कई बार लगता है कि आग शांत होने की राह तकती रहती है लेकिन कुछ उस आग में घी डालकर उसे जलाए रखना चाहते हैं। चाहे किसी वजह से भी। कुछ घाव ऐसे होते हैं जो कि समय के साथ भर जाते हैं लेकिन अपने निशान छोड़ जाते हैं, पर कुछ घाव ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार-बार छेड़ा जाता है, कचोटा जाता है, लेकिन बार-बार क्यों छेड़ा जाता है उन घावों को? क्योंकि वो घाव नासूर की शक्ल इखित्यार कर ले।
कुछ लोगों को शायद शहीदों की शहादत पर सवालिया निशान लगाने की आदत से हो गई है। पहले इंस्पेक्टर शर्मा की शहादत पर उठाए गए थे सवाल, तब भी बहुत बखेड़ा हुआ था। कुछ लोगों ने तो उस दिल्ली के बाटला एनकाउंटर तक को फर्जी करार दे दिया था। कुछ ने तो यहां तक कह दिया था कि खुद पुलिस की गोली का शिकार हुए थे इंस्पेक्टर शर्मा। फिर अब आवाज़ उठने लगी है कि शहीद करकरे क्या वाकई में शहीद हुए हैं? क्या इस बार मुंबई पर हुए हमले को भी कुछ लोग फर्जी करार देंगे, जहां पर 200 लोग मारे गए।
शायद कुछ लोग शहीद हेमंत करकरे के नाम के साथ जुड़े इस शहीद तमगे को पचा नहीं पा रहे हैं। तभी तो कोई ना कोई इस शहीद की शहादत पर सवालिया निशान जरूर लगा देता है।
अब की बार बारी है केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले की। बिना तोल के बोलकर फंस गए अंतुले। अंतुले ने हेमंत करकरे पर कहा कि ‘उन्हें आतंकवादियों ने मारा या फिर किसी और ने’। जब मामला उठा तो अंतुले ने लोकसभा में जरा तोल कर जवाब दिया 'मैंने कहा था कि बजाए इसके कि करकरे, काम्टे, सालस्कर समेत एटीएस दल ताज होटल या ओबेराय भेजा जाता, उन्हें कामा अस्पताल भेजा गया। इन जवां मर्दों को एक ही गाड़ी में सवार होकर कामा अस्पताल जाने का निर्देश किसने दिया इस मामले की जांच कराने के बारे में मैंने कहा था।'
मैं नहीं जानता कि कितने लोग गलत समय पर दिए अंतुले के इस बयान से इत्तेफाक रखते होंगे।
अंतुले के इस बयान से पर मैं तो पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूं।
जांच जरूर होनी चाहिए। ये कोई माखौल नहीं था कि तीन आला अफसर हम लोगों ने यूं ही गवां दिए। मैं पूछता हूं आज हम बार-बार कह रहे हैं कि हेमंत करकरे, सालस्कर और काम्टे शहीद हुए, पर क्या उन तीनों में से किसी को भी इतना मौका मिला था कि वो अपनी आत्मरक्षा में गोली चला पाएं। क्या सच मायने में वो शहीद हुए हैं। शहीद का दर्जा तो हम उनको देते हैं जो कि दुश्मन से लड़ते हुए, टक्कर लेते हुए दुश्मन की गोली से मारा जाए ना कि सरकार, प्रशासन और डिपार्टमेंट की बेवकूफी से।
जम्मू-कश्मीर में हर दो-चार दिन में एक जवान शहीद हो जाता है। शायद ही किसी को ये पता चलता हो कि कोई शहीद हो गया। ना कोई इनाम ना कोई पोस्टर ना कोई तमगा। फिर भी हर रोज उसी मुस्तैदी के साथ सभी जवान डटे रहते हैं।
२६ नवंबर की वो काली रात को जब आतंकवादियों ने सीएसटी पर क़हर बरपाया था और कुछ पुलिसकर्मी उनसे लोहा ले रहे थे और उन बेचारों की खुटल, जंग खाई बंदूक ठस हो गई थी तो उन सिपाहियों को वहां से भागना पड़ा था। कुछ लोगों ने इन सिपाहियों को भगोड़ा कहा था लेकिन मैं इन को हीरो कहता हूं। जब आतंकवादी इन पर गोलियां बरसा रहे थे तो आसपास की दीवारों से धुआं उठ रहा था तब भी काफी देर तक ये डटे रहे। सलाम करता हूं उस सिपाहियों को। तब कहीं ये खबर हेमंत करकरे, सालस्कर और अशाक काम्टे के पास पहुंची थी। पहले भी मुंबई की लाइफ लाइन माने जाने वाली लोकल ट्रेन पर हमले हो चुके हैं तो सभी के सभी इस बात को ध्यान में रखते हुए सीएसटी की तरफ भागे।
