जी की अलग आफत, रोज-रोज ऑफिस में नाना प्रकार के पकवान ले जाते थे पर अब चुनिंदा सब्जियों से गुजारा कर रहे हैं। नौबत ये आन पड़ी है कि दाल तक ऑफिस का सफर तय करने लगी है। पर दाल भी तो सस्ती कहां रह गई। अब सोचते हैं कि खाएं क्या?महीने की शुरुआत में ही वेतन नौ दो ग्यारह। खुशी तो पहले ही दिन होती है फिर तो महीना खींचने की औपचारिक्ता ही शेष रह जाती है। शुरू के पांच दिन में ही पूरे महीना का हिसाब तय हो कर वेतन पर ग्रहण लग जाता है। पर देनदारों की लंबी सूची खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है। फिर से वो ही जद्दोजहद, 25 दिन बाद का इंतजार।
अपने देश में ‘अतिथि देवो भव’ लेकिन महंगाई अभी कहलवा रही है ‘प्रभु अभी मतो भव’। इस महंगाई में ये हाल है कि ना बाबा ना अभी कुछ दिन तो ‘नो टू गेस्ट’। फिर भी गर मेहमान आजाएं तो और मुसीबत। क्या बनाएं क्या ना बनाएं। फिर मेहमाननवाजी भी तो करनी ही है।
कल मार्केट गया तो दो चार सब्जी लेने के बाद ही जेब में कुछ बचा नहीं। पर सोचा की हरी मिर्च ले लूं। पांच की हरी मिर्च देना।
‘ये क्या दे रहे हो भाई, कुछ डालो तो’। पलटकर बोला, ‘70 रु. किलो है’। ‘मैने पांच की मांगी है दो की नहीं’। ‘ये पांच की ही है बोलो तो सात की कर दूं-100 ग्राम’।
सोचा दो और देने पड़ेंगे, चलो अभी तो ये ही दो। अब चटनी भी महंगी हो गई।
पहले कहा जाता था कि गरीब अपना पेट “नमक की रोटी और प्याज” से भर लेता है। वो भी बेचारा अब प्याज और रोटी खाने के लिए तरस रहा है। आज प्याज की कीमत 18रु. किलो. है, जिसमें गिनती की 18 प्याज भी नही चढ़ती। अब गरीब खाए क्या? रोटी नमक के साथ खाए या फिर दाल के चार दाने डालकर नमकीन पानी के साथ। दिन का बीस रु. कमाने वाला क्या अफोर्ड कर
पाएगा 18रु. किलो. की प्याज? आज जब सब्जी लेने जाओ तो दस बार सोचना पङता है कि जाने को तो चले जाएंगे लेकिन जा कर लाएंगे क्या? हमसे ज्यादा हाल तो उनका बुरा है जो दिन के ४०-५० रुपये ही कमा पाते हैं।नोट-ऐसा नहीं की मेहमाननवाजी का आप मौका ही ना दें। भई, अतिथि देवो भव, मेहमान सराखों पर। सभी का स्वागत है।
आपका अपना
नीतीश राज