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Wednesday, March 4, 2009

पाकिस्तान के लोग ऐसा क्यों सोचते हैं कि हमने ‘26/11-मुंबई हमलों’ का बदला लिया है।

मंगलवार की सुबह जब देर से उठा तो इल्म हुआ कि हां, रात देर से सोया था। अभी चाय के प्याले को मुंह तक लगा भी नहीं पाया था कि अल्साते मन को याद आया कि मैच भी है आज। टीवी खोलकर आंखें मलता हुआ स्कोर पढ़ा तो देखा कि अभी कुल 7-8 ओवर हुए थे सचिन-वीरू दोनों क्रीज पर थे। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन आज शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं पर फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
हमने तुरंत मैच से यूं ही न्यूज की तरफ ऱुख किया। आंख फटी की फटी रह गई। अरे, ये क्या? कहां हुआ हमला, किसने किया, किनपर किया? ये तो पाकिस्तान है, तो क्या पाक टीम पर हमला हुआ है नहीं ये तो श्रीलंका की टीम आतंक की शिकार बनी है। बेहद दुख हुआ और नहीं जानता कि आलस कहां गायब हो गया तकरीबन 3-4 घंटे तक लगातार यूं ही चैनल खंगालता रहा। कई बार तो गुस्से ने दिमाग के सभी तारों को झनझना दिया।

