अभी हाल ही में ये खबर सामने आई थी कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्ऱफ भारत आ सकते हैं। वैसे मुशर्रफ इसलिए भारत नहीं आ रहे कि मुंबई हमलों के मामले में भारत की कुछ मदद कर सकें। दरअसल मुशर्रफ भविष्य में अपनी राजनीतिक गतिविधियों के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से भारत, अमेरिका, हांगकांग, चीन, यूरोपीय देशों की यात्रा कर विशेष व्याख्यान देंगे। इन सभी देशों में जाकर वो अपने संवादों के जरिए अपना नजरिया लोगों तक पहुंचाएंगे। और वैसे भी मियां मुशर्रफ के पास अभी दो साल का वक्त भी है क्योंकि दो साल याने नवंबर २००९ से पहले वो राजनीति में नहीं उतर सकते। सत्ता छोड़ने के बाद से ही ये पाबंदी लगी हुई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये आता है कि जहां एक तरफ तो मुशर्रफ भारत के सबूत देने के बाद भी अपना बचाव करने में लगे हुए हैं साथ ही युद्ध तक की धमकी देने से गुरेज नहीं कर रहे तो भारत आकर व्याख्यान के जरिए भारत की जनता से अपने जीवनयापन और अपने स्वार्थ के लिए भीख मांगने की जरूरत क्या है। यदि लड़ाई रखनी है तो खुल के रखो। एक तरफ तो आप पीठ में खंजर भोंक रहे हैं, भारत को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में जलील करने से भी नहीं चूक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने स्वार्थ के लिए आप भारत में आकर भारत के पैसों से, भारत का निवाला खाकर भारत के खिलाफ ज़हर उगलने की तैयारी कर रहे हैं।
यदि देखता हूं तो अपनी सरकार की ही राजनीतिक अस्थिरता ज्यादा नज़र आती है। क्यों हमारे फैसले अडिग नहीं रहते? यदि किसी देश ने आपका जीना दुर्भर कर रखा है तो बेहतरी इसी में है कि कुछ समय के लिए उस देश का बहिष्कार कर दो। दूसरे देश को इस बात से कितना असर पड़ेगा इस बात की चिंता करने की हमें जरूरत नहीं है। हमें अपने कड़े कदम उठाने की जरूरत है और साथ ही दुनिया को ये भी बताने की जरूरत है कि हम ये कड़े कदम उठा रहे हैं। यदि पाकिस्तान से दोस्ती के बढ़े हाथ लाहौर बस सेवा, ट्रेन सेवा और हवाई सेवा को कुछ समय के लिए रोक दिया जाए तो पता चलता है कि हां आपने अपना रुख साफ किया है। एक तरफ तो क्रिकेट टीम, हॉकी टीम पर रोक लगा दी गई है वहीं दूसरी तरफ आतंकवादी एक देश से दूसरे देश आ-जा रहे हैं इन सेवाओं के जरिए। और यदि उस सेवाओं को बंद करने पर किसी को ऐतराज है तो बेहतर है कि वो पाकिस्तान में जाकर बस जाए मेरे देश भारत में इनके लिए जगह नहीं हैं। आतंकवाद के नाम पर अमेरिका किसी देश पर हमला कर दे तो चलेगा तो क्या हम आतंकवाद के नाम पर अपने देश की सुरक्षा के लिए कुछ कड़े कदम तो ले ही सकते हैं।
हमारी सरकार को चाहिए कि कड़े कदम उठाते हुए मियां मुशर्रफ को देश में आने से रोकें वर्ना पता नहीं वो कौन शख्स हो पर जिस बात का पता है वो है कि जूता कानपुर का ही रहेगा और यकीन मानिए चेहरा मुशर्रफ का ही होगा।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
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Tuesday, January 6, 2009
Thursday, December 25, 2008
कब तक डरपोक बने रहेंगे हम? हर दिन के मरने से तो बेहतर है कि एक बार ही मर जाएं।
जब-जब भारत पर आतंकी हमला हुआ है तब-तब भारत की सरकार ने बड़ा ही कड़ा रुख इख्तियार किया है। हर बार पाकिस्तान की तरफ ही निशाना रहा। भारत की तरफ से सबूत भी पाक सरकार को दिए गए। हर बार भारत के कड़े रुख के बाद पाक का रवैया क्या रहा? क्या पाकिस्तान ने कभी भी इस बात को स्वीकार किया कि वो आतंकवादी हमला पाकिस्तान की जमीन से किया गया। नहीं, भारत के हर कड़े रुख का जवाब पाकिस्तान ने और भी तीखे तेवरों में दिया। कोई भी कुछ कहता रहा, पर पाकिस्तान ने किसी की भी नहीं सुनी। भारत ने पूरे विश्व का समर्थन हासिल किया लेकिन पाकिस्तान का रवैया उतना ही सख्त रहा, उसने कभी नहीं माना कि आतंकियों को पाक जमीन मुहैया है।
भारत की संसद पर हमला हुआ, विमान अपहरण कांड और दिल्ली, बैंगलोर, राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, भारत के हर प्रदेश पर संकट के काले बादल अपना क़हर बरपाते रहे। भारत को सबूत के तौर पर कुछ आतंकवादी मिलते रहे लेकिन कभी भी पाकिस्तनी सरकार ने ये कबूल नहीं किया कि उनकी जमीन ही है दहशतगर्दों की पनाहगाह। पाक अधिकृत कश्मीर में तो आतंकवादियों के गढ़ के इतने पुख्ता सबूत मिले जिसे की दरकिनार नहीं किया जा सकता था पर पाकिस्तानी सरकार ने इसे कभी नहीं माना और आज भी वहां कई आतंकवादी संगठन अपना गढ़ बनाए बैठे हैं और उनकी मदद कर रहा है आईएसआई। जिसके पुख्ता सबूत बकौल भारत सरकार भारत के पास हैं और कुछ तो पाक और यूएन को भी दिए जा चुके हैं।
करगिल, क्या किसी को याद नहीं है, अभी हम नहीं भूले हैं, पाकिस्तान की सरकार पर करगिल करवाने का इल्जाम लगा। जब तक कि पाक सरकार पर काबिज नवाज शरीफ कुछ कर पाते तब तक उन्हें ही देश से ऱुखसत करवा दिया गया। आज भी नवाज शरीफ इस बात से इनकार नहीं करते कि करगिल पाकिस्तान पर काबिज समानान्तर सरकार की ही देन थी जिसे कि उस समय के जनरल परवेज मुशर्रफ चला रहे थे। वो दौर था जब कि भारत के राजनीतिक और आपसी संबंध पाकिस्तान के साथ काफी सौहार्दपूर्ण हो गए थे। लेकिन ठीक इसी दौर के बाद पाकिस्तान को एक ऐसा जनरल कम नेता मिला जो कि चाणक्य की तरह सोचता था। उसने कई मामलों में भारत के साथ ऐसी कूटनीति खेली कि भारत के चाणक्य कुछ कर नहीं सके। हमारे देश में आकर ही पाक सरकार का वो जनरल अपनी अधिकतर बातें मनवा के चला गया। आगरा वर्ता के असफल होने का ठीकरा भी भारतीय सरकार के ऊपर ही फोड़ दिया गया। जनरल परवेज मुशर्रफ ने यूएन तक में जाकर हमारे कई तथ्यों को दरकिनार कर दिया और साथ ही पीठ में छुरा भोंकने से भी वो बाज नहीं आया।