अंतिम बार वीडियो में हम सबने हेमंत करकरे को सीएसटी पर ही देखा था। तब ध्यान होगा सबको कि उस समय उन्होंने आसमानी शर्ट पर हेल्मेट लगा रखा था। साथ ही एक सिपाही ने उनके हाथ में बंदूक दी थी। तब सबसे पहले मेरे दिमाग में ख्याल आया था कि कहीं शर्मा की तरह ये भी बुलेटप्रूफ जैकेट ना पहन के जाएं। पर थोड़ी देर बाद कुछ सिपाहियों के साथ करकरे को फ्रंट पर जाते देखा था। सीएसटी के अंदर कुछ सिपाहियों के साथ जाते देखा था। याने कि एक बात तो सही है कि वो मुकाबला करने के लिए ही उस जगह पर गए थे। पर जाते समय उनके शरीर पर जो था वो था दंगा निरोधक दस्ता का बुलेट प्रूफ या कहें कि लाठी प्रूफ जैकेट जिसे की बाद में खुद पुलिस के आला अफसरों ने माना है।
तभी पता चलता है कि आतंकवादी सीएसटी छोड़ चुके हैं और कामा अस्पताल की तरफ गए हैं और सदानंद दाते कामा पर घायल हो गए हैं और मैट्रो के पास से भी गोलियों की आवाज़ें सुनी गई हैं। हेमंत करकरे अपने ड्राइवर के साथ कामा की तरफ कूच करने के लिए निकलने लगे। पर तभी सालस्कर और काम्टे भी वहां पहुंच गए। फिर तीनों के तीनों एक साथ कामा की तरफ चल दिए। पर इस बार गाड़ी की कमान खुद सालस्कर ने संभाल रखी थी। आगे की सीट पर सालस्कर के साथ काम्टे बैठे थे और क्वालिस की बीच की सीट पर हेमंत करकरे बैठे हुए थे और पीछे की सीट पर ड्राइवर के साथ चार सिपाही जिसमें जाधव भी थे। पर निकलते वक्त सभी ने बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं पहने हुए थी शायद सब ने सीएसटी पर ही छोड़ दी, क्यों। बीच-बीच में पुलिस की ये क्वालिस रुकते हुए सिपाहियों और लोगों से पूछते हुए आगे बढ़ रही थी कामा अस्पताल के पास सदानंद को की मदद के लिए ये तीनों वहां आए थे। गाड़ी रुकती है तभी पेड़ के पीछे से दो आतंकवादी कसाब और इस्माइल निकले और क्वालिस पर अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे। कुछ पल में ही मुंबई ने अपने तीनों अफसर खो दिए। साथ ही तीन सिपाही भी एक सिपाही जाधव घायल अवस्था में क्वालिस में ही पड़े मिले। जब तक कि पुलिस ने वहां आकर सभी को अस्पताल नहीं पहुंचाया, अस्पताल में जाधव का इलाज चलने लगा लेकिन उनके साहब शहीद हो चुके थे। पर सवाल यहीं खड़े होते हैं कि इन आतंकियों का मकसद क्या था। क्या वो बिना किसी मकसद के भारत में आतंक फैलाने के लिए आए थे। क्या वो विदेशियों पर हमला करने आए थे। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में हमारी नाक नीचे करने के लिए आए थे। क्या करने आए थे वो यहां पर। क्या और कोई भी कारण हमें समझ में नहीं आता। ताज होटल, ओबेराय होटल समझ में आता है कि वहां पर विदेशी थे और साथ ही वो मुंबई की पहचान है, सीएसटी, नरीमन भी समझ में आते हैं। पर क्या कारण था कि कामा, मैट्रो और पुलिस मुख्यालय की पास की जगह को क्यों निशाना बनाया गया। जहां पर विदेशी ढूंढे से भी नहीं मिलेंगे। कोई बताए फिर उस पर ही निशाना क्यों?
२५ नवंबर को पुणे के एक पुलिस थाने में एक फोन कॉल आता है जो कि मराठी में बोलता है कि हेमंत करकरे को दो-तीन दिन में बम ब्लास्ट में जान से मार देंगे। अगले दिन वो मार भी दिए जाते हैं। क्या इस की जांच नहीं होनी चाहिए कहीं कोई हमारे देश में ही गद्दार तो नहीं। लेकिन एक बात तो सारी दुनिया मानेगी कि वो आतंकवादियों से मुकाबला करने के लिए ही गए थे पर ये उनकी किस्मत ही थी कि मुंबई के तीन आला पुलिस अधिकारी बिना किसी को आघात पहुंचाए उन आतंकवादियों के घात लग गए। पर उन तीनों से शहीद का तमगा आने वाले कल में भी कोई नहीं छीन पाएगा वो फ्रंट पर ही शहीद हुए हैं।
आपका अपना
नीतीश राज
"MY DREAMS" मेरे सपने मेरे अपने हैं, इनका कोई मोल है या नहीं, नहीं जानता, लेकिन इनकी अहमियत को सलाम करने वाले हर दिल में मेरी ही सांस बसती है..मेरे सपनों को समझने वाले वो, मेरे अपने हैं..वो सपने भी तो, मेरे अपने ही हैं...
