Wednesday, December 31, 2008

दिल कर रहा था उस कंडेक्टर को धुन दूं पर...

जम्मू-कश्मीर में काउंटिंग थी और सुबह से लाइव करके दिमाग का दही बन चुका था। नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आ रही थी पीछे-पीछे चल रही थी पीडीपी। जम्मू में पीडीपी को कुछ नहीं मिला था और बीजेपी ने सीटों की कमाई की थी। कश्मीर में पीडीपी शायद सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी बनती नजर आ रही थी। ऑफिस में ये सब चल रहा था और मुझे मेरे रिलीवर ने रिलीव कर दिया और मैं सीधे घर की तरफ कूच कर गया। मेरे पास गाड़ी नहीं थी और कोई साथ जाने वाला भी नहीं मिल रहा था जिससे लिफ्ट ले सकता।
बस स्टेंड पर जाकर खड़ा हुआ तो खड़ा ही रह गया और आधा घंटा कब-कब में निकल गया पता ही नहीं चला। मेरे रूट की बस आ ही नहीं रही थी। दिमाग का दही पहले ही बन चुका था अब दही सड़ने भी लगी। बहुत ही चिड़िचिड़ाहट हो रही थी साथ में गुस्सा भी आ रहा था। पौन घंटे के इंतजार के बाद इंतजार खत्म हुआ और मैं बस में चढ़ा।
कनॉट प्लेस में एक अंग्रेज ने बस को हाथ दिया। बस स्टेंड से थोड़ा आगे जाकर बस वाले ने बस को रोक दिया। वो अंग्रेज जिसे की विदेशी सैलानी कहा जाएगा भागता हुआ बस को पकड़ने आया पर तुरंत ही बस वाले ने बस चला दी। वो पीछे भागता रहा, चिल्लाता रहा, भागता रहा, चिल्लाता रहा लेकिन बस नहीं रुकी। एक थ्री व्हीलर वाले ने ये देखा तो बस पकड़वाने में उसकी मदद करने लगा और आखिरकार बाराखंबा पर बस में वो चढ़ गया। आते के साथ ही उसने कंडेक्टर से कहा कि उसे गंजियाबाद (गाजियाबाद) जाना है।
ये सुनते के साथ ही कंडेक्टर ने उसका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। ‘गंजियाबाद जाना है ये तेरा गंजियाबाद कहां हैं ओ अंग्रेज?’ .... ..... .... तीन-चार गाली देने के बाद उस कंडेक्टर ने कहा, ‘साले अंग्रेज तेरे से तो सौ रु. किराया लूंगा गाजियाबाद तक के और तू क्या तेरा बाप भी देगा’। लेकिन यहां पर उस सैलानी ने कहां, ‘I Know the Fair…हमको मालूम...सौ नहीं...Just 10 Rs.’ ‘अरे अंग्रेज को किराया पता है किसने बताया बे तेरे को...’। कंडेक्टर का जवाब था।
वो अंग्रेज थोड़ी टूटी-फूटी हिंदी जानता था, याने कि उसे सब समझ आरहा था जो भी वो कंडेक्टर बोल रहा था। इसके बाद भी कुछ देर तक उस अंग्रेज को उसने ऐसे ही तंग किया। लेकिन उस अंग्रेज ने एक शब्द भी नहीं कहा। शायद ये उनको बताया भी गया होगा कि लोकल से कभी भी पंगा नहीं लेना है। पूरी बस में कुछ लोग इन बातों पर हंस रहे थे और कुछ ये तमाशा देख रहे थे। लेकिन पूरी बस में उस बदतमीज कंडेक्टर को कोई नहीं रोक रहा था। जब ये सब कुछ हो रहा था तो वहां पर कुछ लड़कियां भी बैठी हुईं थी। जब भी कंडेक्टर गांजियाबाद बोलता तो लड़कियां खूब जोर-जोर से हंसती। कंडेक्टर उन लड़कियों को देखता और फिर गांजियाबाद कहकर उस अंग्रेज को परेशान करता। कुछ बातें तो ऐसी थी कि बताई भी नहीं जा सकती। कंडेक्टर गालियां दे रहा था और लड़कियां हंस रही थीं। वो कंडेक्टर अपने आप को जेम्स बॉन्ड समझ रहा होगा इसलिए ये हरकत कर रहा होगा। लड़कियां हर दिन के लिए सीटें खाली मिलजाने के लालच में या फिर कुछ पैसे बचाने के मोह के कारण भी हंस रहीं थी या फिर वो सारी बेअकल थीं।