अब बात आती है कि घुसपैठ तो पहले भी भारत की लगी पाक सीमा से भारत की जमीन पर होती ही रही हैं। लेकिन इस बार मुंबई में फिदाइनों ने मासूम जनता पर क़हर बरपा दिया। इस हमले ने भारत की आर्थिक राजधानी के साथ-साथ पूरे देश को दहशत से भर दिया। २०० से ज्यादा लोग मारे गए उसमें २० से ज्यादा विदेशी भी थे। पूरे विश्व में इस हमले की निंदा हुई। लेकिन पहली बार किसी फिदाइन हमलावर को जिंदा पकड़ा जा सका। उस आतंकवादी अजमल आमिर कसाब ने ये कबूला कि वो पाकिस्तानी है। आतंकवादी के कबूलनामें के बाद इस समय की सरकार को बाहर से सहयोग देने वाले नवाज शरीफ ने भी ये मान लिया कि कसाब पाकिस्तानी है। पाक मीडिया की जुबानी पूरी दुनिया ने ये जाना कि खुद कसाब के पिता और उस गांव फरीदकोट के लोगों ने ये माना कि कसाब पाकिस्तानी है पर पाकिस्तान को अब भी सबूत की दरकार रही।
भारत एक तरफ डर-डर कर ये बात कहता रहा कि भारत के सारे विकल्प खुले हुए हैं। भारत के विदेश मंत्री और पीएम ने कहा कि हम तो आतंकवाद को ख़त्म करने की बात कर रहे हैं। पाकिस्तान अपनी जमीन से जितनी जल्दी हो आतंकवादियों को पनाह देना बंद करे। दूसरी तरफ पीएम ने साफ शब्दों में कहा कि भारत का मुद्दा युद्ध नहीं, आतंकवाद है। पर दूसरी तरफ पाकिस्तान डंके की चोट पर कार्रवाई करने से मना कर रहा है। पाकिस्तान के आर्मी चीफ परवेज कयानी ने तो यहां तक साफ कह दिया कि
‘पाकिस्तान की आर्मी पूरी तरह तैयार है और यदि भारत कोई भी कदम उठाता है तो भारत के हर कदम का जवाब एक मिनट के अंदर दे दिया जाएगा।’
जहां भारत सूझबूझ का परिचय दे रहा है वहीं पाकिस्तान अकड़ और अड़ियल रवैया अपना रहा है। पाकिस्तान ने अपने रैंजर्स राजस्थान और गुजरात सीमा से हटा कर वहां पर फौज की तैनाती कर रहा है। जबकि पाकिस्तान के इस कदम को भारत रुटीन कार्रवाई मान कर अभी अपनी सेना की तैनाती पर विचार कर रहा है। जबकि भारत की तरफ से एहतियातन कदम उठाए जा रहे हैं। सेना को अलर्ट पर रख दिया गया है लेकिन सीमा पर अभी भी बीएसएफ ही है।
मुंबई हमारे देश का हिस्सा है जब मुंबई पर हमला हुआ तो बैकफुट पर भारत क्यों है। कब तक हम ये सोचते रहेंगे कि अमेरिका हस्ताक्षेप करेगा तभी कोई फैसला होगा। क्या जब सबूत हमारे पास हैं तो क्या हम कार्रवाई नहीं कर सकते। पाकिस्तान के ऊपर जब अमेरिका को शक हुआ था तो उनके घर में घुसकर अमेरिकी सेना ने कार्रवाई की थी। मुशर्रफ को पूरा सहयोग देना पड़ा था, पाक के जितने कठमुल्ला थे सब मियां मुशर्रफ के खिलाफ हो गए थे। लेकिन अमेरिका ही आकर जज की भूमिका क्यों निभाए। हम फैसले बाद में लेते हैं अब जब कि पाकिस्तान पूरे एक्शन में आ गया है तो सरकार भी अपनी सीमा पर सुरक्षा तैनात करना शुरू कर देगी। ये ही समय होता है जब कि भारत की सरजमीं पर आतंकवादी सबसे ज्यादा आते हैं उन बर्फीली चोटियों से जो कि भारत का मस्तक है।
मेरा भारत महान, हम आजाद हैं, मेरे देश की तरफ जो भी निगाह उठा कर देखेगा हम उनकी आंखें नोच लेंगे। असल मायने में हम बस कहते रहते हैं, डरपोक हैं हम, डरते हैं हम, हर दिन हम जीते हैं पर डरते हुए, कब कोई गोली हमें मौत के आगोश में डाल दे। मौत से भरी जिंदगी से हमें शिकवा नहीं पर एक दिन में ये फैसला नहीं कर सकते कि इस जिल्लत से भरी जिंदगी नहीं चाहिए। अरे आज हम खुश नहीं हैं कल हमारे बच्चे खुश नहीं रहेंगे परसों उनके बच्चे। क्या करना है इस बात का फैसला भी हम अपने अनुसार नहीं लेते। क्यों आखिर क्यों? हम दूसरों की तरफ नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं कि या तो वो आकर फैसला कर दे या फिर जब तक दूसरा कोई हरकत नहीं करेगा तब तक हम कोई हल्ला नहीं बोलेंगे। और जब हल्ला बोलेंगे और पैर पर गिरकर माफी मांगने लगेगा तो फिर हमसे बड़ा दानवीर इस धरती पर कोई नहीं। १९७१ में यदि बांग्लादेश बना तो हमारे कारण लेकिन पाकिस्तानियों के घर में घुसकर उन्हें हमने औकात दिखाई थी। पर जंग जीतने के बाद भी भारत ने क्या किया। वो जो भारत और पाकिस्तान के बीच की जड़ थी उस को खत्म नहीं किया। हम जंग जीत चुके थे तब भी हमने पीओके वापस नहीं लिया। क्यों, क्यों नहीं लिया आज वहां पर आतंकवादियों ने हमारी ही जमीन पर आतंक के कैंप लगा रखे हैं। अरे, मुंबई मेरा अपना है, मेरे देश का हिस्सा है, करगिल हमारा है, उसपर किसी ने आंखें उठाई थी, तुमने आंखें तो नोच ली पर ये क्या साथ में उन आंखों को ठीक करने के लिए दवा दारू सब कुछ खुद मुहैया करा दिया। मैंने देखी थी लाशें, जब जवानों को ताबूत में से निकाला जाता था और पूरा गांव दहाड़ें मार मारकर रोता था उस सफेद पाउडर से लिपे बिना हरकत के जिस्म को।
भारत के साथ-साथ अमेरिका तक ने भी ये कह दिया कि पाकिस्तान अपनी जमीन से आतंकवादी वारदातें बंद करे। सख्त बात कोई भी देश नहीं कर रहा है। साथ ही विश्व ये चाहता है कि ये पड़ोसी देशों का आपसी मामला है और हो सके तो दोनों देश ही मिलकर इस मसले को सुलझाएं। सभी ये जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु सक्षम देश हैं और यदि लड़ाई हुई तो नुकसान विश्व का होगा। इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तान ये गेम खेलता है, जब भी पाक पर आतंकियों को पनाह देने की बात आती है तब ही वो सीमा पर ऐसा माहौल बना देता है कि जिससे लगे कि तनावपूर्ण स्थति बन चुकी है। ये भारत को समझना होगा कि पाकिस्तान हर बार इसी गेम प्लान के अंतर्गत काम करता है। भारत अब तक बहुत संयम का परिचय दे चुका है लेकिन हमारे संयमपन को हमारी कायरता ना समझा जाए, हम बार-बार ये बात कह चुके हैं लेकिन हमने कभी भी ये दिखाया नहीं है। देश का हर बाशिंदा इस खौफ के साए से अपने आप को निकालना चाहता है। हमारा साथ हमारी सरकार के साथ है, हम एक जुबान में कहते हैं कि अब कहने का नहीं करने का वक्त आ गया है।