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Thursday, December 18, 2008
Wednesday, December 3, 2008
इजरायली अपने लोगों का शव बिना पोस्टमार्टम के ले गए, लेकिन हमले का तो हमें पोस्टमार्टम करना होगा।
मुंबई धमाकों को क्या कोई याद रखना चाहेगा? शायद नहीं, ये वो डरावनी हकीकत है जिसे दोबारा कोई नहीं देखना चाहेगा। लेकिन यदि हम चाहते हैं कि ये दोबारा हमारे देश के साथ नहीं हो तो इस घाव को हमें हमेशा याद रखना होगा। जहां तक मेरा मानना है कि ये पहली बार है कि हम हारे हैं और आतंकवादी जीते हैं। वो जो करने आए थे वो उससे ज्यादा कर गए। अब तक वो छुप कर हमला करते थे। श्रीनगर, घाटी के तर्ज पर इस बार फिदाइन हमला किया गया। हर बार वो छुपकर वार करते थे इस बार अपना दस्ता भेजकर, बिना चेहरा छुपाए, चेहरे पर कोइ नकाब नहीं, चेहरा दिखाकर हमला किया। २००२ अक्षरधाम सबको याद ही होगा, ऐसे वाक्ये बहुत ही कम हैं। हम इस हमले को गर भूल गए तो याद रखिए कि फिर आतंकवाद पलट कर आएगा और वार होगा हमारे नासूर बन चुके घाव पर।
कैसे घुसे आतंकवादी ?
सब जानते हैं कि कहीं तो चूक हुई है पर ये चूक हुई किस-किस मोड़ पर है। तो लगता है कि शुरू से लेकर आखिर तक हर मोड़ पर सिर्फ हमारी ही गलती है। थ्यौरी तो कई सामने आ रही हैं पर जिस पर विश्वास करना पड़ेगा वो है जो कि पुलिस ने अपने आप को बचाने कि लिए दी है। पकिस्तान के कराची में पहले १० आतंकवादी इकट्ठा हुए, फिर समुद्री रास्ते के जरिए भारतीय सीमा पर एक जहाज को अगवा कर के मुंबई पहुंचे और फिर टैक्सियों में भरकर दो-दो के गुट में ५ जगह अपने-अपने मुकाम की तरफ चल दिए।
पर पेंच तो यही आता है कि पहले तो कराची से मुंबई आने के लिए पानी के रास्ते ४ दिन का समय लगता है। क्या इन चार दिन के अंदर खुफिया सूत्रों को एक बार भी ये पता नहीं चला कि समंदर के रास्ते पर कुछ हलचल है। एक जहाज को कब्जे में किया जाता है जिस का नाम कुबेर बताया गया। पुलिस ने जहाज पर मौजूद अमर सिंह टंडेल का रिकॉर्ड पहले से अच्छा नहीं माना है। ये जानकारी भी है कि गैरकानूनी काम के चलते अमर सिंह टंडेल को १ साल की कैद पाक में काटनी पड़ी थी। क्या ऐसे लोगों पर हमेशा नजर नहीं रखनी चाहिए थी। हो सकता है कि अमर सिंह टंडेल भी उनसे मिला हुआ हो और भारत तक लाने का जिम्मा उसका ही हो पर जैसे ही वो भारत की सीमा में पहुंचे उन्होंने टंडेल को मार दिया। समुद्री रास्ते से आगाह करती यूपी पुलिस की वो रिपोर्ट कहां है? कोई पूछे इंटेलिजेंस, रॉ, राज्य सरकार, सीबीआई से। ये तो सच है कि वो सब आए समुद्र के रास्ते से ही थे। जिसे हमारे गृहराज्यमंत्री जायसवाल और महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्यमंत्री समुद्री रास्ते से हुई चूक को अपनी गलती मान चुके हैं। लेकिन जब पता था कि समुद्री रास्ते पर सुरक्षा कमजोर है तो फिर क्या वहां पर ध्यान नहीं देना चाहिए था। अब ध्यान देत क्या होत जब आतंकी कर गए २०० ढेर।
कितने थे आतंकवादी ?
