Sunday, June 13, 2010

ये हुई ना बात


कल पूरा दिन बहुत उतार-चढाव के साथ बीता। पूरे दिन में सिर्फ एक बार, ऐसा वक्त आया जब एक सवाल ने कुछ राहत दी या यूं कहूं कि खुश किया। मेरे जाननेवाले और अधिकतर मेरे दोस्त जब भी कहीं फंसते हैं खासकर खेल के मामले में तो मुझ से पूछ ही लेते हैं।

शाम मेरे एक मित्र का फोन आया, हाल-चाल जानने के बाद सीधे उसने काम का सवाल दाग दिया। यार, एक बात बता, आज भारत का भी मैच है? मैंने भी चुटकी ली, क्या मियां, सटिया गए हो, जो कि फीफा में भारत की बात कर रहे हो?
अरे नहीं यार, टी-20 मैच है आज भारत का?

दिल को बहुत खुशी हुई। मेरा वो दोस्त और उसकी क्रिकेट मंडली दीवानी है क्रिकेट की। अब सोचो की क्रिकेट के दीवानों को ही नहीं पता कि टी-20 में भारत का मुकाबला है। जिन्हें खाना याद नहीं रहा करता था उन्हें अब क्रिकेट याद नहीं था। मैंने उनको स्कोर बताया और गुड न्यूज दी, भारत 6 विकेट से जिंबाब्वे से जीत गया। उन्होंने बताया कि वो उस समय पब में बैठकर अर्जेंटीना का मैच देखने की तैयारी कर रहे थे। तो उन पर चढ़ा था फुटबॉल फीवर।

अर्जेंटीना ने निराश किया।

सबसे ज्यादा इंतजार था अर्जेंटीना के पहल मैच का पर अर्जेंटीना ने मैच तो जीता मगर दिल नहीं। एक मात्र गोल हैंज ने किया जो कि डिफेंडर के रूप में खेलते हैं। मैसी ने कई मूव बनाए पर उससे ज्यादा उसने गंवाए। मैसी पूरी तरह अपने लिए ही खेलते नजर आए। एक शख्स जिसकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा हो तो उससे वैसी ही परफॉर्मेंस की उम्मीद दुनिया करती है। पर कल दो-तीन बार तो ऐसे मौके मैसी ने गंवाए गर कोई और खिलाड़ी होता तो वो शायद गोल कर देता। साथ ही तारीफ करनी होगी नाइजीरियन गोलकीपर की। जितनी बार मैसी गोलपोस्ट तक पहुंचे हर वार को उसने विफल कर दिया। अब आगे देखना होगा कि अर्जेंटीना आगे कैसा खेलती है।
वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के खिलाफ इंग्लैंड ने भी निराश किया। यूएसए ने इंग्लैंड को बराबरी पर रोक दिया। जहां नाइजीरिया के गोलकीपर ने कमाल किया वहीं यहां पर इंग्लैंड के गोलकीपर ने हाथ में आती गेंद को गोलपोस्ट में फेंक दिया। वैसे, इंग्लैंड और अर्जेंटीना को साफ समझ लेना चाहिए कि ये राह आसान नहीं है।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, June 11, 2010

अब जोश और रोमांच के साथ जागो पूरी रात


बचपन से ही आदत रही देर रात तक जग कर पढ़ने की। वहीं दूसरी तरफ घर में किसी को भी देर रात जगने की आदत नहीं थी। सब के सब जल्द सो जाते थे। वहां वो सोते यहां पर मेरा जगना और लगभग कई बार तो सुबह तक पढ़ना जारी रहता था। याद है वो रातें जब मैं पढ़ा करता था।

पर हर चार साल बाद वो वक्त जरूर आता जब कि मैं रात को नहीं पढ़ता था चाहे फिर परीक्षा ही क्यों ना हो। लगभग पूरी रात टीवी के सामने बैठा रहता। याद आता है घर में सिर्फ टीवी चलता रहता था और वो भी ना के बराबर आवाज़ में। ड्रॉइंग रूम में रोशनी हुआ करती थी सिर्फ टीवी की। बिना पलक झपकाए निरंतर टीवी पर नजरें गड़ाए पूरे 90 मिनट दम साधे देखना। ये आदत बनी रही और आज भी कायम है। आज से फिर शुरू हो रहा है फुटबॉल का जादू जिसका कोई भी मुकाबला नहीं।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में फुटबॉल के दीवाने नहीं हैं। हैं...और बहुत तादाद में हैं। पर फुटबॉल को बैकफुट पर रखा गया है। कभी भी खेल मंत्रालय और मीडिया की तरफ से फुटबॉल और हॉकी को ठीक से आगे बढ़ाया ही नहीं गया। हमारे देश में किसी से भी पूछ लीजिए कि रोनॉल्डो, मैसी, काका, बेकहम कौन है तो बहुत लोग शायद बता दें पर उन्हीं से पूछ लीजिए कि भरत छेत्री कौन है तो शायद वो नहीं बता पाएं। भूटिया का नाम बता दिया जाएगा पर और किसी का....?? अंग्रेजी चैनल तो बेहरहाल थोड़ा वक्त देंगे कि फुटबॉल के ग्राउंड में क्या हो रहा है पर हिंदी चैनलों में से किसी के पास इतनी हिम्मत नहीं है कि वो राखी सावंत या गंगू बाई के ऊपर फुटबॉल को रख लें।

बेहरहाल, बचपन से ही मैं अर्जेंटीना का दीवाना रहा हूं। गैब्रियल बतिस्तुता, डिएगो माराडोना, अमैरिको गैलिगो, डैनियल पासारेला, रोबर्टो अयाला मैदान में कमाल करते थे। कुछ का मानना है कि बतिस्तुता में माराडोना से ज्यादा काबलियत थी, बतिस्तुता ने अर्जेंटीना की तरफ से अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा 56 गोल किए हैं। वहीं क्रेस्पो के 36 गोल के बाद माराडोना तीसरे नंबर पर 34 गोलों के साथ हैं।

1986 का वर्ल्ड कप याद ही होगा। क्वार्टर फाइनल में इंग्लैंड से अर्जेंटीना की भिड़ंत। माराडोना के दो गोल की बदौलत इंग्लैड को हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश किया था। अधिकतर लोगों को ये याद है कि माराडोना ने हाथ की मदद से एक गोल किया था और उस गोल को हैंड ऑफ गॉड के नाम से जाना जाता है। अधिकतर लोग इस गोल की ही चर्चा करते हैं। लेकिन इसी मैच के दूसरे गोल को द गोल ऑफ सेंचुरी दिया गया। 60 मीटर की लंबी दौड साथ ही इंग्लैंड के 6 खिलाड़ियों को छक्काते हुए माराडोना ने सदी का गोल किया था। वो मैच दागदार और यादगार दोनों रहा।

इस बार फिर उम्मीद की जा रही है कि कोच माराडोना, मैसी, तेवेज, सरजिओ, डिएगो मिलिटो, वॉल्टर सेम्यूल, गैब्रियल हैंज, वेरोन की मदद से टीम जीत दर्ज करेगी। पर अर्जेंटीना की मिडफील्ड कमजोर है इस जगह पर ही सतर्क रहना होगा टीम को।

हम तो उम्मीद करेंगे की अर्जेंटीना जीते पर ये बात तो साफ है कि 12 जुलाई तक हर रात उस माहौल और मैदान के नाम रहेगी जिसके लिए फुटबॉल जानी जाती है।
पहले भी सुबह देर से उठते थे अब भी देर से उठेंगे। जिंदगी में अंतर कुछ नहीं पड़ता।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 10, 2010

हमारे अंदर का सबसे बड़ा जानवर ‘कौन’?


जितने मनुष्य उतनी शख्सियत, उतने चेहरे। सबका रहन-सहन अलग, नजरिया अलग, पहचान अलग। रोज ना जाने कितनी शख्सियत आंखों के आगे से गुजर जाती हैं। हर दिन हमें तरह-तरह के लोग रास्ते में टकराते हैं। जितने तरह के लोग उतने ही तरह के व्यक्तित्व। सभी की अपनी एक अलग पहचान, अपना एक अलग सोचने का ढंग और साथ ही अपनी-अपनी खूबियां और खामियां।

कई बार इंसानों के बारे में सोचता हूं तो एक सवाल मेरे मन को बार-बार कुरेदता है। हम सब की जिंदगी में ऐसे मुकाम बहुत बार आते हैं जब कि हम अपने अंदर के जानवर से दो-चार होते हों। तब हमें पता चलता है कि हमारे अंदर भी एक जानवर है और उस जानवर की वो काली छाया कितनी ताकतवर है। कई मौकों पर हम अपने अंदर के उस जानवर से लड़ के जीत जाते हैं और कई बार वो हमें शर्मिंदा होने पर मजबूर कर देता है।

कई मौके आते हैं जब हम अपने अंदर के जानवर से दो-चार होते हैं। मनुष्य के अंदर का जानवर खुद को तो परेशान करता ही है साथ ही दूसरों को भी तकलीफ पहुंचाता है। हमारे अंदर का जानवर क्या है? किन-किन कारणों से जानवर, शरीर के अंदर का जानवर जाग उठता है? और वो कौन-कौन से कारक होते हैं जो हमें जानवर बना देते हैं?