आपका अपना
नीतीश राज
भारत की संसद पर हमला हुआ, विमान अपहरण कांड और दिल्ली, बैंगलोर, राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, भारत के हर प्रदेश पर संकट के काले बादल अपना क़हर बरपाते रहे। भारत को सबूत के तौर पर कुछ आतंकवादी मिलते रहे लेकिन कभी भी पाकिस्तनी सरकार ने ये कबूल नहीं किया कि उनकी जमीन ही है दहशतगर्दों की पनाहगाह। पाक अधिकृत कश्मीर में तो आतंकवादियों के गढ़ के इतने पुख्ता सबूत मिले जिसे की दरकिनार नहीं किया जा सकता था पर पाकिस्तानी सरकार ने इसे कभी नहीं माना और आज भी वहां कई आतंकवादी संगठन अपना गढ़ बनाए बैठे हैं और उनकी मदद कर रहा है आईएसआई। जिसके पुख्ता सबूत बकौल भारत सरकार भारत के पास हैं और कुछ तो पाक और यूएन को भी दिए जा चुके हैं।
करगिल, क्या किसी को याद नहीं है, अभी हम नहीं भूले हैं, पाकिस्तान की सरकार पर करगिल करवाने का इल्जाम लगा। जब तक कि पाक सरकार पर काबिज नवाज शरीफ कुछ कर पाते तब तक उन्हें ही देश से ऱुखसत करवा दिया गया। आज भी नवाज शरीफ इस बात से इनकार नहीं करते कि करगिल पाकिस्तान पर काबिज समानान्तर सरकार की ही देन थी जिसे कि उस समय के जनरल परवेज मुशर्रफ चला रहे थे। वो दौर था जब कि भारत के राजनीतिक और आपसी संबंध पाकिस्तान के साथ काफी सौहार्दपूर्ण हो गए थे। लेकिन ठीक इसी दौर के बाद पाकिस्तान को एक ऐसा जनरल कम नेता मिला जो कि चाणक्य की तरह सोचता था। उसने कई मामलों में भारत के साथ ऐसी कूटनीति खेली कि भारत के चाणक्य कुछ कर नहीं सके। हमारे देश में आकर ही पाक सरकार का वो जनरल अपनी अधिकतर बातें मनवा के चला गया। आगरा वर्ता के असफल होने का ठीकरा भी भारतीय सरकार के ऊपर ही फोड़ दिया गया। जनरल परवेज मुशर्रफ ने यूएन तक में जाकर हमारे कई तथ्यों को दरकिनार कर दिया और साथ ही पीठ में छुरा भोंकने से भी वो बाज नहीं आया।
अब बात आती है कि घुसपैठ तो पहले भी भारत की लगी पाक सीमा से भारत की जमीन पर होती ही रही हैं। लेकिन इस बार मुंबई में फिदाइनों ने मासूम जनता पर क़हर बरपा दिया। इस हमले ने भारत की आर्थिक राजधानी के साथ-साथ पूरे देश को दहशत से भर दिया। २०० से ज्यादा लोग मारे गए उसमें २० से ज्यादा विदेशी भी थे। पूरे विश्व में इस हमले की निंदा हुई। लेकिन पहली बार किसी फिदाइन हमलावर को जिंदा पकड़ा जा सका। उस आतंकवादी अजमल आमिर कसाब ने ये कबूला कि वो पाकिस्तानी है। आतंकवादी के कबूलनामें के बाद इस समय की सरकार को बाहर से सहयोग देने वाले नवाज शरीफ ने भी ये मान लिया कि कसाब पाकिस्तानी है। पाक मीडिया की जुबानी पूरी दुनिया ने ये जाना कि खुद कसाब के पिता और उस गांव फरीदकोट के लोगों ने ये माना कि कसाब पाकिस्तानी है पर पाकिस्तान को अब भी सबूत की दरकार रही।
भारत एक तरफ डर-डर कर ये बात कहता रहा कि भारत के सारे विकल्प खुले हुए हैं। भारत के विदेश मंत्री और पीएम ने कहा कि हम तो आतंकवाद को ख़त्म करने की बात कर रहे हैं। पाकिस्तान अपनी जमीन से जितनी जल्दी हो आतंकवादियों को पनाह देना बंद करे। दूसरी तरफ पीएम ने साफ शब्दों में कहा कि भारत का मुद्दा युद्ध नहीं, आतंकवाद है। पर दूसरी तरफ पाकिस्तान डंके की चोट पर कार्रवाई करने से मना कर रहा है। पाकिस्तान के आर्मी चीफ परवेज कयानी ने तो यहां तक साफ कह दिया कि
‘पाकिस्तान की आर्मी पूरी तरह तैयार है और यदि भारत कोई भी कदम उठाता है तो भारत के हर कदम का जवाब एक मिनट के अंदर दे दिया जाएगा।’
जहां भारत सूझबूझ का परिचय दे रहा है वहीं पाकिस्तान अकड़ और अड़ियल रवैया अपना रहा है। पाकिस्तान ने अपने रैंजर्स राजस्थान और गुजरात सीमा से हटा कर वहां पर फौज की तैनाती कर रहा है। जबकि पाकिस्तान के इस कदम को भारत रुटीन कार्रवाई मान कर अभी अपनी सेना की तैनाती पर विचार कर रहा है। जबकि भारत की तरफ से एहतियातन कदम उठाए जा रहे हैं। सेना को अलर्ट पर रख दिया गया है लेकिन सीमा पर अभी भी बीएसएफ ही है।
मुंबई हमारे देश का हिस्सा है जब मुंबई पर हमला हुआ तो बैकफुट पर भारत क्यों है। कब तक हम ये सोचते रहेंगे कि अमेरिका हस्ताक्षेप करेगा तभी कोई फैसला होगा। क्या जब सबूत हमारे पास हैं तो क्या हम कार्रवाई नहीं कर सकते। पाकिस्तान के ऊपर जब अमेरिका को शक हुआ था तो उनके घर में घुसकर अमेरिकी सेना ने कार्रवाई की थी। मुशर्रफ को पूरा सहयोग देना पड़ा था, पाक के जितने कठमुल्ला थे सब मियां मुशर्रफ के खिलाफ हो गए थे। लेकिन अमेरिका ही आकर जज की भूमिका क्यों निभाए। हम फैसले बाद में लेते हैं अब जब कि पाकिस्तान पूरे एक्शन में आ गया है तो सरकार भी अपनी सीमा पर सुरक्षा तैनात करना शुरू कर देगी। ये ही समय होता है जब कि भारत की सरजमीं पर आतंकवादी सबसे ज्यादा आते हैं उन बर्फीली चोटियों से जो कि भारत का मस्तक है।
