से टीम जीत दर्ज करेगी। पर अर्जेंटीना की मिडफील्ड कमजोर है इस जगह पर ही सतर्क रहना होगा टीम को।

हम तो उम्मीद करेंगे की अर्जेंटीना जीते पर ये बात तो साफ है कि 12 जुलाई तक हर रात उस माहौल और मैदान के नाम रहेगी जिसके लिए फुटबॉल जानी जाती है।
पहले भी सुबह देर से उठते थे अब भी देर से उठेंगे। जिंदगी में अंतर कुछ नहीं पड़ता।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 10, 2010

हमारे अंदर का सबसे बड़ा जानवर ‘कौन’?


जितने मनुष्य उतनी शख्सियत, उतने चेहरे। सबका रहन-सहन अलग, नजरिया अलग, पहचान अलग। रोज ना जाने कितनी शख्सियत आंखों के आगे से गुजर जाती हैं। हर दिन हमें तरह-तरह के लोग रास्ते में टकराते हैं। जितने तरह के लोग उतने ही तरह के व्यक्तित्व। सभी की अपनी एक अलग पहचान, अपना एक अलग सोचने का ढंग और साथ ही अपनी-अपनी खूबियां और खामियां।

कई बार इंसानों के बारे में सोचता हूं तो एक सवाल मेरे मन को बार-बार कुरेदता है। हम सब की जिंदगी में ऐसे मुकाम बहुत बार आते हैं जब कि हम अपने अंदर के जानवर से दो-चार होते हों। तब हमें पता चलता है कि हमारे अंदर भी एक जानवर है और उस जानवर की ‘वो काली छाया’ कितनी ताकतवर है। कई मौकों पर हम अपने अंदर के उस जानवर से लड़ के जीत जाते हैं और कई बार ‘वो’ हमें शर्मिंदा होने पर मजबूर कर देता है।

कई मौके आते हैं जब हम अपने अंदर के जानवर से दो-चार होते हैं। मनुष्य के अंदर का जानवर खुद को तो परेशान करता ही है साथ ही दूसरों को भी तकलीफ पहुंचाता है। हमारे अंदर का जानवर क्या है? किन-किन कारणों से जानवर, शरीर के अंदर का जानवर जाग उठता है? और वो कौन-कौन से कारक होते हैं जो हमें जानवर बना देते हैं?

मैंने थोड़ी कोशिश की कुछ कारकों को टटोलने की जो कि हमें इंसान बने रहने नहीं देते और कई बार इंसानियत खोकर जानवर बनने पर मजबूर कर देते हैं।

हमारे अंदर का जानवर है क्या? ये बता पाना तो बहुत ही मुश्किल है। इस पर बहुत सोचने पर मैंने पाया कि हमारे अंदर की वो इच्छा, कल्पना या बात जिसे हर कीमत पर नैतिक-अनैतिक ढंग से पूरा करने की जिद। उस जिद में किसी और को नुकसान, क्षति हो तो भी कोई गुरेज नहीं।

अब बात करते हैं कारकों की। मैंने इन्हें 3 भागों में विभाजित किया है जो इंसान को इंसानियत छोड़ कर वैहशीपन अपनाने पर मजबूर करते हैं।

क्रोध (गुस्सा), हवस, घमंड। इन में से कौन सा वो कारक है जो कि सबसे खतरनाक होता है।

वैसे तो तीनों कारक ही एक दूसरे से मिलते जुलते लगते हैं। मजबूरी हो या फिर कोई और वजह, कई बार गुस्सा आता है, और पागल बना देता है। पागल मतलब जिसका अपने पर काबू नहीं, जो कुछ भी कर सकता है। आपके अंदर के जानवर को जगा देता है गुस्सा।

हवस, हमेशा नहीं जागती पर जब भी जागती है तो पाप होना स्वाभाविक सा ही है। वैहशी बना देती है हवस। फिर मनुष्य ये सोचने के काबिल नहीं रह जाता कि वो जिस को अपना शिकार बना रहा है वो कौन है।