मुझे गुस्सा आ रहा था लेकिन मैं कुछ कर नहीं पा रहा था। पहले की इरिटेशन और बढ़ गई थी। लग रहा था कि उस कंडेक्टर को पकड़कर धुन दूं पर उस कंडेक्टर के साथ में दो-चार लड़के भी थे शामत से घबरा रहा था क्योंकि थका भी हुआ था। अपने को इतना असहाय कभी नहीं पाया था। सुबह ३.३० बजे का उठा हुआ और शाम के ४.०० बजे के करीब की ये बात थी। इन लड़कियों के पास में ही एक ४०-४५ साल की महिला खड़ीं हुईं थी। जैसे कि मुझे भी गुस्सा आ रहा था शायद उनको भी आ रहा था। उन्होंने सिर्फ एक लाइन उस कंडेक्टर को कही, ‘तुम सोच रहे हो कि तुम इसका मजाक उड़ा रहे हो, नहीं, तुम्हारे देश का मजाक उड़ रहा है। अपने या हमारे लिए ना सही पर देश की खातिर तो इस शख्स को परेशान मत करो’। ‘अरे, देश का अपमान क्यों हो रहा होगा, और वो फूहड़ सी हंसी हंसा। लेकिन इस बार लड़कियों ने साथ नहीं दिया। कुछ मुझ से लड़के जो कि इसी बात का इंतजार कर रहे थे तुरंत उस कंडेक्टर को ज्ञान देने लगे। लेकिन दिल से कह रहा हूं कि उस महिला ने मुझे खुद की ग्लानि से बचा लिया और मैं उन्हें दिल से धन्यवाद कहना चाहता हूं।
वैसे आप सब को ये बता दूं कि ये ब्लूलाइन बस की बात थी। जब मैं अपने स्टॉप पर उतरा तो पीछे से मुझे इसी रूट की सरकारी बस आती दिखी। शर्म आती है सरकारी बसों पर जो हमेशा ही इनसे पीछे चलती हैं और जब ब्लूलाइन बसें सवारी उठा लेती हैं तो तकरीबन १०-१५ मिनट के अंतराल के बाद चलती हैं और खाली आती हैं। ब्लूलाइन और आईसीआईसीआई बैंक की एक ही कहानी है दोनों ने ही सरकारी रवैये की सुस्त चाल का फायदा उठाया और पूरे मार्केट को कैप्चर करके अपने हिसाब से चलाया। ब्लूलाइन आज भी क़त्ल करती है और आईसीआईसीआई बैंक के रिकवरी एजेंट याने गुंडे आज भी लोगों को मारते पीटते हैं माना की अब थोड़ा सरकार सख्त होने के कारण ये सब कम हुआ है पर चल तो अब भी रहा है। पर कब तक?

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, December 25, 2008

कब तक डरपोक बने रहेंगे हम? हर दिन के मरने से तो बेहतर है कि एक बार ही मर जाएं।

जब-जब भारत पर आतंकी हमला हुआ है तब-तब भारत की सरकार ने बड़ा ही कड़ा रुख इख्तियार किया है। हर बार पाकिस्तान की तरफ ही निशाना रहा। भारत की तरफ से सबूत भी पाक सरकार को दिए गए। हर बार भारत के कड़े रुख के बाद पाक का रवैया क्या रहा? क्या पाकिस्तान ने कभी भी इस बात को स्वीकार किया कि वो आतंकवादी हमला पाकिस्तान की जमीन से किया गया। नहीं, भारत के हर कड़े रुख का जवाब पाकिस्तान ने और भी तीखे तेवरों में दिया। कोई भी कुछ कहता रहा, पर पाकिस्तान ने किसी की भी नहीं सुनी। भारत ने पूरे विश्व का समर्थन हासिल किया लेकिन पाकिस्तान का रवैया उतना ही सख्त रहा, उसने कभी नहीं माना कि आतंकियों को पाक जमीन मुहैया है।
भारत की संसद पर हमला हुआ, विमान अपहरण कांड और दिल्ली, बैंगलोर, राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, भारत के हर प्रदेश पर संकट के काले बादल अपना क़हर बरपाते रहे। भारत को सबूत के तौर पर कुछ आतंकवादी मिलते रहे लेकिन कभी भी पाकिस्तनी सरकार ने ये कबूल नहीं किया कि उनकी जमीन ही है दहशतगर्दों की पनाहगाह। पाक अधिकृत कश्मीर में तो आतंकवादियों के गढ़ के इतने पुख्ता सबूत मिले जिसे की दरकिनार नहीं किया जा सकता था पर पाकिस्तानी सरकार ने इसे कभी नहीं माना और आज भी वहां कई आतंकवादी संगठन अपना गढ़ बनाए बैठे हैं और उनकी मदद कर रहा है आईएसआई। जिसके पुख्ता सबूत बकौल भारत सरकार भारत के पास हैं और कुछ तो पाक और यूएन को भी दिए जा चुके हैं।