गुमराह करने की कोशिश है कि वो सिर्फ १० आतंकवादी ही थे। ये मैं नहीं मानता कि वो १० थे। माना कि वो समुद्र के रास्ते से आए थे और मान लें कि आए भी १० ही हों पर आतंकवादी १० नहीं थे। कुछ पहले से ही मुंबई में उनका रास्ता देख रहे थे। वहीं दूसरी तरफ, जिस जहाज को उन्होंने अगवा किया था, कुबेर को, उसमें से १५ जैकेट मिले हैं। पुलिस ने ये पहले कहा था कि शायद कुछ लोग बच कर निकल गए हों। पर अब पुलिस ने ये कह दिया है कि सिर्फ १० जैकेट ही मिले हैं क्योंकि वो भी लोगों को दहशत में नहीं रखना चाहती। जब कि पब्लिक ये जानती है कि मुंबई की धरती पर आतंकी हैं। लेकिन सवाल ये ही उठता है कि जब जैकेट १५ मिले तो लोग घट कर १० क्यों रह गए? आनन फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की जाती है और इस बात का खंडन किया जाता है कि कुबेर में सिर्फ १५ जैकेट मिले हैं। हम भी जानते हैं कि यदि ये बात फैल गई कि मुंबई या देश में ५ आतंकी घूम रहे हैं तो अफरातफरी मच जाएगी। विलासराव क्या मनमोहन की गद्दी भी ख़तरे में पड़ जाएगी।
मैं ये कतई नहीं मानता कि मुंबई में ६० घंटे तक आतंक का राज चलाने वाले सिर्फ और सिर्फ १० आतंकवादी थे। मैं अपने कमांडो फोर्स को इतना कमजोर या हमारी पुलिस की तरह निकम्मा नहीं मानता। कमांडो कह रहे थे कि इन आतंकवादियों को पूरे होटल का लेयआउट पता था। किस फ्लोर पर कितने कमरे हैं, हर कमरे के पास क्या है, वो यहां से गोली चलाते जब तक हम घूम कर देखते तो दूसरे पल तीसरे फ्लोर से फायरिंग होने लगती, हम अपनी निगाह वहां गड़ाते तो वो छठे फ्लोर से फायरिंग करने लगते, फिर ५वें से, फिर पहले तक से फायरिंग करने लगते और फिर ग्रेनेड हमला। उन आतंकियों को होटल के चप्पे-चप्पे के बारे में पता था और ये मैं शर्त के साथ कह सकता हूं कि ताज को सिर्फ और सिर्फ ४ आतंकवादियों ने अपने कब्जे में नहीं किया। वो भी दो आतंकी बाद में आए उस से पहले तक वो दो आतंकी मुंबई में कोहराम मचा रहे थे। २७ की रात जब ओबरॉय पर कार्रवाई की जा रही थी तब ये खबर आने लगी कि ताज में सिर्फ एक आतंकी बाकी रह गया है और वो भी घायल हालत में है। सबने सोचा था कि आज ताज को छुड़ा लिया जाएगा लेकिन अगले दिन दोपहर आते-आते तो इतनी गोलीबारी होने लगी कि लग गया कि वहां पर और भी आतंकी हैं। तो और आतंकी जब कि सेना ने पूरे ताज को घेर रखा था तब वो दो कहां से आए? जैसे कि पुलिस ने कहा कि दो आतंकी बाद में आकर पहले वाले आतंकियों से मिले।
इस बीच एक माता-पिता को फोन आता है। फोन के दूसरी तरफ होता है मौत के मुंह में झूल रहा खुद उनका बेटा। जो कि ताज होटल में इंटरनसिप कर रहा था और उसने अपनी आखरी इच्छा पूरी कर ली, मरने से पहले अपने घर फोन कर अपने घर वालों से बात कर ली। लेकिन जो जानकारी दी वो भयंकर थी, माता-पिता दोनों एक पल के लिए तो सन्न रह गए। अंतिम सांसे लेते हुए बेटा बोल रहा था कि
आतंकवादियों का हमला ताज पर हो चुका है और उसे गोली लग गई है, लेकिन गोली आतंकवादियों ने नहीं मारी, मारी तो उस शख्स ने है जो कि ताज में, हमारे साथ पिछले ५-६ महीने से इंटरनसिप (काम) कर रहा था।
तो क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि फिर वो पांचवां कहां गया? चार आतंकियों की लाश तो मिल गई तो क्या ये शख्स भाग गया या मर गया? वैसे पुलिस ने ये बात शुरू में कही थी कि नरीमन हाउस में रहने वाले दो लड़के ताज में काम करते थे फिर इस बात को किस बात के कारण से दबा दिया गया। जानता हूं क्योंकि ताज है भी बहुत बड़ा और बहुत बड़े लोग हैं।
ये बात पुलिस ने बिल्कुल सही कही है कि वो सीधे कराची से आए थे और फिर क़हर बरपाने मुंबई में फैल गए। तो, नरीमन हाउस पर ठीक उसी समय पर पांच-छह लड़कों को देखे जाने की बात थी तो वो कौन थे? क्या है किसी के पास इस का जवाब? नहीं, तो अगली पोस्ट।
जारी है...
आपका अपना
नीतीश कुमार
कैसे घुसे आतंकवादी ?