मैंने थोड़ी कोशिश की कुछ कारकों को टटोलने की जो कि हमें इंसान बने रहने नहीं देते और कई बार इंसानियत खोकर जानवर बनने पर मजबूर कर देते हैं।

हमारे अंदर का जानवर है क्या? ये बता पाना तो बहुत ही मुश्किल है। इस पर बहुत सोचने पर मैंने पाया कि हमारे अंदर की वो इच्छा, कल्पना या बात जिसे हर कीमत पर नैतिक-अनैतिक ढंग से पूरा करने की जिद। उस जिद में किसी और को नुकसान, क्षति हो तो भी कोई गुरेज नहीं।

अब बात करते हैं कारकों की। मैंने इन्हें 3 भागों में विभाजित किया है जो इंसान को इंसानियत छोड़ कर वैहशीपन अपनाने पर मजबूर करते हैं।

क्रोध (गुस्सा), हवस, घमंड। इन में से कौन सा वो कारक है जो कि सबसे खतरनाक होता है।

वैसे तो तीनों कारक ही एक दूसरे से मिलते जुलते लगते हैं। मजबूरी हो या फिर कोई और वजह, कई बार गुस्सा आता है, और पागल बना देता है। पागल मतलब जिसका अपने पर काबू नहीं, जो कुछ भी कर सकता है। आपके अंदर के जानवर को जगा देता है गुस्सा।

हवस, हमेशा नहीं जागती पर जब भी जागती है तो पाप होना स्वाभाविक सा ही है। वैहशी बना देती है हवस। फिर मनुष्य ये सोचने के काबिल नहीं रह जाता कि वो जिस को अपना शिकार बना रहा है वो कौन है।

पर सबसे बड़ा कारक है जो कि यदि एक बार आपके अंदर आ जाए तो आप को हमेशा के लिए जानवर बना दे, वो है घमंड। गुस्सा हमेशा नहीं बना रह सकता, हवस हमेशा नहीं रह सकती पर घमंड आपके साथ-साथ चलता है हमेशा। घमंड के कारण गुस्सा और हवस का जन्म हो सकता है पर हवस और गुस्से के कारण घमंड का जन्म नहीं हो सकता।

एक इंसान को जानवर बनाने का सबसे बड़ा कारक मुझे घमंड लगता है। घमंड को हमेशा अपने से दूर रखना चाहिए।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, June 7, 2010

क्या लोगों ने ‘उसे’ ठीक पीटा?


उस समय मेरे मुंह से सिर्फ ये ही शब्द निकले....ओह माई गॉड। उसे बुरी तरह से पीट रहे थे लोग। हर आता-जाता दो-चार तो कम से कम लगा ही देता, जहां दिल चाहता वहां मारता। कोई-कोई तो मन भरकर मारता और कुछ तो तब तक मारते जब तक कि खुद के हाथ-पैर दुखने ना लग जाएं। सुना था पर आज देख रहा था भीड़ का कानून।

कब-कौन-कहां से निकल कर उस लड़के के सामने आता और अपनी पूरी भड़ास उस पर निकाल देता, पता ही नहीं चल रहा था। हल्की दाढ़ी से भरे, लाल हो चुके गाल पर रसीद कर दिए जाते और यदि चेहरा छुपाने की कोशिश गर वो करता तो उसके कान तक आ चुके लंबे बाल उसके चेहरे को पीछे खींचने के लिए काफी होते। और फिर चेहरे पर तीन-चार....। कुछ तो उसे बॉक्सिंग पैड समझ कर सिर्फ पेट पर ही गुस्सा निकालते।

कुछ को तो मैंने देखा कि वो राहगीर थे उनको पता नहीं था कि मसला क्या है पर बाइक रोकी उतरे और चार लगाए बाइक शुरू की और चल दिए। कुछ सिर्फ वहां से गुजर रहे थे, देखा, लड़के को अपने दम के मुताबिक पीटा और चल दिए। कइयों को देख कर के ऐसा लग रहा था कि जैसे कहीं की खुंदक कहीं पर निकाल रहे हों।

मुझे फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस याद आई। जब सुनील दत्त एक चोर से बोलते हैं कि यदि मैंने तुम को यहां पब्लिक के आगे छोड़ दिया तो सोचो कि तुम्हारा क्या होगा। कोई घर से लड़ कर आया है, कोई बीबी से परेशान है, किसी को बॉस की टेंशन है, ऑफिस का झमेला, किसी की तुम जैसे जेब कतरे ने जेब काटी है सोचो जब इतने सब लोगों के बीच में तुम होगे तो क्या होगा? उस चोर की हवाइयां उड़ने लग गई। यहां पर भी मुझे वही परेशान लोग नजर आ रहे थे।

वहीं, पिटने वाला लगभग 18-19 साल का युवक होगा। बाल लंबे, कद लंबा, छरेरा शरीर पर अब सब कुछ धुमिल हो चुका लग रहा था। जगह-जगह से खून निकल रहा था, मुंह तो लहु-लुहान हो रहा था। कपड़े कई जगह से फट चुके थे। उस लड़के को समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो क्या करे क्योंकि जब तक संभलता तब तक फिर वो अपने आप को संभालने में जुट जाता।

जैसा वो चोर इस दुर्दशा के बाद सोच रहा होगा कि इस से तो बेहतर होता कि पुलिस के हत्थे चढ़ता। हुआ भी ऐसा ही ये सारा वाक्या होने के लगभग 5 मिनट के अंदर ही पुलिस मौके पर पहुंच कर उस लड़के में दो-चार लगाकर अपने साथ लेकर चलते बनी। कई बार तो शक भी होता है कि कहीं ये लोग भी तो नहीं मिले रहते इनसे?

लेकिन यहां के लोग झपट्टामार चोरों से परेशान हो चुके हैं। यहां कि लड़कियों,महिलाओं का तो दिन में सड़क पर निकलना दूभर हो गया है। सड़क पर मोबाइल पर बात कर ही नहीं सकते पता नहीं कब-कौन-कहां से आकर आपका कीमती सामान झपट जाए। कई बार तो लगता है कि उस लड़के के साथ अच्छा हुआ और पीटना चाहिए था पर कई बार सोचता हूं कि इतना नहीं मारना चाहिए था। मैं भी इंसान हूं क्या करूं!

कल एक जगह खबर पढ़ी थी कि लोगों ने झपट्टामार चोर को पकड़ा और इतना मारा कि वो मर गया। वो था इन चोरों से परेशान और पुलिस की नाकामियत पर भीड़ का कानून

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, May 29, 2010

'ये यंगिस्तान की हार नहीं है...'


यंगिस्तान की हार, यंगिस्तान को धूल चटा दी, यंगिस्तान इसे एक सबक समझे, और ना जाने क्या-क्या सलोगन सुनने में आ रहे हैं। कल से ही कई लोगों की जुबान पर ये बात आ रही थी और आज सुबह अधिकतर अखबार इसी पटे हुए हैं। पर मेरा सवाल ये है कि क्या सचमुच में यंगिस्तान की हार हुई है? और हां, यहां पर एक बात साफ कर दूं कि जिम्बॉब्वे की टीम फिसड्डी नहीं है जैसा कि कई जगह बताया जा रहा है।

हां, यंगिस्तान की हार तो हुई है, जो मैदान में खेल रहा है हारेगा तो वो ही। पर क्या इस हार के जिम्मेदार भी पूरी तरह से वो ही हैं? हार की पूरी वजह भी यंगिस्तान ही है?