करगिल, क्या किसी को याद नहीं है, अभी हम नहीं भूले हैं, पाकिस्तान की सरकार पर करगिल करवाने का इल्जाम लगा। जब तक कि पाक सरकार पर काबिज नवाज शरीफ कुछ कर पाते तब तक उन्हें ही देश से ऱुखसत करवा दिया गया। आज भी नवाज शरीफ इस बात से इनकार नहीं करते कि करगिल पाकिस्तान पर काबिज समानान्तर सरकार की ही देन थी जिसे कि उस समय के जनरल परवेज मुशर्रफ चला रहे थे। वो दौर था जब कि भारत के राजनीतिक और आपसी संबंध पाकिस्तान के साथ काफी सौहार्दपूर्ण हो गए थे। लेकिन ठीक इसी दौर के बाद पाकिस्तान को एक ऐसा जनरल कम नेता मिला जो कि चाणक्य की तरह सोचता था। उसने कई मामलों में भारत के साथ ऐसी कूटनीति खेली कि भारत के चाणक्य कुछ कर नहीं सके। हमारे देश में आकर ही पाक सरकार का वो जनरल अपनी अधिकतर बातें मनवा के चला गया। आगरा वर्ता के असफल होने का ठीकरा भी भारतीय सरकार के ऊपर ही फोड़ दिया गया। जनरल परवेज मुशर्रफ ने यूएन तक में जाकर हमारे कई तथ्यों को दरकिनार कर दिया और साथ ही पीठ में छुरा भोंकने से भी वो बाज नहीं आया।
अब बात आती है कि घुसपैठ तो पहले भी भारत की लगी पाक सीमा से भारत की जमीन पर होती ही रही हैं। लेकिन इस बार मुंबई में फिदाइनों ने मासूम जनता पर क़हर बरपा दिया। इस हमले ने भारत की आर्थिक राजधानी के साथ-साथ पूरे देश को दहशत से भर दिया। २०० से ज्यादा लोग मारे गए उसमें २० से ज्यादा विदेशी भी थे। पूरे विश्व में इस हमले की निंदा हुई। लेकिन पहली बार किसी फिदाइन हमलावर को जिंदा पकड़ा जा सका। उस आतंकवादी अजमल आमिर कसाब ने ये कबूला कि वो पाकिस्तानी है। आतंकवादी के कबूलनामें के बाद इस समय की सरकार को बाहर से सहयोग देने वाले नवाज शरीफ ने भी ये मान लिया कि कसाब पाकिस्तानी है। पाक मीडिया की जुबानी पूरी दुनिया ने ये जाना कि खुद कसाब के पिता और उस गांव फरीदकोट के लोगों ने ये माना कि कसाब पाकिस्तानी है पर पाकिस्तान को अब भी सबूत की दरकार रही।
भारत एक तरफ डर-डर कर ये बात कहता रहा कि भारत के सारे विकल्प खुले हुए हैं। भारत के विदेश मंत्री और पीएम ने कहा कि हम तो आतंकवाद को ख़त्म करने की बात कर रहे हैं। पाकिस्तान अपनी जमीन से जितनी जल्दी हो आतंकवादियों को पनाह देना बंद करे। दूसरी तरफ पीएम ने साफ शब्दों में कहा कि भारत का मुद्दा युद्ध नहीं, आतंकवाद है। पर दूसरी तरफ पाकिस्तान डंके की चोट पर कार्रवाई करने से मना कर रहा है। पाकिस्तान के आर्मी चीफ परवेज कयानी ने तो यहां तक साफ कह दिया कि
‘पाकिस्तान की आर्मी पूरी तरह तैयार है और यदि भारत कोई भी कदम उठाता है तो भारत के हर कदम का जवाब एक मिनट के अंदर दे दिया जाएगा।’
जहां भारत सूझबूझ का परिचय दे रहा है वहीं पाकिस्तान अकड़ और अड़ियल रवैया अपना रहा है। पाकिस्तान ने अपने रैंजर्स राजस्थान और गुजरात सीमा से हटा कर वहां पर फौज की तैनाती कर रहा है। जबकि पाकिस्तान के इस कदम को भारत रुटीन कार्रवाई मान कर अभी अपनी सेना की तैनाती पर विचार कर रहा है। जबकि भारत की तरफ से एहतियातन कदम उठाए जा रहे हैं। सेना को अलर्ट पर रख दिया गया है लेकिन सीमा पर अभी भी बीएसएफ ही है।