सब जानते हैं कि कहीं तो चूक हुई है पर ये चूक हुई किस-किस मोड़ पर है। तो लगता है कि शुरू से लेकर आखिर तक हर मोड़ पर सिर्फ हमारी ही गलती है। थ्यौरी तो कई सामने आ रही हैं पर जिस पर विश्वास करना पड़ेगा वो है जो कि पुलिस ने अपने आप को बचाने कि लिए दी है। पकिस्तान के कराची में पहले १० आतंकवादी इकट्ठा हुए, फिर समुद्री रास्ते के जरिए भारतीय सीमा पर एक जहाज को अगवा कर के मुंबई पहुंचे और फिर टैक्सियों में भरकर दो-दो के गुट में ५ जगह अपने-अपने मुकाम की तरफ चल दिए।
पर पेंच तो यही आता है कि पहले तो कराची से मुंबई आने के लिए पानी के रास्ते ४ दिन का समय लगता है। क्या इन चार दिन के अंदर खुफिया सूत्रों को एक बार भी ये पता नहीं चला कि समंदर के रास्ते पर कुछ हलचल है। एक जहाज को कब्जे में किया जाता है जिस का नाम कुबेर बताया गया। पुलिस ने जहाज पर मौजूद अमर सिंह टंडेल का रिकॉर्ड पहले से अच्छा नहीं माना है। ये जानकारी भी है कि गैरकानूनी काम के चलते अमर सिंह टंडेल को १ साल की कैद पाक में काटनी पड़ी थी। क्या ऐसे लोगों पर हमेशा नजर नहीं रखनी चाहिए थी। हो सकता है कि अमर सिंह टंडेल भी उनसे मिला हुआ हो और भारत तक लाने का जिम्मा उसका ही हो पर जैसे ही वो भारत की सीमा में पहुंचे उन्होंने टंडेल को मार दिया। समुद्री रास्ते से आगाह करती यूपी पुलिस की वो रिपोर्ट कहां है? कोई पूछे इंटेलिजेंस, रॉ, राज्य सरकार, सीबीआई से। ये तो सच है कि वो सब आए समुद्र के रास्ते से ही थे। जिसे हमारे गृहराज्यमंत्री जायसवाल और महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्यमंत्री समुद्री रास्ते से हुई चूक को अपनी गलती मान चुके हैं। लेकिन जब पता था कि समुद्री रास्ते पर सुरक्षा कमजोर है तो फिर क्या वहां पर ध्यान नहीं देना चाहिए था। अब ध्यान देत क्या होत जब आतंकी कर गए २०० ढेर।
कितने थे आतंकवादी ?
गुमराह करने की कोशिश है कि वो सिर्फ १० आतंकवादी ही थे। ये मैं नहीं मानता कि वो १० थे। माना कि वो समुद्र के रास्ते से आए थे और मान लें कि आए भी १० ही हों पर आतंकवादी १० नहीं थे। कुछ पहले से ही मुंबई में उनका रास्ता देख रहे थे। वहीं दूसरी तरफ, जिस जहाज को उन्होंने अगवा किया था, कुबेर को, उसमें से १५ जैकेट मिले हैं। पुलिस ने ये पहले कहा था कि शायद कुछ लोग बच कर निकल गए हों। पर अब पुलिस ने ये कह दिया है कि सिर्फ १० जैकेट ही मिले हैं क्योंकि वो भी लोगों को दहशत में नहीं रखना चाहती। जब कि पब्लिक ये जानती है कि मुंबई की धरती पर आतंकी हैं। लेकिन सवाल ये ही उठता है कि जब जैकेट १५ मिले तो लोग घट कर १० क्यों रह गए? आनन फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की जाती है और इस बात का खंडन किया जाता है कि कुबेर में सिर्फ १५ जैकेट मिले हैं। हम भी जानते हैं कि यदि ये बात फैल गई कि मुंबई या देश में ५ आतंकी घूम रहे हैं तो अफरातफरी मच जाएगी। विलासराव क्या मनमोहन की गद्दी भी ख़तरे में पड़ जाएगी।
मैं ये कतई नहीं मानता कि मुंबई में ६० घंटे तक आतंक का राज चलाने वाले सिर्फ और सिर्फ १० आतंकवादी थे। मैं अपने कमांडो फोर्स को इतना कमजोर या हमारी पुलिस की तरह निकम्मा नहीं मानता। कमांडो कह रहे थे कि इन आतंकवादियों को पूरे होटल का लेयआउट पता था। किस फ्लोर पर कितने कमरे हैं, हर कमरे के पास क्या है, वो यहां से गोली चलाते जब तक हम घूम कर देखते तो दूसरे पल तीसरे फ्लोर से फायरिंग होने लगती, हम अपनी निगाह वहां गड़ाते तो वो छठे फ्लोर से फायरिंग करने लगते, फिर ५वें से, फिर पहले तक से फायरिंग करने लगते और फिर ग्रेनेड हमला। उन आतंकियों को होटल के चप्पे-चप्पे के बारे में पता था और ये मैं शर्त के साथ कह सकता