नहीं, इस हार को यदि प्रतिशत में देखूं तो 10 फीसदी गलती यंगिस्तान टीम की है जो कि कल मैदान में उतरी थी। जी हां, सिर्फ 10 फीसदी गलती मानता हूं टीम की। वन डे में 285 का लक्ष्य किसी भी दूसरी टीम के लिए कम मुश्किल चुनौती नहीं होता। पर क्या इस टीम के पास कोई भी ऐसा गेंदबाज था जो दूसरी टीम और लक्ष्य के बीच दीवार की तरह खड़ा हो जाता। जवाब है, नहीं। तीनों तेज गेंदबाज वन डे में अपनी पारी की शुरूआत कर रहे थे। तीनों ने पूरे 10 ओवर नहीं फेंके और साथ ही तीनों ने 6 की रन रेट से रन दिए। सफल इसमें विनय कुमार ही रहे पर महंगे भी साबित हुए। पर ऐसा क्यों हुआ कि तीन नए गेंदबाजों को एक साथ ही मैदान में उतारना पड़ा? क्या हमारे पास नेहरा, जहीर, प्रवीण को छोड़ कर गेंदबाज नहीं हैं।

नहीं ऐसा नहीं है, हमारे पास गेंदबाज हैं पर उनको मौका नहीं दिया गया। इरफान पठान, श्रीशांत, आरपी सिंह, अजीत अगरकर, जोगिंदर शर्मा को टीम के साथ भेजा जा सकता था पर क्यों नहीं टीम में शामिल किया गया ये तो सेलेक्टर्स ही बेहतर बता सकते हैं। उथप्पा, मनीष पांडे, रायडू, अभिषेक तिवारी, अभिषेक नायर इन नामों पर भी चर्चा हो सकती थी। शायद हुई भी हो पर इस टीम के साथ किसी भी सीनियर खिलाड़ी को ना भेजने के पीछे क्या लॉजिक था ये तो श्रीकांत एंड कंपनी ही बता सकती है। 70 फीसदी गलती सेलेक्टर्स की है।

20 फीसदी गलती है भारतीय टीम के सीनियर खिलाड़ियों की। जब कई खिलाड़ी छुट्टी मांग रहे हैं तो क्या भारतीय टीम के कप्तान धोनी को नहीं चाहिए था कि वो छुट्टी पर ना जाएं। क्यों सभी खिलाड़ियों ने एक साथ आराम की मांग की? और कैसे सेलेक्टर्स ने सभी को छुट्टी या आराम दे दिया। नेहरा ने ऐसा कौन सा पहाड़ तोड़ा था कि जिस कारण उन्हें आराम की जरूरत थी। सचिन तेंदुलकर ना तो वर्ल्ड टी-20 में गए फिर उनको आराम की जरूरत क्यों आ पड़ी।

हमारे टीम के सीनियर खिलाड़ियों से तो सिर्फ ये ही लगता है कि वो सभी अपने लिए खेलते हैं टीम या फिर देश के लिए नहीं खेलते। सब के सब आईपीएल में पैसा कमाने के लिए खेल सकते हैं पर देश की बात आए तो आराम की दरकार करते हैं। और सोने पर सुहागा सेलेक्टर्स, अपने ही पसंदीदा और क्षेत्र के खिलाड़ियों को ही टीम में शामिल करने में लगे रहते हैं।

इस हार को यंगिस्तान की हार मत कहिए, ये हार तो है हमारे बूढ़े सेलेक्टर्स और हमारे स्वार्थी सीनियर खिलाड़ियों की। इन सबको ये समझना चाहिए कि ये हार भारत की है और ये हार रिकॉर्डस में दर्ज भी जरूर होगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, May 28, 2010

’हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग’।


हर दिन की तरह आज भी दौड़ते-भागते मेट्रो में कदम रखा तो भीड़ होने के बावजूद सीट कब्जाने में मैं कामयाब हो गया। बिना वक्त गंवाए मैं रोज की तरह किताब के काले अक्षरों में गुम हो गया। मैं पन्ने दर पन्ने पलट रहा था, और मेट्रो, स्टेशन दर स्टेशन भागी जा रही थी। अगले स्टेशन पर दो लड़कियां चढ़ीं, लगभग 17-18 की होंगी। आते के साथ ही दोनों ने आंखें दौड़ाई कि महिला आरक्षित सीट कौन सी है और उस पर बैठे एक 55-56 साल के अंकल को ऑन्ली फॉर लेडीज का बोर्ड दिखा कर उठा दिया। मैंने अंकल को सीट दी पर अगले स्टॉप पर सीट वापस मिल गई, अंकल उतर गए।

मुझे याद आया कि उन अंकल जी को महिला आरक्षित सीट लगभग इतनी ही उम्र की एक लड़की ने दी थी। कभी-कभी ये देखने को मिलता है एक साथ सिक्के के दो पहलू। मैं फिर किताब के पन्नों में खो गया। मन को हल्का करने के लिए भारी किताबों से हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन का रुख कर चुका हूं। हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मक पेशकश इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर में डूब गया। अपने में मजेदार शख्शियत इंस्पेक्टर मातादीन।

मैं जितना भी मातादीन के करेक्टर में डूबने की कोशिश करता मेरे मन को उस लोक पर जाने से पहले ही ब्रेक लग जाता। मन भटकने का कारण थी इस लोक की दो बालाएं। दोनों लड़कियां चैटर बॉक्स की तरह चालू थीं। मेरे कान के पास चैं चैं...पैं पैं....बाप रे। वो आपस में बात नहीं कर रहीं थीं, वो तो दुनिया को सुना रहीं थीं कि वो कितनी बोल्ड और मॉर्डन हैं। उनकी वार्ता की विष्य वस्तु लड़के, सेक्स और समाज।

जिन शब्दों को किसी भी फैमली चैनल पर बीप कर दिया जाता है उन शब्दों का उपयोग और उपभोग वो दिल खोल के कर रही थीं। अब बारी थी एंग्री यंग मैन लुक की पर हुआ कुछ नहीं, दोनों मुसकुराते हुए उस लुक को ओवर लुक कर गईं। मैंने किताब की तरफ ही रुख करना बेहतर समझा।

मैं किताब में डूबा हुआ था इनमें से एक लड़की ने पूछा कि हमें फ्लां-फ्लां जगह पर जाना है। अब मुसकुराने की बारी मेरी थी। दोनों को वहां जाना था जिसके लिए पिछले स्टेशन पर उतरना होता है और वहां से दूसरी मेट्रो पकड़नी पड़ती है। अब भी वैसे कुछ ज्यादा बिगड़ा नहीं था। मैंने उन दोनों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अंत में एक मुनियों वाली वाणी में मैंने संदेश दिया जिसे दोनों ने बड़े ही ध्यान से सुना।

मेरी बातें जो दो-चार सुन रहे थे समर्थन कर रहे थे और साथ ही अपनी भड़ास मधुर वाणी में निकाल रहे थे। वहां खड़े हर किसी को पता चल चुका था कि मार्डन दिखने और लगने में बहुत फर्क होता है। मार्डन होने का ये मतलब नहीं कि अक्ल के दरवाजे बंद कर दो।

दोनों वहां से जल्द गेट पर पहुंची और जाते-जाते एक जुमला भी छोड़ गईं हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग मेट्रो का दरवाजा खुल चुका था और वो दोनों इस प्रकरण को हंसी में उड़ाते हुए आगे बढ़ गईं और पीछे छोड़ गई वो ओल्ड जनरेशन। मैंने किताब बंद की और बैग के हवाले करते हुए सीट छोड़ दी, मैं अपने गंतव्य तक पहुंचने वाला था।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, May 27, 2010

धीरे-धीरे एक आदत की ओर...


सुबह हर किसी को जल्दी, हर कोई अपने कदमों से तेज, दूसरे से पहले पहुंचने की होड़। एक अजनबी से भी एक अनजाना मुकाबला, आगे निकलने की जद्दोजहद। हर कोई भीड़ का हिस्सा और नहीं भी। एक-दूसरे को धक्का देते, कोहनी से पीछे ढकेलते, आगे बढ़ जल्दी से सीट लपकने की जी जान कोशिश। और फिर सीट पर बैठकर शून्य में खोने का वो एहसास। उफ!!...देखते ही बनता है, हजारों के साथ अकेले सफर करना, भीड़ में अपने ख्यालों के साथ खो जाना।

मेट्रो की सीढ़ियों से ही जैसे मुकाबला शुरू हो जाता है। सबसे पहले दौड़ कर लिफ्ट पकड़ने की चाहत। जो सवार हो गया तो उसे सीट कब्जाने की होड़ और जो नहीं चढ़ पाया उसे सीढ़ियों के रास्ते सीढ़ी दर सीढ़ी किसी को पीछे छोड़ने की होड़। प्लेटफॉर्म पर सिर से जुड़े सिर फिर भी हर कोई हर एक से जुदा-जुदा।

एक बार इधर-उधर अपने सिर को घुमाकर देखिए। पहले बहुत कम लोग पढ़ते हुए चला करते थे पर मेट्रो में इस का चलन वापिस शुरू हुआ है। ना मुझे इस से मतलब ना उस से। कान में इयर फोन, हाई मैमोरी बेस्ड मोबाइल जिसमें सुनने को अथाह सामाग्री। बड़ों की तरज पर हाथ में न्यूजपेपर या फिर अंग्रेजी का कोई नॉवेल। ये है कुछ युवाओं का चेहरा। कुछ युवा जुदा भी हैं। दोनों में कॉमन है मोबाइल, वो नॉवेल में ना करते हुए, मोबाइल में ही आरएनडी करते रहते हैं।

मैने मेट्रो में कुछ दिन तो और लोगों की तरह सिर से सिर मिलाकर आंखों में नींद या फिर पुराने ख्याली पुलाव या दिन के सपनों के साथ गुजार दिए। पर फिर लगा कि नहीं ऐसे 25-30 मिनट बेकार में बेकार करना ठीक नहीं। तो अधिकतर कोई किताब रखकर चलता हूं और जैसे ही मौका मिला, लग जाता हूं पन्ने पलटने में। मेट्रो के कारण कई किताब खत्म करने में कामयाब रहा हूं।