अरे, क्या पागल होगए हैं पाकिस्तान के अधिकारी। जितने भी बयान किसी आला अफसर की तरफ से आ रहे थे उनमें से कुछ और साथ ही कई पत्रकारों के सवाल के निशाने पर कहीं ना कहीं भारत था। कई पाकिस्तानी न्यूज चैनलों पर ये साफ चला कि ये आतंकवादी बाघा बार्डर के रास्ते आए थे। मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था कि पहले तो सुरक्षा में इतनी भारी चूक और उसपर तुर्रा देखिए कि अभी हालात को सामान्य करने की बजाय लगे हैं निशाना साधने पर।
इस पूरे हमले पर कई और कहां-कहां सवाल खड़े होते हैं पाकिस्तान के लिए----
1) कैसे हुई श्रीलंका की टीम की सुरक्षा में चूक? जब कि श्रीलंका की टीम को मिलती है ग्रेड ए यानी कि किसी दूसरे देश से आए हुए किसी भी राष्ट्राध्यक्ष जैसी सुरक्षा। श्रीलंका टीम के काफिले की सुरक्षा के लिए करीब 70 पुलिसवाले दिए गए थे। तो सवाल ये उठता है कि कहां गए 70 पुलिसकर्मी? यदि 70 पुलिसकर्मी वहां पर मौजूद थे तो 12 आतंकी उनको चकमा देने में कैसे कामयाब होगए, कैसे फरार हो गए सभी के सभी और वो भी 5-6 पुलिसवालों को मारकर?
2) गद्दाफी स्टेडियम तक जाने के कई रास्ते हैं। ऐसा बताया गया है कि टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक हर रोज दूसरे रास्ते से ले जाया जाता हैं। तो ये चूक कहां से हुई कि आतंकवादी जान गए वो रास्ता जिस रास्ते से आज टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक पहुंचना था?
3) दूसरे टेस्ट के दूसरे दिन जिस रास्ते का इस्तेमाल किया गया था टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक लाने के लिए, तीसरे दिन भी उसी रास्ते का इस्तेमाल क्यों किया गया? रूट में हमेशा की तरह बदलाव क्यों नहीं किया गया?
4) पहले से ही सरकार को आगाह किया जा रहा था कि नवाज शरीफ और उनके भाई को पंजाब प्रांत से चुनाव ना लड़ने देने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पंजाब सूबे में नवाज शरीफ का जो रुतबा है वो पूरे पाकिस्तान के किसी भी प्रांत में जरदारी या फिर गिलानी का नहीं होगा। पंजाब सूबे के लोग नवाज के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
5) 12 आतंकवादी ये प्लान बनाते हैं कि मेहमान टीम पर हमला करना है। इस बात का मतलब ये है कि आतंकी काफी दिनों से इस योजना को अंजाम देने की कोशिश में जुटे हुए थे। तो क्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी सो रही थी?
6) स्वात पर तालिबान का कब्जा हो गया है और वहां पर पाकिस्तान का नहीं तालिबान का फरमान चलता है और ये धमकी पहले से ही दी जा रही थी कि सिर्फ स्वात के बाद निशाना पूरे पाकिस्तान पर है, और खासतौर पर इस प्रांत।
7) पाकिस्तान के अधिकारी कह रहे हैं कि ये हमला पूरी तरह से देखने पर लगता है कि जैसे मुंबई हमलों को अंजाम दिया गया था बिल्कुल उसी तरह इस का प्लान लाहौर में भी किया गया। याने कि वो हमला भी पाकिस्तान में प्लान किया गया था और ये हमला भी अंदर के लोगों ने ही प्लान किया है।
8) अभी तक जो माना गया है कि ये अटैक सुनियोजित था और 12 के 12 आतंकवादी अपने में पूरे ट्रेनेंड थे। शायद वो पूरी श्रीलंका की टीम को बंदी बनाना चाहते थे। पर देखने से जो लगा कि उनके पास अस्ला, बारूद, सामान काफी था पर फिर भी उसके बाद सवाल ये उठता है कि यदि वो सब ट्रेनेंड थे तो फिर सवाल ये कि मास्क पहन कर हमला करना और फिर मास्क फैंक देना, क्यों? जिस बैग को आप हमेशा अपने साथ, पीठ पर लादे रख रहे थे फिर उनको छोड़कर भागने का औचित्य क्या? गन, ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर इन सब को यूंही छोड़ कर क्यों भाग गए आतंकवादी? या फिर ये भी पहले से ही प्लान्ड था कि इनको छोड़ना था। बस पर इतने पास से रॉकेट दागा जाता है पर उसका निशाना चूक जाता है? बस के सामने से आकर बस पर ग्रेनेड फेंकने की कोशिश की जाती है और वो आतंकी के हाथ से छूटकर दूर गिर जाता है? क्या ऐसी ही ट्रेनेंड आतंकी थे जिन्होंने मुंबई पर हमला किया था?
9) सबसे बड़ा सवाल कि पाकिस्तान के इतने भरे-पूरे इलाके में 12 लोग हमला करते हैं और फिर मौका-ए-वारदात से गायब हो जाते हैं। एनकाउंटर तो दूर की बात लगभग 15 मिनट तक वो गोलीबारी करते हैं और फिर फरार हो जाते हैं और वहां कि पुलिस किसी को दबोचना तो दूर की बात उनका पता तक नहीं लगा पाती कि वो गए कहां। कोई भी वहां का निवासी ये बताने को राज़ी नहीं है कि आखिरकार वो किस तरफ गए हैं या उनको कहां देखा गया है। वैसे लाहौर के मॉडल टाउन इलाके से संदिग्ध 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और इस मामले पर अब तक 60 लोगों को हिरासत में लिया गया।
10) दूसरी तरफ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस पूरे हमले के पीछे वहीं पाकिस्तान की अंदरूनी रंजिश हो। किसी भी आतंकी का ना तो पकड़ा जाना और ना ही घायल होना, दाल को कहीं ना कहीं काला जरूर बनाता है।
तो ये सब सवाल खड़े हैं अपना मुंह खोले कि क्या कोई दे पाएगा इनका जवाब। लाहौर से बाघा बॉर्डर महज 20 किलोमीटर की दूरी पर है। तो कई की आशंका है कि वो सारे आतंकवादी वहां से भागकर सबसे सुरक्षित स्थान भारत में दाखिल हो सकते हैं। तो फिर यदि देखा जाए तो कोई भी सुरक्षित नहीं है। ना इस पार के ना उस पार के। पाकिस्तानियों को ये समझना चाहिए कि ये हमला उनके देश में बैठे कुछ नापाक दहश्तगर्दों ने करवाया है। हम मुंबई हमलों के लिए किसी को माफ नहीं कर सकते, लेकिन अपनी पर आजाएं तो उसकी कीमत चुकाने की औकात इस जमाने में नहीं।

