Friday, September 11, 2009

क्यों है हमारा कानून इतना लचीला? क्यों अपील करने पर दोषी को बाइज्जत बरी कर दिया जाता है?

आश्चर्य होता है मुझे कि हमारा कानून इतना लचीला क्यों है। क्यों एक तरफ हमारा कानून एक आरोपी को दोषी ठहराकर फांसी और दूसरे ही पल उसी आरोपी को बाइज्जत बरी कर देता है। या तो पहले वाली अदालत ने गलत फैसला दिया या फिर दूसरी अदालत याने की ऊपरी अदालत ने गलत फैसला दिया। कानून के कुछ जानकार खुद इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि एक अदालत और दूसरी अदालत एक ही केस पर दो निर्णय कैसे सुना सकती है। वहीं दूसरी तरफ कुछ जानकार ये भी मानते हैं कि जिस तरह से केस विशेष अदालत में पेश किया गया शायद उसी तरह से हाईकोर्ट में केस पेश नहीं किया गया। साथ ही, विशेष अदालत में आरोपी के पक्ष में शायद तथ्य उतने नहीं हो जितने कि हाईकोर्ट में बाद में पेश किए गए हों।


आज नोएडा के बहुचर्चित निठारी मामले में गाजियाबाद की विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया। पंधेर के मामले में विशेष अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंधेर को रिम्पा हल्दर मर्डर केस में बाइज्जत बरी कर दिया। रिम्पा हल्दर मर्डर केस में सारे आरोपों से पंधेर को बरी कर दिया गया और इस मामले में उसे निर्दोष साबित कर दिया। वहीं सुरेंद्र कोली की फांसी की सज़ा को बरकरार रखा गया है। जुलाई 2009 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ मोहिंदर सिंह पंधेर और सुरेंद्र कोली ने याचिका दायर की थी।


जनवरी 2007 में निठारी का ये हैवानियत से भरा वाक्या हुआ था और आईपीसी की कई धाराएं दोनों आरोपियों पर लगी थी। सीबीआई को सौंपी गई थी इस केस की फाइल। दो साल तक गाजियाबाद की विशेष अदालत में चली थी सुनवाई। सुनावई के दौरान लोगों का आक्रोश इतना ज्यादा बढ़ गया था कि लोगों ने दोनों की जमकर धुनाई की थी। फरवरी 2009 को रिम्पा हल्दर केस में मोहिंदर सिंह पंधेर और सुरेंद्र कोली को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई। पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महीने तक लगातार सुनवाई करके विशेष अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुए पंधेर को बरी कर दिया पर कोली के आरोप बरकरार रखे।


क्या गाजियाबाद की विशेष अदालत ने भावनाओं में बहकर दोनों आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी। या क्या कारण है कि आज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंधेर को बाइज्जत बरी कर दिया। मैं कोर्ट के फैसले की अवेहलना नहीं कर रहा। पर मुझे दुख इस बात का है कि एक कोर्ट किसी एक शख्स को मुजरिम ठहरा देती है और फिर वो शख्स मुजरिम कहलाता है। पर जब वो दो उसी केस में अपील करता है तो बाइज्जत बरी कर दिया जाता है तो क्या कोई भी कानून उसके वो दो साल जो कि उसने जेल में काटे वो वापस दिला सकता है। दलील है कि पंधेर उस वक्त ऑस्ट्रेलिया में था और शायद वो बेकसूर था तो फिर उसे सज़ा ही क्यों हुई? यदि सजा हुई है तो क्या कारण है कि अब वो रिहा हो गया।

वैसे 17 मामलों में 1 में फैसला उनके पक्ष में आया है अभी तो 16 केस बाकी हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

9 comments:

  1. आपके कथन से सहमत हुं. आखिर ऐसा क्युं होता है?

    रामराम.

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  2. आपने दुखती रग पर हाथ रख दिया।सारा खेल वंही से होता है।अवमानना के नाम पर लटकती तलवार बहुत से सच का असमय ही गर्भपात करा देती है।ये तो तय है कि दो मे से एक गलत है तो फ़िर जो गलत है उसे भी तो सज़ा मिलनी चाहिये ना?

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  3. भाई, कुछ कहने के पहले निर्णय पढ़ना पड़ेगा। यदि बरी होने वाला वास्तव में दोषी था तो उस का बरी होना अभियोजन पक्ष की कमी को दर्शाता है। अभियोजन यानी पुलिस और उन के वकीलों की कमियों को हम सब जानते हैं। उस में सुधार के लिए बहुत बहुत श्रम की जरूरत है। हम कहने को जनतंत्र कहते हैं। लेकिन अभी निर्वाचित जजों और अभियोजकों के युग से बहुत पीछे हैं।

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  4. कानून की बातें तो कानूनविद ही जान सकते हैं,
    मैं एड.दिनेशराय द्विवेदी की राय से सहमत हूँ।

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  5. क्या कहा जाये..लगता तो ऐसा ही है..फिर दिनेश जी जो कह रहे हैं, वह भी सही है.

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  6. आपकी लेखन शैली का कायल हूँ. बधाई.

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  7. दिनेश जी जब मैं व्यथित होकर ये लिख रहा था तो सब से पहले मुझे आपका ही ख्याल आया था कि क्या कहेंगे आप। आप ने सही कहा कि पुलिस और उनके वकील की कमियों के कारण ही अब पंधेर की रिहाई पर सीबीआई के ऊपर उंगलियां उठने लगी हैं। नीचे दाईं तरफ साइडबार बॉक्स में 'खबरें जो रही सुर्खियां' उसमें भी इस को देख सकते हैं।

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    नीतिश राज जी,
    आप देखियेगा कि १७ के १७ मामलों में पंधेर छूट जायेगा क्योंकि निठारी कान्ड एक PSYCHOPATH कोली की करतूत है,Psychopath हत्यारे हमेशा अकेले ही हत्या करते हैं आज तक के आपराधिक इतिहास में ऐसा कभी नहीं पाया गया कि उनके साथी भी होते हों, पंधेर को केवल उसके धनी और अतिविश्वासी होने के कारण कष्ट झेलने पड़ रहे हैं।

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  9. afzal guru ko phansi na dene ki ek bhi vajah nahin, par ye sarkar besharmi se paal rahi hai use jisne iske sansad pe hamla karne men saath diya. doosra ye kasaab... aur kitne din ise khila pila ke mota kiya jayega? hamaara kanoon sachmuch mahaan hai jo ek ghinaune aatankwadi ko bhi vahi adhikar deta hai jo ek aam, shareef naagarik ko upalabdh hain. KPS gill ke hi boote ki baat thi ki punjab men shanti aa saki varna hamaari hijdi sarkaron se kya ummeed ki ja sakti hai! upadesh ke liye ramayan theek hai, par saphal hone ke liye mahaabhaarat jaanana zaroori hai.

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