पर सबसे बड़ा कारक है जो कि यदि एक बार आपके अंदर आ जाए तो आप को हमेशा के लिए जानवर बना दे, वो है घमंड। गुस्सा हमेशा नहीं बना रह सकता, हवस हमेशा नहीं रह सकती पर घमंड आपके साथ-साथ चलता है हमेशा। घमंड के कारण गुस्सा और हवस का जन्म हो सकता है पर हवस और गुस्से के कारण घमंड का जन्म नहीं हो सकता।

एक इंसान को जानवर बनाने का सबसे बड़ा कारक मुझे घमंड लगता है। घमंड को हमेशा अपने से दूर रखना चाहिए।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, June 7, 2010

क्या लोगों ने ‘उसे’ ठीक पीटा?


उस समय मेरे मुंह से सिर्फ ये ही शब्द निकले....ओह माई गॉड। उसे बुरी तरह से पीट रहे थे लोग। हर आता-जाता दो-चार तो कम से कम लगा ही देता, जहां दिल चाहता वहां मारता। कोई-कोई तो मन भरकर मारता और कुछ तो तब तक मारते जब तक कि खुद के हाथ-पैर दुखने ना लग जाएं। सुना था पर आज देख रहा था भीड़ का कानून।

कब-कौन-कहां से निकल कर उस लड़के के सामने आता और अपनी पूरी भड़ास उस पर निकाल देता, पता ही नहीं चल रहा था। हल्की दाढ़ी से भरे, लाल हो चुके गाल पर रसीद कर दिए जाते और यदि चेहरा छुपाने की कोशिश गर वो करता तो उसके कान तक आ चुके लंबे बाल उसके चेहरे को पीछे खींचने के लिए काफी होते। और फिर चेहरे पर तीन-चार....। कुछ तो उसे बॉक्सिंग पैड समझ कर सिर्फ पेट पर ही गुस्सा निकालते।

कुछ को तो मैंने देखा कि वो राहगीर थे उनको पता नहीं था कि मसला क्या है पर बाइक रोकी उतरे और चार लगाए बाइक शुरू की और चल दिए। कुछ सिर्फ वहां से गुजर रहे थे, देखा, लड़के को अपने दम के मुताबिक पीटा और चल दिए। कइयों को देख कर के ऐसा लग रहा था कि जैसे कहीं की खुंदक कहीं पर निकाल रहे हों।

मुझे फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ याद आई। जब सुनील दत्त एक चोर से बोलते हैं कि यदि मैंने तुम को यहां पब्लिक के आगे छोड़ दिया तो सोचो कि तुम्हारा क्या होगा। कोई घर से लड़ कर आया है, कोई बीबी से परेशान है, किसी को बॉस की टेंशन है, ऑफिस का झमेला, किसी की तुम जैसे जेब कतरे ने जेब काटी है सोचो जब इतने सब लोगों के बीच में तुम होगे तो क्या होगा? उस चोर की हवाइयां उड़ने लग गई। यहां पर भी मुझे वही परेशान लोग नजर आ रहे थे।

वहीं, पिटने वाला लगभग 18-19 साल का युवक होगा। बाल लंबे, कद लंबा, छरेरा शरीर पर अब सब कुछ धुमिल हो चुका लग रहा था। जगह-जगह से खून निकल रहा था, मुंह तो लहु-लुहान हो रहा था। कपड़े कई जगह से फट चुके थे। उस लड़के को समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो क्या करे क्योंकि जब तक संभलता तब तक फिर वो अपने आप को संभालने में जुट जाता।

जैसा वो चोर इस दुर्दशा के बाद सोच रहा होगा कि इस से तो बेहतर होता कि पुलिस के हत्थे चढ़ता। हुआ भी ऐसा ही ये सारा वाक्या होने के लगभग 5 मिनट के अंदर ही पुलिस मौके पर पहुंच कर उस लड़के में दो-चार लगाकर अपने साथ लेकर चलते बनी। कई बार तो शक भी होता है कि कहीं ये लोग भी तो नहीं मिले रहते इनसे?