मेरा भारत महान, हम आजाद हैं, मेरे देश की तरफ जो भी निगाह उठा कर देखेगा हम उनकी आंखें नोच लेंगे। असल मायने में हम बस कहते रहते हैं, डरपोक हैं हम, डरते हैं हम, हर दिन हम जीते हैं पर डरते हुए, कब कोई गोली हमें मौत के आगोश में डाल दे। मौत से भरी जिंदगी से हमें शिकवा नहीं पर एक दिन में ये फैसला नहीं कर सकते कि इस जिल्लत से भरी जिंदगी नहीं चाहिए। अरे आज हम खुश नहीं हैं कल हमारे बच्चे खुश नहीं रहेंगे परसों उनके बच्चे। क्या करना है इस बात का फैसला भी हम अपने अनुसार नहीं लेते। क्यों आखिर क्यों? हम दूसरों की तरफ नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं कि या तो वो आकर फैसला कर दे या फिर जब तक दूसरा कोई हरकत नहीं करेगा तब तक हम कोई हल्ला नहीं बोलेंगे। और जब हल्ला बोलेंगे और पैर पर गिरकर माफी मांगने लगेगा तो फिर हमसे बड़ा दानवीर इस धरती पर कोई नहीं। १९७१ में यदि बांग्लादेश बना तो हमारे कारण लेकिन पाकिस्तानियों के घर में घुसकर उन्हें हमने औकात दिखाई थी। पर जंग जीतने के बाद भी भारत ने क्या किया। वो जो भारत और पाकिस्तान के बीच की जड़ थी उस को खत्म नहीं किया। हम जंग जीत चुके थे तब भी हमने पीओके वापस नहीं लिया। क्यों, क्यों नहीं लिया आज वहां पर आतंकवादियों ने हमारी ही जमीन पर आतंक के कैंप लगा रखे हैं। अरे, मुंबई मेरा अपना है, मेरे देश का हिस्सा है, करगिल हमारा है, उसपर किसी ने आंखें उठाई थी, तुमने आंखें तो नोच ली पर ये क्या साथ में उन आंखों को ठीक करने के लिए दवा दारू सब कुछ खुद मुहैया करा दिया। मैंने देखी थी लाशें, जब जवानों को ताबूत में से निकाला जाता था और पूरा गांव दहाड़ें मार मारकर रोता था उस सफेद पाउडर से लिपे बिना हरकत के जिस्म को।
भारत के साथ-साथ अमेरिका तक ने भी ये कह दिया कि पाकिस्तान अपनी जमीन से आतंकवादी वारदातें बंद करे। सख्त बात कोई भी देश नहीं कर रहा है। साथ ही विश्व ये चाहता है कि ये पड़ोसी देशों का आपसी मामला है और हो सके तो दोनों देश ही मिलकर इस मसले को सुलझाएं। सभी ये जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु सक्षम देश हैं और यदि लड़ाई हुई तो नुकसान विश्व का होगा। इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तान ये गेम खेलता है, जब भी पाक पर आतंकियों को पनाह देने की बात आती है तब ही वो सीमा पर ऐसा माहौल बना देता है कि जिससे लगे कि तनावपूर्ण स्थति बन चुकी है। ये भारत को समझना होगा कि पाकिस्तान हर बार इसी गेम प्लान के अंतर्गत काम करता है। भारत अब तक बहुत संयम का परिचय दे चुका है लेकिन हमारे संयमपन को हमारी कायरता ना समझा जाए, हम बार-बार ये बात कह चुके हैं लेकिन हमने कभी भी ये दिखाया नहीं है। देश का हर बाशिंदा इस खौफ के साए से अपने आप को निकालना चाहता है। हमारा साथ हमारी सरकार के साथ है, हम एक जुबान में कहते हैं कि अब कहने का नहीं करने का वक्त आ गया है।
आपका अपना
नीतीश राज
Monday, September 29, 2008
“बाटला के L-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है”
‘बाटला के एल-18 का सच, अर्द्धसत्य नहीं, पूर्ण सच है’। ये मैं नहीं कह रहा हूं ये वो तीन आतंकवादी कह रहे हैं जो कि एनकाउंटर के बाद से दक्षिण दिल्ली से पकड़े गए हैं। शकील, जिया और साकिब ये तीनों रो रहे हैं अपने गुनाहों के लिए अल्लाह से रहम की जगह मौत मांग रहे हैं। ये पुलिस से भी मौत मांग रहे हैं। कस्टडी में जब भी इनको कोई पुलिसवाला दिख जाता है तभी ये रोना शुरू कर के गिड़गि़ड़ाते हुए उनसे अपने गुनाहों का वास्ता देते हुए सज़ा की भीख मांगते हैं। क्या आपने कभी आतंकवादियों को भीख मांगते हुए देखा है? शायद नहीं ही देखा होगा ये तो वो जालिम होते हैं जो कि औरों से भीख मंगवाते हैं। लेकिन आज ये खुद भीख मांग रहे हैं अपनी मौत की। दिन में रोते हैं, रात में रोते हैं, जमीन-दीवार पर सर मार-मार कर रोते हैं। लेकिन सच जो कि अर्द्धसत्य नहीं कि ये भीख उन्हें कोई भी नहीं दे सकता।
अभी कई बार पढ़ा कि लोग सवाल उठा रहे हैं कि एल-18 में जो एनकाउंटर हुआ वो फर्जी था। मैंने सबकी दलीलें सुनी हैं, साथ में ‘बड़े-बड़े’ लोगों की दलीलें भी सुनी हैं। दलीलें हैं हमने वहां पर आसपास के परिवार वालों से बातें की। जितने मुंह उतनी बातें। अब ये समझ में नहीं आता कि जब हर जगह से अलग-अलग कहानी सुनने को मिल रही हैं तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि उन सारी कहानियों में से कोई एक भी सही है। फिर पुलिस के बयान को भी एक दलील मान कर सच माना जा सकता है।
हर कोई जानना चाहता है सच। ये सच या तो सैफ बता सकता है जो कि वहां से पकड़ा गया या फिर एक शख्स और है जो असलियत बता सकता है। कुछ का मानना है कि भई, सैफ को तो वहां लाया गया था उसे कैसे पता होगा। तो जवाब है, क्यों आंखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या सैफ ने। चलो, मान लें कि सैफ को कुछ भी नहीं पता।
उस दूसरे शख्स को पूछते हैं कि भई, क्या हुआ था। वो हैं कांस्टेबल बलवंत। उस मुठभेड़ में गोली इस शख्स को भी लगी। एम्स ट्रामा सेंटर में इलाज चल रहा है। एक हाथ जो कि चोटिल हुआ वो बच पाया तो बहुत ही होगा। ये बात जो मैं बताने जा रहा हूं वो बलवंत ने किसी मीडियाकर्मी या फिर पुलिस-डॉक्टर को नहीं बताई है। ये बात उसने अपने साथ काम करने वाले एक साथी को बताई है वो भी सबके सामने नहीं बिल्कुल निजी तौर पर।
बलवंत ने अपने साथी के पूछने पर ये बताया कि पूरा घटनाक्रम कैसे-क्या हुआ बताया ही नहीं जा सकता लेकिन मोटा-मोटा क्या हुआ बता देता हूं। उन्होंने बोलना शुरू किया,
तो ये थी बलवंत की अपने साथी से बातचीत। अब और तो शायद ही प्रमाण कोई दे सकता हो। फिर और भी बातें हुईं, वो कुछ महकमे की, कुछ घर परिवार की, कुछ स्व. शर्मा जी के परिवार की।