हम तो शुक्रगुजार हैं भगवान के उस बंदे का जो श्रीलंका टीम की बस का ड्राइवर था जिसने हिम्मत दिखाते हुए टीम को सकुशल गद्दाफी तक पहुंचा दिया। जिसके सामने वाले शीशे पर गोलियां टकरा रहीं थी और उसने एक्सीलेटर और अपने पैर पर विश्वास करके पाकिस्तान, क्रिकेट और आईसीसी के साथ-साथ दुनिया को शर्मिंदगी उठाने से बचा लिया और अकेले आतंक को मात देने में कामयाब रहा।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)

न्यूजीलैंड में भारत जीता, पाकिस्तान में क्रिकेट हारा।

ट्वेंटी-20 सीरीज हारने के बाद धोनी और धोनी की टीम के लिए पहला वन डे बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने था। धोनी के लिए फिर टॉस अच्छा रहा, और टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला। ओपनर के रूप में जैसा कि सोचा जा रहा था वो ही हुआ सहवाग के साथ गंभीर नहीं सचिन ही थे। सचिन से लोगों को काफी उम्मीदें, सचिन ने जमने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ सहवाग अपने रंग में आ चुके थे। जहां सहवाग अर्ध शतक के नजदीक थे वहीं सचिन अभी डबल फिगर को छू ही पाए थे।