हूं कि ताज को सिर्फ और सिर्फ ४ आतंकवादियों ने अपने कब्जे में नहीं किया। वो भी दो आतंकी बाद में आए उस से पहले तक वो दो आतंकी मुंबई में कोहराम मचा रहे थे। २७ की रात जब ओबरॉय पर कार्रवाई की जा रही थी तब ये खबर आने लगी कि ताज में सिर्फ एक आतंकी बाकी रह गया है और वो भी घायल हालत में है। सबने सोचा था कि आज ताज को छुड़ा लिया जाएगा लेकिन अगले दिन दोपहर आते-आते तो इतनी गोलीबारी होने लगी कि लग गया कि वहां पर और भी आतंकी हैं। तो और आतंकी जब कि सेना ने पूरे ताज को घेर रखा था तब वो दो कहां से आए? जैसे कि पुलिस ने कहा कि दो आतंकी बाद में आकर पहले वाले आतंकियों से मिले।
इस बीच एक माता-पिता को फोन आता है। फोन के दूसरी तरफ होता है मौत के मुंह में झूल रहा खुद उनका बेटा। जो कि ताज होटल में इंटरनसिप कर रहा था और उसने अपनी आखरी इच्छा पूरी कर ली, मरने से पहले अपने घर फोन कर अपने घर वालों से बात कर ली। लेकिन जो जानकारी दी वो भयंकर थी, माता-पिता दोनों एक पल के लिए तो सन्न रह गए। अंतिम सांसे लेते हुए बेटा बोल रहा था कि
आतंकवादियों का हमला ताज पर हो चुका है और उसे गोली लग गई है, लेकिन गोली आतंकवादियों ने नहीं मारी, मारी तो उस शख्स ने है जो कि ताज में, हमारे साथ पिछले ५-६ महीने से इंटरनसिप (काम) कर रहा था।
तो क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि फिर वो पांचवां कहां गया? चार आतंकियों की लाश तो मिल गई तो क्या ये शख्स भाग गया या मर गया? वैसे पुलिस ने ये बात शुरू में कही थी कि नरीमन हाउस में रहने वाले दो लड़के ताज में काम करते थे फिर इस बात को किस बात के कारण से दबा दिया गया। जानता हूं क्योंकि ताज है भी बहुत बड़ा और बहुत बड़े लोग हैं।
ये बात पुलिस ने बिल्कुल सही कही है कि वो सीधे कराची से आए थे और फिर क़हर बरपाने मुंबई में फैल गए। तो, नरीमन हाउस पर ठीक उसी समय पर पांच-छह लड़कों को देखे जाने की बात थी तो वो कौन थे? क्या है किसी के पास इस का जवाब? नहीं, तो अगली पोस्ट।
जारी है...
आपका अपना
नीतीश कुमार
Tuesday, December 2, 2008
ताज..,नरीमन..,ओबरॉय..और मेरे विचार
कई दिन से सोच रहा था कि मुंबई आतंकवादी हमले पर मेरा लिखना बनता है। कई मेल भी आए अपने ब्लॉगर भाइयों के, कि इस मुद्दे पर अब तक तुम्हारे ब्लॉग की तरफ से कुछ आया ही नहीं। तो सबको बता दूं कि कुछ और प्रोजेक्ट पर लगा हुआ था और फिर जब से ये हमला हुआ है तो तब से अधिकतर वक्त ऑफिस में ही निकल जाता।
२६ को प्रगति मैदान गए थे, शाम तक घूमते-घूमते हालत ऐसी हो गई कि उस दिन फिर कुछ लिख नहीं सका। शाम को सोचा था कि प्रगति मैदान पर लचर सुरक्षा व्यवस्था पर जरूर लिखूंगा लेकिन थकान ही इतनी ज्यादा थी कि कुछ लिख नहीं पाया। साथ ही यदि आपका बॉस कान का कच्चा हो तो और भी दिक्कत होजाती है और रात में उनसे एक बात को लेकर बहस हो गई(मेरे बॉस ये जानते हैं कि मैं लिखता हूं और जब वो इसे पढ़ेंगे तब तो)। मैंने सोचा था कि २७ को इस पर कुछ लिखूंगा लेकिन मुझे क्या पता था कि २६ की रात ऐसी आपदा देश पर आएगी कि देश के साथ-साथ पूरा विश्व उस घटना से हतप्रभ सा रह जाएगा।
२६ की रात को जब तक मैंने देखा तब तक अपुष्ट खबरें आ रही थीं कि शायद ये आतंकवादी हो सकते हैं। पर लगा कि मुंबई में सुरक्षा व्यवस्था तो इतनी कमजोर नहीं रह गई है जब से कि एटीएस का निर्माण हुआ है लेकिन आतंकवादी मुंबई में हैं ये बात कुछ हजम नहीं हो रही थी। सब चैनलों पर ये चल रहा था कि दो गुट में फायरिंग हुई है। लगा कि अंडरवर्ल्ड के दो गुटों में जमकर फायरिंग हो रही है पर ये आतंकवादी नहीं हो सकते दिल नहीं मान रहा था। थोड़ी देर में पता चला कि नहीं ये तो कुछ और ही है। ये महज कुछ क्षण के लिए फायरिंग नहीं हो रही है मुंबई पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है।