कई बार मेट्रो में कुछ बातें ऐसी होती है जो कि ना जाने क्यों दिल को छू जाती हैं और कुछ दिल को दुखा देती हैं। इन सब बातों की बात अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, May 22, 2010

दूर बैठे, दूर की सोच


गांव, मेरा गांव। जब भी गांव जाता हूं तो करीब 40-50 किलोमीटर पहले ही वो शहर की पक्की सड़क पीछे छूट जाती है। फिर शुरू हो जाता है सफर कच्ची सड़क का, जिसे बोलचाल की भाषा में खड़ंजा (ईट की सड़क) कहते हैं। फिर शुरू हो जाती है हरियाली और सिर्फ हरियाली। मिट्टी की सौंधी-सौंधी महक, वो खुशबू, जो बीमार को भी भला-चंगा कर दे। दूर- दूर तक आंखें सिर्फ देख पाती है तो लहलहाते खेत, हरे-भरे खेत। खेतों में बनी पगडंडी और उस पगडंडी पर कोई खेत में काम कर रहे अपनों के लिए खाना ले जाता या फिर दूर से ही आते दिखती सर पर घास का बड़ा गठ्ठर लिए जिसे कोई आम आदमी सोच भी नहीं सकता उठाने की।

गांवों भी अब पक्के मकानों से घिर चुका हैं पर शहर जैसी कोठियां नहीं है। वो पुराने अंदाज और जमाने की कोठियां। गांव में जिसके पास सबसे छोटा घर होगा उसकी कीमत भी शहर में एक आम आदमी की बड़ी पहुंच से बहुत ऊपर होगी। पर गांव में वो एक गरीब किसान, एक मजबूर मजदूर है।

काफी दिन से सोच रहा था कि गांव का चक्कर लगा आऊं। पर जाना हो ही नहीं पा रहा। वहां की तो बस यादें ही रह गई हैं, जाना तो जैसे छूट ही गया है। ये हालात तो तब हैं जब गांव मेरे बसेरे से महज 125 किलोमीटर भी नहीं है। गांव में चाचाजी और दूसरे नातेदार रहते हैं और हमारी खेती संभालते हैं। पर वक्त का अंतराल इतना हो गया है कि मेरा कोई रिश्तेदार मुझे शहर की सड़कों पर रोक कर पूछें, कि पहचाना? तो मैं बहुत ही असहज हो जाऊंगा और कहने को मजबूर हो जाऊंगा, माफ कीजिएगा नहीं पहचाना। कई बार लगता है जब फासले इतने ज्यादा हो गए हैं तो क्यों ना खेत-खलिहान बेच दूं। पर क्या अपनी जड़ों से इतना आसान होता है कट जाना?

उस फैसले से हम अपनी जड़ों को खो देंगे। पुरखों की एक मात्र निशानी ही है जो कि हमें अपनों के काफी करीब रखती हैं ये जमीन। शहर कि भागती दौड़ती जिंदगी की जैसे आदत सी पड़ गई है। वहां जाने की सोचता हूं तो कई बार मेरी सोच भी ये सोच नहीं पाती कि समय कैसे निकालूंगा। कितना घूमूंगा खेतों में, कितना देखूंगा आखों को सुकून देने वाले वो मनोरम दृष्य।

अभी तो फासले ही हुए हैं पर फिर वो खाई पैदा हो जाएगी जो कभी भी उस फासलों को भर नहीं सकेगी। आज गांव चला जाता हूं तो लगता है कि मैं भी यहां का हिस्सा हूं। जैसे समीर लाल जी को लगता है कि इतने सालों के बाद भी भारत की मिट्टी के हिस्सा हैं।


आपका अपना
नीतीश राज 

Friday, May 21, 2010

अब इस फतवे से जगी आस


भारत में 90 फीसदी मुस्लिम छात्र दसवीं तक पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। शहरों में सिर्फ 1 फीसदी महिलाएं और 3.4 फीसदी मर्द स्नातक हैं। गांवों में मात्र 0.7 फीसदी पुरुष स्नातक हैं और महिलाएं ना के बराबर हैं।

आए दिन कोई ना कोई फतवा। कभी इस बात पर फतवा कभी उस बात पर फतवा। खुद का दिमाग खराब है और साथ ही वो हमारा भी दिमाग खराब कर रहे हैं। अरे आज से कुछ दशक पहले फतवे का खौफ था। जब भी किसी के खिलाफ फतवा जारी हो जाए तो समझो उस शख्स की शामत आगई। पर अब तो ये आलू-प्याज की तरफ दिए जा रहे हैं कभी-कभी तो लगता है कि प्याज का दाम ज्यादा है इन फतवों से।



फतवे ही फतवे

बालों में डाई नहीं लगा सकते सिर्फ मेहंदी लगाएं, वंदेमातरम् नहीं गाएंगे, महिलाओं के मॉडलिंग के खिलाफ फतवा, बॉडी स्कैनर के खिलाफ फतवा, पैसों को बैंक में ना रखें, ब्याज पर पैसे को रखना, औरतें मर्दों के साथ काम नहीं करें, फेसबुक के खिलाफ पतवा...और पता नहीं क्या-क्या। यदि इन लोगों का बस चले तो ये झौंक दें देश को 100 साल पहले के समाज में। अरे, कुछ तो सोचो कि यार क्या फतवा दे रहे हो। फतवा कोई कानून तो है नहीं, ये तो सिर्फ एक राय है पर वो राय तो सोच समझ के दी ही जा सकती हैं।

फेसबुक पर फतवा क्योंकि मिस्र में कुछ जोड़ों का तलाक फेसबुक की वजह से हुआ। गलतियां कोई करे और उठाकर जो मन में आए सुना दो फतवा।

औरतें मर्दों के साथ काम नहीं कर सकती। इस पर बाद में मशविरा का नाम देकर कन्नी काट ली गई पर ऐसी राय भी क्यों दी गई कि सभ्यतापूर्ण कपड़े पहनकर महिलाएं काम पर जाएं। किसी की निजी जिंदगी पर कमेंट करना या फिर बेफालतू की राय देने की ही क्या जरूरत है।

बस ये ही एक आस

ये मत करो, ये मत करो, ये मत करो पर अब पहली बार कोई पॉजिटिव फतवा सामने आया है। महिलाओं को जरूरी है शिक्षा। औरतों की तालीम पर जोर दिया गया है। सभी जानते हैं कि इस्लाम में कहा गया है कि बांदी तक को शिक्षित करो। इस तरह के फतवे जारी करो तो बेहतर है।

भारत में 90 फीसदी मुस्लिम छात्र दसवीं तक पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। शहरों में सिर्फ 1 फीसदी महिलाएं और 3.4 फीसदी मर्द स्नातक हैं। गांवों में मात्र 0.7 फीसदी पुरुष स्नातक हैं और महिलाएं ना के बराबर हैं। अभी हाल ही में जारी प्लानिंग कमीशन की रिपोर्ट में ये बात सामने आई है। ये आंकड़ें अपने में सारी बात कहते हैं।

हर जगह भद पिटने के बाद फतवादारों ने अब तालीम पर जोर दिया है। जिस काम को सबसे पहले अंजाम तक पहुंचाना चाहिए था वो अब पहुंचाया जा रहा है। तालीम पर फतवा उस समय में जारी किया गया है जब कि लोगों का फतवों से विश्वास उठ रहा है।

इस बार ये एक आस जगी है कि यदि ये फतवा कामयाब हुआ तो जरूर ही भारत देश के रूप में तरक्की करेगा और साथ ही अशिक्षित लोग दूसरों के बहलावे में आकर देश का नुकसान नहीं करेंगे। चलो अच्छा है कि देर से ही पर जागे तो।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, May 20, 2010

“वो पुरानी खिड़की”-2


अब आगे...