लेकिन यहां के लोग झपट्टामार चोरों से परेशान हो चुके हैं। यहां कि लड़कियों,महिलाओं का तो दिन में सड़क पर निकलना दूभर हो गया है। सड़क पर मोबाइल पर बात कर ही नहीं सकते पता नहीं कब-कौन-कहां से आकर आपका कीमती सामान झपट जाए। कई बार तो लगता है कि उस लड़के के साथ अच्छा हुआ और पीटना चाहिए था पर कई बार सोचता हूं कि इतना नहीं मारना चाहिए था। मैं भी इंसान हूं क्या करूं!

कल एक जगह खबर पढ़ी थी कि लोगों ने झपट्टामार चोर को पकड़ा और इतना मारा कि वो मर गया। वो था इन चोरों से परेशान और पुलिस की नाकामियत पर भीड़ का कानून।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, May 29, 2010

'ये यंगिस्तान की हार नहीं है...'


यंगिस्तान की हार, यंगिस्तान को धूल चटा दी, यंगिस्तान इसे एक सबक समझे, और ना जाने क्या-क्या सलोगन सुनने में आ रहे हैं। कल से ही कई लोगों की जुबान पर ये बात आ रही थी और आज सुबह अधिकतर अखबार इसी पटे हुए हैं। पर मेरा सवाल ये है कि क्या सचमुच में यंगिस्तान की हार हुई है? और हां, यहां पर एक बात साफ कर दूं कि जिम्बॉब्वे की टीम फिसड्डी नहीं है जैसा कि कई जगह बताया जा रहा है।

हां, यंगिस्तान की हार तो हुई है, जो मैदान में खेल रहा है हारेगा तो वो ही। पर क्या इस हार के जिम्मेदार भी पूरी तरह से वो ही हैं? हार की पूरी वजह भी यंगिस्तान ही है?

नहीं, इस हार को यदि प्रतिशत में देखूं तो 10 फीसदी गलती यंगिस्तान टीम की है जो कि कल मैदान में उतरी थी। जी हां, सिर्फ 10 फीसदी गलती मानता हूं टीम की। वन डे में 285 का लक्ष्य किसी भी दूसरी टीम के लिए कम मुश्किल चुनौती नहीं होता। पर क्या इस टीम के पास कोई भी ऐसा गेंदबाज था जो दूसरी टीम और लक्ष्य के बीच दीवार की तरह खड़ा हो जाता। जवाब है, नहीं। तीनों तेज गेंदबाज वन डे में अपनी पारी की शुरूआत कर रहे थे। तीनों ने पूरे 10 ओवर नहीं फेंके और साथ ही तीनों ने 6 की रन रेट से रन दिए। सफल इसमें विनय कुमार ही रहे पर महंगे भी साबित हुए। पर ऐसा क्यों हुआ कि तीन नए गेंदबाजों को एक साथ ही मैदान में उतारना पड़ा? क्या हमारे पास नेहरा, जहीर, प्रवीण को छोड़ कर गेंदबाज नहीं हैं।

नहीं ऐसा नहीं है, हमारे पास गेंदबाज हैं पर उनको मौका नहीं दिया गया। इरफान पठान, श्रीशांत, आरपी सिंह, अजीत अगरकर, जोगिंदर शर्मा को टीम के साथ भेजा जा सकता था पर क्यों नहीं टीम में शामिल किया गया ये तो सेलेक्टर्स ही बेहतर बता सकते हैं। उथप्पा, मनीष पांडे, रायडू, अभिषेक तिवारी, अभिषेक नायर इन नामों पर भी चर्चा हो सकती थी। शायद हुई भी हो पर इस टीम के साथ किसी भी सीनियर खिलाड़ी को ना भेजने के पीछे क्या लॉजिक था ये तो श्रीकांत एंड कंपनी ही बता सकती है। 70 फीसदी गलती सेलेक्टर्स की है।