सुबह मुझे देर तक सोने की आदत है, घर में सब उठ चुके थे, मैंने उठ कर सबसे पहले अपना चैनल देखा तो आंख फटी की फटी रह गई। ४ साल के बेटे ने पूछा, पापा क्या हुआ? पत्नी भी मेरे बगल में आकर बैठ गईं। हम दोनों को ऐसे बैठे देख, बेटू भी टीवी देखने लगे। फिर सवाल शुरू हुए बेटे के। लेकिन उन सवालों के जवाब मेरे पास क्या किसी के पास भी नहीं हो सकते। पापा ये स्मार्ट अंकल कौन हैं और इनके हैंड में क्या है? क्यों ये ढिसुम ढिसुम कर रहे हैं? अंकल लोग क्यों भाग रहे हैं? फिर खबरें देखते-देखते ही खाना वगैरा चलता रहा और दूसरी तरफ हमारे बेटू बार-बार ये बोलते रहे कि पापा अपना वाला चैनल चला लूं(कार्टून नेटवर्क)। लेकिन मैं मना करता रहा। बेटे ने भी ज्यादा जिद नहीं की। थोड़े समय के बाद मैं ऑफिस के लिए चला गया वहां पता चला कि २६ की रात से ही लाइव बुलेटिन चल रहे हैं। फिर तो काम करने में जुट गए। २८ की सुबह ६ बजे तक मैं ऑफिस में लाइव बुलेटिन करता रहा। रात बारह बजे लग रहा था कि ओबरॉय को छोड़कर दोनों जगहें आतंकियों के कब्जे से छुड़ा ली जाएंगी। पूरी रात नरीमन, ओबरॉय और ताज में फायरिंग होती रही, ग्रेनेड फेंकने का सिलसिला जारी रहा। ऑफिस से घर सोने के लिए फिर उठते ही वापस ऑफिस की राह। और यूं ही सुबह ६ बजे तक लाइव चलता रहता। तीन दिन कुछ यूं ही सिलसिला चलता रहा। पता नहीं चल पा रहा था कि कितने और शहीद होंगे। दुख हुआ कि करकरे, सालास्कर, शहीद होगए, पर क्या वो सच में शहीद हुए। बार-बार खबरें आती रही कि यहां से इतने हताहत हुए और वहां से संख्या बढ़ गई है। थोड़ी देरी की शांति के बाद फिर फायरिंग या ग्रेनेड हमला। इस बीच एक फैसला जरूर अच्छा हुआ कि मीडिया पर लाइव तस्वीरें दिखाने की मनाई हो गई। इस के पीछे कई लोगों ने कई बात बनाई। पर ये फैसला काफी अच्छा था। मैंने अपने सीनियर के सामने ये बात रखी थी कि कमांडो कहां पर हैं ये हमें नहीं दिखाना चाहिए। पर शायद उन्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने कुछ भी जवाब नहीं दिया, साथ ही कहा कि फिर हम दिखाएंगे क्या? और साथ ही कि दोनों होटलों के केबल कनेक्शन काट दिए गए हैं, तो उन्हें पता कैसे चलेगा। मेरा जवाब था कि फोन और सेटेलाइट फोन के जरिए। कहीं पर भी उनके आका देख रहे होंगे जो उनको इस बात की जानकारी दे रहे होंगे। लेकिन थोड़ी देर के बाद ही इस बात को मान लिया गया था। बहुत खुशी हुई जब कमांडो कार्रवाई के दौरान तीनों जगह को आजाद करा लिया गया। पर शायद बहुत देर में हमने अपना पिंड इन आतंकियों से छुड़ाया। गलती किसकी? इस बारे में सिर्फ तथ्यों के साथ अगली पोस्ट में लौटूंगा।
लेकिन ये ५-६ दिन ऐसे थे कि ना चाहते हुए भी लगा कि हमने इस बार बहुत खोया है। कई सवाल मन में उठ रहे हैं। उन सब सवालों के जवाब और उन पर उठते सवालों के साथ अगली पोस्ट में सब लिखूंगा। अभी के लिए इतना ही।
आपका अपना
नीतीश राज
२६ को प्रगति मैदान गए थे, शाम तक घूमते-घूमते हालत ऐसी हो गई कि उस दिन फिर कुछ लिख नहीं सका। शाम को सोचा था कि प्रगति मैदान पर लचर सुरक्षा व्यवस्था पर जरूर लिखूंगा लेकिन थकान ही इतनी ज्यादा थी कि कुछ लिख नहीं पाया। साथ ही यदि आपका बॉस कान का कच्चा हो तो और भी दिक्कत होजाती है और रात में उनसे एक बात को लेकर बहस हो गई(मेरे बॉस ये जानते हैं कि मैं लिखता हूं और जब वो इसे पढ़ेंगे तब तो)। मैंने सोचा था कि २७ को इस पर कुछ लिखूंगा लेकिन मुझे क्या पता था कि २६ की रात ऐसी आपदा देश पर आएगी कि देश के साथ-साथ पूरा विश्व उस घटना से हतप्रभ सा रह जाएगा।