.....कहते हैं कि वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता, और उसके लिए वक्त बदल भी गया। मेरे लिए तो वक्त अभी था पर उसका वक्त भी तो मेरा हो चुका था जो मुझसे मेरी ही चुगली कर रहा था और बता रहा था मुझे कि अब मेरे पास भी वक्त नहीं रह गया है। मेरे वक्त ने तो कसम खा रखी थी कि मेरा साथ नहीं देगा। उसका वक्त, उसका साथ छोड़ते हुए भी उसके साथ था।

आज भी मेरी किस्मत के तार उस खिड़की के साथ जुड़े हैं जिस खिड़की से मैं नीलम को देखा करता था। कई बार यूं ही हाथ अचानक बिना किसी आवाज़ के ही उठ जाता है और चुपचाप कहता है कि आ रहा हूं। उस हाथ की आवाज़ अब किसी को समझ में नहीं आती है। वो चारपाई जिस पर हम साथ वक्त गुजारा करते थे वो अब भी चर-चर करती है और अचानक उसकी चर-चर आज भी हंसा जाती है। छज्जे पर पड़ी वो सीढ़ी गंदी हो चुकी है पर आज भी उस धूल की परतों के नीचे हम दोनों के पैर की छाप देखी जा सकती है। एक पांव में पड़ी उसकी पायल आज भी कभी-कभी दिमाग में छम-छम कर जाती है। हर एक छम के साथ ही पूरे शरीर में एक लहर सी दौड़ जाती है।

चाय की चुस्की लेते हुए उस खिड़की से बाहर देखते हुए मैं अक्सर सोचता हूं कि वक्त कब और कैसे करवट बदलता है पता ही नहीं चलता। ग्रेजुएशन करने के बाद इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन और फिर बीएड के बाद 4 गांवों के एक स्कूल में मास्टर बन गया। दूर तलक कई गांवों में ऐसा स्कूल नहीं है आमदनी अच्छी-खासी हो जाती है। गांव से थोड़ा बाहर जाना पड़ता है थोड़ी दूर है पर फिर भी इस कमरे में वापस आते ही सारी थकान गायब हो जाती है।

दो साल का वो वक्त कितना आसान था जिंदगी जीना का मन करता था। पर वक्त बदला और मेरी दुनिया भी। उस एक वक्त ने मेरी दुनिया बदल दी और तब से आजतक मेरी दुनिया बदली हुई है। अब कोई भी इस पुरानी खिड़की की तरफ कंकड नहीं उछालता। ना ही नीलम और ना ही शंभू। ना शंभू कभी नीलम से मिला था और ना ही नीलम कभी शंभू से मिली थी पर भगवान ने दोनों की जोड़ी लिखी थी। शंभू की मां की तबीयत बिगड़ी जल्दबाजी में लड़के की शादी की बात चली और जब तक कोई समझता दूल्हे संग 5 बाराती लड़की वालों के घर पर थे उनमें से दूल्हे संग मैं था।

आपका अपना 
नीतीश राज

Wednesday, May 19, 2010

“वो पुरानी खिड़की”-1


अब आगे....

.....जेठ के महीने की चिलचिलाती धूप में भी वो हौसला दिखाते हुए मुझसे मिलने पहुंच ही जाती थी मेरे तपते हुए कमरे में। उसके पत्थर फेंकने पर मैं धीरे से बिना आवाज़ किए सीढ़ी नीचे उतार देता और फिर हम दोनों घंटों बैठकर बातें करते रहते थे। कभी इतिहास (history) की तारीखों में उलझते तो कभी सांख्यिकी(statistics) का कोई सवाल ऐसा पेंच फंसाता घंटों उसी में उलझ कर रह जाते।

एक रात जब मैं शंभू के साथ खाने के बाद का कोटा(सिगरेट का) खत्म करके कमरे में लौटा तो थोड़ी ही देर बाद एक पत्थर कमरे की खिड़की तक नहीं पहुंच पाया। समझ ने दिमाग को तुरंत सतर्क किया, पर इस सतर्कता में मन घबरा गया कहीं ये वो तो नहीं है। तुरंत चर-चर करती अपनी चारपाई से उठते हुए खिड़की से हाथ बाहर निकाल दिया। धीरे-धीरे आंखों को खिड़की के बाहर तक लेगया। मैं हतप्रभ था। इस समय नीलम यहां पर? जल्दी से छज्जे पर पहुंचा, नीचे वो अपनी बहन के साथ साइकिल पर खड़ी थी। उसने सिर्फ एक कागज को पत्थर पर लपेट कर छज्जे की तरफ उछाल दिया और चली गई।

उसे सांख्यिकी के उस सवाल का हल मिल गया था जिस पर आज पूरी दोपहरी हम दोनों ने माथापच्ची की थी। उस पर्चे में मेरी वो छोटी सी गलती बता दी जिसके बाद हल तुरंत निकल गया। वो जानती थी कि मैं पूरी रात इसी सवाल में लगा रहूंगा जब तक कि हल नहीं मिल जाएगा। मैं पूरी रात आंखों में ना काटूं इसलिए सिर्फ वो हल बताने इतनी रात मेरे पास आई। दीवानी थी वो, पढ़ाई की और साथ ही मेरी भी।

पर धीरे-धीरे ये मुलाकातें, ये बातें पढ़ाई तक ही नहीं रह गई थीं। कभी घर की बातें होतीं तो कभी बिल्कुल निजी। निजी कुछ इतनी कि वो बातें हम दोनों में ही हो सकती थी किसी तीसरे से नहीं। वो चोरी छिपे घर आती और हम दूसरी दुनिया में गोते लगाने लगते। अब बातों का सिलसिला दूरियों से कम होता-होता हमारी नजदीकियों में समाने लगा। वो पल, उस समय के वो पल भुलाए नहीं भूलते।.....।

                                                जारी है.....

आपका अपना
नीतीश राज

ये फैसला तो जरूरी था।


पिछले वर्ल्ड टी 20 में मैंने एक पूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता से पूछा था कि कौन सी टीम सब से प्रबल दावेदार है कप की। उनके जवाब से मैं संतुष्ट नहीं हुआ। मैंने कहा कि पाकिस्तान को आप कम मत आंकिए ये कभी भी उल्टफेर करने का माद्दा रखती है। उनका जवाब क्या था वो आप को बाद में बताता हूं पहले बात इस बारे में।

ये तो जरूरी था।

7 दिन के अंदर नोटिस का जवाब देना होगा भारतीय टीम के 6 खिलाड़ियों को जिन्होंने वर्ल्ड टी-20 में भारत की शर्मनाक विदाई के बाद पब में पंगा किया था। युवराज सिंह, जहीर खान, आशीष नेहरा, रोहित शर्मा, पीयूष चावला और रवींद्र जडेजा को बोर्ड ने नोटिस जारी किया। वैसे तो हारने के बाद भारतीय जमीन पर कदम रखते ही आशीष नेहरा का पीछा पब ने नहीं छोड़ा था। पर पब के किसी भी तरह के पंगे से उन्होंने गुस्से की हंसी के साथ साफ-साफ इनकार किया था। साथ ही टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी युवराज सिंह ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर में कहा था कि उनका कोई पंगा नहीं हुआ।
वेस्टइंडीज टूर पर भारतीय टीम मैनेजर रंजीव बिस्वाल ने खिलाड़ियों के इनकार के बाद जो रिपोर्ट सौंपी उसमें ये साफ था कि पब में पंगा हुआ था पर हाथापाई नहीं हुई थी

कितनी शर्म की बात है कि सीनियर खिलाड़ियों ने ऐसा बर्ताव किया। हार गए और ऐसा बर्ताव। सीनियर खिलाड़ी बखूबी जानते हैं कि क्रिकेट को खुदा की तरह समझने वाले देश भारत के प्रशंसक कैसे हैं। इन्होंने गलती की और गलती के बाद झूठ बोला। एक बार नहीं बार-बार। वहीं दूसरी तरफ, हम यदि ये कहें कि हार का गम था और फैन्स को ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए था तो ये भी गलत है। ऐसा तो होना ही था पर हां उसको अंत कुछ इस तरह होगा ऐसा शायद ही किसी ने सोचा हो। ये अनुशासनात्मक कार्रवाई इन खिलाड़ियों के ऊपर होनी थी और ये जरूरी भी थी।

धोनी का बयान, एक तीर दो निशाने

वहीं धोनी ने कहा कि टीम के चयन में चयनकर्ता उनकी सुनते नहीं है। तो ये बात पहले भी कही जा सकती थी। जब तक टीम जीत रही थी तब तक आपको भी कोई दिक्कत नहीं हुई पर जैसे ही टीम हारी आप भी खिलाड़ियों के साथ छोड़कर दूर खड़े होगए। जबकि ये बात आप खुद जानते हैं कि इस बार के टी-20 में आपके कई फैसलों पर सवालिया निशान लगाया जा रहा है। लेकिन धोनी कहीं ना कहीं टीम / बोर्ड की राजनीति को भी सामने लाना चाहते हैं।

बोर्ड भी कठघरे में

असल मायने में बोर्ड पर भी सवाल उठना चाहिए। ना वो कोच की सुनती ना ही वो कप्तान की सुनती, क्यों? याद है मुझे पिछले वर्ल्ड टी-20 में हार के बाद भी बोर्ड के एक सदस्य का ये ही कहना था जो कि इस बार भी दोहराया उन्होंने कि यदि खिलाड़ियों को थकान महसूस हो रही थी तो वो बताते तो हम उन्हें आराम देते। रटा-रटाया बयान फिर से जैसे पढ़ दिया गया हो। यानी की वो बोर्ड अधिकारी पुरानी गलतियों से सबक नहीं लेते हैं, इससे तो ये ही जाहिर होता है।
दूसरी बात, इस बात से मैं तो कतई इत्तेफाक नहीं रखता कि सहवाग की जगह मुरली विजय को भेजने का फैसला ठीक कहा जाएगा। आईपीएल की फॉर्म रॉबिन उथप्पा को भेजने की हिमायती दिखती है पर फिर ये फैसला क्यों लिया गया, शायद सेलेक्टर ही जानते हों। मुरली विजय जिस टीम से आईपीएल में खेलते हैं उस टीम के मेंबर बोर्ड में भी मेंबर हैं।

आईपीएल असर तो डालता ही है....