सचिन ने भी अपने हाथ दिखाए और दो शानदार चौके लगाए। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं, फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सचिन से सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल की रफ्तार और हवा से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
जिसकी उम्मीद थी बिल्कुल उससे हटके हुआ। जहां लोग सोच रहे थे कि लेफ्ट-राइट का कॉम्बिनेशन देने के लिए कोई लेफ्टी आएगा याने कि सबसे सफल जोड़ी फिर होगी क्रीज पर, पर ऐसा हुआ नहीं। लोगों और मीडिया की खरी-खरी सुनने के बाद अपना पसंदीदा नंबर 7 छोड़ कप्तान धोनी 3 नंबर पर बैटिंग करने पहुंचे। अपने इस निर्णय को साबित करने के लिए धोनी ने धीमे और सधी शुरुआत करी। वहां वीरू का बल्ला बोल रहा था। अब तक वीरू 56 गेंदों पर 11 चौके और 1 छक्के की मदद से 77 रन बना चुके थे। विटोरी की गेंद पर एक लाजवाब शॉट सहवाग ने खेली और सर्कल के अंदर खड़े टेलर ने उससे भी शानदार कैच लपक वीरू की शानदार पारी पर ब्रेक लगा दी। चौथे नंबर पर टीम के युवराज आए और
कप्तान के साथ दूसरे रन के फेर में पड़कर पवैलियन की राह पर निकल लिए। अब टी-20 के स्टार सुरेश रैना की बारी थी। 20-20 के क्रम को आगे बढ़ाते हुए रैना ने मैदान के हर कोने में बॉल पहुंचाई और शानदार 4 छक्के और 5 चौंकों की मदद से महज 39 गेंदों पर 66 रन बनाकर छक्के मारने के प्रयास में एलिट की गेंद पर ब्रायन को कैच थमा बैठे। वहीं दूसरे छोर पर कप्तान ने पारी संभाल रखी थी। अब धोनी का साथ देने क्रीज पर आए यूसुफ पठान आए और 10 गेंदों पर 1 छक्के और 2 चौकों की मदद से 20 रन बनाए। धोनी की इस समझदारी भरी पारी में सिर्फ ६ चौकों की मदद से 89 गेंदों पर 84 रन बनाए। न्यूजीलैंड के सामने 7.20 की औसत के साथ लक्ष्य 38 ओवरों में 274 रहा।
वैसे, इस बीच न्यूजीलैंड में झमाझम बारिश होने लगी और पाकिस्तान में श्रीलंका टीम की बस पर दनादन फायरिंग। पाकिस्तान में दूसरे टेस्ट के साथ-साथ दौरा भी खटाई में पड़ गया। खेल और क्रिकेट के इतिहास का काला दिन। वहीं दूसरी तरफ न्यूजीलैंड में बारिश के कारण पहला वन डे के ओवर कम कर दिए गए, मैच 38-38 ओवरों का हो गया।
इरफान की जगह टीम में आए प्रवीण कुमार ने बिना खाता खोले न्यूजीलैंड को दूसरे ओवर में ही पहला झटका मैक्कुलम के रूप में दिया। न्यूजीलैंड की तरफ से टी-20 का सितारा अस्त हो गया था। दूसरा विकेट भी प्रवीण कुमार की झोली में गया। गुप्टिल और टेलर जब खेल रहे थे तो लग रहा था कि औसर रन रेट तो बढ़ता जा रहा है पर फिर भी यदि ये दोनों टिके रहे तो मैच को कभी भी पलटने की काब्लियत रखते हैं। १६वें ओवर में यूसुफ पठान ने घातक होते टेलर को सचिन के हाथों कैच करवाकर न्यूजीलैंड की मुसीबत और बढ़ा दी। एलिट को सहवाग के सपाट थ्रू ने रन आउट कर दिया और बारिश शुरू हो गई।
डकवर्थ लुईस नियम को लागू किया गया और फिर जो टार्गेट न्यूजीलैंड के सामने था वो लगभग नामुमकिन सा ही था। 43 गेंद पर 111 रन। जब चौथा विकेट गिरा था तो न्यूजीलैंड को 102 गेंद पर 163 रन चाहिए थे और उनके हाथ में 6 खिलाड़ी थे।
जब मैच शुरू हुआ तो स्कोर को आगे बढ़ाने के कारण ओरम युवराज का शिकार बने। अब लगने लगा कि यदि गुप्टिल का विकेट भारत कैसे भी झटक ले तो फिर पूरी तरह मैच भारत के पक्ष में हो जाएगा। और हुआ भी कुछ यूं ही, पर अब बारी थी भज्जी की। चार गेंद पर भज्जी ने 3 विकेट झटक लिए। सबसे पहले गुप्टिल, फिर ब्रूम और फिर मिल्स को आउट कर न्यूजीलैंड की हार में चारों तरफ कील ठोंक दी। कहां एक समय 132 पर 5 विकेट थे वहीं 9 विकेट भी होगए। अब बस खानापूर्ति ही शेष रह गई थी। और भारत ने पहला वन डे 53 रन से डकवर्थ लुईस नियम से जीत लिया। मैन ऑफ द मैच चुने गए टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी।

जब टीम इंडिया बैटिंग कर रही थी तब ये खबर फैल चुकी थी कि श्रीलंका की टीम पर हमला हो गया है। और दोनों टीमों ने हाथ पर काली पट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज कराया। धोनी ने कहा कि अच्छा हुआ कि भारतीय टीम ने पाकिस्तान का दौरा नहीं किया और शायद ही अब कोई भी खिलाड़ी पाकिस्तान में जाकर खेलना पसंद करेगा।
पर सच तो ये है कि पाक में पनपे आतंक के सच से खुद पाकिस्तानियों को लड़ना होगा और क्रिकेट को जिंदा रखने के लिए तालिबानी ताकतों के सामने घुटने नहीं टेकने होंगे। फिल्म के बाद अब इन दहशतगर्दों के निशाने पर है क्रिकेट पर आतंक से तो लड़ना होगा ही।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)

पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला, पाक में आतंक के आगे हारा क्रिकेट।

पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला हुआ। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब कि विदेशी दौरे पर गई किसी टीम पर आतंकवादी हमला किया गया हो। श्रीलंका की टीम की जगह वो भारत की भी टीम हो सकती थी। जनवरी-फरवरी में भारत को पाकिस्तान का दौरा भी करना था। ऑस्ट्रेलिया और भारत के मना करने के बाद श्रीलंका ने दो फेज में पाकिस्तान का दौरा करना कबूला। जनवरी में वन डे और फरवरी-मार्च में दो टेस्ट।

दूसरे टेस्ट का तीसरा दिन, श्रीलंकाई टीम की बस होटल से गद्दाफी स्टेडियम जहां पर दूसरा टेस्ट खेला जा रहा था वहां के लिए रवाना हुई। साथ में आगे पीछे सुरक्षा दस्ता। सब ठीक चल रहा था, श्रीलंका की टीम इस पर हल्की चर्चा करने में मश्गूल थी कि कैसे गेंदबाजी करनी है। पाकिस्तान के समय अनुसार सुबह 8.40 पर टीम की बस गद्दाफी स्टेडियम के पास लिबर्टी चौक के पास पहुंची। जैसे ही राउंडअबॉयुट याने गोलचक्कर पर घूमी, चारों तरफ से बस और बस को सुरक्षा दे रहे पुलिस के दस्ते पर हमला कर दिया गया। 12 आतंकवादी बस पर अंधाधुंध गोलियां चला रहे थे जिसमें श्रीलंका की क्रिकेट टीम बैठी थी।
सामने से आ रही गोलियों से बच पाना बस के आगे चल रहे पुलिस दस्ते के लिए मुमकिन नहीं था। 7 पुलिसवाले मौके पर ही ढेर हो गए। बस पर ताबड़तोड़ गोलियां लग रहीं थी, और इधर खिलाड़ियों की चीख निकलने लगी।
6 खिलाड़ियों को गोलियां लगी।
फायरिंग की आवाज़ सुनते के साथ ही खिलाड़ियों ने झुकना शुरू कर दिया। चमिंडा वास ने बताया कि, फायरिंग के समय यदि वो झुके नहीं होते तो गोली लग सकती थी, गोली ठीक उनके ऊपर से गई थी। श्रीलंकाई बस के ड्राइवर मेहर मोहम्मद ने बताया कि गोली की आवाज़ के बाद पहले तो लगा कि कोईं पटाखे चला रहा है पर तुरंत पीछे बैठे किसी खिलाड़ी ने पीछे से आवाज़ लगाई कि ‘चलो, जल्दी चलो(go)’। ड्राइवर ने समझदारी का काम किया एक्सीलेटर पर रखा पैर और बस को गद्दाफी स्टेडियम के अंदर पर पहुंचाकर ही दम लिया। जो खिलाड़ी घायल हुए----

--कप्तान महेला जयवर्द्धने के पांव में टखना(ankle) में हल्का सा कट लगा, याने कोई खतरा नहीं।
--उप कप्तान कुमार संगकार के कंधे में गोली लगी, खतरे से बाहर।
--अजंथा मेंडिस-पीठ पर किसी चीज के गहरा घाव।
--थरंगा परनाविथाना-सीने में लगी गोलीघाव।
--थीलाना समरवीरा-जांघ में लगी गोली, खतरे से बाहर पर पूरी तरह नहीं। समरवीरा टीम के टॉप के बल्लेबाज जिसने पिछले टेस्ट और दूसरे टेस्ट की पहली पारी में दोहरा शतक जड़ा था।
--पॉल फरबरेस-श्रीलंकाई टीम के सहायक कोच के हाथ में गहरा घाव।