२६ की रात को जब तक मैंने देखा तब तक अपुष्ट खबरें आ रही थीं कि शायद ये आतंकवादी हो सकते हैं। पर लगा कि मुंबई में सुरक्षा व्यवस्था तो इतनी कमजोर नहीं रह गई है जब से कि एटीएस का निर्माण हुआ है लेकिन आतंकवादी मुंबई में हैं ये बात कुछ हजम नहीं हो रही थी। सब चैनलों पर ये चल रहा था कि दो गुट में फायरिंग हुई है। लगा कि अंडरवर्ल्ड के दो गुटों में जमकर फायरिंग हो रही है पर ये आतंकवादी नहीं हो सकते दिल नहीं मान रहा था। थोड़ी देर में पता चला कि नहीं ये तो कुछ और ही है। ये महज कुछ क्षण के लिए फायरिंग नहीं हो रही है मुंबई पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है।
सुबह मुझे देर तक सोने की आदत है, घर में सब उठ चुके थे, मैंने उठ कर सबसे पहले अपना चैनल देखा तो आंख फटी की फटी रह गई। ४ साल के बेटे ने पूछा, पापा क्या हुआ? पत्नी भी मेरे बगल में आकर बैठ गईं। हम दोनों को ऐसे बैठे देख, बेटू भी टीवी देखने लगे। फिर सवाल शुरू हुए बेटे के। लेकिन उन सवालों के जवाब मेरे पास क्या किसी के पास भी नहीं हो सकते। पापा ये स्मार्ट अंकल कौन हैं और इनके हैंड में क्या है? क्यों ये ढिसुम ढिसुम कर रहे हैं? अंकल लोग क्यों भाग रहे हैं? फिर खबरें देखते-देखते ही खाना वगैरा चलता रहा और दूसरी तरफ हमारे बेटू बार-बार ये बोलते रहे कि पापा अपना वाला चैनल चला लूं(कार्टून नेटवर्क)। लेकिन मैं मना करता रहा। बेटे ने भी ज्यादा जिद नहीं की। थोड़े समय के बाद मैं ऑफिस के लिए चला गया वहां पता चला कि २६ की रात से ही लाइव बुलेटिन चल रहे हैं। फिर तो काम करने में जुट गए। २८ की सुबह ६ बजे तक मैं ऑफिस में लाइव बुलेटिन करता रहा। रात बारह बजे लग रहा था कि ओबरॉय को छोड़कर दोनों जगहें आतंकियों के कब्जे से छुड़ा ली जाएंगी। पूरी रात नरीमन, ओबरॉय और ताज में फायरिंग होती रही, ग्रेनेड फेंकने का सिलसिला जारी रहा। ऑफिस से घर सोने के लिए फिर उठते ही वापस ऑफिस की राह। और यूं ही सुबह ६ बजे तक लाइव चलता रहता। तीन दिन कुछ यूं ही सिलसिला चलता रहा। पता नहीं चल पा रहा था कि कितने और शहीद होंगे। दुख हुआ कि करकरे, सालास्कर, शहीद होगए, पर क्या वो सच में शहीद हुए। बार-बार खबरें आती रही कि यहां से इतने हताहत हुए और वहां से संख्या बढ़ गई है। थोड़ी देरी की शांति के बाद फिर फायरिंग या ग्रेनेड हमला। इस बीच एक फैसला जरूर अच्छा हुआ कि मीडिया पर लाइव तस्वीरें दिखाने की मनाई हो गई। इस के पीछे कई लोगों ने कई बात बनाई। पर ये फैसला काफी अच्छा था। मैंने अपने सीनियर के सामने ये बात रखी थी कि कमांडो कहां पर हैं ये हमें नहीं दिखाना चाहिए। पर शायद उन्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने कुछ भी जवाब नहीं दिया, साथ ही कहा कि फिर हम दिखाएंगे क्या? और साथ ही कि दोनों होटलों के केबल कनेक्शन काट दिए गए हैं, तो उन्हें पता कैसे चलेगा। मेरा जवाब था कि फोन और सेटेलाइट फोन के जरिए। कहीं पर भी उनके आका देख रहे होंगे जो उनको इस बात की जानकारी दे रहे होंगे। लेकिन थोड़ी देर के बाद ही इस बात को मान लिया गया था। बहुत खुशी हुई जब कमांडो कार्रवाई के दौरान तीनों जगह को आजाद करा लिया गया। पर शायद बहुत देर में हमने अपना पिंड इन आतंकियों से छुड़ाया। गलती किसकी? इस बारे में सिर्फ तथ्यों के साथ अगली पोस्ट में लौटूंगा।
लेकिन ये ५-६ दिन ऐसे थे कि ना चाहते हुए भी लगा कि हमने इस बार बहुत खोया है। कई सवाल मन में उठ रहे हैं। उन सब सवालों के जवाब और उन पर उठते सवालों के साथ अगली पोस्ट में सब लिखूंगा। अभी के लिए इतना ही।
आपका अपना
नीतीश राज
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मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”