आईपीएल ने फायदा दिया या घाटा पहुंचाया इस पर बहुत समय से बहस हो रही है पर जहां पर जिस देश में आईपीएल ने जन्म लिया और उस देश का कप्तान ये कहे कि थैंक्स, अगली बार पहले वर्ल्ड कप है बाद में आईपीएल। इस बयान से आप एक कप्तान की व्यथा जान ही सकते हैं कि आईपीएल में कितना पेंच होता है। शायद ये ही कारण है कि इस बार आईपीएल के किसी भी खिलाड़ी ने वहां पर परचम नहीं लहराया।

जाते-जाते----अच्छा हुआ कि इंग्लैंड जीता कप

पिछले वर्ल्ड टी 20 में मैंने एक भूतपूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता से पूछा था कि कौन सी टीम सब से प्रबल दावेदार है इस बार वर्ल्ड टी 20 की। उनके जवाब से मैं संतुष्ट नहीं था। मैंने कहा कि पाकिस्तान को आप कम मत आंकिए ये कभी भी उल्टफेर करने का माद्दा रखती है। उनका जवाब था कि नए खिलाड़ी हैं क्या जीतेंगे। जवाब में मैंने कहा कि पिछली बार भी तो भारत जीत गया था सभी बच्चे थे। पाकिस्तान की ये टीम नहीं जीत सकती, उन्होंने जवाब दिया।
जब पाकिस्तान ने कप जीता, मेरा उनसे आमना-सामना कई बार हुआ अब वो कभी बातचीत में ऐसी कोई लाइन नहीं लेते कि ये तो नहीं हो सकता।
अच्छा हुआ फिर इस बार वो टीम जीती जिसे दावेदार की सूची में नहीं रखा जा रहा था। जितने लोग थे उतने चैंपियन थे, कोई कह रहा था वेस्टइंडीज, द. अफ्रीका, पाकिस्तान शायद भारत भी...। पर अच्छा हुआ कि इंग्लैड जीत गया। पहली बार इतिहास में इंग्लैंड ने कोई ऐसा खिताब जीता है। इंग्लैंड में शुरू हुआ क्रिकेट आज तक एक बार भी 50-50 का चैंपियन नहीं बन पाया है। ब्रिटेन की लेबर पार्टी की सचमुच में हार हुई और ब्रिटेन में बदलाव आ ही गया।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, May 18, 2010

“वो पुरानी खिड़की”


वो खिड़की, मेरी खिड़की, जो कुछ पुराने जमाने की थी, वहां से सड़क दूर तक दिखती। कोई भी दूर से आता आसानी से खिड़की की सलाखों के बीच से पहचाना जाता। पूरी सड़क दिखा करती थी, हमारा घर या यूं कहें कि उस दुमंजले वाली खिड़की सड़क के साथ-साथ थोड़ी सी कर्व में मुड़ रही थी। घर को बनाते समय दादा जी ने गांठ मार ली थी कि घर की एक खिड़की सड़क के साथसाथ ही घूम जाए जिससे हम जब चाहें सतर्क हो सकें।

उस दुमंजले वाले कमरे की खाली और पुरानी हो चुकी खिड़की के पास मैं, लेटा रहता था। मेरा कूलर और एसी तो ये ही खिड़की थी। चर-चर करती चारपाई और साथ रखे लकड़ी के बड़े स्टूल (हम उसे टेबल की संज्ञा नहीं दे सकते) पर पड़ी किताबें ये ही पहचान थी मेरी और मेरे कमरे की।

खिड़की के रास्ते कोई पत्थर गर अंदर आकर गिरता तो समझो कि शंभू आ गया है। सिगरेट पीने का ये ही सिग्नल हुआ करता था। दिन में, तीन बार पत्थर इस खिड़की से अंदर आया करता था। सुबह जब शंभू काम पर जाता, फिर जब वो काम से वापस लौटता और तीसरा खाना खाने के बाद सैर करने के लिए। सिर्फ ये ही तीन वक्त थे जब सिगरेट पीने के लिए मैं बाहर निकलता और पूरे दिन का कोटा यानी चार-पांच सिगरेट खींच लेता।

शंभू काम करता था अपने बाबू जी की फेक्ट्री में। बारहवीं के बाद ही वो काम करने लग गया था और तभी से खिड़की से अंदर पत्थर आने लग गए थे। इधर मुझे इंतजार रहा करता था सुबह से शाम और फिर रात का और रात के बाद फिर सुबह का फिर....। ये क्रम यूं ही चलता रहा मैं अब भी पढ़ाई ही कर रहा था, सेकेंड ईयर में। मेरे पास पैसे नहीं हुआ करते थे। वहीं दूसरी तरफ मेरे साथ के कई लड़के कमाने लग गए थे क्योंकि वो पढ़ाई छोड़ चुके थे।

जब कंकड़ खिड़की के रास्ते अंदर ना आए तो समझो कि नीचे नीलम है। मैं दूसरा कंकड़ फेंकने से पहले ही हाथ बाहर निकाल देता। वो समझ जाती कि मैं कमरे में हूं, ये इशारा होता था हमारा। यदि हाथ बाहर नहीं निकलता तो वो चुपचाप उल्टे पैर लौट जाती। पर जब मैं होता तो कमरे के छज्जे पर पड़ी सीढ़ी काम आती। जिसे नीलम से दोस्ती होने के बाद बड़ी मशक्कत से मैंने बनाया था। इस सीढ़ी के बारे में सिर्फ हम दोनों ही जानते थे।
 
                                                         जारी है.....

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, March 10, 2010

वो पुरानी चौखट की याद


उस दिन धूप अच्छी थी ठंड के दिन जो शुरू हो चुके थे। ठंड की धूप बूढ़े हो चुके जिस्म पर पड़ती तो काली-सफेद चमड़ी सिक कर लाल-काली हो जाती। याद है, उस दिन उम्र के सफर में पक चुके दो जिस्म धूप में चमड़ी काली करने के बाद जैसे ही घर की ड्योढ़ी चढ़े थे उसमें से एक जिस्म ने दूसरे का लगभग साथ छोड़ दिया था। लगा था कि जैसे धूप की गर्मी ने उस पक्के जिस्म में गर्मी भर रखी थी जैसे-जैसे धूप कम हो रही थी पास में रखी लौ बुझने का इशारा कर रही थी। पहले तारे के साथ ही घर का सबसे चहेता तारा टूट गया और पीछे छोड़ गया आंखों में पानी।

ट्रेन में बैठी तारा को धुंधला दिखने लगा था। यादों ने दिल पर अपना कब्जा कर के मन को भर दिया था जो आंखों के रास्ते छलक भी रहा था। आज पूरे एक साल के बाद तारा अपने ननिहाल जा रही है। पता नहीं उस एक जिस्म से मिलने जो कि अभी छत पर बैठा धूप में अपने जिस्म को काला कर रहा था या फिर उस जिस्म के लिए जिसकी यादों ने आंचल को गीला किया था।

स्टेशन की भागदौड़ ने आंखों को सामने देखने का हौसला दिया और एक हाथ में सामान और दूसरे हाथ से अपने पांच साल के बच्चे का हाथ थाम उसने घर का रुख किया। ये शहर बहुत अपना और बहुत पराया दोनों लगता है। ये शहर और घर को जाते रास्ते भुलाए नहीं भूलते पर कभी बिल्कुल अनजाने से लगते हैं। कितनी बार आई हूं यहां पर कभी उन दोनों जिस्मों की गर्मी के साथ तो कभी एक के साथ। पर आज चाह कर के भी दोनों जिस्मों के स्पर्श का एहसास नहीं कर सकती।  

रिक्शे से उतरकर गली में दाखिल होते ही नजरें उस चौखट पर पड़ी जहां वो जा चुका शख्स मेरे आने का इंतजार किया करता था। आज वो चौखट खाली थी, मेरे इंतजार में कोई नहीं खड़ा था। आंखों ने फिर से साथ छोड़ दिया। ऐसा क्यों होता है कि जब हम घर के पास पहुंचने लगते हैं तो पैर भी लड़खड़ाने लगते हैं इस चाहत में कि यहां तो इस दर्द को सहारा मिल ही जाएगा।

तारा ने चौखट से खड़े होकर पहले अंदर का जायजा लिया। आंगन पर धूप खिली हुई थी। तभी छत पर आहट हुई। सिर्फ सर दिख रहा था ऐसा लगा जैसे कि कुर्सी थोड़ी खिसकाई गई हो। तारा ने घर के अंदर कदम रखा। आंगन को पार करते हुए मां-बेटे दोनों ने सामान और फल की पन्नी को कमरे में रखा। बिना घर वालों से दुआ-सलाम किए दोनों छत पर जा पहुंचे।