पुलिस ने एल-18 से जो चीजें बरामद की हैं उनमें से कई चीजें ऐसी हैं जो कि इन आतंकवादियों को ओवरस्मार्ट साबित करती हैं। 900 से ज्यादा फोटों उनके लैपटॉप से बरामद हुई हैं। इन तस्वीरों में ब्लास्ट की तस्वीरें हैं। कुछ वीडियों भी मिले हैं जो कि ब्लास्ट के तुरंत बाद के हैं। उन तस्वीरों में कुछ तो वो हैं जैसे कि मणिनगर में साइकिल की जिसमें कि शकील और जिया ने बम लगाया था। उन सभी कारों की तस्वीरें हो जो कि अहमदाबाद में उपयोग की गईं। बम और टाइमर कार के अंदर प्लांट करते हुए की तस्वीरें हैं। कार के अंदर बम रखा हुआ है, फोटो पर समय बता रहा है शाम के 5.45 और फिर दूसरी तस्वीर भी वहीं कि ब्लास्ट के 5 मिनट बाद की 6.25। साथ ही ऐसा करते हुए इनको लगता था कि पुलिस हो या स्थानीय लोग इन्हें मीडिया का समझेंगे कोई भी हाथ नहीं लगाएगा। इसके अलावा और क्या सबूत दें। और लीजिए सबूत। ये सब फोटो और वीडियो सीडी और मेल के साथ एटैच करके भेजी जाती थीं। देखिए हमने कितने अच्छे ढ़ंग से काम को अंजाम दिया है। कई-कई सिम और ब्लास्ट के बाद और पहले भी एक ही सिम पर कॉल किया गया।
जैसे ही पुलिस को टिप मिली थी इन लड़कों के बारे में जो कि एल-18 में रहते हैं तो उस दिन से ही इनका फोन सर्विलांस पर लग चुका था। पुलिस ने इनकी बातें सुनीं। इनके कारगुजारियों के किस्से भी सुने। लेकिन कभी भी बातचीत में इन्होंने हथियार के बार में जिक्र नहीं किया। ये ही कारण था कि स्व. इस्पेक्टर शर्मा बिना किसी लाइफ गार्ड के दरवाजा खटखटाने चले गए।
सब ये सोच जरूर रहे होंगे कि शकील, जिया और साकिब रो क्यों रहे थे। पुलिस की मार से या क्या कारण था। स्पेशल सेल ने उनको अहमदाबाद ब्लास्ट और बैंगलोर ब्लास्ट के साथ-साथ दिल्ली के दर्द की तस्वीरें भी दिखाईं हैं। इन तस्वीरों को देख कर वो अपने को माफ नहीं कर पा रहे हैं। अब वो बताते हैं कि उन्हें तो मुंबई के दंगों, बाबरी मस्जिद, गोधरा के दंगों की तस्वीरें दिखाई हैं। बोला गया उनको तकरीरें दी गईं हैं और कई न्यूज चैनलों की वो स्टोरी दिखाई गईं हैं जो कि ब्लास्ट के बाद किसी मुस्लिम परिवार पर कवर की गईं थी। वो बताते हैं कि हमें तो कभी रॉ सामान नहीं मिलता था। हम से कहा जाता कि ये सामान वहां रखकर आ जाना है। सिर्फ रखने का झंझट रहता था और वो भी पहले से ही तयशुदा रहता था कि कैसे-क्या करना हैं।
आधा सच जानकर ना जाने ये नौजवान क्यों बहक जाते हैं। पूर्ण सच की तलाश कठिन तो होती है पर नामुमकिन नहीं। लेकिन सच सच ही होता है उसमें से ना घटाया जा सकता है और ना ही उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद कुछ सच और सामने आएंगे।
आपका अपना
नीतीश राज
अभी कई बार पढ़ा कि लोग सवाल उठा रहे हैं कि एल-18 में जो एनकाउंटर हुआ वो फर्जी था। मैंने सबकी दलीलें सुनी हैं, साथ में ‘बड़े-बड़े’ लोगों की दलीलें भी सुनी हैं। दलीलें हैं हमने वहां पर आसपास के परिवार वालों से बातें की। जितने मुंह उतनी बातें। अब ये समझ में नहीं आता कि जब हर जगह से अलग-अलग कहानी सुनने को मिल रही हैं तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि उन सारी कहानियों में से कोई एक भी सही है। फिर पुलिस के बयान को भी एक दलील मान कर सच माना जा सकता है।
हर कोई जानना चाहता है सच। ये सच या तो सैफ बता सकता है जो कि वहां से पकड़ा गया या फिर एक शख्स और है जो असलियत बता सकता है। कुछ का मानना है कि भई, सैफ को तो वहां लाया गया था उसे कैसे पता होगा। तो जवाब है, क्यों आंखों पर पट्टी बांध रखी थी क्या सैफ ने। चलो, मान लें कि सैफ को कुछ भी नहीं पता।
उस दूसरे शख्स को पूछते हैं कि भई, क्या हुआ था। वो हैं कांस्टेबल बलवंत। उस मुठभेड़ में गोली इस शख्स को भी लगी। एम्स ट्रामा सेंटर में इलाज चल रहा है। एक हाथ जो कि चोटिल हुआ वो बच पाया तो बहुत ही होगा। ये बात जो मैं बताने जा रहा हूं वो बलवंत ने किसी मीडियाकर्मी या फिर पुलिस-डॉक्टर को नहीं बताई है। ये बात उसने अपने साथ काम करने वाले एक साथी को बताई है वो भी सबके सामने नहीं बिल्कुल निजी तौर पर।
बलवंत ने अपने साथी के पूछने पर ये बताया कि पूरा घटनाक्रम कैसे-क्या हुआ बताया ही नहीं जा सकता लेकिन मोटा-मोटा क्या हुआ बता देता हूं। उन्होंने बोलना शुरू किया,
‘हम साहब(स्व.इंस्पेक्टर शर्मा) के साथ उपर गए। सेल्समैन बनें हमारे सहयोगी ने हमें कमरा-कमरे का नक्शा यानी समान कहां-कहां रखा है, हथियार दिखे कि नहीं और जो भी उसने देखा था, कम शब्दों में, सब बता दिया था। साहब आगे थे हम सब लोग पीछे, अपनी-अपनी जगह चुनते हुए, खड़े होते रहे, मैं साहब के साथ ही था। साहब ने जाते ही दरवाजे में ठोकर मारी और खोलने के लिए आवाज़ लगाई। लेकिन जब खोलने में देर होने लगी तो साहब ने दरवाजे में दो तीन ठोकरें और जड़ दीं साथ ही ‘जल्दी खोलो’ की आवाज़ भी लगाई। फिर क्या हुआ असल में समझ में नहीं आया, नहीं पता चला कि क्या हुआ। चीख चिल्लाहट के बीच गोलियां चलने लगी और उसके आगे कि तो तुम रोज ही पढ़ते रहते होगे’।
तो ये थी बलवंत की अपने साथी से बातचीत। अब और तो शायद ही प्रमाण कोई दे सकता हो। फिर और भी बातें हुईं, वो कुछ महकमे की, कुछ घर परिवार की, कुछ स्व. शर्मा जी के परिवार की।