20 फीसदी गलती है भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ियों की। जब कई खिलाड़ी छुट्टी मांग रहे हैं तो क्या भारतीय टीम के कप्तान धोनी को नहीं चाहिए था कि वो छुट्टी पर ना जाएं। क्यों सभी खिलाड़ियों ने एक साथ आराम की मांग की? और कैसे सेलेक्टर्स ने सभी को छुट्टी या आराम दे दिया। नेहरा ने ऐसा कौन सा पहाड़ तोड़ा था कि जिस कारण उन्हें आराम की जरूरत थी। सचिन तेंदुलकर ना तो वर्ल्ड टी-20 में गए फिर उनको आराम की जरूरत क्यों आ पड़ी।

हमारे टीम के सीनियर खिलाड़ियों से तो सिर्फ ये ही लगता है कि वो सभी अपने लिए खेलते हैं टीम या फिर देश के लिए नहीं खेलते। सब के सब आईपीएल में पैसा कमाने के लिए खेल सकते हैं पर देश की बात आए तो आराम की दरकार करते हैं। और सोने पर सुहागा सेलेक्टर्स, अपने ही पसंदीदा और क्षेत्र के खिलाड़ियों को ही टीम में शामिल करने में लगे रहते हैं।

इस हार को यंगिस्तान की हार मत कहिए, ये हार तो है हमारे बूढ़े सेलेक्टर्स और हमारे स्वार्थी सीनियर खिलाड़ियों की। इन सबको ये समझना चाहिए कि ये हार भारत की है और ये हार रिकॉर्डस में दर्ज भी जरूर होगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, May 28, 2010

’हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग’।


हर दिन की तरह आज भी दौड़ते-भागते मेट्रो में कदम रखा तो भीड़ होने के बावजूद सीट कब्जाने में मैं कामयाब हो गया। बिना वक्त गंवाए मैं रोज की तरह किताब के काले अक्षरों में गुम हो गया। मैं पन्ने दर पन्ने पलट रहा था, और मेट्रो, स्टेशन दर स्टेशन भागी जा रही थी। अगले स्टेशन पर दो लड़कियां चढ़ीं, लगभग 17-18 की होंगी। आते के साथ ही दोनों ने आंखें दौड़ाई कि ‘महिला आरक्षित’ सीट कौन सी है और उस पर बैठे एक 55-56 साल के अंकल को ’ऑन्ली फॉर लेडीज’ का बोर्ड दिखा कर उठा दिया। मैंने अंकल को सीट दी पर अगले स्टॉप पर सीट वापस मिल गई, अंकल उतर गए।

मुझे याद आया कि उन अंकल जी को ’महिला आरक्षित सीट’ लगभग इतनी ही उम्र की एक लड़की ने दी थी। कभी-कभी ये देखने को मिलता है एक साथ सिक्के के दो पहलू। मैं फिर किताब के पन्नों में खो गया। मन को हल्का करने के लिए भारी किताबों से हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन का रुख कर चुका हूं। हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मक पेशकश ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ में डूब गया। अपने में मजेदार शख्शियत इंस्पेक्टर मातादीन।

मैं जितना भी मातादीन के करेक्टर में डूबने की कोशिश करता मेरे मन को उस लोक पर जाने से पहले ही ब्रेक लग जाता। मन भटकने का कारण थी इस लोक की दो बालाएं। दोनों लड़कियां चैटर बॉक्स की तरह चालू थीं। मेरे कान के पास चैं चैं...पैं पैं....बाप रे। वो आपस में बात नहीं कर रहीं थीं, वो तो दुनिया को सुना रहीं थीं कि वो कितनी बोल्ड और मॉर्डन हैं। उनकी वार्ता की विष्य वस्तु लड़के, सेक्स और समाज।

जिन शब्दों को किसी भी फैमली चैनल पर बीप कर दिया जाता है उन शब्दों का उपयोग और उपभोग वो दिल खोल के कर रही थीं। अब बारी थी एंग्री यंग मैन लुक की पर हुआ कुछ नहीं, दोनों मुसकुराते हुए उस लुक को ओवर लुक कर गईं। मैंने किताब की तरफ ही रुख करना बेहतर समझा।