ठीक से सुनाई नहीं देता, देखने में भी परेशानी पर शरीर अभी भी चुस्त। दोनों मां-बेटे दीवार से लगकर उस शून्य में ताकती आंखों में झांकने की कोशिश करते रहे। बूढ़े जिस्म में हरकत हुई और उसने उठकर आसमान में देखते हुए अपनी कुर्सी को छाया से थोड़ा दूर करके धूप में डाली और जा बैठा शून्य के साथ।

बच्चे के हाथ पर एक बूंद आकर गिरी लड़के ने नजर ऊपर नहीं उठाई वो नीचे देखता रहा, समझ चुका था कि मां की आंखों ने फिर से एक बार साथ छोड़ दिया है। बेटे ने हाथ पर गिरी बूंद को यूं ही बहने दिया और दूसरे हाथ से अपने गालों पर उभर आई लकीरों को पोछ दिया।

दोपहर बाद की धूप धीरे-धीरे खिसक रही थी परछाई लंबी होती जा रही थी। तारा ने आगे बढ़कर उन बूढ़े कंधों को छुआ जो थोड़ा और झुक चुके थे। उन हाथों के एहसास ने सामाजिक तुजुर्बेकार से तारा के वहां होने की चुगली कर दी थी।

आगई तू? सुबह से धूप के साथ चल रहा हूं, वो जहां जाती है उठके साथ हो लेता हूं। तूने देर कर दी, तुझे तो दोपहर तक आजाना चाहिए था अब तो शाम हो चली है।
धूप खत्म होने से पहले पहुंच ही गई मैं। आओ, नीचे चलें।

बूढ़ी सीढ़ियों को जवानी की सीढ़ियों का सहारा मिल गया। कंधे नीचे आते हुए थोड़ा ऊंचे हो गए थे।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, February 6, 2010

राहुल और शाहरुख जैसे और दो-तीन जवाब शिवसेना की मुंबई में कब्र बना देगा।


उत्तरभारतीयों के पीछे राज ठाकरे...खान से खुन्नस निकालती शिवसेना....शिवसेना के पीछे बीजेपी-आरएसएस...और अब इनके पीछे युवराज यानी राहुल गांधी। पर कुछ भी हो हार तो यहां बाल ठाकरे और उनके मुद्दे की हुई है।

ठाकरे के परिवार की अब वो हैसियत नहीं रह गई है जो कि पहले हुआ करती थी। ये हाल में देखने को मिल गया। कुछ साल पहले तक बाल ठाकरे की छत्रछाया पाने के लिए मुंबई पहुंचा हर बड़े से बड़ा शख्स आतुर रहता था। बाल ठाकरे को मुंबई का शेर माना जाता था पर जान पड़ता है कि धीरे-धीर शेर बूढ़ा हो चला है।

जब मुंबई में 1993 के बम धमाके हुए तब बाल ठाकरे का राजनीतिक कैरियर पूरे शवाब पर था। याद है कि मराठी मानुष की राजनीति करते-करते 1995 विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने 73 सीटों पर कब्जा किया था और उस समय कांग्रेस ही महज 9 सीटों से शिवसेना से आगे थी।

शिवसेना में अंतर कलह और उद्धव ठाकरे को ज्यादा तवज्जो देने से पार्टी के वरिष्ठ नेता ठाकरे खानदान से बगावत करके उनके सामने खड़े होने लगे। नारायण राणे, संजय निरुपम, और फिर शिवसेना को सबसे बड़ा आघात। घर का सदस्य राज ठाकरे घर छोड़ आंख से आंख मिलाने निकल पड़ा।

शिवसेना का वर्चस्व धीर-धीरे अपने अंत की तरफ जाता दिखाई दे रहा था। बाल ठाकरे की तबीयत नासाज रहने लगी थी। सारी बागडोर उद्धव ठाकरे के हाथों में आ गई और शिवसेना की नैय्या बीच में कहीं फंसकर रह गई। शिवसेना का सूरज डूबने लगा। वहीं, दूसरी तरफ राज ठाकरे नाम का सूरज आसमान पर चमकना शुरू कर चुका था। राज ने अपने चाचा के नक्सेकदम पर चलते हुए बांटों और राज करो की नीति अपनाई साथ ही कहीं पीछे दब चुके मराठी मानुष को जिंदा कर दिया।

2004 में शिवसेना के हाथ लगी थीं 62 सीटें, मुंबई में पिछड़ चुकी थी शिवसेना। अब 2009 में एमएनएस भी अपने पैर जमा चुकी थी। तो यहां पर 13 सीटों के साथ एमएनएस ने खाता खोला तो वहीं शिवसेना टूट गई और महज 45 सीटों से ही उसे संतोष करना पड़ा।

बाल ठाकरे ने सामने से वार करने के लिए रुख सामना का किया। अपने मुखपत्र से दिन-ब-दिन हस्तियों को निशाना बनाना शुरू किया। अमिताभ बच्चन से लेकर सचिन तेंदुलकर, मुकेश अंबानी, आमिर खान और अब शाहरुख खान।

अपने मुद्दे को छिनता देख बाल ठाकरे खुल कर सामने तो आ गए तब तक उनका सामना करने के लिए एक पूरी फौज ही तैयार हो चुकी थी। किंग खान कहे जाने वाले शाहरुख खान ने कह दिया कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा कि जिसकी वजह से वो शिवसेना से माफी मांगें और शाहरुख खान किसी से नहीं डरता। सचिन और आमिर ने भी अपने तेवर पहले ही साफ कर दिए थे। अब तो शाहरुख के समर्थन में अभिषेक बच्चन और सलमान खान भी उतर आए हैं। शिवसेना की दोगली नीति अब सामने आने लगी। कुछ को सहारा और कुछ को लताड़ने का क्रम लोग समझने लग गए हैं।

राहुल गांधी ने पहले संदेशा पहुंचवाया और फिर वो मुंबई आए। पर मुंबई में इस बार लगा कि शिवसेना खत्म हो चुकी है। यदि पुलिस मदद नहीं करती तो शायद काले झंडे देखने के लिए मीडिया वाले तरस जाते। राहुल का कुछ भी बाल ठाकरे नहीं उखाड़ पाए। ये सभी जानते हैं कि बाल ठाकरे सिर्फ और सिर्फ सुबह सामना में ही अपनी झुझलाहट उतारेंगे।

शिवसेना के लिए ये नाक की लड़ाई है, इस बार पीछे हटे तो पार्टी कभी आगे नहीं आ पाएगी और इसका सबसे बड़ा फायदा होगा राज ठाकरे को। अभी तक तो देखने से लगता है कि आर-पार की इस लड़ाई में शिवसेना बैकफुट पर है और जवाब देने वाले फ्रंटफुट पर। अब तो 12-13 तारीख को ही पता चलेगा कि किसमें कितना है दम।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, February 3, 2010

राहुल लोकप्रिय कम पर उनके दीवाने ज्यादा हैं।


सुना था कि लोग दीवाने होते हैं पर आज देखा कि दीवानगी क्या होती है। पहले तो मैं ये मानता था कि दीवाने सिर्फ और सिर्फ फिल्मी हस्तियों के ही होते हैं। धीरेधीरे जानकारी हुई कि फिल्मी हस्तियों से कदम ताल कर रहे हैं क्रिकेटर। पर पहली बार दिखी दीवानगी किसी राजनेता के लिए। ये दीवानगी की बात है लोकप्रियता की नहीं जैसी कि साउथ में कई राजनेताओं की है।

हाल में ही सलमान खान अपनी फिल्म वीर के प्रमोशन के लिए कहीं पर भी जाते तो वहां पर उनके दीवाने ऐसे आते जैसे कि गुड के ऊपर मक्खियां। एक मॉल में गए तो वहां पर भगदड़ मच गई, एक मैराथन में गए तो लोग दौड़ना भूल कर सिर्फ और सिर्फ उनके पीछे हो लिए। प्रोग्राम तो हो ना सका पर हां ये प्रबंधकों को जरूर पता चल गया कि सलमान छोटे कद के अभिनेता नहीं हैं उनको बुलाना हो तो प्रबंध अच्छा खासा होना चाहिए।

बहरहाल, मैं जो बात कर रहा हूं वो लोकप्रियता से जरा हटकर है। राहुल गांधी। जी हां, राहुल गांधी पटना गए तो जो तस्वीरें टीवी पर देखीं तो मैं दंग रह गया। पटना में वूमेंस कॉलेज को चुना था राहुल ने। जिसमें कॉलेज के एक हॉल में उनसे कॉलेज की महज 400 लड़कियां ही मिल सकीं, बातचीत कर सकीं, सवाल-जवाब पूछ सकीं। बाकियों को बाहर ही इंतजार करना पड़ा। पर राहुल तो राहुल हैं।

