कई दिन से हमारी बेगम कह रहीं थीं कि जब भी कुछ काम कहो, हर बार बहाना बना देते हो कि समय नहीं है। कभी तो घर परिवार के कामों के लिए भी समय निकाल लिया करो। वो जब भी ऐसा कहती हैं तो जानता हूं कि काफी दिनों के बाद ही कह रही हैं तो जरूर से एक-दो काम नहीं लिस्ट होगी कामों की। बस दिक्कत ये है कि कई बार ये लिस्ट इतनी बड़ी होती है कि दिन-ब-दिन करते हुए हफ्तों में जाकर काम खत्म होते हैं। मैंने सोचा कि इस बार की पूरी छुट्टी बेगम के काम के नाम मतलब हमारे घर के कामों के नाम कर देते हैं।
सुबह से ही काम में लग गए। कई काम दोपहर तक निपटा दिए गए थोड़ा आराम करने के बाद शाम को कहा गया कि आज जो साप्ताहिक सब्जी मार्केट लगती है वहां से सब्जी ले आते हैं। हम भी सब्जियों के दामों को आसमान में चढ़ते हुए देख तो रहे ही हैं शायद बाजार में ही सस्ती मिल जाए।
जब बाजार पहुंचे तो एक-दो रु तो कम जरूर मिली सब्जी पर यहां भी दाम आसमान छूते ही नजर आए। सबसे मजेदार बात तो लगी कि पहले चटनी के लिए पोधीना, धनिया और हरी मिर्च एक साथ १० रु की लेते थे इस बार तो देने से इनकार कर दिया गया, सब अलग-अलग मिलेंगी। अरे भई १० की दे दो चाहे थोड़ी यहां से काट लो वहां बढ़ा दो, पर नहीं। टमाटर ३० से नीचे नहीं मिले। चंद सब्जी में ही २०० रु खत्म।
अब हम बढ़ चले फल की तरफ। जानते तो थे कि यहां पर कम दाम की उम्मीद ना ही करें तो बेहतर। पहले बात सेब की, एक ठेले वाले भाईसाहब आवाज़ लगा रहे थे सेब ले लो सेब। बेटा हमें वहां ले गया। बड़े आश्चर्य के साथ हमने कहा कि क्या ये सेब हैं? पत्नी बोलीं, हां, ये खट्टे-मीठे सेब होते हैं। इनका आकार इतना ही होता है छोटे अमरूद की तरह। दाम ४५ रु किलो। बेगम से हमने कहा कि छोटे हैं आधा किलो ले लो इसमें ही काफी आजाएंगे।
अब बारी थी आम की। जो आकार में बड़े थे उनके दाम उनके आकार की तरह ही कुछ ज्यादा था। ६० रु के एक किलो, आदमी क्या खाए, क्या स्वाद ले। तो एक किलो में कुल चार-पांच आम चढ़े जो कि दो बार में ही खत्म हो जाएंगे। तो बढ़े चूसने वाले आमों की तरफ। देख कर लगा कि थोड़े बड़े आकार के नींबू रखे हुए हैं। इनके दाम भी कोई कम नहीं थे, ४० रु किलो। तो दिल को बहलाने के लिए २ किलो ये भी ले आए जिस के कारण थैले का वज़न भी बढ़ गया और दिल को तसल्ली भी हो गई की तीन किलो आम ले आए हैं जम कर खाएंगे। साथ ही साथ पत्नी को भी बता दिया कि देखो १४० रु में तीन किलो आम लाए हैं यानी ४७ रु किलो।
हम दोनों घर में आमों को खाते हुए मुस्कुरा रहे थे। आम के आकार ने हमारे पर्स का आकार इतना छोटा कर दिया कि एक छोटे से परिवार पर ३७५ रु ढीले हो गए। सोचता हूं कि शरीर ओवरवेट हो रहा है तो कुछ दिन जमकर डाइटिंग क्यों ना कर लूं....।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
Showing posts with label महंगाई. Show all posts
Showing posts with label महंगाई. Show all posts
Wednesday, July 22, 2009
Wednesday, August 27, 2008
महंगाई ने किया घर के बजट का बंटाधार-व्यंग्य
हाय रे महंगाई, मार डाला। अब ये हर जगह सुनाई देने लगा है। हर गृहणी को हर रोज सबसे बड़ी लड़ाई लड़नी पडती है मैन्यू के लिए, कि आखिरकार बनाएं क्या। कोई सब्जी सस्ती हो ही नहीं रही। कब तक दालों से काम चलाएं। पर वो भी तो आसमान छूने लगी हैं। राशन का बजट भी इस बार महंगाई को देखते हुए बढ़ाया था पर ये महंगाई दर की तरह काबू से बाहर। मियां
जी की अलग आफत, रोज-रोज ऑफिस में नाना प्रकार के पकवान ले जाते थे पर अब चुनिंदा सब्जियों से गुजारा कर रहे हैं। नौबत ये आन पड़ी है कि दाल तक ऑफिस का सफर तय करने लगी है। पर दाल भी तो सस्ती कहां रह गई। अब सोचते हैं कि खाएं क्या?