श्रीलंकाई टीम की बस के पीछे एलिट अंपायर की वैन भी आ रही थी। 5 अंपायरों के इस काफिले पर भी आतंकवादियों ने निशाना साधा और इसमें रिजर्व अंपायर एहसान रज़ा गंभीर रूप से घायल हो गए। अभी भी एहसान रज़ा अस्पताल में भर्ती हैं पर अभी-अभी पता चला है कि वो ख़तरे से बाहर हैं। लेकिन इस वैन को जो ड्राइवर थे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
पुलिस की तफ्तीश के बाद पता चला कि 12 आतंकवादियों का ये काम था और उन्होंने हमले में ऑटोमैटिक गन, हैंड ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर और स्टार डायमंड पिस्टल का इस्तेमाल किया। कुछ का कहना ये है कि ये अटैक पूरा 26/11 मुंबई हमलों की तर्ज पर किया गया है।
वैसे ही पाकिस्तान में कोई भी खिलाड़ी जाकर नहीं खेलना चाहता। 2008 में ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पाक का दौरा रद्द किया था। उसके बाद चैंपियंस ट्रॉफी रद्द की गई। फिर भारत ने मुंबई हमलों के बाद दौरा रद्द कर दिया, जिसे की आज पूरा विश्व सही ठहरा रहा है। जब ये फैसला लिया गया था तो मुझे याद है कि दुनिया और कुछ पाक के खिलाड़ी जैसे आफरीदी ने काफी कुछ उल्टा सीधा कहा था। श्रीलंका की टीम ने हौसला दिखाया और उसके इस निर्णय पर कई सवाल भी उठे थे।

इस हमले के तुरंत बाद श्रीलंकाई टीम का पाकिस्तान दौरा रद्द कर दिया गया। कोई भी खिलाड़ी इलाज कराने के लिए भी पाक में नहीं रुकना चाहता था। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ये हुआ होगा कि किसी टीम को मैदान से ही हेलिकॉप्टर से दूसरे देश ले जाया गया और फिर वहां से वो रात तक वापिस अपने देश में पहुंच जाएंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, December 18, 2008

करकरे की शहादत पर सवाल नहीं पर मौत की जांच तो होनी ही चाहिए, क्या गलत कहा है अंतुले ने।

कई बार लगता है कि आग शांत होने की राह तकती रहती है लेकिन कुछ उस आग में घी डालकर उसे जलाए रखना चाहते हैं। चाहे किसी वजह से भी। कुछ घाव ऐसे होते हैं जो कि समय के साथ भर जाते हैं लेकिन अपने निशान छोड़ जाते हैं, पर कुछ घाव ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार-बार छेड़ा जाता है, कचोटा जाता है, लेकिन बार-बार क्यों छेड़ा जाता है उन घावों को? क्योंकि वो घाव नासूर की शक्ल इखित्यार कर ले।
कुछ लोगों को शायद शहीदों की शहादत पर सवालिया निशान लगाने की आदत से हो गई है। पहले इंस्पेक्टर शर्मा की शहादत पर उठाए गए थे सवाल, तब भी बहुत बखेड़ा हुआ था। कुछ लोगों ने तो उस दिल्ली के बाटला एनकाउंटर तक को फर्जी करार दे दिया था। कुछ ने तो यहां तक कह दिया था कि खुद पुलिस की गोली का शिकार हुए थे इंस्पेक्टर शर्मा। फिर अब आवाज़ उठने लगी है कि शहीद करकरे क्या वाकई में शहीद हुए हैं? क्या इस बार मुंबई पर हुए हमले को भी कुछ लोग फर्जी करार देंगे, जहां पर 200 लोग मारे गए।
शायद कुछ लोग शहीद हेमंत करकरे के नाम के साथ जुड़े इस शहीद तमगे को पचा नहीं पा रहे हैं। तभी तो कोई ना कोई इस शहीद की शहादत पर सवालिया निशान जरूर लगा देता है।
अब की बार बारी है केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले की। बिना तोल के बोलकर फंस गए अंतुले। अंतुले ने हेमंत करकरे पर कहा कि ‘उन्हें आतंकवादियों ने मारा या फिर किसी और ने’। जब मामला उठा तो अंतुले ने लोकसभा में जरा तोल कर जवाब दिया 'मैंने कहा था कि बजाए इसके कि करकरे, काम्टे, सालस्कर समेत एटीएस दल ताज होटल या ओबेराय भेजा जाता, उन्हें कामा अस्पताल भेजा गया। इन जवां मर्दों को एक ही गाड़ी में सवार होकर कामा अस्पताल जाने का निर्देश किसने दिया इस मामले की जांच कराने के बारे में मैंने कहा था।'
मैं नहीं जानता कि कितने लोग गलत समय पर दिए अंतुले के इस बयान से इत्तेफाक रखते होंगे।
अंतुले के इस बयान से पर मैं तो पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूं।