मैं किताब में डूबा हुआ था इनमें से एक लड़की ने पूछा कि हमें फ्लां-फ्लां जगह पर जाना है। अब मुसकुराने की बारी मेरी थी। दोनों को वहां जाना था जिसके लिए पिछले स्टेशन पर उतरना होता है और वहां से दूसरी मेट्रो पकड़नी पड़ती है। अब भी वैसे कुछ ज्यादा बिगड़ा नहीं था। मैंने उन दोनों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अंत में एक मुनियों वाली वाणी में मैंने संदेश दिया जिसे दोनों ने बड़े ही ध्यान से सुना।

मेरी बातें जो दो-चार सुन रहे थे समर्थन कर रहे थे और साथ ही अपनी भड़ास मधुर वाणी में निकाल रहे थे। वहां खड़े हर किसी को पता चल चुका था कि मार्डन दिखने और लगने में बहुत फर्क होता है। मार्डन होने का ये मतलब नहीं कि अक्ल के दरवाजे बंद कर दो।

दोनों वहां से जल्द गेट पर पहुंची और जाते-जाते एक जुमला भी छोड़ गईं ’हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग’। मेट्रो का दरवाजा खुल चुका था और वो दोनों इस प्रकरण को हंसी में उड़ाते हुए आगे बढ़ गईं और पीछे छोड़ गई वो ओल्ड जनरेशन। मैंने किताब बंद की और बैग के हवाले करते हुए सीट छोड़ दी, मैं अपने गंतव्य तक पहुंचने वाला था।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, May 27, 2010

धीरे-धीरे एक आदत की ओर...


सुबह हर किसी को जल्दी, हर कोई अपने कदमों से तेज, दूसरे से पहले पहुंचने की होड़। एक अजनबी से भी एक अनजाना मुकाबला, आगे निकलने की जद्दोजहद। हर कोई भीड़ का हिस्सा और नहीं भी। एक-दूसरे को धक्का देते, कोहनी से पीछे ढकेलते, आगे बढ़ जल्दी से सीट लपकने की जी जान कोशिश। और फिर सीट पर बैठकर शून्य में खोने का वो एहसास। उफ!!...देखते ही बनता है, हजारों के साथ अकेले सफर करना, भीड़ में अपने ख्यालों के साथ खो जाना।

मेट्रो की सीढ़ियों से ही जैसे मुकाबला शुरू हो जाता है। सबसे पहले दौड़ कर लिफ्ट पकड़ने की चाहत। जो सवार हो गया तो उसे सीट कब्जाने की होड़ और जो नहीं चढ़ पाया उसे सीढ़ियों के रास्ते सीढ़ी दर सीढ़ी किसी को पीछे छोड़ने की होड़। प्लेटफॉर्म पर सिर से जुड़े सिर फिर भी हर कोई हर एक से जुदा-जुदा।

एक बार इधर-उधर अपने सिर को घुमाकर देखिए। पहले बहुत कम लोग पढ़ते हुए चला करते थे पर मेट्रो में इस का चलन वापिस शुरू हुआ है। ना मुझे इस से मतलब ना उस से। कान में इयर फोन, हाई मैमोरी बेस्ड मोबाइल जिसमें सुनने को अथाह सामाग्री। बड़ों की तरज पर हाथ में न्यूजपेपर या फिर अंग्रेजी का कोई नॉवेल। ये है कुछ युवाओं का चेहरा। कुछ युवा जुदा भी हैं। दोनों में कॉमन है मोबाइल, वो नॉवेल में ना करते हुए, मोबाइल में ही ’आरएनडी’ करते रहते हैं।