पुलिस ने एल-18 से जो चीजें बरामद की हैं उनमें से कई चीजें ऐसी हैं जो कि इन आतंकवादियों को ओवरस्मार्ट साबित करती हैं। 900 से ज्यादा फोटों उनके लैपटॉप से बरामद हुई हैं। इन तस्वीरों में ब्लास्ट की तस्वीरें हैं। कुछ वीडियों भी मिले हैं जो कि ब्लास्ट के तुरंत बाद के हैं। उन तस्वीरों में कुछ तो वो हैं जैसे कि मणिनगर में साइकिल की जिसमें कि शकील और जिया ने बम लगाया था। उन सभी कारों की तस्वीरें हो जो कि अहमदाबाद में उपयोग की गईं। बम और टाइमर कार के अंदर प्लांट करते हुए की तस्वीरें हैं। कार के अंदर बम रखा हुआ है, फोटो पर समय बता रहा है शाम के 5.45 और फिर दूसरी तस्वीर भी वहीं कि ब्लास्ट के 5 मिनट बाद की 6.25। साथ ही ऐसा करते हुए इनको लगता था कि पुलिस हो या स्थानीय लोग इन्हें मीडिया का समझेंगे कोई भी हाथ नहीं लगाएगा। इसके अलावा और क्या सबूत दें। और लीजिए सबूत। ये सब फोटो और वीडियो सीडी और मेल के साथ एटैच करके भेजी जाती थीं। देखिए हमने कितने अच्छे ढ़ंग से काम को अंजाम दिया है। कई-कई सिम और ब्लास्ट के बाद और पहले भी एक ही सिम पर कॉल किया गया।
जैसे ही पुलिस को टिप मिली थी इन लड़कों के बारे में जो कि एल-18 में रहते हैं तो उस दिन से ही इनका फोन सर्विलांस पर लग चुका था। पुलिस ने इनकी बातें सुनीं। इनके कारगुजारियों के किस्से भी सुने। लेकिन कभी भी बातचीत में इन्होंने हथियार के बार में जिक्र नहीं किया। ये ही कारण था कि स्व. इस्पेक्टर शर्मा बिना किसी लाइफ गार्ड के दरवाजा खटखटाने चले गए।
सब ये सोच जरूर रहे होंगे कि शकील, जिया और साकिब रो क्यों रहे थे। पुलिस की मार से या क्या कारण था। स्पेशल सेल ने उनको अहमदाबाद ब्लास्ट और बैंगलोर ब्लास्ट के साथ-साथ दिल्ली के दर्द की तस्वीरें भी दिखाईं हैं। इन तस्वीरों को देख कर वो अपने को माफ नहीं कर पा रहे हैं। अब वो बताते हैं कि उन्हें तो मुंबई के दंगों, बाबरी मस्जिद, गोधरा के दंगों की तस्वीरें दिखाई हैं। बोला गया उनको तकरीरें दी गईं हैं और कई न्यूज चैनलों की वो स्टोरी दिखाई गईं हैं जो कि ब्लास्ट के बाद किसी मुस्लिम परिवार पर कवर की गईं थी। वो बताते हैं कि हमें तो कभी रॉ सामान नहीं मिलता था। हम से कहा जाता कि ये सामान वहां रखकर आ जाना है। सिर्फ रखने का झंझट रहता था और वो भी पहले से ही तयशुदा रहता था कि कैसे-क्या करना हैं।
आधा सच जानकर ना जाने ये नौजवान क्यों बहक जाते हैं। पूर्ण सच की तलाश कठिन तो होती है पर नामुमकिन नहीं। लेकिन सच सच ही होता है उसमें से ना घटाया जा सकता है और ना ही उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद कुछ सच और सामने आएंगे।
आपका अपना
नीतीश राज
Saturday, September 27, 2008
क्या हैं हम, SOFT NATION या WEAK NATION? पार्ट 2
पिछली कड़ी में बात की हमने भारत की, जब कि हमने पहली बार आतंकवाद के सामने घुटने टेके थे। कुछ देश ऐसे भी हैं जो कि किसी भी कीमत पर आतंकवाद के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं।
इस कड़ी में अब बात दूसरे नेशन रूस की। रूस के मॉस्को में 23 अक्टूबर 2002 की एक शाम। मॉस्को में शहर के सबसे बड़े थिएटर में गीत संगीत से भरी शाम अपने पूरे रंग में थी। करीब 850-900 के करीब लोग वहां मौजूद थे। तभी रात के 9।00 बजे करीब 42 चेचन्य आतंकवादी वहां आते हैं और पूरे थिएटर को अपने कब्जे में कर लेते हैं। करीब 90 लोग भागने में सफल हो जाते हैं। दो दिन बाद 150-200 लोगों को आतंकवादी छोड़ देते है जिनमें औरतें और बच्चे शामिल। उन चेचन्य आतंकवादियों की मांग थी कि सप्ताह भर के भीतर चेचन्य में से रूस अपनी सेना हटा ले और चेचन्य को आजाद कर दे। काफी लोगों ने मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाही पर वो सब बेकार। सरकार ने ये फैसला भी किया कि चेचन्य से अपने सैनिक हटा लिए जाएंगे पर समय बहुत कम था। वहीं कमांडो अपनी जगह ले चुके थे। 26 अक्टूबर 2002 को फौजी कार्रवाई से पहले सरकार ने संदेश इन विद्रहियों को भिजवाया---
'विद्रोही उनको कोई भी हानि नहीं पहुंचाना चाह रहे ये तो हमारी सरकार है जो कि हमें यहां से जिंदा नहीं निकालना चाहती और थिएटर में जहरीली गैस छोड़ रही है’।
बाद में पुतिन सरकार को बहुत भला-बुरा कहा गया, वहां पर भी राजनीति खूब हुई। पुतिन सरकार पर आरोप भी लगे और एक वक्त तो ये आया कि शायद पुतिन हिल जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। लोगों ने फिर दूरदर्शिता को देखते हुए सरकार का साथ ही दिया।
क्या इस तरह के फैसले भारत सरकार ले सकती है?चाहे किसी की भी दल की सरकार हो। यदि रुबैया अपहरण कांड में सरकार ने सटीक फैसला ले लिया होता तो शायद आज देश का हर हिस्सा महफूज होता।
कई दिनों से ये बहस चल रही है कि हम क्या हैं एक Soft Nation या फिर Weak Nation। लेकिन इन दो उदाहरण से ये साफ जाहिर होगया होगा कि हम क्या हैं। Soft Nation रूस भी है पर वो Weak Nation नहीं है। पर हम Soft Nation के साथ साथ Weak Nation भी हैं। जब ही आतंकवाद सर चढ़कर बोल रहा है।
अगली बार भी नजर डालेंगे भारत सरकार और विदेशी सरकारों के रुख पर जो हमें एहसास कराएगा और बताएगा कि हां, हम Soft नहीं Weak Nation हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