मुंबई हमारे देश का हिस्सा है जब मुंबई पर हमला हुआ तो बैकफुट पर भारत क्यों है। कब तक हम ये सोचते रहेंगे कि अमेरिका हस्ताक्षेप करेगा तभी कोई फैसला होगा। क्या जब सबूत हमारे पास हैं तो क्या हम कार्रवाई नहीं कर सकते। पाकिस्तान के ऊपर जब अमेरिका को शक हुआ था तो उनके घर में घुसकर अमेरिकी सेना ने कार्रवाई की थी। मुशर्रफ को पूरा सहयोग देना पड़ा था, पाक के जितने कठमुल्ला थे सब मियां मुशर्रफ के खिलाफ हो गए थे। लेकिन अमेरिका ही आकर जज की भूमिका क्यों निभाए। हम फैसले बाद में लेते हैं अब जब कि पाकिस्तान पूरे एक्शन में आ गया है तो सरकार भी अपनी सीमा पर सुरक्षा तैनात करना शुरू कर देगी। ये ही समय होता है जब कि भारत की सरजमीं पर आतंकवादी सबसे ज्यादा आते हैं उन बर्फीली चोटियों से जो कि भारत का मस्तक है।
मेरा भारत महान, हम आजाद हैं, मेरे देश की तरफ जो भी निगाह उठा कर देखेगा हम उनकी आंखें नोच लेंगे। असल मायने में हम बस कहते रहते हैं, डरपोक हैं हम, डरते हैं हम, हर दिन हम जीते हैं पर डरते हुए, कब कोई गोली हमें मौत के आगोश में डाल दे। मौत से भरी जिंदगी से हमें शिकवा नहीं पर एक दिन में ये फैसला नहीं कर सकते कि इस जिल्लत से भरी जिंदगी नहीं चाहिए। अरे आज हम खुश नहीं हैं कल हमारे बच्चे खुश नहीं रहेंगे परसों उनके बच्चे। क्या करना है इस बात का फैसला भी हम अपने अनुसार नहीं लेते। क्यों आखिर क्यों? हम दूसरों की तरफ नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं कि या तो वो आकर फैसला कर दे या फिर जब तक दूसरा कोई हरकत नहीं करेगा तब तक हम कोई हल्ला नहीं बोलेंगे। और जब हल्ला बोलेंगे और पैर पर गिरकर माफी मांगने लगेगा तो फिर हमसे बड़ा दानवीर इस धरती पर कोई नहीं। १९७१ में यदि बांग्लादेश बना तो हमारे कारण लेकिन पाकिस्तानियों के घर में घुसकर उन्हें हमने औकात दिखाई थी। पर जंग जीतने के बाद भी भारत ने क्या किया। वो जो भारत और पाकिस्तान के बीच की जड़ थी उस को खत्म नहीं किया। हम जंग जीत चुके थे तब भी हमने पीओके वापस नहीं लिया। क्यों, क्यों नहीं लिया आज वहां पर आतंकवादियों ने हमारी ही जमीन पर आतंक के कैंप लगा रखे हैं। अरे, मुंबई मेरा अपना है, मेरे देश का हिस्सा है, करगिल हमारा है, उसपर किसी ने आंखें उठाई थी, तुमने आंखें तो नोच ली पर ये क्या साथ में उन आंखों को ठीक करने के लिए दवा दारू सब कुछ खुद मुहैया करा दिया। मैंने देखी थी लाशें, जब जवानों को ताबूत में से निकाला जाता था और पूरा गांव दहाड़ें मार मारकर रोता था उस सफेद पाउडर से लिपे बिना हरकत के जिस्म को।