जांच जरूर होनी चाहिए। ये कोई माखौल नहीं था कि तीन आला अफसर हम लोगों ने यूं ही गवां दिए। मैं पूछता हूं आज हम बार-बार कह रहे हैं कि हेमंत करकरे, सालस्कर और काम्टे शहीद हुए, पर क्या उन तीनों में से किसी को भी इतना मौका मिला था कि वो अपनी आत्मरक्षा में गोली चला पाएं। क्या सच मायने में वो शहीद हुए हैं। शहीद का दर्जा तो हम उनको देते हैं जो कि दुश्मन से लड़ते हुए, टक्कर लेते हुए दुश्मन की गोली से मारा जाए ना कि सरकार, प्रशासन और डिपार्टमेंट की बेवकूफी से।
जम्मू-कश्मीर में हर दो-चार दिन में एक जवान शहीद हो जाता है। शायद ही किसी को ये पता चलता हो कि कोई शहीद हो गया। ना कोई इनाम ना कोई पोस्टर ना कोई तमगा। फिर भी हर रोज उसी मुस्तैदी के साथ सभी जवान डटे रहते हैं।

२६ नवंबर की वो काली रात को जब आतंकवादियों ने सीएसटी पर क़हर बरपाया था और कुछ पुलिसकर्मी उनसे लोहा ले रहे थे और उन बेचारों की खुटल, जंग खाई बंदूक ठस हो गई थी तो उन सिपाहियों को वहां से भागना पड़ा था। कुछ लोगों ने इन सिपाहियों को भगोड़ा कहा था लेकिन मैं इन को हीरो कहता हूं। जब आतंकवादी इन पर गोलियां बरसा रहे थे तो आसपास की दीवारों से धुआं उठ रहा था तब भी काफी देर तक ये डटे रहे। सलाम करता हूं उस सिपाहियों को। तब कहीं ये खबर हेमंत करकरे, सालस्कर और अशाक काम्टे के पास पहुंची थी। पहले भी मुंबई की लाइफ लाइन माने जाने वाली लोकल ट्रेन पर हमले हो चुके हैं तो सभी के सभी इस बात को ध्यान में रखते हुए सीएसटी की तरफ भागे।
अंतिम बार वीडियो में हम सबने हेमंत करकरे को सीएसटी पर ही देखा था। तब ध्यान होगा सबको कि उस समय उन्होंने आसमानी शर्ट पर हेल्मेट लगा रखा था। साथ ही एक सिपाही ने उनके हाथ में बंदूक दी थी। तब सबसे पहले मेरे दिमाग में ख्याल आया था कि कहीं शर्मा की तरह ये भी बुलेटप्रूफ जैकेट ना पहन के जाएं। पर थोड़ी देर बाद कुछ सिपाहियों के साथ करकरे को फ्रंट पर जाते देखा था। सीएसटी के अंदर कुछ सिपाहियों के साथ जाते देखा था। याने कि एक बात तो सही है कि वो मुकाबला करने के लिए ही उस जगह पर गए थे। पर जाते समय उनके शरीर पर जो था वो था दंगा निरोधक दस्ता का बुलेट प्रूफ या कहें कि लाठी प्रूफ जैकेट जिसे की बाद में खुद पुलिस के आला अफसरों ने माना है।