इस कड़ी में अब बात दूसरे नेशन रूस की। रूस के मॉस्को में 23 अक्टूबर 2002 की एक शाम। मॉस्को में शहर के सबसे बड़े थिएटर में गीत संगीत से भरी शाम अपने पूरे रंग में थी। करीब 850-900 के करीब लोग वहां मौजूद थे। तभी रात के 9।00 बजे करीब 42 चेचन्य आतंकवादी वहां आते हैं और पूरे थिएटर को अपने कब्जे में कर लेते हैं। करीब 90 लोग भागने में सफल हो जाते हैं। दो दिन बाद 150-200 लोगों को आतंकवादी छोड़ देते है जिनमें औरतें और बच्चे शामिल। उन चेचन्य आतंकवादियों की मांग थी कि सप्ताह भर के भीतर चेचन्य में से रूस अपनी सेना हटा ले और चेचन्य को आजाद कर दे। काफी लोगों ने मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाही पर वो सब बेकार। सरकार ने ये फैसला भी किया कि चेचन्य से अपने सैनिक हटा लिए जाएंगे पर समय बहुत कम था। वहीं कमांडो अपनी जगह ले चुके थे। 26 अक्टूबर 2002 को फौजी कार्रवाई से पहले सरकार ने संदेश इन विद्रहियों को भिजवाया---
“हमें नहीं पता कि कितने आतंकवादी थिएटर में मौजूद हैं और उनके पास कौनऔर हुआ भी ये ही सभी विद्रोही मार दिए गए। साथ ही करीब 150 बंधकों की भी मौत हुई। जबकि ऐन हमले से पहले कुछ बंधकों ने फोन पर ये जानकारी दी थी कि,
से हथियार हैं, हमें ये भी नहीं पता कि वो हमारी जनता के साथ कैसा सलूक कर रहे हैं।
हमें तो सिर्फ ये पता है कि एक भी विद्रोही थिएटर से जिंदा बाहर नहीं निकल
पाएगा”
'विद्रोही उनको कोई भी हानि नहीं पहुंचाना चाह रहे ये तो हमारी सरकार है जो कि हमें यहां से जिंदा नहीं निकालना चाहती और थिएटर में जहरीली गैस छोड़ रही है’।
बाद में पुतिन सरकार को बहुत भला-बुरा कहा गया, वहां पर भी राजनीति खूब हुई। पुतिन सरकार पर आरोप भी लगे और एक वक्त तो ये आया कि शायद पुतिन हिल जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। लोगों ने फिर दूरदर्शिता को देखते हुए सरकार का साथ ही दिया।
क्या इस तरह के फैसले भारत सरकार ले सकती है?चाहे किसी की भी दल की सरकार हो। यदि रुबैया अपहरण कांड में सरकार ने सटीक फैसला ले लिया होता तो शायद आज देश का हर हिस्सा महफूज होता।
कई दिनों से ये बहस चल रही है कि हम क्या हैं एक Soft Nation या फिर Weak Nation। लेकिन इन दो उदाहरण से ये साफ जाहिर होगया होगा कि हम क्या हैं। Soft Nation रूस भी है पर वो Weak Nation नहीं है। पर हम Soft Nation के साथ साथ Weak Nation भी हैं। जब ही आतंकवाद सर चढ़कर बोल रहा है।
अगली बार भी नजर डालेंगे भारत सरकार और विदेशी सरकारों के रुख पर जो हमें एहसास कराएगा और बताएगा कि हां, हम Soft नहीं Weak Nation हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
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Friday, September 26, 2008
क्या हैं हम, SOFT NATION या WEAK NATION?
SOFT NATION या WEAK NATION की पहली कड़ी में आज बात जड़ की।
आतंकवाद का आतंक हमारे देश में सर चढ़कर क्यों बोल रहा है? हर बार बैठकों का दौर शुरू होता है और नतीजा वो ही ढाक के तीन पात। फैसले ऐसे कि जिस पर अमल करते हुए आज भी आतंकवाद हमारे सर पर चढ़कर नाच रहा है। देश की जनता हमेशा ही डर के साए में जीने को मजबूर है। आतंकवाद का ये दानव हमारे देश में इतना क्यों और कैसे फल फूल रहा है इसका जवाब शायद है भी हमारे पास ही। हमारे पुराने उदाहरण इस बात के सबूत रहे हैं जो आतंकवाद को बढ़ावा देते से लगते हैं।
आपको याद होगा 1989। वो काला साल जब कि आतंकवाद के खिलाफ हमने पहली बार घुटने टेके थे। पूरे देश और विश्व की नज़र हम पर टिकी थी कि हम कैसे उस वारदात से निपटते हैं। ऐसा नहीं था कि इस से पहले देश में आतंकवाद का नामोनिशान नहीं था। पर ये वो वाक्या था जब हमारी सरकार ने लड़ने का हौसला छोड़ कर के आतंकवादियों के नापाक इरादों के सामने घुटने टेक दिए थे।
8 दिसंबर 1989, दोपहर के लगभग चार बजे, मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद को उनके घर से महज 500 मीटर की दूरी पर जब कि वो अस्पताल(जहां वो इंटर्नसिप करती थीं) से वापस आते हुए किडनेप कर लिया गया। चार आतंकवादियों ने इस वारदात को अंजाम दिया था। पूरे देश में हड़कंप मच गया। वीपी सिंह की सरकार थी उस समय और सरकार में देश के गृहमंत्री की एक बेटी रुबैया सईद का अपहरण देश की सुर्खियां बटोरने लगा। अपहरण के लगभग दो घंटे के भीतर ही आतंकवादी संगठन कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट अपनी शर्ते रख देता है। जेकेएलएफ के एरिया कमांडर शेख अब्दुल हमीद समेत पांच खुंखार आतंकवादियों को छोड़ने की मांग करता है जिनके नाम थे गुलाम नबी बट, नूर मोहम्मद कलबाल, मुहम्मद अल्ताफ और जावेद अहमद जांगर। देखते ही देखते श्रीनगर में सरकार पहुंचने लगी। कश्मीर का अवाम बहुत गुस्से में था कि कैसे कोई अविवाहित लड़की को अगवा कर सकता है साथ ही लोगों का मानना था कि ये इस्लाम और कश्मीरियत पर हमला है। फारुक अब्दुल्ला उस समय लंदन में छुट्टियां मना रहे थे। तुरंत देश लौटे और फिर कई लोग आतंकवादियों से वार्ता करने के लिए सामने आए। चाहे वो वेद मारवाह हों या एबी गनी लोन की बेटी शबनम लोन या फिर इलाहाबाद हाई कोट के जज मोती लाल भट्ट।
5 दिन बाद 13 दिसंबर की सुबह लगभग 3.30 बजे दो केंद्रीय मंत्री इंद्र कुमार गुजराल और मोहम्मद खान श्रीनगर पहुंचे। फारुख अबदुल्ला नहीं चाहते थे कि आतंकवादियों की मांग को माना जाए। पर सरकार झुक गई और शाम 5 बजे सरकार ने सभी पांचों आतंकवादियों को छोड़ दिया और ठीक दो घंटे बाद शाम 7 बजे रुबैया सईद को छोड़ दिया गया। इस पूरी वारदात के पीछे जिस शख्स का नाम सामने आया था वो था यासीन मलिक। जो कि आज भी भारत में रहकर के पाकिस्तान का पैरोकार बना हुआ है।