महीने की शुरुआत में ही वेतन नौ दो ग्यारह। खुशी तो पहले ही दिन होती है फिर तो महीना खींचने की औपचारिक्ता ही शेष रह जाती है। शुरू के पांच दिन में ही पूरे महीना का हिसाब तय हो कर वेतन पर ग्रहण लग जाता है। पर देनदारों की लंबी सूची खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है। फिर से वो ही जद्दोजहद, 25 दिन बाद का इंतजार।
अपने देश में ‘अतिथि देवो भव’ लेकिन महंगाई अभी कहलवा रही है ‘प्रभु अभी मतो भव’। इस महंगाई में ये हाल है कि ना बाबा ना अभी कुछ दिन तो ‘नो टू गेस्ट’। फिर भी गर मेहमान आजाएं तो और मुसीबत। क्या बनाएं क्या ना बनाएं। फिर मेहमाननवाजी भी तो करनी ही है।
कल मार्केट गया तो दो चार सब्जी लेने के बाद ही जेब में कुछ बचा नहीं। पर सोचा की हरी मिर्च ले लूं। पांच की हरी मिर्च देना।
‘ये क्या दे रहे हो भाई, कुछ डालो तो’। पलटकर बोला, ‘70 रु. किलो है’। ‘मैने पांच की मांगी है दो की नहीं’। ‘ये पांच की ही है बोलो तो सात की कर दूं-100 ग्राम’।
सोचा दो और देने पड़ेंगे, चलो अभी तो ये ही दो। अब चटनी भी महंगी हो गई।
पहले कहा जाता था कि गरीब अपना पेट “नमक की रोटी और प्याज” से भर लेता है। वो भी बेचारा अब प्याज और रोटी खाने के लिए तरस रहा है। आज प्याज की कीमत 18रु. किलो. है, जिसमें गिनती की 18 प्याज भी नही चढ़ती। अब गरीब खाए क्या? रोटी नमक के साथ खाए या फिर दाल के चार दाने डालकर नमकीन पानी के साथ। दिन का बीस रु. कमाने वाला क्या अफोर्ड कर
पाएगा 18रु. किलो. की प्याज? आज जब सब्जी लेने जाओ तो दस बार सोचना पङता है कि जाने को तो चले जाएंगे लेकिन जा कर लाएंगे क्या? हमसे ज्यादा हाल तो उनका बुरा है जो दिन के ४०-५० रुपये ही कमा पाते हैं।
नोट-ऐसा नहीं की मेहमाननवाजी का आप मौका ही ना दें। भई, अतिथि देवो भव, मेहमान सराखों पर। सभी का स्वागत है।
आपका अपना
नीतीश राज
जी की अलग आफत, रोज-रोज ऑफिस में नाना प्रकार के पकवान ले जाते थे पर अब चुनिंदा सब्जियों से गुजारा कर रहे हैं। नौबत ये आन पड़ी है कि दाल तक ऑफिस का सफर तय करने लगी है। पर दाल भी तो सस्ती कहां रह गई। अब सोचते हैं कि खाएं क्या?महीने की शुरुआत में ही वेतन नौ दो ग्यारह। खुशी तो पहले ही दिन होती है फिर तो महीना खींचने की औपचारिक्ता ही शेष रह जाती है। शुरू के पांच दिन में ही पूरे महीना का हिसाब तय हो कर वेतन पर ग्रहण लग जाता है। पर देनदारों की लंबी सूची खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है। फिर से वो ही जद्दोजहद, 25 दिन बाद का इंतजार।
अपने देश में ‘अतिथि देवो भव’ लेकिन महंगाई अभी कहलवा रही है ‘प्रभु अभी मतो भव’। इस महंगाई में ये हाल है कि ना बाबा ना अभी कुछ दिन तो ‘नो टू गेस्ट’। फिर भी गर मेहमान आजाएं तो और मुसीबत। क्या बनाएं क्या ना बनाएं। फिर मेहमाननवाजी भी तो करनी ही है।
कल मार्केट गया तो दो चार सब्जी लेने के बाद ही जेब में कुछ बचा नहीं। पर सोचा की हरी मिर्च ले लूं। पांच की हरी मिर्च देना।
‘ये क्या दे रहे हो भाई, कुछ डालो तो’। पलटकर बोला, ‘70 रु. किलो है’। ‘मैने पांच की मांगी है दो की नहीं’। ‘ये पांच की ही है बोलो तो सात की कर दूं-100 ग्राम’।
सोचा दो और देने पड़ेंगे, चलो अभी तो ये ही दो। अब चटनी भी महंगी हो गई।
पहले कहा जाता था कि गरीब अपना पेट “नमक की रोटी और प्याज” से भर लेता है। वो भी बेचारा अब प्याज और रोटी खाने के लिए तरस रहा है। आज प्याज की कीमत 18रु. किलो. है, जिसमें गिनती की 18 प्याज भी नही चढ़ती। अब गरीब खाए क्या? रोटी नमक के साथ खाए या फिर दाल के चार दाने डालकर नमकीन पानी के साथ। दिन का बीस रु. कमाने वाला क्या अफोर्ड कर
पाएगा 18रु. किलो. की प्याज? आज जब सब्जी लेने जाओ तो दस बार सोचना पङता है कि जाने को तो चले जाएंगे लेकिन जा कर लाएंगे क्या? हमसे ज्यादा हाल तो उनका बुरा है जो दिन के ४०-५० रुपये ही कमा पाते हैं।नोट-ऐसा नहीं की मेहमाननवाजी का आप मौका ही ना दें। भई, अतिथि देवो भव, मेहमान सराखों पर। सभी का स्वागत है।
आपका अपना
नीतीश राज
Subscribe to:
Posts (Atom)
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”