मैने मेट्रो में कुछ दिन तो और लोगों की तरह सिर से सिर मिलाकर आंखों में नींद या फिर पुराने ख्याली पुलाव या दिन के सपनों के साथ गुजार दिए। पर फिर लगा कि नहीं ऐसे 25-30 मिनट बेकार में ‘बेकार’ करना ठीक नहीं। तो अधिकतर कोई किताब रखकर चलता हूं और जैसे ही मौका मिला, लग जाता हूं पन्ने पलटने में। मेट्रो के कारण कई किताब खत्म करने में कामयाब रहा हूं।

कई बार मेट्रो में कुछ बातें ऐसी होती है जो कि ना जाने क्यों दिल को छू जाती हैं और कुछ दिल को दुखा देती हैं। इन सब बातों की बात अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, May 22, 2010

दूर बैठे, दूर की सोच


गांव, मेरा गांव। जब भी गांव जाता हूं तो करीब 40-50 किलोमीटर पहले ही वो शहर की पक्की सड़क पीछे छूट जाती है। फिर शुरू हो जाता है सफर कच्ची सड़क का, जिसे बोलचाल की भाषा में खड़ंजा (ईट की सड़क) कहते हैं। फिर शुरू हो जाती है हरियाली और सिर्फ हरियाली। मिट्टी की सौंधी-सौंधी महक, वो खुशबू, जो बीमार को भी भला-चंगा कर दे। दूर- दूर तक आंखें सिर्फ देख पाती है तो लहलहाते खेत, हरे-भरे खेत। खेतों में बनी पगडंडी और उस पगडंडी पर ’कोई’ खेत में काम कर रहे अपनों के लिए खाना ले जाता या फिर दूर से ही आते दिखती सर पर घास का बड़ा गठ्ठर लिए जिसे कोई आम आदमी सोच भी नहीं सकता उठाने की।

गांवों भी अब पक्के मकानों से घिर चुका हैं पर शहर जैसी कोठियां नहीं है। वो पुराने अंदाज और जमाने की कोठियां। गांव में जिसके पास सबसे छोटा घर होगा उसकी कीमत भी शहर में एक आम आदमी की बड़ी पहुंच से बहुत ऊपर होगी। पर गांव में वो एक गरीब किसान, एक मजबूर मजदूर है।

काफी दिन से सोच रहा था कि गांव का चक्कर लगा आऊं। पर जाना हो ही नहीं पा रहा। वहां की तो बस यादें ही रह गई हैं, जाना तो जैसे छूट ही गया है। ये हालात तो तब हैं जब गांव मेरे बसेरे से महज 125 किलोमीटर भी नहीं है। गांव में चाचाजी और दूसरे नातेदार रहते हैं और हमारी खेती संभालते हैं। पर वक्त का अंतराल इतना हो गया है कि मेरा कोई रिश्तेदार मुझे शहर की सड़कों पर रोक कर पूछें, कि पहचाना? तो मैं बहुत ही असहज हो जाऊंगा और कहने को मजबूर हो जाऊंगा, माफ कीजिएगा नहीं पहचाना। कई बार लगता है जब फासले इतने ज्यादा हो गए हैं तो क्यों ना खेत-खलिहान बेच दूं। पर क्या अपनी जड़ों से इतना आसान होता है कट जाना?

उस फैसले से हम अपनी जड़ों को खो देंगे। पुरखों की एक मात्र निशानी ही है जो कि हमें अपनों के काफी करीब रखती हैं ये जमीन। शहर कि भागती दौड़ती जिंदगी की जैसे आदत सी पड़ गई है। वहां जाने की सोचता हूं तो कई बार मेरी सोच भी ये सोच नहीं पाती कि समय कैसे निकालूंगा। कितना घूमूंगा खेतों में, कितना देखूंगा आखों को सुकून देने वाले वो मनोरम दृष्य।

अभी तो फासले ही हुए हैं पर फिर वो खाई पैदा हो जाएगी जो कभी भी उस फासलों को भर नहीं सकेगी। आज गांव चला जाता हूं तो लगता है कि मैं भी यहां का हिस्सा हूं। जैसे समीर लाल जी को लगता है कि इतने सालों के बाद भी भारत की मिट्टी के हिस्सा हैं।


आपका अपना
नीतीश राज 
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”