तभी पता चलता है कि आतंकवादी सीएसटी छोड़ चुके हैं और कामा अस्पताल की तरफ गए हैं और सदानंद दाते कामा पर घायल हो गए हैं और मैट्रो के पास से भी गोलियों की आवाज़ें सुनी गई हैं। हेमंत करकरे अपने ड्राइवर के साथ कामा की तरफ कूच करने के लिए निकलने लगे। पर तभी सालस्कर और काम्टे भी वहां पहुंच गए। फिर तीनों के तीनों एक साथ कामा की तरफ चल दिए। पर इस बार गाड़ी की कमान खुद सालस्कर ने संभाल रखी थी। आगे की सीट पर सालस्कर के साथ काम्टे बैठे थे और क्वालिस की बीच की सीट पर हेमंत करकरे बैठे हुए थे और पीछे की सीट पर ड्राइवर के साथ चार सिपाही जिसमें जाधव भी थे। पर निकलते वक्त सभी ने बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं पहने हुए थी शायद सब ने सीएसटी पर ही छोड़ दी, क्यों। बीच-बीच में पुलिस की ये क्वालिस रुकते हुए सिपाहियों और लोगों से पूछते हुए आगे बढ़ रही थी कामा अस्पताल के पास सदानंद को की मदद के लिए ये तीनों वहां आए थे। गाड़ी रुकती है तभी पेड़ के पीछे से दो आतंकवादी कसाब और इस्माइल निकले और क्वालिस पर अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे। कुछ पल में ही मुंबई ने अपने तीनों अफसर खो दिए। साथ ही तीन सिपाही भी एक सिपाही जाधव घायल अवस्था में क्वालिस में ही पड़े मिले। जब तक कि पुलिस ने वहां आकर सभी को अस्पताल नहीं पहुंचाया, अस्पताल में जाधव का इलाज चलने लगा लेकिन उनके साहब शहीद हो चुके थे। पर सवाल यहीं खड़े होते हैं कि इन आतंकियों का मकसद क्या था। क्या वो बिना किसी मकसद के भारत में आतंक फैलाने के लिए आए थे। क्या वो विदेशियों पर हमला करने आए थे। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में हमारी नाक नीचे करने के लिए आए थे। क्या करने आए थे वो यहां पर। क्या और कोई भी कारण हमें समझ में नहीं आता। ताज होटल, ओबेराय होटल समझ में आता है कि वहां पर विदेशी थे और साथ ही वो मुंबई की पहचान है, सीएसटी, नरीमन भी समझ में आते हैं। पर क्या कारण था कि कामा, मैट्रो और पुलिस मुख्यालय की पास की जगह को क्यों निशाना बनाया गया। जहां पर विदेशी ढूंढे से भी नहीं मिलेंगे। कोई बताए फिर उस पर ही निशाना क्यों?
२५ नवंबर को पुणे के एक पुलिस थाने में एक फोन कॉल आता है जो कि मराठी में बोलता है कि हेमंत करकरे को दो-तीन दिन में बम ब्लास्ट में जान से मार देंगे। अगले दिन वो मार भी दिए जाते हैं। क्या इस की जांच नहीं होनी चाहिए कहीं कोई हमारे देश में ही गद्दार तो नहीं। लेकिन एक बात तो सारी दुनिया मानेगी कि वो आतंकवादियों से मुकाबला करने के लिए ही गए थे पर ये उनकी किस्मत ही थी कि मुंबई के तीन आला पुलिस अधिकारी बिना किसी को आघात पहुंचाए उन आतंकवादियों के घात लग गए। पर उन तीनों से शहीद का तमगा आने वाले कल में भी कोई नहीं छीन पाएगा वो फ्रंट पर ही शहीद हुए हैं।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”