यदि उस दिन सरकार ने ये सौदा नहीं किया होता तो शायद आतंकवाद का ये रूप हम आज नहीं देख रहे होते। वो पहली नाकामयाबी थी हमारी सरकार की आतंकवाद के खिलाफ। वो आतंकवादी छोड़ दिए गए जिन्होंने सैंकड़ों को मौत के घाट उतारा था और उन्हें पकड़ने में ना जाने कितने ही हमारे फौजी शहीद हुए थे। उस समय वीपी सिंह की सरकार को बीजेपी का समर्थन मिला हुआ था। इसी तरह का गुल कुछ सालों बाद बीजेपी सरकार ने भी खिलाया था। उसके बारे में भी बात करेंगे। बीजेपी ने वीपी सरकार से समर्थन वापस लिया था। लेकिन इस मुद्दे पर नहीं। उसने समर्थन वापस लिया था रथ यात्रा पर निकले बीजेपी के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी की बिहार में गिरफ्तारी पर। शायद बीजेपी के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था हिंदुत्व के वोट बैंक की राजनीति ना कि आतंकवाद।
कई दिनों से ये बहस चल रही है कि हम क्या हैं एक Soft Nation या फिर Weak Nation। लेकिन इन दो उदाहरण से ये साफ जाहिर होगया होगा कि हम क्या हैं। Soft Nation रूस भी है पर वो Weak Nation नहीं है। पर हम Soft Nation के साथ साथ Weak Nation भी हैं। जब ही आतंकवाद सर चढ़कर बोल रहा है।
अगली बार भी नजर डालेंगे सरकार के रुख पर जो हमें बताता है कि हां, हम Soft नहीं Weak Nation हैं। और साथ ही उने देशों पर भी जो कि Soft तो हैं पर Week नहीं।
आपका अपना
नीतीश राज
आतंकवाद का आतंक हमारे देश में सर चढ़कर क्यों बोल रहा है? हर बार बैठकों का दौर शुरू होता है और नतीजा वो ही ढाक के तीन पात। फैसले ऐसे कि जिस पर अमल करते हुए आज भी आतंकवाद हमारे सर पर चढ़कर नाच रहा है। देश की जनता हमेशा ही डर के साए में जीने को मजबूर है। आतंकवाद का ये दानव हमारे देश में इतना क्यों और कैसे फल फूल रहा है इसका जवाब शायद है भी हमारे पास ही। हमारे पुराने उदाहरण इस बात के सबूत रहे हैं जो आतंकवाद को बढ़ावा देते से लगते हैं।
आपको याद होगा 1989। वो काला साल जब कि आतंकवाद के खिलाफ हमने पहली बार घुटने टेके थे। पूरे देश और विश्व की नज़र हम पर टिकी थी कि हम कैसे उस वारदात से निपटते हैं। ऐसा नहीं था कि इस से पहले देश में आतंकवाद का नामोनिशान नहीं था। पर ये वो वाक्या था जब हमारी सरकार ने लड़ने का हौसला छोड़ कर के आतंकवादियों के नापाक इरादों के सामने घुटने टेक दिए थे।
8 दिसंबर 1989, दोपहर के लगभग चार बजे, मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद को उनके घर से महज 500 मीटर की दूरी पर जब कि वो अस्पताल(जहां वो इंटर्नसिप करती थीं) से वापस आते हुए किडनेप कर लिया गया। चार आतंकवादियों ने इस वारदात को अंजाम दिया था। पूरे देश में हड़कंप मच गया। वीपी सिंह की सरकार थी उस समय और सरकार में देश के गृहमंत्री की एक बेटी रुबैया सईद का अपहरण देश की सुर्खियां बटोरने लगा। अपहरण के लगभग दो घंटे के भीतर ही आतंकवादी संगठन कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट अपनी शर्ते रख देता है। जेकेएलएफ के एरिया कमांडर शेख अब्दुल हमीद समेत पांच खुंखार आतंकवादियों को छोड़ने की मांग करता है जिनके नाम थे गुलाम नबी बट, नूर मोहम्मद कलबाल, मुहम्मद अल्ताफ और जावेद अहमद जांगर। देखते ही देखते श्रीनगर में सरकार पहुंचने लगी। कश्मीर का अवाम बहुत गुस्से में था कि कैसे कोई अविवाहित लड़की को अगवा कर सकता है साथ ही लोगों का मानना था कि ये इस्लाम और कश्मीरियत पर हमला है। फारुक अब्दुल्ला उस समय लंदन में छुट्टियां मना रहे थे। तुरंत देश लौटे और फिर कई लोग आतंकवादियों से वार्ता करने के लिए सामने आए। चाहे वो वेद मारवाह हों या एबी गनी लोन की बेटी शबनम लोन या फिर इलाहाबाद हाई कोट के जज मोती लाल भट्ट।
5 दिन बाद 13 दिसंबर की सुबह लगभग 3.30 बजे दो केंद्रीय मंत्री इंद्र कुमार गुजराल और मोहम्मद खान श्रीनगर पहुंचे। फारुख अबदुल्ला नहीं चाहते थे कि आतंकवादियों की मांग को माना जाए। पर सरकार झुक गई और शाम 5 बजे सरकार ने सभी पांचों आतंकवादियों को छोड़ दिया और ठीक दो घंटे बाद शाम 7 बजे रुबैया सईद को छोड़ दिया गया। इस पूरी वारदात के पीछे जिस शख्स का नाम सामने आया था वो था यासीन मलिक। जो कि आज भी भारत में रहकर के पाकिस्तान का पैरोकार बना हुआ है।
यदि उस दिन सरकार ने ये सौदा नहीं किया होता तो शायद आतंकवाद का ये रूप हम आज नहीं देख रहे होते। वो पहली नाकामयाबी थी हमारी सरकार की आतंकवाद के खिलाफ। वो आतंकवादी छोड़ दिए गए जिन्होंने सैंकड़ों को मौत के घाट उतारा था और उन्हें पकड़ने में ना जाने कितने ही हमारे फौजी शहीद हुए थे। उस समय वीपी सिंह की सरकार को बीजेपी का समर्थन मिला हुआ था। इसी तरह का गुल कुछ सालों बाद बीजेपी सरकार ने भी खिलाया था। उसके बारे में भी बात करेंगे। बीजेपी ने वीपी सरकार से समर्थन वापस लिया था। लेकिन इस मुद्दे पर नहीं। उसने समर्थन वापस लिया था रथ यात्रा पर निकले बीजेपी के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी की बिहार में गिरफ्तारी पर। शायद बीजेपी के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था हिंदुत्व के वोट बैंक की राजनीति ना कि आतंकवाद।
कई दिनों से ये बहस चल रही है कि हम क्या हैं एक Soft Nation या फिर Weak Nation। लेकिन इन दो उदाहरण से ये साफ जाहिर होगया होगा कि हम क्या हैं। Soft Nation रूस भी है पर वो Weak Nation नहीं है। पर हम Soft Nation के साथ साथ Weak Nation भी हैं। जब ही आतंकवाद सर चढ़कर बोल रहा है।
अगली बार भी नजर डालेंगे सरकार के रुख पर जो हमें बताता है कि हां, हम Soft नहीं Weak Nation हैं। और साथ ही उने देशों पर भी जो कि Soft तो हैं पर Week नहीं।
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“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”