भारत के साथ-साथ अमेरिका तक ने भी ये कह दिया कि पाकिस्तान अपनी जमीन से आतंकवादी वारदातें बंद करे। सख्त बात कोई भी देश नहीं कर रहा है। साथ ही विश्व ये चाहता है कि ये पड़ोसी देशों का आपसी मामला है और हो सके तो दोनों देश ही मिलकर इस मसले को सुलझाएं। सभी ये जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु सक्षम देश हैं और यदि लड़ाई हुई तो नुकसान विश्व का होगा। इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तान ये गेम खेलता है, जब भी पाक पर आतंकियों को पनाह देने की बात आती है तब ही वो सीमा पर ऐसा माहौल बना देता है कि जिससे लगे कि तनावपूर्ण स्थति बन चुकी है। ये भारत को समझना होगा कि पाकिस्तान हर बार इसी गेम प्लान के अंतर्गत काम करता है। भारत अब तक बहुत संयम का परिचय दे चुका है लेकिन हमारे संयमपन को हमारी कायरता ना समझा जाए, हम बार-बार ये बात कह चुके हैं लेकिन हमने कभी भी ये दिखाया नहीं है। देश का हर बाशिंदा इस खौफ के साए से अपने आप को निकालना चाहता है। हमारा साथ हमारी सरकार के साथ है, हम एक जुबान में कहते हैं कि अब कहने का नहीं करने का वक्त आ गया है।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, December 21, 2008

मांग करने वालों की तादाद बढ़ी तो अब सबकी जुबान चुप क्यों?

बिना तथ्यों के बात करना गलत होता है, यदि तथ्य हैं तो बेहतर हो कि उजागर भी हों। अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं वो पुराने तथ्यों से कुछ अलग हैं। जो पुराने तथ्य सामने आए थे वो ये थे कि करकरे, सालस्कर, काम्टे और साथ में बैठे तीनों सिपाही जब शहीद हुए तो उनके पास टाइम ही नहीं था कि वो आतंकवादियों की गोली का जवाब दे पाते। साथ ही तीनों अधिकारियों को पीछे की तरफ से गोली मारी गई थी। सबकुछ इतना अचानक हो गया कि किसी को भी पता नहीं चल सका था कि क्या हुआ। 27 की रात 1 बजे के करीब जब ये ख़बर आई थी कि हमारे तीन आला अधिकारियों को गोली लग गई है जिसमें से करकरे को ताज के पास और सालस्कर, काम्टे को कामा के पास गोली लगी है। पर थोड़ी देर बाद ये दुखद समाचार आया कि करकरे नहीं रहे, पर ये क्या सालस्कर भी नहीं रहे, और तीसरा फ्लैश था कि काम्टे भी शहीद। मुंबई के साथ-साथ पूरा देश आतंकित हो गया। हेमंत करकरे का नाम हर दिन सुनने को आ रहा था कारण था साध्वी का। तो फिर एकदम से खबर आना कि आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला कर दिया है और इन आतंकियों ने हमारे तीन आला अधिकारियों को मार दिया है तो ख़ौफ़ की बात तो थी ही। क्या आतंकवादी इतने ताकतवर होकर आए हैं कि पूरे मुंबई को कब्जे में कर लेंगे। फिर एक घंटे बाद ही ये साफ हो गया कि तीनों अधिकारी कामा के पास शहीद हुए। लेकिन जिस क्वालिस में करकरे थे उस क्वालिस में सिर्फ एक सिपाही घायल अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहा था। अभी तक जो भी सच सामने आया है वो है खुद जाधव की जुबानी। जो भी हमने जाना है वो हमें जाधव ने बताया है। उस में ही ये सच सामने आया कि उस क्वालिस में किसी ने भी बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहन रखी थी। दूसरी बात जो सामने आई थी वो ये कि इतना मौका किसी के पास भी नहीं था कि कोई संभल कर आतंकवादियों का जवाब दे पाता।