राहुल ने हॉल की लड़कियों पर पता नहीं कहां से और क्या जादू फेरा कि वो उन्हें अपना आइडल मान बैठीं। वैसे भी, ये युवा नेता आज के युवाओं का आइडल तो बन ही चुका है। जिससे भी पूछा गया सबने राहुल की तारीफ में कसीदे पढ़ दिए। फिर राहुल कॉलेज के बाहर निकले तो लड़कियों का हुजूम राहुल को देखने के लिए दौड़ लगा बैठा। हर तरफ सिर्फ और सिर्फ लड़कियां दौड़ती ही नज़र आ रहीं थीं। पहले तो राहुल ने गाड़ी में बैठे- बैठे ही हाथ निकाला और लहरा दिया पीछे आती लड़कियां राहुल-राहुल चिल्लाने लगीं। अब तो राहुल से भी नहीं रुका गया। राहुल ने गाड़ी रुक वाई और दरवाजा खोलकर खड़े होगए और हाथ हिलाने लगे। फिर तो हजारों चीखने-चिल्लाने की आवाज़ चारों तरफ से आने लगीं। कुछ तो लड़कियां उनकी गाड़ी के नजदीक तक आ पहुंची। फिर क्या था राहुल ने वो काम कर दिया जो उनहें नहीं करना चाहिए था।

राहुल ने अपना सुरक्षा घेरा तोड़ा और लगे लड़कियों से हाथ मिलानें। ऐसे ही सुरक्षा घेरा तोड़ने की कीमत देश चुका चुका है और खुद राहुल भी चुका चुके हैं। फिर भी राहुल ने ऐसा ही किया। शायद जोश में राहुल होश खो बैठे। राहुल की ये आदत कहीं उन्हें ले ना डूबे।

पर पता नहीं समझ नहीं आता कि राहुल नाम के पीछे ऐसा क्या है कि जो लोग इस नाम के दीवाने हो जाते हैं। मेरे ऑफिस में भी दो राहुल हैं उन पर भी सब मरते हैं। पर जो भी है शायद राहुल लोकप्रिय कम और उनके दीवाने ज्यादा हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, January 29, 2010

स्टोव की गर्मी


फटररररर...फटरररररर....खटररररर...खटरररररर...। ग्लास से बार-बार टकराती चम्मच की खटररररर....खटररररर....। खटररर...खटरररर...होने के बाद तेल में छप्प से एक चिरमिराहट के साथ वो ग्लास को स्टोव पर रखे फ्राइकपेन में उड़ेल देता।
अच्छे से सेकना...पर जलाना नहीं और हां, यार...दो अंडों का ऑम्लेट और कर देना विद आउट ब्रैड।

फुल बाजू की कमीज पर आधे बाजू का पैबंद लगा स्वेटर। कोहरे से भरी रात में जहां 10 हाथ दूर दिखाई नहीं दे रहा वहां रात के 1 बजे ये शख्स आधे बाजू के कुछ ऊन के टुकड़ों से ठंड से लोहा ले रहा है। ना सर पर टोपी, ना पैरों में जूते, ना ही कोई ऊपर से कपड़ा। हां... पैरों में जगह जगह से फटी जुराब जरूर पहन रखी थी। गौर से देखा तो जान पड़ा कि एक नहीं दो जोड़ी फटी पुरानी सी जुराब एक के ऊपर एक थी।

वहीं, हमने सर पर टोपी, गले में मफलर, हाथ में दस्ताने, पैर में जूते और अंदर मोटी जुराब अड़ाई हुई थी। हमने अपने शरीर को मोटी-मोटी कपड़ों की परतों से ढका हुआ था। फिर भी जान नहीं पड़ रहा था कि ठंड कहां से लग रही है।

लोग आते उसे ऑर्डर देते और वहीं कहीं पर खड़े होकर अपने-अपने पेय पीने लग जाते।  एक बार वो ऑर्डर देने वाले को देखता और फिर अपने काम में जुट जाता। पता नहीं कहां से उसे पता होता कि फलां ऑर्डर वाला कहां खड़ा हुआ है। नहीं जानता मैं कि वो किस तरह से याद रखता था कि पहले ये है और दूसरा ये...। पहले वाले की चाय में चीनी कम रखनी है और इलायची नहीं डालनी, दूसरी वाले के ऑमलेट में हरी मिर्च नहीं डालनी है। ख्वाहिशें होती रहती और मजबूरी नीचे झुके उन ख्वाहिशों को पूरा करती रहती।

जब हम चलने लगे तो मैंने उससे पूछा, क्यों ठंड नहीं लग रही क्या? उसने नजर उठाके देखा और फिर लग गया खटरररर....फटररररर...में। तब तक काफी लोग जा चुके थे, कुछ ऑर्डर वो पूरा करने में लगा हुआ था। पैसे वापिस करने के बाद उसने कहा, भाईसाहब, पैर अकड़ जाते हैं जबकि मैं दो जुराबें पहनता हूं। मेरे पास ना तो जूते हैं और ना ही गर्मी देने को अंगीठी। पूरे टाइम तो स्टोब चलता ही रहता है और मैं चलता रहता हूं। स्टोव के पास आने की चाहत ही मुझे जल्दी-जल्दी काम करवाती है। मैं जब ठेला छोड़ता हूं तो ठंड महसूस करता हूं पर सामान देकर लौटने पर गरमाहट दूर से ही लगने लगती है।

साहब, स्टोब की गर्मी जिस्म में गर्मी तो भर देती है पर पैर ठंड में मारे खड़े रहने में दिक्कत पैदा करते हैं।
मैंने कुछ पैसे उसकी तरफ बढ़ाए और अपने लिए गर्म जुराबें ले लेना।
नहीं साहब, ये पैसे तो मैं ले ही नहीं सकता, हां, गर कोई फटा पुराना मोजा आपके पास पड़ा हो तो आते-जाते वक्त.....।
वो बोल पूरे नहीं कर पाया, नीचे देखने लगा।
...फटे भी होंगे तो चलेंगे दोनों जुराबों के ऊपर ही पहन लूंगा।

पैसे उसने नहीं लिए....क्या आदमी है....पता नहीं कहां से आती है इतनी सहनशक्ति। क्या सिर्फ स्टोव की गर्मी में रात बिता देता होगा वो....यहां तो चारदिवारी के अंदर भी रूम हीटर चला लेते हैं लोग।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, January 28, 2010

पैसे के लिए कुछ भी करेगा। कभी ख़फा होगा, कभी खुद मान जाएगा, पर पैसा तो नहीं छोड़ेगा।


आजकल ये बहुत देखने में आ रहा है कि लोग पैसे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। कुछ भी मतलब कुछ भी, शायद सब समझ गए होंगे कि इस कुछ भी का क्या मतलब होता है। पहले मैं सोचता था कि ये पैसा तो सिर्फ कॉरपोरेट कल्चर वालों को ही अपने इशारे पर नचाता है। पर धीर-धीरे मेरी जानकारी में इजाफा हुआ कि नहीं ये तो हर जगह बॉस है। चाहे फिर वो राजनीति हो, मीडिया हो, बॉलीवुड या फिर खेल।

अब देखिए हाल ही में कितना बवाल मचा था आईपीएल की बोली पर। क्यों पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं लिए गए, चैंपियनों को दर किनार कर दिया, वगैरा वगैरा। पाकिस्तान का बच्चा-बच्चा (बकौल पाकिस्तानी मीडिया और क्रिकेटर) सब की जुबान सिर्फ दो को ही कोस रही थी, एक आईपीएल(बकौल उनके कि जिसे भारत सरकार चला रही है) और दूसरा ललित मोदी। दहाड़े मार-मार कर कहा जा रहा था कि पाकिस्तानी आवाम, पाक सरकार, और खुद पाकिस्तानी क्रिकेटर और पड़ोसी देश को आघात पहुंचा है। कभी भी भारत के साथ कोई भी संबंध बढ़ाने की बात तो दूर संबंध रखा भी नहीं जाएगा (बात बेसर पैर की)।  

पर अब देखिए चार दिन बाद पैसे ने अपना जलवा दिखाया और फिर उन्हीं खिलाड़ियों के मुंह से अलग शब्दों की बौछार होने लगी है जो अब तक अपना अपमान मान कर भारत में ना खेलने का दम भर रहे थे। पीसीबी की माली हालत कितनी मजबूत है ये सारा क्रिकेट जगत जानता है। खाने के लिए दाने नहीं है और बातें गड़े हुए मुर्दे की कब्र के सामान खोखली, है कुछ नहीं पर घमंड में आंच ना आए।

एक बार बेइज्जती कराने के बाद भी ये नहीं सुधरे हैं। अब क्यों आफरीदी और तनवीर की जुबान पर ये जुमला आने लगा है कि ”we will forgive and play”। दिखादी ना अपनी औकात इन्होंने सिर्फ पैसे के लिए। क्योंकि वो बेहतर जानते हैं कि पैसा आईपीएल में बहुत है। इनके लिए ना बेइज्जती बड़ी है और ना ही देश। पैसा इनके लिए सबसे बड़ा है। और हमें इसे दोस्ताना समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

आपका अपना
नीतीश राज

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”