पर अब, जो बात सामने आ रही है वो है कसाब की जुबानी। अजमल आमिर कसाब वो आतंकवादी, जो मुंबई में कहर बरपाने वाले देहश्तगर्द गुट का सदस्य था। कसाब को गिरगांव चौपाटी से जिंदा धर दबोचा गया था और इसका साथी इस्माइल मारा गया था। इन्हीं दोनों आतंकवादियों ने अधिकारियों को मारा और फिर इन्हीं की गाड़ी लेकर गिरगांव चौपाटी भाग निकले। अब कसाब का इकबाले जुर्म सामने आया है। कसाब का बयान जो सामने आया है वो बिल्कुल अलग है। आतंकवादी कसाब के मुताबिक जब वो कामा में क़हर बरपाने के बाद जैसे ही कामा से बाहर निकले तो पुलिस से उनका सामना हुआ। एके 47 का मुंह उन्होंने पुलिस पर खोल दिया। तभी वहां पर दूर से पुलिस की गाड़ियां भी आती दिखाई दी। पहली गाड़ी कामा के पीछे वाले गेट से आगे वाले गेट की तरफ बढ़ गई। थोड़े फासले से आती दूसरी गाड़ी पीछे वाले गेट के पास धीरे हो गई। धीरे होते के साथ क्वालिस में आगे की सीट पर बैठे पुलिसवाले ने उन्हें पहचान लिया था जिसके हाथ में एक 47 थी। गाड़ी रुकते के साथ ही पुलिस ने फायर खोल दिया। गोली कसाब के हाथ को चीरते हुए निकल गई। तभी इस्माइल ने गोलियां चलानी शुरू कर दी और सभी के सभी पुलिसवालों को मार दिया। तीन शव को गाड़ी से बाहर फेंक कर वो गाड़ी से मुंबई में ख़ौफ़ का क़हर, बरपाते हुए चले गए और गिरगांव चौपाटी पर पकड़े गए।
लेकिन यहीं पर बात जो सामने आती है वो है कि दो अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। ये बात भी सामने आ रही है कि ये दोनों छिपे हुए थे और जिस जगह पर छिपे थे वो गाड़ी के बांयी ओर थी और जो गोलियां अधिकारियों को लगी हैं वो दाहिने तरफ लगी हैं। जब आतंकवादी बांयी तरफ थे तो दायीं तरफ से और पीछे से गोली कैसे चली। मान लिया चलगई पता नहीं कैसे चल गई, कहां से चल गई। लेकिन हेमंत करकरे की बुलेट प्रूफ जैकेट कहां है? जब करकरे की मौत की खबर आई तो नरीमन हाउस में इस ख़बर का तालियों से स्वागत किया गया।
दूसरी बात कि हेमंत करकरे के सीने में तीन गोली लगी जब गोली पीछे से चलाई गईं तो गोली सीने में कैसे लगी? सीएसटी पर जब वो मोर्चा लेने के लिए निकले थे तो उन्होंने बुलेटप्रूफ जैकेट और साथ ही हेल्मेट भी लगा रखा था तो फिर उन्होंने ये उतार क्यों दिया? क्या हेमंत करकरे जैसे सीनियर ऑफिसर इस आतंकवादी घटना को कम आंक रहे थे। या कि फिर ओवर कॉनफिडेंस ने इन आतंकवादियों को इतना मौका दे दिया कि हमने देश का सच्चा सिपाही खो दिया। वो सिपाही जो कि देश को आने वाले दिनों में एक ऐसे सच से रूबरू कराने वाला था जो कि अभी तक भारत के इतिहास में नहीं हुआ था। जिसके कारण वो पूरे देश का दुश्मन बन गया था।
सालस्कर को भी गोली दाहिने तरफ ही लगी है। तो क्या इन दोनों थ्यौरियों में कुछ लोच है या फिर असलियत अभी आना बाकी है। मैं कसाब की थ्यौरी को तबज्जो नहीं देता लेकिन जाधव की भी बात कहीं ना कहीं अधुरी लगती है। जांच की मांग जो की जा रही है वो इन्हीं तथ्यों के कारण की जा रही है। पूरा देश ये मानता है कि तीनों ऑफिसर हमारे नगीना थे, अभी मुंबई को इनकी जरूरत थी शायद देश को भी, पर कुछ हैं जो कि मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। वो इस शहीद को खोने के हमारे ग़म को भी हमारा नहीं होने देना चाहते। अंतुले के बाद कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी है, साथ ही हर दिन कोई ना कोई इस जांच को कराने की वकालत कर रहा है तो फिर कुछ चुनिंदा लोग जांच क्यों नहीं होने देना चाहते। क्या कुछ पर्दे के पीछे है जो कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते की सामने आए?

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”